शुक्रवार, 18 सितंबर 2026

यूपीआई, शुल्क और राजनीति: डिजिटल संप्रभुता, बाज़ार की हकीकत और कूटनीति का त्रिकोण

 

यूपीआई, शुल्क और राजनीति: डिजिटल संप्रभुता, बाज़ार की हकीकत और कूटनीति का त्रिकोण

                           शिव प्रकाश मिश्रा



 

बीते एक दशक में भारत की आर्थिक और सामाजिक दिनचर्या में यदि कोई सबसे मूक परंतु गहरा क्रांतिकारी परिवर्तन आया है, तो वह है लेनदेन की भाषा का बदलना। गली के नुक्कड़ पर चाय की गुमटी से लेकर बहुमंजिला मॉल के शोरूम तककागज़ी नोटों की जगह मोबाइल की स्क्रीन और 'क्यूआर कोड' ने ले ली है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) द्वारा विकसित 'यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस' (यूपीआई) महज़ एक तकनीकी उपकरण नहीं रहा, बल्कि भारत की डिजिटल संप्रभुता और आर्थिक स्वावलंबन का वैश्विक प्रतीक बन चुका था।

किंतु हाल ही में यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) यानी सेवा शुल्क लगाए जाने के निर्णय ने देश के शांत आर्थिक परिदृश्य में हलचल मचा दी है। २,००० रुपये से अधिक के व्यावसायिक लेनदेन पर ०.४ प्रतिशत का सेवा शुल्क (जो १५ अक्टूबर २०२६ से प्रभावी होना है) तय होते ही यह विषय विशुद्ध अर्थशास्त्र के दायरे से बाहर निकलकर संसद, सड़क और टीवी स्टूडियो की गरमा-गरम बहसों का केंद्र बन गया।

यूपीआई के नए ढाँचे पर राजनीतिक बहस का सबसे पहला कारण शब्दों का भ्रम है। आम नागरिक के लिए यह खबर सरल है—“अब यूपीआई पर शुल्क लगेगा।लेकिन तकनीकी रूप से यह पूरी तरह सही व्याख्या नहीं है, क्योंकि प्रस्तावित शुल्क का भार ग्राहक पर नहीं पड़ेगा। यह शुल्क मर्चन्ट (व्यापारी) वहन करेगा। लेकिन यहीं अर्थशास्त्र और राजनीति एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। व्यापारी को यदि डिजिटल भुगतान स्वीकार करने की लागत आती है, तो वह लागत अंततः उसके व्यापारिक खर्च का हिस्सा बनती है। व्यापारी चाहे तो अपने मुनाफे में उसे समाहित करे या इसका प्रभाव ग्राहकों पर डाले। इसलिए यह कहना कि ग्राहक पर कोई प्रत्यक्ष शुल्क नहीं हैतथ्यात्मक रूप से सही हो सकता है, लेकिन इससे यह प्रश्न समाप्त नहीं होता कि एमडीआर का आर्थिक भार अंततः किस पर पड़ेगा।

एक तरफ विपक्ष का तीखा आरोप है कि यह कदम वाशिंगटन के दबाव में वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसी अमेरिकी वित्तीय कंपनियों को भारतीय बाज़ार में पुनर्जीवित करने की साज़िश है। वहीं दूसरी ओर सरकार और रिज़र्व बैंक इसे देश के विशाल डिजिटल ढांचे को आत्मनिर्भर और टिकाऊ बनाने का अपरिहार्य कदम बता रहे हैं। क्या सचमुच यूपीआई पर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की छाया पड़ चुकी है, या यह 'मुफ़्त की अर्थव्यवस्था' से 'टिकाऊ आर्थिक यथार्थ' की ओर बढ़ने का अनिवार्य प्रस्थान बिंदु है?

शुल्क का नया गणित: क्या बदला

राजनीतिक नारों और सोशल मीडिया के शोर के बीच यह समझना आवश्यक है कि नीतिगत स्तर पर वास्तव में क्या परिवर्तन हुआ है:

  • आम नागरिक के बीच लेनदेन (पी-टू-पी): एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को भेजे जाने वाले पैसे पूरी तरह निःशुल्क हैं।
  • छोटे व्यापारी और दैनिक खरीदारी (₹२,००० तक के पी-टू-एम): सब्ज़ी, दूध, राशन या दैनिक ज़रूरतों के ₹२,००० से कम के बिलों पर व्यापारियों के लिए एमडीआर पूर्ववत 'शून्य' रहेगा।
  • बड़े वाणिज्यिक भुगतान (₹२,००० से अधिक के पी-टू-एम): शुल्क केवल २,००० रुपये से अधिक के लेनदेन पर प्रभावी होगा, जहाँ व्यापारी से ०.४% एमडीआर लिया जाएगा (जिसकी अधिकतम सीमा ₹३०० निर्धारित है)।

आँकड़ों के अनुसार, यूपीआई के ९५ प्रतिशत लेनदेन २,००० रुपये के दायरे के भीतर होते हैं। यानी आम उपभोक्ता और छोटे दुकानदारों पर इसका तात्कालिक असर शून्य है। किंतु शेष ५ प्रतिशत बड़े लेनदेन यूपीआई के कुल वित्तीय मूल्य का लगभग ६०-६५ प्रतिशत हिस्सा कवर करते हैं। करोड़ों-अरबों रुपये का कारोबार इसी दायरे में आता है और यहीं 'मुनाफ़े', 'लागत' और 'राजनीति' आपस में टकराते हैं।

मुफ़्त की यूपीआई आखिर कब तक?

वर्ष २०२० में डिजिटल लेन-देन को गति देने के लिए यूपीआई और रुपे पर एमडीआर शून्य कर दिया गया था। परंतु अर्थशास्त्र का बुनियादी नियम है—"दुनिया में कुछ भी पूरी तरह मुफ़्त नहीं होता"।

जब कोई उपभोक्ता फोनपे, गूगल पे या पेटीएम से पैसा भेजता है, तो उस लेनदेन के पीछे तीन प्रमुख संस्थाएं काम करती हैं:

१. बैंक: जिनके कोर बैंकिंग सिस्टम (सीबीएस) पर अरबों ट्रांजैक्शन का लोड पड़ता है।

२. एनपीसीआई: जो राष्ट्रीय स्विच और सुरक्षा ढांचा संचालित करता है।

३. पेमेंट एग्रीगेटर: जो दुकानों पर क्यूआर कोड और सॉफ़्टवेयर सपोर्ट मुहैया कराते हैं।

शून्य एमडीआर के दौर में इस विशाल बुनियादी ढांचे के संचालन और सर्वर अपग्रेड की लागत का मामूली हिस्सा सरकार सब्सिडी के रूप में देती थी, जबकि बैंकों की वास्तविक लागत इससे कहीं अधिक हो चुकी थी। बैंक चेतावनी दे रहे थे कि बिना आय के वे सर्वर क्षमता का विस्तार नहीं कर पा रहे हैं, जिससे ट्रांजैक्शन फेल (सर्वर टाइमआउट) होने की दर बढ़ रही थी। इसलिए, ०.४% शुल्क लगाकर उस राशि को बैंकों और ऑपरेटरों के बीच बाँटने का तर्क एक व्यावहारिक सुधार प्रतीत होता है।

विपक्ष का 'अमेरिकी दबाव' का आरोप

नीति की घोषणा होते ही विपक्ष ने इसे 'आम आदमी की जेब पर डाका' करार दिया। विपक्ष का सबसे गंभीर आरोप यह है कि भारत सरकार ने अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधियों (यूएसटीआर) के कूटनीतिक दबाव के आगे घुटने टेक दिए हैं।

इस आरोप की जड़ें अंतरराष्ट्रीय व्यापार वार्ताओं में छिपी हैं। यूएसटीआर अपनी वार्षिक 'नेशनल ट्रेड एस्टीमेट' रिपोर्टों में भारत की शून्य-एमडीआर नीति और 'रुपे' कार्डों की प्राथमिकता को 'नॉन-टैरिफ ट्रेड बैरियर' (गैर-टैरिफ व्यापार बाधा) बताता रहा है। वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसी अमेरिकी कंपनियाँ, जो वैश्विक वित्तीय लेन-देन पर १.५% से २.५% का भारी एमडीआर वसूलती थीं, भारत में यूपीआई के उदय से हाशिए पर धकेल दी गईं। मुफ़्त यूपीआई के सामने कोई व्यापारी पीओएस मशीन का किराया और २% शुल्क क्यों देता? अमेरिकी लॉबी लंबे समय से 'लेवल प्लेइंग फील्ड' (समान अवसर) का दबाव बना रही थी। विपक्ष का तर्क है कि ०.४% शुल्क लागू करके सरकार ने पारंपरिक कार्ड और यूपीआई के बीच लागत की खाई को पाट दिया है।

सरकार का तर्क: संप्रभुता बनाम वित्तीय यथार्थ

दूसरी ओर, वित्त मंत्रालय का रुख स्पष्ट है। उनका कहना है कि ०.४% की दर वीज़ा और मास्टरकार्ड (१.५% से ३%) की तुलना में आज भी सबसे सस्ती है। यह निर्णय किसी विदेशी दबाव में नहीं, बल्कि भारतीय बैंकों और एनपीसीआई की वित्तीय सेहत सुदृढ़ करने के लिए रिज़र्व बैंक की सिफारिशों पर लिया गया है। सरकार ने स्पष्ट किया कि यह ०.४% कोई 'सरकारी टैक्स' नहीं है। इसका एक भी रुपया राजकोष में नहीं जाएगा, बल्कि यह सीधे बैंकों और तकनीकी कंपनियों को उनके सर्वर और साइबर सुरक्षा अभेद्य बनाने के लिए मिलेगा।

ज़मीनी हकीकत और 'कैश' की वापसी का डर

इस निर्णय के बाज़ार पर दो संभावित परिणाम हो सकते हैं:

१. क्या व्यापारी यह बोझ उठाएंगे? कपड़ा विक्रेता, इलेक्ट्रॉनिक्स डीलर और मध्यम स्तर के रेस्तरां संचालक अब ₹५,००० के बिल पर ₹२० का शुल्क देने को लेकर आशंकित हैं। वे यह अतिरिक्त लागत ग्राहकों के बिल में जोड़ने का प्रयास कर सकते हैं।

२. क्या 'कैश' फिर से लौटेगा? लागत घटाने के लिए यदि बड़े लेन-देन पर व्यापारी ग्राहकों से पुनः 'कैश' मांगने लगें, तो काले धन और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर कसी गई नकेल ढीली पड़ सकती है।

निष्कर्ष और राजनीतिक आकलन

यूपीआई इक्कीसवीं सदी के भारत का वह आत्मविश्वास है जिसने पश्चिमी वित्तीय एकाधिकार को चुनौती दी। इसे राजनीति का मोहरा बनाने के बजाय परिपक्व दृष्टि से देखना होगा। मुफ़्त मॉडल लंबे समय तक नवाचार (इनोवेशन) को जीवित नहीं रख सकता। यदि बैंकों को पारिश्रमिक नहीं मिलेगा, तो तकनीकी उन्नयन ठप हो जाएगा।

हालाँकि, विशुद्ध राजनैतिक चश्मे से देखा जाए तो सरकार का यह कदम नुकसानदेह साबित हो सकता है। निष्पक्ष समीक्षा से ऐसा लगता है कि सरकार ने इसे लागू करने के समय और प्रभाव पर बहुत अधिक चिंतन नहीं किया। शुल्क तब लागू किए जा रहे हैं जब पितृपक्ष के बाद नवरात्रि का समय है और सबसे अधिक खरीदारी होती है।

दूसरा, २०२७ में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती हैं। यद्यपि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं, लेकिन ऐसे समय जब एससी-एसटी ऐक्ट और यूजीसी नियमों के कारण सामान्य वर्ग में भारी आक्रोश है, यूपीआई का यह नया शुल्क भाजपा और विशेषकर योगी सरकार के लिए नई चुनौती बन गया है, जिससे बचा जा सकता था।

(लेखक भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व शीर्ष कार्यपालक अधिकारी  तथा समसामयिक विषयों, आर्थिक नीतियों और सामाजिक सरोकारों के स्वतंत्र विश्लेषक हैं।)

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शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

राजनीति का 'नाराज़ फूफा

 

राजनीति का 'नाराज़ फूफा': लोकतंत्र, सत्ता और विपक्ष का भटकाव

                 शिव प्रकाश मिश्रा

 

भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में 'फूफा' एक अत्यंत दिलचस्प, संवेदनशील और जटिल किरदार होता है। वह घर का सदस्य भी है और थोड़ा बाहर का भी। उसे घर के प्रत्येक मामले पर अपनी राय देने का एक अघोषित नैतिक अधिकार महसूस होता है। शादी में जाए तो पूछेगा कि खाने में नमक कम क्यों है; मकान बने तो बताएगा कि नक्शा ऐसा क्यों है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि फूफा हमेशा नाराज़ क्यों रहता है? उसकी नाराजगी की असल वजह यह होती है कि जब किसी भारतीय परिवार में बहन के बाद बेटी की शादी होती है और नया दामाद घर में आ जाता है, तो जाने-अनजाने पुराने दामाद (यानी फूफा) की अनदेखी होने लगती है। घर के सभी लोग नए दामाद की खातिरदारी में जुट जाते हैं, और इसी अनदेखी से आहत फूफा अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए हर चीज़ में कमी निकालने का बहाना ढूँढ़ने लगता है।

'दिमागी नक्सली' जैसे जुमलों की अपार सफलता के बाद, राजनीतिक संदेशों के महारथी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति में इसी घरेलू चरित्र को उतार दिया है—'नाराज़ फूफा'। अब यह मामला केवल एक राजनीतिक जुमले तक सीमित नहीं रह गया है। फूफा जी पहले ५ सितंबर को दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री के भाषण में आए, जहाँ उन्होंने युवाओं से कहा कि हर काम शुरू होते ही कुछ लोग 'नाराज़ फूफा' बन जाते हैं। फिर ८ सितंबर को वडोदरा में 'नमो फॉर विकसित भारत' कार्यक्रम में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने तंज कसा कि अब 'नाराज़ फूफा जी' पूछेंगे कि ट्रकों का क्या होगा।

इसके ठीक अगले दिन ९ सितंबर को जब राहुल गांधी अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली पहुँचे, तो दिशा समिति की बैठक के बाहर भीड़ ने उन्हें देखकर 'नाराज़ फूफा' के नारे लगाए। अर्थात्, प्रधानमंत्री का एक राजनीतिक तंज अब जमीनी नारे में बदल चुका था। राजनीति की यही खूबी हैएक नेता मंच से शब्द उछालता है और दूसरा उसे नारे में बदल देता है। लेकिन 'पप्पू' की तरह यदि 'नाराज़ फूफा' को भी राहुल गांधी के साथ स्थायी रूप से चस्पा हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं लेकिन  “बिना बुआ के फूफा” बनना उनके साथ बहुत नाइंसाफी हो जायेगी ।

लेकिन !  जब राजनीति के मंच से 'फूफा' और 'दामाद' के रूपक गढ़े जा रहे हों, तो यह देखना नितांत आवश्यक हो जाता है कि वर्तमान सत्ता और विपक्ष का असली 'वोट बैंक रूपी नया दामाद' कौन है और उपेक्षित 'फूफा' कौन है? राहुल गांधी पर 'नाराज़ फूफा' का ठप्पा लगाना एक सफल राजनीतिक चतुराई हो सकती है, लेकिन असल में देश का 'सामान्य वर्ग' (सवर्ण समाज) आज खुद को उस पुराने दामाद या उपेक्षित फूफा की तरह महसूस कर रहा है, जिसे हाशिए पर धकेल कर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही 'नए दामादों' (आरक्षित वोट बैंकों) की मनुहार में लगे हुए हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो कांग्रेस ने कभी भी वृहद हिंदू समाज के लिए सकारात्मक कार्य नहीं किया। ऐसा प्रतीत होता है कि नेहरू के कार्यकाल से ही तुष्टिकरण की राजनीति की नींव रखी गई, जिसके लिए एक तरफ हिंदू समाज का विखंडन आवश्यक था, तो दूसरी तरफ एक विशेष वर्ग को असीमित अधिकार दिए गए। देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद बनाए गए, जो औपचारिक रूप से शिक्षित भी नहीं थे जिनकी पृष्ठभूमि विशुद्ध कट्टरपंथी  इस्लामी शिक्षा की थी, जो उन्हे घर पर ही मिली थी। उन्होंने नेहरु की सहमति से वामपंथियों के साथ मिलकर भारत के गौरवशाली इतिहास को इस तरह तोड़ा-मरोड़ा गया जिससे हिंदू समाज हीन भावना (कुंठा) से भर जाए। आक्रांताओं और मुगलों के कसीदे पढ़े गए और भारत के वीर महापुरुषों को हाशिए पर धकेल दिया गया। विभाजन के बाद भी कांग्रेस ने मुस्लिम लीग का नाम बदलकर (इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग) उसके साथ राजनीतिक रिश्ते बनाए, जो केरल में आज भी बदस्तूर जारी है। हिंदुओं का नरसंहार करने वाले कुख्यात 'रजाकार' संगठन पर से प्रतिबंध हटाकर उन्हें राजनीतिक मुख्यधारा में लाया गया। यह सब कांग्रेस की उसी तुष्टिकरण नीति का हिस्सा था, जो वृहद हिंदू समाज के लिए हमेशा विध्वंसक साबित हुई।

किसी राजनीतिक विश्लेषक ने कभी यह सटीक भविष्यवाणी की थी कि आगे चलकर कांग्रेस 'मुस्लिम लीग' बन जाएगी और भाजपा 'कांग्रेस' हो जाएगी।  आज यह कटु सत्य प्रतीत हो रहा है। कॉंग्रेस तो खुले आम कह रही है कि  वह मुसलमानों की पार्टी है और केरल मे उसकी सरकार मुस्लिम लीग के नियंत्रण मे ही चल रही है।  वर्ष दो हज़ार चौदह (2014) में जो मोदी वृहद हिंदू एकता का चेहरा थे, वे प्रधानमंत्री बनते ही 'सबका साथ, सबका विकास' की ओर मुड़ गए। वर्ष दो हज़ार उन्नीस (2019) आते-आते वे स्वयं को पिछड़े वर्ग का बताने लगे और अब हालात यहाँ तक आ पहुँचे हैं कि जातिगत जनगणना का अघोषित आश्वासन भी दिया जाने लगा है

सत्ता की इस अंधी दौड़ में भाजपा के लिए भी अब हिंदू समाज की एकजुटता नहीं, बल्कि आरक्षित वोट बैंक ही सर्वोपरि हो गया है। आज अनुसूचित जाति एवं जनजाति (एससी/एसटी) अधिनियम को इतना सख्त कर दिया गया है कि सामान्य वर्ग के लिए यह एक अभिशाप बन गया है। प्राथमिकी दर्ज होने के कुछ ही दिनों के भीतर लाखों रुपये के सरकारी मुआवजे का प्रावधान है। भले ही बाद में मुकदमे फर्जी साबित हो जाएं, लेकिन फर्जी मुकदमा लिखवाने वालों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती और न ही वह मुआवजा वापस लिया जाता है। यह धंधा आज खूब फल-फूल रहा है और सामान्य वर्ग के निर्दोष युवाओं का जीवन नरक बना रहा है। हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के जो नए दिशा-निर्देश आए, उन्होंने तो जैसे मृतप्राय सामान्य वर्ग को पूरी तरह कुचलने का खाका ही खींच दिया है।

आज सरकारें दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को सशक्त बनाने के नाम पर केवल अपना-अपना वोट बैंक मजबूत कर रही हैं। विडंबना देखिए कि देश को सबसे अधिक कर (टैक्स) चुकाने वाले सामान्य वर्ग के युवाओं को अपनी जायज माँगों के लिए राजधानी के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन तक की अनुमति नहीं मिलती; उन्हें बसों में भरकर मीलों दूर छोड़ दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर, अराजक तत्वों को महीनों तक सड़कों पर उपद्रव करने और देश के संसद भवन तक ट्रैक्टर ले जाने की पूरी छूट दे दी जाती है, और बाद में उसी वोट बैंक को साधने के लिए उनके सारे मुकदमे वापस ले लिए जाते हैं।

जब सत्ता पक्ष अपने मूल मतदाता को नजरअंदाज कर नए वोट बैंक को साधने में इस कदर अंधा हो जाए, तो देश के उस उपेक्षित 'फूफा' (सामान्य वर्ग) से क्या शिकायत करें, जो स्वतंत्र भारत में खुद को आखिरी पायदान का दोयम दर्जे का नागरिक महसूस कर रहा है? रही बात राजनीतिक फूफा (विपक्ष) की, तो उनकी सबसे बड़ी परेशानी यह है कि लाख कोशिशों के बाद भी 'बुआ' (सत्ता) उनके हाथ नहीं आ रही है। इसी हताशा में विपक्ष कई बार राष्ट्र-विरोधी विमर्श का भी हिस्सा बन जाता है। 

अगर देश में 'यूपीआई' (डिजिटल भुगतान) सफल हुआ है या माल ढुलाई गलियारों (फ्रेट कॉरिडोर) से परिवहन की क्षमता बढ़ी है, तो उसे केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह कार्य मोदी सरकार में हुआ है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम गुण-दोष के आधार पर नीतियों की समीक्षा करना है, न कि हर अच्छी-बुरी बात का केवल अंधविरोध करना। 

इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य को यदि एक वाक्य में समेटना हो तो यही कहा जाएगासमस्या नाराज़ फूफा से नहीं, समस्या 'फूफागिरी' से है। वह फूफागिरी जो विपक्ष की तरह हर शानदार राष्ट्रीय उपलब्धि में खामी ढूँढ़ती है, और वह फूफागिरी जो सत्ता पक्ष की तरह उठने वाले हर जायज सवाल में षड्यंत्र देखती है तथा अपने ही वफादार करदाता वोटरों को दरकिनार कर देती है।

लोकतंत्र में असहमति एक सुरक्षा-वाल्व है, कोई देशद्रोह नहीं। आज की जागरूक जनता केवल नाराज़गी और आरोप-प्रत्यारोप नहीं चाहती, वह एक ऐसा सकारात्मक विकल्प और ऐसी पारदर्शी सत्ता चाहती है, जहाँ किसी एक 'दामाद' के राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए पूरे घर को दांव पर न लगाया जाए।

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शनिवार, 5 सितंबर 2026

देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था

भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र?


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से देशवासियों के समक्ष वर्ष २०४७ तक भारत को एक 'विकसित राष्ट्र' बनाने का स्वप्न प्रस्तुत कर रहे हैं। किंतु दूसरी ओर, कट्टरपंथी शक्तियों ने पीएफआई जैसे संगठनों को मुखौटा बनाकर २०४७ तक भारत को एक इस्लामी राष्ट्र में तब्दील करने का खतरनाक षड्यंत्र रच रखा है। लंबे समय से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो दोनों ही धाराएं एक-दूसरे के मार्ग में बिना हस्तक्षेप किए आगे बढ़ रही हैं। ऐसे में यह एक अत्यंत स्वाभाविक और ज्वलंत प्रश्न उठता है कि यदि २०४७ तक भारत एक विकसित राष्ट्र बन भी जाता है, तो उसका वैचारिक और जनसांख्यिकीय स्वरूप क्या होगा— एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र या एक इस्लामी राष्ट्र? सरकार शायद इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर न दे सके, परंतु वर्तमान परिस्थितियां और जनसांख्यिकीय बदलाव इस बात की ओर स्पष्ट संकेत कर रहे हैं कि एक समुदाय विशेष अपने भयावह एजेंडे में अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ता जा रहा है।

आज भारत में इस्लामी और ईसाई मिशनरियां व्यापक स्तर पर धर्मांतरण के कुत्सित अभियान में संलग्न हैं। इस राष्ट्र-विरोधी कार्य के लिए विदेशों से भारी मात्रा में फंडिंग की जाती है। यही कारण है कि जब विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम (एफसीआरए) को सख्त किया गया, तो उसका चौतरफा और पुरजोर विरोध हुआ।

आज दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि देश का असली विपक्ष कांग्रेस या कोई अन्य राजनीतिक दल नहीं रह गया है, बल्कि मुस्लिम कट्टरपंथी और धर्मांतरण में लिप्त ईसाई मिशनरियां देश के मुख्य विपक्षी की भूमिका में आ गई हैं। कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल तो भारत को खंडित करने और इसके राष्ट्रीय स्वरूप को नष्ट करने के इस भयानक अभियान में मात्र मोहरे बनकर रह गए हैं। यदि हम बीते एक सप्ताह के भीतर घटी घटनाओं का सूक्ष्मता से विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कट्टरपंथियों ने जिस भयावह कार्य को १०-१५ वर्ष बाद अंजाम देने की योजना बनाई थी, उसकी शुरुआत उन्होंने अभी से कर दी है।

उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र के पुणे में राहुल गांधी एक आयोजन करते हैं और उसमें पहले से तैयार की गई स्लाइड के माध्यम से 'मनुस्मृति' का विकृत प्रस्तुतीकरण करते हैं। वे एक तीर से दो शिकार करते हैं— एक ओर वे हिंदुओं पर निशाना साधते हुए उनकी महान परंपराओं और पवित्र ग्रंथों का घोर अपमान करते हैं, तो दूसरी ओर सनातन धर्म की सुदृढ़ और पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था पर सीधा कुठाराघात करते हैं। वे हिंदुओं की हजारों वर्षों से चली आ रही पारिवारिक संरचना को छिन्न-भिन्न करने का आह्वान ठीक उसी प्रकार करते हैं, जैसा जिहादी और ईसाई मिशनरियां सदियों से करती आ रही हैं। वे हिंदू महिलाओं से इन तथाकथित 'रूढ़िवादी बंधनों' को तोड़ने की अपील करते हैं। इसके पीछे का छिपा हुआ एजेंडा क्या है? यही कि उन महिलाओं को जिहादियों और मिशनरियों द्वारा आसानी से अपना शिकार बनाया जा सके।

इस घटना के तुरंत पश्चात, केरल में एक मजहबी उन्मादी मुफ्ती शेख अबू बकर अहमद (कांतपुरम एपी अबूबकर मुसलियार) का एक नितांत महिला-विरोधी और विवादित बयान सामने आता है। कोच्चि के एक सम्मेलन में वह फतवा-नुमा फरमान सुनाता है कि महिलाओं को घरों की चारदीवारी तक ही सीमित रहना चाहिए और सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह दूर रहना चाहिए। उसने महिलाओं की तुलना निर्जीव सोने के गहनों से करते हुए कहा कि जैसे कीमती हार को सुरक्षित डिब्बे में रखा जाता है, वैसे ही महिलाओं को भी पर्दा प्रथा के तहत घर में कैद रखना चाहिए। ध्यातव्य है कि यह मध्ययुगीन फरमान विशेष रूप से केवल मुस्लिम महिलाओं के लिए था।

यद्यपि केरल के कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने आरंभ में एक वीडियो संदेश जारी कर मौलाना के इस कृत्य की कड़ी आलोचना की थी, किंतु बाद में आलाकमान और मुस्लिम लीग के भारी राजनीतिक दबाव में उन्हें अपना वह वीडियो डिलीट कर अपनी आलोचना वापस लेनी पड़ी। इस घोर कट्टरपंथी मानसिकता पर गांधी परिवार (राहुल, प्रियंका या सोनिया) के मुख से विरोध का एक शब्द नहीं निकला। आश्चर्यजनक और निराशाजनक तो यह भी है कि भाजपा को छोड़कर देश के किसी अन्य 'तथाकथित प्रगतिशील' राजनीतिक दल ने इसका विरोध करने का साहस नहीं जुटाया।

इसी कड़ी में एक तीसरी और अत्यंत गंभीर घटना यह है कि 'ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड' ने देशभर में 'सेव इंडिया, सेव शरिया' (दीन और दस्तूर बचाओ) नामक एक बड़ा अभियान शुरू करने की घोषणा की है। इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन की औपचारिक शुरुआत १७ सितंबर २०२६ को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक विशाल शक्ति प्रदर्शन के साथ प्रस्तावित है। देश ने पहले भी देखा है कि ऐसे प्रदर्शनों की आड़ में अनेक कट्टरपंथी, जिहादी और अराजक तत्व कैसे सक्रिय हो जाते हैं। उनका वास्तविक उद्देश्य अपने बाहुबल का परीक्षण करना तथा वर्तमान सरकार के विरुद्ध किसी भी प्रदर्शन को हिंसक और उत्तेजक बनाकर व्यवस्था को घुटनों पर लाना होता है।

इस अभियान के जो मुख्य बिंदु घोषित किए गए हैं, वे पूरी तरह से भ्रामक और अलगाववादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। उनका नैरेटिव यह है कि पिछले १०-१२ वर्षों में (केंद्र की मोदी सरकार के दौरान) मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। इस आंदोलन के पांच मुख्य एजेंडे हैं:

 

१. समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का तीखा विरोध करना।,

२. राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के गायन पर अपनी पुरानी मजहबी आपत्ति को फिर से मुखर करना।,

३. अवैध मदरसों, अतिक्रमण कर बनाई गई मस्जिदों और वक्फ बोर्ड की मनमानी संपत्तियों पर होने वाली कानूनी कार्रवाई (बुलडोजर एक्शन) का विरोध करना।,

४. 'मॉब लिंचिंग' का नैरेटिव गढ़कर एकतरफा मुहिम चलाना, और

५. संवैधानिक अधिकारों की आड़ में अपने मजहबी हितों को साधना।

 

यदि हम इन सभी घटनाओं की कड़ियों को आपस में जोड़ें, तो एक अत्यंत भयानक षड्यंत्र उभरकर सामने आता है। यह षड्यंत्र भारत की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के समक्ष ऐसी विकट चुनौती उत्पन्न करने का है, जिससे सरकार घुटने टेक दे और जिहादियों तथा अतिवादियों द्वारा किए जा रहे भारत के इस सुनियोजित 'राष्ट्रान्तरण' के कार्य में कोई बाधा उत्पन्न न करे। संपूर्ण विश्व का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जहाँ-जहाँ इस्लामिक जिहादी और उग्रवादी तत्वों को तनिक भी प्रश्रय मिला है, वहाँ इन्हीं चरणबद्ध योजनाओं के माध्यम से अंततः इस्लामी राष्ट्र की स्थापना हुई है।

स्मरण रहे, स्वतंत्रता आंदोलन के समय ही कट्टरपंथियों द्वारा समूचे भारत पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का एक अभियान चलाया गया था। तब यह कुतर्क दिया जाता था कि अंग्रेजों ने सत्ता मुस्लिम साम्राज्य से छीनी थी, इसलिए जाते समय उन्हें यह कमान पुनः मुसलमानों को ही सौंपनी चाहिए। जब ऐसा संभव नहीं हो सका, तो उन्होंने भारत को खंडित कर धर्म के आधार पर एक अलग देश ले लिया, किंतु साथ ही एक विषैला नारा भी गढ़ा— "हंस कर लिया पाकिस्तान, लड़ कर लेंगे हिंदुस्तान।" मुस्लिम आबादी का एक बड़ा वर्ग, जिसने पाकिस्तान बनाने के लिए हिंसक आंदोलन चलाया था, वह विभाजन के बाद पाकिस्तान गया ही नहीं। उनका कुटिल मानना था कि उन्हें भारत भूमि के एक टुकड़े से संतोष नहीं है, उन्हें समूचा भारत चाहिए और वे इसके लिए निरंतर प्रयास करते रहेंगे। और आज ठीक वही प्रयास हो रहे हैं।

यह हमारा दुर्भाग्य रहा कि तत्कालीन नेतृत्व (विशेषकर गांधी और नेहरू) ने सुनियोजित तरीके से इन अलगाववादी प्रयासों को ढाल प्रदान की। स्वतंत्रता के बाद का यदि हम इतिहास देखें, तो ऐसा प्रतीत होता है कि स्वतंत्र भारत की पहली सरकार के समय से ही देश को एक इस्लामी राष्ट्र बनाने का परोक्ष अभियान चलाया जाता रहा, जिसे सत्ता का संरक्षण भी प्राप्त था। इसलिए, आज कांग्रेस से कोई गिला-शिकवा नहीं है। वास्तविक गिला-शिकवा तो उन अचेत हिंदुओं से है, जो आज भी ऐसी राजनीतिक ताकतों के पीछे आंख मूंदकर घूम रहे हैं, जिनका देश की अस्मिता, एकता और अखंडता से कोई सरोकार नहीं है।

जो विनाशकारी कार्य आज से १०-१५ वर्ष बाद अपने चरम पर पहुँचना था, उसकी आक्रामक शुरुआत अभी से हो चुकी है। इसके बाद की जो स्थिति उत्पन्न होती है, वह और भी भयावह होती है, जिसे 'गृहयुद्ध' कहा जाता है। इतिहास गवाह है कि ऐसी स्थिति में कट्टरपंथी 'मोपला विद्रोह' और 'डायरेक्ट एक्शन डे' की तरह देश के मूल निवासियों का बर्बर नरसंहार करते हैं। लोगों को या तो धर्मांतरण के लिए विवश किया जाता है, या वे मौत के घाट उतार दिए जाते हैं। अंततः जबरन उस देश पर शरिया कानून थोप दिया जाता है। बचे-खुचे मूल निवासी कालांतर में उसी तरह विलुप्त हो जाते हैं, जैसे आज पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू कहीं खो गए हैं।

इस पावन भारतवर्ष ने अपने इतिहास में १० करोड़ से अधिक हिंदुओं का नरसंहार झेला है, जो इस पृथ्वी का सबसे बड़ा और क्रूरतम नरसंहार है। लेकिन सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इतनी भयानक ऐतिहासिक त्रासदियों और वर्तमान के स्पष्ट पदचापों के बावजूद, हिंदू समाज आज भी गहरी निद्रा में है। यदि वे अभी भी सचेत नहीं हुए, तो स्वाभाविक रूप से उनके हिस्से में क्या आने वाला है, यह समझना अब तनिक भी मुश्किल नहीं है।

                    — शिव मिश्रा

शनिवार, 29 अगस्त 2026

क्या कॉर्पोरेट जगत के निशाने पर हैं हिंदू परंपराएं?

 


रक्षाबंधन : हिन्दू त्योहार और विज्ञापन: क्या कॉर्पोरेट जगत के निशाने पर हैं हिंदू परंपराएं? || बॉलीवुड और ऐड एजेंसियों का गहरा रिश्ता


अभी हाल ही में चांदी के आभूषण बेचने वाली कंपनी गिवा के रक्षाबंधन विज्ञापन ने हिंदुओं की आस्था और सांस्कृतिक चेतना को अत्यधिक ठेस पहुंचाने का कार्य किया है। बॉलीवुड अभिनेत्री कृति सेनन वाले इस विज्ञापन को लेकर पूरे देश और सोशल मीडिया पर यह भारी आपत्ति उठी कि रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक पर्व की प्रस्तुति और अभिनेत्री के परिधान में भारतीय सांस्कृतिक संदर्भों का लेशमात्र भी ध्यान नहीं रखा गया। इस विज्ञापन में मुख्य कलाकार के कपड़े, जो इंडो-वेस्टर्न स्टाइल के हैं और जिसमें लगभग नग्नता का प्रदर्शन किया गया है, भारतीय परिवार की गरिमा के बिल्कुल भी अनुकूल नहीं हैं। हिंदू परिवारों की बहन और बेटियां अपने भाई और पिता के समक्ष इस तरह का अर्धनग्न प्रदर्शन नहीं करतीं।

इस विज्ञापन का एक और घोर आपत्तिजनक पहलू अभिनेत्री द्वारा अपने भाई से पहले अपने पालतू कुत्ते को राखी बांधना है। यह सीधे तौर पर भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और बहन की दृष्टि में भाई की हैसियत का भद्दा मजाक उड़ाना है।

लेकिन यदि फिल्म या ad बनाने वाले अगर ऐसे समाज से हों जहां न कोई भाई होता है , न कोई बहन, तो क्या अपेक्षा करें. कहीं भी, कभी भी, किसी से कुछ भी करने की चाहत रखने वाले, भाई बहिन के पवित्र रिश्ते को नहीं समझ सकते. उनके लिए रक्षा बंधन उपभोक्ता वाद की एक तारीख होती है और उनकी कोई मां, बहिन, बेटी नहीं होती, सब केवल औरते ही होती हैं. लेकिन अपनी को तिरपाल में ढकने वाला अगर ad में भी किसी हिन्दू महिला को लगभग नग्नावस्था में दिखाता हो, तो वह व्यक्ति निम्नस्तरीय मानसिकता का तो होगा ही, उसके इरादे बेहद खतरनाक होंगे और सभी हिन्दुओं को इस षड्यंत्र से सावधान होने की आवश्यकता है.

गिवा विवाद को केवल कपड़े छोटे थे या बड़े या भाई से पहले कुत्ते को राखी क्यों बांधी, की बहस तक सीमित कर देना शायद इस पूरे प्रकरण की गंभीरता को कम आंकना होगा। विज्ञापन का उद्देश्य उपभोक्ता के मन में किसी भावना को उत्पाद से जोड़ना होता है। यदि रक्षाबंधन को चुना गया है, तो स्वाभाविक रूप से दर्शक उस विज्ञापन में भाई-बहन के संबंध और भारतीय पारिवारिक-सांस्कृतिक वातावरण की अपेक्षा करेगा। भारी विरोध और हिंदू संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद गिवा ने भारतीय संस्कृति और परंपराओं का सम्मान करने का खोखला हवाला देते हुए इस विज्ञापन को वापस ले लिया, लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या कंपनी के संचालकों में इतनी बुद्धि और विवेक भी नहीं है कि वे भारतीय संस्कृति और त्योहारों की संवेदनशीलता का ध्यान रख सकें।

भारत में त्योहार केवल बाजार के लिए उत्पादों की बिक्री का अवसर नहीं हैं। वे हमारी प्राचीन सभ्यता और सनातन संस्कृति के जीवंत प्रमाण हैं। इन उत्सवों के पीछे छिपा हुआ मनोविज्ञान केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और पारिवारिक शुचिता तथा पारस्परिक प्रेम के अनुष्ठान होते हैं। रक्षाबंधन भाई-बहन के पवित्र प्रेम और विश्वास का पर्व है, दीपावली प्रकाश और आध्यात्मिक चेतना का, नवरात्रि शक्ति-उपासना का और होली सामाजिक उल्लास का महान प्रतीक है। इन सब के पीछे गहरे वैज्ञानिक और सामाजिक कारण छिपे हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था के उत्प्रेरक भी रहे हैं।

आजकल भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार का उपयोग केवल उत्पादों की बिक्री के लिए ही नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसके बहाने प्राचीन सनातन संस्कृति और हिंदुत्व को गहरी चोट पहुंचाने का सुनियोजित षड्यंत्र भी रचा जा रहा है। गिवा, तनिष्क, पेटा जैसे अनगिनत संस्थान नाना प्रकार से भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति पर सीधा प्रहार कर रहे हैं। यह सब अचानक शुरू नहीं हुआ है, बल्कि इसका एक लंबा इतिहास है।

असीम प्रेमजी की कंपनी गिवा का विवादित कृत्य

कई बहुराष्ट्रीय तथा घरेलू कंपनियां हिंदू विरोधी कार्य के लिए बड़ी मात्रा में फंडिंग करती हैं और इसमें दिखावे के लिए हिंदू नामों और चेहरों को ही माध्यम बनाया जाता है। त्योहारों के अवसर पर ब्रांड और उत्पादन की बिक्री बढ़ाने के लिए लुभावने विज्ञापन बनाना अनुचित नहीं कहा जा सकता, लेकिन अगर इसे त्योहारों की सांस्कृतिक संवेदनशीलता को समझे बिना इस ढंग से बनाया जाए कि उससे न केवल त्योहार की गरिमा को ठेस लगे बल्कि हिंदुत्व और सनातन संस्कृति का भी अपमान हो, तो यह एक प्रकार का अपराध है।

विवादों का पुराना इतिहास और बहुराष्ट्रीय षड्यंत्र

यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में एक ऐसा पैटर्न उभरा है, जहां हिंदू त्योहारों के समय कॉर्पोरेट ब्रांड्स अपने विज्ञापनों के जरिए तथाकथित सामाजिक सुधार का संदेश देने का ढोंग रचते हैं। आलोचकों का स्पष्ट तर्क है कि जब भी हिंदू त्योहार आते हैं, ब्रांड्स अचानक पर्यावरण, पितृसत्ता या धर्मनिरपेक्षता पर ज्ञान देने लगते हैं। त्योहार की पारंपरिक वेशभूषा, जैसे माथे पर बिंदी न होना, से लेकर रस्मों के अर्थ बदलने तक, विज्ञापनों के जरिए हिंदू संस्कृति को पिछड़ा या सुधार की आवश्यकता वाला दिखाने की कोशिश की जाती है।

यदि हम पिछले कुछ वर्षों के विज्ञापनों पर नजर डालें तो तनिष्क का वर्ष दो हजार बीस का एकत्वम अभियान आज भी चर्चित उदाहरणों में से एक है जिसमें एक हिन्दू महिला को उसके मुस्लिम ससुराल में गोद भराई की रस्म में दिखाया गया था। तनिष्क का घोषित उद्देश्य यदि अलग-अलग समुदायों के बीच एकता का संदेश देना था, तो किसी मुस्लिम लड़की की शादी हिन्दू घर में भी दिखाई जा सकती थी। तनिष्क का विरोध और बहिष्कार हुआ और उसे विज्ञापन वापस लेना पड़ा, लेकिन तब तक कंपनी की काफी व्यावसायिक क्षति हो चुकी थी।

इसी तरह फैबइंडिया ने दीवाली के अपने संग्रह को जश्न-ए-रिवाज़ का उर्दू नाम दिया और मॉडल्स को बिना बिंदी के दिखाया। जो दीवाली के अब्राहमीकरण का सीधा प्रयास है । मान्यवर के विज्ञापन में आलिया भट्ट ने हिंदू विवाह की सबसे पवित्र रस्म कन्यादान पर सवाल उठाते हुए उसे कन्यामान में बदलने की वकालत की, जिसे हिंदू विवाह पद्धतियों के अपमान होता है। सर्फ एक्सेल ने होली के रंगों को नमाज पढ़ने जा रहे एक बच्चे से जोड़कर दिखाया, जिसे अनावश्यक धार्मिक तुष्टिकरण करार दिया गया।

यह केवल विज्ञापन और संस्कृति का टकराव नहीं है। इस तरह के विज्ञापन या फिल्में बनाना लंबे विचार-विमर्श के बाद तय किया जाता है। यदि किसी कंपनी को जानबूझकर सनातन संस्कृति और हिंदुत्व पर चोट करनी हो, तो विज्ञापन को ज्यादा से ज्यादा घातक बनाने की कोशिश की जाती है। यह वामपंथी इस्लामी गठजोड़ और डीप स्टेट द्वारा किया गया एक सुनियोजित हमला है। हिंदुओं के कई त्योहारों पर ऐसा हुआ है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी अन्य धर्म के त्योहार जैसे ईद या क्रिसमस पर भी इस तरह का ज्ञान देने वाला विज्ञापन बनाया जा सकता है।

परोपकार की आड़ में वैचारिक फंडिंग

विज्ञापनों से परे, यह बहस कॉर्पोरेट फंडिंग तक भी जाती है। विप्रो के संस्थापक अजीम प्रेमजी को यद्यपि भारत के सबसे बड़े दानवीरों में गिना जाता है और प्रायः यह बताया जाता है कि उन्होंने शिक्षा और सामाजिक कार्यों के लिए अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा दान किया है। लेकिन उनके फिलैंथ्रोपिक इनिशिएटिव्स और अन्य ट्रस्टों द्वारा की जाने वाली फंडिंग पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि वे अपने दीन की सेवा के लिए जाने जाते हैं और उनके पैसों का उपयोग हिंदुत्व के विरोध में किया जाता है।

आरोप है कि उनके ट्रस्ट का पैसा उन गैर-सरकारी संगठनों, थिंक-टैंक और द वायर जैसे स्वतंत्र मीडिया पोर्टल्स को जाता है, जिनका संपादकीय रुख हमेशा हिंदुत्व विरोधी या हिंदू राष्ट्रवाद का मुखर आलोचक होता है। दीन-हीनों की सेवा के नाम पर दिया गया यह पैसा ऐसी संस्थाओं तक पहुँचता है, जो अदालतों से लेकर सड़कों तक, ऐसे मुद्दे उठाती हैं जो अंततः हिंदू परंपराओं, त्योहारों और राष्ट्रीय सुरक्षा के नैरेटिव के खिलाफ जाते हैं। इस फंडिंग का उद्देश्य केवल सामाजिक कल्याण नहीं है, बल्कि एक विशिष्ट प्रकार की राजनीतिक और वैचारिक जमीन तैयार करना है, जो सनातन धर्म और हिंदुत्व की जड़ों को खोखला करती है।

निष्कर्ष और समाधान

तनिष्क की घटना से जिन्हें सीखना था उन्होंने निश्चित रूप से सीखा होगा, लेकिन जिन्हें जानबूझकर हिंदुत्व और हिंदुओं के त्योहारों को अभद्र रूप से पेश कर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सनातन चेतना को चोट पहुंचानी है, वे आज भी सुनियोजित षड्यंत्र रचते चले आ रहे हैं। सोशल मीडिया के आज के युग में और हिंदुओं की चेतना के पुनर्जागरण के काल में, यह काम अब आसान नहीं रह गया है।

सनातन संस्कृति के विरुद्ध षड्यंत्र रचने वालों को यह बात याद रखनी चाहिए कि भारत केवल एक उपभोक्ता बाजार नहीं है। यहाँ धर्म और संस्कृति करोड़ों लोगों की व्यक्तिगत आस्था और पारिवारिक पहचान से जुड़े हैं। इसलिए कोई विज्ञापन निर्माता यदि हिन्दू विवाह, पूजा, रक्षाबंधन, दीपावली या अन्य धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करता है, तो उसे यह समझना चाहिए कि सनातन धर्म को अन्य धर्मों की अपेक्षा कमतर दिखाकर धर्मांतरण और इस्लामीकरण की योजनाओं को अंजाम देना अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

सभी हिंदुओं को एकजुट होकर इसका विरोध करना चाहिए। यदि भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमला किया जाता है, तो उसका भरपूर जवाब देना आवश्यक है। ऐसे उत्पादों और ऐसी कंपनियों का पूर्ण बहिष्कार करना चाहिए और उनके खिलाफ वैचारिक संघर्ष के लिए सभी को तैयार रहना चाहिए। इसके साथ ही, सरकार पर भी इस बात का भारी दबाव बनाया जाना चाहिए कि ऐसे सख्त कानून बनाए जाएं जिससे भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति पर हो रहे ये हमले बंद हो सकें।

सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञापनों के सार्वजनिक प्रदर्शन से पहले उन पर सख्त नियमन हो। जिस तरह फिल्मों के प्रदर्शन से पहले फिल्म सेंसर बोर्ड उनकी समीक्षा करता है, ठीक उसी तरह विज्ञापनों के लिए भी एक कठोर विज्ञापन नियामक बोर्ड की स्थापना होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाए जा रहे हिंदू विरोधी सामग्री की भी गहन समीक्षा और उस पर सख्त नियंत्रण होना चाहिए ताकि कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में बहुसंख्यक समाज की आस्था के साथ खिलवाड़ करने की इस कुत्सित परंपरा का अंत हो सके।

~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~

रविवार, 23 अगस्त 2026

वन्देमातरम पर संग्राम: राष्ट्रगीत का ऐतिहासिक सफर, नया कानून और तुष्टीकरण की राजनीति


 

वन्देमातरम पर संग्राम: राष्ट्रगीत का ऐतिहासिक सफर, नया कानून और तुष्टीकरण की राजनीति

जुलाई २०२६ के मानसून सत्र में मोदी सरकार द्वारा एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, २०२६ पारित किया गया। इस नए कानून के माध्यम से राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान पूर्ण वैधानिक दर्जा और सुरक्षा प्रदान कर दी गई है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह नया कानून पूरे देश में लागू हो चुका है। देश जब अपने अस्सीवें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पूर्ण 'वंदे मातरम्' गीत गाए जाने के गौरव से अभिभूत अनुभव कर रहा था, तभी दुर्भाग्यवश इसका अपमान भी शुरू हो गया। और यह विवाद किसी और ने नहीं, बल्कि देश की सबसे पुरानी पार्टी, कांग्रेस द्वारा खड़ा किया गया। यह विडंबना ही है कि जिस गीत ने कभी पूरे देश को आजादी के लिए एक सूत्र में पिरोया था, आज उसी गीत को राजनीतिक तुष्टीकरण की भेंट चढ़ाया जा रहा है।

नया कानून: राष्ट्रगीत को मिला सर्वोच्च सम्मान और कड़े दंड का प्रावधान -

नए वैधानिक संशोधनों के अनुसार अब राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' को भी राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान की तरह पूरी तरह कानूनी संरक्षण मिल गया है। इस कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम् के गायन को रोकता है या उसके गायन अथवा प्रस्तुति के दौरान सभा में बाधा उत्पन्न करता है, तो इसे एक गंभीर दंडनीय अपराध माना जाएगा। इसके लिए अधिकतम तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया है। गृह मंत्रालय के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, सरकारी कार्यक्रमों और आधिकारिक अवसरों के लिए 'वंदे मातरम्' के पूरे छह छंदों वाले पूर्ण प्रारूप को गाने का समय लगभग तीन मिनट दस सेकंड निर्धारित किया गया है। अब आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगान से पहले राष्ट्रीय गीत को स्थान दिया गया है और इसके आधिकारिक गायन या वादन के दौरान 'सावधान' की मुद्रा में खड़े रहने का प्रोटोकॉल अनिवार्य कर दिया गया है।

पंद्रह अगस्त का विवाद और कांग्रेस का अड़ियल रुख -

विवाद की शुरुआत पंद्रह अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान हुई। 'वंदे मातरम्' के गायन के दौरान एक वीडियो सामने आया जिसमें सोनिया गांधी ने स्टाफ से दो छंद पूरे होने के बाद गीत को रोकने के लिए कहा। इस दौरान मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी के बीच हुई बातचीत सार्वजनिक हो गई और यहीं से एक बड़े विवाद ने जन्म ले लिया। शुरुआत में कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने इसे छुपाने का प्रयास किया और बहाना बनाया कि यह बातचीत मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी मंगाने के संदर्भ में थी। लेकिन जब विवाद बढ़ा, तो कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने सामने आकर स्पष्ट किया कि कांग्रेस शुरू के दो छंद गाने की अपनी पुरानी नीति पर ही कायम रहेगी और पूरा राष्ट्रगीत नहीं गाएगी। अपने इस कदम को सही ठहराने के लिए कांग्रेस ने अपने लगभग नौ दशक पुराने प्रस्ताव का हवाला दिया।

वन्दे मातरम् का जन्म और स्वतंत्रता संग्राम का प्रयाण-गीत -

अठारह सौ सत्तर के दशक में ब्रिटिश शासकों ने सरकारी समारोहों में 'गॉड सेव द क्वीन' गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था। अंग्रेजों के इस तानाशाही आदेश से बंकिमचन्द्र चटर्जी, जो उन दिनों एक सरकारी अधिकारी थे, को बहुत ठेस पहुँची। इसके विकल्प के तौर पर उन्होंने अठारह सौ पचहत्तर में संस्कृत और बाँग्ला भाषा के मिश्रण से एक नये गीत की रचना की, जिसका शीर्षक था - 'वन्दे मातरम्'

अठारह सौ बयासी में जब उन्होंने 'आनन्द मठ' नामक उपन्यास लिखा, तब मातृभूमि के प्रेम से ओतप्रोत इस गीत को उसमें शामिल कर लिया। यह उपन्यास अंग्रेजी शासन, जमींदारों के शोषण और अकाल से मर रही जनता को जागृत करने हेतु संन्यासी विद्रोह पर आधारित था। उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम का एक संन्यासी विद्रोही गाता है।

अठारह सौ छियानवे में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अधिवेशन में इस गीत का पूर्ण संस्करण गाया गया, जिसके प्रथम स्टेज परफॉर्मर और कम्पोजर स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर थे। उन्नीस सौ पांच में जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया, तो इस गीत ने चमत्कार कर दिया। सात अगस्त उन्नीस सौ पांच को बंग-भंग का विरोध करने जुटी भीड़ के बीच अचानक यह समवेत स्वर गूंज उठा और पूरा आसमान 'वंदे मातरम' के घोष से भर गया। रातों-रात यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रयाण-गीत बन गया।

मदनलाल ढींगरा, खुदीराम बोस, सूर्यसेन, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खान जैसे अनगिनत क्रांतिकारियों ने 'वंदे मातरम' कहते हुए फांसी के फंदे को चूमा। भगत सिंह अपने पिता को लिखे पत्रों में इसी गीत से अभिवादन करते थे। सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज ने इस गीत को अंगीकार किया था।

विरोध के स्वर: मुस्लिम लीग और अलगाववादी राजनीति-

जैसे-जैसे स्वतंत्रता संग्राम आगे बढ़ा, विभाजनकारी ताकतों ने इस महान गीत पर निशाना साधना शुरू कर दिया। इस गीत को एकीकृत करने वाले स्वर के रूप में देखने से सबसे पहले इंकार उन्नीस सौ तेईस में काकीनाड कांग्रेस अधिवेशन में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अहमद अली ने किया। उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के पुरोधा पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर को वन्दे मातरम्‌ गाने के बीच में ही टोक दिया था। लेकिन पं. पलुस्कर ने उस समय गीत का अपमान नहीं होने दिया और वे पूरा गाना गाकर ही रुके।

उन्नीस सौ तीस के दशक में मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने मजहब आधारित राजनीति के तहत इसके खिलाफ एक मजबूत अभियान चलाया। उनका तर्क था कि इसमें भारत माता को देवी दुर्गा के रूप में चित्रित किया गया है, जो इस्लाम की मान्यताओं के अनुकूल नहीं है। मुस्लिम लीग ने इसे मूर्तिपूजक और मुस्लिम विरोधी बताया।

यहां यह ध्यान देना आवश्यक है कि दुनिया के कई देशों के राष्ट्रगीतों या राष्ट्रगानों में उनकी संस्कृति और मान्यताओं का समावेश होता है। ब्रिटेन के राष्ट्रगान में रानी को भगवान द्वारा बचाने की प्रार्थना है, लीबिया का राष्ट्रगीत 'अल्लाहो अकबर' की पुकार लगाता है, और सीरिया के राष्ट्रगीत में 'अरबवाद' की चर्चा है। इन देशों में कभी इन गीतों को सांप्रदायिक चश्मे से नहीं देखा गया, लेकिन भारत में मुस्लिम लीग ने इसे हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा बना दिया।

तुष्टीकरण का आरंभ: उन्नीस सौ सैंतीस का वैचारिक आत्मसमर्पण -

मुस्लिम लीग की आपत्तियों और दबावों के आगे तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने झुकना शुरू कर दिया। उन्नीस सौ सैंतीस में जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद और सुभाष चंद्र बोस की समिति ने (रवींद्र नाथ टैगोर के मार्गदर्शन में) यह निर्णय लिया कि इस गीत के केवल शुरुआती दो पद ही गाए जाएंगे। उनका तर्क था कि बाद के पदों में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र है, जिससे मुसलमानों को आपत्ति हो सकती है।

नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को एक पत्र लिखा था, जिसमें कहा गया था कि 'आनंदमठ' की पृष्ठभूमि मुसलमानों को परेशान कर सकती है। कांग्रेस ने सांप्रदायिक सद्भाव के नाम पर मुस्लिम लीग के सामने वैचारिक घुटने टेक दिए।

निष्कर्ष: वैचारिक प्रतीकों की महत्ता और राजनीतिक दलों के लिए संदेश-

'वंदे मातरम्' पर उठा यह वर्तमान विवाद केवल एक गीत को गाने या न गाने का साधारण प्रश्न नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की उस वैचारिक यात्रा का प्रतिबिंब है जो उन्नीस सौ पांच के स्वदेशी आंदोलन से शुरू होकर आज तक पहुँची है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिस 'वंदे मातरम्' के पूर्ण गान ने उन्नीस सौ पांच में विभाजित बंगाल को वापस जोड़ दिया था और अंग्रेजों को अपना फैसला बदलने पर मजबूर कर दिया था, उसी गीत को उन्नीस सौ सैंतीस में सांप्रदायिक दबावों के चलते खंडित कर दिया गया।

गीत का यह बँटवारा भले ही देश के विभाजन का प्रत्यक्ष कारण न रहा हो, लेकिन यह उस वैचारिक कमजोरी, मुस्लिम तुष्टीकरण और समझौतावादी मानसिकता का सबसे बड़ा प्रतीक अवश्य था, जिसने अलगाववादियों के हौसले बढ़ाए और अंततः देश के विभाजन को संभव बनाया। यदि इस गीत रूपी मंत्र के टुकड़े न हुए होते, तो शायद देश के टुकड़े होने की नौबत भी नहीं आती।

सरकार के लिए यह आवश्यक है कि नए कानून के माध्यम से 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रगान के समान वैधानिक दर्जा देना केवल एक कानूनी कदम बनकर न रह जाए।

दूसरी ओर, देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिए यह विवाद एक गंभीर चेतावनी है।   उन्नीस सौ सैंतीस में जिस 'मुस्लिम तुष्टीकरण' की नीति के तहत गीत के टुकड़े करने का समझौता किया गया था, उसी तुष्टीकरण की राजनीति को पार्टी आज भी अपनी ढाल बनाए हुए है। राष्ट्र के प्रतीकों से दूरी बनाने का सीधा अर्थ राष्ट्र की मूल चेतना और उसकी आत्मा से कटना है। यदि कांग्रेस पार्टी एक वर्ग विशेष को खुश करने के लिए 'वंदे मातरम्' जैसे अपने ही गौरवशाली ऐतिहासिक प्रतीकों का अपमान या बहिष्कार जारी रखती है, और अपने तुष्टीकरण की चरित्रहीनता से बाज नहीं आती, तो आने वाले समय में उसकी बची-खुची प्रासंगिकता भी समाप्त हो जाएगी और  राजनीतिक भविष्य भी।  ~~~~~शिव मिश्रा ~~~~


 

यूपीआई, शुल्क और राजनीति: डिजिटल संप्रभुता, बाज़ार की हकीकत और कूटनीति का त्रिकोण

  यूपीआई , शुल्क और राजनीति: डिजिटल संप्रभुता , बाज़ार की हकीकत और कूटनीति का त्रिकोण                            — शिव प्रकाश मिश्रा   ...