बुधवार, 3 जून 2026

साप्ताहिक विशेष लेख :- बाल-बाल बचा पश्चिम बंगाल

 


साप्ताहिक विशेष लेख :-

बाल-बाल बचा पश्चिम बंगाल! || तुष्टिकरण के 'डायमंड हार्बर मॉडल' का पतन, अंतरराष्ट्रीय साजिशों का भंडाफोड़ और सनातन पुनरुत्थान की नई भोर


स्वाधीनता जैसी अनुभूति और उत्सवधर्मी जनमानस

पश्चिम बंगाल की लाल माटी और कोलकाता की ऐतिहासिक गलियों में इन दिनों हर्ष और उल्लास का एक ऐसा अभूतपूर्व वातावरण दिखाई पड़ रहा है, मानो इस सीमांत राज्य को दशकों के दमघोंटू माहौल से अभी हाल ही में वास्तविक स्वतंत्रता मिली हो। यद्यपि, यह उल्लास और राहत की सांस मुख्य रूप से उन लोगों के चेहरों पर साफ देखी जा सकती है जो भारतीय राष्ट्रवाद, हिंदू अस्मिता और सनातन संस्कृति में प्रगाढ़ विश्वास रखते हैं। इसके विपरीत, दशकों से राज्य में तुष्टिकरण की फसल काटने वाले राजनेता, प्रशासनिक संरक्षण में फलने-फूलने वाला सिंडिकेट और राज्य की अराजकतापूर्ण व्यवस्था से गैर-कानूनी ढंग से अकूत लाभ अर्जित करने वाले तत्व गहरे सदमे में हैं। राजनीतिक गलियारों से लेकर जमीन तक फैले इस तंत्र को अभी भी यह विश्वास नहीं हो पा रहा है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) की अजेय मानी जाने वाली सरकार का भी अवसान हो सकता है।

राज्य के नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने शपथ लेते ही जिस प्रकार ताबड़तोड़ और कड़े फैसले लेने शुरू किए हैं, उसने राज्य के आम नागरिकों में एक नए उत्साह और उत्सव का संचार कर दिया है। सुवेंदु सरकार के शुरुआती कदमों ने ही यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य में अब कानून का राज स्थापित होने जा रहा है। सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हैं:

    • भ्रष्टाचारियों पर कड़ा प्रहार: पिछले शासनकाल के दौरान सरकारी नौकरियों की तस्करियों और घोटालों में संलिप्त अधिकारियों व नेताओं के खिलाफ त्वरित कानूनी कार्यवाही।
    • सिंडिकेट राज की समाप्ति: राज्य भर में अवैध रूप से वसूले जाने वाले 'गुंडा टैक्स' और जबरन टोल टैक्स वसूलने वाले सिंडिकेट सरगनाओं पर शिकंजा।
    • घुसपैठ विरोधी अभियान: अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे क्षेत्रों और आंतरिक जिलों में अवैध घुसपैठियों की धरपकड़ के लिए बड़े पैमाने पर तलाशी अभियान।

रेड रोड पर बदली परंपरा और नए नायक का उदय

पश्चिम बंगाल के इतिहास में लगभग १०७ वर्षों के बाद पहली बार ऐसा दृश्य देखने को मिला, जब कोलकाता के प्रतिष्ठित 'रेड रोड' पर ईद की नमाज का वह राजनीतिक आयोजन नहीं हुआ, जो पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान मुख्यमंत्री की उपस्थिति का मुख्य केंद्र हुआ करता था। मुस्लिम तुष्टिकरण और तुच्छ वोट बैंक की राजनीति पर कड़ा अंकुश लगाने के इन शुरुआती और साहसिक प्रयासों ने सुवेंदु अधिकारी को रातों-रात राज्य का नया 'नायक' (Mass Leader) बनाकर उभार दिया है।

अपनी त्वरित, निष्पक्ष और कड़क कार्यशैली के कारण वे न केवल पश्चिम बंगाल भाजपा में लोकप्रियता के शिखर पर पहुंच गए हैं, बल्कि समूचे देश के हिंदू समुदाय में भी उनके प्रति भारी आकर्षण पैदा हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यद्यपि उन्होंने अभी तक हिंदू समाज के विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक हित में कोई प्रत्यक्ष लोक-लुभावन कार्य नहीं किया है, लेकिन चूंकि भारत का बहुसंख्यक हिंदू समाज केवल राष्ट्र के प्रति किए गए सकारात्मक, साहसिक और न्यायसंगत कार्यों से ही अत्यधिक प्रसन्न हो जाता है, इसलिए पूरे हिंदू जनमानस के मन में सुवेंदु अधिकारी के प्रति अटूट श्रद्धा, विश्वास और सम्मान का भाव उत्पन्न हो गया है।

'लॉन्चिंग पैड' का विध्वंस और जनसांख्यिकीय संकट

पश्चिम बंगाल की नवगठित सरकार ने उस सबसे बड़े घाव पर सीधे सर्जिकल स्ट्राइक की है, जो दशकों से भारत की आंतरिक सुरक्षा को खोखला कर रहा था। बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कटीले तार (Barbed Wire Fencing) लगाने का जो कार्य पूर्ववर्ती ममता बनर्जी सरकार द्वारा 'भूमि अधिग्रहण न करने' और असहयोग के बहानों के कारण दशकों से लंबित रखा गया था, उसे सुवेंदु सरकार ने तुरंत प्रभाव से शुरू करा दिया है। सीमा सुरक्षा बल (BSF) को आवश्यक भूमि और प्रशासनिक सहयोग रातों-रात उपलब्ध करा दिया गया है। इसके साथ ही, राज्य के भीतर अवैध घुसपैठियों की पहचान का एक सघन अभियान शुरू हो चुका है। राज्य के प्रत्येक जिले में पहले से निर्मित या अस्थायी तौर पर चिन्हित डिटेंशन और होल्डिंग सेंटर्स को पूरी तरह सक्रिय कर दिया गया है, जिनमें पकड़े जा रहे अवैध नागरिकों की आमद शुरू हो चुकी है।

करदाताओं की कमाई पर डाका और सुरक्षाबलों की कड़ाई

डिटेंशन सेंटर्स और सीमावर्ती क्षेत्रों में जब राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों के कई समूहों ने इन पकड़े गए घुसपैठियों से सीधी वार्ता की, तो उन्होंने जो खुलासे किए वे चौंकाने वाले और देश की संप्रभुता को चुनौती देने वाले हैं। इन घुसपैठियों ने कैमरे के सामने यह स्वीकार किया कि:

१. उन्होंने भारत की सीमा में अवैध रूप से प्रवेश किया था।

२. पूर्ववर्ती सत्ताधारी दल (TMC) के स्थानीय नेताओं, पंचायत प्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों के सीधे सहयोग से उन्हें भारत के नागरिकता से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध कराए गए थे।

३. इन दस्तावेजों के आधार पर वे न केवल मुफ्त राशन प्राप्त कर रहे थे, बल्कि राज्य और केंद्र सरकार की सभी कल्याणकारी व वित्तीय योजनाओं का सीधा लाभ उठा रहे थे।

यह तथ्य किसी भी सजग नागरिक को उद्वेलित करने के लिए पर्याप्त है कि भारत के ईमानदार करदाताओं (Taxpayers) की गाढ़ी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा इन अवैध विदेशी घुसपैठियों को पालने और उन्हें मुफ्त सुविधाएं देने पर लुटाया जा रहा था। मुस्लिम तुष्टिकरण आधारित राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय संसाधनों का एक विशाल हिस्सा न केवल एक समुदाय विशेष के तुष्टिकरण पर खर्च कर रहे थे, बल्कि देश की सुरक्षा को दांव पर लगाकर अवैध घुसपैठियों को अपना स्थायी 'वोट बैंक' बनाने के लिए उन्हें भारत का वैध नागरिक सिद्ध करने में अपनी पूरी शासकीय शक्ति झोंक चुके थे।

फलता का जनादेश और 'डायमंड हार्बर मॉडल' का स्याह सच

पश्चिम बंगाल के इस हालिया विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक विजय दर्ज की है। लेकिन इस पूरे चुनाव का जो वैचारिक और रणनीतिक निचोड़ है, वह दक्षिण २४ परगना जिले की फलता विधानसभा सीट के परिणाम से निकलता है। फलता के चुनावी परिणाम ने पिछले १५ वर्षों में ममता बनर्जी के शासनकाल के दौरान हुए सभी चुनावों के पीछे छिपे 'चुनावी प्रबंधन' के काले सच को पूरी दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया है। फलता विधानसभा क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी ने १,०९,००० से भी अधिक मतों के विशाल अंतर से ऐतिहासिक विजय हासिल की। सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह रहा कि इस सीट पर टीएमसी का प्रत्याशी अपनी जमानत तक नहीं बचा सका और खिसककर चौथे स्थान पर पहुंच गया, जबकि उसका निकटतम प्रतिद्वंदी वाम मोर्चे का उम्मीदवार था।

लोकतंत्र को बंधक बनाने का खेल

भौगोलिक और राजनीतिक दृष्टि से फलता विधानसभा क्षेत्र 'डायमंड हार्बर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र' के अंतर्गत आता है। यह वही क्षेत्र है जिसे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी का राजनीतिक गढ़ माना जाता था। यहाँ टीएमसी का कुख्यात 'डायमंड हार्बर मॉडल' काम करता था। पूर्ववर्ती सरकार और टीएमसी के रणनीतिकार इस मॉडल को 'निर्बाध विकास' और 'सर्वश्रेष्ठ चुनावी प्रबंधन' का प्रतीक बताकर पूरे देश में इसका प्रचार करते थे। परंतु, वास्तविकता में यह मॉडल क्या था, इसका खुलासा तब हुआ जब फलता के मतदाताओं ने राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम कर पूर्ववर्ती सरकार द्वारा की जाने वाली चुनावी धांधली, डराने-धमकाने और विशेषकर महिलाओं के साथ किए जाने वाले अपमानजनक व दमनकारी व्यवहार के खिलाफ देश का ध्यान आकर्षित किया।

इसके बाद केंद्रीय चुनाव आयोग ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया। जांच में यह रोंगटे खड़े करने वाला सच सामने आया कि मतदान केंद्रों पर ईवीएम (EVM) मशीनों के उन बटनों पर सेलोटेप लगा दिया जाता था जिन पर विरोधी दलों के चुनाव चिन्ह होते थे, ताकि मतदाता केवल टीएमसी को वोट देने पर मजबूर हों। इतना ही नहीं, वोट देकर बाहर निकलने वाले मतदाताओं के कपड़ों पर एक विशिष्ट इत्र (Scent) छिड़का जाता था, और बाद में उस इत्र की खुशबू और बूथ के भीतर के इनपुट्स से यह पता लगाया जाता था कि मतदाता ने टीएमसी को वोट दिया है या नहीं। वोट न देने वाले या विरोध करने वाले मतदाताओं को चुनाव के बाद भीषण शारीरिक, मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना सहन करनी पड़ती थी।

जब चुनाव आयोग की कड़ी निगरानी, केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती और सीसीटीवी कैमरों के साए में फलता सीट पर दोबारा निष्पक्ष मतदान कराया गया, तो टीएमसी के उम्मीदवार और ममता बनर्जी के बेहद करीबी माने जाने वाले जहांगीर खान—जो उस पूरे क्षेत्र में अपनी दबंगई, सिंडिकेट और आतंक के लिए कुख्यात था—की न केवल करारी हार हुई, बल्कि उसकी जमानत तक जब्त हो गई। फलता का यह परिणाम यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि पिछले चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की अधिकांश सीटों पर जीत जनसमर्थन से नहीं, बल्कि इसी लोकतांत्रिक डकैती यानी 'डायमंड हार्बर मॉडल' पर आधारित थी। इसने लोकतंत्र को बंधक बनाने वाले और वोटों की संगठित लूट करने वाले तंत्र का न केवल पतन किया, बल्कि एक बहुत बड़े राज्य-प्रायोजित षड्यंत्र का पर्दाफाश भी कर दिया।

ऐतिहासिक तुष्टिकरण और सुवेंदु की डबल स्ट्राइक

ममता बनर्जी की राजनीतिक अपराजेयता के मिथक को तोड़ने वाले नेता कोई और नहीं, बल्कि सुवेंदु अधिकारी ही हैं। इतिहास गवाह है कि वर्ष २०२१ में नंदीग्राम सीट से और वर्ष २०२६ के इस ऐतिहासिक विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी को उनकी सुरक्षित मानी जाने वाली भवानीपुर सीट से शिकस्त देकर सुवेंदु अधिकारी ने धूल चटाई है। एक ही मुख्यमंत्री को लगातार दो अलग-अलग चुनावों में हराने वाले सुवेंदु अधिकारी कभी ममता के सबसे भरोसेमंद और करीबी सहयोगी हुआ करते थे, जिन्होंने नंदीग्राम आंदोलन की जमीन तैयार की थी। आज वे बंगाल में राष्ट्रवाद के सबसे बड़े प्रतीक बनकर उभरे हैं।

कांग्रेस और वामपंथ के दौर में तुष्टिकरण की ऐतिहासिक क्रोनोलॉजी

पश्चिम बंगाल का यह ऐतिहासिक दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि १५ अगस्त १९४७ को देश का विभाजन होने के पहले ही, इस महान बौद्धिक और सांस्कृतिक चेतना वाले राज्य का 'मजहब' के आधार पर विभाजन तय कर दिया गया था। स्वतंत्रता के बाद शुरुआती २० वर्षों तक कांग्रेस ने इस राज्य पर निर्बाध शासन किया, परंतु सत्ता संभालते ही कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण की सभी सीमाएं लांघ दीं।

तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से अपनी जान, इज्जत और धर्म बचाकर आने वाले लाखों बंगाली हिंदू शरणार्थियों (Partition Refugees) को नागरिकता देने और उनके पुनर्वास में नेहरू और राज्य की कांग्रेस सरकार ने जानबूझकर अत्यधिक ढिलाई बरती। कांग्रेस सरकार को यह डर सता रहा था कि अगर इन लाखों पीड़ित हिंदू शरणार्थियों को राज्य के मुस्लिम बहुल सीमावर्ती इलाकों में स्थायी रूप से बसा दिया गया, तो वहां का जनसांख्यिकीय ढांचा (Demography) बदल जाएगा और स्थानीय मुस्लिम आबादी कांग्रेस से नाराज होकर उसके पारंपरिक वोट बैंक को छिन्न-भिन्न कर देगी। यही कारण था कि इन हिंदू शरणार्थियों को बंगाल की मुख्यधारा से दूर रखने के लिए देश के सुदूर क्षेत्रों जैसे दंडकारण्य (ओडिशा/छत्तीसगढ़ के जंगलों) या अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भेजने का अमानवीय प्रयास किया गया।

इसके विपरीत, नेहरू-लियाकत समझौते के तहत पूर्वी पाकिस्तान चले गए मुस्लिम नागरिकों को भारत लौटने पर प्रफुल्ल चंद्र घोष और डॉ. बिधान चंद्र रॉय के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकारों ने स्थानीय स्तर पर विशेष प्रशासनिक सुरक्षा प्रदान की, उनकी संपत्तियों पर दोबारा कब्जा दिलवाया और वित्तीय सहायता भी प्रदान की। इनमें बड़ी संख्या में वे तत्व भी शामिल थे जो जिन्ना के "डायरेक्ट एक्शन" के दौरान कोलकाता और नोआखली में हुए भीषण हिंदू नरसंहार के लिए जिम्मेदार थे।

१९७७ में सत्ता में आए वामपंथियों (Left Front) ने तो मुस्लिम तुष्टिकरण के मामले में कांग्रेस के भी सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। वामपंथियों ने 'भूमि सुधार' के नाम पर हिंदू जमींदारों की जमीनें छीनकर मुसलमानों में बांटी, ओबीसी (OBC) कोटे के तहत मुसलमानों को १०% का आरक्षण दे दिया, मदरसों को भारी सरकारी सहायता दी और उर्दू शिक्षकों की बड़े पैमाने पर भर्ती की। इसके विपरीत, हिंदू धार्मिक पाठशालाओं, टोलों, मठों और मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए सरकारी खजाने का उपयोग नहीं किया गया।

ममता शासन की पराकाष्ठा: ११००% बजटीय छलांग

२०११ में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने इसे खतरनाक और संस्थागत स्तर पर पहुंचा दिया। २०१२ में उन्होंने राज्य की मस्जिदों के इमामों और मुअज्जिनों के लिए मासिक वेतन और भत्तों की घोषणा कर दी। वामपंथियों के शासनकाल के अंत तक (वर्ष २०१०-११ में) राज्य का अल्पसंख्यक मामलों का कुल वार्षिक बजट केवल ₹४७२ करोड़ था, जिसे ममता बनर्जी की सरकार ने अपने अंतिम पूर्ण बजट (वर्ष २०२५-२६) में ११००% से अधिक बढ़ाकर ₹५,७१३ करोड़ कर दिया था। इस बजट का एक बड़ा हिस्सा 'ऐक्यश्री' और 'मेधाश्री' जैसी विशेष स्कॉलरशिप योजनाओं के तहत केवल अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं को सीधे वित्तीय सहायता के रूप में बांटा जा रहा था। इसके अलावा, राज्य की कई बेशकीमती सरकारी संपत्तियों को वक्फ बोर्ड को सौंप दिया गया। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने पदभार ग्रहण करते ही इस संस्थागत भेदभाव पर कड़ा प्रहार करते हुए मस्जिदों के इमामों और मुअज्जिनों को दिए जाने वाले असंवैधानिक मासिक वेतन और भत्तों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।

'ग्रेटर बांग्लादेश' की अंतरराष्ट्रीय साजिश और सनातन का भविष्य

पश्चिम बंगाल का इतिहास जितना गौरवशाली रहा है, वर्तमान उतना ही साशंकित करने वाला रहा है। राजनीतिक विशेषज्ञों का आरोप है कि ममता बनर्जी सरकार केवल वोट बैंक की राजनीति नहीं कर रही थी, बल्कि वह परोक्ष रूप से 'ग्रेटर बांग्लादेश' (Greater Bangladesh) बनाने के एक बेहद खतरनाक अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा बनती जा रही थी। इस अवधारणा के अंतर्गत पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश और भारत के पूर्वोत्तर (North-East) के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक नए संप्रभु भू-भाग को आकार देने का ताना-बाना बुना जा रहा था। इस योजना के तहत बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को योजनाबद्ध तरीके से सीमावर्ती जिलों में बसाया जा रहा था।

पश्चिम बंगाल दरअसल इन विदेशी तत्वों के लिए एक 'लॉन्चिंग पैड' बन चुका था। यहाँ से भारतीय नागरिकता के फर्जी दस्तावेज प्राप्त करने के बाद, इन घुसपैठियों को एक पूर्व-निर्धारित रणनीति के तहत भारत के विभिन्न कोनों जैसे जम्मू, लद्दाख की सीमाओं, उत्तराखंड की दुर्गम पहाड़ियों, और दक्षिण भारत के केरल में भेजा जाता था। हाल ही में राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों की जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि इनमें से कई संदिग्ध घुसपैठिये अल-कायदा (Al-Qaeda) जैसे वैश्विक आतंकी संगठनों के स्लीपर सेल से जुड़े हुए थे।

अंतरराष्ट्रीय ईसाई मिशनरी और वैश्विक शक्तियों का हस्तक्षेप

यह संकट केवल एक सीमा पार की घुसपैठ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वैश्विक मजहबी शक्तियों के घालमेल के भी संकेत मिले हैं। पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों और म्यांमार के अशांत क्षेत्रों को जोड़कर एक 'क्रिश्चियन लैंड' (Christian Land) बनाने की अंतरराष्ट्रीय साजिशों की गूंज पूर्व में भी सुनाई देती रही है। स्वयं बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने अपने सत्ताच्युत होने से पहले यह दावा किया था कि उत्तर-पूर्व भारत, बांग्लादेश और म्यांमार के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक अलग ईसाई देश बनाने की अंतरराष्ट्रीय साजिश रची जा रही है।

हाल ही में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने कोलकाता एयरपोर्ट से मैथ्यू वैन डायक नामक एक संदिग्ध अमेरिकी नागरिक को गिरफ्तार किया था। उसी नेटवर्क के तहत दिल्ली और लखनऊ हवाई अड्डों से ६ यूक्रेनी नागरिकों को भी गिरफ्तार किया गया था, जो टूरिस्ट वीजा पर आकर अवैध रूप से पूर्वोत्तर के प्रतिबंधित क्षेत्रों और मिजोरम के रास्ते म्यांमार सीमा में दाखिल हो रहे थे।

इस पूरे परिदृश्य में सबसे चौंकाने वाली कूटनीतिक घटना तब घटी जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो भारत की आधिकारिक यात्रा पर आए। वे देश की राजधानी नई दिल्ली आने के बजाय सीधे कोलकाता पहुंचे और वहाँ 'मिशनरीज ऑफ चैरिटी' (Missionaries of Charity) के मुख्यालय 'मदर हाउस' गए। यह संस्था लंबे समय से अवैध धर्मांतरण और वित्तीय विसंगतियों के कारण विवादों में घिरी रही है, जिसके कारण वर्ष २०२१ में केंद्र सरकार ने इसका एफसीआरए (FCRA) लाइसेंस भी रद्द कर दिया था। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा आम है कि ममता बनर्जी इस संस्था के शीर्ष नेतृत्व से बेहद नजदीक से जुड़ी हुई थीं और अमेरिकी विदेश मंत्री के आगमन से ठीक एक दिन पहले संस्था की कुछ ननों ने सचिवालय जाकर ममता बनर्जी से गुप्त भेंट भी की थी।

निष्कर्ष

उपरोक्त संपूर्ण परिदृश्य से यह अकाट्य रूप से स्पष्ट हो जाता है कि पश्चिम बंगाल एक बहुत बड़े अस्तित्वगत और सांस्कृतिक संकट के मुहाने पर खड़ा था, जिससे अब वह राष्ट्रवाद के उदय के कारण कुछ हद तक बाहर आ चुका है। आज पश्चिम बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक, और कश्मीर से लेकर केरल तक समूचे भारत में सनातन धर्म और राष्ट्र की संप्रभुता के खिलाफ वैश्विक शक्तियों का जो एक अघोषित गठबंधन काम कर रहा है, उसे बंगाल के इस राजनीतिक परिवर्तन से बहुत बड़ा झटका लगा है।

अब इस नई सरकार से राज्य के बहुसंख्यक समाज की एकमात्र और सबसे बड़ी अपेक्षा यही रहेगी कि वह राज्य से राजनीतिक हिंसा और भय के वातावरण को हमेशा के लिए समाप्त करे तथा हिंदुओं को उनके सनातन धर्म, त्योहारों और सांस्कृतिक प्रतीकों को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए पूर्ण शासकीय व प्रशासनिक संरक्षण प्रदान करे। यदि सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में भाजपा की यह नवगठित सरकार पश्चिम बंगाल के पीड़ित और प्रताड़ित हिंदू जनमानस को न्यूनतम इतना संबल और सुरक्षा प्रदान करने में सफल हो जाती है, तो राजनीतिक और सामाजिक रूप से आने वाले कई दशकों तक इस राज्य से राष्ट्रवाद के इस किले को ढहा पाना किसी भी देशविरोधी या तुष्टिकरण करने वाली शक्ति के लिए असंभव होगा। पश्चिम बंगाल सचमुच 'बाल-बाल' बचा है।

~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~

सारांश -

शनिवार, 23 मई 2026

रायबरेली और अमेठी में राहुल ने निकाली भड़ास

 



रायबरेली और अमेठी में राहुल ने निकाली भड़ास || मर्यादविहीन राजनीति, दिशाहीन आक्रोश में तड़प तड़प कर मरती काँग्रेस || कांग्रेस का भविष्य


1. शब्दों का अवमूल्यन और 'राहु' बने राहुल :-

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में वैचारिक मतभेदों के बावजूद शीर्ष नेताओं के बीच परस्पर सम्मान और भाषाई शुचिता की एक गौरवशाली परंपरा रही है। अटल बिहारी वाजपेयी और जवाहरलाल नेहरू से लेकर समकालीन राजनीति तक, कड़वे से कड़वे विरोध को भी संसदीय मर्यादा के दायरे में || व्यक्त किया जाता रहा है। किंतु, हालिया वर्षों में भारतीय राजनीति के भाषाई स्तर में जो गिरावट आई है, उसने इस गौरवशाली इतिहास को झकझोर कर रख दिया है। वर्तमान परिदृश्य को देखकर ऐसा प्रतीत होने लगा है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की अनियंत्रित बयानबाजी और आक्रामक शैली स्वयं कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार के लिए राजनीतिक ‘राहु’ की भूमिका निभा रही है।

राजनीति में आलोचना का स्वागत है, और एक मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की अनिवार्य आवश्यकता है, परंतु जब आलोचना का स्थान व्यक्तिगत कुंठा, अभद्र शब्दावली और गाली-गलौज ले ले, तो वह विमर्श न रहकर आत्मघाती कदम बन जाता है। राहुल गांधी के हालिया बयानों और उनकी भाव-भंगिमाओं ने एक बार फिर यह साबित किया है कि वे राजनीतिक परिपक्वता और संसदीय शिष्टाचार के बुनियादी सिद्धांतों से अब भी कोसों दूर हैं।

2. अमेठी और रायबरेली का मंच: मर्यादा की सभी सीमाएं लांघता नेतृत्व :-

हाल ही में अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली में आयोजित ‘बहुजन स्वाभिमान जनसभा’ को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने जिस प्रकार देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के प्रति अत्यंत अपमानजनक और अमर्यादित टिप्पणियां कीं, उसने लोकतांत्रिक संवाद को एक नए निचले स्तर पर धकेल दिया है। जनसभा में उपस्थित जनता को उकसाते हुए उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा:

"जब आप अपने घर पहुंचें और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के लोग आपके पास आकर नरेंद्र मोदी, अमित शाह और भाजपा की बात करें, तो उनसे साफ कहना कि आपका प्रधानमंत्री गद्दार है, आपका गृहमंत्री गद्दार है और आपका संगठन गद्दार है। इन्होंने देश को बेचने और संविधान को नष्ट करने का कुत्सित कार्य किया है।"

एक जिम्मेदार राष्ट्रीय दल के शीर्ष नेता और संवैधानिक पद (नेता प्रतिपक्ष) पर बैठे व्यक्ति के मुख से देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के लिए ‘गद्दार’ जैसे संगीन शब्द का प्रयोग न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी चोट करता है। इसके बाद, अपने पूर्व संसदीय क्षेत्र अमेठी में—जहाँ से उन्हें वर्ष 2019 में स्मृति ईरानी के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था—उसी तीखे तेवर, आक्रामक भाव-भंगिमा और हठधर्मिता को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि इन लोगों ने देश के महापुरुषों और जनता के साथ गद्दारी की है, इसलिए वे इन्हें 'गद्दार' ही कहेंगे और इसके लिए किसी भी कीमत पर माफी नहीं मांगेंगे।

इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर बेहद सतही और व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि जब देश में गैस, पेट्रोल और रोजगार का संकट है, तब प्रधानमंत्री इटली में मेलोनी के साथ 'मेलोडी' खा रहे हैं। अपनी उम्र और अनुभव में खुद से लगभग दो दशक बड़े, देश के तीन बार निर्वाचित प्रधानमंत्री के लिए "मोदी रोएगा", "पिटेगा" और "गिड़गिड़ाएगा" जैसी मवालिया छाप भाषा का प्रयोग करना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। ऐसी भाषा की अपेक्षा एक हाई स्कूल अनुत्तीर्ण छात्र से भी नहीं की जा सकती। यह आचरण किसी जमाने में बड़े जमींदार या रसूखदार घरों के बिगड़े हुए बच्चों की याद दिलाता है, जो अपनी असफलता के झुंझलाहट में बड़ों का आदर भूल जाते हैं। आज के आधुनिक परिवेश में एक अनपढ़ व्यक्ति भी सार्वजनिक रूप से ऐसी भाषा बोलने से कतराता है, लेकिन राहुल गांधी अपनी इन अमर्यादित टिप्पणियों को बार-बार दोहराकर ऐसा प्रदर्शित करते हैं मानो वे कोई महान और बहादुरी का ऐतिहासिक कार्य कर रहे हों।

3. निरंतर दोहराई जाती रणनीतिक भूलों का इतिहास :-

राहुल गांधी के लिए इस प्रकार की 'सिर-पैर विहीन' और आत्मघाती बयानबाजी कोई नई बात नहीं है। यदि उनके दो दशकों के राजनीतिक जीवन का अवलोकन किया जाए, तो यह साफ दिखाई देता है कि वे 'आलोचना' और 'ओछी गाली-गलौज' के बीच के महीन अंतर को कभी समझ ही नहीं पाए। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने देश भर में "चौकीदार चोर है" का नारा उछाला था। देश की जनता ने इसे प्रधानमंत्री के प्रति व्यक्तिगत द्वेष माना और अंततोगत्वा यह नारा कांग्रेस की ऐतिहासिक और करारी हार का मुख्य कारण बना। देश की संप्रभुता और सुरक्षा के संवेदनशील मुद्दों पर भी उनका रवैया बेहद गैर-जिम्मेदाराना रहा है। पुलवामा के कायरतापूर्ण आतंकी हमले और उसके बाद भारतीय वायुसेना की जांबाज सर्जिकल स्ट्राइक पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री पर सैनिकों के "खून की दलाली" करने का संगीन आरोप लगाया था। इस बयान ने न केवल देश की सेना के मनोबल पर चोट की, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत के विरोधियों को एक मुद्दा थमा दिया। लोकसभा के पटल पर खड़े होकर उन्होंने अत्यंत गैर-संसदीय भाषा में कहा था कि "युवा नरेंद्र मोदी को डंडे से पीटेंगे।" एक लोकतांत्रिक संसद के भीतर ऐसी हिंसक और अमर्यादित भाषा का प्रयोग स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास के काले पन्नों में दर्ज है।

राहुल गांधी की यह अलोकतांत्रिक और हठधर्मी मानसिकता केवल विपक्ष में रहते हुए ही नहीं दिखाई दी, बल्कि 2004 से 2014 के यूपीए शासनकाल के दौरान भी उनका आचरण हमेशा विवादों और संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन के घेरे में रहा। भारतीय संसदीय इतिहास का वह काला दिन कोई नहीं भूल सकता, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह विदेश दौरे पर थे और उनकी कैबिनेट द्वारा सर्वसम्मति से पारित एक अध्यादेश को राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सरेआम फाड़कर रद्दी की टोकरी में फेंक दिया था। यह कृत्य न केवल अपनी ही सरकार के प्रधानमंत्री और कैबिनेट का अपमान था, बल्कि देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं के मुंह पर एक करारा तमाचा था।

4. 2014 का युगांतकारी परिवर्तन और कांग्रेस की हताशा :-

2004 से 2014 तक का वह दशक भारतीय इतिहास में अभूतपूर्व भ्रष्टाचार (2G, कोयला, कॉमनवेल्थ घोटाला), भाई-भतीजावाद, नीतिगत पंगुता, चरमपंथी तुष्टिकरण और बहुसंख्यक समाज के प्रति उपेक्षा के लिए जाना जाता है। इसी जन-आक्रोश के परिणामस्वरूप वर्ष 2014 में देश की जनता ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड और पूर्ण बहुमत देकर सत्ता की चाबी सौंपी।

यह भारतीय राजनीति में एक युगांतकारी परिवर्तन था। भाजपा ने 30 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद देश में एक पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई—एक ऐसा कीर्तिमान जो स्वयं कांग्रेस पार्टी 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति की प्रचंड लहर के बाद कभी अपने दम पर हासिल नहीं कर पाई थी।

यह सच है कि कोई भी सरकार शत-प्रतिशत जन-अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकती, और भाजपा सरकार की भी अपनी सीमाएं रही होंगी, परंतु उसने देश की जनता को निराश नहीं किया। यही कारण है कि देश के राजनैतिक मानचित्र पर भाजपा का निरंतर विस्तार हो रहा है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ कभी भाजपा का वजूद न के बराबर था, वहाँ भाजपा का एक सशक्त विकल्प के रूप में उभरना और दशकों तक शासन करने वाली कांग्रेस का पूरी तरह से समाप्त हो जाना इसका सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण है।

अब परिस्थितियां ऐसी हो चुकी हैं कि कांग्रेस अपने बलबूते पर केंद्र की सत्ता में वापसी कर पाए, इसकी दूर-दूर तक कोई संभावना नजर नहीं आती। इसी ऐतिहासिक विफलता, पराजय और हाशिए पर चले जाने के कारण राहुल गांधी गहरे अवसाद, हताशा और निराशा से घिर चुके हैं। हालांकि, कांग्रेस को इस दयनीय स्थिति में पहुंचाने के लिए स्वयं उनकी नीतियां और अपरिपक्व नेतृत्व ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। राहुल गांधी को लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गगनचुंबी लोकप्रियता को वे गाली देकर, कीचड़ उछालकर या अभद्र भाषा का प्रयोग करके कम कर सकते हैं, तो यह उनकी भारी राजनीतिक भूल और गलतफहमी है। भारत की समझदार और जागरूक जनता इस प्रकार की मूर्खतापूर्ण और अमर्यादित भाषा को कभी स्वीकार नहीं करती, बल्कि इससे पीड़ित नेता के प्रति सहानुभूति और लोकप्रियता और अधिक बढ़ जाती है।

5. राजनैतिक हैसियत और तुष्टिकरण की शरणस्थली :-

अपनी इसी अहंकार और अपरिपक्वता की राजनीति के कारण राहुल गांधी को अपनी पारंपरिक पारिवारिक सीट अमेठी तक गंवानी पड़ी। विडंबना देखिए कि उन्हें अपनी वास्तविक राजनीतिक हैसियत और मोदी लहर की ताकत का अंदाजा तब भी नहीं हुआ। उत्तर भारत से पूरी तरह नकार दिए जाने के बाद, उन्हें संसद पहुंचने के लिए देश के सुदूर दक्षिण में केरल की मुस्लिम बहुल सीट वायनाड का रुख करना पड़ा। वे वायनाड से लोकसभा केवल इसलिए पहुंच सके क्योंकि वहाँ 'मुस्लिम लीग' और उसके कैडर का उन्हें एकतरफा और पूर्ण समर्थन प्राप्त था। एक राष्ट्रीय दल के शीर्ष नेता का संसद पहुंचने के लिए क्षेत्रीय और सांप्रदायिक ताकतों के बैसाखी पर निर्भर होना उनकी राजनीतिक लाचारी को बयां करता है।

इतना ही नहीं, राहुल गांधी की इस ऊलजुलूल और ध्यान भटकाने वाली बयानबाजी के कारण वर्तमान वैश्विक परिदृश्य (ईरान-इजरायल तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका की आर्थिक चुनौतियां) के बीच भारत के समक्ष उत्पन्न होने वाले वास्तविक आर्थिक मुद्दों की गंभीर चर्चा ही गौण हो जाती है। वे देश की आर्थिक प्रणाली को बेचने का बेतुका आरोप लगाते हुए कहते हैं कि "मोदी ने हिंदुस्तान का पूरा आर्थिक सिस्टम अडानी, अंबानी और अमेरिका को सौंप दिया है।"

वे देश के सामने एक कृत्रिम 'आर्थिक तूफान' और मंदी का खौफ पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, और दावा कर रहे हैं कि आने वाले महीनों में पेट्रोल, डीजल और दाल-चावल के दाम इस कदर बढ़ेंगे कि देश एक बड़े झटके से दहल उठेगा। वे हर आर्थिक नीति को क्रोनी कैपिटलिज्म के चश्मे से देखते हैं। हर मंच से वे जीएसटी, नोटबंदी और कोविड लॉकडाउन के पुराने राग अलापते रहते हैं, जिन्हें देश की जनता पहले ही चुनावों के जरिए खारिज कर चुकी है। उनके पास देश के विकास के लिए कोई वैकल्पिक विज़न या ठोस ब्लूप्रिंट नहीं है, बल्कि वही घिसे-पिटे मुद्दे हैं जिन्हें वे अपने प्रायोजित विदेशी दौरों में भी दोहराते हैं, और कई बार तो इस प्रक्रिया में वे अनजाने में देश-विरोधी ताकतों की भाषा बोलते हुए दिखाई देते हैं।

6. विदेशी दौरों का रहस्य और संबित पात्रा का बड़ा खुलासा

जहाँ एक तरफ राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आधिकारिक और रणनीतिक विदेश यात्राओं पर सवाल उठाते हैं, वहीं देश की जनता यह भली-भांति जानती है कि पीएम मोदी की यात्राएं व्यक्तिगत मनोरंजन या पर्यटन के लिए नहीं होतीं। उनकी यात्राओं का उद्देश्य भारत की अर्थव्यवस्था, द्विपक्षीय व्यापार, रक्षा सौदों और वैश्विक मंच पर भारत के भू-राजनीतिक महत्व को बढ़ाना होता है।

इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से एक सनसनीखेज और विस्तृत ब्योरा जारी किया है, कि राहुल गांधी ने अपने पिछले 22 वर्ष के राजनीतिक जीवन में 54 घोषित विदेशी यात्राएं की हैं जिन पर 60 करोड रुपए से भी अधिक का खर्च आया है लेकिन उनकी यह यात्राएं ना तो पार्टी ने फंड की हैं और राहुल गांधी की व्यक्तिगत आय भी इतनी नहीं है। इसका इसका सीधा अर्थ है कि राहुल गांधी की विदेश यात्राएं प्रायोजित होती हैं और इनमें राष्ट्र विरोधी शक्तियों का होना होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। इन यात्राओं में मुख्य रूप से इटली, यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन), यूनाइटेड स्टेट्स (अमेरिका), जर्मनी, वियतनाम, कंबोडिया, सिंगापुर, बहरीन, मालदीव, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) शामिल हैं.

7. आंतरिक कलह और राज्यों के चुनावी समीकरण

यह एक कड़वा सच है कि भारत की समझदार जनता राहुल गांधी को एक गंभीर राजनेता के रूप में स्वीकार नहीं करती और उनके द्वारा उठाए गए किसी भी तथाकथित 'संकट' पर कोई जन-प्रतिक्रिया नहीं होती। स्वयं कांग्रेस पार्टी के भीतर भी एक बहुत बड़ा, अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं का वर्ग उनके इन अपरिपक्व बयानों से असहमत रहता है और खुद को असहज महसूस करता है। परंतु, राहुल गांधी अपने इर्द-गिर्द मौजूद कुछ चाटुकारों और गैर-राजनैतिक सलाहकारों की 'नजदीकी कोठरी' (Coterie) के सहारे हमेशा सुर्खियों में बने रहने का प्रयास करते हैं, जिससे अंततः कांग्रेस पार्टी का ही भारी अहित होता है।

हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। उनकी एकमात्र उल्लेखनीय उपलब्धि केरल में उनके गठबंधन की जीत रही। राजनैतिक पंडितों और केरल के स्थानीय कांग्रेसी नेताओं का आंतरिक रूप से यह मानना है कि केरल में क्रमिक रूप से यूडीएफ और एलडीएफ की सरकारें बदलती रहती हैं। नियमानुसार, यह जीत पिछले चुनाव में ही मिल जानी चाहिए थी।

राजनैतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मत है कि यदि पिछले चुनावों में राहुल गांधी केरल के वायनाड से स्वयं सांसद नहीं होते, तो राज्य में सत्ता-विरोधी लहर का लाभ उठाकर कांग्रेस की सरकार बहुत पहले ही बन गई होती। लेकिन उनके वहां होने से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ा और वामपंथियों को दोबारा आने का मौका मिल गया। अब, जब वे वायनाड सीट छोड़कर उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से सांसद बन गए हैं और वायनाड सीट पर उनकी बहन प्रियंका वाड्रा चुनाव लड़कर संसद पहुँची हैं, तभी जाकर केरल राज्य में कांग्रेस के लिए अपनी खोई हुई जमीन वापस पाना संभव हो सका है। यह साफ दर्शाता है कि राहुल गांधी का चुनावी प्रभाव पार्टी के लिए फायदे की जगह नुकसानदेह साबित हो रहा है।

8. कॉंग्रेस को आत्ममंथन की आवश्यकता

यह स्पष्ट है कि लोकतंत्र के सुचारू संचालन के लिए एक मजबूत, वैचारिक और नीति-आधारित विपक्ष का होना अनिवार्य है। सरकार की गलत नीतियों का विरोध आंकड़ों, तर्कों और संसदीय मर्यादा के भीतर रहकर होना चाहिए। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जैसे गरिमापूर्ण पदों पर बैठे व्यक्तियों को 'गद्दार' कहना या उनके शारीरिक नुकसान को लेकर अमर्यादित टिप्पणियां करना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र का हिस्सा नहीं हो सकता।

यदि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को भारतीय राजनीति के मुख्यधारा में अपनी प्रासंगिकता बचाए रखनी है, तो उन्हें इस नकारात्मकता, व्यक्तिगत द्वेष और आत्मघाती विमर्श की राजनीति का परित्याग करना होगा। गाली-गलौज और विदेशी सरजमीं पर जाकर देश की छवि खराब करने की इस परिपाटी से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता तो कम नहीं होगी, लेकिन देश की जनता के बीच कांग्रेस की बची-खुची साख अवश्य समाप्त हो जाएगी। समय आ गया है कि कांग्रेस अपने इस 'राहु काल' से बाहर निकले और देश के सामने गाली के बदले एक सकारात्मक और रचनात्मक विज़न प्रस्तुत करे।


~~~~~~~~~Shiv Mishra ~~~~~~~~~~

सोमवार, 11 मई 2026

तमिलनाडु की राजनीति में क्या बदला? सनातन पर गहराया बड़ा खतरा !

 


तमिलनाडु की राजनीति में क्या बदला? सनातन पर गहराया बड़ा खतरा !

 

तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) के अध्यक्ष सी. जोसेफ़ विजय ने रविवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। इसके साथ ही राज्य में लगभग छह दशकों से जारी दो प्रमुख द्रविड़ दलों—डीएमके और एआईएडीएमके के बारी-बारी से सत्ता में आने का दौर समाप्त हो गया। मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने मंच पर ही तीन आदेशों पर हस्ताक्षर किए। इन आदेशों में हर घर को 200 यूनिट बिजली मुफ्त करना, नशे की समस्या से निपटने के लिए हर जिले में विशेष बल बनाना और महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक 'स्पेशल टास्क फोर्स' बनाना शामिल है।

आइए जानते हैं सी. जोसेफ़ विजय के राजनीतिक करियर के बारे में कि क्या उन्होंने यह करियर स्वयं चुना या उन्हें राजनीति में लाया गया।

विजय की राजनीतिक पार्टी का नाम 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (टीवीके) है और यह नाम डीएमके और एआईएडीएमके से मिलता-जुलता है। डीएमके का नाम 'द्रविड़ मुनेत्र कड़गम' है और एआईएडीएमके यानी 'अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम'। स्वतंत्रता के बाद लगभग 20 साल तक कांग्रेस की सरकार रही और उसके बाद डीएमके सत्ता में आई। 1977 में तमिल सिनेमा के मशहूर नायक एम.जी. रामचंद्रन ने डीएमके से अलग होकर अपनी नई पार्टी बनाई और उसका नाम एआईएडीएमके रखा। उसके बाद से पिछले लगभग 60 सालों से सत्ता का हस्तांतरण डीएमके और एआईएडीएमके के बीच ही होता रहा है।

'द्रविड़ मुनेत्र कड़गम' के नाम से ऐसा लगता है कि यह कोई स्थानीय पार्टी है जो द्रविड़ भावनाओं को आधार बनाकर रखी गई है, लेकिन ऐसा केवल ऊपरी तौर पर देखने से लगता है। वास्तव में, 1944 में ई.वी. रामास्वामी 'पेरियार' द्वारा जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर 'द्रविड़ कड़गम' रखा गया था, इसलिए पेरियार को इस पार्टी का संस्थापक नहीं कहा जा सकता। जस्टिस पार्टी की स्थापना 1916 में अंग्रेजों के इशारे पर टी.एम. नायर, पी. त्यागराज चेट्टी और सी. नटेसा मुदलियार ने की थी।

अंग्रेजों ने देखा कि उत्तर भारत में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा सनातन धर्म को अत्यधिक नुकसान पहुँचाया जा चुका है, मंदिरों को क्षति पहुँचाई गई है और डरे-सहमे हिंदू मंदिर जाने से घबराते हैं। प्रथम दृष्टया देखने से ऐसा लगता है कि शायद हिंदुत्व की धार कुंद हो गई है; इसके विपरीत दक्षिण भारत, और खासतौर से तमिलनाडु में, हिंदुत्व की प्रबल धारा बह रही थी। सनातन का तत्कालीन महत्वपूर्ण केंद्र तमिलनाडु ही था। पूरे प्रदेश में मंदिरों की अत्यधिक संख्या थी, जिनमें धर्म-कर्म के अलावा संस्कृत और सनातनी गतिविधियाँ होती थीं। ये मंदिर संगीत, नृत्य तथा अन्य शिल्पों के केंद्र बने हुए थे और सही अर्थ में देखा जाए तो ये भारत की अर्थव्यवस्था की धुरी थे।

आपको ज्ञात होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा भारत की जीडीपी पर करवाए गए शोध से पता चला कि पहली शताब्दी से लेकर 11वीं शताब्दी तक भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में सबसे बड़ी थी और उसका हिस्सा एक-तिहाई था। 17वीं शताब्दी तक भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में नंबर एक बनी रही और इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण 'मंदिर आधारित अर्थव्यवस्था' थी। अंग्रेजों के शासनकाल में यह लगातार गिरती रही और जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा, उस समय भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में केवल 3% के आसपास बची थी।

अंग्रेज चाहते थे कि जो काम मुस्लिम आक्रांताओं ने उत्तर, पूर्व और पश्चिम भारत में किया, वैसा ही कुछ दक्षिण भारत में भी किया जाए ताकि हिंदुत्व को नुकसान पहुँचाया जा सके और मिशनरियों को धर्मांतरण के लिए अच्छा सुअवसर उपलब्ध हो सके। उनके अनुसार वर्तमान व्यवस्था 'ब्राह्मणवादी' थी जो उनके मार्ग में बाधक थी, इसलिए उससे छुटकारा पाने के लिए एक पार्टी की आवश्यकता थी जिसका नाम 'जस्टिस पार्टी' रखा गया। घोषित तौर पर इसका उद्देश्य गैर-ब्राह्मणों के लिए शिक्षा, नौकरियों और राजनीति में उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना था, ताकि 'ब्राह्मण मुक्त' या 'ब्राह्मण विरोधी' हिंदू समाज में धर्मांतरण का काम आसानी से हो सके।

1919 के 'मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों' के बाद 1920 के पहले चुनावों में जस्टिस पार्टी ने भारी जीत हासिल की और मद्रास प्रेसीडेंसी में सरकार बनाई। इस सरकार के बनते ही पूरे मद्रास प्रेसीडेंसी में जातिगत विभेद की भयानकता बढ़ गई और ब्राह्मणों के विरुद्ध उग्र आंदोलन शुरू हो गए। इस प्रकार विभाजित हिंदू समुदाय में मिशनरियों ने अपनी जड़ें जमाईं और धर्मांतरण का काम धड़ल्ले से शुरू हो गया। चूँकि धर्मांतरण के कार्य में ब्राह्मण बड़ी रुकावट थे, इसलिए हिंदुओं में जातिगत खाई चौड़ी करने के लिए गैर-ब्राह्मणों हेतु आरक्षण की शुरुआत की गई। साथ ही, सनातन धर्म का अपमान करने के लिए देवी-देवताओं को गालियाँ देने से लेकर भ्रामक साहित्य तैयार करने का काम सरकारी संरक्षण में होने लगा।

1921 और 1922 में 'सांप्रदायिक सरकारी आदेश' पारित किए गए, जिससे नौकरियों में आरक्षण की नींव पड़ी और सामाजिक अव्यवस्था शुरू हो गई। हिंदू समाज में मंदिरों के प्रभाव को कम करने और गैर-ब्राह्मणों को मंदिरों से दूर ले जाने के लिए, मंदिर प्रशासन में सुधार के नाम पर 'हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम' (1926) पारित किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य सनातन चेतना की धुरी रहे मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित करना था, ताकि समाज सेवा से जुड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास प्रवाह को रोका जा सके।

इससे हिंदू समाज में जाति-पाति की खाई इतनी चौड़ी हो गई कि पूरा समाज विभाजित हो गया, जिसकी भरपाई आज तक नहीं हो पाई है और तमिलनाडु आज भी इससे बुरी तरह संकटग्रस्त है। 1930 के दशक के मध्य तक जस्टिस पार्टी की लोकप्रियता कम होने लगी। 1937 के चुनावों में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने जस्टिस पार्टी को बुरी तरह हरा दिया। 1944 में ई.वी. रामास्वामी 'पेरियार' ने जस्टिस पार्टी की कमान संभाली और इसका नाम बदलकर 'द्रविड़ कड़गम' (डीके) कर दिया।

अंग्रेजों के इशारे पर पेरियार ने अपनी पार्टी को सामाजिक सुधार आंदोलन के नाम पर सनातन धर्म के विरुद्ध विष-वमन करते हुए हिंदू समाज को टुकड़ों-टुकड़ों में बाँटने की नीति पर अमल शुरू कर दिया। वास्तव में इस सब की आड़ में ईसाई मिशनरी तेजी से धर्मांतरण कर रहे थे और किसी को इसकी भनक भी नहीं लग रही थी, क्योंकि हिंदू अपने जातिगत झगड़ों में ही उलझे हुए थे।

आजादी के बाद यद्यपि कांग्रेस सत्ता में आ गई, लेकिन उसने भी हिंदू समाज में हो रहे इस षड्यंत्र के प्रति आँखें बंद कर लीं और 20 साल तक शासन किया। इस दौरान मिशनरी बिना रोक-टोक के चुपचाप धर्मांतरण का काम करते रहे। बाद में मुस्लिम कट्टरपंथी भी इसी कार्य में लग गए। 1967 में सी.एन. अन्नादुरई के नेतृत्व में डीएमके ने पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई। उनके बाद एम. करुणानिधि ने कमान संभाली। ब्राह्मण विरोध के नाम पर सनातन धर्म का विरोध करना इस पार्टी को विरासत में मिला था और करुणानिधि ने इस काम को बखूबी अंजाम दिया।

इसके बाद एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) ने डीएमके से अलग होकर एआईएडीएमके बनाई और 1977 में मुख्यमंत्री बने। 1987 में उनके निधन तक वे सत्ता में रहे। इसके बाद से राज्य में सत्ता हर पांच साल में डीएमके और एआईएडीएमके के बीच बदलती रही। दोनों ही पार्टियों में जस्टिस पार्टी के सनातन विरोधी दुर्गुण मौजूद थे। कालांतर में डीएमके स्वयं को प्रखर हिंदू विरोधी सिद्ध करती रही, जबकि एआईएडीएमके ने थोड़ा लचीला रुख अपनाया। दोनों पार्टियाँ राष्ट्रीय स्तर पर उपस्थिति दर्ज करने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन करती रहीं और दक्षिणपंथी जनसंघ या भाजपा से उचित दूरी बनाए रखी।

केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद दक्षिण में उसकी स्वीकार्यता कुछ हद तक बढ़ी और तमिलनाडु की दोनों पार्टियों ने कभी न कभी भाजपा की केंद्र सरकार को समर्थन दिया। डीएमके की कार्यप्रणाली में बदलाव यह आया कि उन्होंने मुस्लिम कट्टरपंथियों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। स्टालिन के सत्ता में आने के बाद स्वयं स्टालिन और उनके पुत्र उदयनिधि सनातन धर्म के विरुद्ध विष-वमन करते रहे और उसे डेंगू, मलेरिया, कोरोना जैसी महामारी बताने से गुरेज नहीं किया। हाल ही में स्टालिन सरकार ने एक मंदिर में 'दीपथून' यानी दीप प्रज्वलन की परंपरा को बंद कर दिया। उच्च न्यायालय के निर्देश के बावजूद उन्होंने इसका पालन नहीं किया और सुप्रीम कोर्ट तक गए, लेकिन दीप प्रज्वलन नहीं होने दिया। इस प्रकार उन्होंने स्वयं को सनातन विरोधी सिद्ध कर दिया, जिससे हिंदू संगठन सतर्क और सक्रिय हो गए।

ऐसा करते समय अनजाने में डीएमके ने ईसाई मिशनरियों को भी नाराज कर दिया, जो पहले ही डीएमके की 'प्रो-मुस्लिम' नीतियों से रुष्ट थे। मिशनरी धर्मांतरण का काम बहुत शांति से करते हैं ताकि बहुसंख्यक समाज इसके विरुद्ध आंदोलित न हो। स्टालिन और उदयनिधि की हरकतों से हिंदू समाज में जो हलचल हुई, उससे मिशनरियों के काम में व्यवधान उत्पन्न हुआ। मिशनरी अब डीएमके को और बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थे, इसलिए उनके इशारे पर विजय ने 2 फरवरी 2024 को 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (टीवीके) के गठन की घोषणा की।

विजय ने अपनी पार्टी की विचारधारा को "धर्मनिरपेक्ष सामाजिक न्याय" बताया है। उन्होंने पेरियार, बी.आर. अंबेडकर और के. कामराज को अपना प्रेरणा स्रोत बताया। ईसाई मिशनरियों ने उनका जमकर साथ दिया और कहा जाता है कि उन्हें विदेशी सहायता भी प्राप्त हुई। 2026 के चुनावों में कांग्रेस और राहुल गांधी विजय के साथ गठबंधन करना चाहते थे, लेकिन सोनिया गांधी अपनी नीति पर चलते हुए डीएमके के साथ डटी रहीं।

लेकिन बाजी पलट गई। विजय की पार्टी टीवीके को 108 सीटें मिलीं। 234 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 117 विधायकों की आवश्यकता थी। विजय ने राज्यपाल से मिलकर दावा पेश किया। जब समर्थन की समस्या आई, तो मिशनरियों के निर्देश पर सोनिया गांधी ने (जो पहले गठबंधन नहीं चाहती थीं) विजय को समर्थन देने की घोषणा करवा दी। हालांकि, संख्या बल के अभाव में शुरुआत में राज्यपाल ने निमंत्रण देने से इनकार कर दिया। कांग्रेस के इस कदम को स्टालिन ने 'पीठ में छुरा घोंपना' बताया।

अंततः मिशनरियों ने स्टालिन को समझाया कि यदि भाजपा सरकार ने राष्ट्रपति शासन लगाया, तो सनातन के विरुद्ध टिप्पणियों और न्यायालय की अवमानना के मामले में उनका जेल जाना निश्चित है। घबराकर स्टालिन ने अपने सहयोगियों (सीपीएम, सीपीआई, मुस्लिम लीग और वीसीके) को विजय के समर्थन के लिए राजी किया। इस प्रकार तमाम मोल-भाव के बाद विजय के पास 121 विधायकों का समर्थन हो गया और जोसेफ़ विजय तमिलनाडु के पहले ईसाई मुख्यमंत्री बन गए।

अब ईसाई मिशनरी अपना काम खुलकर कर सकेंगे, जैसा उन्होंने आंध्र प्रदेश में रेड्डी परिवार के कार्यकाल में किया था। एक विशेष बात जो मिशनरियों को अलग करती है, वह यह है कि वे 'लव जिहाद' के बजाय ईसाई लड़कियों को हिंदू परिवारों में बहू बनाकर भेजते हैं और बाद में पूरे परिवार का धर्मांतरण करा लेते हैं। इसके कई राजनीतिक उदाहरण जैसे रेड्डी परिवार, सोनिया गांधी का आगमन, और अन्य चर्चित विवाहों में देखे जा सकते हैं।

इससे स्पष्ट है कि राजनीति केवल सत्ता पाने का खेल नहीं है, इसका प्रभाव अत्यंत व्यापक होता है। इसलिए हमेशा सोते रहने वाले हिंदुओं को सावधान हो जाना चाहिए। सनातन गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है और यह असावधानी इसकी उद्गम भूमि पर ही इसके विलुप्त होने का कारण बन सकती है।

साप्ताहिक विशेष लेख :- बाल-बाल बचा पश्चिम बंगाल

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