शुक्रवार, 26 जून 2026

राम मंदिर: आस्था का केंद्र, पारदर्शिता की कसौटी और प्रशासनिक पुनर्गठन की आवश्यकता

 

राम मंदिर: आस्था का केंद्र, पारदर्शिता की कसौटी और प्रशासनिक पुनर्गठन की आवश्यकता


 

शिव मिश्रा, वरिष्ठ स्तंभकार

अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण केवल एक स्थापत्य उपलब्धि नहीं, बल्कि लगभग पाँच शताब्दियों तक चले संघर्ष, असंख्य बलिदानों और करोड़ों हिंदुओं की अटूट आस्था का साकार रूप है। यह मंदिर केवल ईंट-पत्थरों का भवन नहीं, बल्कि सनातन सभ्यता के आत्मविश्वास, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है। इसलिए यदि इस मंदिर के प्रशासन, दान-प्रबंधन या वित्तीय पारदर्शिता पर कोई प्रश्न उठता है, तो उसका प्रभाव केवल एक धार्मिक संस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विश्वभर के करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं और विश्वास को प्रभावित करता है।

हाल के दिनों में राम मंदिर परिसर में दान, आभूषणों और प्रशासनिक अनियमितताओं से संबंधित जो समाचार सामने आए हैं, वे अत्यंत चिंताजनक हैं। इन मामलों की जांच अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष न्यायिक एवं प्रशासनिक प्रक्रिया से ही सामने आएंगे। इसलिए किसी भी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष ठहराने का अधिकार केवल जांच एजेंसियों और न्यायालयों को है। किंतु यदि किसी भी स्तर पर वित्तीय अनियमितता या प्रशासनिक शिथिलता सिद्ध होती है, तो यह केवल कानून का नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का भी गंभीर उल्लंघन होगा।

यही कारण है कि इस विषय को केवल व्यक्तियों के आचरण तक सीमित न रखकर संस्थागत व्यवस्था के दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। किसी भी महान संस्था की विश्वसनीयता व्यक्तियों से नहीं, बल्कि उसकी व्यवस्थाओं से निर्मित होती है।

सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के उपरांत भारत सरकार ने 5 फरवरी 2020 को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया था, ताकि मंदिर का निर्माण और संचालन एक स्वतंत्र सार्वजनिक ट्रस्ट के माध्यम से हो सके। इस ट्रस्ट में संतों, समाज के प्रतिनिधियों तथा केंद्र और राज्य सरकार के पदेन अधिकारियों को सम्मिलित किया गया। उद्देश्य स्पष्ट थामंदिर का संचालन राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त, सामाजिक रूप से प्रतिनिधिक और प्रशासनिक रूप से पारदर्शी हो।

निस्संदेह ट्रस्ट ने अल्प समय में विश्वस्तरीय मंदिर निर्माण का कार्य सम्पन्न किया, जिसके लिए वह प्रशंसा का पात्र है। किंतु किसी भी बड़े संस्थान की वास्तविक परीक्षा उसके निर्माण से अधिक उसके दीर्घकालीन संचालन में होती है। करोड़ों श्रद्धालुओं द्वारा प्रतिवर्ष आने वाले दान, सोना-चाँदी, बहुमूल्य आभूषण और विशाल संपत्तियों के प्रबंधन के लिए केवल सद्भावना पर्याप्त नहीं होती; उसके लिए आधुनिक प्रशासनिक ढाँचा, तकनीकी निगरानी और कठोर वित्तीय नियंत्रण अनिवार्य हैं।

भारत में अनेक समृद्ध मंदिर वर्षों से विशाल दानराशि का सफल प्रबंधन कर रहे हैं। विशेष रूप से तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् ने दान-प्रबंधन की जो व्यवस्था विकसित की है, वह अध्ययन का विषय है। वहाँ दानपात्रों की सुरक्षा, नकदी की गिनती, बैंक में जमा, लेखांकन और निगरानी की प्रत्येक प्रक्रिया बहु-स्तरीय नियंत्रण प्रणाली के अंतर्गत संचालित होती है। किसी एक व्यक्ति के हाथ में पूरी प्रक्रिया नहीं होती। आधुनिक मशीनें, निरंतर वीडियो रिकॉर्डिंग, स्वतंत्र पर्यवेक्षक और नियमित लेखा परीक्षण पूरी व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बनाते हैं।

अयोध्या जैसे वैश्विक महत्व के तीर्थ के लिए अब इससे भी अधिक आधुनिक व्यवस्था विकसित करने का समय आ गया है। मंदिर का प्रशासन पारंपरिक श्रद्धा और आधुनिक प्रबंधनदोनों का संतुलित संगम होना चाहिए।

सबसे पहले ट्रस्ट के प्रशासन को चार स्वतंत्र स्तंभों में विभाजित किया जाना चाहिएट्रस्टी बोर्ड, मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ), मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) तथा स्वतंत्र आंतरिक लेखा एवं सतर्कता प्रकोष्ठ। इन सभी की जवाबदेही सीधे ट्रस्ट बोर्ड के प्रति हो और कोई भी अधिकारी अकेले वित्तीय निर्णय लेने में सक्षम न हो। शक्तियों का यह विकेंद्रीकरण किसी भी प्रकार की मिलीभगत या निरंकुशता की संभावना को कम करेगा।

दान प्रबंधन को पूर्णतः डिजिटल बनाया जाना चाहिए। प्रत्येक दानचाहे वह नकद हो, ऑनलाइन हो अथवा चेक के माध्यम सेका तत्काल डिजिटल पंजीकरण हो। श्रद्धालुओं को डिजिटल भुगतान, क्यूआर कोड तथा स्मार्ट डोनेशन कियोस्क के माध्यम से दान देने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, जिससे नकद लेन-देन न्यूनतम हो और धन सीधे बैंक खातों में पहुँचे।

मंदिर परिसर में स्थापित प्रत्येक दानपात्र अत्याधुनिक सुरक्षा प्रणाली से युक्त होना चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक सील, बायोमेट्रिक लॉक,  आरएफआईडी  टैग, चौबीसों घंटे सीसीटीवी निगरानी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अलर्ट सिस्टम यह सुनिश्चित करें कि किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ तुरंत नियंत्रण कक्ष तक पहुँचे। दानपात्र खोलने की प्रक्रिया केवल संयुक्त अभिरक्षा (जॉइन्ट कस्टडी) के सिद्धांत पर आधारित हो, जिसमें ट्रस्ट, बैंक, लेखा विभाग तथा स्वतंत्र पर्यवेक्षकसभी की उपस्थिति अनिवार्य हो।

नकदी गिनने के लिए पृथक उच्च-सुरक्षा परिसर बनाया जाए, जहाँ अत्याधुनिक करेंसी काउंटिंग मशीनें, नकली नोट पहचान प्रणाली तथा स्वचालित लेखांकन सॉफ्टवेयर का उपयोग हो। कर्मचारियों के लिए बिना जेब वाली वर्दी, प्रवेश पर बायोमेट्रिक सत्यापन तथा प्रत्येक गतिविधि की वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य हो। गिनी गई पूरी राशि चौबीस घंटे के भीतर अधिकृत बैंकों में जमा कर दी जाए।

वित्तीय प्रबंधन के लिए आधुनिक ERP प्रणाली, जैसे SAP या Oracle, का उपयोग किया जाना चाहिए ताकि प्रत्येक आय और व्यय का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रहे और किसी भी प्रविष्टि में परिवर्तन केवल बहु-स्तरीय अनुमति से ही संभव हो। दैनिक बैंक समन्वयन (बैंक रेकन्सिलीऐशन) स्वचालित हो तथा एक रुपये का भी अंतर आते ही प्रणाली स्वतः चेतावनी जारी करे।

इसी प्रकार ऑडिट व्यवस्था को भी तीन स्तरों पर विकसित किया जाना चाहिएदैनिक आंतरिक लेखा परीक्षण, मासिक स्वतंत्र समवर्ती ऑडिट तथा वार्षिक वैधानिक ऑडिट। वार्षिक ऑडिट किसी प्रतिष्ठित स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट फर्म द्वारा किया जाए तथा उसकी रिपोर्ट, वार्षिक आय-व्यय विवरण और बैलेंस शीट सार्वजनिक वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाए। पारदर्शिता का सर्वोच्च मानक यही है कि संस्था स्वयं अपने वित्तीय अभिलेख जनता के समक्ष प्रस्तुत करे।

इसके अतिरिक्त ट्रस्ट की वेबसाइट को केवल सूचना पोर्टल न बनाकर "पब्लिक ट्रांसपेरेंसी डैशबोर्ड" के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। श्रद्धालु यह देख सकें कि प्रतिदिन कितना दान प्राप्त हुआ, किस मद में कितना व्यय हुआ, कौन-सी निर्माण परियोजना किस चरण में है, किसे ठेका दिया गया और उसकी प्रगति क्या है। वार्षिक रिपोर्ट, ऑडिट रिपोर्ट, निविदाएँ, बैठकों के संक्षिप्त निर्णय तथा प्रमुख प्रशासनिक सूचनाएँ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हों। इससे अफवाहों के लिए स्थान स्वतः समाप्त हो जाएगा।

साथ ही एक स्वतंत्र व्हिसलब्लोअर प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए, जिसके माध्यम से कोई भी कर्मचारी या श्रद्धालु बिना पहचान उजागर किए संभावित अनियमितताओं की सूचना दे सके। शिकायतों की समीक्षा स्वतंत्र सतर्कता समिति द्वारा की जाए और उनकी समयबद्ध जांच सुनिश्चित हो।

ध्यान रखने योग्य तथ्य यह भी है कि किसी संस्था की विश्वसनीयता इस बात से नहीं बढ़ती कि उसमें कभी त्रुटि न हो; बल्कि इस बात से बढ़ती है कि त्रुटि सामने आने पर संस्था कितनी ईमानदारी, पारदर्शिता और दृढ़ता से उसका समाधान करती है। यदि किसी स्तर पर अनियमितता सिद्ध होती है, तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिएचाहे उनका पद, प्रतिष्ठा या संगठनात्मक संबंध कुछ भी हो। यही न्याय है, यही धर्म है और यही श्रीराम के आदर्शों के अनुरूप आचरण भी।

आज राम मंदिर केवल भारत का मंदिर नहीं, बल्कि विश्वभर के हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। इसकी प्रतिष्ठा किसी व्यक्ति, संगठन या सरकार की प्रतिष्ठा से कहीं बड़ी है। इसलिए इसकी प्रशासनिक व्यवस्था भी विश्वस्तरीय होनी चाहिए। आधुनिक तकनीक, स्वतंत्र लेखा परीक्षण, संस्थागत नियंत्रण और पूर्ण पारदर्शिता ही वह मार्ग है, जो इस मंदिर को आने वाली शताब्दियों तक श्रद्धा और सुशासनदोनों का आदर्श बना सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और पक्ष भी गंभीरता से विचारणीय है। अयोध्या के राम मंदिर से जुड़ी प्रत्येक घटना स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक चर्चा का विषय बनती है। ऐसे में यह आवश्यक है कि तथ्य और अफवाह, दोनों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए। दुर्भाग्यवश, हाल के दिनों में अनेक समाचारों, सोशल मीडिया पोस्टों और टीवी बहसों में अपुष्ट सूचनाओं तथा अटकलों को भी प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया, जिससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई।

यह भी निर्विवाद है कि राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय समाज में सांस्कृतिक चेतना और हिंदू अस्मिता के प्रश्न को नई ऊर्जा प्रदान की है। इस सामाजिक परिवर्तन के राजनीतिक प्रभाव भी विभिन्न दल अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते और उसकी व्याख्या करते हैं। ऐसे वातावरण में यह आशंका बनी रहती है कि मंदिर से जुड़ी किसी भी घटना का उपयोग राजनीतिक विमर्श या वैचारिक संघर्ष का माध्यम बनाया जाए। इसलिए आवश्यक है कि किसी भी आरोप, समाचार या दावे को अंतिम सत्य मानने से पहले उसकी आधिकारिक जांच और प्रमाणित तथ्यों की प्रतीक्षा की जाए।

राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। उसकी प्रतिष्ठा किसी राजनीतिक दल, संगठन या व्यक्ति से कहीं अधिक बड़ी है। इसलिए न तो वास्तविक अनियमितताओं पर पर्दा डाला जाना चाहिए और न ही अपुष्ट अथवा भ्रामक सूचनाओं के आधार पर उसकी छवि धूमिल करने का प्रयास होना चाहिए।

राम के मंदिर में आने वाला प्रत्येक दान रामकाज में ही लगेयह केवल आर्थिक अनुशासन का प्रश्न नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास की रक्षा का संकल्प है। यही संकल्प भविष्य की प्रशासनिक व्यवस्था का आधार बनना चाहिए।

  

                     ~~~Shiv Mishra ~~~~~

शुक्रवार, 19 जून 2026

भारत में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं ?

भारत में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं ? 

 


वैचारिक विखंडन का नया नैरेटिव: क्या भारत 'सनातन-शून्य' होने की राह पर है?

- शिव मिश्रा

दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर में आयोजित ‘मिल्लत टाइम्स कॉन्क्लेव 2026’ में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े मौलाना खलीलुर रहमान सज्जाद नोमानी का दिया गया भाषण केवल एक तात्कालिक विवाद नहीं है। यह भारतीय राज्य व्यवस्था, इसकी आंतरिक सुरक्षा और सनातन सभ्यता के अस्तित्व पर मँडराते उस गहरे संकट का दस्तावेजीकरण है, जिसे मुख्यधारा का विमर्श अक्सर 'धर्मनिरपेक्षता' के परदे के पीछे छिपा देता है। जब एक जिम्मेदार मंच से यह दावा किया जाता है कि "भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हैं," तो यह कोई अज्ञानता जनित बयान नहीं होता; इसके पीछे एक अत्यंत सोची-समझी, रणनीतिक और दीर्घकालिक योजना छिपी होती है। यह योजना भारत को भीतर से खोखला करने और इसे 'सनातन-शून्य' बनाकर एक पूर्ण इस्लामिक राष्ट्र की दिशा में अग्रसर करने के अनवरत प्रयासों का हिस्सा है।

यह कड़वी सच्चाई आज देश के सामने है कि यदि भारत में हिंदू वास्तव में एक सशक्त और एकीकृत बहुसंख्यक होते, तो देश की राजनीति में उनकी इस कदर अनदेखी और उनके सांस्कृतिक प्रतीकों का इस तरह उपहास संभव नहीं था। आज स्वतंत्रता के सात दशकों के बाद भी भारत का राजनीतिक परिदृश्य मुस्लिम तुष्टिकरण की धुरी पर घूम रहा है। राजनीतिक दल इस बात की होड़ में लगे हैं कि कौन बहुसंख्यक समाज की कीमत पर अल्पसंख्यक मतबैंक को अधिक संतुष्ट कर सकता है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को वैचारिक रूप से इसका अपवाद माना जाता है, लेकिन सत्ता की मजबूरियों और वैश्विक नैरेटिव के दबाव में वह भी कई मोर्चों पर इस वर्ग को रिझाने के लिए रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई देती है। वास्तविकता यह है कि भाजपा चाहे उनके लिए कितनी भी कल्याणकारी योजनाएं चला ले, वैचारिक कट्टरता के कारण वह मतबैंक किसी भी स्थिति में राष्ट्रवाद या हिंदुत्व के नाम पर मतदान नहीं करेगा। यदि यह भय न होता, तो शायद भाजपा भी उसी ढर्रे पर चल रही होती जिस पर अन्य छद्म-धर्मनिरपेक्ष दल चल रहे हैं।

पहचान का विखंडन: हिंदुओं को विभाजित करने का 'तालिबानी' मॉडल

मौलाना नोमानी का यह दावा कि सिख, जैन, बौद्ध, जाट, अनुसूचित जाति, जनजाति, आदिवासी, तमिल और लिंगायत जैसे कन्नड़ भाषी लोग हिंदू नहीं हैं, वास्तव में समाजशास्त्र का शोध नहीं बल्कि 'सोशल इंजीनियरिंग' के माध्यम से भारत को जनसांख्यिकीय रूप से हड़पने की एक खतरनाक साजिश है।

ऐतिहासिक विडंबना: भारत का इतिहास गवाह है कि यहाँ का कोई भी मुसलमान किसी अरब या मध्य-पूर्वी देश से आकर नहीं बसा। ये सभी मूल रूप से धर्मांतरित हिंदू हैं। स्वयं मौलाना नोमानी के पूर्वज भी इसी भूमि के सनातन अंग थे। लेकिन नव-धर्मांतरितों में अपनी धार्मिक वफादारी को साबित करने की जो छटपटाहट होती है, वही हिंदुओं के प्रति घृणा के इस चरम स्तर को जन्म देती है।

इस तालिबानी कट्टर मानसिकता के दो स्पष्ट रणनीतिक उद्देश्य हैं:

जनसांख्यिकीय मनोविज्ञान को बदलना: हिंदुओं को यह विश्वास दिलाना कि वे अब इस देश में एक अजेय बहुसंख्यक नहीं हैं, जिससे उनके भीतर का प्रतिरोध समाप्त हो जाए और वे 'गजवा-ए-हिंद' या भारत के इस्लामीकरण की परियोजनाओं के सामने आत्मसमर्पण कर दें।
हिंदू पुनरुत्थान को हतोत्साहित करना: जो वर्ग या संगठन भारत को सांस्कृतिक रूप से एक हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग कर रहे हैं, उनके तर्कों को कमजोर करना और उन्हें वैश्विक मंचों पर 'फासिस्ट' सिद्ध करना।

मौलाना नोमानी ने अपने इस शरारतपूर्ण बयान को प्रामाणिकता देने के लिए काबा के काले पत्थर और लिहाफ पर हाथ रखकर कसम खाने का दावा किया। यह इस बात का प्रमाण है कि यह कोई हवा-हवाई बयान नहीं था, बल्कि तीन दशकों के जमीनी सफर और शोध पर आधारित एक ऐसी कार्ययोजना है, जिसका उद्देश्य हिंदुओं को उप-जातियों और क्षेत्रीय पहचानों में बांटकर उनकी सामूहिक शक्ति को समाप्त करना है।

सेक्युलर बनाम फासिस्ट: हिंदुओं का रणनीतिक विभाजन

मौलाना नोमानी ने अपने भाषण में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़वी सच्चाई को अनजाने में स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा कि रणनीतिकारों ने हिंदुओं को दो श्रेणियों में बांटा था—'सेक्युलर हिंदू' और 'फासिस्ट हिंदू'

इस विभाजन का सीधा उद्देश्य यह था कि जब तक इस्लामीकरण का एजेंडा पूरी तरह परिपक्व नहीं हो जाता, तब तक कथित 'सेक्युलर' हिंदुओं के राजनीतिक और सामाजिक समर्थन का उपयोग करके अपने हितों को सुरक्षित रखा जाए। लेकिन नोमानी की हताशा इस बात से उजागर होती है कि इन दोनों समूहों ने मिलकर अंततः देश की कमान उन ताकतों के हाथों में सौंप दी, जिन्हें वे 'फासिस्ट' कहते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि कथित धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं ने पूरी तरह से घुटने टेक दिए होते, तो भारत में 'गजवा-ए-हिंद' का कार्य अब तक निर्बाध रूप से पूरा हो चुका होता।

इस रणनीतिक विभाजन का असर भारत के दक्षिणी राज्यों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जहाँ हिंदुओं की बहुसंख्या होने के बावजूद उनकी राजनीतिक चेतना को पूरी तरह से सुप्त कर दिया गया है।

केरल और तमिलनाडु का चुनावी यथार्थ

दक्षिण भारत की राजनीतिक जनसांख्यिकी और चुनावी परिणाम इस वैचारिक विभाजन की गवाही देते हैं:

राज्यधार्मिक जनसांख्यिकी (अनुमानित)राजनीतिक प्रतिनिधित्व का विरोधाभास (हालिया चुनाव)
केरल

हिंदू: 55%


मुसलमान: 27%


ईसाई: 18%

भारतीय जनता पार्टी (विशुद्ध राष्ट्रवादी/हिंदूवादी दल) को इतिहास में पहली बार केवल 3 सीटें प्राप्त हुईं, जबकि अकेले इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग  जैसी सांप्रदायिक पार्टी को 22 सीटें मिलीं।
तमिलनाडु

हिंदू: 82%


ईसाई: 6%


मुसलमान: 6%

हिंदू बहुल राज्य होने के बावजूद राष्ट्रवाद की बात करने वाली भाजपा को केवल 1 सीट मिली, जबकि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को 2 सीटें प्राप्त हुईं।

यह आंकड़े सिद्ध करते हैं कि हिंदुओं में 'धर्मनिरपेक्षता' का पैमाना यह बन चुका है कि जो हिंदू हितों की अनदेखी करे और सनातन की बुराई करे, उसे प्रगतिशील माना जाता है, और जो हिंदू अस्मिता की बात करे, उसे 'फासिस्ट' कहकर मुख्यधारा से अलग थलग करने का प्रयास किया जाता है।

सुरक्षा एजेंसियों की विफलता और बौद्धिक विमर्श का आत्मसमर्पण

यह भारत की आंतरिक सुरक्षा, पत्रकारिता जगत और खुफिया तंत्र के लिए अत्यंत चिंताजनक और शर्मनाक बात है कि 2 फरवरी 2026 को दिल्ली के हृदय स्थल में दिया गया यह देशद्रोही और भड़काऊ भाषण पाँच महीने तक दबा रहा और सुरक्षा एजेंसियों को इसकी भनक तक नहीं लगी। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि जब मौलाना नोमानी मंच से हिंदुओं को तोड़ने और देश को अस्थिर करने का ताना-बाना बुन रहे थे, तब उस कार्यक्रम में कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर, सलमान खुर्शीद, इमरान प्रतापगढ़ी, समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन चौधरी और यहाँ तक कि भाजपा नेता यासिर जिलानी जैसे कई बड़े राजनेता और पत्रकार मूकदर्शक बने बैठे थे।

यह नोमानी का पहला विवादित बयान नहीं है। इससे पहले जब अफगानिस्तान में बर्बर तालिबान ने बंदूक के बल पर लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंका था, तब नोमानी ने इसका जश्न मनाया था और तालिबानियों को 'सलाम' भेजा था। उन्होंने भारत में लड़कियों की आधुनिक शिक्षा का विरोध करते हुए कहा था:

"पाक रमजान की रात में उन लोगों पर लानत भेजता हूँ जो अपनी बच्चियों को अकेले कोचिंग सेंटर या कॉलेज भेजते हैं। अल्लाह उन्हें जहन्नुम में भेजेगा।"

एक तरफ तालिबान का खुला समर्थन, बच्चियों की शिक्षा को हराम बताना और दूसरी तरफ भारत के बहुसंख्यक समाज के अस्तित्व पर सवाल उठाना—यह सब कुछ खुलेआम होने के बावजूद भारत का 'लिबरल' और 'सेक्युलर' तबका उन्हें एक महान बुद्धिजीवी मानकर बड़े-बड़े मंच प्रदान करता है। स्वरा भास्कर जैसे लोग मुस्लिमों के बीच राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए अपना पहनावा तक बदलकर इनके आगे वैचारिक आत्मसमर्पण कर देते हैं।

भू-राजनीतिक संजाल और वैश्विक 'धार्मिक अर्थव्यवस्था' का गणित

भारत के भीतर चल रहे इस सुनियोजित इस्लामीकरण के एजेंडे को केवल स्थानीय मस्जिदों या कुछ कट्टरपंथियों के व्यक्तिगत प्रयासों के रूप में देखना भारी भूल होगी। भारत में जितने मुस्लिम संगठन सक्रिय हैं, शायद उतने पूरी दुनिया में मिलकर भी नहीं होंगे। इन संगठनों का एक बड़ा हिस्सा अरब देशों, विशेषकर सऊदी अरब से मिलने वाली गुप्त और प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता (खैरात) पर फलता-फूलता है।

इसके पीछे सऊदी अरब की एक बहुत बड़ी 'दीर्घकालिक वैश्विक धार्मिक अर्थव्यवस्था' (Global Religious Economy) काम कर रही है। सऊदी अरब भली-भांति जानता है कि उसके पास कच्चे तेल (Petroleum) के भंडार सीमित हैं और वैश्विक स्तर पर लिक्विड हाइड्रोजन तथा नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) की ओर बढ़ते कदमों के कारण उसकी तेल-आधारित अर्थव्यवस्था का पतन निश्चित है। इसलिए, सऊदी अरब अपनी राष्ट्रीय आय बढ़ाने के लिए वैकल्पिक और स्थायी रास्तों पर काम कर रहा है, जिसमें सबसे बड़ा स्रोत हज और उमराह यात्राएं हैं।

सऊदी विजन 2030 और वैश्विक धर्मांतरण का आर्थिक संबंध

सऊदी अरब के आधिकारिक 'विजन 2030' दस्तावेजों के अनुसार, धार्मिक पर्यटन को एक विशाल उद्योग में बदला जा रहा है:

वर्तमान आय: सऊदी अरब वर्तमान में हज और उमराह से हर साल औसतन $12 अरब से $15 अरब डॉलर (लगभग ₹1 लाख करोड़ से ₹1.25 लाख करोड़) की सीधी कमाई करता है।
जीडीपी में योगदान: सऊदी की गैर-तेल अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग में इसका योगदान लगभग 20% से 27% तक है। मक्का और मदीना जैसे शहरों में होटल, ट्रैवल एजेंसियों और नागरिक उड्डयन क्षेत्र की 30% कमाई सीधे तौर पर इन्हीं तीर्थयात्रियों से होती है।
विजन 2030 का लक्ष्य: सऊदी सरकार का लक्ष्य है कि साल 2030 तक सालाना हज और उमराह यात्रियों की संख्या को बढ़ाकर 3 करोड़ किया जाए, जिससे इस क्षेत्र से होने वाली वार्षिक कमाई को $150 अरब डॉलर तक पहुँचाया जा सके।

अब समझने वाली बात यह है कि यदि धार्मिक पर्यटन से होने वाली इस आय को कई गुना बढ़ाना है, तो दुनिया भर में मुसलमानों की जनसंख्या में भी उसी अनुपात में वृद्धि करनी होगी। जिहाद, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और धर्मांतरण के जो खेल भारत और अफ्रीका जैसे देशों में खेले जा रहे हैं, वे अनजाने में सऊदी अरब के इस आर्थिक एजेंडे को ईंधन प्रदान करते हैं। भारत के मुसलमान खुद को अरब के मूल मुसलमानों से भी अधिक कट्टर साबित करने की होड़ में अपने ही देश और संस्कृति के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं, जबकि भारत के कथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल जाने-अनजाने में इस अंतरराष्ट्रीय आर्थिक-धार्मिक चक्रव्यूह के मोहरे बन रहे हैं।

मोदी युग का 'सांस्कृतिक पुनर्जागरण' और उसकी सीमाएं

निस्संदेह, वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत के हिंदुओं के मानस में एक बड़ा सकारात्मक परिवर्तन आया है। दशकों से संजोए गए घावों पर अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण से मरहम लगा है। सदियों की हीनभावना से उबरकर हिंदुओं के भीतर अपनी पहचान और संस्कृति पर गर्व करने की भावना जागृत हुई है। जब देश का प्रधानमंत्री भगवा वस्त्रों में, माथे पर चंदन लगाकर किसी प्राचीन मंदिर में पूजा-अर्चना करता है, तो आम हिंदू को अपनी खोई हुई सांस्कृतिक संप्रभुता वापस मिलती हुई प्रतीत होती है।

इस सांस्कृतिक जागरण का सबसे बड़ा राजनीतिक परिणाम यह हुआ कि आजादी के बाद से चला आ रहा 'मुस्लिम मतों का वीटो' समाप्त हो गया। लगातार तीन बार केंद्र में पूर्ण और प्रभावी बहुमत की सरकार बनना और उन राज्यों में भी सत्ता प्राप्त करना जहाँ मुस्लिम मत निर्णायक माने जाते थे, यह सिद्ध करता है कि अब केवल एक समुदाय के तुष्टिकरण से भारत की सत्ता हासिल नहीं की जा सकती।

हाल के वर्षों में पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों और राजनीतिक संघर्षों ने यह दिखा दिया कि यदि बहुसंख्यक समाज अपने अस्तित्व के संकट को पहचानकर एकजुट हो जाए, तो छद्म-धर्मनिरपेक्षता के गढ़ को भी ध्वस्त किया जा सकता है। पश्चिम बंगाल में हिंदू एकता के पीछे वहाँ के बहुसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों और जनसांख्यिकीय आक्रमण की एक लंबी और मार्मिक कहानी है। यही कारण है कि कट्टरपंथियों, मुस्लिम परस्त दलों और वामपंथी इतिहासकारों में इस बात की छटपटाहट है कि जो जागृति बंगाल में आई है, वह कहीं केरल और तमिलनाडु में न फैल जाए।

नेहरूवादी विरासत का ऐतिहासिक बोझ और वर्तमान की विफलता

पूरी दुनिया जानती है कि भारत का संविधान और इसकी व्यवस्थाएं देश के बहुसंख्यक हिंदुओं और सनातन धर्म के प्रति एक प्रकार की संस्थागत उपेक्षा का भाव रखती हैं। धार्मिक आधार पर देश का विभाजन होने और एक स्पष्ट इस्लामिक राष्ट्र (पाकिस्तान) के निर्माण के बाद भी, भारत के भीतर मुसलमानों को वे अधिकार और विशेषाधिकार दे दिए गए जो पाकिस्तान में भी उपलब्ध नहीं हैं।

यह इतिहास की सबसे शर्मनाक सच्चाई है कि जिन लोगों ने 'लड़के लेंगे पाकिस्तान' के नारे लगाए थे, जिन्होंने प्रत्यक्ष कार्रवाई (Direct Action Day) के नाम पर हिंदुओं का नरसंहार करवाया था, उनमें से एक बहुत बड़ी आबादी विभाजन के बाद भी यहीं रुक गई और उनमें से कई लोगों को भारत की संविधान सभा का सदस्य तक बना दिया गया। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की अत्यधिक मुस्लिम-परस्त नीतियों के कारण ही हिंदुओं की यह संवैधानिक दुर्दशा हुई। नेहरू ने हिंदुओं को नियंत्रित करने के लिए 'हिंदू कोड बिल' बनाया और हिंदुओं के प्राचीन एवं समृद्ध मंदिरों को सरकारी नियंत्रण (अधिग्रहण) में ले लिया, ताकि सनातन धर्म आर्थिक और सामाजिक रूप से पंगु हो जाए। इसके विपरीत, उन्होंने मुसलमानों के लिए 'वक्फ बोर्ड' जैसे कानून बनाए, जिसने भारत के भीतर एक समानांतर 'लैंड जिहाद' का संस्थागत बीज बो दिया।

लेकिन यह तो इतिहास की बात है। आज नरेंद्र मोदी देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के कार्यकाल की समयावधि को भी पीछे छोड़ चुके हैं। धारा 370 को निष्प्रभावी करने और राम मंदिर का मार्ग प्रशस्त करने के अलावा, वर्तमान सरकार ने ऐसा कोई ठोस और संस्थागत कार्य नहीं किया जिससे दुनिया की सबसे प्राचीन सनातन संस्कृति इस भूमि पर वैधानिक रूप से सुरक्षित हो सके।

मंदिर मुक्ति कानून की उपेक्षा: सरकारी नियंत्रण से हिंदू मंदिरों को मुक्त कराना सबसे आसान और तार्किक काम था, जिसका कोई तार्किक विरोध भी नहीं हो सकता था, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
प्रभावी कानूनों का अभाव: एक राष्ट्रव्यापी कठोर धर्मांतरण विरोधी कानून, समान नागरिक संहिता (UCC), और राष्ट्रीय स्तर पर सनातन परिषद या मंदिर परिषद का गठन आज भी ठंडे बस्ते में है।
वैचारिक अंतर्विरोध: जब मौलाना नोमानी जैसे कट्टरपंथी हिंदू समाज को जातियों में बांटने की बात कर रहे हैं, ठीक उसी समय स्वयं को हिंदूवादी कहने वाली सरकारें भी विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में अगड़े, पिछड़े और दलितों के लिए अलग-अलग नीतियां और कानून बनाकर अनजाने में उसी विभाजनकारी एजेंडे को हवा दे रही हैं। चरित्र निर्माण के केंद्रों में जब मेधा के बजाय जातिगत पहचान सर्वोपरि हो जाएगी, तो समाज का बिखराव अवश्यंभावी है।

 2047 का सपना और गृहयुद्ध की पदचाप

केवल 'विकसित भारत 2047' का नारा देने या आर्थिक प्रगति के आंकड़ों को प्रदर्शित करने से सनातन धर्म और संस्कृति सुरक्षित नहीं होने वाली। यदि देश की जनसांख्यिकी बदल गई, यदि सीमाओं और आंतरिक हिस्सों में 'गजवा-ए-हिंद' के वैचारिक स्लीपर सेल्स इसी तरह फलते-फूलते रहे, तो 2047 का विकसित भारत केवल किताबों में रह जाएगा।

ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान सरकार देश के सामने खड़ी इन अस्तित्वगत और जनसांख्यिकीय चुनौतियों को आर्थिक विकास के चमकते परदे के नीचे ढकना चाहती है। यदि समय रहते इन कट्टरपंथी मौलानाओं, उनके विदेशी वित्तपोषकों और देश के भीतर बैठे उनके राजनीतिक संरक्षकों के खिलाफ कठोर, दंडात्मक और दार्शनिक कार्रवाई नहीं की गई, तो जो परिस्थितियां तेजी से उभर रही हैं, वे भारत को विनाश की ओर ले जाएंगी। भय इस बात का है कि कहीं 'विकसित भारत' के लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही, यह देश आंतरिक वैचारिक और जनसांख्यिकीय असंतुलन के कारण एक भीषण गृहयुद्ध के मुहाने पर न खड़ा हो जाए। संप्रभुता की रक्षा के लिए अब शब्दों की नहीं, बल्कि कठोर विधायी और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~ 

रविवार, 14 जून 2026

मोदी के बारह वर्ष का कार्यकाल बेमिशाल ?

 



कालखंड का न्याय : लोकतांत्रिक निरंतरता का महाशिखर और राष्ट्रहित की शाश्वत चुनौतियां

                                                          लेखक - शिव मिश्रा 

राष्ट्रीय नेतृत्व का नया कीर्तिमान और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में जून २०२६ का यह सप्ताह एक युगांतकारी मोड़ बनकर उभरा है। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लगातार चार हजार तीन सौ निन्यानबे दिनों तक शासन के शीर्ष पर रहकर स्वतंत्र भारत के इतिहास में सर्वाधिक समय तक लगातार सेवा करने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री का कीर्तिमान स्थापित किया है। उन्होंने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित निरंतर कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। यद्यपि ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो पंडित नेहरू का कुल राजनीतिक नेतृत्व स्वतंत्रता से पूर्व ही आरंभ हो गया था, जब २ सितंबर १९४६ को अंतरिम सरकार का गठन हुआ और उन्होंने वायसराय की कार्यकारी परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाला था। तत्पश्चात १५ अगस्त १९४७ को देश की स्वतंत्रता के साथ वे प्रथम प्रधानमंत्री बने, किंतु लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में उनका अनवरत कार्यकाल वर्ष १९५२ के पहले आम चुनाव में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के बाद ही प्रारंभ हुआ था, जो चार हजार तीन सौ अठानवे दिनों तक चला। आज इस ऐतिहासिक आंकड़े को पार करना केवल एक राजनीतिक दल की चुनावी विजय मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय जनमानस के उस गहरे विश्वास का प्रतीक है जिसने देश की नीति और दिशा को एक नया धरातल दिया है।

एक ओर जहां स्वतंत्र भारत अपनी स्वाधीनता के सतहत्तर से अधिक वर्ष पूर्ण कर चुका है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान नेतृत्व ने अपने सफल बारह वर्ष पूरे किए हैं। इस दीर्घायु कालखंड की सबसे बड़ी महत्ता यह है कि जहां पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों के लंबे कार्यकाल अक्सर राजनीतिक अस्थिरता, गठबंधन की मजबूरियों, आंतरिक अंतर्विरोधों या नीतिगत पंगुता से जूझते रहे, वहीं बीते बारह वर्षों का यह सफर पूर्ण बहुमत के स्थायित्व, दृढ़ इच्छाशक्ति और साहसिक निर्णयों का साक्षी रहा है। भारतीय जनता ने पुराने ढर्रे की शिथिलता को नकारकर राष्ट्रहित, सुरक्षा और सांस्कृतिक स्वाभिमान की इस नई धारा पर अपनी अटूट मुहर लगाई है। परंतु, किसी भी राष्ट्र के इतिहास में केवल कार्यकाल की दीर्घता ही सर्वोच्च मानदंड नहीं हो सकती। वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होता है कि उस कालखंड में राष्ट्र की संप्रभुता, अखंडता और उसकी मूल आत्मा की रक्षा के लिए कितने निर्णायक प्रयास किए गए। आज जब भारत अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है, तब राष्ट्रवाद की परिभाषा भौगोलिक सीमाओं की रक्षा से आगे बढ़कर सांस्कृतिक अस्तित्व को अक्षुण्ण रखने की अग्निपरीक्षा बन चुकी है।

स्वतंत्रता के प्रारंभिक दशक और सामरिक आदर्शवाद की सीमाएं

यदि हम स्वतंत्र भारत के शुरुआती सरसठ वर्षों का अवलोकन करें, तो देश ने चौदह प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल देखा, जिनमें से प्रत्येक ने अपनी-अपनी वैचारिक प्राथमिकताओं के अनुसार राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू के युग को आधुनिक संस्थानों और उद्योगों की नींव रखने का काल माना जाता है। उन्होंने वैज्ञानिक चेतना और तकनीकी विकास के लिए प्रारंभिक ढांचे का निर्माण किया, किंतु उनका राष्ट्रवाद वैश्विक समाजवाद और गुटनिरपेक्षता के आदर्शवादी सिद्धांतों से अत्यधिक प्रभावित था। परिणामतः, परम राष्ट्रहित और सामरिक संप्रभुता के मोर्चे पर तत्कालीन नीतियां कूटनीतिक अदूरदर्शिता का शिकार हो गईं। वर्ष १९६२ में चीन के हाथों मिली सैन्य पराजय तत्कालीन रक्षा नीति की बहुत बड़ी विफलता थी। इसके अतिरिक्त, कश्मीर के आंतरिक भू-भाग के विषय को संयुक्त राष्ट्र संघ की चौखट पर ले जाना और तिब्बत पर चीनी आधिपत्य को मौन स्वीकृति देना ऐसी ऐतिहासिक भूलें थीं, जिन्होंने भारत की सीमाओं को स्थायी रूप से संवेदनशील बना दिया। उस कालखंड का राष्ट्रवाद अत्यंत रक्षात्मक था, जिसमें शत्रु को उसकी सीमा में जवाब देने के शौर्य का अभाव दिखता था।

पंडित नेहरू के पश्चात लाल बहादुर शास्त्री के संक्षिप्त परंतु ओजस्वी कार्यकाल ने देश के राष्ट्रीय स्वाभिमान को पुनर्जीवित किया। वर्ष १९६५ के युद्ध में पाकिस्तान को करारी शिकस्त देकर और कृषि तथा सैन्य शक्ति के समन्वय से 'जय जवान, जय किसान' का उद्घोष कर उन्होंने सिद्ध किया कि भारत किसी भी विदेशी शक्ति के सामने घुटने नहीं टेकेगा। उनके इस सैन्य राष्ट्रवाद को इंदिरा गांधी ने और अधिक विस्तार दिया। वर्ष १९७१ के युद्ध में पाकिस्तान के दो टुकड़े कर मानचित्र को बदल देना और बांग्लादेश का निर्माण करना उनकी सामरिक दृढ़ता का चरमोत्कर्ष था। इसी प्रकार वर्ष १९७४ में पोखरण में प्रथम शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण कर उन्होंने वैश्विक शक्तियों के परमाणु एकाधिकार को चुनौती दी और देश के वित्तीय समावेशन के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। तथापि, इसी कार्यकाल में वर्ष १९७५ से १९७७ तक लगाया गया आंतरिक आपातकाल भारतीय लोकतंत्र पर एक अमिट कलंक बन गया, जिसने नागरिक स्वतंत्रताओं को कुचलकर राष्ट्रवाद की लोकतांत्रिक आत्मा को गहरी क्षति पहुंचाई।

आर्थिक संक्रांति, गठबंधन की विवशताएं और सुरक्षा की शिथिलता

अस्सी के दशक के राजनीतिक संक्रमण के बाद वर्ष १९९१ में पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में देश ने अभूतपूर्व आर्थिक संकट का सामना किया, जब राष्ट्रीय स्वर्ण भंडार को विदेशी बैंकों में गिरवी रखने की नौबत आ गई थी। उस कठिन घड़ी में राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्विक एकीकरण की नीतियों को लागू किया गया, जिसने देश को दिवालिया होने से बचाया और आर्थिक विकास के नए द्वार खोले। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भारत ने सांस्कृतिक और सामरिक राष्ट्रवाद का एक अत्यंत संतुलित रूप देखा। वर्ष १९९८ में पोखरण में द्वितीय परमाणु परीक्षण कर भारत को एक घोषित परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाना और वैश्विक प्रतिबंधों का निर्भीकता से सामना करना उनकी सरकार की महानतम उपलब्धि थी। उन्होंने सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा की नींव को सुदृढ़ किया तथा स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के द्वारा देश के चारों कोनों को राजमार्गों से जोड़कर आर्थिक राष्ट्रवाद को एक नई गति प्रदान की। उनका राष्ट्रवाद राष्ट्रीय अस्मिता और सबको साथ लेकर चलने की सर्वसमावेशी भावना पर आधारित था।

इसके विपरीत, वर्ष २००४ से २०१४ तक का डॉ. मनमोहन सिंह का दशक आर्थिक प्रगति का भ्रम पैदा करने के बावजूद अंततः नीतिगत पंगुता और व्यापक भ्रष्टाचार के दलदल में धंस गया। इस कालखंड में राष्ट्रीय सुरक्षा की स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो गई थी। छब्बीस नवंबर को मुंबई में हुए भीषण आतंकवादी हमले के बाद भी शासन की प्रतिक्रिया अत्यंत दुर्बल और केवल कागजी विरोध तक सीमित रही। वैश्विक मंच पर भारत की छवि एक ऐसे असहाय राष्ट्र की बन गई थी जो निरंतर आघात सहने के बाद भी दंडात्मक कार्रवाई करने का साहस नहीं जुटा पाता था। आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर तुष्टिकरण की पराकाष्ठा ने बहुसंख्यक समाज के भीतर एक गहरी हीनभावना, सांस्कृतिक असुरक्षा और अपनी ही पहचान के प्रति संकोच की स्थिति उत्पन्न कर दी थी, जिससे राष्ट्र की आंतरिक शक्ति क्षीण होने लगी थी।

बीते बारह वर्ष: संप्रभुता का शंखनाद और सांस्कृतिक पुनरुत्थान

वर्ष २०१४ में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार के गठन के साथ ही भारत की शासन व्यवस्था में एक युगांतकारी वैचारिक परिवर्तन का सूत्रपात हुआ। उन्होंने 'राष्ट्र प्रथम' के संकल्प को अपनी नीतियों का मूलमंत्र बनाया और तुष्टिकरण के स्थान पर न्यायसंगत संतुष्टीकरण की नीति अपनाई। राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर भारत ने अपनी रक्षात्मक मुद्रा को त्यागकर अग्रगामी और निवारक नीति का अवलंबन किया। उरी और पुलवामा के आतंकवादी हमलों के पश्चात सीमा पार जाकर की गई सैन्य कार्रवाइयों और हवाई हमलों ने संपूर्ण विश्व को यह कड़ा संदेश दिया कि भारत अब केवल सहन नहीं करेगा, बल्कि प्रहार के स्रोतों को उनके घर में घुसकर नष्ट करने की सामर्थ्य रखता है। इसी दृढ़ता का परिणाम था कि दशकों से लंबित जम्मू-कश्मीर के अनुच्छेद ३७० और पैंतीस-ए को निरस्त कर संपूर्ण राष्ट्र में एक विधान, एक प्रधान और एक निशान की अवधारणा को पूर्णतः लागू किया गया, जिसने अलगाववाद के तंत्र को समूल नष्ट कर दिया।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के धरातल पर यह बारह वर्ष का कालखंड भारत के सभ्यतागत गौरव के पुनर्जागरण का स्वर्ण काल रहा है। वर्ष २०२४ में अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण और उनकी प्राण-प्रतिष्ठा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं था, बल्कि वह सदियों की सांस्कृतिक पराधीनता के प्रतीकों से मुक्ति और राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनर्स्थापना का महाप्रतीक बना। इसी प्रकार काशी विश्वनाथ धाम, उज्जैन के महाकाल लोक और केदारनाथ-बद्रीनाथ जैसे प्राचीन तीर्थ क्षेत्रों का कायाकल्प इस बात का जीवंत प्रमाण है कि आधुनिक विकास और प्राचीन विरासत का सह-अस्तित्व संभव है। पूर्ववर्ती सरकारों ने जहां धर्मनिरपेक्षता के छद्म आवरण में भारत की मूल सनातन पहचान को प्रकट करने में सदैव संकोच किया, वहीं वर्तमान नेतृत्व ने वैश्विक मंचों पर योग, आयुर्वेद और भारतीय जीवन दर्शन को पूरे गौरव के साथ प्रतिष्ठित किया है।

आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में भी इस कालखंड ने नए आयाम स्थापित किए हैं। जनधन खातों, आधार और मोबाइल की त्रिशक्ति के माध्यम से प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की व्यवस्था ने उस बिचौलिया संस्कृति को समाप्त कर दिया, जिसने देश के विकास को दशकों तक लूटा था। आज भारत ने अपनी तकनीकी संप्रभुता को सिद्ध करते हुए एक ऐसी एकीकृत भुगतान प्रणाली विकसित की है, जो विश्व के विकसित देशों के लिए भी अचंभे का विषय है। 'भारत में बनाओ' की नीति के कारण आज देश हथियारों के आयातक की छवि से बाहर निकलकर रक्षा उपकरणों का निर्यातक बनने की दिशा में अग्रसर है। सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत करोड़ों शौचालयों का निर्माण, उज्ज्वला योजना के माध्यम से गैस कनेक्शन, आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य सुरक्षा और महामारी के समय अस्सी करोड़ से अधिक नागरिकों को निःशुल्क अन्न की आपूर्ति जैसी योजनाओं ने देश के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन स्तर में स्थायी सुधार किया है। कूटनीतिक स्तर पर भी भारत आज एक याचक नहीं, बल्कि वैश्विक संकटों में अपनी स्वतंत्र नीति पर अडिग रहने वाला एक सशक्त मार्गदर्शक बनकर उभरा है।

राष्ट्रहित की अधूरी कसौटी: सनातन अस्मिता और आंतरिक विडंबनाएं

परंतु, किसी भी निष्पक्ष और राष्ट्रहित-केंद्रित विश्लेषण में केवल उपलब्धियों का गान करना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उन गंभीर चुनौतियों पर आत्ममंथन करना भी आवश्यक है जो देश के भविष्य के लिए संकट बनी हुई हैं। स्वतंत्रता के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के उपरांत और चौदह प्रधानमंत्रियों के शासन के बाद भी, यह एक कड़वी वास्तविकता है कि भारत की मूल सनातन संस्कृति अपने ही देश में पूर्णतः स्वतंत्र और सुरक्षित अनुभव नहीं कर पा रही है। वर्ष १९४७ में पंथ और धर्म के आधार पर देश का विभाजन होने और एक बड़े भू-भाग को पृथक राष्ट्र बना दिए जाने के बाद भी, बहुसंख्यक हिंदू समाज को अपनी ही भूमि पर संवैधानिक रूप से दोयम दर्जे की विडंबनाओं का सामना करना पड़ रहा है। हिंदुओं के पवित्र मंदिर आज भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त नहीं हो सके हैं, जबकि अन्य समुदायों के धार्मिक स्थलों को पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त है। मंदिरों के चढ़ावे की राशि पर सरकारों का नियंत्रण रहता है, जिसका उपयोग कई बार गैर-सनातनी कार्यों में किया जाता है। जिन प्राचीन मंदिरों को आक्रांताओं ने ध्वस्त किया था, उनमें से कुछ को छोड़कर बहुसंख्यक स्थलों का जीर्णोद्धार आज भी लंबित है।

इस संदर्भ में वर्ष १९९१ में बनाया गया पूजा स्थल कानून एक बहुत बड़ी विसंगति बनकर खड़ा है, जिसे व्यवहार में एक प्रकार से सातवीं शताब्दी के आक्रांताओं के कुकृत्यों को कानूनी संरक्षण देने जैसा माना जाता है। स्वतंत्रता के पूर्व के दो सौ वर्षों के ब्रिटिश शासन और उससे पहले के क्रूर मुस्लिम कालखंड में इन ध्वस्त मंदिरों का उद्धार असंभव था, और स्वतंत्रता के बाद इस कानून ने हिंदुओं को अपनी आस्था के केंद्रों को वापस पाने के कानूनी अधिकार से ही वंचित कर दिया। इसके अतिरिक्त, शिक्षा के क्षेत्र में भी एक गंभीर संवैधानिक असंतुलन दिखाई देता है। हिंदुओं को अपने पारंपरिक गुरुकुलों को स्वतंत्र रूप से चलाने का वह अधिकार प्राप्त नहीं है, जो अन्य समुदायों को अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान चलाने के नाम पर मिला हुआ है। इस प्रकार की संवैधानिक और प्रशासनिक व्यवस्थाएं भारत की मूल सनातनी चेतना को धीरे-धीरे कमजोर कर रही हैं। अनेक वैश्विक और आंतरिक षड्यंत्रों के माध्यम से देश की जनसांख्यिकी को परिवर्तित करने, अवैध धर्मांतरण को हथियार बनाने और राष्ट्र की संप्रभुता को चुनौती देने वाले विभिन्न छद्म अभियानों को रोकने में वर्तमान सरकार की नीतियां भी पूरी तरह सफल नहीं हो सकी हैं।

कई बार यह प्रतीत होता है कि शासन में इस दिशा में दृढ़ इच्छाशक्ति की न्यूनता है, अन्यथा बारह वर्ष का अटूट और प्रचंड बहुमत का कार्यकाल किसी भी राष्ट्र के सांस्कृतिक स्वाभिमान और ऐतिहासिक न्याय को पूर्णतः स्थापित करने के लिए पर्याप्त होता है। मोदी सरकार के इन बारह वर्षों में शिक्षा और संस्कृति जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार वैचारिक रूप से शिथिल रहा, जिसके कारण न तो भारत की पाठ्यपुस्तकों में दर्ज विकृत इतिहास को समूल सुधारा जा सका और न ही संपूर्ण शिक्षा प्रणाली को भारतीय संस्कारों के अनुकूल प्रदूषण मुक्त किया जा सका। प्रधानमंत्री ने वर्ष २०४७ तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का भव्य स्वप्न तो दिखाया है, परंतु राष्ट्रहित का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि वह विकसित भारत अपनी मूल सनातनी आत्मा के साथ जीवित रहेगा या केवल एक भौतिकवादी और सांस्कृतिक पहचान से विहीन भू-भाग बनकर रह जाएगा?

निष्कर्ष: सर्वाधिक कार्यकाल बनाम सर्वाधिक कार्य का संकल्प

स्वतंत्र भारत के समूचे राजनीतिक इतिहास की यात्रा का यदि सूक्ष्म और निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए, तो वर्ष १९४७ से २०१४ तक का समय भारत को एक भौगोलिक इकाई के रूप में सहेजने, उसके अस्तित्व को बाहरी संकटों से बचाने और विभिन्न अंतर्विरोधों के बीच देश की व्यवस्था को चलाए रखने का कालखंड था। पंडित नेहरू से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह तक, प्रत्येक प्रधानमंत्री ने अपनी सीमाओं, वैचारिक दृष्टिकोणों और तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप देश की प्रगति में अपना योगदान दिया, जिसे पूर्णतः नकारा नहीं जा सकता। परंतु वर्ष २०१४ से २०२६ के ये बारह वर्ष भारत के भीतर एक सुसुप्त पड़े आत्मविश्वास को जगाने और उसे वैश्विक पटल पर एक सुदृढ़ आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में स्थापित करने के साक्षी रहे हैं। वर्तमान नेतृत्व ने देश को एक मजबूर राष्ट्र की छवि से निकालकर एक मजबूत और निर्णायक महाशक्ति के मार्ग पर अग्रसर अवश्य किया है।

तथापि, इतिहास का न्याय अत्यंत क्रूर और निष्पक्ष होता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह सदैव स्मरण रखना होगा कि इतिहास में केवल सर्वाधिक लंबे कार्यकाल का प्रधानमंत्री बन जाना ही उनकी वास्तविक श्रेष्ठता को सिद्ध नहीं करेगा। लोकतांत्रिक कीर्तिमानों की संख्या से कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि क्या उनका नेतृत्व इस देश की प्राचीन सनातन संस्कृति, उसकी जनसांख्यिकीय सुरक्षा, और राष्ट्र की आंतरिक अखंडता को उन गहरे संकटों से स्थायी मुक्ति दिला सका जो भारत को भीतर से खोखला कर रहे हैं। केवल भौतिक और आर्थिक विकास किसी राष्ट्र को अमर नहीं बनाता; राष्ट्र अपने सांस्कृतिक प्राणों से जीवित रहता है। अतः, सर्वाधिक लंबे समय तक पद पर रहने की उपलब्धि की अपेक्षा राष्ट्र की एकता, अखंडता और आदि-अनादि सनातन संस्कृति की चिरंतन सुरक्षा के लिए सर्वाधिक युगांतकारी कार्य करने वाला प्रधानमंत्री बनना ही वास्तविक रूप से ऐतिहासिक, स्मरणीय और परम राष्ट्रीय हित में होगा।

~~~शिव मिश्रा ~~~

राम मंदिर: आस्था का केंद्र, पारदर्शिता की कसौटी और प्रशासनिक पुनर्गठन की आवश्यकता

  राम मंदिर: आस्था का केंद्र , पारदर्शिता की कसौटी और प्रशासनिक पुनर्गठन की आवश्यकता   — शिव मिश्रा , वरिष्ठ स्तंभकार अयोध्या में प्रभु श्री...