शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

यूपीआई, शुल्क और राजनीति: डिजिटल संप्रभुता, बाज़ार की हकीकत और कूटनीति का त्रिकोण

 

यूपीआई, शुल्क और राजनीति: डिजिटल संप्रभुता, बाज़ार की हकीकत और कूटनीति का त्रिकोण

                           शिव प्रकाश मिश्रा

बीते एक दशक में भारत की आर्थिक और सामाजिक दिनचर्या में यदि कोई सबसे मूक परंतु गहरा क्रांतिकारी परिवर्तन आया है, तो वह है लेनदेन की भाषा का बदलना। गली के नुक्कड़ पर चाय की गुमटी से लेकर बहुमंजिला मॉल के शोरूम तककागज़ी नोटों की जगह मोबाइल की स्क्रीन और 'क्यूआर कोड' ने ले ली है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) द्वारा विकसित 'यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस' (यूपीआई) महज़ एक तकनीकी उपकरण नहीं रहा, बल्कि भारत की डिजिटल संप्रभुता और आर्थिक स्वावलंबन का वैश्विक प्रतीक बन चुका था।

किंतु हाल ही में यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) यानी सेवा शुल्क लगाए जाने के निर्णय ने देश के शांत आर्थिक परिदृश्य में हलचल मचा दी है। २,००० रुपये से अधिक के व्यावसायिक लेनदेन पर ०.४ प्रतिशत का सेवा शुल्क (जो १५ अक्टूबर २०२६ से प्रभावी होना है) तय होते ही यह विषय विशुद्ध अर्थशास्त्र के दायरे से बाहर निकलकर संसद, सड़क और टीवी स्टूडियो की गरमा-गरम बहसों का केंद्र बन गया।

यूपीआई के नए ढाँचे पर राजनीतिक बहस का सबसे पहला कारण शब्दों का भ्रम है। आम नागरिक के लिए यह खबर सरल है—“अब यूपीआई पर शुल्क लगेगा।लेकिन तकनीकी रूप से यह पूरी तरह सही व्याख्या नहीं है, क्योंकि प्रस्तावित शुल्क का भार ग्राहक पर नहीं पड़ेगा। यह शुल्क मर्चन्ट (व्यापारी) वहन करेगा। लेकिन यहीं अर्थशास्त्र और राजनीति एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। व्यापारी को यदि डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की लागत आती है, तो वह लागत अंततः उसके व्यापारिक खर्च का हिस्सा बनती है। व्यापारी चाहे तो अपने मुनाफे में उसे समाहित करे या इसका प्रभाव ग्राहकों पर डाले। इसलिए यह कहना कि ग्राहक पर कोई प्रत्यक्ष शुल्क नहीं हैतथ्यात्मक रूप से सही हो सकता है, लेकिन इससे यह प्रश्न समाप्त नहीं होता कि एमडीआर का आर्थिक भार अंततः किस पर पड़ेगा।

एक तरफ विपक्ष का तीखा आरोप है कि यह कदम वाशिंगटन के दबाव में वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसी अमेरिकी वित्तीय कंपनियों को भारतीय बाज़ार में पुनर्जीवित करने की साज़िश है। वहीं दूसरी ओर सरकार और रिज़र्व बैंक इसे देश के विशाल डिजिटल ढांचे को आत्मनिर्भर और टिकाऊ बनाने का अपरिहार्य कदम बता रहे हैं। क्या सचमुच यूपीआई पर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की छाया पड़ चुकी है, या यह 'मुफ़्त की अर्थव्यवस्था' से 'टिकाऊ आर्थिक यथार्थ' की ओर बढ़ने का अनिवार्य प्रस्थान बिंदु है?

शुल्क का नया गणित: क्या बदला

राजनीतिक नारों और सोशल मीडिया के शोर के बीच यह समझना आवश्यक है कि नीतिगत स्तर पर वास्तव में क्या परिवर्तन हुआ है:

  • आम नागरिक के बीच लेनदेन (पी-टू-पी): एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को भेजे जाने वाले पैसे पूरी तरह निःशुल्क हैं।
  • छोटे व्यापारी और दैनिक खरीदारी (₹२,००० तक के पी-टू-एम): सब्ज़ी, दूध, राशन या दैनिक ज़रूरतों के ₹२,००० से कम के बिलों पर व्यापारियों के लिए एमडीआर पूर्ववत 'शून्य' रहेगा।
  • बड़े वाणिज्यिक भुगतान (₹२,००० से अधिक के पी-टू-एम): शुल्क केवल २,००० रुपये से अधिक के लेनदेन पर प्रभावी होगा, जहाँ व्यापारी से ०.४% एमडीआर लिया जाएगा (जिसकी अधिकतम सीमा ₹३०० निर्धारित है)।

आँकड़ों के अनुसार, यूपीआई के ९५ प्रतिशत लेनदेन २,००० रुपये के दायरे के भीतर होते हैं। यानी आम उपभोक्ता और छोटे दुकानदारों पर इसका तात्कालिक असर शून्य है। किंतु शेष ५ प्रतिशत बड़े लेनदेन यूपीआई के कुल वित्तीय मूल्य का लगभग ६०-६५ प्रतिशत हिस्सा कवर करते हैं। करोड़ों-अरबों रुपये का कारोबार इसी दायरे में आता है और यहीं 'मुनाफ़े', 'लागत' और 'राजनीति' आपस में टकराते हैं।

मुफ़्त की यूपीआई आखिर कब तक?

वर्ष २०२० में डिजिटल लेन-देन को गति देने के लिए यूपीआई और रुपे पर एमडीआर शून्य कर दिया गया था। परंतु अर्थशास्त्र का बुनियादी नियम है—"दुनिया में कुछ भी पूरी तरह मुफ़्त नहीं होता"।

जब कोई उपभोक्ता फोनपे, गूगल पे या पेटीएम से पैसा भेजता है, तो उस लेनदेन के पीछे तीन प्रमुख संस्थाएं काम करती हैं:

१. बैंक: जिनके कोर बैंकिंग सिस्टम (सीबीएस) पर अरबों ट्रांजैक्शन का लोड पड़ता है।

२. एनपीसीआई: जो राष्ट्रीय स्विच और सुरक्षा ढांचा संचालित करता है।

३. पेमेंट एग्रीगेटर: जो दुकानों पर क्यूआर कोड और सॉफ़्टवेयर सपोर्ट मुहैया कराते हैं।

शून्य एमडीआर के दौर में इस विशाल बुनियादी ढांचे के संचालन और सर्वर अपग्रेड की लागत का मामूली हिस्सा सरकार सब्सिडी के रूप में देती थी, जबकि बैंकों की वास्तविक लागत इससे कहीं अधिक हो चुकी थी। बैंक चेतावनी दे रहे थे कि बिना आय के वे सर्वर क्षमता का विस्तार नहीं कर पा रहे हैं, जिससे ट्रांजैक्शन फेल (सर्वर टाइमआउट) होने की दर बढ़ रही थी। इसलिए, ०.४% शुल्क लगाकर उस राशि को बैंकों और ऑपरेटरों के बीच बाँटने का तर्क एक व्यावहारिक सुधार प्रतीत होता है।

विपक्ष का 'अमेरिकी दबाव' का आरोप

नीति की घोषणा होते ही विपक्ष ने इसे 'आम आदमी की जेब पर डाका' करार दिया। विपक्ष का सबसे गंभीर आरोप यह है कि भारत सरकार ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधियों (यूएसटीआर) के कूटनीतिक दबाव के आगे घुटने टेक दिए हैं।

इस आरोप की जड़ें अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं में छिपी हैं। यूएसटीआर अपनी वार्षिक 'नेशनल ट्रेड एस्टीमेट' रिपोर्टों में भारत की शून्य-एमडीआर नीति और 'रुपे' कार्डों की प्राथमिकता को 'नॉन-टैरिफ ट्रेड बैरियर' (गैर-टैरिफ व्यापार बाधा) बताता रहा है। वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसी अमेरिकी कंपनियाँ, जो वैश्विक वित्तीय लेन-देन पर १.५% से २.५% का भारी एमडीआर वसूलती थीं, भारत में यूपीआई के उदय से हाशिए पर धकेल दी गईं। मुफ़्त यूपीआई के सामने कोई व्यापारी पीओएस मशीन का किराया और २% शुल्क क्यों देता? अमेरिकी लॉबी लंबे समय से 'लेवल प्लेइंग फील्ड' (समान अवसर) का दबाव बना रही थी। विपक्ष का तर्क है कि ०.४% शुल्क लागू करके सरकार ने पारंपरिक कार्ड और यूपीआई के बीच लागत की खाई को पाट दिया है।

सरकार का तर्क: संप्रभुता बनाम वित्तीय यथार्थ

दूसरी ओर, वित्त मंत्रालय का रुख स्पष्ट है। उनका कहना है कि ०.४% की दर वीज़ा और मास्टरकार्ड (१.५% से ३%) की तुलना में आज भी सबसे सस्ती है। यह निर्णय किसी विदेशी दबाव में नहीं, बल्कि भारतीय बैंकों और एनपीसीआई की वित्तीय सेहत सुदृढ़ करने के लिए रिज़र्व बैंक की सिफारिशों पर लिया गया है। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह ०.४% कोई 'सरकारी टैक्स' नहीं है। इसका एक भी रुपया राजकोष में नहीं जाएगा, बल्कि यह सीधे बैंकों और तकनीकी कंपनियों को उनके सर्वर और साइबर सुरक्षा अभेद्य बनाने के लिए मिलेगा।

ज़मीनी हकीकत और 'कैश' की वापसी का डर

इस निर्णय के बाज़ार पर दो संभावित परिणाम हो सकते हैं:

१. क्या व्यापारी यह बोझ उठाएंगे? कपड़ा विक्रेता, इलेक्ट्रॉनिक्स डीलर और मध्यम स्तर के रेस्तरां संचालक अब ₹५,००० के बिल पर ₹२० का शुल्क देने को लेकर आशंकित हैं। वे यह अतिरिक्त लागत ग्राहकों के बिल में जोड़ने का प्रयास कर सकते हैं।

२. क्या 'कैश' फिर से लौटेगा? लागत घटाने के लिए यदि बड़े लेन-देन पर व्यापारी ग्राहकों से पुनः 'कैश' मांगने लगें, तो काले धन और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर कसी गई नकेल ढीली पड़ सकती है।

निष्कर्ष और राजनीतिक आकलन

यूपीआई इक्कीसवीं सदी के भारत का वह आत्मविश्वास है जिसने पश्चिमी वित्तीय एकाधिकार को चुनौती दी। इसे राजनीति का मोहरा बनाने के बजाय परिपक्व दृष्टि से देखना होगा। मुफ़्त मॉडल लंबे समय तक नवाचार (इनोवेशन) को जीवित नहीं रख सकता। यदि बैंकों को पारिश्रमिक नहीं मिलेगा, तो तकनीकी उन्नयन ठप हो जाएगा।

हालाँकि, विशुद्ध राजनैतिक चश्मे से देखा जाए तो सरकार का यह कदम नुकसानदेह साबित हो सकता है। निष्पक्ष समीक्षा से ऐसा लगता है कि सरकार ने इसे लागू करने के समय और प्रभाव पर बहुत अधिक चिंतन नहीं किया। शुल्क तब लागू किए जा रहे हैं जब पितृपक्ष के बाद नवरात्रि का समय है और सबसे अधिक खरीदारी होती है।

दूसरा, २०२७ में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती हैं। यद्यपि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं, लेकिन ऐसे समय जब एससी-एसटी ऐक्ट और यूजीसी नियमों के कारण सामान्य वर्ग में भारी आक्रोश है, यूपीआई का यह नया शुल्क भाजपा और विशेषकर योगी सरकार के लिए नई चुनौती बन गया है, जिससे बचा जा सकता था।

(लेखक भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व शीर्ष कार्यपालक अधिकारी  तथा समसामयिक विषयों, आर्थिक नीतियों और सामाजिक सरोकारों के स्वतंत्र विश्लेषक हैं।)

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यूपीआई, शुल्क और राजनीति: डिजिटल संप्रभुता, बाज़ार की हकीकत और कूटनीति का त्रिकोण

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