गुरुवार, 22 जनवरी 2026

A.R. Rahman का बयान या BBC का एजेंडा? | पूरी पड़ताल

 





कला और कट्टरता का इम्तिहान, फेल हुआ अल्ला रख्खा रहमान !

जब सुर राजनीति से टकराए, दूसरों का मोहरा बन जाए और अपने स्वार्थ में अँधा दूसरों को दे दे अपना कंधा,   तो उसका नाम होता है अल्ला रख्खा रहमान.

अल्ला रख्खा रहमान कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। वे भारत के वैश्विक सांस्कृतिक प्रतिनिधि हैं। इसलिए जब उनका नाम बीबीसी जैसे  विवादास्पद अंतरराष्ट्रीय मंच से जुड़ता है, तो हर शब्द केवल एक साक्षात्कार नहीं, बल्कि एक विमर्श बन जाता है। औपनिवेशिक मंशा से ग्रस्त बीबीसी की मंशा तो स्पष्ट है भारत में मुसलमानों के साथ भेदभाव का नैरेटिव स्थापित करना, और वह लम्बे समय से कर भी रहा है, यह सभी जानते हैं

बीबीसी संवाददाता  हारून रशीद को दिए साक्षात्कार के बाद रहमान सुर्खियों में हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें काम नहीं मिल रहा है, पिछले 8 वर्षों में पॉवर शिफ्ट हो गया है और  अब "नॉनक्रिएटिव" लोग तय करते हैं कि किसे काम मिले और किसे नहीं।  इसका मतलब की जबसे केन्द्र में सत्ता परिवर्तन हुआ है, तबसे ऐसा हुआ. यह विशुद्ध राजनीतिक भाषा है काम न मिलने के पीछे सांप्रदायिकता भी कारण  हो सकता है, कैट हुए उन्होंने फिल्म छावा को भी विभाजनकारी बताया, जिसका संगीत खुद उन्होंने दिया था।

अगर सीधे अर्थों में  देखा जाए तो ऐसा लगता है कि वह कोई बहुत ही गरीब और उपेक्षित कलाकार हैं, जो आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि रहमान फिल्म इंडस्ट्री के सबसे धनाढ्य संगीतकारों में से हैं। उनके पास चेन्नई में अत्याधुनिक और बेहद महंगा स्टूडियो है. वैसा कोई फिल्म जगत का कोई संगीतकार तो आज तक नहीं बना सका है।  वे नियमित रूप से कार्यक्रम करते हैं, अच्छी कमाई कर रहे हैं और आज भी बहुत व्यस्त हैं। इसलिए ये बहुत स्वाभाविक प्रश्न है कि

- क्या ए आर रहमान को सचमुच समस्या है? यदि नहीं, तो फिर हिंदूविरोधी और भारतविरोधी वक्तव्य क्यों?

- क्या रहमान के बयान के पीछे भारत विरोधी और कट्टर पंथी शक्तियां हैं? यदि हाँ तो इसके निहतार्थ क्या हैं?

लोकतंत्र में बोलने का अधिकार निर्विवाद सभी को है। लेकिन सवाल तो लाजिमी है, कि उन्होंने क्या कहा  पर  उससे भी बड़ा सवाल है कि उन्होंने किस मंच पर कहा?

बीबीसी कोई सांस्कृतिक मंच नहीं है। यह एक कुख्यात भारतविरोधी नैरेटिवबिल्डर है, जिसका झुकाव वामपंथी और इस्लामी संगठनों की तरफ होता  है। ब्रिटेन के करदाताओं के पैसे से चलने वाला बीबीसी अपने देश में भी मुख्यधारा के साथ नहीं है तो भारत क्या चीज है? इसलिए जब आप बीबीसी  से बात करते हैं, तो आप उसे भारतविरोधी हथियार थमा देते हैं।

एक बड़ा कलाकार आम नागरिक नहीं होता वह देश का ब्रांड प्रतिनिधि होता है। भारत ने रहमान को क्या नहीं दिया ! ऑस्कर मंच तक पहुँचाया, अनगिनत राष्ट्रीय पुरुष्कार, पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च सम्मान दिए।

लेकिन उन्होंने देश को क्या दिया?  घोर अपमान !

देश के प्रति नैतिक ज़िम्मेदारी, वह कर्तव्य  है, जो किसी भी पुरस्कार से बड़ा  होता  है। मैं नहीं कहता कि रहमान को चुप रहना चाहिए लेकिन हिंदुओं, हिंदी भाषा, बहुसंख्यकों, अपने प्रशंसकों और अपने देश के विरुद्ध बोलने में उन्हें जरा भी  संकोच नहीं हुआ।  छावा फिल्म का संगीत उन्होंने दिया, पैसे कमाए लेकिन अब कह रहे हैं कि ये फिल्म विभाजनकारी है। ये कोई सामान्य व्यक्ति तो नहीं कर सकता

अब तक कोई रहमान को देशविरोधी कहने की कल्पना भी नहीं कर सकता था। लेकिन आज जब उनकी असली भावनाएँ सामने आ गईं तो हर गलीमोहल्ले में उनके नाम पर थू थू हो रही है। जिस हिन्दू धर्म में उन्होंने जन्म लिया और 22 वर्ष तक जिस धर्म का जीवन जिया, उसका अपमान किया। अपने हिन्दू पिता का अपमान किया। अपने हिन्दू  रिश्तेदारों का अपमान  किया।      

फिल्म जगत में कोई भी कलाकार हमेशा शिखर पर नहीं रह सकता। "सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट" का सिद्धांत यहाँ भी लागू होता है। दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन सभी को समय के साथ प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।

रहमान का यह कहना कि उन्हें काम नहीं मिल रहा क्योंकि वे मुसलमान हैं यह ज्यादा गंभीर आरोप है। वह  इतने नासमझ तो नहीं होंगे कि इसके प्रभाव को समझते नहीं होंगे

हिन्दी सिनेमा  में खान बंधुओं   (शाहरुख, आमिर, सलमान) का दशकों तक वर्चस्व रहा है और उनके प्रशंसकों में बहुसंख्यक हिंदू ही हैं। मुसलमान, संख्या और फिल्म देखने की आदत के आधार पर किसी को शिखर पर नहीं पहुँचा सकते। शाहरुख़ खान की यदि अमेरिकी एअरपोर्ट पर तलाशी होती है, तो वह भारत आकर कहते हैं कि उनके साथ भेदभाव इसलिए होता है क्योंकि वह समुदाय विशेष से हैं, जबकि भारत से उसका कोई लेना देना नहीं। आमिर खान ने कहा था कि उनकी पत्नी बच्चों को लेकर चिंतित रहती हैं। नशीरुद्दीन के बयान तो जग जाहिर हैं।  कई लोगों ने पुरूस्कार वापस कर दिए थे, और कई ने तो देश छोड़ने का एलान कर दिया था।   यह सब कुछ 2014 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद  हुआ। अब उस श्रंखला को आगे बढ़ने का काम अल्ला रखखा रहमान ने किया है.        

रहमान ने वंदे मातरम, जिया जले, छैयाछैया जैसे हिंदी गीतों से प्रसिद्धि पाई आज जो कुछ भी वह हैं, वह हिन्दी और हिन्दी सिनेमा  के कारण लेकिन बीबीसी  इंटरव्यू में उन्होंने हिंदी का अपमान किया और उर्दू को "मदर ऑफ म्यूजिक" कहा। या तो उन्हें भारत की समझ नहीं है या कट्टरपंथी अजेंडा चला रहे हैं। भारत के शास्त्रीय संगीत और गायन समझने के लिए उनका एक जीवन भी पर्याप्त नहीं है, उसके  लिये  उन्हे कई जन्म लेने पड़ेंगे।  

बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि रहमान के जन्म का  नाम ए. एस. दिलीप कुमार था। उनके पिता आर. के. शेखर तमिल और मलयालम फिल्मों के संगीतकार और धर्म निष्ठ  हिन्दू थे । पिता की मृत्यु के बाद, उनका परिवार आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक संघर्ष से गुजर रहा था उनकी बहन गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। इन मुशीबतों से छुटकारे के लिए, वह एक सूफ़ी करामतुल्ला शाह क़ादिरी के संपर्क में आये और फिर जैसा आम तौर पर होता है, उसके प्रभाव में आकर लगभग 22  वर्ष की उम्र में  उन्होंने धर्मान्तरण कर लिया. आज लगभग 59  वर्ष की उम्र के रहमान के शरीर में 22 वर्ष के हिन्दू और  37 वर्ष  के मुसलमान का मिश्रण है, तब ये हाल है। रहमान अक्सर कहते रहे हैं : “मैं धर्म को दीवार नहीं, एक पुल की तरह देखता हूँ।लेकिन अब उसी  पुल पर चढ़ कर भारतविरोधी और कट्टरपंथी सांप्रदायिक ताकतों से रिश्ता जोड़ कर देश को गली देकर सिद्ध कर दिया है कि उन्होंने  धर्मान्तरण  स्वार्थपूर्ति के लिए ही था

रहमान को मणिरत्नम ने स्वयं निर्देशित फिल्म रोज़ामें  अवसर दिया और यह काम उन्हे  मुसलमान होते हुए दिया। अगर सांप्रदायिकता कारण होती तो उन्हे काम कैसे मिलता। स्लमडॉग मिलियनेयरने उन्हें ऑस्कर दिलाया। पद्म श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दिया और पद्म विभूषण नरेंद्र मोदी ने। तो अगर उनका इशारा राजनीतिक सत्तापरिवर्तन की ओर है तो यह तथ्य उन्हें याद रखना चाहिए और इतना कृतघ्न तो कोई अजेंडा धारी ही हो सकता है ।

यह केवल रहमान की बात नहीं है शाहरुख खान, आमिर खान, सलमान खान, नसीरुद्दीन शाह, सभी ने समयसमय पर सांप्रदायिकता का सार्वजानिक प्रदर्शन किया है। लेकिन इससे भी बड़ी बात है कि अंतर्राष्ट्रीय विमर्शकारी शक्तियाँ अपने गजवा-ए-हिन्द के अजेंडे को आगे बढाने के लिए समय समय पर भारतीय मुस्लिम हस्तियों को लुभाकर अपने जाल में फंसाती हैं और उनका इस्तेमाल करती हैं. ये सिलसिला लगातार चल रहा है.  इनका क्षेत्र व्यापक है खेल, सिनेमा, राजनीति और प्रशासन. अजहरुद्दीन से लेकर हामिद अंसारी तक कोई भी, कहीं भी, कभी भी मिल सकता है.          

कारगिल युद्ध के समय प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने दिलीप कुमार को दिल्ली बुलवाया ताकि वह  पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बात करा सकें,और पाकिस्तान को सन्देश दे सकें कि भारत में मुसलमान कितने खुश हैं.  दिलीप कुमार ने नवाज शरीफ से बात की लेकिन अटल जी तब हतप्रभ रह गए जब दिलीप कुमार ने फोन पर नवाज शरीफ से कहा कि अल्लाह के लिए आप यह सब मत किया करिए, जब आप यह सब करते हैं,तो यहाँ भारत में हम मुसलमानों का घर से निकलना मुश्किल हो जाता है. दिलीप कुमार वही हैं जिन्होंने अपना नाम छिपाया फिर भी  देश ने उन्हे  सिर आंखों पर बिठाया 

आज रहमान कट्टरपंथियों के हाथ का मोहरा बने हैं, कल कोई दूसरा बनेगा । उनके पास इतना पैसा है कि अब उन्हें न हिंदी की चिंता है,  हिन्दी सिनेमा की। इसलिए  ये न मानने का कोई कारण नहीं है कि उन्होंने जो किया वह सुनियोजित था, प्रायोजित भी  उन्होंने भारतीय पत्रकारों से क्यों कभी ऐसा नहीं कहा केवल बीबीसी जैसे मंच पर ही क्यों कहा इस इंटरव्यू का कोई विशेष अवसर भी नहीं था ।  

जो व्यक्ति हिंदू, हिंदी और हिंदुस्तान के साथ विश्वासघात करता है  वह माफी भी मांगे तो भी उसे माफ़ नहीं किया जा सकता है और माफ करना भी नहीं चाहिए ।

~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~


  • AR Rahman BBC interview controversy

  • A R Rahman BBC statement analysis

  • BBC India narrative explained

  • AR Rahman latest political controversy

  • Indian musician BBC interview debate

  • Media bias BBC India

  • Freedom of speech vs responsibility India, AR Rahman interview full analysis Hindi

  • AR Rahman

    AR Rahman BBC Interview

    A R Rahman Controversy

    BBC India Interview

    BBC Interview Controversy

    AR Rahman Latest News

    AR Rahman Statement Analysis

    Indian Media Analysis

    International Media Narrative

    BBC vs India

    Freedom of Expression India

    Public Intellectual Responsibility

    Indian Politics Explained

    Cultural Narrative India

    BBC Agenda India

    Indian Opinion Video

    Political Analysis Hindi

  •  

     

    बंगाल की (निर)-ममता — केंद्र की दुर्बलता

     


    बंगाल की (निर)-ममता — केंद्र की दुर्बलता || बंगाल में संवैधानिक व्यवस्था का पतन लेकिन दिल्ली मुँह फेर रही है || अराजकता के डर में डूबा राज्य और केंद्र के राजनीतिक मौन की कीमत चुकाते हिन्दू


    जब कोई राज्य निर्मम हो जाए और केंद्र सरकार मौन साध ले, तो जो स्थिति बनती है, वही आज पश्चिम बंगाल की पहचान बन चुकी है।

    पश्चिम बंगाल अब केवल किसी एक सरकार की विफलता की कहानी नहीं रह गया है। यह उस गहरे लोकतांत्रिक संकट का आईना बन चुका है, जहाँ सत्ता हिंसा के बल पर सुरक्षित है, संस्थाएँ दबाव में काम कर रही हैं और आम नागरिक भय के साये में जीवन जीने को विवश हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि यह सब कुछ खुलेआम, देश की आँखों के सामने घट रहा है—और केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया या तो विलंबित है या लगभग अनुपस्थित।

    परंपरागत रूप से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रहने वाला यह राज्य, आगामी विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में असाधारण रूप से अस्थिर और उग्र राजनीतिक वातावरण से गुजर रहा है। हाल के दिनों में प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा राज्य के विभिन्न स्थानों पर की गई छापेमारियों ने इस अस्थिरता को और बढ़ा दिया। इनमें सबसे प्रमुख था I-PAC कार्यालय, जिसका संबंध कोयला घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग की जाँच से जोड़ा जा रहा है।

    जब ED के अधिकारी I-PAC कार्यालय में दस्तावेज़ों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को जब्त करने की वैधानिक प्रक्रिया में थे, उसी समय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ वहाँ पहुँचीं। आरोप है कि जाँच से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज़ और साक्ष्य अधिकारियों से जबरन ले लिए गए। इसके बाद राज्य पुलिस ने स्वयं प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर दी।


    न्यायपालिका पर दबाव और संस्थागत विघटन

    पूरा देश तब स्तब्ध रह गया, जब प्रवर्तन निदेशालय राहत की आशा लेकर कलकत्ता उच्च न्यायालय पहुँचा और वहाँ भी वही अराजकता दिखाई दी। आरोप लगे कि व्हाट्सएप कॉल के माध्यम से पार्टी कार्यकर्ताओं को बुलाकर न्यायालय परिसर में जानबूझकर अव्यवस्था फैलाई गई, ताकि सुनवाई बाधित हो और न्यायपालिका पर दबाव डाला जा सके। उग्र भीड़ के कारण उस दिन न्यायालय सुनवाई नहीं कर सका।

    1. बंगाल का संकट अब केवल स्थानीय नहीं रहा 

    उच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायालय परिसर को जंतर-मंतर जैसे धरना-प्रदर्शन के स्थल में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। सुनवाई स्थगित होने के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। इस मामले को अत्यंत गंभीर मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया और टिप्पणी की कि केंद्रीय एजेंसियों के कार्य में हस्तक्षेप करना तथा उनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज करना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और यह असंवैधानिक भी हो सकता है।

    हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय अभी आना शेष है, लेकिन एक बात स्पष्ट हो चुकी है—ममता बनर्जी सरकार इस पूरे घटनाक्रम को लेकर किसी भी प्रकार की जवाबदेही स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखती। यह मामला अब कोई साधारण विवाद नहीं रह गया है; यह भारत की संस्थागत संतुलन व्यवस्था और संवैधानिक मर्यादाओं की एक गंभीर परीक्षा बन चुका है, जिसका प्रभाव आने वाले वर्षों में केंद्र–राज्य संबंधों और जाँच प्रक्रियाओं पर पड़ेगा।


    लोकतांत्रिक दुरुपयोग और बंगाल का पतन

    पश्चिम बंगाल में लोकतांत्रिक ढाँचे का दुरुपयोग केवल राज्य के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गंभीर चिंता का विषय है। भारत के संविधान में निहित लोकतांत्रिक व्यवस्था धीरे-धीरे सुशासन का माध्यम बनने के बजाय शासन पर बोझ बनती जा रही है—और बंगाल इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है।

    1. बंगाल: भय के सहारे शासन, मौन की अनुमति 

    स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक यह राज्य वामपंथियों का गढ़ रहा, जिसके दौरान उद्यमिता, व्यापार और औद्योगिक विकास लगभग ठप हो गया। अंततः त्रस्त जनता ने वामपंथियों को सत्ता से बाहर किया, लेकिन दुर्भाग्यवश वह एक नई समस्या में फँस गई—तृणमूल कांग्रेस के शासन में।

    ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथियों को चुनौती देते हुए बेहतर शासन और सुरक्षा का वादा किया। प्रारंभिक वर्षों में कुछ सुधार दिखाई दिए, किंतु समय के साथ इसका शासन अपने पूर्ववर्तियों से भी अधिक घातक सिद्ध होने लगा।


    तुष्टिकरण, घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा

    सत्ता में बने रहने के लिए तुष्टिकरण की राजनीति को चरम पर पहुँचा दिया गया। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की आड़ में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को खुला संरक्षण दिए जाने के आरोप लगे। धीरे-धीरे यह राजनीति उस खतरनाक सीमा को पार कर गई, जहाँ यह चुनावी रणनीति से आगे बढ़कर भारत की एकता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन गई। स्वाभाविक है कि देश की जनता इसे स्वीकार नहीं कर सकी।

    1. "बंगाल जहाँ सत्ता की रक्षा हिंसा से होती है" 

    इसी पृष्ठभूमि में बंगाल की जनता ने विकल्प तलाशने शुरू किए। वामपंथियों का पूर्ण पतन, कांग्रेस की निष्क्रियता और सांप्रदायिक तुष्टिकरण से उपजे शून्य में भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ। हिंदुओं के प्रति कथित अन्याय को भाजपा ने राजनीतिक मुद्दा बनाया और केंद्र में सत्ता में होने के कारण अपने जनाधार का विस्तार भी किया।


    भाजपा का उदय—और उससे भी तेज़ पतन

    पश्चिम बंगाल में भाजपा का उदय जितना तेज़ रहा, उसका पतन उससे भी अधिक तेज़ सिद्ध हुआ। 2014 में मात्र दो लोकसभा सीटें जीतने वाली भाजपा 2019 में 18 सीटों और लगभग 40 प्रतिशत वोट शेयर तक पहुँच गई। 2021 के विधानसभा चुनावों में उसने तृणमूल के कुशासन से मुक्ति का वादा किया और जनता का व्यापक समर्थन भी प्राप्त किया। किंतु केंद्र में सत्तासीन होने के बावजूद वह राज्य के मतदाताओं को आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराने में विफल रही।

    मतदान केंद्रों पर केंद्रीय बलों की तैनाती के बावजूद तृणमूल के अराजक तत्वों ने मतदाताओं को घरों से निकलने तक नहीं दिया। परिणामस्वरूप भाजपा सत्ता से दूर रह गई, हालाँकि वह 2016 में मात्र तीन सीटों से बढ़कर 2021 में 77 सीटें पाकर मुख्य विपक्षी दल बन गई।


    हिंसा, पलायन और भय का शासन

    चुनावों के दौरान और उसके बाद हिंसा का पैमाना इतना व्यापक था कि भाजपा समर्थकों को योजनाबद्ध ढंग से निशाना बनाया गया। हज़ारों लोग अपने घर-बार छोड़कर पड़ोसी राज्यों में पलायन को मजबूर हुए। उनका एकमात्र ‘अपराध’ भाजपा का समर्थन करना था।

    भाजपा अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों की रक्षा करने में असफल रही। कई मामलों में लोगों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया और तृणमूल कार्यालयों में साष्टांग दंडवत करने को विवश किया गया। इस भयावह वातावरण ने यह धारणा मजबूत कर दी कि संकट की घड़ी में भाजपा अपने समर्थकों के साथ खड़ी नहीं हो सकती।

    इस धारणा का असर 2024 के लोकसभा चुनावों में दिखाई दिया, जब भाजपा की सीटें घटकर 12 रह गईं और उसका वोट प्रतिशत गिरकर 38 प्रतिशत हो गया।


    स्थानीय नेतृत्व और राष्ट्रीय जिम्मेदारी

    पश्चिम बंगाल की राजनीति में स्थानीय नेतृत्व हमेशा निर्णायक रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होने के बावजूद भाजपा राज्य में मज़बूत जमीनी संगठन और भरोसेमंद स्थानीय नेतृत्व विकसित नहीं कर सकी। 2021 की हिंसा के घाव आज भी उसके समर्थकों के मन में ताज़ा हैं।

    सत्ता प्राप्त करने के लिए सामाजिक और सांप्रदायिक समीकरणों के साथ-साथ यह भरोसा भी आवश्यक होता है कि कोई दल अपने समर्थकों को अराजक तत्वों से सुरक्षित रख पाएगा। दुर्भाग्यवश भाजपा इस कसौटी पर खरी नहीं उतर सकी।


    भ्रष्टाचार, हिंसा और केंद्र की निष्क्रियता

    तृणमूल शासन के दौरान बंगाल ने सारदा चिटफंड घोटाला, शिक्षक भर्ती घोटाला, चुनावी हिंसा, रामनवमी शोभायात्राओं पर हमले, अराजक पंचायत चुनाव, रामपुरहाट नरसंहार, संदेशखाली में महिलाओं का यौन शोषण और आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की जघन्य घटना जैसी भयावह घटनाएँ देखीं। ये सभी लोकतांत्रिक पतन की एक डरावनी श्रृंखला प्रस्तुत करती हैं।

    1. “हिंसा से सुरक्षित सत्ता, चुप्पी से संचालित लोकतंत्र” 

    2025 तक आते-आते केंद्रीय एजेंसियों और राज्य सरकार के बीच टकराव सामान्य हो गया। न्यायालयों की कठोर टिप्पणियाँ न तो राज्य सरकार को शर्मसार कर सकीं और न ही केंद्र सरकार को समय रहते हस्तक्षेप के लिए प्रेरित कर सकीं।


    साझा जिम्मेदारी से बचता केंद्र - राजनीतिक लाभ का लालच

    “डबल इंजन सरकार” का आकर्षण बेचने से पहले केंद्र को अपनी दोहरी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। पिछले 10–12 वर्षों में पश्चिम बंगाल ने लोकतांत्रिक क्षरण की गंभीर चुनौतियाँ झेली हैं। यह केवल राज्य सरकार की विफलता नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की निष्क्रियता का भी परिणाम है। कई ऐसे अवसर आए जब राष्ट्रपति शासन अपरिहार्य प्रतीत होता था, किंतु मोदी सरकार ने हस्तक्षेप नहीं किया।

    यदि यह राजनीतिक रणनीति थी—कि तृणमूल को स्वयं बदनाम होने दिया जाए—तो यह पश्चिम बंगाल की जनता के साथ गंभीर अन्याय है।

    आज बंगाल की दयनीय स्थिति के लिए ममता बनर्जी सरकार और केंद्र की मोदी सरकार—दोनों समान रूप से जिम्मेदार हैं। तृणमूल कांग्रेस प्रत्यक्ष दोषी है, लेकिन इस स्थिति को लंबे समय तक बने रहने देने के लिए केंद्र सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती।

    — शिव मिश्रा

    A.R. Rahman का बयान या BBC का एजेंडा? | पूरी पड़ताल

      कला  और कट्टरता का इम्तिहान,  फेल हुआ अल्ला रख्खा रहमान ! जब सुर राजनीति से टकराए , दूसरों का मोहरा बन जाए और अपने स्वार्थ में अँधा दूसरों...