रविवार, 14 जून 2026

मोदी के बारह वर्ष का कार्यकाल बेमिशाल ?

 



कालखंड का न्याय : लोकतांत्रिक निरंतरता का महाशिखर और राष्ट्रहित की शाश्वत चुनौतियां

                                                          लेखक - शिव मिश्रा 

राष्ट्रीय नेतृत्व का नया कीर्तिमान और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में जून २०२६ का यह सप्ताह एक युगांतकारी मोड़ बनकर उभरा है। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लगातार चार हजार तीन सौ निन्यानबे दिनों तक शासन के शीर्ष पर रहकर स्वतंत्र भारत के इतिहास में सर्वाधिक समय तक लगातार सेवा करने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री का कीर्तिमान स्थापित किया है। उन्होंने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित निरंतर कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। यद्यपि ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो पंडित नेहरू का कुल राजनीतिक नेतृत्व स्वतंत्रता से पूर्व ही आरंभ हो गया था, जब २ सितंबर १९४६ को अंतरिम सरकार का गठन हुआ और उन्होंने वायसराय की कार्यकारी परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाला था। तत्पश्चात १५ अगस्त १९४७ को देश की स्वतंत्रता के साथ वे प्रथम प्रधानमंत्री बने, किंतु लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में उनका अनवरत कार्यकाल वर्ष १९५२ के पहले आम चुनाव में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के बाद ही प्रारंभ हुआ था, जो चार हजार तीन सौ अठानवे दिनों तक चला। आज इस ऐतिहासिक आंकड़े को पार करना केवल एक राजनीतिक दल की चुनावी विजय मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय जनमानस के उस गहरे विश्वास का प्रतीक है जिसने देश की नीति और दिशा को एक नया धरातल दिया है।

एक ओर जहां स्वतंत्र भारत अपनी स्वाधीनता के सतहत्तर से अधिक वर्ष पूर्ण कर चुका है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान नेतृत्व ने अपने सफल बारह वर्ष पूरे किए हैं। इस दीर्घायु कालखंड की सबसे बड़ी महत्ता यह है कि जहां पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों के लंबे कार्यकाल अक्सर राजनीतिक अस्थिरता, गठबंधन की मजबूरियों, आंतरिक अंतर्विरोधों या नीतिगत पंगुता से जूझते रहे, वहीं बीते बारह वर्षों का यह सफर पूर्ण बहुमत के स्थायित्व, दृढ़ इच्छाशक्ति और साहसिक निर्णयों का साक्षी रहा है। भारतीय जनता ने पुराने ढर्रे की शिथिलता को नकारकर राष्ट्रहित, सुरक्षा और सांस्कृतिक स्वाभिमान की इस नई धारा पर अपनी अटूट मुहर लगाई है। परंतु, किसी भी राष्ट्र के इतिहास में केवल कार्यकाल की दीर्घता ही सर्वोच्च मानदंड नहीं हो सकती। वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होता है कि उस कालखंड में राष्ट्र की संप्रभुता, अखंडता और उसकी मूल आत्मा की रक्षा के लिए कितने निर्णायक प्रयास किए गए। आज जब भारत अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है, तब राष्ट्रवाद की परिभाषा भौगोलिक सीमाओं की रक्षा से आगे बढ़कर सांस्कृतिक अस्तित्व को अक्षुण्ण रखने की अग्निपरीक्षा बन चुकी है।

स्वतंत्रता के प्रारंभिक दशक और सामरिक आदर्शवाद की सीमाएं

यदि हम स्वतंत्र भारत के शुरुआती सरसठ वर्षों का अवलोकन करें, तो देश ने चौदह प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल देखा, जिनमें से प्रत्येक ने अपनी-अपनी वैचारिक प्राथमिकताओं के अनुसार राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू के युग को आधुनिक संस्थानों और उद्योगों की नींव रखने का काल माना जाता है। उन्होंने वैज्ञानिक चेतना और तकनीकी विकास के लिए प्रारंभिक ढांचे का निर्माण किया, किंतु उनका राष्ट्रवाद वैश्विक समाजवाद और गुटनिरपेक्षता के आदर्शवादी सिद्धांतों से अत्यधिक प्रभावित था। परिणामतः, परम राष्ट्रहित और सामरिक संप्रभुता के मोर्चे पर तत्कालीन नीतियां कूटनीतिक अदूरदर्शिता का शिकार हो गईं। वर्ष १९६२ में चीन के हाथों मिली सैन्य पराजय तत्कालीन रक्षा नीति की बहुत बड़ी विफलता थी। इसके अतिरिक्त, कश्मीर के आंतरिक भू-भाग के विषय को संयुक्त राष्ट्र संघ की चौखट पर ले जाना और तिब्बत पर चीनी आधिपत्य को मौन स्वीकृति देना ऐसी ऐतिहासिक भूलें थीं, जिन्होंने भारत की सीमाओं को स्थायी रूप से संवेदनशील बना दिया। उस कालखंड का राष्ट्रवाद अत्यंत रक्षात्मक था, जिसमें शत्रु को उसकी सीमा में जवाब देने के शौर्य का अभाव दिखता था।

पंडित नेहरू के पश्चात लाल बहादुर शास्त्री के संक्षिप्त परंतु ओजस्वी कार्यकाल ने देश के राष्ट्रीय स्वाभिमान को पुनर्जीवित किया। वर्ष १९६५ के युद्ध में पाकिस्तान को करारी शिकस्त देकर और कृषि तथा सैन्य शक्ति के समन्वय से 'जय जवान, जय किसान' का उद्घोष कर उन्होंने सिद्ध किया कि भारत किसी भी विदेशी शक्ति के सामने घुटने नहीं टेकेगा। उनके इस सैन्य राष्ट्रवाद को इंदिरा गांधी ने और अधिक विस्तार दिया। वर्ष १९७१ के युद्ध में पाकिस्तान के दो टुकड़े कर मानचित्र को बदल देना और बांग्लादेश का निर्माण करना उनकी सामरिक दृढ़ता का चरमोत्कर्ष था। इसी प्रकार वर्ष १९७४ में पोखरण में प्रथम शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण कर उन्होंने वैश्विक शक्तियों के परमाणु एकाधिकार को चुनौती दी और देश के वित्तीय समावेशन के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। तथापि, इसी कार्यकाल में वर्ष १९७५ से १९७७ तक लगाया गया आंतरिक आपातकाल भारतीय लोकतंत्र पर एक अमिट कलंक बन गया, जिसने नागरिक स्वतंत्रताओं को कुचलकर राष्ट्रवाद की लोकतांत्रिक आत्मा को गहरी क्षति पहुंचाई।

आर्थिक संक्रांति, गठबंधन की विवशताएं और सुरक्षा की शिथिलता

अस्सी के दशक के राजनीतिक संक्रमण के बाद वर्ष १९९१ में पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में देश ने अभूतपूर्व आर्थिक संकट का सामना किया, जब राष्ट्रीय स्वर्ण भंडार को विदेशी बैंकों में गिरवी रखने की नौबत आ गई थी। उस कठिन घड़ी में राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्विक एकीकरण की नीतियों को लागू किया गया, जिसने देश को दिवालिया होने से बचाया और आर्थिक विकास के नए द्वार खोले। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भारत ने सांस्कृतिक और सामरिक राष्ट्रवाद का एक अत्यंत संतुलित रूप देखा। वर्ष १९९८ में पोखरण में द्वितीय परमाणु परीक्षण कर भारत को एक घोषित परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाना और वैश्विक प्रतिबंधों का निर्भीकता से सामना करना उनकी सरकार की महानतम उपलब्धि थी। उन्होंने सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा की नींव को सुदृढ़ किया तथा स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के द्वारा देश के चारों कोनों को राजमार्गों से जोड़कर आर्थिक राष्ट्रवाद को एक नई गति प्रदान की। उनका राष्ट्रवाद राष्ट्रीय अस्मिता और सबको साथ लेकर चलने की सर्वसमावेशी भावना पर आधारित था।

इसके विपरीत, वर्ष २००४ से २०१४ तक का डॉ. मनमोहन सिंह का दशक आर्थिक प्रगति का भ्रम पैदा करने के बावजूद अंततः नीतिगत पंगुता और व्यापक भ्रष्टाचार के दलदल में धंस गया। इस कालखंड में राष्ट्रीय सुरक्षा की स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो गई थी। छब्बीस नवंबर को मुंबई में हुए भीषण आतंकवादी हमले के बाद भी शासन की प्रतिक्रिया अत्यंत दुर्बल और केवल कागजी विरोध तक सीमित रही। वैश्विक मंच पर भारत की छवि एक ऐसे असहाय राष्ट्र की बन गई थी जो निरंतर आघात सहने के बाद भी दंडात्मक कार्रवाई करने का साहस नहीं जुटा पाता था। आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर तुष्टिकरण की पराकाष्ठा ने बहुसंख्यक समाज के भीतर एक गहरी हीनभावना, सांस्कृतिक असुरक्षा और अपनी ही पहचान के प्रति संकोच की स्थिति उत्पन्न कर दी थी, जिससे राष्ट्र की आंतरिक शक्ति क्षीण होने लगी थी।

बीते बारह वर्ष: संप्रभुता का शंखनाद और सांस्कृतिक पुनरुत्थान

वर्ष २०१४ में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार के गठन के साथ ही भारत की शासन व्यवस्था में एक युगांतकारी वैचारिक परिवर्तन का सूत्रपात हुआ। उन्होंने 'राष्ट्र प्रथम' के संकल्प को अपनी नीतियों का मूलमंत्र बनाया और तुष्टिकरण के स्थान पर न्यायसंगत संतुष्टीकरण की नीति अपनाई। राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर भारत ने अपनी रक्षात्मक मुद्रा को त्यागकर अग्रगामी और निवारक नीति का अवलंबन किया। उरी और पुलवामा के आतंकवादी हमलों के पश्चात सीमा पार जाकर की गई सैन्य कार्रवाइयों और हवाई हमलों ने संपूर्ण विश्व को यह कड़ा संदेश दिया कि भारत अब केवल सहन नहीं करेगा, बल्कि प्रहार के स्रोतों को उनके घर में घुसकर नष्ट करने की सामर्थ्य रखता है। इसी दृढ़ता का परिणाम था कि दशकों से लंबित जम्मू-कश्मीर के अनुच्छेद ३७० और पैंतीस-ए को निरस्त कर संपूर्ण राष्ट्र में एक विधान, एक प्रधान और एक निशान की अवधारणा को पूर्णतः लागू किया गया, जिसने अलगाववाद के तंत्र को समूल नष्ट कर दिया।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के धरातल पर यह बारह वर्ष का कालखंड भारत के सभ्यतागत गौरव के पुनर्जागरण का स्वर्ण काल रहा है। वर्ष २०२४ में अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण और उनकी प्राण-प्रतिष्ठा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं था, बल्कि वह सदियों की सांस्कृतिक पराधीनता के प्रतीकों से मुक्ति और राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनर्स्थापना का महाप्रतीक बना। इसी प्रकार काशी विश्वनाथ धाम, उज्जैन के महाकाल लोक और केदारनाथ-बद्रीनाथ जैसे प्राचीन तीर्थ क्षेत्रों का कायाकल्प इस बात का जीवंत प्रमाण है कि आधुनिक विकास और प्राचीन विरासत का सह-अस्तित्व संभव है। पूर्ववर्ती सरकारों ने जहां धर्मनिरपेक्षता के छद्म आवरण में भारत की मूल सनातन पहचान को प्रकट करने में सदैव संकोच किया, वहीं वर्तमान नेतृत्व ने वैश्विक मंचों पर योग, आयुर्वेद और भारतीय जीवन दर्शन को पूरे गौरव के साथ प्रतिष्ठित किया है।

आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में भी इस कालखंड ने नए आयाम स्थापित किए हैं। जनधन खातों, आधार और मोबाइल की त्रिशक्ति के माध्यम से प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की व्यवस्था ने उस बिचौलिया संस्कृति को समाप्त कर दिया, जिसने देश के विकास को दशकों तक लूटा था। आज भारत ने अपनी तकनीकी संप्रभुता को सिद्ध करते हुए एक ऐसी एकीकृत भुगतान प्रणाली विकसित की है, जो विश्व के विकसित देशों के लिए भी अचंभे का विषय है। 'भारत में बनाओ' की नीति के कारण आज देश हथियारों के आयातक की छवि से बाहर निकलकर रक्षा उपकरणों का निर्यातक बनने की दिशा में अग्रसर है। सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत करोड़ों शौचालयों का निर्माण, उज्ज्वला योजना के माध्यम से गैस कनेक्शन, आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य सुरक्षा और महामारी के समय अस्सी करोड़ से अधिक नागरिकों को निःशुल्क अन्न की आपूर्ति जैसी योजनाओं ने देश के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन स्तर में स्थायी सुधार किया है। कूटनीतिक स्तर पर भी भारत आज एक याचक नहीं, बल्कि वैश्विक संकटों में अपनी स्वतंत्र नीति पर अडिग रहने वाला एक सशक्त मार्गदर्शक बनकर उभरा है।

राष्ट्रहित की अधूरी कसौटी: सनातन अस्मिता और आंतरिक विडंबनाएं

परंतु, किसी भी निष्पक्ष और राष्ट्रहित-केंद्रित विश्लेषण में केवल उपलब्धियों का गान करना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उन गंभीर चुनौतियों पर आत्ममंथन करना भी आवश्यक है जो देश के भविष्य के लिए संकट बनी हुई हैं। स्वतंत्रता के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के उपरांत और चौदह प्रधानमंत्रियों के शासन के बाद भी, यह एक कड़वी वास्तविकता है कि भारत की मूल सनातन संस्कृति अपने ही देश में पूर्णतः स्वतंत्र और सुरक्षित अनुभव नहीं कर पा रही है। वर्ष १९४७ में पंथ और धर्म के आधार पर देश का विभाजन होने और एक बड़े भू-भाग को पृथक राष्ट्र बना दिए जाने के बाद भी, बहुसंख्यक हिंदू समाज को अपनी ही भूमि पर संवैधानिक रूप से दोयम दर्जे की विडंबनाओं का सामना करना पड़ रहा है। हिंदुओं के पवित्र मंदिर आज भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त नहीं हो सके हैं, जबकि अन्य समुदायों के धार्मिक स्थलों को पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त है। मंदिरों के चढ़ावे की राशि पर सरकारों का नियंत्रण रहता है, जिसका उपयोग कई बार गैर-सनातनी कार्यों में किया जाता है। जिन प्राचीन मंदिरों को आक्रांताओं ने ध्वस्त किया था, उनमें से कुछ को छोड़कर बहुसंख्यक स्थलों का जीर्णोद्धार आज भी लंबित है।

इस संदर्भ में वर्ष १९९१ में बनाया गया पूजा स्थल कानून एक बहुत बड़ी विसंगति बनकर खड़ा है, जिसे व्यवहार में एक प्रकार से सातवीं शताब्दी के आक्रांताओं के कुकृत्यों को कानूनी संरक्षण देने जैसा माना जाता है। स्वतंत्रता के पूर्व के दो सौ वर्षों के ब्रिटिश शासन और उससे पहले के क्रूर मुस्लिम कालखंड में इन ध्वस्त मंदिरों का उद्धार असंभव था, और स्वतंत्रता के बाद इस कानून ने हिंदुओं को अपनी आस्था के केंद्रों को वापस पाने के कानूनी अधिकार से ही वंचित कर दिया। इसके अतिरिक्त, शिक्षा के क्षेत्र में भी एक गंभीर संवैधानिक असंतुलन दिखाई देता है। हिंदुओं को अपने पारंपरिक गुरुकुलों को स्वतंत्र रूप से चलाने का वह अधिकार प्राप्त नहीं है, जो अन्य समुदायों को अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान चलाने के नाम पर मिला हुआ है। इस प्रकार की संवैधानिक और प्रशासनिक व्यवस्थाएं भारत की मूल सनातनी चेतना को धीरे-धीरे कमजोर कर रही हैं। अनेक वैश्विक और आंतरिक षड्यंत्रों के माध्यम से देश की जनसांख्यिकी को परिवर्तित करने, अवैध धर्मांतरण को हथियार बनाने और राष्ट्र की संप्रभुता को चुनौती देने वाले विभिन्न छद्म अभियानों को रोकने में वर्तमान सरकार की नीतियां भी पूरी तरह सफल नहीं हो सकी हैं।

कई बार यह प्रतीत होता है कि शासन में इस दिशा में दृढ़ इच्छाशक्ति की न्यूनता है, अन्यथा बारह वर्ष का अटूट और प्रचंड बहुमत का कार्यकाल किसी भी राष्ट्र के सांस्कृतिक स्वाभिमान और ऐतिहासिक न्याय को पूर्णतः स्थापित करने के लिए पर्याप्त होता है। मोदी सरकार के इन बारह वर्षों में शिक्षा और संस्कृति जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार वैचारिक रूप से शिथिल रहा, जिसके कारण न तो भारत की पाठ्यपुस्तकों में दर्ज विकृत इतिहास को समूल सुधारा जा सका और न ही संपूर्ण शिक्षा प्रणाली को भारतीय संस्कारों के अनुकूल प्रदूषण मुक्त किया जा सका। प्रधानमंत्री ने वर्ष २०४७ तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का भव्य स्वप्न तो दिखाया है, परंतु राष्ट्रहित का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि वह विकसित भारत अपनी मूल सनातनी आत्मा के साथ जीवित रहेगा या केवल एक भौतिकवादी और सांस्कृतिक पहचान से विहीन भू-भाग बनकर रह जाएगा?

निष्कर्ष: सर्वाधिक कार्यकाल बनाम सर्वाधिक कार्य का संकल्प

स्वतंत्र भारत के समूचे राजनीतिक इतिहास की यात्रा का यदि सूक्ष्म और निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए, तो वर्ष १९४७ से २०१४ तक का समय भारत को एक भौगोलिक इकाई के रूप में सहेजने, उसके अस्तित्व को बाहरी संकटों से बचाने और विभिन्न अंतर्विरोधों के बीच देश की व्यवस्था को चलाए रखने का कालखंड था। पंडित नेहरू से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह तक, प्रत्येक प्रधानमंत्री ने अपनी सीमाओं, वैचारिक दृष्टिकोणों और तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप देश की प्रगति में अपना योगदान दिया, जिसे पूर्णतः नकारा नहीं जा सकता। परंतु वर्ष २०१४ से २०२६ के ये बारह वर्ष भारत के भीतर एक सुसुप्त पड़े आत्मविश्वास को जगाने और उसे वैश्विक पटल पर एक सुदृढ़ आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में स्थापित करने के साक्षी रहे हैं। वर्तमान नेतृत्व ने देश को एक मजबूर राष्ट्र की छवि से निकालकर एक मजबूत और निर्णायक महाशक्ति के मार्ग पर अग्रसर अवश्य किया है।

तथापि, इतिहास का न्याय अत्यंत क्रूर और निष्पक्ष होता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह सदैव स्मरण रखना होगा कि इतिहास में केवल सर्वाधिक लंबे कार्यकाल का प्रधानमंत्री बन जाना ही उनकी वास्तविक श्रेष्ठता को सिद्ध नहीं करेगा। लोकतांत्रिक कीर्तिमानों की संख्या से कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि क्या उनका नेतृत्व इस देश की प्राचीन सनातन संस्कृति, उसकी जनसांख्यिकीय सुरक्षा, और राष्ट्र की आंतरिक अखंडता को उन गहरे संकटों से स्थायी मुक्ति दिला सका जो भारत को भीतर से खोखला कर रहे हैं। केवल भौतिक और आर्थिक विकास किसी राष्ट्र को अमर नहीं बनाता; राष्ट्र अपने सांस्कृतिक प्राणों से जीवित रहता है। अतः, सर्वाधिक लंबे समय तक पद पर रहने की उपलब्धि की अपेक्षा राष्ट्र की एकता, अखंडता और आदि-अनादि सनातन संस्कृति की चिरंतन सुरक्षा के लिए सर्वाधिक युगांतकारी कार्य करने वाला प्रधानमंत्री बनना ही वास्तविक रूप से ऐतिहासिक, स्मरणीय और परम राष्ट्रीय हित में होगा।

~~~शिव मिश्रा ~~~

शनिवार, 6 जून 2026

कॉर्पोरेट जिहाद - सनातन संस्कृति को निगलने का नया कुचक्र

 

कॉर्पोरेट जिहाद: वैश्विक नीतिगत दिशा-निर्देशों की आड़ में सनातन संस्कृति को निगलने का नया कुचक्र

- शिव मिश्रा

कॉर्पोरेट जिहाद : लम्बी सूची बढ़ता ग्राफ 

नासिक में टीसीएस के भीतर 'कॉर्पोरेट जिहाद' के माध्यम से किए जा रहे सुनियोजित धर्मांतरण का घाव अभी सूखा भी नहीं था कि इस क्षेत्र की एक और बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी 'विप्रो' का नाम भी इस काली सूची में जुड़ गया। पुणे के विप्रो कार्यालय की एक पूर्व हिंदू महिला कर्मचारी द्वारा पुलिस में दर्ज कराई गई प्राथमिकी में जो रोंगटे खड़े करने वाले तथ्य सामने आए हैं, उसने भारतीय कॉर्पोरेट जगत के धर्मनिरपेक्ष दावों के पीछे छिपी भयावह वास्तविकता को उजागर कर दिया है।

यह स्थिति उन सनातनी अभिभावकों के लिए अत्यंत चिंताजनक और स्वाभाविक रूप से विचलित करने वाली है, जिनकी उच्च शिक्षित बेटियां अपने घरों से दूर महानगरों के औद्योगिक क्षेत्रों में काम कर रही हैं। यदि कार्यस्थलों पर ऐसा ही असुरक्षित और दमघोटू माहौल रहा, तो दूरगामी परिणाम यह होगा कि हिंदू अभिभावक अपनी बेटियों को ऐसी कंपनियों में भेजने से कतराएंगे। यह आत्मघाती प्रवृत्ति न तो इन कंपनियों के व्यावसायिक हित में होगी और न ही हमारे समाज के लिए शुभ संकेत है।

विप्रो और टीसीएस: सफेदपोश जिहाद के जीवित प्रमाण

जून 2026 में पुणे के हिंजवड़ी औद्योगिक क्षेत्र स्थित विप्रो की पूर्व महिला कर्मचारी ने न्याय की गुहार लगाते हुए पुलिस को बताया कि उसकी वरिष्ठ सहकर्मी (जो बीमा विभाग में प्रबंधक जैसे प्रभावी पद पर आसीन थी) द्वारा उस पर इस्लाम अपनाने और एक मुस्लिम युवक से निकाह करने के लिए लगातार मानसिक व आजीविका संबंधी दबाव बनाया जा रहा था। जब पीड़िता ने इसकी शिकायत कंपनी के आंतरिक शिकायत तंत्र से की, तो न्याय मिलने के बजाय प्रबंधन ने उस पर ही त्यागपत्र देने का दबाव बनाया। अंततः, हिंदू संगठनों के प्रखर हस्तक्षेप और पुलिसिया जांच के बाद कॉर्पोरेट जगत के वातानुकूलित केबिनों में चल रहा यह छद्म एजेंडा और धर्मांतरण का सिंडिकेट बेनकाब हुआ।

यह केवल विप्रो तक सीमित नहीं है। मार्च-अप्रैल 2026 में नासिक की एक अन्य बड़ी कंपनी में भी एक वरिष्ठ अधिकारी दानिश शेख और उसके सहयोगियों पर हिंदू महिला कर्मचारी के यौन उत्पीड़न, सनातन देवी-देवताओं पर भद्दी टिप्पणियों और धर्मांतरण के दबाव के आरोप में विशेष जांच दल द्वारा गंभीर कानूनी कार्रवाई की जा चुकी है। जो कॉर्पोरेट परिसर कभी विशुद्ध व्यावसायिकता, योग्यता और निष्पक्षता के आदर्श माने जाते थे, वे आज सनातन विरोधी और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए अत्यंत उर्वरक भूमि में बदल रहे हैं।

तलवार से लेकर कीबोर्ड तक: गजवा-ए-हिंद का बदलता स्वरूप

इतिहास के झरोखे से देखें तो भारत की इस सस्यश्यामला देवभूमि पर हुए इस्लामी आक्रांताओं के बर्बर आक्रमणों का एकमात्र ध्येय यहाँ की मूल सनातनी संस्कृति को समूल नष्ट कर इसे एक इस्लामी गणराज्य में परिवर्तित करना था, जिसे 'गजवा-ए-हिंद' का नाम दिया गया। इन मजहबी हमलावरों में ऐसा एक भी नाम नहीं है, जिसने सनातनी आस्था के केंद्रों और मंदिरों को निशाना न बनाया हो। इन मजहबी पिशाचों ने हमारे वैभवशाली मंदिरों को तोड़ा और उसी मलबे से जबरन मस्जिदों का निर्माण करायायही कारण है कि आज भी उन विवादित ढांचों में हमारे देवी-देवताओं की मूर्तियां, कलाकृतियां और सनातनी प्रतीक चीख-चीखकर इतिहास की गवाही देते हैं।

इन मजहबी दरिंदों ने भारत के एक बड़े भूभाग पर लगभग आठ सौ वर्षों तक रक्तपात और दमन का शासन चलाया। तलवार की नोंक पर जितना संभव था, उतना जबरन धर्मांतरण किया गया। हिंदुओं के सामूहिक नरसंहार का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि कत्लेआम के बाद हिंदुओं के जनेऊ क्विंटलों के वजन में तोले जाते थे और हमारे पूर्वजों के कटे सिरों की मीनारें खड़ी की जाती थीं। हिंदुओं के भीतर भय का साम्राज्य स्थापित करने के लिए हमारे गुरुओं, महापुरुषों और पूजनीय विभूतियों को दीवारों में जिंदा चुनवा दिया गया, खौलते तेल और गर्म तवों पर तड़पाया गया, परंतु वे सनातनी वीरों का धर्म डिगा नहीं सके। प्रख्यात इतिहासकारों के अनुसार, पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर आज तक का सबसे भीषण और क्रूरतम मानव संहार इसी देवभूमि पर हुआ, जिसमें लगभग दस करोड़ हिंदुओं को अपनी आस्था के लिए प्राणों की आहुति देनी पड़ी।

यदि इतिहास के क्रम को समझें, तो अंग्रेजों के आगमन ने संभवतः इस पूर्ण इस्लामीकरण के पहिये को कुछ समय के लिए रोक दिया था। परंतु, जब ब्रिटेन ने भारत छोड़ा, तो उन्होंने देश का मजहबी विभाजन करके इन आक्रांताओं के वंशजों को 'पाकिस्तान' और 'बांग्लादेश' के रूप में एक अनुचित पारितोषिक सौंप दिया। विभाजन के बाद भी गांधी और नेहरू की अदूरदर्शिता तथा तुष्टिकरण की नीति के कारण, उन्होंने मजहबी आधार पर पाकिस्तान तो दे दिया, लेकिन वहां के संपूर्ण मुस्लिम वर्ग को वहां भेजने का दृढ़ संकल्प नहीं दिखा पाए। परिणामस्वरूप, भारत के भीतर एक ऐसा वर्ग शेष रह गया जिसका मानना था कि वे केवल पाकिस्तान से संतुष्ट नहीं हैं, बल्कि उनका अंतिम लक्ष्य संपूर्ण अखंड भारत पर इस्लामी परचम लहराना है। उस समय की व्यवस्था ने हिंदुओं के लिए तो संवैधानिक और कानूनी अड़चनें खड़ी कर दीं, लेकिन दूसरे धर्मावलंबियों को 'अल्पसंख्यक' के नाम पर असीमित संवैधानिक छूट दे दी।

आज जनसंख्या वृद्धि, विवाह के बहाने धर्मांतरण, भूमि पर अवैध कब्जे और अब 'कॉर्पोरेट जिहाद' के माध्यम से भारत को कालांतर में इस्लामी गणराज्य बनाने की उसी सोची-समझी रणनीति पर काम किया जा रहा है। प्रतिदिन समाचार पत्रों में छपने वाली धर्मांतरण की घटनाएं तो केवल सागर की ऊपरी लहरें भर हैं, जो पुलिस तक पहुंच पाती हैं; वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक भयावह है। इस चौतरफा मजहबी आक्रमण ने समाज में अविश्वास की एक गहरी खाई पैदा कर दी है, जिससे ऐसा प्रतीत होने लगा है कि जैसे पूरा तंत्र ही इस एजेंडे में संलिप्त है। खान-पान में मिलावट के अमानवीय कुकर्म इसी विकृत मानसिकता के प्रतीक हैं।

क्या है 'कॉर्पोरेट जिहाद' और वैश्विक नीतियों का कुचक्र?

'कॉर्पोरेट जिहाद' दरअसल जिहाद का एक अत्यंत परिष्कृत, आधुनिक और उच्च स्तरीय सफेदपोश संस्करण है। इसके तहत अत्यधिक शिक्षित, उच्च पदों पर बैठे जिहादी तत्वों द्वारा हिंदू समाज की उच्च शिक्षित, आत्मनिर्भर और निर्णय लेने में सक्षम महिलाओं को लक्षित किया जा रहा है। हम पहले भी देख चुके हैं कि किस प्रकार उच्च शिक्षित चिकित्सक, बड़े संस्थानों के अभियंता और सिविल सेवा के अधिकारी तक इस नेटवर्क से जुड़कर भारत के जनसांख्यिकीय ढांचे को बदलने में लगे हैं। इस पूरे खेल के पीछे वैश्विक कॉर्पोरेट जगत का एक अदृश्य हथियार काम कर रहा है, जिसे 'रेडी' यानी प्रजाति, जातीयता, विविधता और समावेशन संबंधी दिशा-निर्देश कहा जाता है।

"वैश्विक विविधता के नाम पर आयात की गई नीतियां जब बिना भारतीय संदर्भ के लागू की जाती हैं, तो वे कार्यस्थल को सुरक्षित बनाने के बजाय, सनातन विरोधी आंतरिक एजेंडा चलाने वाले तत्वों के लिए एक सुरक्षा कवच बन जाती हैं।"

·         वैश्विक सूचकांक का लालच और राष्ट्रधर्म से गद्दारी: यह सूचकांक मूल रूप से अमेरिका स्थित 'धार्मिक स्वतंत्रता एवं व्यवसाय प्रतिष्ठान' द्वारा वर्ष 2014 में विकसित किया गया था। इस संगठन के पीछे वैश्विक वामपंथी और छद्म-उदारवादी ताकतें सक्रिय हैं। पश्चिमी देशों में इसका उद्देश्य कार्यस्थल पर धार्मिक भेदभाव रोकना बताया जाता है, लेकिन इसकी असलियत यह है कि वैश्विक निवेशकों से उच्च पर्यावरण, सामाजिक और प्रशासनिक अंक प्राप्त करने के लोभ में भारतीय कंपनियां अंधी हो चुकी हैं। जितने अधिक अंक होंगे, विदेशी धन उतनी ही आसानी से मिलेगा। इसी आर्थिक लालच में ये भारतीय कंपनियां दीवानगी की हद तक जाकर अपना राष्ट्रधर्म भूल रही हैं और सनातन संस्कृति को नष्ट करने के कुचक्र का हिस्सा बन रही हैं।

·         अल्पसंख्यक कार्ड का भय और आंतरिक समूहों का दुरुपयोग: ये दिशा-निर्देश कंपनियों को कर्मचारियों के धार्मिक या सांस्कृतिक समूह बनाने की छूट देते हैं। इन समूहों की आड़ में कट्टरपंथी तत्व अपना नेटवर्क सुदृढ़ करते हैं और बहुसंख्यक हिंदू समाज के कनिष्ठ कर्मचारियों को चिन्हित कर उन पर मानसिक दबाव बनाते हैं। यदि कोई हिंदू कर्मचारी इसकी शिकायत करता है, तो कंपनी का मानव संसाधन विभाग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी विविधता रैंकिंग गिरने और अल्पसंख्यक उत्पीड़न का ठप्पा लगने के डर से आरोपी पर कार्रवाई करने के बजाय पीड़ित को ही चुप करा देता है या उसे नौकरी छोड़ने पर मजबूर कर देता है।

जिहाद के बदलते आधुनिक रूप - धर्मांतरण का यह हिंसक सिंडिकेट अब पूर्णतः तकनीकी रूप से सक्षम और आधुनिक हो चुका है:

·         ऑनलाइन खेल और संवाद माध्यम: विभिन्न नगरों में ऑनलाइन खेलों और संवाद माध्यमों के जरिए हिंदू नाबालिग बच्चों का मतिभ्रम कर उनके धर्मांतरण के बड़े रैकेट पकड़े जा चुके हैं।

·         आर्थिक और रोजगार प्रलोभन: निजी शिक्षण संस्थानों, परिवहन कंपनियों और नए व्यावसायिक उपक्रमों में पदोन्नति और मोटी परिलब्धियों के बदले धर्म बदलने की अदृश्य शर्तें थोपी जा रही हैं।

·         जिहादी व्यायामशालाएं: देश भर की व्यायामशालाओं का उपयोग सनातनी युवतियों को फंसाने और इस जाल को कॉर्पोरेट और संभ्रांत वर्गों तक फैलाने के लिए एक बड़े हथकंडे के रूप में किया जा रहा है, जिसे तंत्र केवल सामान्य अपराध मानकर नजरअंदाज कर रहा है।

उद्योग जगत के लिए कठोर और अनिवार्य सुधारात्मक कदम :

1.  स्थानीयकृत एवं सनातनी मूल्यों के अनुकूल नीति: पश्चिमी देशों की अंधी नकल पर आधारित इन विदेशी नीतिगत ढांचों को पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए अथवा इन्हें भारतीय संविधान और राज्यों के 'धर्मांतरण विरोधी कानूनों' के अनुरूप परिवर्तित किया जाए।

2.  संस्था प्रमुखों की दंडात्मक जवाबदेही: यदि किसी भी कॉर्पोरेट परिसर में धर्मांतरण या धार्मिक प्रलोभन का मामला सामने आता है, तो केवल आरोपी कर्मचारी ही नहीं, बल्कि कंपनी के मानव संसाधन प्रमुख और मुख्य कार्यकारी अधिकारी को भी देशद्रोही गतिविधियों में सह-आरोपी माना जाए और उन पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई हो।

3.  उच्च वैश्विक अंक वाली कंपनियों का सुरक्षा अंकेक्षण: जिन कंपनियों को वैश्विक स्तर पर बहुत उच्च अंक मिले हुए हैं, सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को तुरंत उनकी आंतरिक गतिविधियों और उनके सामाजिक उत्तरदायित्व कोष की सघन जांच करनी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भारतीय धन का उपयोग सनातन विरोधी तंत्र को पोषित करने में न हो रहा हो।

4.  आचरण संहिता में 'शून्य सहिष्णुता': कार्यस्थलों पर किसी भी प्रकार के मजहबी प्रचार, प्रार्थना समूहों या धर्मांतरण के प्रयासों पर तत्काल प्रभाव से पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए और उल्लंघन पर सीधे सेवामुक्ति का प्रावधान हो।

मोदी सरकार से तीखे सवाल

भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अंतःकरण की स्वतंत्रता देता है, लेकिन इस स्वतंत्रता का उपयोग सनातनी हिंदुओं के विरुद्ध एक हथियार के रूप में करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। "कपट, प्रलोभन, डराने-धमकाने या कार्यस्थल पर पद के दुरुपयोग" द्वारा किया गया कोई भी धर्मांतरण राष्ट्र की सुरक्षा और संप्रभुता पर सीधा प्रहार है।

वर्तमान सरकार को केवल चुनावी सुर्खियों और लोकलुभावन बयानों के माध्यम से वोट बटोरने की राजनीति से ऊपर उठना होगा। ज़मीनी हकीकत यह है कि कॉर्पोरेट जिहाद को रोकने के लिए अभी तक कोई ठोस, दूरगामी और दंडात्मक कदम नहीं उठाए गए हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें प्रत्येक निजी व सार्वजनिक प्रतिष्ठान के लिए अविलंब एक 'राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सांस्कृतिक अखंडता नीति' अनिवार्य करें।

 

~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~

 

बुधवार, 3 जून 2026

साप्ताहिक विशेष लेख :- बाल-बाल बचा पश्चिम बंगाल

 


साप्ताहिक विशेष लेख :-

बाल-बाल बचा पश्चिम बंगाल! || तुष्टिकरण के 'डायमंड हार्बर मॉडल' का पतन, अंतरराष्ट्रीय साजिशों का भंडाफोड़ और सनातन पुनरुत्थान की नई भोर


स्वाधीनता जैसी अनुभूति और उत्सवधर्मी जनमानस

पश्चिम बंगाल की लाल माटी और कोलकाता की ऐतिहासिक गलियों में इन दिनों हर्ष और उल्लास का एक ऐसा अभूतपूर्व वातावरण दिखाई पड़ रहा है, मानो इस सीमांत राज्य को दशकों के दमघोंटू माहौल से अभी हाल ही में वास्तविक स्वतंत्रता मिली हो। यद्यपि, यह उल्लास और राहत की सांस मुख्य रूप से उन लोगों के चेहरों पर साफ देखी जा सकती है जो भारतीय राष्ट्रवाद, हिंदू अस्मिता और सनातन संस्कृति में प्रगाढ़ विश्वास रखते हैं। इसके विपरीत, दशकों से राज्य में तुष्टिकरण की फसल काटने वाले राजनेता, प्रशासनिक संरक्षण में फलने-फूलने वाला सिंडिकेट और राज्य की अराजकतापूर्ण व्यवस्था से गैर-कानूनी ढंग से अकूत लाभ अर्जित करने वाले तत्व गहरे सदमे में हैं। राजनीतिक गलियारों से लेकर जमीन तक फैले इस तंत्र को अभी भी यह विश्वास नहीं हो पा रहा है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) की अजेय मानी जाने वाली सरकार का भी अवसान हो सकता है।

राज्य के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने शपथ लेते ही जिस प्रकार ताबड़तोड़ और कड़े फैसले लेने शुरू किए हैं, उसने राज्य के आम नागरिकों में एक नए उत्साह और उत्सव का संचार कर दिया है। सुवेंदु सरकार के शुरुआती कदमों ने ही यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य में अब कानून का राज स्थापित होने जा रहा है। सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हैं:

    • भ्रष्टाचारियों पर कड़ा प्रहार: पिछले शासनकाल के दौरान सरकारी नौकरियों की तस्करियों और घोटालों में संलिप्त अधिकारियों व नेताओं के खिलाफ त्वरित कानूनी कार्यवाही।
    • सिंडिकेट राज की समाप्ति: राज्य भर में अवैध रूप से वसूले जाने वाले 'गुंडा टैक्स' और जबरन टोल टैक्स वसूलने वाले सिंडिकेट सरगनाओं पर शिकंजा।
    • घुसपैठ विरोधी अभियान: अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे क्षेत्रों और आंतरिक जिलों में अवैध घुसपैठियों की धरपकड़ के लिए बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान।

रेड रोड पर बदली परंपरा और नए नायक का उदय

पश्चिम बंगाल के इतिहास में लगभग १०७ वर्षों के बाद पहली बार ऐसा दृश्य देखने को मिला, जब कोलकाता के प्रतिष्ठित 'रेड रोड' पर ईद की नमाज का वह राजनीतिक आयोजन नहीं हुआ, जो पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान मुख्यमंत्री की उपस्थिति का मुख्य केंद्र हुआ करता था। मुस्लिम तुष्टिकरण और तुच्छ वोट बैंक की राजनीति पर कड़ा अंकुश लगाने के इन शुरुआती और साहसिक प्रयासों ने सुवेंदु अधिकारी को रातों-रात राज्य का नया 'नायक' (Mass Leader) बनाकर उभार दिया है।

अपनी त्वरित, निष्पक्ष और कड़क कार्यशैली के कारण वे न केवल पश्चिम बंगाल भाजपा में लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गए हैं, बल्कि समूचे देश के हिंदू समुदाय में भी उनके प्रति भारी आकर्षण पैदा हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यद्यपि उन्होंने अभी तक हिंदू समाज के विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक हित में कोई प्रत्यक्ष लोक-लुभावन कार्य नहीं किया है, लेकिन चूंकि भारत का बहुसंख्यक हिंदू समाज केवल राष्ट्र के प्रति किए गए सकारात्मक, साहसिक और न्यायसंगत कार्यों से ही अत्यधिक प्रसन्न हो जाता है, इसलिए पूरे हिंदू जनमानस के मन में सुवेंदु अधिकारी के प्रति अटूट श्रद्धा, विश्वास और सम्मान का भाव उत्पन्न हो गया है।

'लॉन्चिंग पैड' का विध्वंस और जनसांख्यिकीय संकट

पश्चिम बंगाल की नवगठित सरकार ने उस सबसे बड़े घाव पर सीधे सर्जिकल स्ट्राइक की है, जो दशकों से भारत की आंतरिक सुरक्षा को खोखला कर रहा था। बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कटीले तार (Barbed Wire Fencing) लगाने का जो कार्य पूर्ववर्ती ममता बनर्जी सरकार द्वारा 'भूमि अधिग्रहण न करने' और असहयोग के बहानों के कारण दशकों से लंबित रखा गया था, उसे सुवेंदु सरकार ने तुरंत प्रभाव से शुरू करा दिया है। सीमा सुरक्षा बल (BSF) को आवश्यक भूमि और प्रशासनिक सहयोग रातों-रात उपलब्ध करा दिया गया है। इसके साथ ही, राज्य के भीतर अवैध घुसपैठियों की पहचान का एक सघन अभियान शुरू हो चुका है। राज्य के प्रत्येक जिले में पहले से निर्मित या अस्थायी तौर पर चिन्हित डिटेंशन और होल्डिंग सेंटर्स को पूरी तरह सक्रिय कर दिया गया है, जिनमें पकड़े जा रहे अवैध नागरिकों की आमद शुरू हो चुकी है।

करदाताओं की कमाई पर डाका और सुरक्षाबलों की कड़ाई

डिटेंशन सेंटर्स और सीमावर्ती क्षेत्रों में जब राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों के कई समूहों ने इन पकड़े गए घुसपैठियों से सीधी वार्ता की, तो उन्होंने जो खुलासे किए वे चौंकाने वाले और देश की संप्रभुता को चुनौती देने वाले हैं। इन घुसपैठियों ने कैमरे के सामने यह स्वीकार किया कि:

१. उन्होंने भारत की सीमा में अवैध रूप से प्रवेश किया था।

२. पूर्ववर्ती सत्ताधारी दल (TMC) के स्थानीय नेताओं, पंचायत प्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के सीधे सहयोग से उन्हें भारत के नागरिकता से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध कराए गए थे।

३. इन दस्तावेजों के आधार पर वे न केवल मुफ्त राशन प्राप्त कर रहे थे, बल्कि राज्य और केंद्र सरकार की सभी कल्याणकारी व वित्तीय योजनाओं का सीधा लाभ उठा रहे थे।

यह तथ्य किसी भी सजग नागरिक को उद्वेलित करने के लिए पर्याप्त है कि भारत के ईमानदार करदाताओं (Taxpayers) की गाढ़ी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा इन अवैध विदेशी घुसपैठियों को पालने और उन्हें मुफ्त सुविधाएं देने पर लुटाया जा रहा था। मुस्लिम तुष्टिकरण आधारित राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय संसाधनों का एक विशाल हिस्सा न केवल एक समुदाय विशेष के तुष्टिकरण पर खर्च कर रहे थे, बल्कि देश की सुरक्षा को दांव पर लगाकर अवैध घुसपैठियों को अपना स्थायी 'वोट बैंक' बनाने के लिए उन्हें भारत का वैध नागरिक सिद्ध करने में अपनी पूरी शासकीय शक्ति झोंक चुके थे।

फलता का जनादेश और 'डायमंड हार्बर मॉडल' का स्याह सच

पश्चिम बंगाल के इस हालिया विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक विजय दर्ज की है। लेकिन इस पूरे चुनाव का जो वैचारिक और रणनीतिक निचोड़ है, वह दक्षिण २४ परगना जिले की फलता विधानसभा सीट के परिणाम से निकलता है। फलता के चुनावी परिणाम ने पिछले १५ वर्षों में ममता बनर्जी के शासनकाल के दौरान हुए सभी चुनावों के पीछे छिपे 'चुनावी प्रबंधन' के काले सच को पूरी दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया है। फलता विधानसभा क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी ने १,०९,००० से भी अधिक मतों के विशाल अंतर से ऐतिहासिक विजय हासिल की। सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह रहा कि इस सीट पर टीएमसी का प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा सका और खिसककर चौथे स्थान पर पहुंच गया, जबकि उसका निकटतम प्रतिद्वंदी वाम मोर्चे का उम्मीदवार था।

लोकतंत्र को बंधक बनाने का खेल

भौगोलिक और राजनीतिक दृष्टि से फलता विधानसभा क्षेत्र 'डायमंड हार्बर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र' के अंतर्गत आता है। यह वही क्षेत्र है जिसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी का राजनीतिक गढ़ माना जाता था। यहाँ टीएमसी का कुख्यात 'डायमंड हार्बर मॉडल' काम करता था। पूर्ववर्ती सरकार और टीएमसी के रणनीतिकार इस मॉडल को 'निर्बाध विकास' और 'सर्वश्रेष्ठ चुनावी प्रबंधन' का प्रतीक बताकर पूरे देश में इसका प्रचार करते थे। परंतु, वास्तविकता में यह मॉडल क्या था, इसका खुलासा तब हुआ जब फलता के मतदाताओं ने राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम कर पूर्ववर्ती सरकार द्वारा की जाने वाली चुनावी धांधली, डराने-धमकाने और विशेषकर महिलाओं के साथ किए जाने वाले अपमानजनक व दमनकारी व्यवहार के खिलाफ देश का ध्यान आकर्षित किया।

इसके बाद केंद्रीय चुनाव आयोग ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया। जांच में यह रोंगटे खड़े करने वाला सच सामने आया कि मतदान केंद्रों पर ईवीएम (EVM) मशीनों के उन बटनों पर सेलोटेप लगा दिया जाता था जिन पर विरोधी दलों के चुनाव चिन्ह होते थे, ताकि मतदाता केवल टीएमसी को वोट देने पर मजबूर हों। इतना ही नहीं, वोट देकर बाहर निकलने वाले मतदाताओं के कपड़ों पर एक विशिष्ट इत्र (Scent) छिड़का जाता था, और बाद में उस इत्र की खुशबू और बूथ के भीतर के इनपुट्स से यह पता लगाया जाता था कि मतदाता ने टीएमसी को वोट दिया है या नहीं। वोट न देने वाले या विरोध करने वाले मतदाताओं को चुनाव के बाद भीषण शारीरिक, मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना सहन करनी पड़ती थी।

जब चुनाव आयोग की कड़ी निगरानी, केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती और सीसीटीवी कैमरों के साए में फलता सीट पर दोबारा निष्पक्ष मतदान कराया गया, तो टीएमसी के उम्मीदवार और ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाने वाले जहांगीर खान—जो उस पूरे क्षेत्र में अपनी दबंगई, सिंडिकेट और आतंक के लिए कुख्यात था—की न केवल करारी हार हुई, बल्कि उसकी जमानत तक जब्त हो गई। फलता का यह परिणाम यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि पिछले चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की अधिकांश सीटों पर जीत जनसमर्थन से नहीं, बल्कि इसी लोकतांत्रिक डकैती यानी 'डायमंड हार्बर मॉडल' पर आधारित थी। इसने लोकतंत्र को बंधक बनाने वाले और वोटों की संगठित लूट करने वाले तंत्र का न केवल पतन किया, बल्कि एक बहुत बड़े राज्य-प्रायोजित षड्यंत्र का पर्दाफाश भी कर दिया।

ऐतिहासिक तुष्टिकरण और सुवेंदु की डबल स्ट्राइक

ममता बनर्जी की राजनीतिक अपराजेयता के मिथक को तोड़ने वाले नेता कोई और नहीं, बल्कि सुवेंदु अधिकारी ही हैं। इतिहास गवाह है कि वर्ष २०२१ में नंदीग्राम सीट से और वर्ष २०२६ के इस ऐतिहासिक विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी को उनकी सुरक्षित मानी जाने वाली भवानीपुर सीट से शिकस्त देकर सुवेंदु अधिकारी ने धूल चटाई है। एक ही मुख्यमंत्री को लगातार दो अलग-अलग चुनावों में हराने वाले सुवेंदु अधिकारी कभी ममता के सबसे भरोसेमंद और करीबी सहयोगी हुआ करते थे, जिन्होंने नंदीग्राम आंदोलन की जमीन तैयार की थी। आज वे बंगाल में राष्ट्रवाद के सबसे बड़े प्रतीक बनकर उभरे हैं।

कांग्रेस और वामपंथ के दौर में तुष्टिकरण की ऐतिहासिक क्रोनोलॉजी

पश्चिम बंगाल का यह ऐतिहासिक दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि १५ अगस्त १९४७ को देश का विभाजन होने के पहले ही, इस महान बौद्धिक और सांस्कृतिक चेतना वाले राज्य का 'मजहब' के आधार पर विभाजन तय कर दिया गया था। स्वतंत्रता के बाद शुरुआती २० वर्षों तक कांग्रेस ने इस राज्य पर निर्बाध शासन किया, परंतु सत्ता संभालते ही कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण की सभी सीमाएं लांघ दीं।

तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से अपनी जान, इज्जत और धर्म बचाकर आने वाले लाखों बंगाली हिंदू शरणार्थियों (Partition Refugees) को नागरिकता देने और उनके पुनर्वास में नेहरू और राज्य की कांग्रेस सरकार ने जानबूझकर अत्यधिक ढिलाई बरती। कांग्रेस सरकार को यह डर सता रहा था कि अगर इन लाखों पीड़ित हिंदू शरणार्थियों को राज्य के मुस्लिम बहुल सीमावर्ती इलाकों में स्थायी रूप से बसा दिया गया, तो वहां का जनसांख्यिकीय ढांचा (Demography) बदल जाएगा और स्थानीय मुस्लिम आबादी कांग्रेस से नाराज होकर उसके पारंपरिक वोट बैंक को छिन्न-भिन्न कर देगी। यही कारण था कि इन हिंदू शरणार्थियों को बंगाल की मुख्यधारा से दूर रखने के लिए देश के सुदूर क्षेत्रों जैसे दंडकारण्य (ओडिशा/छत्तीसगढ़ के जंगलों) या अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भेजने का अमानवीय प्रयास किया गया।

इसके विपरीत, नेहरू-लियाकत समझौते के तहत पूर्वी पाकिस्तान चले गए मुस्लिम नागरिकों को भारत लौटने पर प्रफुल्ल चंद्र घोष और डॉ. बिधान चंद्र रॉय के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकारों ने स्थानीय स्तर पर विशेष प्रशासनिक सुरक्षा प्रदान की, उनकी संपत्तियों पर दोबारा कब्जा दिलवाया और वित्तीय सहायता भी प्रदान की। इनमें बड़ी संख्या में वे तत्व भी शामिल थे जो जिन्ना के "डायरेक्ट एक्शन" के दौरान कोलकाता और नोआखली में हुए भीषण हिंदू नरसंहार के लिए जिम्मेदार थे।

१९७७ में सत्ता में आए वामपंथियों (Left Front) ने तो मुस्लिम तुष्टिकरण के मामले में कांग्रेस के भी सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। वामपंथियों ने 'भूमि सुधार' के नाम पर हिंदू जमींदारों की जमीनें छीनकर मुसलमानों में बांटी, ओबीसी (OBC) कोटे के तहत मुसलमानों को १०% का आरक्षण दे दिया, मदरसों को भारी सरकारी सहायता दी और उर्दू शिक्षकों की बड़े पैमाने पर भर्ती की। इसके विपरीत, हिंदू धार्मिक पाठशालाओं, टोलों, मठों और मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए सरकारी खजाने का उपयोग नहीं किया गया।

ममता शासन की पराकाष्ठा: ११००% बजटीय छलांग

२०११ में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने इसे खतरनाक और संस्थागत स्तर पर पहुंचा दिया। २०१२ में उन्होंने राज्य की मस्जिदों के इमामों और मुअज्जिनों के लिए मासिक वेतन और भत्तों की घोषणा कर दी। वामपंथियों के शासनकाल के अंत तक (वर्ष २०१०-११ में) राज्य का अल्पसंख्यक मामलों का कुल वार्षिक बजट केवल ₹४७२ करोड़ था, जिसे ममता बनर्जी की सरकार ने अपने अंतिम पूर्ण बजट (वर्ष २०२५-२६) में ११००% से अधिक बढ़ाकर ₹५,७१३ करोड़ कर दिया था। इस बजट का एक बड़ा हिस्सा 'ऐक्यश्री' और 'मेधाश्री' जैसी विशेष स्कॉलरशिप योजनाओं के तहत केवल अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं को सीधे वित्तीय सहायता के रूप में बांटा जा रहा था। इसके अलावा, राज्य की कई बेशकीमती सरकारी संपत्तियों को वक्फ बोर्ड को सौंप दिया गया। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने पदभार ग्रहण करते ही इस संस्थागत भेदभाव पर कड़ा प्रहार करते हुए मस्जिदों के इमामों और मुअज्जिनों को दिए जाने वाले असंवैधानिक मासिक वेतन और भत्तों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।

'ग्रेटर बांग्लादेश' की अंतरराष्ट्रीय साजिश और सनातन का भविष्य

पश्चिम बंगाल का इतिहास जितना गौरवशाली रहा है, वर्तमान उतना ही साशंकित करने वाला रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञों का आरोप है कि ममता बनर्जी सरकार केवल वोट बैंक की राजनीति नहीं कर रही थी, बल्कि वह परोक्ष रूप से 'ग्रेटर बांग्लादेश' (Greater Bangladesh) बनाने के एक बेहद खतरनाक अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा बनती जा रही थी। इस अवधारणा के अंतर्गत पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश और भारत के पूर्वोत्तर (North-East) के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक नए संप्रभु भू-भाग को आकार देने का ताना-बाना बुना जा रहा था। इस योजना के तहत बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को योजनाबद्ध तरीके से सीमावर्ती जिलों में बसाया जा रहा था।

पश्चिम बंगाल दरअसल इन विदेशी तत्वों के लिए एक 'लॉन्चिंग पैड' बन चुका था। यहाँ से भारतीय नागरिकता के फर्जी दस्तावेज प्राप्त करने के बाद, इन घुसपैठियों को एक पूर्व-निर्धारित रणनीति के तहत भारत के विभिन्न कोनों जैसे जम्मू, लद्दाख की सीमाओं, उत्तराखंड की दुर्गम पहाड़ियों, और दक्षिण भारत के केरल में भेजा जाता था। हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों की जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि इनमें से कई संदिग्ध घुसपैठिये अल-कायदा (Al-Qaeda) जैसे वैश्विक आतंकी संगठनों के स्लीपर सेल से जुड़े हुए थे।

अंतरराष्ट्रीय ईसाई मिशनरी और वैश्विक शक्तियों का हस्तक्षेप

यह संकट केवल एक सीमा पार की घुसपैठ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वैश्विक मजहबी शक्तियों के घालमेल के भी संकेत मिले हैं। पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों और म्यांमार के अशांत क्षेत्रों को जोड़कर एक 'क्रिश्चियन लैंड' (Christian Land) बनाने की अंतरराष्ट्रीय साजिशों की गूंज पूर्व में भी सुनाई देती रही है। स्वयं बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने सत्ताच्युत होने से पहले यह दावा किया था कि उत्तर-पूर्व भारत, बांग्लादेश और म्यांमार के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक अलग ईसाई देश बनाने की अंतरराष्ट्रीय साजिश रची जा रही है।

हाल ही में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने कोलकाता एयरपोर्ट से मैथ्यू वैन डायक नामक एक संदिग्ध अमेरिकी नागरिक को गिरफ्तार किया था। उसी नेटवर्क के तहत दिल्ली और लखनऊ हवाई अड्डों से ६ यूक्रेनी नागरिकों को भी गिरफ्तार किया गया था, जो टूरिस्ट वीजा पर आकर अवैध रूप से पूर्वोत्तर के प्रतिबंधित क्षेत्रों और मिजोरम के रास्ते म्यांमार सीमा में दाखिल हो रहे थे।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे चौंकाने वाली कूटनीतिक घटना तब घटी जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत की आधिकारिक यात्रा पर आए। वे देश की राजधानी नई दिल्ली आने के बजाय सीधे कोलकाता पहुंचे और वहाँ 'मिशनरीज ऑफ चैरिटी' (Missionaries of Charity) के मुख्यालय 'मदर हाउस' गए। यह संस्था लंबे समय से अवैध धर्मांतरण और वित्तीय विसंगतियों के कारण विवादों में घिरी रही है, जिसके कारण वर्ष २०२१ में केंद्र सरकार ने इसका एफसीआरए (FCRA) लाइसेंस भी रद्द कर दिया था। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि ममता बनर्जी इस संस्था के शीर्ष नेतृत्व से बेहद नजदीक से जुड़ी हुई थीं और अमेरिकी विदेश मंत्री के आगमन से ठीक एक दिन पहले संस्था की कुछ ननों ने सचिवालय जाकर ममता बनर्जी से गुप्त भेंट भी की थी।

निष्कर्ष

उपरोक्त संपूर्ण परिदृश्य से यह अकाट्य रूप से स्पष्ट हो जाता है कि पश्चिम बंगाल एक बहुत बड़े अस्तित्वगत और सांस्कृतिक संकट के मुहाने पर खड़ा था, जिससे अब वह राष्ट्रवाद के उदय के कारण कुछ हद तक बाहर आ चुका है। आज पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक, और कश्मीर से लेकर केरल तक समूचे भारत में सनातन धर्म और राष्ट्र की संप्रभुता के खिलाफ वैश्विक शक्तियों का जो एक अघोषित गठबंधन काम कर रहा है, उसे बंगाल के इस राजनीतिक परिवर्तन से बहुत बड़ा झटका लगा है।

अब इस नई सरकार से राज्य के बहुसंख्यक समाज की एकमात्र और सबसे बड़ी अपेक्षा यही रहेगी कि वह राज्य से राजनीतिक हिंसा और भय के वातावरण को हमेशा के लिए समाप्त करे तथा हिंदुओं को उनके सनातन धर्म, त्योहारों और सांस्कृतिक प्रतीकों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए पूर्ण शासकीय व प्रशासनिक संरक्षण प्रदान करे। यदि सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की यह नवगठित सरकार पश्चिम बंगाल के पीड़ित और प्रताड़ित हिंदू जनमानस को न्यूनतम इतना संबल और सुरक्षा प्रदान करने में सफल हो जाती है, तो राजनीतिक और सामाजिक रूप से आने वाले कई दशकों तक इस राज्य से राष्ट्रवाद के इस किले को ढहा पाना किसी भी देशविरोधी या तुष्टिकरण करने वाली शक्ति के लिए असंभव होगा। पश्चिम बंगाल सचमुच 'बाल-बाल' बचा है।

~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~

सारांश -

मोदी के बारह वर्ष का कार्यकाल बेमिशाल ?

  कालखंड का न्याय : लोकतांत्रिक निरंतरता का महाशिखर और राष्ट्रहित की शाश्वत चुनौतियां                                                       ...