रविवार, 31 जनवरी 2021

पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की नई किताब "बाइ मैनी ए हैपी ऐक्सिडेंट: रीकलेक्शंस ऑफ ए लाइफ" नए खुलासे नए विवाद

 

27 जनवरी 2021 को विमोचन की गई यह किताब अमेज़न पर ₹125 मूल्य पर उपलब्ध है. इस किताब को सुर्खियों में लाने के लिए हामिद अंसारी ने नरेंद्र मोदी के साथ हुए उनके वार्तालाप और घटनाओं को सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत किया है. इसके अतिरिक्त इस किताब में कुछ भी खास नहीं है.

इस किताब के बारे में विमर्श करने से पहले 26 जनवरी 2021 को हामिद अंसारी और नरेंद्र मोदी के बीच हुई एक संक्षिप्त वार्तालाप से नरेंद्र मोदी और हामिद अंसारी के बीच के रिश्ते और उनकी संवैधानिक भूमिका के बारे में काफी कुछ समझा जा सकता है.

हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी 26 जनवरी को राष्ट्रपति भवन में “एट होम” का आयोजन किया गया था. कोविड-19 के कारण आयोजन पहले ही काफी संक्षिप्त था, उस पर दिल्ली में हो रही घटनाओं ने इसे फीका बना दिया था. आयोजन की परंपरा के अनुसार सभी आमंत्रित लोग समय से आधे घंटे पूर्व पहुंच जाते हैं और प्रोटोकॉल के अनुसार तय समय पर सबसे पहले प्रधानमंत्री, उसके कुछ देर बाद उपराष्ट्रपति और आखिर में राष्ट्रपति आते हैं.

मोदी ने पहुंचकर अपनी आदत के अनुसार प्रत्येक मेज पर जाकर लोगों का हालचाल जाना और अभिवादन किया. हामिद अंसारी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पास बैठे थे. मोदी जब उनके पास पहुंचे तो हामिद अंसारी ने मुस्कुराते हुए पूछा “कैसे हैं जनाब ?”

मोदी ने भी उसी तत्परता से जवाब दिया “ जी रहे हैं.. साहब, …… आपके बिना” इसके बाद हामिद अंसारी के चेहरे पर मुस्कुराहट गायब हो गई.

बात बहुत छोटी है लेकिन बहुत कुछ कहती है. पास खड़े हुए लोगों ने भी इसे शिद्दत से महसूस किया. एक वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश सिंह,जो इस आयोजन में आमंत्रित थे, ने अपने ब्लॉग में इसका उल्लेख किया है.

( २७ जनवरी २०२१ को राष्ट्रपति भवन में एट होम में हामिद अंसारी और मोदी )

स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद ही कभी उपराष्ट्रपति के पद पर बैठा कोई व्यक्ति इतना विवादित रहा हो, पद पर रहने के दौरान और पद पर छोड़ने के बाद भी जितना हामिद अंसारी हैं. उनके डीएनए में भी खिलाफत आंदोलन के बीज हैं, क्योंकि उनके नाते-रिश्तेदार 19वीं सदी में धार्मिक आधार पर हुए इस पहले आंदोलन का हिस्सा रहे थे, जहां से जन्मे मुस्लिम अलगाववाद ने आखिर देश का विभाजन भी करवा दिया. धार्मिक आधार पर – हिंदुस्तान और पाकिस्तान अस्तित्व में आए. हामिद अंसारी आज भी उसी मानसिकता में जी रहें हैं.

अपनी नई किताब " बाई मैनी ए हैप्पी एक्सीडेंट रिकलेक्शन ऑफ़ ए लाइफ " में उन्होंने मोदी पर जमकर भड़ास निकाली है .

हामिद अंसारी ने बतौर उपराष्ट्रपति अपने कार्यकाल के आखिरी सवा तीन वर्षों में पीएम मोदी और उनकी सरकार को परेशान करने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी.

पीएम मोदी ने 10 अगस्त 2017 के अपने भाषण में गिनाया था कि किस तरह हामिद अंसारी के कैरियर का ज्यादातर समय मध्य और पश्चिम एशिया के देशों में बीता, जहां वो कूटनीति की अलग-अलग भूमिकाओं में थे. रिटायरमेंट के बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रहे, फिर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष, जहां से सीताराम येचुरी जैसे अपने वामपंथी मित्रों की मदद से यूपीए-1 के दौरान वो उपराष्ट्रपति बनने में कामयाब रहे थे.

( सेवा निवृत्ति के अवसर पर हामिद अन्सारी)

अंसारी ने अपनी किताब में कहा भी है कि मोदी ने खास तौर पर मुस्लिम देशों में उनके कैरियर का जिक्र और एक खास दृष्टिकोण की बात कर साफ संकेत देने की कोशिश की थी.

मोदी ने हामिद अंसारी के विदाई भाषण में माइनॉरिटी सिंड्रोम से पीड़ित होने का जो आरोप इशारों-इशारो में लगाया था और सांप्रदायिक सोच की तरफ भी इशारा किया था, उसके पीछे भी कई वजहें रहीं. हामिद अंसारी ने सार्वजनिक तौर पर कई बार इस्लामिक कार्ड खेला था. यही नहीं, मध्यपूर्व के कई मामलों में उनकी राय भारत सरकार की राय से अलग मुस्लिम प्रेम के नाते थी. पद छोड़ने के तुरंत बाद भी वो विवादास्पद संगठन, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के केरल के एक कार्यक्रम में भी शरीक हो आए थे, जिस पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के ढेरों आरोप हैं.

अंसारी ने किताब में लिखा हैं कि जिस समय एनडीए ये मांग कर रही थी डिन यानी शोर-शराबे के बीच भी महत्वपूर्ण बिल राज्य सभा में पारित कराए जाएं, उसी दौर में एक दिन पीएम मोदी बिना किसी पूर्व सूचना के उनके चेंबर में आए और बड़े अधिकार पूर्वक कहा कि उनसे ज्यादा जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभाने की उम्मीद की जाती है, लेकिन वो उनकी सहायता नहीं कर रहे हैं.

सवाल ये उठता है कि अपनी पुस्तक को सनसनीखेज बनाने के लिए इस तरह की घटनाओं का जिक्र किताब में करना चाहिए था? यह उपराष्ट्रपति की गरिमा के अनुकूल नहीं है.

लगता है कि उनका इरादा दुनिया को यह बताना है कि मोदी किस तरह से उपराष्ट्रपति के पद पर बैठे शख्स को धमकाने आए थे.

बतौर राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी का कार्यकाल बेहद पक्षपात पूर्ण रहा. हामिद अंसारी ने अपनी किताब में लिखा है कि यूपीए के दौरान उन पर कभी शोर-शराबे के बीच बिल पास कराने का दबाव नहीं आया .

मोदी के साथ अपनी उसी बातचीत का जिक्र करते हुए हामिद अंसारी ने किताब में ये भी लिखा है कि पीएम मोदी राज्यसभा टीवी के कामकाज से नाराज थे और कहा था कि ये सरकार के अनुकूल नहीं है,

राज्यसभा टीवी का गठन और इसका कामकाज शुरु से विवादों के घेरे में रहा है, और इस विवाद के केंद्र में रही है खुद अंसारी की भूमिका.

राज्यसभा में नियुक्तियों में राजनीतिक विचारधारा और प्रभाव को हर तरह महत्व दिया गया, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक पत्रकार की ऐसी नियुक्ति हुई, जो कांग्रेस के बड़े नेता ( दिग्विजय सिंह ) की बाद में पत्नी बन गयीं .

राज्यसभा टीवी में उपकरणों की खरीद से लेकर बाहर से कार्यक्रम बनाए जाने के नाम पर जो करोड़ों का भ्रष्टाचार हुआ, उसकी जांच जरूर शुरु हो गई है, इससे भी हामिद अंसारी परेशान हैं .

कुछ लोग विवादों से बचते हैं तो हामिद अंसारी जैसे कुछ लोग विवादों का हमेशा पीछा करते हैं.

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

क्या रजिस्ट्री के बाद म्युटेशन करवाना जरूरी है और न करवाने के क्या नुकसान हैं?

ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट १८८२ के अनुसार किसी भी संपत्ति के स्वामित्व हस्तांतरण हेतु अभिलेख ( सेल डीड, गिफ्ट डीड या अन्य ) का पंजीकरण या रजिस्ट्री होना अनिवार्य है.

  • इस रजिस्ट्रेशन या पंजीकरण पर सरकार कर लगाती है जो स्टैंप ड्यूटी के रूप में क्रेता को देनी पड़ती है, जिसका निर्धारण संपत्ति के मूल्य या सरकार द्वारा निर्धारित सर्किल रेट के अनुसार किया जाता है.
  • अगर संपत्ति का विक्रय किया जाता है तो इसे सेल डीड, अगर गिफ्ट दिया जाता है तो इसे गिफ्ट डीड कहा जाता है.
  • रजिस्ट्रेशन या रजिस्ट्री की कार्यवाही रजिस्ट्रार के कार्यालय में संपादित की जाती है जो इस तरह के स्थानांतरण और विक्रय का रिकॉर्ड रखते हैं.
  • रजिस्ट्रेशन या रजिस्ट्री संपत्ति हस्तांतरण की पहली प्रक्रिया है और यह एक तरह से संपत्ति हस्तांतरण के लिए प्रमाण पत्र की तरह होती है लेकिन यह अपने आप में स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं है.

इसे थोड़ा विस्तार से समझ लेना बहुत आवश्यक है.

  • हर संपत्ति का ब्यौरा सरकार के संपत्ति रजिस्टर या सरकारी दस्तावेजों में होता है और यह किसी भी संपत्ति के स्वामित्व या मालिकाना हक का अंतिम दस्तावेज माना जाता है.
  • अगर यह कृषि भूमि है तो इसका विवरण राजस्व दस्तावेजों में होता हैं, जो तहसील या स्थानीय राजस्व कार्यालय में होते हैं.
  • अगर यह शहरी भूमि या मकान है, तो इसका विवरण संबंधित विकास प्राधिकरण, नगर निगम, नगर महापालिका या अन्य संबंधित विभाग में होता है.
  • जब भी कभी संपत्ति का क्रय - विक्रय होता है तो इन सरकारी दस्तावेजों में संपत्ति स्वामी के नाम के स्थान पर नए खरीदार का नाम लिखवाना अत्यंत आवश्यक है.
  • मूल सरकारी दस्तावेजों में नाम परिवर्तित करने की इस प्रक्रिया को म्यूटेशन, इंतकाल या दाखिल खारिज कहा जाता है. इसलिए जब तक म्यूटेशन इंतकाल या दाखिल खारिज नहीं हो जाता है तकनीकी रूप से खरीदार को स्वामित्व नहीं मिलता और सम्पत्ति पर पुराने मालिक का नाम अंकित रहता है .

म्यूटेशन इंतकाल या दाखिल खारिज न करवाने के नुकसान

  • म्यूटेशन न करवाए जाने पर संपत्ति के सरकारी दस्तावेजों में पहले वाले भू -स्वामी का नाम रहता है और तकनीकी तौर पर वह संपत्ति का मालिक होता है.
  • जब तक संपत्ति रजिस्टर में पुराने भू - स्वामी का नाम है, किसी धोखाधड़ी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
  • बिना धोखाधड़ी किये भी एक स्वाभाविक परेशानी होती है कि सरकारी दस्तावेजों में दर्ज भू स्वामी की मृत्यु के पश्चात उत्तराधिकार कानून के अनुसार थोड़ी सी औपचारिकता के बाद ( मृत्यु प्रमाण पत्र और उत्तराधिकार प्रमाण पत्र) तहसील, नगर निगम और नगर महापालिका में मृतक के उत्तराधिकारियों का नाम आ जाना बहुत आम बात है.
    • ये उत्तराधिकारी खरीदार को अनावश्यक कोर्ट कचहरी के चक्कर में डाल सकते हैं.
  • मूल भूस्वामी भी लालच में आकर अपनी संपत्ति की दोबारा रजिस्ट्री कर सकता है और इस तरह एक ही संपत्ति के दो खरीदार हो जाएंगे.
  • अगर दूसरा खरीदार ज्यादा तेज हुआ और उसने पहले म्यूटेशन करा लिया तो भी अनावश्यक मुकदमे बाजी शुरू हो जाएगी.
  • रजिस्ट्री कराने के बाद यदि काफी समय हो गया है तो भी संबंधित विभाग को एक लंबी प्रक्रिया का पालन करना होता है जिसके अनुसार क्षेत्रीय समाचार पत्रों में इस म्यूटेशन के आवेदन की सार्वजनिक सूचना दी जाती है ताकि यदि किसी को आपत्ति हो तो वह अपनी आपत्ति दर्ज करा सके.
    • इसमें अनावश्यक परेशानी तो होगी ही समय और पैसे की भी बर्बादी होगी.
    • दुर्भाग्य से अगर किसी ने आपत्ति दाखिल कर दी तो व्यर्थ की मुकदमे बाजी भी शुरू हो सकती है.

क्या सावधानी बरतें ?

  • जब भी कोई संपत्ति खरीदें चाहे वह कृषि भूमि हो या शहरी भूमि या कोई बना बनाया मकान , उसकी सर्च रिपोर्ट किसी वकील के माध्यम से जरूर बनवानी चाहिए.
  • यह वकील संबंधित रजिस्ट्री ऑफिस और संबंधित संपत्ति कार्यालय के कम से कम 12 साल के रिकॉर्ड देखेगा और नॉन इनकंब्रेंस सर्टिफिकेट बनाएगा.
  • इसके साथ ही वह वकील बिक्री करने वाले व्यक्ति और संपत्ति दस्तावेजों में अंकित अंतिम व्यक्ति की छानबीन करेगा और पिछले 30 सालों में संपत्ति हस्तांतरण की श्रंखला की जांच करेगा ( चैन ऑफ टाइटल डीड)
  • उपरोक्त दोनों चीजें सही होने पर ही संपत्ति खरीदनी चाहिए.
    • अगर आप किसी अच्छे बैंक से ऋण ले रहे हैं तो संभवत इन बातों का पालन किया जाएगा
      • स्टेट बैंक में बिना इन रिपोर्ट्स के ऋण नहीं दिया जा सकता . इस प्रक्रिया में काफी समय भी लगता है और थोड़ा खर्चा भी होता है इसलिए कई बार लोगों को स्टेट बैंक की प्रक्रिया काफी जटिल और लंबी लगती है.
      • मेरे राय में यह अत्यंत आवश्यक है कि जिस संपत्ति में आप इतना निवेश कर रहे हैं उसकी पूरी तरह से जांच पड़ताल होनी ही चाहिए.
  • एक बार जब आप सभी तरह की कमियों से मुक्त, साफ और स्वच्छ स्वामित्व वाली संपत्ति खरीदते हैं तो इसके तुरंत बाद संभव हो तो एक माह के अंदर नाम स्थानांतरण के लिए आवेदन कर देना चाहिए.
  • यही नहीं जब आपका नाम आ जाता है तो उसके बाद भी आप किसी वकील के माध्यम से एक छोटी सर्च रिपोर्ट प्राप्त कर सकते हैं ताकि आप सुनिश्चित कर सकें कि वह संपत्ति आपके नाम आ चुकी है.

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भारत की अर्थव्यवस्था को तेज रफ्तार से आगे बढ़ाने के लिए हमें कैसी वित्तीय व्यवस्था अपनानी चाहिए?

तुरत फुरत किसी इकोनामिक मॉडल को बदल पाना बहुत मुश्किल होता है. स्वतंत्रता के बाद भारत की अर्थव्यवस्था मिश्रित अर्थव्यवस्था बनाई गई थी, जिसका मतलब होता है पब्लिक सेक्टर और प्राइवेट सेक्टर का साथ साथ काम करना.

दुर्भाग्य से पब्लिक सेक्टर में जहां निवेश किया गया वह ऐसे स्थान थे जहां प्राइवेट सेक्टर को बढ़ावा दिया जाना चाहिए था. श्रीमती इंदिरा गांधी के समय में इसमें कुछ परिवर्तन करने की कोशिश की गई, बहुत अच्छे परिणाम भी निकले लेकिन जल्दी ही सब कुछ वोट बैंक के हवाले हो गया.

इस कारण बैंक राष्ट्रीयकरण करने के एक अच्छे कार्य के बाद, बड़ी संख्या में कपड़ा, जूट, कताई, चीनी, खाद, बीज, स्कूटर, ट्रैक्टर, घड़ी जैसे तमाम तरह के यांत्रिक मिलों का भी अधिग्रहण सरकार ने किया जिसमे बहुत पैसा निवेश किया गया लेकिन कालांतर में यह सारी मिले बंद हो गई.

इस तरह के कार्य से पैसा तो बर्बाद हुआ ही, प्राइवेट सेक्टर को याचक की मुद्रा में खड़ा कर दिया गया और उसके बाद प्राइवेट सेक्टर और उस को गति देने वाली पूंजी पतियों को स्थाई रूप से चोर और बेईमान घोषित कर दिया गया, दुनिया में ऐसा कहीं नहीं होता और यह भी एक बहुत बड़ा कारण है भारतीय अर्थव्यवस्था के गति न पकड़ पाने का. दुनिया में जितनी भी बहुराष्ट्रीय कंपनी है, ज्यादातर या लगभग सब प्राइवेट सेक्टर से है और वह अपने देशों के लिए दुनिया भर से राजस्व कमा कर लाती हैं . क्या भारत में एक भी ऐसी प्राइवेट कंपनी है जिसका कोई भी उत्पाद पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो ?

दुर्भाग्य से ऐसी कोई भी कंपनी भारत में नहीं है.

कौन है सबके लिए जिम्मेदार ? केवल और केवल सरकारी नीतियां.

  • सरकार का काम व्यापार करना नहीं है और दुनिया की ज्यादातर सरकारें व्यापार में भाग नहीं लेती हैं . भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में सरकार के पास इतना धन नहीं होता है कि वह व्यापार कर के अपनी पूंजी गवां दे और जो धन कल्याणकारी राज्य की स्थापना के लिए गरीबों के जीवन उत्थान के लिए काम आ सकता है व्यर्थ में बर्बाद कर दिया जाए.
  • हमारा आयात बहुत ज्यादा है और निर्यात बहुत कम और यह व्यापार घाटा प्रतिवर्ष बढ़ता जा रहा है. इसका प्रमुख कारण है कि औद्योगिक क्षेत्र में भारत का निष्पादन गुणवत्ता और लागत के हिसाब से विश्व स्तर पर प्रतियोगी नहीं है.
  • जो सामान चीन से बन कर, तमाम करों का भुगतान करने के बाद भी फुटकर दुकानों में बहुत सस्ता मिलता है किन्तु उसकी उत्पादन लागत भारत में इतनी ज्यादा होती है कि वह इनके सामने कहीं नहीं ठहरते.
  • इससे उबरने के लिए हमें न केवल अपना औद्योगिक मूलभूत ढांचा व्यवस्थित करना पड़ेगा बल्कि हड़ताल और विभिन्न श्रमिक असंतोष उनसे मुक्ति पानी होगी.
  • भारत को न केवल अपने उपभोग की चीजों को देश में बनाना होगा बल्कि ऐसी चीजें भी बनानी होगी जिनका बड़े पैमाने पर निर्यात किया जा सके ताकि हमारा व्यापार घाटा खत्म हो सके.
  • स्वतंत्रता के बाद से सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान निरंतर घटता जा रहा है और अब यह लगभग 16% के आसपास आ गया है.
  • कितनी बड़ी विडंबना है कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जहां की 75% आबादी आज भी कृषि या कृषि आधारित उद्योगों पर आधारित हो , उस क्षेत्र का योगदान सिर्फ 16% है . हमें इसे बढ़ाना होगा ताकि न केवल नए रोजगार सृजित किए जा सकें बल्कि अर्थव्यवस्था को भी गति दी जा सके.
  • इसके लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है कृषि सुधारों की ताकि कृषि को लाभकारी तथा उपयोगी और उद्योगपूरक बनाया जा सके.

अगर भारत आने वाले कुछ वर्षों में कृषि तथा उद्योगों के बीच, और प्राइवेट और पब्लिक सेक्टर के बीच समन्वय स्थापित किया जा सके तो अब शीघ्र ही उत्प्रेरित किया जा सकता है.


क्या है मकर संक्रांति और सूर्य का उत्तरायण होना ?




सूर्य का उत्तरायण होना वास्तव में भारतीयता का उत्तरायण होना है.

इसका अत्यंत धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व है. हजारों साल पहले वैदिक ग्रंथों में जो लिखा गया था उसे मात्र सौ साल पहले ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझा जा सका है.

इससे पहले मकर संक्रांति और सूर्य के उत्तरायण और दक्षिणायन होने की घटना को भारतीय धार्मिक मानसिकता करार दिया जाता था. दुर्भाग्य से इस पर विश्वास न करने वालों में ज्यादातर भारतीय ही थे और कुछ आज भी हैं.

महाभारत का समय ईशा पूर्व 5000 वर्ष पश्चिमी विद्वान स्वीकार करे हैं उसके अनुसार आज से 7000 हजार वर्ष पूर्व भीष्म पितामह सरसय्या पर लेटे हुए अपना शरीर छोड़ने के लिए सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की थी . इसका मतलब है कि उस समय भी लोगों को ब्रह्माण्ड की यह खगोलीय घटना की जानकारी थी और वैज्ञानिकों को केवल 100 वर्ष पूर्व यह घटना और इसके प्रभाव पता चल सके. यह है भारत का वैदिक ज्ञान.

आज जब इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण सिद्ध हो चुका है तो हम इसके धार्मिक और वैज्ञानिक खगोलीय दृष्टिकोण का संक्षेप में विश्लेषण करते हैं.

  1. भारतीय धार्मिक मान्यता
  • वैदिक ग्रंथों के अनुसार जब सूर्य उत्तरी गोलार्ध से दक्षिणी गोलार्ध की तरफ गमन करने लगता है तब इसे सूर्य का दक्षिणायन होना कहते हैं और जब दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध की तरफ गमन करता है तो उसे सूर्य का उत्तरायण होना कहा जाता है.
  • सूर्य पृथ्वी के लिए ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है और आज सूर्य की किरणें दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध की तरफ बढ़ने लगती हैं, जिसके कारण आज से दिन बड़ा होने लगता है और मौसम शरद से ग्रीष्म ऋतु में परिवर्तित होने लगता है.
  • सूर्य के उत्तरायण होने का मतलब है सूर्य द्वारा मकर रेखा को संक्रांत करना और धनु से मकर पर पहुंचना.
  • मकर राशि का स्वामी शनि होता है और वह सूर्य का पुत्र है. इसलिए माना जाता है कि सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने के लिए जाते हैं.
  • शनि को अंधेरे का प्रतीक माना जाता है इसलिए आज के दिन सूर्य का मकर पर पहुंचना पूरे ब्रह्मांड को प्रकाश पहुंचाता है.
  • आज के दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर उत्तर की तरफ बढ़ने लगता है. मकर राशि में सूर्य के प्रवेश करने को मकर संक्रांति कहा जाता है.
  • ऐसा माना जाता है कि देवता उत्तरी गोलार्ध और दक्षिणी गोलार्ध में रहते हैं और जब सूर्य उत्तरायण होने लगता है तो इसे अत्यंत शुभ माना जाता है.
  • इस संक्रांति के कारण जलवायु पर असर पड़ता है और वातावरण में होने वाली विभिन्न जैविक / अजैविक क्रियाओं के कारण मानव शरीर पर दुष्प्रभाव होने की संभावना रहती है इसलिए आज के दिन शुद्धता का विशेष महत्व बताया गया है.
  • इस दिन वेद मंत्र उच्चारण के साथ जल तीर्थों में जप, तप, स्नान, ध्यान, दान के माध्यम से तन मन की शुद्धि के अनुष्ठान का प्रावधान है.
  • पाचन संबंधी विकारों से बचने के लिए चावल और दाल मिश्रित खिचड़ी खाने का प्रावधान है और आज हल्के फुल्के और शरीर में ऊष्मा उत्पन्न करने वाले पदार्थ जैसे गुड़ तिल आदि खाने का प्रावधान है.
  • आज के दिन काशी प्रयाग पर गंगा सागर में स्नान करने का विशेष महत्व है.
  • दूरदराज से साधु, सन्यासी और ऋषि कल्पवास करने के लिए प्रयाग और काशी पहुंचते हैं जहां ये गंगा के किनारे वास करते हैं जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है.
  • आज के दिन ही भगीरथ गंगा को लेकर गंगासागर पहुंचे थे.
  • आज काशी में गंगा भी उत्तरवाहिनी हो जाती है.
  • आज के ही दिन खरमास की समाप्ति होती है.

2. वैज्ञानिक और खगोलीय महत्व :

  • वैज्ञानिक दृष्टि से यह सिद्ध हो चुका है कि मकर संक्रांति खतरनाक विकरण और उसमें भी सबसे खतरनाक अल्ट्रावायलेट ‘सी’ से सुरक्षित रखने में सहायता करता है.
  • सूर्य के उत्तरायण होने की स्थिति में पूरे भारतवर्ष में खासतौर से उत्तर भारत में कैंसर उत्पन्न करने वाली तथा त्वचा को झुलसाने वाली पराबैंगनी किरणों का प्रभाव कम होने लगता है.
  • मकर संक्रांति के कारण पूरे उत्तरी गोलार्ध में ओजोन परत में सघनता आ जाती है और इसके कारण नुकसानदायक किरणें और विकरण पृथ्वी पर नहीं पहुंच पाता है.
  • खगोलीय घटना के अनुसार आज का दिन सौर मंडल के केंद्र जो स्वयं सूर्य हैं, से लेकर उसकी परिधि शनि तक सब प्रकाशित हो जाने का पर्व है.

भारत में इस पर्व की विविधता :

पूरे भारतवर्ष में मकर संक्रांति का पर्व विभिन्न रूपों में मनाया जाता है इसे मकर संक्रांति, पोंगल, लोहड़ी, भोगाली, भोगी आदि नामों से श्रद्धा और विश्वास से मनाया जाता है.


मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

कन्यादान को महादान क्यों कहा जाता है?

 संक्षेप में अगर हम समझना चाहें तो-

  • कन्यादान एक अनुष्ठान है, और पाणि ग्रहण एक संस्कार है .
  • विवाह पति-पत्नी के बीच एक वचन वद्धता हैं, जिसमें कन्यादान एक अति महत्वपूर्ण हिस्सा है.

ये तीनों एक साथ ही संपन्न किए जाते हैं लेकिन बिना कन्यादान के न तो पाणि ग्रहण हो सकता है और न ही विवाह.

इसे विस्तार से समझने के लिए हमें काफी पीछे जाना पड़ेगा.

सनातन सभ्यता का जब विकास हो रहा था, उस समय त्रिदेव के आदेशानुसार ऋषि और मुनियों ने समाज के लिए आदर्श आचार संहिता बनाना शुरू किया जिसमें वैज्ञानिक, सामाजिक, चिकित्सीय, तथा मानव मस्तिष्क के विकास के उपायों को समाहित करते हुए उसे धर्म का अभिन्न अंग बनाना शामिल था .

उस समय धर्म का मतलब मजहब नहीं था बल्कि वह समाज के लिए वैज्ञानिक पद्धति की आदर्श आचार संहिता ही होती थी. इस समय सनातन संस्कृति के अलावा न तो कोई धर्म था और न ही कोई संस्कृति. इस आचार संहिता में एक प्रमुख वैज्ञानिक दृष्टिकोण का पालन किया जाना था जिसके अनुसार

"एक कुल, एक परिवार और एक ही माता पिता की संतानों - पुत्र और पुत्रियों के मध्य शारीरिक संबंध स्थापित नहीं होने चाहिए और विवाह नहीं होने चाहिए क्योंकि इससे रिश्तों की शुचिता और पवित्रता खत्म हो जाने का तो डर था ही, अनुवांशिकीय विकास में यह सबसे विध्वंस कारी हो सकता था."

आज दुनिया के सभी समाज और सभी धर्म इसी परंपरा का पालन करते हैं कुछेक धर्मों ने इसमें शॉर्टकट अपनाए हैं, जिनके परिणामों के बारे में कुछ भी कहना उचित नहीं है, आप स्वयं समीक्षा कर सकते हैं.

विभिन्न पहलुओं पर विचार करते हुए मनुष्यों के समूह को कुल या वंश में वर्गीकृत करने का निर्णय लिया गया और इसके लिए बहुत ही वैज्ञानिक विधि का इस्तेमाल किया गया. इसमें ऋषियों को कुल का प्रथम पुरुष बनाया गया था.

इस व्यवस्था के दो स्वरूप प्रस्तावित थे -

१. पितृकुल व्यवस्था और

२. मातृ कुल व्यवस्था

पितृकुल व्यवस्था में पीढ़ी का अंतरण या वंश का अनुगमन पिता के आधार पर किया जाना था, यानी पीढ़ी अंतरण की इकाई पुरुष थी. इस व्यवस्था में इस कुल से पुत्रियों को पृथक किया जाना था ताकि वह दूसरे कुल में विवाह करके गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर सकें और उस कुल का हिस्सा बन जाए.

मातृ कुल व्यवस्था में पीढ़ी अंतरण माता के आधार पर होना था इसमें पीढ़ी अंतरण की इकाई महिला थी इसलिए पुत्रों को इस कुल व्यवस्था से पृथक किया जाना था ताकि पुत्रियों की तरह वे दूसरे कुल में विवाह करके गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर सकें और फिर उस कुल का हिस्सा बन जाए.

इन दोनों व्यवस्थाओं में क्रमश: पुरुषों और महिलाओं को टैग किया जाना था और उन्हें पहचान दिया जाना था.

इस के वर्गीकरण के लिए -कुल, गोत्र, जाति, उपजाति, उत्पत्ति, सूक्ष्म समूह, आदि को प्राथमिक डाटा बनाया गया था. अन्य डाटा के लिए जन्म तिथि और समय के अनुसार गणना स्वयमेव कर ली जाती है. यह आज भी प्रचलित है और एक ही गोत्र के लड़का और लडकी के मध्य आज भी विवाह नहीं किया जाता है .

आज विज्ञान जब बहुत उन्नति कर चुकी है तब भी पूरे भूमंडल पर जीव जंतुओं और वनस्पतियों का वर्गीकरण भी इसी व्यवस्था की तरह ही किया जा रहा है . ( डिवीजन, फाइलम, क्लास, सब क्लास, स्पीशीज आदि )

अनुवांशिकीय लक्षणों की स्थानांतरण क्षमता और सामाजिक व्यावहारिकता को देखते हुए पितृकुल व्यवस्था को श्रेष्ठ माना गया और इसे लागू किया गया.

लेकिन प्रायोगिक तौर पर मातृ कुल व्यवस्था को भी सीमित स्वरूप में लागू किया गया जिसमें से ज्यादातर कालांतर में पितृ कुल व्यवस्था में समाहित हो गए.

लेकिन बेहद विचारणीय प्रश्न है कि

  • क्या किसी माता-पिता के लिए अपनी किसी भी संतान को चाहे वह पुत्र हो या पुत्री अपने से पृथक करना और दूसरे कुल का हिस्सा बना देना आसान कार्य है ?
    • नहीं यह बिल्कुल भी आसान नहीं है और कोई भी माता पिता अपने कलेजे के टुकड़े को अलग कैसे कर सकता था ? यह मामला ममत्व का है और बेहद संवेदनशील और भावनात्मक भी है . लेकिन यह संपूर्ण मानव जाति की सुरक्षा और निरंतरता के लिए प्रस्तावित सामाजिक व्यवस्था के अनुपालन हेतु आवश्यक था.
  • इसलिए इसे धार्मिक बनाकर माता पिता के प्रथम कर्तव्य में शामिल करते हुए महादान की संज्ञा दी गई, भाई और बहिन के रिश्ते की पवित्रतास्थापित की गयी.
    • इसे महादान इसलिए कहा गया क्योंकि यह दान की तरह साधारण कार्य नहीं था . यह अपने आप में असाधारण कार्य था जिसे करने के लिए माता और पिता के पास बहुत बड़ी मानसिक शक्ति की आवश्यकता थी और इसलिए कन्यादान या पुत्र दान को बहुत अद्भुत और अद्वितीय बनाते हुए महादान की संज्ञा दी गई.
    • माता पिता को आश्वस्त करने के लिए ही पति और पत्नी के लिए वचनबद्धता बनाई गई जिसे अग्नि को साक्षी बनाकर वचनबद्ध होते हुए विवाह बंधन में बंधने का संस्कार बनाया गया.

कन्यादान की महत्ता को और विस्तार से समझने के पहले हमें पुत्र दान के बारे में जान लेना भी जरूरी है. हमारे देश में कई स्थानों पर अभी भी मातृ कुल व्यवस्था चल रही है जहां कन्यादान की जगह पुत्र दान होता है.

मेघालय में ज्यादातर लोग खासी जनजाति समुदाय से है जहां मातृ कुल व्यवस्था का प्रचलन आज भी है. यहां परिवार की संपत्ति मां के नाम पर होती है और उसकी मृत्यु के उपरांत बेटियों के नाम में स्थानांतरित होती है. बेटियां उसी घर में रहती हैं. शादी में दूल्हे विदा होकर आ जाते हैं और शेष जीवन लड़की के पास रहते हैं .

इसी तरह परिवार के पुत्र भी शादी के बाद विदा होकर अपनी पत्नियों के पास अन्यत्र चले जाते हैं.

यह पूरी परंपरा मुख्य धारा के विपरीत है लेकिन हजारों वर्षों से लगातार चल रही है. मेघालय में इसे राज्य की मान्यता प्राप्त है और संपत्ति का सरकारी दस्तावेजों में हस्तांतरण इसी प्रकार होता है.

अब उदाहरण से समझते हैं कन्यादान की महत्ता और इसे महादान क्यों समझा जाना चाहिए ?

कन्यादान कब से शुरू हुआ इसका बिल्कुल सटीक समय बताना तो संभव नहीं है लेकिन यह सनातन सभ्यता के साथ ही शुरू हो गया था. इसका पता इस बात से चलता है कि भगवान शंकर का सती के साथ विवाह भी इसी पितृ व्यवस्था के अंतर्गत हुआ था, जिनमें सती विवाह के उपरांत शंकर जी के साथ रहने कैलाश आ गई थी.

दक्ष प्रजापति अपनी कन्या सती से बेहद प्यार करते थे और उन्हें यह बिल्कुल भी पसंद नहीं था कि उनकी लाडली बेटी किसी ऐसे व्यक्ति से शादी करें जिसके पास रहने के लिए न घर हो, न खाने की कोई व्यवस्था हो. उन्होंने सती को समझाने का बहुत प्रयास किया लेकिन वह नहीं मानी. कहते हैं कि अति प्रेम भी मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी होती है इसलिए कभी-कभी यह प्रेम नाराजगी में भी बदल जाता है.

राजा दक्ष अपनी पुत्री सती के शंकर को पति के रूप में वरण के निर्णय से बहुत दुखी थे इसलिए उन्होंने पुत्री और जामाता से लगभग संबंध विच्छेद कर लिए थे. इसलिए जब उन्होंने यज्ञ किया, सती और शंकर को आमंत्रित नहीं किया. सती बिना बुलाए ही पहुंच गई और उसका परिणाम यह हुआ कि उनका और उनके पति का अपमान किया गया. इससे आहत होकर सती ने यज्ञ कुंड में अपने आप को भस्म कर लिया. शंकर जी को पता चला तो उन्होंने यज्ञ का विध्वंस कर दिया और सती का मृत शरीर बाहों में लेकर शोकाकुल और विषाद की की अवस्था में ब्रह्मांड में विचरण करने लगे.

यह पूरे भूमंडल के लिए एक सन्देश था . यह प्रसंग कन्यादान और कन्या के नए कुल में प्रवेश का महत्व दर्शाने के लिए पर्याप्त है जिसके कुछ विचारणीय प्रश्न है -

  • सती अपने पति के अपमान से इतनी व्यथित हो गई कि उन्होंने अपने आप को समाप्त कर लिया, आखिर उनके पति का अपमान करने वाला उन को जन्म देने वाला उनका पिता ही तो था. पति तो दूसरे कुल से संबंधित था. फिर सती ने ऐसा क्यों किया ?
    • इसका कारण है पति पत्नी के बीच परस्पर प्रेम और संबंधों की मजबूत आधारशिला जो शायद माता-पिता से उसके संबंधों से भी ज्यादा मजबूत है.
  • शंकर ने दक्ष प्रजापति का यज्ञ और कुछ विध्वंस कर दिया, क्योंकि राजा दक्ष ने उनकी पत्नी सती का निरादर किया था. पर उनकी पत्नी तो राजा दक्ष की बेटी थी, उनको बेटी से नाराजगी जाहिर करने का अधिकार था. फिर शंकर जी ने ऐसा क्यों किया ?
    • शंकर जी का यह कृत्य, पति पत्नी के बीच प्रेम के संबंधों की प्रगाढ़ता को रेखांकित करता है. उनका प्रेम चरम की वह अवस्था है जिसमें वह देवों के देव होने के बाद भी शोकाकुल हो जाते हैं, अवसाद में आ जाते हैं और उनके मृत शरीर को लेकर ब्रह्मांड में भटकने लगते हैं.
  • इस घटना या लीला से से संसार के सभी माता पिता को आश्वस्त होने का सन्देश भी मिला और पुत्री विछोह सहन करने का शक्ति और सामर्थ्य भी मिलता है .

मैंने शंकर जी का उदाहरण इस लिए दिया है कि यह विवाह सनातन सभ्यता के विकास के समय ही हुआ था, जिस समय वेदों की रचना भी नहीं हो पाई थी.

शंकर जी के विवाह का ही दूसरा उदाहरण देखें.

जब शंकर जी का विवाह पर्वतराज हिमालय की बेटी पार्वती के साथ में हुआ. शादी समारोह सब कुछ सामान्य ढंग से हुआ और सबसे बड़ी चीज थी कि पार्वती के पिता पर्वतराज हिमालय ने बहुत खुशी-खुशी कन्यादान किया और इस कारण दोनों परिवारों के बीच में बहुत ही मधुर संबंध बने रहे. न केवल शंकर पार्वती और उनके बेटे, बेटियां बल्कि पार्वती के माता-पिता भी कैलाश पर आते जाते रहे.

इस उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि कन्यादान का मतलब परित्याग करना नहीं है बल्कि अपनी कन्या को, अपनी लाडली को, सनातन परंपरा के अनुसार दूसरे कुल में स्थापित करना है ताकि न केवल दो कुलों के बीच में संतुलन और सामंजस्य बना रहे बल्कि सनातन सभ्यता की इस वैज्ञानिक पद्धति द्वारा वंश वृद्धि हो और समाज में शुचिता और रिश्तो की पवित्रता कायम रहे.

क्यों प्रश्न उठते हैं कन्यादान पर ?

  • आज के नारी सशक्तिकरण के इस काल में कुछ प्रगतिशील महिलाएं ही कन्यादान पर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं. इसका कारण संभवत: यह होता है कि उनको लगता है कि दान सिर्फ वस्तुओं का होता है और ऐसे में उन्हें पुत्री की जगह वस्तु समझकर दान किया जा रहा है, जो उनके साथ अन्याय है. ये विषय के समझ के अभाव में स्वभाविक है .
  • प्रश्न इसलिए भी उठाए जाते हैं क्योंकि कुछ लोग अपने बुद्धि और विवेक के आधार पर ऋषि-मुनियों, और यहां तक कि स्वयं भगवान के आचरण पर प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं.
  • यह लोग भगवान को भी अपने समकक्ष बना लेते हैं और खुद उनसे भी ज्यादा ज्ञानी बन जाते है। उनके अपने अपने तर्क हैं, जो कुतर्क ज्यादा होते हैं और जिनका कोई उत्तर नहीं हो सकता है.

यह पूरा लेख कई ग्रंथो और भाष्यों पर आधारित है, इसमें अगर कहीं संशोधन की आवश्यकता महसूस हो तो ज्ञानी जन कृपया टिप्पड़ियों में दे जिसे मैं सहर्ष जोड़ दूंगा .

मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

क्या भारत बंद एक राजनैतिक षड्यंत्र है?

 

इसे राजनीतिक षड्यंत्र तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन यह किसान आन्दोलन के विरुद्ध एक षड़यंत्र अवश्य है.षड्यंत्रकारी राजनैतिक दल अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन हासिल करना चाहते हैं, जिन्हें जनता का कोई भी समर्थन हासिल नहीं है और किसानों की भलाई से तो इनका दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है.

यह भारत बंद प्राथमिक रूप से भाजपा और नरेंद्र मोदी के विरोध स्वरूप आयोजित किया गया है क्योंकि जो विपक्षी दल राजनीतिक रूप से नरेंद्र मोदी का मुकाबला करने में सक्षम नहीं हैं वे कोई न कोई ऐसा मौका तलाशते रहते हैं जिसमें अप्रत्यक्ष रूप से नरेंद्र मोदी के साथ राजनीतिक हिसाब-किताब चुकता किया जा सके.

भारत बंद के बारे में किसानों के साथ साथ विपक्षी दलों को भी आशंका थी कि इसे जनता का समर्थन हासिल नहीं होगा . इसी कारण इस बंद का समय दिन में केवल 11:00 बजे से लेकर 3:00 बजे तक के लिए किया गया है. एसा लगता है कि किसी फिल्म का शो आयोजित किया गया है. बहुत स्पष्ट है कि सुबह का समय ऑफिस जाने वालों के लिए छोड़ दिया हैं और शाम का समय भी आफिस से आने वालों के लिए छोड़ा हैं , अन्यथा उन्हें जनता के सीधे विरोध का सामना करना पड़ता.

ऐसा लगता है कि भारत बंद आयोजित करके विपक्षी दलों के साथ-साथ प्रदर्शनकारी किसान भी फंस गए हैं और अब किसी तरह इसकी औपचारिकता भर पूरी करना चाहते हैं.

दिखावा ही करना था तो अच्छा होता कि भारत बंद के लिए रात 11:00 बजे से सुबह 3:00 बजे का समय चुना गया होता तो यह पूरी तरह से सफल होता और सड़कों पर सन्नाटा होता.
  • अगर हम राज्य वार विश्लेषण करें तो पाते हैं कि प्रत्येक राज्य में बंद का वही समर्थन कर रहे हैं जो या तो राज्य में विपक्ष में है या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना दुश्मन मानते हैं.
  • इनमें से भी ममता बनर्जी ने किसानों की मांगों का तो समर्थन किया है लेकिन उन्होंने बंद से किनारा कर लिया है.
  • सत्ताधारी दलों में वाईएसआर कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश में, एआईडीएमके ने तमिलनाडु में, बीजू जनता दल ने उड़ीसा में बंद का समर्थन नहीं किया है.
  • तेलंगाना में हैदराबाद निकाय चुनाव में बुरी तरह मात खाने वाली सत्ताधारी टीआरएस ने बंद का समर्थन किया है और यही नहीं टीआरएस के कार्यकर्ताओं ने हैदराबाद में रोजाना ड्यूटी पर जाने वाले लोगों के साथ पुलिस के सहयोग से दुर्व्यवहार भी किया है.
  • जिन राज्यों में बंद का थोड़ा बहुत असर दिखाई पड़ रहा है ये वहीं राज्य हैं जहां पर सत्ताधारी दल नरेंद्र मोदी से व्यक्तिगत हिसाब-किताब चुकता करना चाहते हैं.
  • बिहार में जहां राष्ट्रीय जनता दल और अन्य अनगिनत छोटे-छोटे दलों ने अभी हाल में हार का स्वाद चखा है वे पटना की सड़कों पर हुड़दंग मचा रहे हैं लेकिन न तो स्थानीय दुकानदारों का और ना ही पटरी दुकानदारों का उन्हें समर्थन हासिल है.
  • उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने कल ही प्रेस कांफ्रेंस करके भारत बंद की हवा निकाल डी थी . आज छिटपुट जगहों पर समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने अराजकता फैलाने की कोशिश की जिसे पुलिस ने सख्ती से रोका. ज्यादातर जगहों पर समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता फोटो खिंचवाते ही दिखे और उनके समर्थन में कोई स्थानीय शामिल नहीं हुआ.
  • भारत बंद का यह अभियान पूरी तरह से विपक्षी नेताओं के कहने से ही आयोजित किया गया था और इस चालाकी को दिल्ली में प्रदर्शन करने वाले किसान संगठन समझ नहीं सके. इसलिए उन्होंने 5 दिसंबर की वार्ता की असफलता के बाद पून: 7 दिसंबर को वार्ता का प्रस्ताव सिर्फ इस आधार पर ठुकरा दिया था कि 8 दिसंबर को भारत बंद आयोजित किया गया है. इसलिए अगली वार्ता 9 दिसंबर को रखी जाए.
  • वास्तव में किसान संगठन पूरे भारत में आंदोलन को मिल रहे समर्थन का मूल्यांकन करना चाहते थे.
निष्कर्ष :
  • अब पूरी तरह से स्पष्ट है कि इस आंदोलन का व्यापक जनसमर्थन नहीं है . इसलिए किसान संगठनो को अपने रुख को लचीला बनाते हुए सरकार से वार्ता में सहयोग करना चाहिए और संदेहास्पद बिंदुओं पर सरकार से स्पष्टीकरण लेना चाहिए और परस्पर सहमति से कानून में संशोधन स्वीकार कर लेना चाहिए.
  • सभी जानते हैं कि भारत में तीन चौथाई किसान बहुत छोटे किसान हैं जिन्हें न तो न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ मिलता है,और न हीं मंडियों में बिचौलिए होने का कोई अतिरिक्त फायदा होता है. उन्हें केवल प्रधान मंत्री मोदी द्वारा सीधे दिए जाने वाले रु. ६००० बार्षिक मिलते हैं. उनका भरोसा मोदी पर ज्यादा है.
  • पंजाब सहित पूरे भारत के छोटे किसान इस समूचे आंदोलन से बहुत दूर है क्योंकि कुछ बड़े किसान जो मंडियों पर भी काबिज है वही उनके शोषण के प्रमुख कारक हैं. इसलिए इस आंदोलन में ज्यादातर बड़े किसान और बिचौलिए ही शामिल हैं.
  • अब जबकि आन्दोलन रास्ते से भटक गया है, जैसे -जैसे समय गुजरता जाएगा लोगों को पूरी बात समझ में आती जाएगी और इस आंदोलन की धार कुंद होती जाएगी .
  • फिर इस आंदोलन का अंत उसी तरह से होगा जैसे शाहिनबाग आंदोलन का हुआ था केवल समय की बात है .
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रविवार, 15 नवंबर 2020

अयोध्या की दीवाली २०२०

 बहुत खास थी अयोध्या की दिवाली इस बार जिसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने बहुत पहले से तैयारी कर रखी थी. इस बार अयोध्या की रामलीला का मंचन सुप्रसिद्ध सिने कलाकारों द्वारा किया गया और इसे दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर प्रसारित किया गया ताकि कोविड-19 किस महामारी के समय लोग घर बैठे रामलीला देखने का और सर पा सकें. रामलीला का मंचन भी बहुत खास था और इसे बहुत सराहा गया.

अयोध्या में योगी सरकार आने के बाद दीप जलाने का विश्व रिकॉर्ड बनाने का आयोजन हर साल होता है और इसी क्रम में इस बार भी 6 लाख 6 हजार 569 दीपक जलाने का विश्व रिकॉर्ड बनाया गया. इस तरह अयोध्या विश्व पटल पर अपनी पहचान छोड़ रही है.

दीपमाला का विडियो बहुत चित्ताकर्षक है .

लोगों के अपार उत्साह और कोरोना महामारी को देखते हुए सलाह दी गई थी कि लोग घर बैठे दीप जलाएं और इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने एक पोर्टल बनाई थी जिस पर जाकर आप एक दिया अपना भी जला सकते थे . समूचे विश्व से लोगों ने अपना अपना दिया जलाने का प्रयास किया.

यह वेबसाइट आज भी उपलब्ध है और आप चाहें तो आज भी दिया जला सकते हैं. नीचे लिंक पर क्लिक करे और अपनी पसंद का विकल्प चुनते हुए आगे बढ़ते जाए . बहुत अच्चा वर्चुअल टूर है .

अपना दिया अवश्य जलाएं - Virtual Deepotsav

सबसे अच्छी बात यह रही कि अयोध्या की दीपावली में मुस्लिमों ने दीप जलाये और राम नाम का गुणगान किया .

त्रेता युग में भगवान श्री राम 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या वापस आ गए थे लेकिन कलयुग में उन्हें अपने घर से विस्थापित हुए 492 वर्ष हो चुके थे, उनका निवास कोर्ट कचहरी के चक्कर में फंसा हुआ था . इस वर्ष उनकी घर वापसी का रास्ता साफ हो गया है और शीघ्र ही उनके लिए विश्व प्रसिद्ध राम मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा लेकिन इस बीच भी उन्हें एक अस्थाई किंतु भव्य मंदिर में स्थापित किया गया है.

इस बार अयोध्या की दिवाली मैं कोरोनावायरस की बंदिशों के बावजूद भव्यता और उत्साह देखते ही बनता था. ऐसा लग रहा था कि त्रेता युग की दिवाली फिर से जीवंत हो रही है.

इस अवसर पर लेजर शो का आयोजन किया गया. कोरोना महामारी की वजह से बाहर से श्रद्धालुओं के अयोध्या पहुंचने पर अस्थाई रूप से रोक लगाई गई थी ताकि कोरोना संक्रमण से लोगों का बचाव हो सके लेकिन इस समूचे घटनाक्रम का लाइव टेलीकास्ट किया गया था.

लेजर शो का विडियो बहुत मन मोहने वाला है .

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल आनंदीबेन पटेल अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ भगवान श्री राम के वापस आने पर उनके स्वागत के लिए अयोध्या में थे.

भगवान श्री राम पुष्पक विमान से लक्ष्मण और सीता सहित वापस अयोध्या पहुंचे जहां पर उनका भव्य स्वागत किया गया और एक शोभायात्रा के रूप में राम कथा पार्क ले जाया गया जहां पर उनका राज्याभिषेक किया गया. पूरी अयोध्या नगरी सज धज कर बिल्कुल अलौकिक, अप्रतिम और अद्भुत लग रही थी.

अयोध्या की इस अप्रतिम सुंदरता ने लोगों में विश्वास जगाया है कि अयोध्या का प्राचीन गौरव पुनः प्राप्त हो सकेगा और रामायण सर्किट के रूप में बनाई गई योजना के पूरा होने पर श्रद्धालु अयोध्या से राम वन गमन मार्ग होते हुए चित्रकूट पहुंच सकेंगे.

मुझे लग रहा है कि आने वाले कुछ वर्षों में अयोध्या की दीपावली का उतना ही महत्व हो जाएगा जितना कि प्रयागराज में कुंभ मेले का होता है. जो भी श्रद्धालु या पर्यटक वाराणसी पहुंचेंगे वे अयोध्या पहुंचने का मोह नहीं छोड़ पाएंगे. इससे यहां प्राचीन गौरव के साथ साथ आर्थिक विकास की संभावनाएं अधिक प्रबल हो गई हैं.

यूजीसी नियमों पर मोदी सरकार की लीपापोती

  यूजीसी नियमों पर मोदी सरकार की लीपापोती                    - शिव मिश्रा    केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में यूजीसी नियमों पर चल रही स...