मुद्दाहीन विपक्ष: बदलते मुद्दे और खिसकता जनाधार
पिछले बारह वर्षों से देश की सत्ता का संचालन कर रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मोदी सरकार के कार्यकाल का यदि निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए, तो यह दावा करना अतिशयोक्ति होगी कि सरकार ने हर समस्या का शत-प्रतिशत समाधान कर दिया है, देश में पूर्ण पूर्णता आ गई है, और हर नागरिक सरकार के कामकाज से पूरी तरह संतुष्ट है। यदि ऐसा होता, तो राजनीति और समाजशास्त्र के नियम ही बदल जाते। इसके बावजूद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ और उनके प्रति जनसमर्थन का आधार लगातार सुदृढ़ बना हुआ है, जिसके पीछे ठोस धरातलीय बदलाव और पिछले दशकों की तुलना में हुआ गुणात्मक सुधार एक बड़ा कारण है।
प्राथमिक चुनौतियाँ: महंगाई और बेरोजगारी का यथार्थ
महंगाई और बेरोजगारी प्रत्येक विकासशील अर्थव्यवस्था की चिरकालिक और जटिल समस्याएं रही हैं, और भारत भी इसका अपवाद नहीं रहा है। स्वतंत्रता के बाद से ही बढ़ती जनसंख्या और उसके अनुपात में शिक्षित युवाओं की बढ़ती संख्या के साथ रोजगार के अवसरों का सृजन और मूल्य-वृद्धि को पूरी तरह काबू में रखना एक बड़ी चुनौती रहा है। आज भी ये मुद्दे राजनीति के केंद्र में हैं।किंतु, इस जमीनी सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान दौर में महंगाई और बेरोजगारी उतनी अनियंत्रित और भयावह नहीं है, जैसी पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में हुआ करती थी। वैश्विक और घरेलू आर्थिक उथल-पुथल के बीच सरकार ने वित्तीय अनुशासन और लक्षित कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से इन पर एक हद तक नियंत्रण बनाए रखा है, जिससे आम जनजीवन पर पड़ने वाला दबाव कुछ कम हुआ है।
सुरक्षा और आंतरिक शांति: भयमुक्त समाज की ओर कदम
यदि हम पिछली सरकारों के दौर को याद करें, तो आतंकवाद और नक्सलवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए नासूर बन चुके थे। कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों के दौरान देश के महानगरों, धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक स्थानों पर बम धमाके एक सामान्य परिघटना बन गए थे। रेलवे स्टेशनों, रेडियो स्टेशनों और टेलीविजन पर लगातार सार्वजनिक चेतावनियाँ गूंजती रहती थीं— "किसी भी लावारिस या अनजान वस्तु को हाथ न लगाएं, उसमें बम हो सकता है।" सुबह घर से रोजी-रोटी के लिए निकला व्यक्ति सुरक्षित शाम को घर लौटेगा या नहीं, इसकी कोई निश्चितता नहीं थी।
इसी प्रकार, वामपंथी उग्रवाद यानी नक्सलवाद, जिसने ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के विशाल भूभाग को अपनी गिरफ्त में ले रखा था, उसकी कमर लगभग पूरी तरह तोड़ दी गई है। जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद की जड़ मानी जाने वाली धारा तीन सौ सत्तर (370) का संवैधानिक खात्मा कर दिया गया है। इसके साथ ही, अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण और उसका उद्घाटन उस जन-आकांक्षा की तार्किक परिणति है, जो सदियों से देश की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रही थी।
आर्थिक सुधार और वित्तीय समावेशन की ऐतिहासिक छलांग
आर्थिक मोर्चे पर, मोदी सरकार ने वित्तीय समावेशन (वित्तीय रूप से सबको जोड़ना) और पारदर्शिता के मामले में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। 'प्रधानमंत्री जन धन योजना' के माध्यम से साठ करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले गए, जिनमें सरकारी अनुदान और कल्याणकारी योजनाओं की सहायता राशि का सीधा हस्तांतरण (प्रत्यक्ष लाभ अंतरण) बिचौलियों की संस्कृति को समाप्त करने में मील का पत्थर साबित हुआ। आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है और इसकी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) चार ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर चुकी है।
जुलाई 2017 से लागू वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने देश की जटिल कर प्रणाली को सुव्यवस्थित और पारदर्शी बनाया। 'मेक इन इंडिया' और 'स्टार्टअप इंडिया' जैसी पहलों ने देश के युवा उद्यमियों को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई है। यूपीआई (यू.पी.आई.) और डिजिटल भुगतान क्रांति ने भारत को फिनटेक (वित्तीय तकनीकी) के क्षेत्र में विश्वगुरु के रूप में स्थापित किया है।
सामाजिक कल्याण और बुनियादी ढांचे का कायाकल्प
सामाजिक सुरक्षा और गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में उज्ज्वला योजना (रसोई गैस कनेक्शन), आयुष्मान भारत (स्वास्थ्य बीमा), प्रधानमंत्री आवास योजना (पक्की छत) और स्वच्छ भारत अभियान ने समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन स्तर को उठाया है। बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) के विकास ने तो अपनी गति और गुणवत्ता से एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। देश भर में मेट्रो नेटवर्क, आधुनिक रेल सेवाओं (वंदे भारत आदि), अत्याधुनिक हवाई अड्डों तथा हाई-स्पीड हाईवे और एक्सप्रेसवे का जाल बिछाया गया है। रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में 'तेजस' लड़ाकू विमान, ब्रह्मोस मिसाइल, स्वदेशी विमानवाहक पोत 'आईएनएस विक्रांत' और अंतरिक्ष के क्षेत्र में गगनयान व चंद्रयान अभियानों की सफलता ने पूरी दुनिया का ध्यान भारत की तकनीकी और सामरिक क्षमता की ओर खींचा है।
संवैधानिक संस्थाओं का अतीत और सुशासन की वर्तमान वास्तविकता
इन तमाम उपलब्धियों को देखने के बाद स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या ये कार्य पहले नहीं किए जा सकते थे? इसका उत्तर है—निश्चित रूप से किए जा सकते थे। यदि पूर्ववर्ती सरकारों ने राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया होता, तो आज भारत वैश्विक मंच पर चीन जैसी महाशक्तियों के साथ बराबरी पर प्रतियोगिता कर रहा होता।
यदि हम अतीत के पन्नों को पलटें, तो यह आकलन करना सहज नहीं है कि पिछली सरकारों के दौर में संविधान, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और प्रशासनिक संस्थाओं का किस हद तक राजनीतिक उपयोग और दुरूपयोग किया गया था। बिना विधिवत कानूनी पृष्ठभूमि या विशेषज्ञता के व्यक्तियों को सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश या मुख्य न्यायाधीश बना देना, किसी सेवारत सांसद या राजनीतिक करीबी को न्यायपालिका में ऊंचे पदों पर बैठा देना, अथवा चुनाव आयोग के प्रमुख पदों पर आसीन अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद राजनीतिक दलों के टिकट पर लोकसभा-राज्यसभा का सांसद या मंत्री बना देना सामान्य प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा हुआ करता था। बड़े राजनीतिक परिवारों के घरेलू सहायकों या करीबियों को राज्यपाल, उपराज्यपाल और यहाँ तक कि राष्ट्रपति जैसे गरिमामयी पदों पर आसीन कर देना भी उस दौर की साधारण घटनाएं थीं। मीडिया घरानों के संपादकीय नियंत्रण और केंद्रीय मंत्रिपरिषद के चयन तक में कॉर्पोरेट और राजनीतिक गठजोड़ की भूमिका जगजाहिर थी।
विपक्ष की हताशा, खिसकता जनाधार और 'जल बिन मछली' जैसी तड़प
दूसरी ओर, लगातार चुनावी पराजयों और सत्ता से बाहर होने के कारण विपक्षी दल आज राजनीतिक रूप से 'जल बिन मछली' की भांति तड़प रहे हैं। राजशाही और परिवारवादी आधिपत्य के दौर में पली-बढ़ी इन पार्टियों की जीवनशैली और वित्तीय स्रोतों के कुंए सूखने लगे हैं। उनकी यह हताशा और निराशा अब एक गहरी कुंठा में बदल चुकी है। परिणामस्वरूप, सरकार के हर छोटे-बड़े और जनहित के निर्णय का आँख मूंदकर विरोध करना उनकी दैनिक दिनचर्या बन गया है। जब भी चुनाव नजदीक आते हैं, विपक्ष के तरकश से ऐसे बेतुके और आधारहीन मुद्दे निकलते हैं, जिनका जनता की वास्तविक समस्याओं से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता। जनता इन चालों को भली-भांति समझती है, इसलिए वह विपक्ष को लगातार नकार रही है और विपक्ष अपनी इसी खीझ के कारण और अधिक रसातल में जा रहा है।
ईवीएम और चुनाव आयोग पर अनर्गल प्रलाप
भारतीय चुनावी राजनीति के इतिहास को याद करें, तो एक दौर वह भी था जब मतपेटियों (बैलेट पेपर) के जमाने में बाहुबलियों के दम पर मतदान केंद्रों को लूटा जाता था, फर्जी मतदान कराए जाते थे, और परिणामों को प्रभावित करने के लिए किसी भी हद तक जाया जाता था। चुनावों का इतिहास रक्तयोजित और हिंसा से भरा होता था। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ई.वी.एम.) के आने के बाद से बाहुबलियों और भू-माफियाओं का चुनावी हस्तक्षेप लगभग समाप्त हो गया, और आम, गरीब तथा कमजोर वर्ग का मतदाता निडर होकर अपने मताधिकार का प्रयोग करने लगा। किंतु अपनी हार की खीझ मिटाने के लिए विपक्ष आज भी ई.वी.एम. को निशाना बनाता है। जब यह अकाट्य रूप से प्रमाणित हो चुका है कि ई.वी.एम. में किसी प्रकार की छेड़छाड़ संभव नहीं है, तब विपक्ष ने चुनाव प्रक्रिया और प्रशासनिक संस्थाओं को बदनाम करने के नए रास्ते तलाश लिए हैं। हाल ही में मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने की सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया पर भी सवालिया निशान उठाए जाने लगे हैं।
एक समाचार पत्र की रिपोर्ट को आधार बनाकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध अनर्गल आंदोलन खड़े करना और भाजपा की चुनावी जीत का ठीकरा चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर फोड़ना सरासर राजनीतिक बेईमानी है। विडंबना यह है कि जिन-जिन राज्यों में इन्हीं चुनाव आयोग के निर्देशन में हुए चुनावों में विपक्ष ने जीत हासिल कर अपनी सरकारें बनाई हैं, वहाँ उन्हें कोई धांधली नजर नहीं आती; किंतु जहाँ भाजपा जीतती है, वहाँ सारा दोष चुनाव आयोग का मान लिया जाता है।
क्षेत्रीय दलों की कांग्रेस पर निर्भरता और वैचारिक भटकाव
कुछ वर्ष पूर्व विपक्षी दलों ने केंद्र की सत्ता से भाजपा को बेदखल करने के लिए एक तथाकथित 'महागठबंधन' का ताना-बाना बुना था। किंतु क्षेत्रीय क्षत्रपों की अपनी महत्वकांक्षाओं और राहुल गांधी के नेतृत्व के प्रति अंधी निर्भरता ने इन दलों की अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन को भी लील लिया है। आज क्षेत्रीय दल अपनी वैचारिक पहचान खो चुके हैं और राहुल गांधी के हर अप्रत्याशित व अपरिपक्व राजनीतिक कदम में उनके साथ खड़े होने को विवश हैं।
राष्ट्रहित बनाम विरोध की राजनीति
मोदी सरकार का विरोध करते-करते विपक्ष कई बार उस संवेदनशील रेखा को भी लांघ जाता है जहाँ उसका विरोध देश का विरोध बन जाता है। आज राहुल गांधी और कई विपक्षी नेता विदेशी धरती पर जाकर भारत विरोधी ताकतों और देश की संप्रभुता को आघात पहुँचाने वाले तत्वों से मंच साझा करने में संकोच नहीं करते। वैश्विक मंचों पर जहाँ देश के आंतरिक और सामरिक विषयों पर संपूर्ण राजनीतिक वर्ग को एक स्वर में बोलना चाहिए, वहीं विपक्षी दल अक्सर विदेशी ताकतों के सुर में सुर मिलाते नजर आते हैं।
आज स्थिति यह है कि विपक्ष सचमुच मुद्दों के अकाल से जूझ रहा है। सही और रचनात्मक आलोचना करने के बजाय वे रोज नए और अटपटे प्रसंगों को उठाकर खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। यह स्थिति भले ही अल्पकालिक रूप से भारतीय जनता पार्टी के लिए राजनीतिक लाभ का मार्ग प्रशस्त करती हो, किंतु एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह कतई सुखद नहीं है कि देश का विपक्ष इस हद तक दिशाहीन और संवेदनहीन हो जाए। लोकतंत्र की मजबूती के लिए एक जिम्मेदार, परिपक्व और मुद्दों पर आधारित विपक्ष का होना अनिवार्य है, किंतु वर्तमान विपक्ष अपनी आंतरिक विफलताओं और दिशाहीन नेतृत्व के कारण स्वयं ही अपने राजनीतिक अवसादन का कारक बन चुका है।
~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~