शुक्रवार, 26 जून 2026

राम मंदिर: आस्था का केंद्र, पारदर्शिता की कसौटी और प्रशासनिक पुनर्गठन की आवश्यकता

 

राम मंदिर: आस्था का केंद्र, पारदर्शिता की कसौटी और प्रशासनिक पुनर्गठन की आवश्यकता


 

शिव मिश्रा, वरिष्ठ स्तंभकार

अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण केवल एक स्थापत्य उपलब्धि नहीं, बल्कि लगभग पाँच शताब्दियों तक चले संघर्ष, असंख्य बलिदानों और करोड़ों हिंदुओं की अटूट आस्था का साकार रूप है। यह मंदिर केवल ईंट-पत्थरों का भवन नहीं, बल्कि सनातन सभ्यता के आत्मविश्वास, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है। इसलिए यदि इस मंदिर के प्रशासन, दान-प्रबंधन या वित्तीय पारदर्शिता पर कोई प्रश्न उठता है, तो उसका प्रभाव केवल एक धार्मिक संस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विश्वभर के करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं और विश्वास को प्रभावित करता है।

हाल के दिनों में राम मंदिर परिसर में दान, आभूषणों और प्रशासनिक अनियमितताओं से संबंधित जो समाचार सामने आए हैं, वे अत्यंत चिंताजनक हैं। इन मामलों की जांच अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष न्यायिक एवं प्रशासनिक प्रक्रिया से ही सामने आएंगे। इसलिए किसी भी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष ठहराने का अधिकार केवल जांच एजेंसियों और न्यायालयों को है। किंतु यदि किसी भी स्तर पर वित्तीय अनियमितता या प्रशासनिक शिथिलता सिद्ध होती है, तो यह केवल कानून का नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का भी गंभीर उल्लंघन होगा।

यही कारण है कि इस विषय को केवल व्यक्तियों के आचरण तक सीमित न रखकर संस्थागत व्यवस्था के दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। किसी भी महान संस्था की विश्वसनीयता व्यक्तियों से नहीं, बल्कि उसकी व्यवस्थाओं से निर्मित होती है।

सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के उपरांत भारत सरकार ने 5 फरवरी 2020 को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया था, ताकि मंदिर का निर्माण और संचालन एक स्वतंत्र सार्वजनिक ट्रस्ट के माध्यम से हो सके। इस ट्रस्ट में संतों, समाज के प्रतिनिधियों तथा केंद्र और राज्य सरकार के पदेन अधिकारियों को सम्मिलित किया गया। उद्देश्य स्पष्ट थामंदिर का संचालन राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त, सामाजिक रूप से प्रतिनिधिक और प्रशासनिक रूप से पारदर्शी हो।

निस्संदेह ट्रस्ट ने अल्प समय में विश्वस्तरीय मंदिर निर्माण का कार्य सम्पन्न किया, जिसके लिए वह प्रशंसा का पात्र है। किंतु किसी भी बड़े संस्थान की वास्तविक परीक्षा उसके निर्माण से अधिक उसके दीर्घकालीन संचालन में होती है। करोड़ों श्रद्धालुओं द्वारा प्रतिवर्ष आने वाले दान, सोना-चाँदी, बहुमूल्य आभूषण और विशाल संपत्तियों के प्रबंधन के लिए केवल सद्भावना पर्याप्त नहीं होती; उसके लिए आधुनिक प्रशासनिक ढाँचा, तकनीकी निगरानी और कठोर वित्तीय नियंत्रण अनिवार्य हैं।

भारत में अनेक समृद्ध मंदिर वर्षों से विशाल दानराशि का सफल प्रबंधन कर रहे हैं। विशेष रूप से तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् ने दान-प्रबंधन की जो व्यवस्था विकसित की है, वह अध्ययन का विषय है। वहाँ दानपात्रों की सुरक्षा, नकदी की गिनती, बैंक में जमा, लेखांकन और निगरानी की प्रत्येक प्रक्रिया बहु-स्तरीय नियंत्रण प्रणाली के अंतर्गत संचालित होती है। किसी एक व्यक्ति के हाथ में पूरी प्रक्रिया नहीं होती। आधुनिक मशीनें, निरंतर वीडियो रिकॉर्डिंग, स्वतंत्र पर्यवेक्षक और नियमित लेखा परीक्षण पूरी व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बनाते हैं।

अयोध्या जैसे वैश्विक महत्व के तीर्थ के लिए अब इससे भी अधिक आधुनिक व्यवस्था विकसित करने का समय आ गया है। मंदिर का प्रशासन पारंपरिक श्रद्धा और आधुनिक प्रबंधनदोनों का संतुलित संगम होना चाहिए।

सबसे पहले ट्रस्ट के प्रशासन को चार स्वतंत्र स्तंभों में विभाजित किया जाना चाहिएट्रस्टी बोर्ड, मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ), मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) तथा स्वतंत्र आंतरिक लेखा एवं सतर्कता प्रकोष्ठ। इन सभी की जवाबदेही सीधे ट्रस्ट बोर्ड के प्रति हो और कोई भी अधिकारी अकेले वित्तीय निर्णय लेने में सक्षम न हो। शक्तियों का यह विकेंद्रीकरण किसी भी प्रकार की मिलीभगत या निरंकुशता की संभावना को कम करेगा।

दान प्रबंधन को पूर्णतः डिजिटल बनाया जाना चाहिए। प्रत्येक दानचाहे वह नकद हो, ऑनलाइन हो अथवा चेक के माध्यम सेका तत्काल डिजिटल पंजीकरण हो। श्रद्धालुओं को डिजिटल भुगतान, क्यूआर कोड तथा स्मार्ट डोनेशन कियोस्क के माध्यम से दान देने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, जिससे नकद लेन-देन न्यूनतम हो और धन सीधे बैंक खातों में पहुँचे।

मंदिर परिसर में स्थापित प्रत्येक दानपात्र अत्याधुनिक सुरक्षा प्रणाली से युक्त होना चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक सील, बायोमेट्रिक लॉक,  आरएफआईडी  टैग, चौबीसों घंटे सीसीटीवी निगरानी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अलर्ट सिस्टम यह सुनिश्चित करें कि किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ तुरंत नियंत्रण कक्ष तक पहुँचे। दानपात्र खोलने की प्रक्रिया केवल संयुक्त अभिरक्षा (जॉइन्ट कस्टडी) के सिद्धांत पर आधारित हो, जिसमें ट्रस्ट, बैंक, लेखा विभाग तथा स्वतंत्र पर्यवेक्षकसभी की उपस्थिति अनिवार्य हो।

नकदी गिनने के लिए पृथक उच्च-सुरक्षा परिसर बनाया जाए, जहाँ अत्याधुनिक करेंसी काउंटिंग मशीनें, नकली नोट पहचान प्रणाली तथा स्वचालित लेखांकन सॉफ्टवेयर का उपयोग हो। कर्मचारियों के लिए बिना जेब वाली वर्दी, प्रवेश पर बायोमेट्रिक सत्यापन तथा प्रत्येक गतिविधि की वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य हो। गिनी गई पूरी राशि चौबीस घंटे के भीतर अधिकृत बैंकों में जमा कर दी जाए।

वित्तीय प्रबंधन के लिए आधुनिक ERP प्रणाली, जैसे SAP या Oracle, का उपयोग किया जाना चाहिए ताकि प्रत्येक आय और व्यय का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रहे और किसी भी प्रविष्टि में परिवर्तन केवल बहु-स्तरीय अनुमति से ही संभव हो। दैनिक बैंक समन्वयन (बैंक रेकन्सिलीऐशन) स्वचालित हो तथा एक रुपये का भी अंतर आते ही प्रणाली स्वतः चेतावनी जारी करे।

इसी प्रकार ऑडिट व्यवस्था को भी तीन स्तरों पर विकसित किया जाना चाहिएदैनिक आंतरिक लेखा परीक्षण, मासिक स्वतंत्र समवर्ती ऑडिट तथा वार्षिक वैधानिक ऑडिट। वार्षिक ऑडिट किसी प्रतिष्ठित स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट फर्म द्वारा किया जाए तथा उसकी रिपोर्ट, वार्षिक आय-व्यय विवरण और बैलेंस शीट सार्वजनिक वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाए। पारदर्शिता का सर्वोच्च मानक यही है कि संस्था स्वयं अपने वित्तीय अभिलेख जनता के समक्ष प्रस्तुत करे।

इसके अतिरिक्त ट्रस्ट की वेबसाइट को केवल सूचना पोर्टल न बनाकर "पब्लिक ट्रांसपेरेंसी डैशबोर्ड" के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। श्रद्धालु यह देख सकें कि प्रतिदिन कितना दान प्राप्त हुआ, किस मद में कितना व्यय हुआ, कौन-सी निर्माण परियोजना किस चरण में है, किसे ठेका दिया गया और उसकी प्रगति क्या है। वार्षिक रिपोर्ट, ऑडिट रिपोर्ट, निविदाएँ, बैठकों के संक्षिप्त निर्णय तथा प्रमुख प्रशासनिक सूचनाएँ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हों। इससे अफवाहों के लिए स्थान स्वतः समाप्त हो जाएगा।

साथ ही एक स्वतंत्र व्हिसलब्लोअर प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए, जिसके माध्यम से कोई भी कर्मचारी या श्रद्धालु बिना पहचान उजागर किए संभावित अनियमितताओं की सूचना दे सके। शिकायतों की समीक्षा स्वतंत्र सतर्कता समिति द्वारा की जाए और उनकी समयबद्ध जांच सुनिश्चित हो।

ध्यान रखने योग्य तथ्य यह भी है कि किसी संस्था की विश्वसनीयता इस बात से नहीं बढ़ती कि उसमें कभी त्रुटि न हो; बल्कि इस बात से बढ़ती है कि त्रुटि सामने आने पर संस्था कितनी ईमानदारी, पारदर्शिता और दृढ़ता से उसका समाधान करती है। यदि किसी स्तर पर अनियमितता सिद्ध होती है, तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिएचाहे उनका पद, प्रतिष्ठा या संगठनात्मक संबंध कुछ भी हो। यही न्याय है, यही धर्म है और यही श्रीराम के आदर्शों के अनुरूप आचरण भी।

आज राम मंदिर केवल भारत का मंदिर नहीं, बल्कि विश्वभर के हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। इसकी प्रतिष्ठा किसी व्यक्ति, संगठन या सरकार की प्रतिष्ठा से कहीं बड़ी है। इसलिए इसकी प्रशासनिक व्यवस्था भी विश्वस्तरीय होनी चाहिए। आधुनिक तकनीक, स्वतंत्र लेखा परीक्षण, संस्थागत नियंत्रण और पूर्ण पारदर्शिता ही वह मार्ग है, जो इस मंदिर को आने वाली शताब्दियों तक श्रद्धा और सुशासनदोनों का आदर्श बना सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और पक्ष भी गंभीरता से विचारणीय है। अयोध्या के राम मंदिर से जुड़ी प्रत्येक घटना स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक चर्चा का विषय बनती है। ऐसे में यह आवश्यक है कि तथ्य और अफवाह, दोनों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए। दुर्भाग्यवश, हाल के दिनों में अनेक समाचारों, सोशल मीडिया पोस्टों और टीवी बहसों में अपुष्ट सूचनाओं तथा अटकलों को भी प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया, जिससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई।

यह भी निर्विवाद है कि राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय समाज में सांस्कृतिक चेतना और हिंदू अस्मिता के प्रश्न को नई ऊर्जा प्रदान की है। इस सामाजिक परिवर्तन के राजनीतिक प्रभाव भी विभिन्न दल अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते और उसकी व्याख्या करते हैं। ऐसे वातावरण में यह आशंका बनी रहती है कि मंदिर से जुड़ी किसी भी घटना का उपयोग राजनीतिक विमर्श या वैचारिक संघर्ष का माध्यम बनाया जाए। इसलिए आवश्यक है कि किसी भी आरोप, समाचार या दावे को अंतिम सत्य मानने से पहले उसकी आधिकारिक जांच और प्रमाणित तथ्यों की प्रतीक्षा की जाए।

राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। उसकी प्रतिष्ठा किसी राजनीतिक दल, संगठन या व्यक्ति से कहीं अधिक बड़ी है। इसलिए न तो वास्तविक अनियमितताओं पर पर्दा डाला जाना चाहिए और न ही अपुष्ट अथवा भ्रामक सूचनाओं के आधार पर उसकी छवि धूमिल करने का प्रयास होना चाहिए।

राम के मंदिर में आने वाला प्रत्येक दान रामकाज में ही लगेयह केवल आर्थिक अनुशासन का प्रश्न नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास की रक्षा का संकल्प है। यही संकल्प भविष्य की प्रशासनिक व्यवस्था का आधार बनना चाहिए।

  

                     ~~~Shiv Mishra ~~~~~

राम मंदिर: आस्था का केंद्र, पारदर्शिता की कसौटी और प्रशासनिक पुनर्गठन की आवश्यकता

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