रविवार, 5 जुलाई 2026

भारत-पाकिस्तान वार्ता की नई पुकार: शांति की पहल या कुछ और?

 


भारत-पाकिस्तान वार्ता की नई पुकार: शांति की पहल या कुछ और?

शिव प्रकाश मिश्रा, वरिष्ठ स्तंभकार

शांति एक सुंदर शब्द है। इतना सुंदर कि उसके नाम पर उठने वाले प्रश्न भी कई बार असुविधाजनक लगने लगते हैं। कौन चाहेगा कि दो पड़ोसी देश हमेशा तनाव में रहें? कौन युद्ध चाहेगा? कौन नहीं चाहेगा कि सीमाओं पर बंदूकें शांत हों, व्यापार बढ़े, लोग एक-दूसरे से मिलें और आने वाली पीढ़ियां भयमुक्त वातावरण में जी सकें? लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल सुंदर शब्दों से नहीं चलती। वहां सदिच्छा के साथ स्मृति भी चाहिए, आदर्शों के साथ अनुभव और शांति की इच्छा के साथ राष्ट्रीय हितों की समझ भी। विशेष रूप से तब, जब सामने पाकिस्तान जैसा पड़ोसी हो, जिसके साथ भारत के संबंधों का इतिहास जितना वार्ताओं से भरा है, उतना ही युद्धों, विश्वासघात और सीमा पार आतंकवाद के रक्तरंजित अध्यायों से भी।

इसी पृष्ठभूमि में भारत के 61 और पाकिस्तान के 56 प्रमुख नागरिकों द्वारा दोनों देशों के प्रधानमंत्रियोंनरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफको लिखा गया खुला पत्र महत्वपूर्ण हो जाता है। इस पत्र में पूर्ण राजनयिक संबंधों की बहाली, उच्चायुक्तों की वापसी, सामान्य वीजा सेवाओं को फिर शुरू करने, व्यापार और परिवहन संपर्क खोलने, व्यापक द्विपक्षीय संवाद आरंभ करने और जम्मू-कश्मीर सहित विवादित विषयों पर बातचीत की मांग की गई है।

भारतीय हस्ताक्षरकर्ताओं में डॉ. फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, मीरवाइज उमर फारूक, मणिशंकर अय्यर, प्रो. मनोज झा और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के पूर्व प्रमुख ए. एस. दुलत जैसे चर्चित नाम शामिल बताए गए हैं, जो पाकिस्तान के साथ खड़े होने का आभास देते रहे हैं।

लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को शांति की अपील करने का अधिकार है। इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की नीयत पर प्रश्न न भी उठाए तो भी किसी राजनीतिक अथवा कूटनीतिक पहल का मूल्यांकन केवल उसके शब्दों से नहीं, उसके समय, संदर्भ और संभावित परिणामों से भी किया जाता है। इसलिए पहला प्रश्न यही हैयह अपील इसी समय क्यों?

क्या यह केवल संयोग है कि पाकिस्तान इस समय सिंधु जल संधि को पुनः सक्रिय कराने के लिए अंतरराष्ट्रीय वातावरण बनाने में लगा है; लगभग उसी समय भारत-पाकिस्तान संबंधों को सामान्य करने की मांग उठ रही है; और भारत के भीतर भी कुछ राजनीतिक शक्तियां सरकार की पाकिस्तान नीति को लेकर नया विमर्श खड़ा करती दिखाई दे रही हैं?

पहलगाम के बाद इतनी जल्दी सामान्य संबंधों की बात क्यों?

22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले में 26 निर्दोष लोगों की हत्या कर दी गई। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया। इसके बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से पाकिस्तान स्थित आतंकवादी ढांचे के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई की और कई महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम उठाए। इनमें 1960 की सिंधु जल संधि को स्थगित करना सबसे दूरगामी निर्णयों में एक था। भारत का घोषित रुख स्पष्ट हैसिंधु जल संधि तब तक स्थगित रहेगी, जब तक पाकिस्तान विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय रूप से सीमा पार आतंकवाद का समर्थन नहीं छोड़ता।

शांति का आह्वान तभी विश्वसनीय होता है, जब उसमें पीड़ित और आक्रांता के बीच अंतर करने का नैतिक साहस भी हो। पहलगाम कोई अकेली घटना नहीं थी। भारत 1993 के मुंबई सीरियल बम विस्फोट, संसद भवन पर हमला, मुंबई ट्रेन विस्फोट, 26/11, पठानकोट, उरी और पुलवामा जैसी अनेक भीषण आतंकवादी घटनाएं झेल चुका है। हजारों परिवारों ने इसकी कीमत चुकाई है।

पानी की बेचैनी और शांति की नई पुकार :  भारत-पाकिस्तान संबंधों के वर्तमान घटनाक्रम को सिंधु जल संधि से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 1960 में हस्ताक्षरित इस संधि को विमर्श के माध्यम से लंबे समय तक दुनिया के सफल जल-वितरण समझौतों में गिनाया जाता रहा है। जबकि यह एक तरफा पाकिस्तान के लिए अत्यधिक उदार और लाभप्रद  और भारतीय हितों के प्रतिकूल था।  युद्ध हुए, सीमाएं रक्तरंजित हुईं, कूटनीतिक संबंध टूटे, भारत ने आतंकवाद झेलालेकिन सिंधु का पानी बहता रहा। पहलगाम के बाद पहली बार भारत ने एक नई रणनीतिक सीमा रेखा खींची। संदेश था सहयोग और आतंकवाद अनंतकाल तक साथ-साथ नहीं चल सकते। पानी और खून एक साथ नहीं बह सकता । यही पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता है।

पाकिस्तान की कृषि, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली पर अत्यधिक निर्भर है और इस समय गंभीर जल संकट से गुजर रहा है। 30 जून 2026 को इस्लामाबाद में सिंधु जल संधि पर एक अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया, भारत के विरुद्ध विमर्श बनाने के लिए। पाकिस्तान के वरिष्ठ नेताओं ने इस मंच का उपयोग भारत की नीति के विरुद्ध अपना पक्ष रखने के लिए किया। पाकिस्तान ने भारत पर जल को हथियार बनानेका आरोप लगाया, जबकि भारत का तर्क है एकतरफा सद्भावना आधारित व्यवस्था का लाभ पाकिस्तान अनंतकाल तक कैसे मांग सकता है, जो सीमा पार आतंकवाद को संरक्षण देता रहे?

अब पाकिस्तान सिंधु जल विवाद को अंतरराष्ट्रीय कानूनी, मानवीय और पर्यावरणीय विमर्श में बदलने का प्रयास करता दिखाई दे रहा है। इस्लामाबाद सम्मेलन के बाद कोलंबो में एक प्रस्तावित आयोजन की भी सूचना है। यदि ऐसी श्रृंखलाबद्ध गतिविधियां आगे बढ़ती हैं, तो उन्हें अलग-अलग अकादमिक आयोजनों के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े कूटनीतिक अभियान के संदर्भ में देखना होगा।

पाकिस्तान का संभावित उद्देश्य समझना कठिन नहीं हैसिंधु जल प्रश्न का अंतरराष्ट्रीयकरण, भारत को कठोर और असहयोगी पक्ष के रूप में प्रस्तुत करना और ऐसा वातावरण तैयार करना, जिसमें नई दिल्ली पर संधि की पुरानी व्यवस्था बहाल करने का आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़े। यहीं 117 प्रमुख नागरिकों के पत्र का समय प्रश्नों के घेरे में आता है।

वार्ता की मेज और आतंक की बंदूक : पाकिस्तान के संदर्भ में वार्ता और हिंसा हमेशा एक-दूसरे के विकल्प नहीं रहे बल्कि समानांतर चलते रहे हैं। फरवरी 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस से लाहौर गए। लाहौर घोषणा हुई, विश्वास बहाली की बातें हुईं। लेकिन कुछ ही महीनों बाद कारगिल हो गया। 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हमला हुआ। 166 लोग मारे गए और तीन दिनों तक भारत की आर्थिक राजधानी आतंक के साये में रही। दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाहौर गए और तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मिले। इसे शांति की दिशा में साहसिक व्यक्तिगत कूटनीति माना गया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद पठानकोट वायुसेना स्टेशन पर हमला हुआ। फिर उरी, पुलवामा और अंततः पहलगाम।

इसलिए समस्या संवाद की कमी नहीं, पाकिस्तान की उस सुरक्षा संरचना में है, जिसमें भारत-विरोधी आतंकवादी संगठनों का उपयोग रणनीतिक साधन के रूप में किया जाता है?

छद्म युद्ध का बदलता चेहरा : 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के सामने यह वास्तविकता स्पष्ट हो गई थी कि पारंपरिक युद्ध में भारत को निर्णायक रूप से पराजित करना अत्यंत कठिन है। इसके बाद छद्म युद्ध, आतंकवादी संगठनों, कट्टरपंथी नेटवर्क, जाली मुद्रा, मादक पदार्थों और सामाजिक अस्थिरता पैदा करने वाली गतिविधियों का महत्व बढ़ता गया।

विमर्श का घरेलू राजनीतिक पक्ष भी है : विपक्ष के सामने सरकार को चुनौती देने के लिए एक प्रभावी वैकल्पिक राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने की चुनौती है। पश्चिम एशिया की अस्थिरता, ऊर्जा आपूर्ति की चिंता, तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक व्यापार तनाव के बीच विपक्ष ने भ्रम फैलाया कि भारत में आर्थिक सुनामी आएगी  लेकिन वित्त वर्ष 2025-26 में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत रही। प्रमुख आर्थिक आंकड़े भारत की स्वस्थ अर्थव्यवस्था की गवाही दे रहे हैं. जिसे विनिर्माण और मजबूत घरेलू मांग से बल मिला।  वित्तीय वर्ष  2026-27 में भी किसी गंभीर संकट की संभावना निकट भविष्य में दिखाई नहीं पड़ती. आंकड़ों के अनुसार खुदरा महंगाई दर 3.93% के आसपास नियंत्रित है। बिजली और ऑटोमोबाइल सेक्टर में तेज वृद्दि के कारण देश का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक  पांच महीने के उच्चतम स्तर 5.1% पर पहुंच गया है। जून 2026 में देश का सकल जीएसटी संग्रह सालाना आधार पर 13.9% बढ़कर ₹1.95 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गया है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार $682.32 बिलियन के बेहद मजबूत स्तर पर है, जो किसी भी बाहरी आर्थिक झटके से सुरक्षा प्रदान करता है.

ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता हैक्या भारत-पाकिस्तान संबंधों, युद्ध-विरोध, शांति-वार्ता और अल्पसंख्यक असुरक्षा जैसे विषयों को आने वाले चुनावों के लिए एक राजनीतिक विमर्श में बदला जा सकता है? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 में उत्तर प्रदेश सहित 7  राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे।

शांति चाहिए, लेकिन किस कीमत पर? 117 नागरिकों के पत्र का सबसे गंभीर परीक्षण इसी कसौटी पर होना चाहिए। यदि शांति की मांग की जा रही है, तो आतंकवाद पर उतनी ही स्पष्ट मांग क्यों नहीं? पाकिस्तान से क्यों न कहा जाए कि वह आतंकवादी संगठनों के विरुद्ध सत्यापन योग्य कार्रवाई करे? आतंकवादी ढांचे को नष्ट करे? आतंकवादी वित्तपोषण और भर्ती तंत्र समाप्त करे? मुंबई हमलों के षड्यंत्रकारियों को दंडित करे और यह सुनिश्चित करे कि उसकी धरती भारत के विरुद्ध आतंकवाद के लिए इस्तेमाल नहीं होगी?

यदि इतिहास से कुछ सीखना है, तो भारत को यह चक्र तोड़ना होगा। वार्ता अवश्य हो सकती है, लेकिन पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि वार्ता आतंकवाद का विकल्प बनेगी या आतंकवाद को ढकने वाला पर्दा। भारत को शांति चाहिएलेकिन विस्मृति की कीमत पर नहीं। भारत को संवाद चाहिएलेकिन आतंकवाद की छाया में नहीं। भारत को अच्छे पड़ोसी संबंध चाहिएलेकिन अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से समझौते की कीमत पर नहीं।

और शायद आज इन 117 हस्ताक्षरकर्ताओं से पूछा जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही हैआप शांति चाहते हैं, यह स्वागतयोग्य है। लेकिन क्या आपने उस पक्ष से भी उतनी ही स्पष्टता से कहा हैबंदूक नीचे रखो, आतंक के कारखाने बंद करो और पहले यह सिद्ध करो कि इस बार बातचीत केवल अगले हमले तक का विराम नहीं होगी?

~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~




शुक्रवार, 26 जून 2026

राम मंदिर: आस्था का केंद्र, पारदर्शिता की कसौटी और प्रशासनिक पुनर्गठन की आवश्यकता

 

राम मंदिर: आस्था का केंद्र, पारदर्शिता की कसौटी और प्रशासनिक पुनर्गठन की आवश्यकता


 

शिव मिश्रा, वरिष्ठ स्तंभकार

अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण केवल एक स्थापत्य उपलब्धि नहीं, बल्कि लगभग पाँच शताब्दियों तक चले संघर्ष, असंख्य बलिदानों और करोड़ों हिंदुओं की अटूट आस्था का साकार रूप है। यह मंदिर केवल ईंट-पत्थरों का भवन नहीं, बल्कि सनातन सभ्यता के आत्मविश्वास, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक है। इसलिए यदि इस मंदिर के प्रशासन, दान-प्रबंधन या वित्तीय पारदर्शिता पर कोई प्रश्न उठता है, तो उसका प्रभाव केवल एक धार्मिक संस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विश्वभर के करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं और विश्वास को प्रभावित करता है।

हाल के दिनों में राम मंदिर परिसर में दान, आभूषणों और प्रशासनिक अनियमितताओं से संबंधित जो समाचार सामने आए हैं, वे अत्यंत चिंताजनक हैं। इन मामलों की जांच अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष न्यायिक एवं प्रशासनिक प्रक्रिया से ही सामने आएंगे। इसलिए किसी भी व्यक्ति को दोषी या निर्दोष ठहराने का अधिकार केवल जांच एजेंसियों और न्यायालयों को है। किंतु यदि किसी भी स्तर पर वित्तीय अनियमितता या प्रशासनिक शिथिलता सिद्ध होती है, तो यह केवल कानून का नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का भी गंभीर उल्लंघन होगा।

यही कारण है कि इस विषय को केवल व्यक्तियों के आचरण तक सीमित न रखकर संस्थागत व्यवस्था के दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है। किसी भी महान संस्था की विश्वसनीयता व्यक्तियों से नहीं, बल्कि उसकी व्यवस्थाओं से निर्मित होती है।

सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के उपरांत भारत सरकार ने 5 फरवरी 2020 को श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया था, ताकि मंदिर का निर्माण और संचालन एक स्वतंत्र सार्वजनिक ट्रस्ट के माध्यम से हो सके। इस ट्रस्ट में संतों, समाज के प्रतिनिधियों तथा केंद्र और राज्य सरकार के पदेन अधिकारियों को सम्मिलित किया गया। उद्देश्य स्पष्ट थामंदिर का संचालन राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त, सामाजिक रूप से प्रतिनिधिक और प्रशासनिक रूप से पारदर्शी हो।

निस्संदेह ट्रस्ट ने अल्प समय में विश्वस्तरीय मंदिर निर्माण का कार्य सम्पन्न किया, जिसके लिए वह प्रशंसा का पात्र है। किंतु किसी भी बड़े संस्थान की वास्तविक परीक्षा उसके निर्माण से अधिक उसके दीर्घकालीन संचालन में होती है। करोड़ों श्रद्धालुओं द्वारा प्रतिवर्ष आने वाले दान, सोना-चाँदी, बहुमूल्य आभूषण और विशाल संपत्तियों के प्रबंधन के लिए केवल सद्भावना पर्याप्त नहीं होती; उसके लिए आधुनिक प्रशासनिक ढाँचा, तकनीकी निगरानी और कठोर वित्तीय नियंत्रण अनिवार्य हैं।

भारत में अनेक समृद्ध मंदिर वर्षों से विशाल दानराशि का सफल प्रबंधन कर रहे हैं। विशेष रूप से तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् ने दान-प्रबंधन की जो व्यवस्था विकसित की है, वह अध्ययन का विषय है। वहाँ दानपात्रों की सुरक्षा, नकदी की गिनती, बैंक में जमा, लेखांकन और निगरानी की प्रत्येक प्रक्रिया बहु-स्तरीय नियंत्रण प्रणाली के अंतर्गत संचालित होती है। किसी एक व्यक्ति के हाथ में पूरी प्रक्रिया नहीं होती। आधुनिक मशीनें, निरंतर वीडियो रिकॉर्डिंग, स्वतंत्र पर्यवेक्षक और नियमित लेखा परीक्षण पूरी व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बनाते हैं।

अयोध्या जैसे वैश्विक महत्व के तीर्थ के लिए अब इससे भी अधिक आधुनिक व्यवस्था विकसित करने का समय आ गया है। मंदिर का प्रशासन पारंपरिक श्रद्धा और आधुनिक प्रबंधनदोनों का संतुलित संगम होना चाहिए।

सबसे पहले ट्रस्ट के प्रशासन को चार स्वतंत्र स्तंभों में विभाजित किया जाना चाहिएट्रस्टी बोर्ड, मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ), मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) तथा स्वतंत्र आंतरिक लेखा एवं सतर्कता प्रकोष्ठ। इन सभी की जवाबदेही सीधे ट्रस्ट बोर्ड के प्रति हो और कोई भी अधिकारी अकेले वित्तीय निर्णय लेने में सक्षम न हो। शक्तियों का यह विकेंद्रीकरण किसी भी प्रकार की मिलीभगत या निरंकुशता की संभावना को कम करेगा।

दान प्रबंधन को पूर्णतः डिजिटल बनाया जाना चाहिए। प्रत्येक दानचाहे वह नकद हो, ऑनलाइन हो अथवा चेक के माध्यम सेका तत्काल डिजिटल पंजीकरण हो। श्रद्धालुओं को डिजिटल भुगतान, क्यूआर कोड तथा स्मार्ट डोनेशन कियोस्क के माध्यम से दान देने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, जिससे नकद लेन-देन न्यूनतम हो और धन सीधे बैंक खातों में पहुँचे।

मंदिर परिसर में स्थापित प्रत्येक दानपात्र अत्याधुनिक सुरक्षा प्रणाली से युक्त होना चाहिए। इलेक्ट्रॉनिक सील, बायोमेट्रिक लॉक,  आरएफआईडी  टैग, चौबीसों घंटे सीसीटीवी निगरानी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अलर्ट सिस्टम यह सुनिश्चित करें कि किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ तुरंत नियंत्रण कक्ष तक पहुँचे। दानपात्र खोलने की प्रक्रिया केवल संयुक्त अभिरक्षा (जॉइन्ट कस्टडी) के सिद्धांत पर आधारित हो, जिसमें ट्रस्ट, बैंक, लेखा विभाग तथा स्वतंत्र पर्यवेक्षकसभी की उपस्थिति अनिवार्य हो।

नकदी गिनने के लिए पृथक उच्च-सुरक्षा परिसर बनाया जाए, जहाँ अत्याधुनिक करेंसी काउंटिंग मशीनें, नकली नोट पहचान प्रणाली तथा स्वचालित लेखांकन सॉफ्टवेयर का उपयोग हो। कर्मचारियों के लिए बिना जेब वाली वर्दी, प्रवेश पर बायोमेट्रिक सत्यापन तथा प्रत्येक गतिविधि की वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य हो। गिनी गई पूरी राशि चौबीस घंटे के भीतर अधिकृत बैंकों में जमा कर दी जाए।

वित्तीय प्रबंधन के लिए आधुनिक ERP प्रणाली, जैसे SAP या Oracle, का उपयोग किया जाना चाहिए ताकि प्रत्येक आय और व्यय का डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रहे और किसी भी प्रविष्टि में परिवर्तन केवल बहु-स्तरीय अनुमति से ही संभव हो। दैनिक बैंक समन्वयन (बैंक रेकन्सिलीऐशन) स्वचालित हो तथा एक रुपये का भी अंतर आते ही प्रणाली स्वतः चेतावनी जारी करे।

इसी प्रकार ऑडिट व्यवस्था को भी तीन स्तरों पर विकसित किया जाना चाहिएदैनिक आंतरिक लेखा परीक्षण, मासिक स्वतंत्र समवर्ती ऑडिट तथा वार्षिक वैधानिक ऑडिट। वार्षिक ऑडिट किसी प्रतिष्ठित स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट फर्म द्वारा किया जाए तथा उसकी रिपोर्ट, वार्षिक आय-व्यय विवरण और बैलेंस शीट सार्वजनिक वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाए। पारदर्शिता का सर्वोच्च मानक यही है कि संस्था स्वयं अपने वित्तीय अभिलेख जनता के समक्ष प्रस्तुत करे।

इसके अतिरिक्त ट्रस्ट की वेबसाइट को केवल सूचना पोर्टल न बनाकर "पब्लिक ट्रांसपेरेंसी डैशबोर्ड" के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। श्रद्धालु यह देख सकें कि प्रतिदिन कितना दान प्राप्त हुआ, किस मद में कितना व्यय हुआ, कौन-सी निर्माण परियोजना किस चरण में है, किसे ठेका दिया गया और उसकी प्रगति क्या है। वार्षिक रिपोर्ट, ऑडिट रिपोर्ट, निविदाएँ, बैठकों के संक्षिप्त निर्णय तथा प्रमुख प्रशासनिक सूचनाएँ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हों। इससे अफवाहों के लिए स्थान स्वतः समाप्त हो जाएगा।

साथ ही एक स्वतंत्र व्हिसलब्लोअर प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए, जिसके माध्यम से कोई भी कर्मचारी या श्रद्धालु बिना पहचान उजागर किए संभावित अनियमितताओं की सूचना दे सके। शिकायतों की समीक्षा स्वतंत्र सतर्कता समिति द्वारा की जाए और उनकी समयबद्ध जांच सुनिश्चित हो।

ध्यान रखने योग्य तथ्य यह भी है कि किसी संस्था की विश्वसनीयता इस बात से नहीं बढ़ती कि उसमें कभी त्रुटि न हो; बल्कि इस बात से बढ़ती है कि त्रुटि सामने आने पर संस्था कितनी ईमानदारी, पारदर्शिता और दृढ़ता से उसका समाधान करती है। यदि किसी स्तर पर अनियमितता सिद्ध होती है, तो दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिएचाहे उनका पद, प्रतिष्ठा या संगठनात्मक संबंध कुछ भी हो। यही न्याय है, यही धर्म है और यही श्रीराम के आदर्शों के अनुरूप आचरण भी।

आज राम मंदिर केवल भारत का मंदिर नहीं, बल्कि विश्वभर के हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। इसकी प्रतिष्ठा किसी व्यक्ति, संगठन या सरकार की प्रतिष्ठा से कहीं बड़ी है। इसलिए इसकी प्रशासनिक व्यवस्था भी विश्वस्तरीय होनी चाहिए। आधुनिक तकनीक, स्वतंत्र लेखा परीक्षण, संस्थागत नियंत्रण और पूर्ण पारदर्शिता ही वह मार्ग है, जो इस मंदिर को आने वाली शताब्दियों तक श्रद्धा और सुशासनदोनों का आदर्श बना सकता है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और पक्ष भी गंभीरता से विचारणीय है। अयोध्या के राम मंदिर से जुड़ी प्रत्येक घटना स्वाभाविक रूप से राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक चर्चा का विषय बनती है। ऐसे में यह आवश्यक है कि तथ्य और अफवाह, दोनों के बीच स्पष्ट अंतर किया जाए। दुर्भाग्यवश, हाल के दिनों में अनेक समाचारों, सोशल मीडिया पोस्टों और टीवी बहसों में अपुष्ट सूचनाओं तथा अटकलों को भी प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया, जिससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई।

यह भी निर्विवाद है कि राम मंदिर आंदोलन ने भारतीय समाज में सांस्कृतिक चेतना और हिंदू अस्मिता के प्रश्न को नई ऊर्जा प्रदान की है। इस सामाजिक परिवर्तन के राजनीतिक प्रभाव भी विभिन्न दल अपने-अपने दृष्टिकोण से देखते और उसकी व्याख्या करते हैं। ऐसे वातावरण में यह आशंका बनी रहती है कि मंदिर से जुड़ी किसी भी घटना का उपयोग राजनीतिक विमर्श या वैचारिक संघर्ष का माध्यम बनाया जाए। इसलिए आवश्यक है कि किसी भी आरोप, समाचार या दावे को अंतिम सत्य मानने से पहले उसकी आधिकारिक जांच और प्रमाणित तथ्यों की प्रतीक्षा की जाए।

राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। उसकी प्रतिष्ठा किसी राजनीतिक दल, संगठन या व्यक्ति से कहीं अधिक बड़ी है। इसलिए न तो वास्तविक अनियमितताओं पर पर्दा डाला जाना चाहिए और न ही अपुष्ट अथवा भ्रामक सूचनाओं के आधार पर उसकी छवि धूमिल करने का प्रयास होना चाहिए।

राम के मंदिर में आने वाला प्रत्येक दान रामकाज में ही लगेयह केवल आर्थिक अनुशासन का प्रश्न नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास की रक्षा का संकल्प है। यही संकल्प भविष्य की प्रशासनिक व्यवस्था का आधार बनना चाहिए।

  

                     ~~~Shiv Mishra ~~~~~

शुक्रवार, 19 जून 2026

भारत में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं ?

भारत में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं ? 

 


वैचारिक विखंडन का नया नैरेटिव: क्या भारत 'सनातन-शून्य' होने की राह पर है?

- शिव मिश्रा

दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर में आयोजित ‘मिल्लत टाइम्स कॉन्क्लेव 2026’ में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े मौलाना खलीलुर रहमान सज्जाद नोमानी का दिया गया भाषण केवल एक तात्कालिक विवाद नहीं है। यह भारतीय राज्य व्यवस्था, इसकी आंतरिक सुरक्षा और सनातन सभ्यता के अस्तित्व पर मँडराते उस गहरे संकट का दस्तावेजीकरण है, जिसे मुख्यधारा का विमर्श अक्सर 'धर्मनिरपेक्षता' के परदे के पीछे छिपा देता है। जब एक जिम्मेदार मंच से यह दावा किया जाता है कि "भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हैं," तो यह कोई अज्ञानता जनित बयान नहीं होता; इसके पीछे एक अत्यंत सोची-समझी, रणनीतिक और दीर्घकालिक योजना छिपी होती है। यह योजना भारत को भीतर से खोखला करने और इसे 'सनातन-शून्य' बनाकर एक पूर्ण इस्लामिक राष्ट्र की दिशा में अग्रसर करने के अनवरत प्रयासों का हिस्सा है।

यह कड़वी सच्चाई आज देश के सामने है कि यदि भारत में हिंदू वास्तव में एक सशक्त और एकीकृत बहुसंख्यक होते, तो देश की राजनीति में उनकी इस कदर अनदेखी और उनके सांस्कृतिक प्रतीकों का इस तरह उपहास संभव नहीं था। आज स्वतंत्रता के सात दशकों के बाद भी भारत का राजनीतिक परिदृश्य मुस्लिम तुष्टिकरण की धुरी पर घूम रहा है। राजनीतिक दल इस बात की होड़ में लगे हैं कि कौन बहुसंख्यक समाज की कीमत पर अल्पसंख्यक मतबैंक को अधिक संतुष्ट कर सकता है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को वैचारिक रूप से इसका अपवाद माना जाता है, लेकिन सत्ता की मजबूरियों और वैश्विक नैरेटिव के दबाव में वह भी कई मोर्चों पर इस वर्ग को रिझाने के लिए रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई देती है। वास्तविकता यह है कि भाजपा चाहे उनके लिए कितनी भी कल्याणकारी योजनाएं चला ले, वैचारिक कट्टरता के कारण वह मतबैंक किसी भी स्थिति में राष्ट्रवाद या हिंदुत्व के नाम पर मतदान नहीं करेगा। यदि यह भय न होता, तो शायद भाजपा भी उसी ढर्रे पर चल रही होती जिस पर अन्य छद्म-धर्मनिरपेक्ष दल चल रहे हैं।

पहचान का विखंडन: हिंदुओं को विभाजित करने का 'तालिबानी' मॉडल

मौलाना नोमानी का यह दावा कि सिख, जैन, बौद्ध, जाट, अनुसूचित जाति, जनजाति, आदिवासी, तमिल और लिंगायत जैसे कन्नड़ भाषी लोग हिंदू नहीं हैं, वास्तव में समाजशास्त्र का शोध नहीं बल्कि 'सोशल इंजीनियरिंग' के माध्यम से भारत को जनसांख्यिकीय रूप से हड़पने की एक खतरनाक साजिश है।

ऐतिहासिक विडंबना: भारत का इतिहास गवाह है कि यहाँ का कोई भी मुसलमान किसी अरब या मध्य-पूर्वी देश से आकर नहीं बसा। ये सभी मूल रूप से धर्मांतरित हिंदू हैं। स्वयं मौलाना नोमानी के पूर्वज भी इसी भूमि के सनातन अंग थे। लेकिन नव-धर्मांतरितों में अपनी धार्मिक वफादारी को साबित करने की जो छटपटाहट होती है, वही हिंदुओं के प्रति घृणा के इस चरम स्तर को जन्म देती है।

इस तालिबानी कट्टर मानसिकता के दो स्पष्ट रणनीतिक उद्देश्य हैं:

जनसांख्यिकीय मनोविज्ञान को बदलना: हिंदुओं को यह विश्वास दिलाना कि वे अब इस देश में एक अजेय बहुसंख्यक नहीं हैं, जिससे उनके भीतर का प्रतिरोध समाप्त हो जाए और वे 'गजवा-ए-हिंद' या भारत के इस्लामीकरण की परियोजनाओं के सामने आत्मसमर्पण कर दें।
हिंदू पुनरुत्थान को हतोत्साहित करना: जो वर्ग या संगठन भारत को सांस्कृतिक रूप से एक हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग कर रहे हैं, उनके तर्कों को कमजोर करना और उन्हें वैश्विक मंचों पर 'फासिस्ट' सिद्ध करना।

मौलाना नोमानी ने अपने इस शरारतपूर्ण बयान को प्रामाणिकता देने के लिए काबा के काले पत्थर और लिहाफ पर हाथ रखकर कसम खाने का दावा किया। यह इस बात का प्रमाण है कि यह कोई हवा-हवाई बयान नहीं था, बल्कि तीन दशकों के जमीनी सफर और शोध पर आधारित एक ऐसी कार्ययोजना है, जिसका उद्देश्य हिंदुओं को उप-जातियों और क्षेत्रीय पहचानों में बांटकर उनकी सामूहिक शक्ति को समाप्त करना है।

सेक्युलर बनाम फासिस्ट: हिंदुओं का रणनीतिक विभाजन

मौलाना नोमानी ने अपने भाषण में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़वी सच्चाई को अनजाने में स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा कि रणनीतिकारों ने हिंदुओं को दो श्रेणियों में बांटा था—'सेक्युलर हिंदू' और 'फासिस्ट हिंदू'

इस विभाजन का सीधा उद्देश्य यह था कि जब तक इस्लामीकरण का एजेंडा पूरी तरह परिपक्व नहीं हो जाता, तब तक कथित 'सेक्युलर' हिंदुओं के राजनीतिक और सामाजिक समर्थन का उपयोग करके अपने हितों को सुरक्षित रखा जाए। लेकिन नोमानी की हताशा इस बात से उजागर होती है कि इन दोनों समूहों ने मिलकर अंततः देश की कमान उन ताकतों के हाथों में सौंप दी, जिन्हें वे 'फासिस्ट' कहते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि कथित धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं ने पूरी तरह से घुटने टेक दिए होते, तो भारत में 'गजवा-ए-हिंद' का कार्य अब तक निर्बाध रूप से पूरा हो चुका होता।

इस रणनीतिक विभाजन का असर भारत के दक्षिणी राज्यों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जहाँ हिंदुओं की बहुसंख्या होने के बावजूद उनकी राजनीतिक चेतना को पूरी तरह से सुप्त कर दिया गया है।

केरल और तमिलनाडु का चुनावी यथार्थ

दक्षिण भारत की राजनीतिक जनसांख्यिकी और चुनावी परिणाम इस वैचारिक विभाजन की गवाही देते हैं:

राज्यधार्मिक जनसांख्यिकी (अनुमानित)राजनीतिक प्रतिनिधित्व का विरोधाभास (हालिया चुनाव)
केरल

हिंदू: 55%


मुसलमान: 27%


ईसाई: 18%

भारतीय जनता पार्टी (विशुद्ध राष्ट्रवादी/हिंदूवादी दल) को इतिहास में पहली बार केवल 3 सीटें प्राप्त हुईं, जबकि अकेले इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग  जैसी सांप्रदायिक पार्टी को 22 सीटें मिलीं।
तमिलनाडु

हिंदू: 82%


ईसाई: 6%


मुसलमान: 6%

हिंदू बहुल राज्य होने के बावजूद राष्ट्रवाद की बात करने वाली भाजपा को केवल 1 सीट मिली, जबकि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को 2 सीटें प्राप्त हुईं।

यह आंकड़े सिद्ध करते हैं कि हिंदुओं में 'धर्मनिरपेक्षता' का पैमाना यह बन चुका है कि जो हिंदू हितों की अनदेखी करे और सनातन की बुराई करे, उसे प्रगतिशील माना जाता है, और जो हिंदू अस्मिता की बात करे, उसे 'फासिस्ट' कहकर मुख्यधारा से अलग थलग करने का प्रयास किया जाता है।

सुरक्षा एजेंसियों की विफलता और बौद्धिक विमर्श का आत्मसमर्पण

यह भारत की आंतरिक सुरक्षा, पत्रकारिता जगत और खुफिया तंत्र के लिए अत्यंत चिंताजनक और शर्मनाक बात है कि 2 फरवरी 2026 को दिल्ली के हृदय स्थल में दिया गया यह देशद्रोही और भड़काऊ भाषण पाँच महीने तक दबा रहा और सुरक्षा एजेंसियों को इसकी भनक तक नहीं लगी। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि जब मौलाना नोमानी मंच से हिंदुओं को तोड़ने और देश को अस्थिर करने का ताना-बाना बुन रहे थे, तब उस कार्यक्रम में कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर, सलमान खुर्शीद, इमरान प्रतापगढ़ी, समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन चौधरी और यहाँ तक कि भाजपा नेता यासिर जिलानी जैसे कई बड़े राजनेता और पत्रकार मूकदर्शक बने बैठे थे।

यह नोमानी का पहला विवादित बयान नहीं है। इससे पहले जब अफगानिस्तान में बर्बर तालिबान ने बंदूक के बल पर लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंका था, तब नोमानी ने इसका जश्न मनाया था और तालिबानियों को 'सलाम' भेजा था। उन्होंने भारत में लड़कियों की आधुनिक शिक्षा का विरोध करते हुए कहा था:

"पाक रमजान की रात में उन लोगों पर लानत भेजता हूँ जो अपनी बच्चियों को अकेले कोचिंग सेंटर या कॉलेज भेजते हैं। अल्लाह उन्हें जहन्नुम में भेजेगा।"

एक तरफ तालिबान का खुला समर्थन, बच्चियों की शिक्षा को हराम बताना और दूसरी तरफ भारत के बहुसंख्यक समाज के अस्तित्व पर सवाल उठाना—यह सब कुछ खुलेआम होने के बावजूद भारत का 'लिबरल' और 'सेक्युलर' तबका उन्हें एक महान बुद्धिजीवी मानकर बड़े-बड़े मंच प्रदान करता है। स्वरा भास्कर जैसे लोग मुस्लिमों के बीच राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए अपना पहनावा तक बदलकर इनके आगे वैचारिक आत्मसमर्पण कर देते हैं।

भू-राजनीतिक संजाल और वैश्विक 'धार्मिक अर्थव्यवस्था' का गणित

भारत के भीतर चल रहे इस सुनियोजित इस्लामीकरण के एजेंडे को केवल स्थानीय मस्जिदों या कुछ कट्टरपंथियों के व्यक्तिगत प्रयासों के रूप में देखना भारी भूल होगी। भारत में जितने मुस्लिम संगठन सक्रिय हैं, शायद उतने पूरी दुनिया में मिलकर भी नहीं होंगे। इन संगठनों का एक बड़ा हिस्सा अरब देशों, विशेषकर सऊदी अरब से मिलने वाली गुप्त और प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता (खैरात) पर फलता-फूलता है।

इसके पीछे सऊदी अरब की एक बहुत बड़ी 'दीर्घकालिक वैश्विक धार्मिक अर्थव्यवस्था' (Global Religious Economy) काम कर रही है। सऊदी अरब भली-भांति जानता है कि उसके पास कच्चे तेल (Petroleum) के भंडार सीमित हैं और वैश्विक स्तर पर लिक्विड हाइड्रोजन तथा नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) की ओर बढ़ते कदमों के कारण उसकी तेल-आधारित अर्थव्यवस्था का पतन निश्चित है। इसलिए, सऊदी अरब अपनी राष्ट्रीय आय बढ़ाने के लिए वैकल्पिक और स्थायी रास्तों पर काम कर रहा है, जिसमें सबसे बड़ा स्रोत हज और उमराह यात्राएं हैं।

सऊदी विजन 2030 और वैश्विक धर्मांतरण का आर्थिक संबंध

सऊदी अरब के आधिकारिक 'विजन 2030' दस्तावेजों के अनुसार, धार्मिक पर्यटन को एक विशाल उद्योग में बदला जा रहा है:

वर्तमान आय: सऊदी अरब वर्तमान में हज और उमराह से हर साल औसतन $12 अरब से $15 अरब डॉलर (लगभग ₹1 लाख करोड़ से ₹1.25 लाख करोड़) की सीधी कमाई करता है।
जीडीपी में योगदान: सऊदी की गैर-तेल अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग में इसका योगदान लगभग 20% से 27% तक है। मक्का और मदीना जैसे शहरों में होटल, ट्रैवल एजेंसियों और नागरिक उड्डयन क्षेत्र की 30% कमाई सीधे तौर पर इन्हीं तीर्थयात्रियों से होती है।
विजन 2030 का लक्ष्य: सऊदी सरकार का लक्ष्य है कि साल 2030 तक सालाना हज और उमराह यात्रियों की संख्या को बढ़ाकर 3 करोड़ किया जाए, जिससे इस क्षेत्र से होने वाली वार्षिक कमाई को $150 अरब डॉलर तक पहुँचाया जा सके।

अब समझने वाली बात यह है कि यदि धार्मिक पर्यटन से होने वाली इस आय को कई गुना बढ़ाना है, तो दुनिया भर में मुसलमानों की जनसंख्या में भी उसी अनुपात में वृद्धि करनी होगी। जिहाद, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और धर्मांतरण के जो खेल भारत और अफ्रीका जैसे देशों में खेले जा रहे हैं, वे अनजाने में सऊदी अरब के इस आर्थिक एजेंडे को ईंधन प्रदान करते हैं। भारत के मुसलमान खुद को अरब के मूल मुसलमानों से भी अधिक कट्टर साबित करने की होड़ में अपने ही देश और संस्कृति के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं, जबकि भारत के कथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल जाने-अनजाने में इस अंतरराष्ट्रीय आर्थिक-धार्मिक चक्रव्यूह के मोहरे बन रहे हैं।

मोदी युग का 'सांस्कृतिक पुनर्जागरण' और उसकी सीमाएं

निस्संदेह, वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत के हिंदुओं के मानस में एक बड़ा सकारात्मक परिवर्तन आया है। दशकों से संजोए गए घावों पर अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण से मरहम लगा है। सदियों की हीनभावना से उबरकर हिंदुओं के भीतर अपनी पहचान और संस्कृति पर गर्व करने की भावना जागृत हुई है। जब देश का प्रधानमंत्री भगवा वस्त्रों में, माथे पर चंदन लगाकर किसी प्राचीन मंदिर में पूजा-अर्चना करता है, तो आम हिंदू को अपनी खोई हुई सांस्कृतिक संप्रभुता वापस मिलती हुई प्रतीत होती है।

इस सांस्कृतिक जागरण का सबसे बड़ा राजनीतिक परिणाम यह हुआ कि आजादी के बाद से चला आ रहा 'मुस्लिम मतों का वीटो' समाप्त हो गया। लगातार तीन बार केंद्र में पूर्ण और प्रभावी बहुमत की सरकार बनना और उन राज्यों में भी सत्ता प्राप्त करना जहाँ मुस्लिम मत निर्णायक माने जाते थे, यह सिद्ध करता है कि अब केवल एक समुदाय के तुष्टिकरण से भारत की सत्ता हासिल नहीं की जा सकती।

हाल के वर्षों में पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों और राजनीतिक संघर्षों ने यह दिखा दिया कि यदि बहुसंख्यक समाज अपने अस्तित्व के संकट को पहचानकर एकजुट हो जाए, तो छद्म-धर्मनिरपेक्षता के गढ़ को भी ध्वस्त किया जा सकता है। पश्चिम बंगाल में हिंदू एकता के पीछे वहाँ के बहुसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों और जनसांख्यिकीय आक्रमण की एक लंबी और मार्मिक कहानी है। यही कारण है कि कट्टरपंथियों, मुस्लिम परस्त दलों और वामपंथी इतिहासकारों में इस बात की छटपटाहट है कि जो जागृति बंगाल में आई है, वह कहीं केरल और तमिलनाडु में न फैल जाए।

नेहरूवादी विरासत का ऐतिहासिक बोझ और वर्तमान की विफलता

पूरी दुनिया जानती है कि भारत का संविधान और इसकी व्यवस्थाएं देश के बहुसंख्यक हिंदुओं और सनातन धर्म के प्रति एक प्रकार की संस्थागत उपेक्षा का भाव रखती हैं। धार्मिक आधार पर देश का विभाजन होने और एक स्पष्ट इस्लामिक राष्ट्र (पाकिस्तान) के निर्माण के बाद भी, भारत के भीतर मुसलमानों को वे अधिकार और विशेषाधिकार दे दिए गए जो पाकिस्तान में भी उपलब्ध नहीं हैं।

यह इतिहास की सबसे शर्मनाक सच्चाई है कि जिन लोगों ने 'लड़के लेंगे पाकिस्तान' के नारे लगाए थे, जिन्होंने प्रत्यक्ष कार्रवाई (Direct Action Day) के नाम पर हिंदुओं का नरसंहार करवाया था, उनमें से एक बहुत बड़ी आबादी विभाजन के बाद भी यहीं रुक गई और उनमें से कई लोगों को भारत की संविधान सभा का सदस्य तक बना दिया गया। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की अत्यधिक मुस्लिम-परस्त नीतियों के कारण ही हिंदुओं की यह संवैधानिक दुर्दशा हुई। नेहरू ने हिंदुओं को नियंत्रित करने के लिए 'हिंदू कोड बिल' बनाया और हिंदुओं के प्राचीन एवं समृद्ध मंदिरों को सरकारी नियंत्रण (अधिग्रहण) में ले लिया, ताकि सनातन धर्म आर्थिक और सामाजिक रूप से पंगु हो जाए। इसके विपरीत, उन्होंने मुसलमानों के लिए 'वक्फ बोर्ड' जैसे कानून बनाए, जिसने भारत के भीतर एक समानांतर 'लैंड जिहाद' का संस्थागत बीज बो दिया।

लेकिन यह तो इतिहास की बात है। आज नरेंद्र मोदी देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के कार्यकाल की समयावधि को भी पीछे छोड़ चुके हैं। धारा 370 को निष्प्रभावी करने और राम मंदिर का मार्ग प्रशस्त करने के अलावा, वर्तमान सरकार ने ऐसा कोई ठोस और संस्थागत कार्य नहीं किया जिससे दुनिया की सबसे प्राचीन सनातन संस्कृति इस भूमि पर वैधानिक रूप से सुरक्षित हो सके।

मंदिर मुक्ति कानून की उपेक्षा: सरकारी नियंत्रण से हिंदू मंदिरों को मुक्त कराना सबसे आसान और तार्किक काम था, जिसका कोई तार्किक विरोध भी नहीं हो सकता था, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
प्रभावी कानूनों का अभाव: एक राष्ट्रव्यापी कठोर धर्मांतरण विरोधी कानून, समान नागरिक संहिता (UCC), और राष्ट्रीय स्तर पर सनातन परिषद या मंदिर परिषद का गठन आज भी ठंडे बस्ते में है।
वैचारिक अंतर्विरोध: जब मौलाना नोमानी जैसे कट्टरपंथी हिंदू समाज को जातियों में बांटने की बात कर रहे हैं, ठीक उसी समय स्वयं को हिंदूवादी कहने वाली सरकारें भी विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में अगड़े, पिछड़े और दलितों के लिए अलग-अलग नीतियां और कानून बनाकर अनजाने में उसी विभाजनकारी एजेंडे को हवा दे रही हैं। चरित्र निर्माण के केंद्रों में जब मेधा के बजाय जातिगत पहचान सर्वोपरि हो जाएगी, तो समाज का बिखराव अवश्यंभावी है।

 2047 का सपना और गृहयुद्ध की पदचाप

केवल 'विकसित भारत 2047' का नारा देने या आर्थिक प्रगति के आंकड़ों को प्रदर्शित करने से सनातन धर्म और संस्कृति सुरक्षित नहीं होने वाली। यदि देश की जनसांख्यिकी बदल गई, यदि सीमाओं और आंतरिक हिस्सों में 'गजवा-ए-हिंद' के वैचारिक स्लीपर सेल्स इसी तरह फलते-फूलते रहे, तो 2047 का विकसित भारत केवल किताबों में रह जाएगा।

ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान सरकार देश के सामने खड़ी इन अस्तित्वगत और जनसांख्यिकीय चुनौतियों को आर्थिक विकास के चमकते परदे के नीचे ढकना चाहती है। यदि समय रहते इन कट्टरपंथी मौलानाओं, उनके विदेशी वित्तपोषकों और देश के भीतर बैठे उनके राजनीतिक संरक्षकों के खिलाफ कठोर, दंडात्मक और दार्शनिक कार्रवाई नहीं की गई, तो जो परिस्थितियां तेजी से उभर रही हैं, वे भारत को विनाश की ओर ले जाएंगी। भय इस बात का है कि कहीं 'विकसित भारत' के लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही, यह देश आंतरिक वैचारिक और जनसांख्यिकीय असंतुलन के कारण एक भीषण गृहयुद्ध के मुहाने पर न खड़ा हो जाए। संप्रभुता की रक्षा के लिए अब शब्दों की नहीं, बल्कि कठोर विधायी और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~ 

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