शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

विधान परिषद चुनाव में भाजपा की जीत हार से भी बदतर : 2027 का महा संकट

 

विधान परिषद चुनाव में भाजपा की जीत हार से भी बदतर : 2027 का महा संकट  - शिव मिश्रा 




 

चार राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों पर संपन्न हुए चुनावों में यद्यपि भाजपा की कुल संख्यात्मक स्थिति लगभग पूर्ववत रही और उसने कांग्रेस शासित कर्नाटक में कॉंग्रेस को शून्य पर समेट दिया, किंतु उत्तर प्रदेश का परिदृश्य पूरी तरह भिन्न संदेश दे रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े इस सबसे महत्वपूर्ण राज्य में भाजपा की स्थिति तकनीकी तौर पर भले ही स्थिर दिख रही हो, लेकिन राजनीतिक संदर्भों में यह जीत, हार से भी बदतर है।   

 

उत्तर प्रदेश में स्नातक और शिक्षक क्षेत्र की 11 विधान परिषद सीटों पर हुए चुनाव से पूर्व भाजपा के पास 6, समाजवादी पार्टी के पास 3 और निर्दलीयों के पास 2 सीटें थीं। चुनाव के बाद भाजपा अपनी 6 सीटें बरकरार रखने में सफल तो रही, लेकिन समाजवादी पार्टी ने अपनी संख्या 3 से बढ़ाकर 5 कर ली। सबसे चौंकाने वाला परिणाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में सामने आया, जहां समाजवादी पार्टी ने शिक्षक और स्नातक दोनों ही सीटों पर कब्जा जमा लिया। वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रभाव क्षेत्र गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार मात्र 307 मतों के अत्यंत करीबी अंतर से ही जीत दर्ज कर सका। लखनऊ खंड स्नातक सीट पर समाजवादी पार्टी की कांति सिंह पटेल ने भाजपा के मौजूदा एमएलसी अवनीश कुमार सिंह को लगभग 17,000 मतों से हराया। राजधानी लखनऊ, जो भाजपा का सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ मानी जाती है, वहां स्नातक सीट गंवाना एक बड़ा नीतिगत और राजनीतिक झटका है।

"प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में दोनों सीटें गंवाना और मुख्यमंत्री के प्रभाव क्षेत्र में महज 307 मतों से पार पाना—यह तकनीकी जीत के आवरण में छिपे गहरे संगठनात्मक संकट का स्पष्ट संकेत है।"

"शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में सपा का बढ़ता दायरा रेखांकित करता है कि 'पीडीए' विमर्श अब पारंपरिक सीमाओं से निकलकर बौद्धिक और कर्मचारी वर्ग के भीतर भी जड़ें जमा रहा है।"

"भाजपा का कोर सवर्ण मतदाता यदि विरोधी खेमे में न भी जाए और केवल मतदान केंद्रों से विमुख होकर उदासीन बैठ जाए, तो 2027 की सत्ता-राह बेहद कंटीली साबित होगी।"

 

भाजपा ने इन चुनावों के लिए व्यापक संगठनात्मक ताकत झोंकी थी और शत-प्रतिशत परिणाम का लक्ष्य रखा था, जिससे 2027 के लिए एक अजेय राजनीतिक विमर्श तैयार किया जा सके; किंतु पार्टी इस लक्ष्य से काफी दूर रह गई। राष्ट्रीय स्तर पर भी महाराष्ट्र में संघ के मुख्यालय वाले शहर नागपुर की पदवीधर (स्नातक) सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार की जीत ने भगवा खेमे को असहज किया है। 

 

सैद्धांतिक रूप से इन सीटों के परिणामों से राज्य की सत्ता संरचना पर सीधा असर नहीं पड़ता, क्योंकि इनका चुनावी प्रारूप अलग होता है और मतदाता वर्ग केवल स्नातक और शिक्षक तक सीमित होता है। इसके बावजूद, राजनीतिक विमर्श गढ़ने के लिहाज से यह परिणाम भाजपा की संगठनात्मक तैयारियों पर सवाल खड़े करते हैं। समाजवादी पार्टी इन नतीजों से उत्साहित है और 2027 के चुनावी समर के लिए उसका आत्मविश्वास बढ़ा है। इसका एक रणनीतिक असर यह होगा कि सपा 'इंडिया' गठबंधन में सीटों के तालमेल के दौरान कांग्रेस पर अपनी शर्तें बेहतर ढंग से रख सकेगी, जबकि भाजपा पर उसके घटक दलों का सीट बंटवारे को लेकर दबाव बढ़ेगा।

 

इन परिणामों ने एक बार फिर रेखांकित किया है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक और जातीय गोलबंदी एक निर्णायक तत्व है। गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का चुनावी गणित इसका उदाहरण बना, जहां समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी ब्राह्मण होने के बावजूद मुख्य मुकाबला भाजपा उम्मीदवार और एक निर्दलीय यादव प्रत्याशी के बीच सिमट गया, जिसमें भाजपा प्रत्याशी द्वितीय वरीयता की गणना के बाद बहुत छोटे अंतर से जीत सका। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी सामाजिक समीकरणों की सक्रियता ने अखिलेश यादव के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले को बौद्धिक व शिक्षक वर्ग के बीच भी एक धरातल प्रदान किया है। 

इसके साथ ही उच्च शिक्षा से जुड़े नीतिगत मुद्दों और शिक्षकों व कर्मचारियों के असंतोष का असर भी परिणामों में परिलक्षित हुआ। शिक्षक और स्नातक एमएलसी चुनावों में सबसे प्रभावी मुद्दा पुरानी पेंशन योजना, तदर्थ शिक्षकों का मानदेय/समायोजन और वित्तविहीन शिक्षकों की सेवा सुरक्षा रहा है।

राज्य के सवर्ण, विशेषकर ब्राह्मण मतदाताओं के एक वर्ग में उपजी नाराजगी भी सतह पर आई है। जमीनी स्तर पर एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के कथित दुरुपयोग की घटनाएं इस वर्ग के असंतोष का मुख्य कारण रही हैं और  यूजीसी मुद्दे ने आग में घी का काम किया है। उच्च शिक्षण संस्थानों में 200-पॉइंट आरक्षण रोस्टर, जिस कारण प्रोफ़ेसर, एसोसिएट प्रोफ़ेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती में सामान्य वर्ग के लिए घटते अवसर और हालिया पेपर लीक/नेट परीक्षा विवादों ने युवा स्नातकों और प्रतियोगी छात्रों में निराशा उत्पन्न की है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 के एक फैसले में प्रारंभिक जांच के बिना त्वरित गिरफ्तारी पर रोक, डीएसपी स्तर के अधिकारी द्वारा सत्यापन और अग्रिम जमानत का प्रावधान कर झूठे मुकदमों से संरक्षण दिया था। किंतु मोदी सरकार ने संसद में संशोधन पारित कर इन सुरक्षा उपायों को निष्प्रभावी कर दिया और कानून को पूर्ववत कड़ा बना दिया। इस अधिनियम के तहत दी जाने वाली आर्थिक राहत राशि के दुरुपयोग और झूठी शिकायतों पर दंडात्मक कार्रवाई के अभाव ने सामान्य वर्ग के भीतर भारी असुरक्षा और क्षोभ पैदा किया है।

 

2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को उत्तर प्रदेश में इसका खामियाजा भुगतना पड़ा था, जब उसकी सीटें 62 से घटकर 33 रह गईं, जबकि समाजवादी पार्टी 5 से उछलकर 37 और कांग्रेस 6 सीटों पर पहुंच गई। केंद्र में भाजपा के अपने बूते पूर्ण बहुमत से चूकने का सबसे बड़ा कारण उत्तर प्रदेश का यह लचर प्रदर्शन ही था। पार्टी व संघ के कार्यकर्ताओं की उदासीनता और सवर्ण वर्ग के एक हिस्से का मतदान केंद्रों तक न पहुंचना भाजपा की बड़ी कमजोरी बना।

 

2024 के लोकसभा चुनाव के विधानसभा-वार आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा गठबंधन केवल 174 विधानसभा क्षेत्रों में आगे था (भाजपा 162, सहयोगी 12), जबकि 'इंडिया' गठबंधन 224 क्षेत्रों (सपा 184, कांग्रेस 39) में बढ़त बनाए हुए था। यदि यही रुझान बना रहा, तो 2027 की डगर भाजपा के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण सिद्ध होगी। 

 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण मतदाताओं की भूमिका का इतिहास भी महत्वपूर्ण है। प्रदेश में लगभग 13 प्रतिशत ब्राह्मणों के साथ कुल सवर्ण आबादी लगभग 22 प्रतिशत मानी जाती है, जो लंबे समय से भाजपा का परंपरागत कोर वोटर रहा है।  2007 में मायावती ने दलितों के साथ ब्राह्मणों को जोड़कर सोशल इंजीनियरिंग का सफल प्रयोग किया और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। बसपा से मोहभंग हुआ तो इस वर्ग ने 2012 में सपा की सरकार बनवाई, लेकिन जब इस समाज को वहाँ भी निराशा हाथ लगी तो 2017 और 2022 में भाजपा की सत्ता वापसी में भी ब्राह्मणों सहित सवर्ण मतदाताओं का व्यापक समर्थन महत्वपूर्ण रहा। लेकिन अब यक्ष प्रश्न यह है कि क्या यह समर्थन 2027 में भी भाजपा को उसी रूप में मिलेगा? आज तो इसकी संभावना बहुत कम दिखाई पड़ती है।

 

वर्तमान में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली और प्रशासनिक निर्णयों के प्रति सामान्य वर्ग में सहानुभूति और समर्थन होने के बावजूद, केंद्र सरकार के कुछ नीतिगत फैसलों और कानूनी संशोधनों को लेकर उपजा रोष जमीन पर दिख रहा है। यदि यह वर्ग 2027 में भाजपा के खिलाफ न जाकर केवल मतदान से उदासीन या विरत भी रह गया, तो इसका सीधा नुकसान सत्तारूढ़ दल को उठाना पड़ सकता है। विधान परिषद के ये चुनाव परिणाम उसी सुलगती हुई राजनीतिक जमीन की शुरुआती बानगी हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना 2027 के लिए भारी पड़ सकता है। 

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

 

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रविवार, 25 अक्टूबर 2026

मुद्दाहीन विपक्ष: बदलते मुद्दे और खिसकता जनाधार ,

 मुद्दाहीन विपक्ष: बदलते मुद्दे और खिसकता जनाधार

 

पिछले बारह वर्षों से देश की सत्ता का संचालन कर रही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मोदी सरकार के कार्यकाल का यदि निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए, तो यह दावा करना अतिशयोक्ति होगी कि सरकार ने हर समस्या का शत-प्रतिशत समाधान कर दिया है, देश में पूर्ण पूर्णता आ गई है, और हर नागरिक सरकार के कामकाज से पूरी तरह संतुष्ट है। यदि ऐसा होता, तो राजनीति और समाजशास्त्र के नियम ही बदल जाते। इसके बावजूद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ और उनके प्रति जनसमर्थन का आधार लगातार सुदृढ़ बना हुआ है, जिसके पीछे ठोस धरातलीय बदलाव और पिछले दशकों की तुलना में हुआ गुणात्मक सुधार एक बड़ा कारण है।

प्राथमिक चुनौतियाँ: महंगाई और बेरोजगारी का यथार्थ

महंगाई और बेरोजगारी प्रत्येक विकासशील अर्थव्यवस्था की चिरकालिक और जटिल समस्याएं रही हैं, और भारत भी इसका अपवाद नहीं रहा है। स्वतंत्रता के बाद से ही बढ़ती जनसंख्या और उसके अनुपात में शिक्षित युवाओं की बढ़ती संख्या के साथ रोजगार के अवसरों का सृजन और मूल्य-वृद्धि को पूरी तरह काबू में रखना एक बड़ी चुनौती रहा है। आज भी ये मुद्दे राजनीति के केंद्र में हैं।किंतु, इस जमीनी सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान दौर में महंगाई और बेरोजगारी उतनी अनियंत्रित और भयावह नहीं है, जैसी पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में हुआ करती थी। वैश्विक और घरेलू आर्थिक उथल-पुथल के बीच सरकार ने वित्तीय अनुशासन और लक्षित कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से इन पर एक हद तक नियंत्रण बनाए रखा है, जिससे आम जनजीवन पर पड़ने वाला दबाव कुछ कम हुआ है।


सुरक्षा और आंतरिक शांति: भयमुक्त समाज की ओर कदम

यदि हम पिछली सरकारों के दौर को याद करें, तो आतंकवाद और नक्सलवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए नासूर बन चुके थे। कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों के दौरान देश के महानगरों, धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक स्थानों पर बम धमाके एक सामान्य परिघटना बन गए थे। रेलवे स्टेशनों, रेडियो स्टेशनों और टेलीविजन पर लगातार सार्वजनिक चेतावनियाँ गूंजती रहती थीं— "किसी भी लावारिस या अनजान वस्तु को हाथ न लगाएं, उसमें बम हो सकता है।" सुबह घर से रोजी-रोटी के लिए निकला व्यक्ति सुरक्षित शाम को घर लौटेगा या नहीं, इसकी कोई निश्चितता नहीं थी।

इसी प्रकार, वामपंथी उग्रवाद यानी नक्सलवाद, जिसने ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के विशाल भूभाग को अपनी गिरफ्त में ले रखा था, उसकी कमर लगभग पूरी तरह तोड़ दी गई है। जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद की जड़ मानी जाने वाली धारा तीन सौ सत्तर (370) का संवैधानिक खात्मा कर दिया गया है। इसके साथ ही, अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण और उसका उद्घाटन उस जन-आकांक्षा की तार्किक परिणति है, जो सदियों से देश की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रही थी।

आर्थिक सुधार और वित्तीय समावेशन की ऐतिहासिक छलांग

आर्थिक मोर्चे पर, मोदी सरकार ने वित्तीय समावेशन (वित्तीय रूप से सबको जोड़ना) और पारदर्शिता के मामले में क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। 'प्रधानमंत्री जन धन योजना' के माध्यम से साठ करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले गए, जिनमें सरकारी अनुदान और कल्याणकारी योजनाओं की सहायता राशि का सीधा हस्तांतरण (प्रत्यक्ष लाभ अंतरण) बिचौलियों की संस्कृति को समाप्त करने में मील का पत्थर साबित हुआ। आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती हुई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शुमार है और इसकी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) चार ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े को पार कर चुकी है।

जुलाई 2017 से लागू वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने देश की जटिल कर प्रणाली को सुव्यवस्थित और पारदर्शी बनाया। 'मेक इन इंडिया' और 'स्टार्टअप इंडिया' जैसी पहलों ने देश के युवा उद्यमियों को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई है। यूपीआई (यू.पी.आई.) और डिजिटल भुगतान क्रांति ने भारत को फिनटेक (वित्तीय तकनीकी) के क्षेत्र में विश्वगुरु के रूप में स्थापित किया है।

सामाजिक कल्याण और बुनियादी ढांचे का कायाकल्प

सामाजिक सुरक्षा और गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में उज्ज्वला योजना (रसोई गैस कनेक्शन), आयुष्मान भारत (स्वास्थ्य बीमा), प्रधानमंत्री आवास योजना (पक्की छत) और स्वच्छ भारत अभियान ने समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन स्तर को उठाया है। बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) के विकास ने तो अपनी गति और गुणवत्ता से एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। देश भर में मेट्रो नेटवर्क, आधुनिक रेल सेवाओं (वंदे भारत आदि), अत्याधुनिक हवाई अड्डों तथा हाई-स्पीड हाईवे और एक्सप्रेसवे का जाल बिछाया गया है। रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में 'तेजस' लड़ाकू विमान, ब्रह्मोस मिसाइल, स्वदेशी विमानवाहक पोत 'आईएनएस विक्रांत' और अंतरिक्ष के क्षेत्र में गगनयान व चंद्रयान अभियानों की सफलता ने पूरी दुनिया का ध्यान भारत की तकनीकी और सामरिक क्षमता की ओर खींचा है।


संवैधानिक संस्थाओं का अतीत और सुशासन की वर्तमान वास्तविकता

इन तमाम उपलब्धियों को देखने के बाद स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या ये कार्य पहले नहीं किए जा सकते थे? इसका उत्तर है—निश्चित रूप से किए जा सकते थे। यदि पूर्ववर्ती सरकारों ने राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया होता, तो आज भारत वैश्विक मंच पर चीन जैसी महाशक्तियों के साथ बराबरी पर प्रतियोगिता कर रहा होता।

यदि हम अतीत के पन्नों को पलटें, तो यह आकलन करना सहज नहीं है कि पिछली सरकारों के दौर में संविधान, न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और प्रशासनिक संस्थाओं का किस हद तक राजनीतिक उपयोग और दुरूपयोग किया गया था। बिना विधिवत कानूनी पृष्ठभूमि या विशेषज्ञता के व्यक्तियों को सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश या मुख्य न्यायाधीश बना देना, किसी सेवारत सांसद या राजनीतिक करीबी को न्यायपालिका में ऊंचे पदों पर बैठा देना, अथवा चुनाव आयोग के प्रमुख पदों पर आसीन अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद राजनीतिक दलों के टिकट पर लोकसभा-राज्यसभा का सांसद या मंत्री बना देना सामान्य प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा हुआ करता था। बड़े राजनीतिक परिवारों के घरेलू सहायकों या करीबियों को राज्यपाल, उपराज्यपाल और यहाँ तक कि राष्ट्रपति जैसे गरिमामयी पदों पर आसीन कर देना भी उस दौर की साधारण घटनाएं थीं। मीडिया घरानों के संपादकीय नियंत्रण और केंद्रीय मंत्रिपरिषद के चयन तक में कॉर्पोरेट और राजनीतिक गठजोड़ की भूमिका जगजाहिर थी।

 

विपक्ष की हताशा, खिसकता जनाधार और 'जल बिन मछली' जैसी तड़प

दूसरी ओर, लगातार चुनावी पराजयों और सत्ता से बाहर होने के कारण विपक्षी दल आज राजनीतिक रूप से 'जल बिन मछली' की भांति तड़प रहे हैं। राजशाही और परिवारवादी आधिपत्य के दौर में पली-बढ़ी इन पार्टियों की जीवनशैली और वित्तीय स्रोतों के कुंए सूखने लगे हैं। उनकी यह हताशा और निराशा अब एक गहरी कुंठा में बदल चुकी है। परिणामस्वरूप, सरकार के हर छोटे-बड़े और जनहित के निर्णय का आँख मूंदकर विरोध करना उनकी दैनिक दिनचर्या बन गया है। जब भी चुनाव नजदीक आते हैं, विपक्ष के तरकश से ऐसे बेतुके और आधारहीन मुद्दे निकलते हैं, जिनका जनता की वास्तविक समस्याओं से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं होता। जनता इन चालों को भली-भांति समझती है, इसलिए वह विपक्ष को लगातार नकार रही है और विपक्ष अपनी इसी खीझ के कारण और अधिक रसातल में जा रहा है।


ईवीएम और चुनाव आयोग पर अनर्गल प्रलाप

भारतीय चुनावी राजनीति के इतिहास को याद करें, तो एक दौर वह भी था जब मतपेटियों (बैलेट पेपर) के जमाने में बाहुबलियों के दम पर मतदान केंद्रों को लूटा जाता था, फर्जी मतदान कराए जाते थे, और परिणामों को प्रभावित करने के लिए किसी भी हद तक जाया जाता था। चुनावों का इतिहास रक्तयोजित और हिंसा से भरा होता था। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ई.वी.एम.) के आने के बाद से बाहुबलियों और भू-माफियाओं का चुनावी हस्तक्षेप लगभग समाप्त हो गया, और आम, गरीब तथा कमजोर वर्ग का मतदाता निडर होकर अपने मताधिकार का प्रयोग करने लगा। किंतु अपनी हार की खीझ मिटाने के लिए विपक्ष आज भी ई.वी.एम. को निशाना बनाता है। जब यह अकाट्य रूप से प्रमाणित हो चुका है कि ई.वी.एम. में किसी प्रकार की छेड़छाड़ संभव नहीं है, तब विपक्ष ने चुनाव प्रक्रिया और प्रशासनिक संस्थाओं को बदनाम करने के नए रास्ते तलाश लिए हैं। हाल ही में मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाने की सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया पर भी सवालिया निशान उठाए जाने लगे हैं।

एक समाचार पत्र की रिपोर्ट को आधार बनाकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध अनर्गल आंदोलन खड़े करना और भाजपा की चुनावी जीत का ठीकरा चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर फोड़ना सरासर राजनीतिक बेईमानी है। विडंबना यह है कि जिन-जिन राज्यों में इन्हीं चुनाव आयोग के निर्देशन में हुए चुनावों में विपक्ष ने जीत हासिल कर अपनी सरकारें बनाई हैं, वहाँ उन्हें कोई धांधली नजर नहीं आती; किंतु जहाँ भाजपा जीतती है, वहाँ सारा दोष चुनाव आयोग का मान लिया जाता है।


क्षेत्रीय दलों की कांग्रेस पर निर्भरता और वैचारिक भटकाव

कुछ वर्ष पूर्व विपक्षी दलों ने केंद्र की सत्ता से भाजपा को बेदखल करने के लिए एक तथाकथित 'महागठबंधन' का ताना-बाना बुना था। किंतु क्षेत्रीय क्षत्रपों की अपनी महत्वकांक्षाओं और राहुल गांधी के नेतृत्व के प्रति अंधी निर्भरता ने इन दलों की अपनी स्वतंत्र राजनीतिक जमीन को भी लील लिया है। आज क्षेत्रीय दल अपनी वैचारिक पहचान खो चुके हैं और राहुल गांधी के हर अप्रत्याशित व अपरिपक्व राजनीतिक कदम में उनके साथ खड़े होने को विवश हैं।

 

राष्ट्रहित बनाम विरोध की राजनीति

मोदी सरकार का विरोध करते-करते विपक्ष कई बार उस संवेदनशील रेखा को भी लांघ जाता है जहाँ उसका विरोध देश का विरोध बन जाता है। आज राहुल गांधी और कई विपक्षी नेता विदेशी धरती पर जाकर भारत विरोधी ताकतों और देश की संप्रभुता को आघात पहुँचाने वाले तत्वों से मंच साझा करने में संकोच नहीं करते। वैश्विक मंचों पर जहाँ देश के आंतरिक और सामरिक विषयों पर संपूर्ण राजनीतिक वर्ग को एक स्वर में बोलना चाहिए, वहीं विपक्षी दल अक्सर विदेशी ताकतों के सुर में सुर मिलाते नजर आते हैं।

 

आज स्थिति यह है कि विपक्ष सचमुच मुद्दों के अकाल से जूझ रहा है। सही और रचनात्मक आलोचना करने के बजाय वे रोज नए और अटपटे प्रसंगों को उठाकर खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं। यह स्थिति भले ही अल्पकालिक रूप से भारतीय जनता पार्टी के लिए राजनीतिक लाभ का मार्ग प्रशस्त करती हो, किंतु एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह कतई सुखद नहीं है कि देश का विपक्ष इस हद तक दिशाहीन और संवेदनहीन हो जाए। लोकतंत्र की मजबूती के लिए एक जिम्मेदार, परिपक्व और मुद्दों पर आधारित विपक्ष का होना अनिवार्य है, किंतु वर्तमान विपक्ष अपनी आंतरिक विफलताओं और दिशाहीन नेतृत्व के कारण स्वयं ही अपने राजनीतिक अवसादन का कारक बन चुका है।

       ~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

 

 

शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

भारत में अराजकता और 2027 का महासंग्राम,

      भारत के विरुद्ध वैश्विक कुचक्र: 'डीप स्टेट' का प्रयोग, पनपती अराजकता और 2027 का महासंग्राम

                                                                     - शिव मिश्रा 

 

वर्तमान में भारत की राजधानी नई दिल्ली सुनियोजित आंदोलनों और अराजकता का प्रमुख केंद्र बन चुकी है। यद्यपि विरोध-प्रदर्शनों की यह आग देश के अन्य बड़े शहरों में भी सुलग रही है, लेकिन ये सभी शहर मुख्य रूप से भाजपा शासित राज्यों में स्थित हैं। यह महज कोई संयोग नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इस अराजकता का एकमात्र निशाना भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रवादी शक्तियां हैं, ताकि उन्हें किसी भी कीमत पर केंद्र की सत्ता से बेदखल किया जा सके। 'कॉकरोच जनता पार्टी' द्वारा शुरू किए गए इस आंदोलन की आड़ में कांग्रेस, अन्य विपक्षी दल और कई कुख्यात वामपंथी व कथित छात्र संगठन एक के बाद एक आंदोलनों की बाढ़ ला रहे हैं। इन सभी के सूत्रधार और रणनीतिकार एक ही प्रतीत होते हैं।

 

आज स्थिति यह हो गई है कि यदि विरोध का कोई वास्तविक मुद्दा न मिले, तो प्रतिबंधित जगहों पर तिरंगा फहराने की जिद को ही 'आंदोलन' का रूप दे दिया जाता है। 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने छात्रों के नाम पर आंदोलन शुरू किया, लेकिन देखते ही देखते मुख्य चुनाव आयुक्त और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर भी राष्ट्र-विरोधी विमर्श खड़ा कर दिया गया। इसी बीच, छात्रों की इस गूँज की आड़ में कांग्रेस किसी न किसी बहाने हिंदुत्व पर प्रहार करके और मुस्लिम तुष्टिकरण का कार्ड खेलकर नेहरु युग की उस कांग्रेस के रूप में पुनर्जीवित होने की जुगत में लगी है, जिसे सत्ता का पूर्ण एकाधिकार प्राप्त था। केरल में मुस्लिम समर्थन की बैसाखी पर बनी कांग्रेस की सरकार इस तुष्टिकरण की राजनीति का जीता-जागता प्रमाण है। सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि देश को अस्थिर करने वाले इन आंदोलनों के लिए विदेशी धन की बेतहाशा बौछार हो रही है, जो भारत की संप्रभुता के लिए सीधा खतरा है।

 

सरकार का ढुलमुल रवैया और पनपता जन-असंतोष

आम जनता जहाँ एक ओर विपक्ष और अराजक संगठनों की देश-विरोधी मानसिकता से आक्रोशित है, वहीं केंद्र सरकार की इस निष्क्रियता से भी अत्यंत असंतुष्ट है। समाज में अब यह भ्रम भी फैलने लगा है कि कहीं इन आंदोलनों से कोई परोक्ष चुनावी या राजनीतिक लाभ लेने के लिए स्वयं सत्तापक्ष ही तो इन्हें पनपने की मौन स्वीकृति नहीं दे रहा है?

 

'कॉकरोच' आंदोलन का सच और 'डीप स्टेट' का षड्यंत्र

इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में जाना आवश्यक है। 15 मई 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की 'कॉकरोच' संबंधी एक टिप्पणी से ही 'कॉकरोच जनता पार्टी' का जन्म हुआ—ऐसा समझना हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। वास्तविकता यह है कि विदेशी शक्तियों के निर्देश पर  'डीप स्टेट' भारत में उथल-पुथल और अराजकता मचाने की एक बड़ी योजना पर लंबे समय से काम कर रहा है। इसके लिए पूरा ढांचा पहले से ही तैयार था। एक गैर-सरकारी संगठन और गैर-राजनीतिक संस्था का मुखौटा पहनकर एक व्यापक राष्ट्रव्यापी आंदोलन की पृष्ठभूमि रची जा रही थी। जैसे ही मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी आई, रातों-रात करोड़ों फॉलोअर्स खड़े हो गए। यदि यह टिप्पणी न भी आती, तो यह संगठन कोई और बहाना ढूंढ लेता; इनका सड़क पर उतरना पूर्व-नियोजित था। लेकिन मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत आज भी पश्चाताप की मुद्रा में फैसले ले रहे हैं।   

 

इसके कार्यवाहक बने अमेरिका से लौटे अभिजीत दीपक, जो जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए सीधे अमेरिका से ही भारत आए थे। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए अनुमति तक नहीं ली गई थी, लेकिन सरकार के भीतर बैठे कुछ लोगों के हस्तक्षेप से यह अनुमति उन्हें मानो चांदी की प्लेट में सजाकर सौंप दी गई। शुरुआत में जनता और सरकार दोनों ने इसे कोई तवज्जो नहीं दी। इसके बाद लद्दाख में विदेशी धन से चलने वाले एक गैर-सरकारी संगठन के संचालक और सरकार के मुखर विरोधी सोनम वांगचुक इस प्रदर्शन में शामिल होकर आमरण अनशन पर बैठ गए। अंततः जब वांगचुक का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा, तो सरकार ने उन्हें उठाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया। यहां आंदोलन दम तोड़ चुका था, भीड़ छंट गई थी और पुलिस ने सारे तंबू-कनात उखाड़ फेंके थे। लेकिन जैसे ही अनशन टूटा, कुछ उपद्रवियों की भीड़ फिर जुटी और रातों-रात फिर से तंबू गाड़कर मंच सजा दिया गया।

 

यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है कि सरकार में बैठा वह कौन रणनीतिकार था जिसने पहले आंदोलन की अनुमति दी और फिर एक मृतप्राय आंदोलन को दोबारा खड़े होने की 'ऑक्सीजन' दी?

 

शिक्षा क्षेत्र की विफलताएं और विपक्ष का 'गिद्ध-विमर्श'

इस प्रशासनिक नाकामी का परिणाम यह हुआ कि 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों ने संसद तक एक बड़ा मार्च निकाला। भारी पुलिस बल प्रयोग हुआ और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग लिया गया। सरकार ने भी दबाव में आकर सहज भाव से मंत्री की बलि चढ़ा दी। यह केंद्र सरकार की एक बड़ी रणनीतिक भूल थी।

हालांकि, यूजीसी और बाद में नीट के मामले में शिक्षा मंत्रालय से एक 'हिमालयी भूल' अवश्य हुई थी। इस लापरवाही ने पूरे हिंदू समाज और युवा वर्ग में एक सामाजिक वितृष्णा पैदा कर दी। सरकार यदि चाहती तो संकट की शुरुआत में ही मंत्री से इस्तीफा लेकर इस मुद्दे को शांत कर सकती थी, लेकिन तब ऐसा नहीं किया गया। बाद में सड़क के दबाव में झुककर लिए गए इस इस्तीफे ने यह संदेश दे दिया कि सरकार को झुकाया जा सकता है।

 

भू-राजनीति: अमेरिका, डीप स्टेट और पड़ोस में सत्ता परिवर्तन

इस अराजकता के पीछे एक बड़ा वैश्विक षड्यंत्र काम कर रहा है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इस 'कॉकरोच' पार्टी को इसलिए पनपने दिया ताकि वह विपक्ष (खासकर कांग्रेस) के वोट बैंक को ध्वस्त  सके। लेकिन यह आकलन पूरी तरह गलत साबित हुआ।

 

एक शीर्ष अमेरिकी अधिकारी का यह बयान कि "अमेरिका ने चीन के मामले में जो गलती की है, वह भारत के मामले में नहीं दोहराएगा," इस मानसिकता को उजागर करता है। अमेरिका नहीं चाहता कि भारत एक स्वतंत्र और शक्तिशाली वैश्विक शक्ति बने। अमेरिका भारत को पाकिस्तान के साथ उलझाकर उसी धरातल पर खड़ा देखना चाहता है, ताकि भारत महज एक क्षेत्रीय विवादों में फंसा देश बनकर रह जाए। रूस से भारत की स्वतंत्र तेल खरीद और वेनेजुएला जैसे देशों के लिए अमेरिकी शर्तें इसी दबाव की कूटनीति का हिस्सा हैं।

 

भारत के पड़ोस पर नजर डालें— पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और हाल ही में बांग्लादेश— इन सभी देशों में 'डीप स्टेट' ने तख्तापलट या सत्ता परिवर्तन का सफल खेल खेला है। बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस को अमेरिका से लाकर अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया और काम खत्म होते ही वे वापस लौट गए। यह स्पष्ट दर्शाता है कि कठपुतलियां कहाँ से संचालित हो रही हैं।

 

भारत कोई छोटा देश नहीं है। यहाँ का लोकतांत्रिक और विकेंद्रीकृत ढांचा इतना मजबूत है कि सीधा तख्तापलट असंभव है। इसलिए विदेशी शक्तियों की रणनीति यह है कि यदि तख्तापलट न भी हो, तो केंद्र में एक ऐसी कमजोर, गठबंधन-मजबूर सरकार, जैसे यूपीए काल में थी, स्थापित कर दी जाए जो 10-15 साल तक कड़े फैसले न ले सके। यदि भारत इस चक्रव्यूह में फंसा, तो 2047 तक 'विकसित राष्ट्र' बनने का हमारा सपना एक सदी पीछे धकेल दिया जाएगा।

जिस 'डीप स्टेट' ने आम आदमी पार्टी के माध्यम से दिल्ली और पंजाब में जो जड़ें जमाई हैं, अब वही सूत्रधार 'कॉकरोच जनता पार्टी' का भी पोषण कर रहे हैं। कांग्रेस भी अब इस नए दल के साथ 'इंडिया' गठबंधन के तहत दोस्ती का हाथ बढ़ा रही है। सत्ता प्राप्ति की भूख ने इन सभी परस्पर विरोधी दलों को एक ही छतरी के नीचे ला खड़ा किया है।

 

उत्तर प्रदेश में 2027 का महासंग्राम और सवर्ण आक्रोश

2029 के लोकसभा चुनावों से पूर्व 2027 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने हैं। कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है। 80 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में जो जीतेगा, वही देश पर राज करेगा। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन राज्य में निराशाजनक रहा। 80 में से केवल 33 सीटें भाजपा को मिलीं, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन ने 43 सीटें जीतीं। यदि वोट शेयर को विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से देखा जाए, तो 'इंडिया' गठबंधन 224 सीटों पर आगे था और भाजपा केवल 174 पर। इसी आंकड़े ने विपक्ष में यह उम्मीद जगा दी है कि 2027 में वे सत्ता पा सकते हैं।

 

उत्तर प्रदेश की राजनीति गहराई से जातियों में विभाजित है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली, सख्त कानून-व्यवस्था और माफियाराज के अंत से जनता बेहद खुश है। लेकिन मतदान में तो जातिगत समीकरण हावी होंगे। इसके साथ ही, भाजपा के मूल मतदाता माने जाने वाले सवर्ण (विशेषकर ब्राह्मण), जो यूजीसी नियमन  और पार्टी की कथित उपेक्षा से आहत हैं, अब एक खामोश बगावत के मूड में हैं। तमाम दावों के बीच भी सवर्णों की यह नाराजगी भाजपा की सबसे बड़ी 'दुखती रग' बनी हुई है। यदि ये नाराज मतदाता विपक्षी गठबंधन को वोट न भी दे, और केवल मतदान के दिन घर बैठ जाए, तो भी भाजपा को ऐतिहासिक नुकसान उठाना पड़ेगा।

 

 लौह-इच्छा शक्ति की आवश्यकता

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस चुनौती को समझते हुए दिन-रात एक कर रहे हैं। यह वह समय है जब केंद्र सरकार और भाजपा के शीर्ष रणनीतिकार भी  अपने अहंकार और अपनी राजनीतिक तंद्रा से बाहर आयें । सड़कों पर देश की संप्रभुता को चुनौती दे रहे प्रदर्शनकारियों से ढुलमुल  तरीके से नहीं, बल्कि एक प्रभुसत्ता-संपन्न राष्ट्र की लौह-इच्छाशक्ति के साथ निपटना होगा। देश की राष्ट्रवादी जनता आज इन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ स्वयं खड़ी हो रही है। यह वह स्वर्णिम अवसर है जब सरकार को जनता के इस राष्ट्रप्रेम का सम्मान करते हुए अराजकता के इन तंबुओं को हमेशा के लिए उखाड़ फेंकना चाहिए। यदि अब भी देर की गई, तो उत्तर प्रदेश की सत्ता हाथ से फिसल सकती है, और यदि यूपी गिरा, तो दिल्ली का  किला ढहने से कोई नहीं रोक पाएगा।

             ~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~ 

 


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