शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

धरती से आसमान तक नफरत का साया: दुबई-इजराइल उड़ान की घटना


 
धरती से आसमान तक नफरत का साया: दुबई-इजराइल उड़ान की घटना और सभ्यतागत चुनौतियां
                                                          — शिव प्रकाश मिश्रा

 

आसमान को मानव सभ्यता ने सदा से भौगोलिक सीमाओं और संकीर्ण दीवारों से परे एक ऐसी दुनिया के रूप में देखा है, जहाँ देशों के बीच की दूरियां सिमट जाती हैं। जब सैकड़ों टन वजनी कोई विमान बादलों को चीरता हुआ उड़ान भरता है, तो उसमें सवार विभिन्न राष्ट्रीयताओं, संस्कृतियों, धर्मों और भाषाओं के लोग एक साझी पहचान में बंध जाते हैं— ‘सहयात्री’ होने की पहचान। उनकी एक ही सामूहिक अपेक्षा होती है: अपनी मंजिल तक सुरक्षित पहुँचना।  

 

परंतु ३० सितंबर २०२६ को दुबई से तेल अवीव जा रही ‘फ्लाईदुबई’ की उड़ान एफजेड-१०७३ के चालक-कक्ष (कॉकपिट) में जो कुछ घटा, उसने न केवल वैश्विक विमानन सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ को हिला दिया, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि धार्मिक उन्माद और वैचारिक विषवल्ली अब धरती की संकीर्ण गलियों से निकलकर ३३ हज़ार फीट ऊँचे खुले आसमान में भी मानव सभ्यता का पीछा कर रही है।

 

रोंगटे खड़े कर देने वाले पल: हवा में मौत से मुकाबला
विमान में १७४ से अधिक यात्री सवार थे, जिनमें अधिकांश इजराइली नागरिक थे। जब विमान ३३ 
हज़ार फीट की ऊँचाई पर संतुलन बनाए हुए था, तभी चालक-कक्ष के भीतर एक भयावह षड्यंत्र का पर्दाफाश हुआ। ओमान मूल के सह-चालक ने अचानक मुख्य कप्तान—भारतीय नागरिक स्मित मच्छार—पर धारदार चाकू से प्राणघातक हमला बोल दिया।

 

हमलावर सह-चालक का मंसूबा अत्यंत स्पष्ट था—ग्यारह सितंबर (नाइन-इलेवन) की तर्ज पर मुख्य विमानचालक को मारकर विमान का नियंत्रण अपने हाथ में लेना और उसे सामूहिक कब्रगाह में तब्दील कर देना। चालक-कक्ष के भीतर शुरू हुए इस खूनी संघर्ष के कारण अनियंत्रित हुआ विमान मात्र २९ सेकंड के भीतर लगभग १४,००० फीट नीचे आ गिरा। शून्य वायुदाब, तेजी से घटती ऊँचाई और शरीर से बहते खून के बीच यदि नियंत्रण-कक्ष में कोई दुर्बल मनोबल वाला व्यक्ति होता, तो परिणाम सैकड़ों चिताओं के रूप में सामने आता।

 

परंतु लहूलुहान और असहनीय पीड़ा से जूझते हुए भी भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार ने अदम्य साहस, संयम और अद्वितीय जीवटता का परिचय दिया। उन्होंने हमलावर का डटकर मुकाबला किया और अत्यंत विषम परिस्थितियों में चालक-कक्ष का सुरक्षित द्वार खोलने में सफलता पाई। द्वार खुलते ही विमान परिचारक दल और यात्रा कर रहे अन्य प्रशिक्षित चालक तुरंत सहायता के लिए अंदर दौड़े। हमलावर को काबू कर लिया गया और अंततः विमान को सऊदी अरब के तबुक हवाई अड्डे पर आपातकालीन परिस्थितियों में सुरक्षित उतार लिया गया। कैप्टन मच्छार की सूझबूझ और अदम्य कर्तव्यनिष्ठा ने लगभग एक सौ अस्सी निर्दोष जिंदगियों को मौत के जबड़े से खींच निकाला।

 

अंदरूनी खतरा और कूटनीतिक सुरक्षा चूक
पारंपरिक विमानन सुरक्षा का संपूर्ण ढांचा अब तक बाहरी खतरों पर केंद्रित रहा है—यात्रियों की तलाशी, सामान की छायाचित्र (एक्स-रे) जांच, धातु संसूचक (मेटल डिटेक्टर) और यात्री दीर्घा में हथियारों के प्रवेश को रोकना। किंतु इस घटना ने सुरक्षा तंत्र के सामने एक नया और अधिक खतरनाक रूप प्रस्तुत किया है—‘इनसाइडर थ्रेट’ यानी तंत्र के भीतर बैठे भेदी का खतरा। जब वह व्यक्ति ही विध्वंसक बन जाए जिसके हाथों में विमान का संचालन और सैकड़ों यात्रियों के जीवन की बागडोर सौंपी गई हो, तो धरती के सारे सुरक्षा उपकरण निरर्थक सिद्ध हो जाते हैं।

 

यह घटना केवल एक आपराधिक कृत्य नहीं, अपितु अंतरराष्ट्रीय उड्डयन नियमों और कूटनीतिक कार्यप्रणाली की एक अक्षम्य विफलता भी है:

 

 - सुरक्षा मंजूरी (क्लीयरेंस) पर प्रश्न: स्थापित नियमों और द्विपक्षीय संवेदनशीलता के अनुसार, इजराइल जाने वाले संवेदनशील मार्गों पर उन देशों के चालक दल के सदस्यों की तैनाती वर्जित या अत्यधिक नियंत्रित होनी चाहिए जिनके इजराइल के साथ सामान्य राजनयिक संबंध नहीं हैं।


 

-  प्रशासनिक शिथिलता: ओमान और इजराइल के बीच संबंधों की स्थिति जगजाहिर है। ऐसे में एक ओमानी नागरिक को तेल अवीव जाने वाले विमान में सह-चालक के रूप में नियुक्त किया जाना यह दर्शाता है कि व्यावसायिक विमान सेवा कंपनियों में पृष्ठभूमि सत्यापन (वेटिंग) की प्रक्रिया कितनी ढीली और सतही हो चुकी है।


पश्चिम एशिया की भू-राजनीति और वैचारिक कट्टरपंथ की जड़ें

दुबई-तेल अवीव उड़ान का अस्तित्व २०२० के ऐतिहासिक ‘अब्राहम समझौते’ की देन है, जिसने इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात के मध्य कूटनीतिक, व्यापारिक और पर्यटन के नए द्वार खोले थे। परंतु यह उड़ान जिस भौगोलिक आकाश से गुजरती है, वह नीचे गाजा संघर्ष, हमास के आतंकी हमलों, ईरान-इजराइल तनाव और फिलिस्तीन के अनसुलझे प्रश्नों से सुलग रहा है।


प्रारंभिक जांच और इजराइली नेतृत्व के बयानों से यह स्पष्ट हुआ है कि हमलावर सह-चालक गहन कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा से ग्रसित था। जब कोई विचारधारा अपने अनुयायियों के मन में यह जहर घोल देती है कि दूसरे विचार, धर्म या नस्ल के लोगों का संहार करना कोई पुण्य-कार्य या पवित्र कर्तव्य है, तब मानवीय संवेदना और पेशेवर निष्ठा समाप्त हो जाती है।


सुलगता परिदृश्य और सभ्यताओं का संघर्ष

७ अक्टूबर २०२३ को हमास द्वारा इजराइल पर किए गए नृशंस आतंकी हमले, नरसंहार और बंधक संकट के बाद से संपूर्ण मध्य पूर्व निरंतर युद्ध की ज्वाला में झुलस रहा है। गाजा, लेबनान, यमन और ईरान से जुड़े संघर्षों ने वैचारिक और धार्मिक ध्रुवीकरण को चरम पर पहुँचा दिया है। सोशल मीडिया और भूमिगत नेटवर्क के माध्यम से चलाए जा रहे विमर्श में कई बार आतंकवाद और नागरिक हत्याओं को वैचारिक आवरण पहनाकर सही ठहराने का कुत्सित प्रयास किया जाता है।


जब कोई विचारधारा अपने अनुयायियों को यह पाठ पढ़ाने लगती है कि किसी विशेष धर्म, जाति या नस्ल के लोगों का जीवन मूल्यहीन है, तब मानव मस्तिष्क से करुणा का लोप हो जाता है। इतिहास साक्षी है कि इसी मतांधता और असहिष्णुता के चलते दुनिया की कई समृद्ध प्राचीन संस्कृतियों और स्वतंत्र चिंतन का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया। आज यहूदी समाज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, तो दूसरी ओर भारत जैसी प्राचीन बहुलवादी सभ्यता भी सीमा पार से प्रायोजित धार्मिक जिहाद, कट्टरपंथ और जनसांख्यिकीय बदलाव की चुनौतियों से जूझती रही है। कट्टरपंथी तत्वों की दृष्टि में सभ्य, लोकतांत्रिक और मानवीय समाज हमेशा निशाने पर रहते हैं।


वैश्विक सभ्यताओं पर संकट: यहूदी और सनातन परंपरा के साझा सबक

मानव इतिहास की प्राचीनतम जीवंत संस्कृतियों में यहूदी और हिंदू (सनातन) परंपराएं अग्रणी रही हैं। विडंबना यह है कि इतिहास के विभिन्न कालखंडों में ये दोनों ही सभ्यताएं एकतरफा वैचारिक असहिष्णुता, मजहबी विस्तारवाद और नरसंहारों की शिकार रही हैं।


जहाँ इजराइल अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए चौतरफा चुनौतियों के बीच अडिग खड़ा है, वहीं भारत ने भी सदियों से बाहरी आक्रांताओं, धर्मांतरण के षड्यंत्रों, विभाजन की विभीषिका और सीमा-पार से संचालित छद्म युद्धों (जैसे 'गजवा-ए-हिंद' की परिकल्पना) का दंश झेला है।


भारत की आंतरिक राजनीति में अक्सर तुष्टिकरण और वोट-बैंक की विवशताएं इस खतरे की गंभीरता को धुंधला कर देती हैं। पश्चिमी एशिया की इस घटना ने भारत के नीति-निर्माताओं और समाज को स्पष्ट चेतावनी दी है कि वैचारिक कट्टरपंथ किसी सीमा या पेशे का संकोच नहीं करता; यदि समय रहते इसकी पहचान न की जाए, तो यह समाज के ताने-बाने को भीतर से खोखला कर देता है।


भारतीय पेशेवरता, धैर्य और सर्वोच्च मानवीय मूल्य

इस पूरे घटनाक्रम में कैप्टन स्मित मच्छार की भूमिका भारत के लिए केवल क्षणिक राष्ट्रीय गौरव का विषय नहीं है, बल्कि यह विदेशों में कार्यरत लाखों भारतीय पेशेवरों की कार्यसंस्कृति, नैतिक निष्ठा और मानसिक सुदृढ़ता का एक स्वर्णिम प्रमाण है।


चाहे चिकित्सा का क्षेत्र हो, सूचना प्रौद्योगिकी हो या अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन—भारतीय प्रतिभाएं संकट के समय अपने धैर्य, पेशेवर प्रशिक्षण और मानवीय मूल्यों के लिए जानी जाती हैं। जब चालक-कक्ष में स्वयं की साँसें उखड़ रही थीं, तब भी कैप्टन मच्छार ने 'यात्री रक्षा' को अपने जीवन से ऊपर रखा। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजराइल के नेतृत्व द्वारा उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस भारतीय जीवन-दृष्टि का सम्मान है जो 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और 'परोपकाराय सतां विभूतयः' के आदर्शों पर पोषित होती है।


भारत के लिए बहुआयामी सबक: आंतरिक सतर्कता और विदेश नीति

भारत के लिए इस घटना के निहितार्थ गहरे और दूरगामी हैं:


- प्रवासियों की सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन: खाड़ी देशों में ९० लाख से अधिक भारतीय पेशेवर और कामगार कार्यरत हैं। पश्चिम एशिया की स्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए अपरिहार्य है। भारत के इजराइल के साथ रणनीतिक व तकनीकी संबंध हैं, तो अरब देशों के साथ ऐतिहासिक व आर्थिक साझेदारी। इस जटिल संतुलन के बीच विदेश में काम करने वाले भारतीयों की सुरक्षा और उनकी प्रतिष्ठा की रक्षा सर्वोपरि है।


- संवेदनशील बुनियादी ढाँचे में गहन निगरानी: भारत को अपने घरेलू नागरिक उड्डयन, परमाणु प्रतिष्ठानों, रेलवे और सामरिक नेटवर्क में 'आंतरिक घुसपैठ' के खतरे को हल्के में नहीं लेना चाहिए। केवल तकनीकी पृष्ठभूमि ही नहीं, बल्कि किसी भी तरह के कट्टरपंथी प्रभाव की समय-समय पर पहचान की व्यवस्था सुदृढ़ करनी होगी।


- तुष्टिकरण बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा: जब सुरक्षा और कानून के अनुपालन में किसी संप्रदाय या वर्ग के तुष्टिकरण की नीति अपनाई जाती है, तो राज्य की संप्रभुता और नागरिकों का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है। कानून का समान और कठोर अनुप्रयोग ही उग्रवाद की काट है।


भविष्य की सुरक्षा रणनीति - 

भारत को इस घटना को केवल विदेशी सरजमीं या पराये आकाश का वाकया मानकर भुला नहीं देना चाहिए। भारत स्वयं एक विशाल, विविध और संवेदनशील भू-भाग है। भारत के हित पश्चिम एशिया की स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और वहाँ रहने वाले करोड़ों प्रवासी भारतीयों से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं।


इस घटना से मिलने वाले रणनीतिक सबक स्पष्ट हैं:


सतत मनोवैज्ञानिक एवं सुरक्षा जांच: संवेदनशील पदों—जैसे विमान चालक, वायु यातायात नियंत्रक (एटीसी), परमाणु और रक्षा प्रतिष्ठानों के अभियंताओं की पृष्ठभूमि जांच केवल नियुक्ति के समय न हो, बल्कि उनकी कार्यप्रणाली और डिजिटल व्यवहार का समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए।

साइबर व वैचारिक कट्टरपंथ (रेडिकलाइजेशन) पर नियंत्रण: ऑनलाइन कट्टरपंथ की रोकथाम के लिए खुफिया तंत्र को तकनीकी रूप से और अधिक चुस्त बनाना होगा ताकि मस्तिष्कों में बोए जा रहे वैचारिक विष की समय रहते पहचान हो सके।

सभ्यतागत सतर्कता: किसी भी समुदाय के प्रति अंध-संदेह किए बिना, कानून का कठोर और समान अनुप्रयोग सुनिश्चित करना होगा ताकि धर्म या मजहब की आड़ में राष्ट्रविरोधी या विध्वंसक तत्वों को कोई राजनीतिक संरक्षण न मिल सके।


मानवता की रक्षा का संकल्प

आधुनिक रडार, उपग्रह दिशा-सूचक (जीपीएस) प्रणालियां और स्वतः चालन (ऑटो-पायलट) तकनीकें कितनी भी परिष्कृत क्यों न हो जाएं, अंततः किसी भी व्यवस्था की सुरक्षा उसके संचालक के मस्तिष्क और नीयत पर निर्भर करती है। यदि मन में नफरत का बारूद भरा हो, तो सबसे उन्नत तकनीक भी विनाश का अस्त्र बन जाती है।


दुबई-इजराइल उड़ान की इस घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर कर यह संदेश दिया है कि वैचारिक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल सीमाओं पर तोपों और बंदूकों से नहीं लड़ी जा सकती। इसके लिए विवेक, सतर्कता, कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल और कैप्टन स्मित मच्छार जैसे अदम्य मानवीय साहस की आवश्यकता है। कट्टरपंथ रूपी इस नासूर का समूल उन्मूलन किए बिना न तो हमारी धरती सुरक्षित रह सकती है और न ही वह खुला आसमान, जो समस्त मानवता को एक सूत्र में पिरोने का सपना देखता है।

                     ~~~~~~~~~~~~  शिव मिश्रा ~~~~

बुधवार, 23 सितंबर 2026

पितृ पक्ष 2026 - एक दृष्टि:

 पितृ पक्ष 2026 - एक दृष्टि:  

एक पीढ़ी का दूसरी पीढ़ी से संवाद 

- शिव मिश्रा

सनातन परंपरा में पितृ पक्ष पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण काल है। "श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्" अर्थात् जो पूर्ण श्रद्धा से दिया जाए, वही श्राद्ध है। भागती हुई इस दुनिया में पितृ पक्ष हमें कुछ दिनों के लिए ठहरकर उन लोगों को याद करने का अवसर देता है, जिनके त्याग और संघर्षों से हमारा वर्तमान निर्मित हुआ है। तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान की परंपराओं के पीछे केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि स्मृति, कृतज्ञता, परिवार और आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी का गहरा मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक भाव भी छिपा है।

क्या है पितृ पक्ष?  

भारतीय पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक के सोलह दिनों के समय को पितृ पक्ष या महालय कहा जाता है। इन सोलह दिनों में चंद्रमा क्षीण होता है (कृष्ण पक्ष), और मान्यता है कि इस अवधि में पूर्वज सूक्ष्म रूप में पृथ्वी पर अपने परिजनों के पास आते हैं। पितृ पक्ष उन भूली-बिसरी कहानियों और पारिवारिक जड़ों को फिर से सींचने का भारतीय तरीका है।

वर्ष 2026 में प्रचलित उत्तर भारतीय पंचांग के अनुसार, पितृ पक्ष का मुख्य क्रम 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक रहेगा, जबकि 26 सितंबर को पूर्णिमा का श्राद्ध संपन्न होगा। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इस पावन पखवाड़े का समापन होगा।

क्यों मनाया जाता है?

सनातन दर्शन में मनुष्य पर जन्म के साथ ही तीन मुख्य ऋण माने गए हैं—देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। पितृ ऋण से उऋण होने के लिए ही श्राद्ध और तर्पण का विधान है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा पितृ लोक में निवास करती है। पितृ पक्ष के दौरान उन्हें मुक्त किया जाता है ताकि वे अपने वंशजों द्वारा श्रद्धापूर्वक अर्पित किए गए अन्न और जल को ग्रहण कर सकें। इस तर्पण से उन्हें तृप्ति मिलती है, और वे प्रसन्न होकर अपने परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

कैसे किया जाता है श्राद्ध कर्म?

श्राद्ध कर्म की प्रक्रिया अत्यंत सूक्ष्म और सात्विक होती है। इसके मुख्य अंग इस प्रकार हैं: 

तर्पण: कुशा, काले तिल और जल से पूर्वजों को तृप्त करना तर्पण कहलाता है।
पिंडदान: पके हुए चावल, जौ के आटे, गाय के दूध, घी, शहद और तिल को मिलाकर बनाए गए 'पिंड' पूर्वजों के निमित्त अर्पित किए जाते हैं।
पंचबलि: ब्राह्मणों को भोजन कराने से पूर्व श्राद्ध के अन्न में से पांच हिस्से निकाले जाते हैं—गाय के लिए (गो बलि), कुत्ते के लिए (श्वान बलि), कौवे के लिए (काक बलि), चींटियों के लिए (पिपीलिका बलि) और देवताओं के लिए (देवादि बलि)। यह प्रकृति के सभी जीवों के प्रति सह-अस्तित्व और कृतज्ञता का प्रतीक है।
ब्राह्मण भोज: योग्य और सात्विक ब्राह्मणों को आदरपूर्वक भोजन कराकर सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा व वस्त्र दान किए जाते हैं।
नियम और संयम: इन दिनों में तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज आदि) का पूर्णतः त्याग किया जाता है। क्षौर कर्म (बाल और नाखून काटना) तथा कोई भी नया मांगलिक कार्य (जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश) इस दौरान वर्जित माना जाता है।

धार्मिक महत्व

गरुड़ पुराण, अग्नि पुराण और वायु पुराण जैसे धर्म ग्रंथों में पितृ पक्ष की महिमा का व्यापक वर्णन है। ग्रंथों के अनुसार, जो व्यक्ति विधि-विधान से श्राद्ध करता है, उसके पितृ तृप्त होकर उसे आयु, संतति, यश, स्वर्ग, कीर्ति, बल, सुख और धन-धान्य का आशीर्वाद देते हैं। पितरों के असंतुष्ट रहने पर परिवार को पितृ दोष का सामना करना पड़ सकता है, जिससे जीवन में कई प्रकार की अकारण बाधाएं उत्पन्न होती हैं।

इतिहास और पौराणिक कथा

पितृ पक्ष की उत्पत्ति के संदर्भ में महाभारत काल की एक अत्यंत प्रसिद्ध कथा प्रासंगिक है। दानवीर कर्ण ने अपने पूरे जीवन में स्वर्ण, आभूषण और अपार धन का दान किया था, परंतु उन्होंने कभी अपने पूर्वजों के निमित्त अन्न या जल का दान नहीं किया। महाभारत युद्ध में वीरगति प्राप्त करने के पश्चात जब कर्ण स्वर्ग पहुंचे, तो उन्हें क्षुधा शांत करने के लिए भोजन के रूप में स्वर्ण और आभूषण ही परोसे गए। जब कर्ण ने देवराज इंद्र से इसका कारण पूछा, तो इंद्र ने बताया कि उन्होंने आजीवन केवल भौतिक वस्तुओं का दान किया है, पितरों को अन्न का नहीं, जिसके कारण उनके पितृ अतृप्त हैं। अपनी इस भूल का प्रायश्चित करने के लिए कर्ण को सोलह दिनों के लिए पुनः पृथ्वी पर भेजा गया। इन सोलह दिनों में कर्ण ने विधि-विधान से पूर्वजों को अन्न और जल का दान किया। कालांतर में यही सोलह दिन पितृ पक्ष के रूप में विख्यात हुए। 

पितृ पक्ष को ‘अशुभ’ क्यों कहा जाता है?

यह एक आम धारणा बन गई है कि पितृ पक्ष अशुभ होता है और इसलिए इस दौरान विवाह या गृहप्रवेश जैसे मांगलिक आयोजन नहीं किए जाते। लेकिन इसका अधिक सटीक और दार्शनिक अर्थ यह है कि पितृ पक्ष उत्सव के बजाय स्मरण का समय है। भारतीय परंपरा में कालखंड का अपना विशिष्ट सांस्कृतिक स्वर रहा है—कुछ समय उत्सव के हैं, कुछ साधना के, कुछ ज्ञान के और कुछ केवल स्मरण के। पितृ पक्ष उसी अंतर्मुखी स्मरण का काल है। इसलिए इसे मात्र “अशुभ समय” कहकर लांछित करना इस महान परंपरा के अर्थ को अत्यंत सीमित कर देता है।

कौए के लिए भोजन क्यों?

श्राद्ध के दिनों में कौए को भोजन देने की परंपरा लगभग पूरे भारत में प्रचलित है। धार्मिक मान्यता में कौए को पितरों का प्रतीक या संदेशवाहक माना गया है। लेकिन इसके भीतर एक व्यापक पर्यावरणीय संकेत भी निहित है। भारतीय दर्शन ने मनुष्य के साथ-साथ पशु-पक्षियों और प्रकृति के प्रति दायित्व को भी धार्मिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा बनाया है। आज जब जैव-विविधता और पर्यावरण संरक्षण ज्वलंत प्रश्न बन चुके हैं, तो इन परंपराओं को प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी की दृष्टि से भी समझा जाना चाहिए।

गया से घर की देहरी तक

पितृकर्म की चर्चा में बिहार के गया तीर्थ का नाम विशेष रूप से आता है। विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी और गया-श्राद्ध की परंपरा ने इसे पिंडदान के प्रमुख केंद्रों में शीर्ष स्थान दिया है, जिसका संबंध गयासुर की पौराणिक कथा से भी है। लेकिन पितृ पक्ष का अर्थ केवल तीर्थयात्रा तक सीमित नहीं है। देश के करोड़ों परिवार अपने घरों की देहरी पर भी पितरों का स्मरण करते हैं। कहीं नदी के तट पर तर्पण होता है, कहीं घर के आंगन में श्राद्ध किया जाता है और कहीं जरूरतमंदों को भोजन कराया जाता है। स्थान और विधियां बदल सकती हैं, लेकिन स्मृति और श्रद्धा का मूल भाव अपरिवर्तित रहता है।

आधुनिक परिवार और भूला हुआ इतिहास

पितृ पक्ष आधुनिक समाज के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है। आज संयुक्त परिवारों की जगह एकाकी और छोटे परिवारों ने ले ली है। युवा पीढ़ी शिक्षा और आजीविका के लिए अपनी जड़ों से दूर दूसरे शहरों या विदेशों में बस रही है। एक ही परिवार के सदस्य कभी-कभी वर्षों तक साथ नहीं मिलते। नतीजा यह है कि परिवार का मौखिक इतिहास दिनों-दिन क्षीण हो रहा है।

इस वर्ष श्राद्ध के साथ एक अभिनव कार्य भी किया जा सकता है—परिवार का इतिहास लिपिबद्ध किया जाए। पुरानी तस्वीरें सहेजी जाएं। बुजुर्गों के पास बैठकर उनके अनुभव सुने जाएं। परिवार की वंशावली तैयार की जाए। पुरानी और प्रेरक कहानियों को दृश्य-श्रव्य माध्यमों में सहेजा जाए। यह भी अपने आप में एक सच्चा पितृ-स्मरण है।

श्रद्धा और तर्क का संतुलन

आधुनिक समय में प्रायः एक तार्किक प्रश्न उठता है—क्या वास्तव में श्राद्ध से पितरों को भोजन या जल मिलता है? यह विशुद्ध रूप से धार्मिक आस्था का विषय है। पितरों तक हमारा अर्पण किस सूक्ष्म रूप में पहुंचता है, इसे भौतिक विज्ञान की कसौटियों पर मापना न तो संभव है और न ही इसकी आवश्यकता है। मृत्यु के बाद प्रियजनों की स्मृति जीवित रहती है, परिवार एक साथ बैठता है, पुराने संबंधों को ऊर्जा मिलती है और दान-सेवा के माध्यम से समाज के वंचित वर्ग को सहायता प्राप्त होती है। इस दृष्टि से पितृ पक्ष एक सांस्कृतिक स्मृति-व्यवस्था है, जो मृत्यु को जीवन से पूर्णतः विच्छेदित करने के बजाय दोनों के मध्य एक अदृश्य संवाद स्थापित करती है।

दान : परंपरा का सामाजिक पक्ष

श्राद्ध कर्म में भोजन और दान का सदैव विशेष स्थान रहा है। परंपरागत रूप से इसमें ब्राह्मण भोज और दक्षिणा की व्यवस्था रही है। आज अनेक परिवार अपनी सामर्थ्य और देश-काल की आवश्यकता के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र, शिक्षा-सामग्री या अन्य आवश्यक वस्तुएं प्रदान करते हैं।

पितृ पक्ष का सबसे आधुनिक संदेश - यदि पूर्वजों के प्रति सच्ची कृतज्ञता है, तो उनके उच्च आदर्शों और श्रेष्ठ परंपराओं को आगे ले जाना हमारा परम कर्तव्य है। यदि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में परिवार को एकजुट रखा, तो हमें भी वह जिम्मेदारी निभानी होगी। यदि उन्होंने शिक्षा का दीप जलाया, तो हमें अगली पीढ़ी को और बेहतर संस्कार देने होंगे। यदि उन्होंने प्रकृति को सहेजा, तो पर्यावरण संरक्षण हमारा भी धर्म है। यदि उन्होंने समाज में सहयोग का भाव रखा, तो हमें भी जरूरतमंद के लिए खड़ा होना होगा। यहीं आकर पितृ पक्ष केवल अतीत का पन्ना न रहकर भविष्य के निर्माण का मार्गदर्शक सिद्धांत बन जाता है।

स्मृति का यह ऋतुचक्र - पितृ पक्ष के तुरंत पश्चात शारदीय नवरात्र का शुभारंभ होता है। 2026 में सर्वपितृ अमावस्या के अगले ही दिन से शक्ति की आराधना आरंभ हो जाएगी। यह सांस्कृतिक क्रम अपने आप में अत्यंत गूढ़ और अर्थपूर्ण है। पहले अपने पूर्वजों का स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन; तत्पश्चात शक्ति की उपासना; और अंततः उत्सवों की लंबी श्रृंखला। मानो भारतीय जीवन-दर्शन हमें यह संदेश देता है कि जीवन में किसी भी उत्सव और उल्लास की नींव हमारी स्मृतियों और जड़ों पर ही टिकती है। हम विकास के पथ पर आगे अवश्य बढ़ें, परंतु अपने अतीत को विस्मृत करके नहीं।

अंततः पितृ पक्ष किसका पर्व है? पितृ पक्ष केवल मृतकों के शोक का पर्व नहीं है; यह जीवितों के आत्म-मंथन का भी पर्व है। यह हमें बोध कराता है कि हमारा जीवन केवल हमारी अपनी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों की एक लंबी और अनवरत यात्रा का प्रतिफल है। हमसे पहले भी लोग थे, जिन्होंने हमें भाषा दी, संस्कार दिए, सिर पर छांव दी और अपने संघर्षों से हमारे लिए प्रशस्त मार्ग बनाए। एक दिन हम भी किसी आने वाली पीढ़ी की स्मृति का हिस्सा मात्र रह जाएंगे। तब शायद यक्ष प्रश्न यह नहीं होगा कि हमने कितने बड़े-बड़े कर्मकांड किए थे, बल्कि यह होगा कि हमने अपने पीछे कैसी वैचारिक और सामाजिक विरासत छोड़ी है।

क्या हमने अपने बच्चों को उनकी जड़ों से जोड़ा? क्या हमने पारिवारिक स्मृतियों को सहेज कर रखा? क्या हमने समाज के लिए कोई योगदान दिया? क्या हमने आने वाली पीढ़ी के लिए इस संसार को थोड़ा और बेहतर बनाया?

इस अर्थ में पितृ पक्ष केवल तर्पण का कर्मकांड नहीं, बल्कि गहरे आत्मचिंतन का अवसर है। यह हमें वर्तमान की अंधी दौड़ से कुछ पलों के लिए बाहर निकालता है और कहता है— रुको। पीछे मुड़कर देखो। उन लोगों को कृतज्ञता से याद करो जिनसे तुम्हारा अस्तित्व है। और फिर आगे बढ़ो—इस दृढ़ संकल्प के साथ कि तुम्हारे बाद आने वालों को तुमसे कुछ ऐसा प्राप्त हो, जिसे वे भी इसी श्रद्धा के साथ याद कर सकें।

शायद यही पितृ पक्ष का सबसे प्रखर और शाश्वत संदेश है। पूर्वजों का सच्चा सम्मान केवल उन्हें वर्ष में एक बार याद करने में नहीं, बल्कि उनकी पवित्र स्मृति को एक अर्थपूर्ण भविष्य में रूपांतरित करने में है। 

~~~~~~~~~~~~~~~~~ शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~


शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

यूपीआई, शुल्क और राजनीति: डिजिटल संप्रभुता, बाज़ार की हकीकत और कूटनीति का त्रिकोण

 

यूपीआई, शुल्क और राजनीति: डिजिटल संप्रभुता, बाज़ार की हकीकत और कूटनीति का त्रिकोण

                           — शिव प्रकाश मिश्रा



 

बीते एक दशक में भारत की आर्थिक और सामाजिक दिनचर्या में यदि कोई सबसे मूक परंतु गहरा क्रांतिकारी परिवर्तन आया है, तो वह है लेनदेन की भाषा का बदलना। गली के नुक्कड़ पर चाय की गुमटी से लेकर बहुमंजिला मॉल के शोरूम तक—कागज़ी नोटों की जगह मोबाइल की स्क्रीन और 'क्यूआर कोड' ने ले ली है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) द्वारा विकसित 'यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस' (यूपीआई) महज़ एक तकनीकी उपकरण नहीं रहा, बल्कि भारत की डिजिटल संप्रभुता और आर्थिक स्वावलंबन का वैश्विक प्रतीक बन चुका था।

किंतु हाल ही में यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) यानी सेवा शुल्क लगाए जाने के निर्णय ने देश के शांत आर्थिक परिदृश्य में हलचल मचा दी है। २,००० रुपये से अधिक के व्यावसायिक लेनदेन पर ०.४ प्रतिशत का सेवा शुल्क (जो १५ अक्टूबर २०२६ से प्रभावी होना है) तय होते ही यह विषय विशुद्ध अर्थशास्त्र के दायरे से बाहर निकलकर संसद, सड़क और टीवी स्टूडियो की गरमा-गरम बहसों का केंद्र बन गया।

यूपीआई के नए ढाँचे पर राजनीतिक बहस का सबसे पहला कारण शब्दों का भ्रम है। आम नागरिक के लिए यह खबर सरल है—“अब यूपीआई पर शुल्क लगेगा।” लेकिन तकनीकी रूप से यह पूरी तरह सही व्याख्या नहीं है, क्योंकि प्रस्तावित शुल्क का भार ग्राहक पर नहीं पड़ेगा। यह शुल्क मर्चन्ट (व्यापारी) वहन करेगा। लेकिन यहीं अर्थशास्त्र और राजनीति एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। व्यापारी को यदि डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की लागत आती है, तो वह लागत अंततः उसके व्यापारिक खर्च का हिस्सा बनती है। व्यापारी चाहे तो अपने मुनाफे में उसे समाहित करे या इसका प्रभाव ग्राहकों पर डाले। इसलिए यह कहना कि “ग्राहक पर कोई प्रत्यक्ष शुल्क नहीं है” तथ्यात्मक रूप से सही हो सकता है, लेकिन इससे यह प्रश्न समाप्त नहीं होता कि एमडीआर का आर्थिक भार अंततः किस पर पड़ेगा।

एक तरफ विपक्ष का तीखा आरोप है कि यह कदम वाशिंगटन के दबाव में वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसी अमेरिकी वित्तीय कंपनियों को भारतीय बाज़ार में पुनर्जीवित करने की साज़िश है। वहीं दूसरी ओर सरकार और रिज़र्व बैंक इसे देश के विशाल डिजिटल ढांचे को आत्मनिर्भर और टिकाऊ बनाने का अपरिहार्य कदम बता रहे हैं। क्या सचमुच यूपीआई पर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की छाया पड़ चुकी है, या यह 'मुफ़्त की अर्थव्यवस्था' से 'टिकाऊ आर्थिक यथार्थ' की ओर बढ़ने का अनिवार्य प्रस्थान बिंदु है?

शुल्क का नया गणित: क्या बदला

राजनीतिक नारों और सोशल मीडिया के शोर के बीच यह समझना आवश्यक है कि नीतिगत स्तर पर वास्तव में क्या परिवर्तन हुआ है:

  • आम नागरिक के बीच लेनदेन (पी-टू-पी): एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को भेजे जाने वाले पैसे पूरी तरह निःशुल्क हैं।
  • छोटे व्यापारी और दैनिक खरीदारी (₹२,००० तक के पी-टू-एम): सब्ज़ी, दूध, राशन या दैनिक ज़रूरतों के ₹२,००० से कम के बिलों पर व्यापारियों के लिए एमडीआर पूर्ववत 'शून्य' रहेगा।
  • बड़े वाणिज्यिक भुगतान (₹२,००० से अधिक के पी-टू-एम): शुल्क केवल २,००० रुपये से अधिक के लेनदेन पर प्रभावी होगा, जहाँ व्यापारी से ०.४% एमडीआर लिया जाएगा (जिसकी अधिकतम सीमा ₹३०० निर्धारित है)।

आँकड़ों के अनुसार, यूपीआई के ९५ प्रतिशत लेनदेन २,००० रुपये के दायरे के भीतर होते हैं। यानी आम उपभोक्ता और छोटे दुकानदारों पर इसका तात्कालिक असर शून्य है। किंतु शेष ५ प्रतिशत बड़े लेनदेन यूपीआई के कुल वित्तीय मूल्य का लगभग ६०-६५ प्रतिशत हिस्सा कवर करते हैं। करोड़ों-अरबों रुपये का कारोबार इसी दायरे में आता है और यहीं 'मुनाफ़े', 'लागत' और 'राजनीति' आपस में टकराते हैं।

मुफ़्त की यूपीआई आखिर कब तक?

वर्ष २०२० में डिजिटल लेन-देन को गति देने के लिए यूपीआई और रुपे पर एमडीआर शून्य कर दिया गया था। परंतु अर्थशास्त्र का बुनियादी नियम है—"दुनिया में कुछ भी पूरी तरह मुफ़्त नहीं होता"।

जब कोई उपभोक्ता फोनपे, गूगल पे या पेटीएम से पैसा भेजता है, तो उस लेनदेन के पीछे तीन प्रमुख संस्थाएं काम करती हैं:

१. बैंक: जिनके कोर बैंकिंग सिस्टम (सीबीएस) पर अरबों ट्रांजैक्शन का लोड पड़ता है।

२. एनपीसीआई: जो राष्ट्रीय स्विच और सुरक्षा ढांचा संचालित करता है।

३. पेमेंट एग्रीगेटर: जो दुकानों पर क्यूआर कोड और सॉफ़्टवेयर सपोर्ट मुहैया कराते हैं।

शून्य एमडीआर के दौर में इस विशाल बुनियादी ढांचे के संचालन और सर्वर अपग्रेड की लागत का मामूली हिस्सा सरकार सब्सिडी के रूप में देती थी, जबकि बैंकों की वास्तविक लागत इससे कहीं अधिक हो चुकी थी। बैंक चेतावनी दे रहे थे कि बिना आय के वे सर्वर क्षमता का विस्तार नहीं कर पा रहे हैं, जिससे ट्रांजैक्शन फेल (सर्वर टाइमआउट) होने की दर बढ़ रही थी। इसलिए, ०.४% शुल्क लगाकर उस राशि को बैंकों और ऑपरेटरों के बीच बाँटने का तर्क एक व्यावहारिक सुधार प्रतीत होता है।

विपक्ष का 'अमेरिकी दबाव' का आरोप

नीति की घोषणा होते ही विपक्ष ने इसे 'आम आदमी की जेब पर डाका' करार दिया। विपक्ष का सबसे गंभीर आरोप यह है कि भारत सरकार ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधियों (यूएसटीआर) के कूटनीतिक दबाव के आगे घुटने टेक दिए हैं।

इस आरोप की जड़ें अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं में छिपी हैं। यूएसटीआर अपनी वार्षिक 'नेशनल ट्रेड एस्टीमेट' रिपोर्टों में भारत की शून्य-एमडीआर नीति और 'रुपे' कार्डों की प्राथमिकता को 'नॉन-टैरिफ ट्रेड बैरियर' (गैर-टैरिफ व्यापार बाधा) बताता रहा है। वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसी अमेरिकी कंपनियाँ, जो वैश्विक वित्तीय लेन-देन पर १.५% से २.५% का भारी एमडीआर वसूलती थीं, भारत में यूपीआई के उदय से हाशिए पर धकेल दी गईं। मुफ़्त यूपीआई के सामने कोई व्यापारी पीओएस मशीन का किराया और २% शुल्क क्यों देता? अमेरिकी लॉबी लंबे समय से 'लेवल प्लेइंग फील्ड' (समान अवसर) का दबाव बना रही थी। विपक्ष का तर्क है कि ०.४% शुल्क लागू करके सरकार ने पारंपरिक कार्ड और यूपीआई के बीच लागत की खाई को पाट दिया है।

सरकार का तर्क: संप्रभुता बनाम वित्तीय यथार्थ

दूसरी ओर, वित्त मंत्रालय का रुख स्पष्ट है। उनका कहना है कि ०.४% की दर वीज़ा और मास्टरकार्ड (१.५% से ३%) की तुलना में आज भी सबसे सस्ती है। यह निर्णय किसी विदेशी दबाव में नहीं, बल्कि भारतीय बैंकों और एनपीसीआई की वित्तीय सेहत सुदृढ़ करने के लिए रिज़र्व बैंक की सिफारिशों पर लिया गया है। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह ०.४% कोई 'सरकारी टैक्स' नहीं है। इसका एक भी रुपया राजकोष में नहीं जाएगा, बल्कि यह सीधे बैंकों और तकनीकी कंपनियों को उनके सर्वर और साइबर सुरक्षा अभेद्य बनाने के लिए मिलेगा।

ज़मीनी हकीकत और 'कैश' की वापसी का डर

इस निर्णय के बाज़ार पर दो संभावित परिणाम हो सकते हैं:

१. क्या व्यापारी यह बोझ उठाएंगे? कपड़ा विक्रेता, इलेक्ट्रॉनिक्स डीलर और मध्यम स्तर के रेस्तरां संचालक अब ₹५,००० के बिल पर ₹२० का शुल्क देने को लेकर आशंकित हैं। वे यह अतिरिक्त लागत ग्राहकों के बिल में जोड़ने का प्रयास कर सकते हैं।

२. क्या 'कैश' फिर से लौटेगा? लागत घटाने के लिए यदि बड़े लेन-देन पर व्यापारी ग्राहकों से पुनः 'कैश' मांगने लगें, तो काले धन और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर कसी गई नकेल ढीली पड़ सकती है।

निष्कर्ष और राजनीतिक आकलन

यूपीआई इक्कीसवीं सदी के भारत का वह आत्मविश्वास है जिसने पश्चिमी वित्तीय एकाधिकार को चुनौती दी। इसे राजनीति का मोहरा बनाने के बजाय परिपक्व दृष्टि से देखना होगा। मुफ़्त मॉडल लंबे समय तक नवाचार (इनोवेशन) को जीवित नहीं रख सकता। यदि बैंकों को पारिश्रमिक नहीं मिलेगा, तो तकनीकी उन्नयन ठप हो जाएगा।

हालाँकि, विशुद्ध राजनैतिक चश्मे से देखा जाए तो सरकार का यह कदम नुकसानदेह साबित हो सकता है। निष्पक्ष समीक्षा से ऐसा लगता है कि सरकार ने इसे लागू करने के समय और प्रभाव पर बहुत अधिक चिंतन नहीं किया। शुल्क तब लागू किए जा रहे हैं जब पितृपक्ष के बाद नवरात्रि का समय है और सबसे अधिक खरीदारी होती है।

दूसरा, २०२७ में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती हैं। यद्यपि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं, लेकिन ऐसे समय जब एससी-एसटी ऐक्ट और यूजीसी नियमों के कारण सामान्य वर्ग में भारी आक्रोश है, यूपीआई का यह नया शुल्क भाजपा और विशेषकर योगी सरकार के लिए नई चुनौती बन गया है, जिससे बचा जा सकता था।

(लेखक भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व शीर्ष कार्यपालक अधिकारी  तथा समसामयिक विषयों, आर्थिक नीतियों और सामाजिक सरोकारों के स्वतंत्र विश्लेषक हैं।)

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शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

राजनीति का 'नाराज़ फूफा

 

राजनीति का 'नाराज़ फूफा': लोकतंत्र, सत्ता और विपक्ष का भटकाव

                 — शिव प्रकाश मिश्रा

 

भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में 'फूफा' एक अत्यंत दिलचस्प, संवेदनशील और जटिल किरदार होता है। वह घर का सदस्य भी है और थोड़ा बाहर का भी। उसे घर के प्रत्येक मामले पर अपनी राय देने का एक अघोषित नैतिक अधिकार महसूस होता है। शादी में जाए तो पूछेगा कि खाने में नमक कम क्यों है; मकान बने तो बताएगा कि नक्शा ऐसा क्यों है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि फूफा हमेशा नाराज़ क्यों रहता है? उसकी नाराजगी की असल वजह यह होती है कि जब किसी भारतीय परिवार में बहन के बाद बेटी की शादी होती है और नया दामाद घर में आ जाता है, तो जाने-अनजाने पुराने दामाद (यानी फूफा) की अनदेखी होने लगती है। घर के सभी लोग नए दामाद की खातिरदारी में जुट जाते हैं, और इसी अनदेखी से आहत फूफा अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए हर चीज़ में कमी निकालने का बहाना ढूँढ़ने लगता है।

'दिमागी नक्सली' जैसे जुमलों की अपार सफलता के बाद, राजनीतिक संदेशों के महारथी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति में इसी घरेलू चरित्र को उतार दिया है—'नाराज़ फूफा'। अब यह मामला केवल एक राजनीतिक जुमले तक सीमित नहीं रह गया है। फूफा जी पहले ५ सितंबर को दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री के भाषण में आए, जहाँ उन्होंने युवाओं से कहा कि हर काम शुरू होते ही कुछ लोग 'नाराज़ फूफा' बन जाते हैं। फिर ८ सितंबर को वडोदरा में 'नमो फॉर विकसित भारत' कार्यक्रम में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने तंज कसा कि अब 'नाराज़ फूफा जी' पूछेंगे कि ट्रकों का क्या होगा।

इसके ठीक अगले दिन ९ सितंबर को जब राहुल गांधी अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली पहुँचे, तो दिशा समिति की बैठक के बाहर भीड़ ने उन्हें देखकर 'नाराज़ फूफा' के नारे लगाए। अर्थात्, प्रधानमंत्री का एक राजनीतिक तंज अब जमीनी नारे में बदल चुका था। राजनीति की यही खूबी है—एक नेता मंच से शब्द उछालता है और दूसरा उसे नारे में बदल देता है। लेकिन 'पप्पू' की तरह यदि 'नाराज़ फूफा' को भी राहुल गांधी के साथ स्थायी रूप से चस्पा हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं लेकिन  “बिना बुआ के फूफा” बनना उनके साथ बहुत नाइंसाफी हो जायेगी ।

लेकिन !  जब राजनीति के मंच से 'फूफा' और 'दामाद' के रूपक गढ़े जा रहे हों, तो यह देखना नितांत आवश्यक हो जाता है कि वर्तमान सत्ता और विपक्ष का असली 'वोट बैंक रूपी नया दामाद' कौन है और उपेक्षित 'फूफा' कौन है? राहुल गांधी पर 'नाराज़ फूफा' का ठप्पा लगाना एक सफल राजनीतिक चतुराई हो सकती है, लेकिन असल में देश का 'सामान्य वर्ग' (सवर्ण समाज) आज खुद को उस पुराने दामाद या उपेक्षित फूफा की तरह महसूस कर रहा है, जिसे हाशिए पर धकेल कर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही 'नए दामादों' (आरक्षित वोट बैंकों) की मनुहार में लगे हुए हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो कांग्रेस ने कभी भी वृहद हिंदू समाज के लिए सकारात्मक कार्य नहीं किया। ऐसा प्रतीत होता है कि नेहरू के कार्यकाल से ही तुष्टिकरण की राजनीति की नींव रखी गई, जिसके लिए एक तरफ हिंदू समाज का विखंडन आवश्यक था, तो दूसरी तरफ एक विशेष वर्ग को असीमित अधिकार दिए गए। देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद बनाए गए, जो औपचारिक रूप से शिक्षित भी नहीं थे जिनकी पृष्ठभूमि विशुद्ध कट्टरपंथी  इस्लामी शिक्षा की थी, जो उन्हे घर पर ही मिली थी। उन्होंने नेहरु की सहमति से वामपंथियों के साथ मिलकर भारत के गौरवशाली इतिहास को इस तरह तोड़ा-मरोड़ा गया जिससे हिंदू समाज हीन भावना (कुंठा) से भर जाए। आक्रांताओं और मुगलों के कसीदे पढ़े गए और भारत के वीर महापुरुषों को हाशिए पर धकेल दिया गया। विभाजन के बाद भी कांग्रेस ने मुस्लिम लीग का नाम बदलकर (इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग) उसके साथ राजनीतिक रिश्ते बनाए, जो केरल में आज भी बदस्तूर जारी है। हिंदुओं का नरसंहार करने वाले कुख्यात 'रजाकार' संगठन पर से प्रतिबंध हटाकर उन्हें राजनीतिक मुख्यधारा में लाया गया। यह सब कांग्रेस की उसी तुष्टिकरण नीति का हिस्सा था, जो वृहद हिंदू समाज के लिए हमेशा विध्वंसक साबित हुई।

किसी राजनीतिक विश्लेषक ने कभी यह सटीक भविष्यवाणी की थी कि आगे चलकर कांग्रेस 'मुस्लिम लीग' बन जाएगी और भाजपा 'कांग्रेस' हो जाएगी।  आज यह कटु सत्य प्रतीत हो रहा है। कॉंग्रेस तो खुले आम कह रही है कि  वह मुसलमानों की पार्टी है और केरल मे उसकी सरकार मुस्लिम लीग के नियंत्रण मे ही चल रही है।  वर्ष दो हज़ार चौदह (2014) में जो मोदी वृहद हिंदू एकता का चेहरा थे, वे प्रधानमंत्री बनते ही 'सबका साथ, सबका विकास' की ओर मुड़ गए। वर्ष दो हज़ार उन्नीस (2019) आते-आते वे स्वयं को पिछड़े वर्ग का बताने लगे और अब हालात यहाँ तक आ पहुँचे हैं कि जातिगत जनगणना का अघोषित आश्वासन भी दिया जाने लगा है

सत्ता की इस अंधी दौड़ में भाजपा के लिए भी अब हिंदू समाज की एकजुटता नहीं, बल्कि आरक्षित वोट बैंक ही सर्वोपरि हो गया है। आज अनुसूचित जाति एवं जनजाति (एससी/एसटी) अधिनियम को इतना सख्त कर दिया गया है कि सामान्य वर्ग के लिए यह एक अभिशाप बन गया है। प्राथमिकी दर्ज होने के कुछ ही दिनों के भीतर लाखों रुपये के सरकारी मुआवजे का प्रावधान है। भले ही बाद में मुकदमे फर्जी साबित हो जाएं, लेकिन फर्जी मुकदमा लिखवाने वालों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती और न ही वह मुआवजा वापस लिया जाता है। यह धंधा आज खूब फल-फूल रहा है और सामान्य वर्ग के निर्दोष युवाओं का जीवन नरक बना रहा है। हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के जो नए दिशा-निर्देश आए, उन्होंने तो जैसे मृतप्राय सामान्य वर्ग को पूरी तरह कुचलने का खाका ही खींच दिया है।

आज सरकारें दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को सशक्त बनाने के नाम पर केवल अपना-अपना वोट बैंक मजबूत कर रही हैं। विडंबना देखिए कि देश को सबसे अधिक कर (टैक्स) चुकाने वाले सामान्य वर्ग के युवाओं को अपनी जायज माँगों के लिए राजधानी के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन तक की अनुमति नहीं मिलती; उन्हें बसों में भरकर मीलों दूर छोड़ दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर, अराजक तत्वों को महीनों तक सड़कों पर उपद्रव करने और देश के संसद भवन तक ट्रैक्टर ले जाने की पूरी छूट दे दी जाती है, और बाद में उसी वोट बैंक को साधने के लिए उनके सारे मुकदमे वापस ले लिए जाते हैं।

जब सत्ता पक्ष अपने मूल मतदाता को नजरअंदाज कर नए वोट बैंक को साधने में इस कदर अंधा हो जाए, तो देश के उस उपेक्षित 'फूफा' (सामान्य वर्ग) से क्या शिकायत करें, जो स्वतंत्र भारत में खुद को आखिरी पायदान का दोयम दर्जे का नागरिक महसूस कर रहा है? रही बात राजनीतिक फूफा (विपक्ष) की, तो उनकी सबसे बड़ी परेशानी यह है कि लाख कोशिशों के बाद भी 'बुआ' (सत्ता) उनके हाथ नहीं आ रही है। इसी हताशा में विपक्ष कई बार राष्ट्र-विरोधी विमर्श का भी हिस्सा बन जाता है। 

अगर देश में 'यूपीआई' (डिजिटल भुगतान) सफल हुआ है या माल ढुलाई गलियारों (फ्रेट कॉरिडोर) से परिवहन की क्षमता बढ़ी है, तो उसे केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह कार्य मोदी सरकार में हुआ है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम गुण-दोष के आधार पर नीतियों की समीक्षा करना है, न कि हर अच्छी-बुरी बात का केवल अंधविरोध करना। 

इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य को यदि एक वाक्य में समेटना हो तो यही कहा जाएगा—समस्या नाराज़ फूफा से नहीं, समस्या 'फूफागिरी' से है। वह फूफागिरी जो विपक्ष की तरह हर शानदार राष्ट्रीय उपलब्धि में खामी ढूँढ़ती है, और वह फूफागिरी जो सत्ता पक्ष की तरह उठने वाले हर जायज सवाल में षड्यंत्र देखती है तथा अपने ही वफादार करदाता वोटरों को दरकिनार कर देती है।

लोकतंत्र में असहमति एक सुरक्षा-वाल्व है, कोई देशद्रोह नहीं। आज की जागरूक जनता केवल नाराज़गी और आरोप-प्रत्यारोप नहीं चाहती, वह एक ऐसा सकारात्मक विकल्प और ऐसी पारदर्शी सत्ता चाहती है, जहाँ किसी एक 'दामाद' के राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए पूरे घर को दांव पर न लगाया जाए।

                     ~~~~~~~~  Shiv Mishra ~~~~~~~~~~~~

धरती से आसमान तक नफरत का साया: दुबई-इजराइल उड़ान की घटना

  धरती से आसमान तक नफरत का साया: दुबई-इजराइल उड़ान की घटना और सभ्यतागत चुनौतियां                                                           —...