शनिवार, 4 अप्रैल 2026

नकली दलित बनाम असली दलित


 

 

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: नकली दलित बनाम असली दलित | 75 साल से हो रही एक धोखाधडी का अंत


“धर्मांतरित होकर ईसाई या मुसलमान बन चुके दलित अब दलित होने का फायदा नहीं उठा पाएंगे.”


धर्मांतरित होकर ईसाई या मुसलमान बन चुके दलित, अब दलित होने का फायदा नहीं उठा पाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस समय आया है जब पिछले 75 वर्षों से संविधान की अवहेलना करते हुए धर्मांतरण के बाद भी धड़ल्ले से इसका फायदा उठाया जा रहा था। धर्मांतरण के लिए दलित आसान शिकार होते हैं जिन्हें सब्ज बाग़ दिखाया जाता था कि उन्हें जातिगत भेदभाव से छुटकारा मिल सकेगा और साथ ही साथ उन्हें जातिगत आधार पर मिलने वाले आरक्षण तथा अन्य लाभ भी मिलते रहेंगे — यानी आम के आम, गुठलियों के दाम। तत्कालीन कांग्रेस सरकारों के संरक्षण में पनपा यह गोरखधंधा आज भी केंद्र सरकार की नाक के नीचे हो रहा था।

24 मार्च 2026 को सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने चिंतादा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण और स्पष्ट निर्णय सुनाया है, जो सामाजिक और कानूनी दृष्टिकोण से एक बड़ी नजीर है। यह मामला आंध्र प्रदेश के एक ईसाई पादरी, चिंतादा आनंद से जुड़ा था, जिनका जन्म दलित परिवार में हुआ था, लेकिन वे धर्मांतरित होकर ईसाई बन गए थे। उन्होंने जन्म से दलित होने का दावा करते हुए अपने ऊपर हुए कथित हमले के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था। पीड़ित पक्ष ने निचली अदालतों और फिर हाईकोर्ट में इसे इस आधार पर चुनौती दी कि ईसाई होने के कारण वे अब अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं आते।

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जैसे ही कोई व्यक्ति ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाता है, उसका अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत और पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है। न्यायालय ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 का हवाला दिया, जो कहता है कि केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानने वाले ही अनुसूचित जाति के सदस्य माने जा सकते हैं। चूँकि जो व्यक्ति अब ईसाई बन चुका है, इसलिए वह अब अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रहा; इसलिए वह एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत सुरक्षा या सरकारी आरक्षण का दावा नहीं कर सकता।

यह निर्णय कई मामलों में ऐतिहासिक है, लेकिन यह गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है कि पिछले 75 वर्षों से संवैधानिक व्यवस्था के साथ की जा रही धोखाधड़ी के लिए कौन जिम्मेदार है — राजनीति, सरकार या सर्वोच्च न्यायालय।

दलितों में समानता के उद्देश्य से की गई आरक्षण की व्यवस्था तथा अन्य संवैधानिक कानूनों का किस हद तक दुरुपयोग हुआ है, बहुत चिंताजनक है। इसमें सबसे अधिक नुकसान असली दलितों का हुआ है, जिनके हक पर ईसाई और मुस्लिम बन चुके नकली दलितों ने डाका डाला है। अगर यह सब नहीं किया गया होता तो उनकी स्थिति आज काफी बेहतर होती।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज यही नकली दलित यूजीसी मामले में विभिन्न संगठनों के बैनर तले सवर्ण और सामान्य वर्ग से मोर्चा खोल रहे हैं, जिन्हें निहित स्वार्थ वाली हिंदू-विरोधी शक्तियाँ वित्तीय सहायता और संसाधन उपलब्ध करा कर सामाजिक विद्वेश फैलाने का काम कर रहीं हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने उन सभी संशयों को खत्म कर दिया जहाँ लोग धर्म परिवर्तन के बाद भी जाति प्रमाण पत्र का लाभ लेते थे और ईसाई या मुस्लिम होते हुए भी कागजी दलित बने रहते थे। इस निर्णय के प्रभाव बहुत व्यापक होंगे और इनका सीधा लाभ दलित समुदायों को होगा।

अब ईसाई और मुस्लिम बन चुके दलित सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं उठा पाएंगे और न ही उन्हें प्रोन्नति के मामले में कोई लाभ मिलेगा। शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के मामले में भी उन्हें अनुसूचित जाति का लाभ नहीं मिलेगा। अनुसूचित जाति को मिलने वाली तमाम सरकारी रियायतें — जैसे शिक्षण शुल्क में छूट, मुफ्त कोचिंग, नौकरी तथा प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए निशुल्क आवेदन और अन्य सरकारी सुविधाएँ — भी इन नकली दलितों को नहीं मिलेंगी। धर्मांतरित नकली दलित उत्पीड़न के मामलों में एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं कर पाएंगे। लोकसभा और विधानसभा में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों में भी इन नकली दलितों की घुसपैठ बंद हो जाएगी।

अनुसूचित जाति का दर्जा मुख्य रूप से ‘अस्पृश्यता’ की ऐतिहासिक सामाजिक बुराई से जुड़ा है, जिसके लिए संवैधानिक अधिकार 1950 के राष्ट्रपति आदेश (अनुच्छेद 341) द्वारा दिया गया है; इसके अनुसार अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के व्यक्तियों को ही मिल सकता है। इसलिए यदि कोई दलित, ईसाई या मुस्लिम बनता है तो वह कानूनन अपनी अनुसूचित जाति की श्रेणी खो देता है।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यह नियम अनुसूचित जनजाति पर लागू नहीं होगा, क्योंकि अनुसूचित जनजाति का दर्जा धर्म से नहीं, बल्कि उनकी ‘नृवंशविज्ञान’ और ‘विशिष्ट संस्कृति’ से तय होता है। संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित जनजाति के निर्धारण के लिए धर्म की कोई शर्त नहीं है। एक आदिवासी व्यक्ति की पहचान उसके रक्तपूर्वजों, विशिष्ट भाषा, रीति-रिवाजों और भौगोलिक अलगाव से होती है। ये गुण धर्म बदलने से नहीं बदलते।

इस संवैधानिक व्यवस्था में भी पिछले दरवाजे से सेंध लगाई जा रही है। झारखंड में भीषण समस्या उत्पन्न हो गयी है जहाँ बांग्लादेशी घुसपैठियों ने स्थानीय आदिवासी महिलाओं से शादियाँ कर उन्हें इस्लाम में धर्मांतरित कर लिया है। उनकी संतानों में नृवंशविज्ञान, एथनिक और सांस्कृतिक पहचान समाप्त हो जाती है, तो उनका अनुसूचित जनजाति बने रहना एक बड़ी धोखाधड़ी है। इसलिए जितनी जल्दी संभव हो सके इस संदर्भ में केंद्र सरकार को उचित संवैधानिक संशोधन करना चाहिए अन्यथा वहां का मूल आदिवासी समूह पूरी तरह समाप्त हो सकता है।

मुस्लिम बन चुके लोगों को वोटों की राजनीति और मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण अनुसूचित जाति की तरह ही, अन्य पिछड़ा वर्ग का लाभ दिया जा रहा है। मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 13 अगस्त 1990 से सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27% आरक्षण की घोषणा की गई थी, जिसे 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने मंजूरी दी थी। अनुसूचित जाति के मामले में 1950 का राष्ट्रपति आदेश इसे केवल हिंदू, सिख और बौद्धों तक सीमित रखता है; लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए इस तरह की कोई स्पष्ट संवैधानिक या कानूनी व्यवस्था नहीं है।

कई राज्य सरकारों ने मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग के कोटे से सरकारी आरक्षण देकर उन्हें लाभान्वित भी कर दिया है। सैयद, शेख, मुगल तथा पठान, जिनकी संख्या कुल मुसलमानों में 10% से भी कम है, को छोड़कर शेष सभी मुसलमानों को पसमांदा कह कर अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लिया गया है।

यदि एक ही पृष्ठभूमि का कोई व्यक्ति ईसाई होने के बाद अनुसूचित जाति होने का लाभ नहीं ले सकता, तो फिर मुसलमान होने के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग का लाभ कैसे ले सकता है — यह एक बड़ी विसंगति है जिस पर सर्वोच्च न्यायालय को ध्यान देना चाहिए। केंद्र सरकार से इसकी अपेक्षा करना व्यर्थ है क्योंकि भाजपा शासित महाराष्ट्र तथा अन्य राज्यों ने मुसलमानों की अनेक जातियों को पहले ही अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर दिया है।

यह एक यक्ष प्रश्न है। यदि उन्हें बराबरी का हक देने की गारंटी देकर धर्मांतरित करवाया, लेकिन फिर भी उनकी सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ तो फिर धर्मांतरण का उद्देश्य क्या था !

यह व्यवस्था की विसंगति है, या हिंदुओं को उनके ही देश में धर्मांतरित कर दिए जाने का सुनियोजित षड्यंत्र, ताकि भारत का राष्ट्रीयकरण किया जा सके — यह विचारणीय प्रश्न है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नकली दलितों पर दिया गया ऐतिहासिक निर्णय अंतिम नहीं है। इसके विरुद्ध पुनर्विचार याचिका दायर की जा सकती है । सरकार भी इस मामले में हस्तक्षेप करके कानून बना सकती है, जैसा कि मोदी सरकार ने एससी/एसटी एक्ट के मामले में किया था।

सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि केंद्र की मोदी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालकृष्णन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया है, जो यह अध्ययन कर रहा है कि क्या दलित ईसाइयों और दलित मुस्लिमों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाना चाहिए। आयोग को इसी वर्ष अप्रैल में अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। यदि आयोग पाता है कि धर्म परिवर्तन के बाद भी इन समुदायों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधर नहीं हुआ है, तो केंद्र सरकार संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में संशोधन करके हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म के साथ ‘ईसाई’ और ‘इस्लाम’ धर्म को भी शामिल करने का प्रावधान कर सकती है; ऐसी स्थिति में न्यायालय का वर्तमान निर्णय स्वतः निष्प्रभावी हो जाएगा।

मोदी सरकार की मंशा कुछ ऐसा करने की प्रतीत भी होती है, अन्यथा इस आयोग के गठन की कोई आवश्यकता नहीं थी। यदि मोदी सरकार ऐसा नहीं भी करती है तो भविष्य की कोई भी सरकार कभी भी इस रिपोर्ट को निकाल कर लागू कर सकती है, जैसा कि बी. पी. सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट के मामले में किया था। इसलिए मोदी सरकार द्वारा गठित वालकृष्णन आयोग की रिपोर्ट विष का बीज साबित होगी।

जो भी हो, नकली दलितों और नकली पिछड़ों के आरक्षित कोटे में शामिल होने का सबसे बड़ा नुकसान अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को उठाना पड़ेगा। इसका एहसास जितनी जल्दी उन्हें हो जाए उतना ही अच्छा है; अन्यथा यह व्यवस्था उनके तथा राष्ट्र दोनों के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगी।

~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~

शनिवार, 28 मार्च 2026

नव संवत्सर 2083: समय और संस्कृति का पुनर्जन्म

 






 https://www.youtube.com/watch?v=f6dJjrS2Ktc&t=21s

नव संवत्सर 2083: समय और संस्कृति का पुनर्जन्म

आज जब दुनिया कैलेंडर की तारीखों के पीछे भाग रही है, तब भारतीय संस्कृति हमें समय की उस गहरी गणना की ओर ले जाती है जो वैज्ञानिक भी है और आध्यात्मिक भी। 19 मार्च 2026 को हमने अपने नए वर्ष 'नव संवत्सर 2083' का स्वागत किया है। यह दिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि को होता है, जिसे 'चैत्र शुक्ल प्रतिपदा' कहा जाता है। इस दिन से हिंदू धर्म में नए साल का आरंभ होता है, जिसे 'नव संवत्सर' के रूप में जाना जाता है। यह आज भी भारतीय काल-गणना का आधार है। यह हमारी उस वैज्ञानिक विरासत का प्रमाण है, जो सूर्य और चंद्रमा की गति के आधार पर समय को परिभाषित करती है। 19 मार्च 2026 से विक्रम संवत की गणना में 2083वाँ वर्ष शुरू होता है।

भारतीय काल-गणना केवल तिथियों का क्रम नहीं, बल्कि खगोलीय घटनाओं, ऋतुओं और मानव जीवन के चक्र का सटीक समन्वय है। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को वर्षारंभ मानने के पीछे गहरी तर्कसंगतता हैयह वसंत ऋतु का प्रारंभिक चरण है, जो प्रकृति का पुनर्जन्म, सूर्य की गति और चंद्रमा की कलाओं का संतुलित संगम तथा कृषि चक्र की नई शुरुआत (बीज, फसल और श्रम का नया वर्ष) दर्शाता है। भारतीय पंचांग (लूनी-सोलर) चंद्रमा की तिथियों और सूर्य की संक्रांतियों का संयोजन है, जो इसे अत्यंत वैज्ञानिक बनाता है।

धार्मिक, आध्यात्मिक, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण इस पावन तिथि से जुड़ी तीन प्रमुख पौराणिक कथाएं हैं:

1. ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि की रचना (ब्रह्म पुराण): 'ब्रह्म पुराण' के अनुसार, जब संपूर्ण ब्रह्मांड जलमग्न और अंधकारमय था और भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में थे, तब उनकी नाभि से उत्पन्न कमल पर ब्रह्मा जी प्रकट हुए। यही सृजन का प्रथम क्षण था। उन्होंने इसी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के सूर्योदय के समय सृष्टि की रचना का संकल्प लिया था। ब्रह्मा जी ने इसी दिन से 'सतयुग' का प्रारंभ किया और कालचक्र (समय की सुई) को गति दी। उन्होंने पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) की व्यवस्था की; ग्रह, नक्षत्र और ऋतुओं का नियमन किया तथा दिन, मास और संवत्सर (वर्ष) का निर्धारण किया। इसीलिए इस दिन को "सृष्टि का जन्मदिन" कहा जाता है।


 

इस दिन ब्रह्मा जी की पूजा का विशेष विधान है क्योंकि उन्होंने ही शून्य से इस जीवंत संसार को गढ़ा था। यह तथ्य संकेत देता है कि सृष्टि का आरंभ निर्विकार और शुद्ध ऊर्जा (विष्णु) से हुआ और उसे आकार देने वाली सृजनात्मक शक्ति (ब्रह्मा) उसी से उत्पन्न हुई। यह कथा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सृजन-तत्व की दार्शनिक व्याख्या हैकि व्यवस्था, समय और नियम के बिना सृष्टि संभव नहीं। इस दिन ब्रह्मा जी ने न केवल भौतिक वस्तुओं की रचना की, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक नियमों की भी नींव रखी। यह नव संवत्सर न केवल एक नए साल का आरंभ है, बल्कि एक नए आध्यात्मिक और नैतिक चक्र का प्रारंभ भी है। यह एक ऐसा अवसर है जब व्यक्ति अपने भीतर निहित ब्रह्मांड की खोज करता है और अपने जीवन को एक नई दिशा में मोड़ने का प्रयास करता है।

2. भगवान विष्णु का 'मत्स्य अवतार': एक अन्य प्रमुख कथा जल प्रलय से जुड़ी है। जब हयग्रीव नामक असुर ने वेदों को चुराकर समुद्र की गहराइयों में छिपा दिया था, तब सृष्टि का विनाश निश्चित लग रहा था। वेद केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं थे, बल्कि वे जीवन, संस्कृति, नैतिकता और विज्ञान के महासागर तथा मानव सभ्यता की आत्मा थे। उस विकट स्थिति में भगवान विष्णु ने मत्स्य (मछली) का अवतार लिया। हयग्रीव का शरीर भयावह था, जिसका धड़ मनुष्य और सिर घोड़े का था। मत्स्य रूपी भगवान विष्णु और हयग्रीव के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें भगवान ने वेदों की रक्षा की और अंधकार को परास्त किया। प्रलय के शांत होने के बाद, इसी प्रतिपदा तिथि को भगवान ने पुनः वेदों को स्थापित किया और मनु (वैवस्वत मनु) के माध्यम से मानव सभ्यता की नई शुरुआत की। यह कथा एक शक्तिशाली पुनरुद्धार की कहानी है जो दर्शाती है कि कोई भी विनाश अंतिम नहीं है; वह नए आरंभ की एक अवस्था है।


 

3. सम्राट विक्रमादित्य और शकों पर विजय: यह कथा ऐतिहासिक और धार्मिक दोनों दृष्टिकोणों से महत्वपूर्ण है। प्राचीन भारत में 'शकों' और 'हूणों' जैसे विदेशी आक्रांताओं ने अत्यंत अत्याचार फैला रखा था। उज्जैन के प्रतापी राजा विक्रमादित्य ने अपनी वीरता, बुद्धिमत्ता और कुशल रणनीति से शकों को पराजित कर भारत भूमि से खदेड़ दिया। इस महान विजय और प्रजा को कष्टों से मुक्ति दिलाने की स्मृति में उन्होंने 'विक्रम संवत' की शुरुआत की। राजा विक्रमादित्य ने इसी दिन अपनी प्रजा का ऋण माफ कर दिया था, जिससे पूरी प्रजा ने दीप जलाकर खुशियाँ मनाईं। इस कथा का संदेश है कि सशक्त नेतृत्व, न्याय और जनकल्याण ही समृद्धि के आधार हैं।


 

अन्य महत्वपूर्ण मान्यताएं हैं कि इसी दिन सतयुग का प्रारंभ हुआ था, जो यह सिखाता है कि नैतिकता और सत्यनिष्ठा ही दीर्घकालीन संतुलन का मार्ग हैं। इसी दिन भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था, जिससे 'रामराज्य' की स्थापना हुई और त्रेतायुग का आरंभ हुआ। इसी दिन देवी पार्वती ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए अपनी कठोर तपस्या का समापन किया था, जिसके बाद से चैत्र नवरात्रि की परंपरा प्रारंभ हुई।


 

यह विविधता में एकता का पर्व है क्योंकि इसे भारत के विभिन्न कोनों में इसे अलग-अलग नामों से मनाया जाता है।

महाराष्ट्र में इसे 'गुड़ी पड़वा' के रूप में मनाया जाता है, जहाँ घरों के सामने विजय और नई शुरुआत के प्रतीक स्वरूप 'गुड़ी' (भगवा झंडा) फहराई जाती है। इस दिन  विशेष भोजन तैयार किया जाता है, जिसे 'श्रीखंड-पूड़ी' कहा जाता है. जो जीवन के खट्टे मीठे  दोनों पहलुओं को दर्शाता है


 

दक्षिण भारत (कर्नाटक, आंध्र, तेलंगाना) में इसे 'उगादि' कहा जाता है, जिसका अर्थ होता है नए युग का आरम्भ। यहाँ 'उगादि पचड़ी' का विशेष महत्व है, जो छह स्वादों का संयोजन हैखट्टा, मीठा, कड़वा, तीखा, नमकीन और कसैला। यह पचड़ी जीवन की पूर्णता और सभी अनुभवों को स्वीकार करने का प्रतीक है। यह प्रथा भारतीय चिकित्सा विज्ञान के सिद्धांतों से भी जुड़ी है जिसके अनुसार  छह स्वादों का संयोजन शरीर में अग्नि तत्व को संतुलित करता है और मन को शांत करता है  यह दर्शाती है कि भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता और विज्ञान एक दूसरे को पूरक बनाते हैं।

कश्मीर में इसे 'नवरेह', सिंध में 'चेटीचंड' और मणिपुर में 'सजिबु नोंगमा पानबा' के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

शक्ति की उपासना के लिए यह महत्वपूर्ण समय होता है शक्ति की उपासना का यह नौ दिवसीय उत्सव है, जो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होकर नवमी (राम नवमी) तक चलता है, जब भगवान राम का जन्म दिन होता है। कलश की स्थापना करके इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधाना की जाती है। यह आत्म-शुद्धि और अपने भीतर की शक्ति (ज्ञान, साहस, सहनशीलता और भक्ति) को जागृत करने का अवसर है।


 

आज की तेज़-रफ्तार दुनिया में नव संवत्सर हमें तीन स्पष्ट दिशाएँ देता है पहली  रीसेट यानी अतीत की त्रुटियों से सीखकर नई शुरुआत, दूसरी रीअलाइन अर्थात प्रकृति, दिनचर्या और स्वास्थ्य के साथ तालमेल और तीसरी रीइमेजिन जिसका मतलब है  लक्ष्य, मूल्य और जीवन-दृष्टि का पुनर्निर्धारण 

कॉरपोरेट भाषा में कहें तो यह वार्षिक स्ट्रैटेजिक रीसेट है; आध्यात्मिक भाषा मेंआत्मशुद्धि और नवसंकल्प 

 

भारत की सांस्कृतिक विविधता कोई कमजोरी नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय शक्ति है। यह विविधता हमें सिखाती है कि राष्ट्र की एकता एकरूपता पर नहीं, बल्कि विविधता के भीतर अंतर्निहित एकता पर निर्भर करती है। आज जब हम राष्ट्रीय एकता, सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता के मुद्दों के सम्मुख खड़े हैं, तब यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।

नव संवत्सर केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की समग्र अभिव्यक्ति हैजहाँ पुराण, इतिहास, विज्ञान और लोकाचार एक सूत्र में बंधते हैं। इस नव रात्रि में जब हम दीप प्रज्वलित करें, तो केवल उत्सव न मनाएँबल्कि यह संकल्प भी लें कि समय का सम्मान करेंगे, प्रकृति के साथ संतुलन रखेंगे तथा ज्ञान और परंपरा को आगे बढ़ाएँगे। इसी में हमारे अतीत की गरिमा और भविष्य की दिशा दोनों निहित हैं। इस नव संवत्सर पर हम केवल नए संकल्प ही न लें, बल्कि अपनी संस्कृति के इस वैज्ञानिक आधार को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का उत्तरदायित्व भी उठाएं।


 

नव संवत्सर आपके जीवन में नई ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि लेकर आए। समस्त पाठकों को 'विक्रम संवत 2083' की अनंत शुभकामनाएँ!

~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्र ~~~~~~~~~~~~~~~~

 

 

 

 

शनिवार, 7 मार्च 2026

मक्का-मदीना मिला रहे इज़रायल से हाथ, लेकिन भारत में उन्माद,

 


मक्का-मदीना मिला रहे इज़रायल से हाथ, लेकिन भारत में उन्माद || भारत के कुछ शहरों में विदेशी कट्टरपंथ के लिए आंसू क्यों बहाए जा रहे हैं ?

ईरान के सर्वोच्च इस्लामिक नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की एक कथित अमेरिकी-इज़रायली हमले में मृत्यु की खबरों के बाद भारत के कई शहरों में मुस्लिम समुदाय, विशेष रूप से शिया मुसलमानों द्वारा विरोध प्रदर्शन और शोक सभाएं आयोजित की गईं। इन प्रदर्शनों में प्रधानमंत्री मोदी और भारत सरकार की 'चुप्पी' पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया गया। कहीं-कहीं राष्ट्र विरोधी बयानबाजी भी देखने को मिली। कांग्रेस, वामपंथी और विपक्षी नेताओं ने मांग की कि भारत सरकार इस हमले की स्पष्ट निंदा करे और ईरान के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करे। सोनिया गांधी ने समाचार पत्र में लेख लिखकर न केवल सरकार की आलोचना की, बल्कि एक विशेष दृष्टिकोण का समर्थन किया।

कट्टरता केवल बंदूकों से नहीं आती, वह विरोध की भाषा से शुरू होती है। आज हम जाने-अनजाने में उसी खाई को खोद रहे हैं, जिसमें कभी पर्शिया जैसी महान सभ्यताएं दफन हो गईं। आस्था का सम्मान करना लोकतंत्र है, लेकिन आस्था के नाम पर राष्ट्र की नीति को बंधक बनाना अराजकता है। भारत की विदेश नीति किसी धर्म के प्रति प्रेम या घृणा पर नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा और आर्थिक भविष्य पर आधारित होनी चाहिए, न कि वोट बैंक के तुष्टिकरण पर। यह देखना दुखद है कि जब अरब दुनिया 'मार्स मिशन' और 'एआई तकनीक' की बात कर रही है, तब भारत में एक वर्ग सातवीं सदी के संघर्षों की मानसिकता में जी रहा है। इज़रायल या अमेरिका का विरोध करना एक 'फैशन' बन गया है, जो राष्ट्रीय हित को ताक पर रखकर किया जाता है। यदि खाड़ी के मुस्लिम देश अपने राष्ट्रीय हितों के लिए इज़रायल से हाथ मिला सकते हैं, तो भारतीय मुसलमानों को यह सोचने की जरूरत है कि वे किसके हितों की लड़ाई लड़ रहे हैं—ईरान के 'प्रॉक्सी' एजेंडे की या अपने देश 'भारत' की तरक्की की?

हमें यह समझना होगा कि ईरान की अपनी राजनीति है, और भारत का अपना भूगोल। जब कोई नागरिक अपने देश की चुनी हुई सरकार को विदेशी संघर्षों के आधार पर 'भला-बुरा' कहता है, तो वह वास्तव में अपनी ही लोकतांत्रिक जड़ों को कमजोर कर रहा होता है।

भारत में खामेनेई के समर्थन में आंसू बहाने वालों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ईरान इस समय इज़रायल के अतिरिक्त सऊदी अरब सहित खाड़ी के कई मुस्लिम देशों पर भी मिसाइल आक्रमण कर रहा है, जिससे भारी धन-जन की हानि हो रही है। इन क्षेत्रों में लगभग 1 करोड़ भारतीय रहते हैं; ऐसे में ईरान के प्रति यह एकतरफा प्रेम प्रदर्शन, क्या भारत सरकार के प्रति 'खिलाफत आंदोलन' की तर्ज पर आक्रोश जाहिर करना तो नहीं है?

इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी देश द्वारा किसी संप्रभु राष्ट्र पर आक्रमण या किसी राजनीतिक/धार्मिक नेता की हत्या गलत है, जैसा कि अमेरिका पर आरोप है। लेकिन किसी राष्ट्र द्वारा आतंकी संगठन खड़े करना, उन्हें संसाधन उपलब्ध कराना, विरोधी देशों में आतंकी घटनाएं करवाना और उसके नागरिकों का अपहरण व हत्याएं करवाना भी किसी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह मानवता के प्रति जघन्य अपराध है, जो ईरान वर्षों से कर रहा है। कौन कितना गलत है, यह बहस का विषय हो सकता है।

खामेनेई यद्यपि सर्वोच्च मजहबी नेता थे, लेकिन वे किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे, इसलिए उनके निधन पर सरकारी संवेदना या शोक का कोई औचित्य नहीं है। विशेषकर तब, जब वे समय-समय पर भारत के आंतरिक मुद्दों पर विवादित बयान देते रहे हों। खामेनेई ने कई बार कश्मीर की तुलना फिलिस्तीन, गाजा और यमन से की। अगस्त 2019 में जब भारत ने अनुच्छेद 370 हटाया, तब खामेनेई ने भारत सरकार से "दमनकारी नीति" छोड़ने की मांग की थी। मार्च 2020 के दिल्ली दंगों को उन्होंने "मुसलमानों का नरसंहार" बताया और नागरिकता संशोधन कानून की भी कड़ी आलोचना की, जो भारत के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप था। किसी भी संप्रभु राष्ट्र द्वारा इस तरह के "अस्वीकार्य हस्तक्षेप" के बाद संवेदना प्रकट करना, अपने स्वाभिमान और राष्ट्रीय अस्मिता को स्वयं चोट पहुँचाना है।

वर्तमान परिस्थितियों में ईरान, इज़रायल और अमेरिका के बीच छिड़ा यह युद्ध भारत के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। भारत को अपनी "सामरिक स्वायत्तता" की नीति पर कायम रहना चाहिए। मोदी सरकार ने इज़रायल के साथ संबंधों को 'विशेष सामरिक साझेदारी' तक पहुँचाया है, जिसकी गर्मजोशी फरवरी 2026 की प्रधानमंत्री की इज़रायल यात्रा में दिखी। दूसरी ओर, भारत को ईरान के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को भी बनाए रखना चाहिए, यद्यपि ईरान के इस्लामिक राष्ट्र बनने के बाद दोनों प्राचीन सभ्यताओं के बीच का सेतु अब इतिहास बन चुका है। भारत का आधिकारिक रुख "संवाद और कूटनीति" के माध्यम से शांति बहाली का होना चाहिए।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों (कच्चा तेल और गैस) का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा करता है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव के कारण सप्लाई चेन बाधित हुई है। यद्यपि अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की विशेष छूट दी है, लेकिन बीमा कवर न मिलने के कारण आपूर्ति अब भी बाधित है।

प्राचीन सनातन भारत और प्राचीन पर्शिया के संबंध ऋग्वेद और जेंद-अवेस्ता के पन्नों में जीवित हैं। इन्हें एक ही आर्य कुल की दो शाखाएं माना जाता है, जो कालांतर में अलग-अलग दिशाओं में विकसित हुईं। वैदिक संस्कृत और प्राचीन अवेस्तन भाषाएं "जुड़वां बहनों" की तरह हैं। सनातन परंपरा में जिसे 'यज्ञ' कहा जाता है, पारसी परंपरा में उसे 'यास्ना' कहा गया।

इन दोनों सभ्यताओं के बीच एक अनूठा दार्शनिक विभाजन भी दिखता है। भारत में 'देव' पूजनीय हुए और 'असुर' राक्षसी प्रवृत्तियों के प्रतीक बने, जबकि ईरान में इसके विपरीत 'अहुर' (असुर) सर्वोच्च ईश्वर बने और 'दैव' बुरी शक्तियों के प्रतीक। यह विभाजन संकेत देता है कि एक कालखंड में ये दोनों समूह साथ थे, जो वैचारिक मतभेद के कारण अलग हुए, पर उनके संस्कार एक ही रहे।

तुर्की के बोग़ाज़कुई से मिला 3400 साल पुराना शिलालेख गवाही देता है कि ऋग्वैदिक देवता (इंद्र, वरुण, मित्र, नासत्य) सुदूर पश्चिम तक पूजे जाते थे। यह शिलालेख भारतीय इतिहास की उस कल्पित कहानी को खारिज करता है कि सनातन धर्म केवल एक छोटे से क्षेत्र की उपज था।

ऐतिहासिक काल में, विशेषकर हर्यक और मौर्य वंश के दौरान, दोनों सभ्यताओं के बीच प्रशासनिक और कलात्मक आदान-प्रदान हुआ। प्राचीन गांधार (वर्तमान में अफगानिस्तान का क्षेत्र) जहाँ से होकर व्यापारिक काफिले और विद्वान एक-दूसरे के यहाँ आते जाते थे। आयुर्वेद, गणित और दर्शन का ज्ञान भारत से पर्शिया के माध्यम से ही अरब और यूरोप तक पहुँचा।

पर्शिया से ईरान बनने की यात्रा अपनी जड़ों को खोजने की थी । ईरान शब्द प्राचीन अवेस्तन भाषा के 'ऐर्यानाम' से निकला है, जिसका अर्थ है "आर्यों की भूमि"। सासैनियन राजाओं के समय तीसरी शताब्दी ईस्वी के शिलालेखों में भी इस देश को 'ईरान-शह्र' यानी आर्यों का साम्राज्य कहा गया है। इस नाम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर औपचारिक पहचान 21 मार्च, 1935 को मिली। रज़ा शाह पहलवी, जो ईरान के आधुनिकीकरण के पक्षधर थे, चाहते थे कि उनके देश को पर्शिया के बजाय ईरान से जाना जाए। उनका मानना था कि 'ईरान' नाम का उपयोग करने से देश की 'आर्य विरासत' स्पष्ट रूप से दुनिया के सामने आएगी, जो उस दौर के वैश्विक परिदृश्य में एक गौरवशाली पहचान मानी जाती थी।

लेकिन 1979 की इस्लामी क्रांति ने इसे कट्टरता के 'पाषाण युग' में धकेल दिया। इसने न केवल ईरान की सरकार बदली, बल्कि उसकी सदियों पुरानी पहचान, संस्कृति और वैश्विक राजनीति के दृष्टिकोण को भी पूरी तरह से बदल दिया। ईरान एक 'इस्लामी गणराज्य' बन गया। कानून व्यवस्था को 'शरिया' पर आधारित किया गया। धार्मिक शिक्षा लागू हो गयी और सह-शिक्षा समाप्त हो गयी मनोरंजन के साधनों पर कड़ा सेंसर लागू हुआ। महिलाओं के लिए हिजाब/चादर अनिवार्य कर दी गई। आधुनिक पहनावे और जीवनशैली को प्रतिबंधित कर दिया गया। बाद में, ईरान ने अपनी इस्लामिक क्रांति को अन्य मुस्लिम देशों में निर्यात करने की कोशिश की, जिससे सऊदी अरब जैसे सुन्नी देशों के साथ उसका विवाद गहरा गया। सरकार ने इस्लाम से पूर्व की संस्कृति और इतिहास को दबाने और मिटाने का कार्य किया ।

ईरान का इतिहास हमें सिखाता है कि कट्टरता हमेशा 'धार्मिक सुधार' के नाम पर आती है, लेकिन वह अंततः सभ्यता का संहार कर देती है। भारत की ढाल उसकी 'सहिष्णुता' नहीं, बल्कि उसका 'सजग लोकतंत्र' और 'सभ्यतागत गर्व' होना चाहिए।

"भारत की शक्ति उसकी विविधता में नहीं, बल्कि उस विविधता के 'भारतीयता' के सूत्र में बंधे होने में है। यदि यह सूत्र टूटा, तो हम भी इतिहास के उन पन्नों का हिस्सा बन जाएंगे जिन्हें आज हम एक 'चेतावनी' की तरह पढ़ रहे हैं।"

क्या आप अपनी अगली पीढ़ी को एक 'आधुनिक प्रगतिशील भारत' देना चाहते हैं या किसी विदेशी विचारधारा की 'छाया' मात्र? चुनाव आपका है।

~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~

नकली दलित बनाम असली दलित

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