Tuesday, June 22, 2021

क्या लक्ष द्वीप में हो रहा विरोध मोदी सरकार के विरुद्ध एक षड्यंत्र है?

 प्राय: खबरों से गायब  रहने वाले  लक्ष द्वीप इस  समय सुर्खियों में है और  इसका कारण है वहां के नए प्रशासक  प्रफुल्ल के पटेल  द्वारा  प्रस्तावित कुछ नए कानून जिनका यह कहकर विरोध किया जा रहा है यह प्रस्तावित कानून उनकी जमीन हड़पने, मुंह से निवाला छीनने और द्वीप  का भगवाकरण करने का प्रयास है. 

 

प्रस्तावित कानूनों का विरोध करते हुए  कांग्रेस नेता राहुल  ने प्रधानमंत्री मोदी को एक पत्र लिखा कि इन कानूनों से द्वीप  के निवासियों की धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता खत्म हो जाएगी.  राष्ट्रवादी पार्टी के नेता शरद पवार ने भी विरोध किया क्योंकि द्वीप का एकमात्र सांसद उनकी पार्टी का सदस्य है.  इसके अलावा 93 रिटायर्ड अधिकारियों ने भी  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर प्रस्तावित कानूनों  का  विरोध   करते  हुए मांग की कि वर्तमान प्रशासक प्रफुल्ल के पटेल को हटा कर, लोगों के प्रति संवेदनशील और जिम्मेदार प्रशासक नियुक्त किया जाए.  कांग्रेस के एक स्थानीय नेता ने तो यहां तक आरोप लगा दिया  कि सड़क के किनारे पेड़ों पर लाल और सफेद रंग की  जो पट्टियां बनाई गई हैं उससे   लक्षद्वीप  का भगवाकरण   किया जा रहा है,जो निहायत हास्यास्पद  है.  सभी शहरों में सड़क के किनारे समुद्र किनारे पेड़ों को जड़ों के पास से लाल और सफेद रंग की पट्टियां बनाकर सजाया जाता है और उनमें नंबर डाले जाते हैं.

 

क्या है प्रस्तावित कानून ? 

  1. विकास प्राधिकरण बनाने हेतु  लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण विनियमन मसौदा, 2021

  2. गाय और बैल के अवैध कत्ल पर प्रतिबंध

  3. शराब  की बिक्री को प्रतिबंध मुक्त करना 

  4. पंचायत चुनाव में 2 से अधिक संतानों वाले लोगों के उम्मीदवार होने पर प्रतिबंध

  5. गुंडा एक्ट लागू करना 

 

अगर हम उपरोक्त  प्रस्तावित कानूनों का विश्लेषण करें तो  पाते  हैं कि द्वीप  में विकास प्राधिकरण की स्थापना अत्यंत आवश्यक है,  क्योंकि इस छोटे से द्वीप में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन  जितने   अवैज्ञानिक तरीके से  से  किया जा रहा है,  उससे इस  द्वीप  के अस्तित्व पर संकट आ सकता है. हाल ही में आईआईटी खड़कपुर के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया है कि  लक्षद्वीप के  आसपास समुद्र का जल एक मिली मीटर प्रति वर्ष के हिसाब से बढ़ रहा है,  जिसमें हवाओं के वेग और तूफान के कारण और वृद्धि हो सकती है.  इन वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि लक्षद्वीप के लिए अनुमानित समुद्र-स्तर वृद्धि के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए,  अल्प और दीर्घ  अवधि  की योजना को बनाना अत्यंत आवश्यक है  ताकि  यहां के निवासियों की जीवन रक्षा की जा सके. इस अध्ययन के अनुसार अगाती द्वीप पर स्थित हवाई अड्डा खतरे में है. ऐसे में  इस द्वीप  में विकास प्राधिकरण की स्थापना  आवश्यक है  जो विशेषज्ञ तरीके से द्वीप  का  रखरखाव और विकास सुनिश्चित कर सकता है.

 

द्वीप  पर अवैध क़त्ल खानों  के कारण पर्यावरण को  गंभीर नुकसान पहुंच रहा है   जिसके कारण आबादी के साथ साथ   पर्यटक भी प्रभावित होते हैं. इसलिए बूचड़खानों  पर नियंत्रण अत्यंत आवश्यक है जिसके लिए अन्य राज्यों में  प्रचलित  लाइसेंस  प्रणाली  लागू की जा सकती है,  जिस का विरोध नहीं होना चाहिए.

 किसी भी द्वीप पर जब कोई पर्यटन के लिए जाता है तो उसका उद्देश्य  तनाव से दूर मौज मस्ती करना होता है.  इसलिए शराब और बियर  किसी भी पर्यटन स्थल की आवश्यकता होती है. भारत में गोवा, पुडुचेरी,  दमन एंड दीव   सहित अन्य स्थलों पर भी   मदिरा  पर कोई प्रतिबंध नहीं है.  द्वीप के निवासी बताते हैं कि सरकार ने  तो शराब पर  कभी प्रतिबंधित नहीं  लगाया  बल्कि यह  यहां के निवासियों द्वारा स्वयं लगाया हुआ नियम है जो कालांतर में शराबबंदी के रूप में माना जाने लगा.  शराब विक्री की अनुमति से  भी किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह द्वीप  कोई धार्मिक स्थल नहीं है,  जहां शराबबंदी  लागू की  जाए. 

 

जहां तक पंचायत चुनाव का प्रश्न है,  2 से अधिक संतानों वाले व्यक्तियों को   उम्मीदवार बनने से रोक भारत के ज्यादातर राज्यों में लागू है  और यह  बहुत प्रगतिशील  कदम है ताकि पंचायत स्तर से  लोगों को  जनसंख्या नियंत्रण के लिए संदेश दिया जा सके. लक्षद्वीप  में इस कानून का  विरोध समझ से परे है  और राजनीतिक दलों को भी  दलगत  स्वार्थ से ऊपर उठकर सोचना चाहिए.

 

लक्ष द्वीप के  लिए प्रस्तावित गुंडा एक्ट का भी  यह कह कर विरोध किया जा रहा है  कि जब यहां पर कानून और व्यवस्था की स्थिति ठीक है तो इस एक्ट की आवश्यकता  नहीं है.  यह तर्क भी किसी के गले नहीं उतर सकता क्योंकि कानून हमेशा भविष्य की घटनाओं को ध्यान में रखते हुए बनाए जाते हैं और अगर कहीं पर गुंडा नहीं है  तो गुंडा एक्ट से  डरने का कोई मतलब नहीं.  इससे कानून व्यवस्था में और सुधार होने की संभावना बढ़ जाएगी. जब  इस कानून का दुरुपयोग होने लगे तब विरोध किया जाए  तो  यह स्वाभाविक लोकतांत्रिक प्रक्रिया  होगी. 

 

लक्ष दीप इतिहास और सामरिक महत्व:

 

लक्षद्वीप  संस्कृत का  शब्द है, जिसका वर्णन पौराणिक ग्रंथों में मिलता है  और  इसका मतलब है एक लाख द्वीप.  यह भारत के दक्षिणी पश्चिमी तट से 200 से 440 किमी (120 से 270 मील) दूर लक्षद्वीप सागर में स्थित  द्वीपसमूह है,  जिसमें इस समय छोटे-बड़े 36 द्वीप  हैं  और इनका  कुल भूमि  क्षेत्रफल लगभग 32 वर्ग किलोमीटर है । 

लक्ष द्वीप भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे खूबसूरत स्थानों में से एक माना जाता है और यह  भारत का सबसे छोटा केंद्र शासित प्रदेश है.

लक्ष्यदीप का भारत के लिए बहुत सामरिक महत्व है क्योंकि यह 20 हजार वर्ग किलोमीटर का जल क्षेत्र और 4 लाख वर्ग किलोमीटर का विशेष आर्थिक क्षेत्र प्रदान करता है. यह पश्चिमी हिंद महासागर में स्थित है और फारस की खाड़ी की तरफ के समुद्री क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. भारत के क्रूड आयल के जहाज इसी क्षेत्र से आते जाते हैं इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से भी इसका अत्यधिक महत्व है.

 लक्ष द्वीप  के  कुछ उल्लेखनीय  तथ्य 

  1. लक्षदीप की जनसंख्या एक लाख से भी कम है और लगभग 98%  जनसंख्या मुस्लिम  है.  मुस्लिम आबादी  का प्रतिशत इतना अधिक होने के कारण,  भारत  गणराज्य का हिस्सा  होने के बाद भी,  यहां की आबादी  इसे इस्लामिक  स्थान समझती  हैं.  इसलिए  स्वाभाविक रूप से उनकी अपेक्षा है कि यहां पर इस्लामिक कानून के अनुसार ही शासन व्यवस्था चलाई जाए. 

  2. कभी आदिवासी रही यहां की  पूरी जनसंख्या को अनुसूचित जनजाति मैं वर्गीकृत किया गया है. 

  3. मुस्लिमों का प्रतिशत इतना अधिक होने के बाद भी उन्हें अल्पसंख्यक होने का दर्जा भी प्राप्त है और तदनुसार उन्हें सभी सरकारी सुविधाएं प्राप्त होती हैं.

  4. प्राचीन काल  में द्वीप पर चोल साम्राज्य का शासन हुआ करता था जो बाद में टीपू सुल्तान के कब्जे में आ गया था और उसी समय यहां पर बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ.

  5. अंग्रेजों के शासन समाप्त होने  के बाद 1956 में इसे केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया.

  6. अगर प्रतिशत के हिसाब से देखें तो यह भारत का सर्वाधिक  मुस्लिम जनसंख्या वाला प्रदेश है, 

  7. सुरक्षा की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण होने के बाद भी  आज तक  इस केंद्र शासित प्रदेश को सामरिक चुनौतियों का सामना करने के लिए  तैयार नहीं किया  गया. 

  8. ऐसे समय में  जब  आतंकवादी आक्रमण समुद्री सीमा से भी होने लगे हैं , इस द्वीप में सुरक्षात्मक उपाय न करना देश के लिए संभावित खतरे से अंजान बने रहने के बराबर है. 

 

 हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 26 नवंबर को मुंबई में हुआ आतंकी आक्रमण समुद्र के रास्ते से किया गया था और इसके लिए उन्हें विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया था. सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार पाकिस्तान में आतंकवादियों के लिए इस समय जो प्रशिक्षण केंद्र चलाए जा रहे हैं उसमें बड़े-बड़े तरणताल भी बनाए गए हैं ताकि आतंकवादियों को समुद्री रास्ते से भारत पर आक्रमण करने के लिए तैयार किया जा सके. जब  चीन, पाकिस्तान के बलूचिस्तान में ग्वादर पोर्ट का कार्य बड़ी तेजी से पूरा कर रहा है, भारत को सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण इस क्षेत्र को सुरक्षा के दृष्टिकोण से मजबूत बनाना ही होगा खासतौर से ऐसे समय में जब केरल में बड़ी संख्या में चरमपंथियों ने अपने ठिकाने बना रखे हो.

 

विरोध  का एक विशेष  कारण 

लक्ष द्वीप  में  हो रहे विरोध के पीछे एक और कारण है और वह  है काव़ारती में महात्मा गांधी की मूर्ति की स्थापना, जिसके  कांग्रेस के शासनकाल में 2010 में लक्ष द्वीप की राजधानी  में स्थापित करने की योजना बनाई गयी थी. उस समय महात्मा गाँधी की मूर्ति पानी के जहाज द्वारा लक्षद्वीप भेजी  गई  लेकिन द्वीप  के निवासियों के भारी विरोध के कारण  यह मूर्ति लक्षद्वीप में जलयान से उतारी भी नहीं जा सकी.  विरोध करने वालों का तर्क था कि इस्लाम में मूर्ति  लगाना हराम माना जाता है इसलिए वह गांधी जी की प्रतिमा नहीं लगने देंगे क्योंकि  इससे समुदाय की मजहबी भावनाओं को ठेस पहुँचेगी। स्थानीय निवासियों का कहना है कि  मूर्ति लगाना हिन्दुत्व का  हिस्सा है  लेकिन  शरिया कानून  इसकी इजाजत  नहीं  देता  । 

 

 उग्र  विरोध के बाद  यह  विशेष जलयान महात्मा गाँधी की मूर्ति के साथ वापस कोच्चि आ गया. इससे पहले कि  दिल्ली में विपक्षी दल इसे राजनीतिक रंग देते, एक दिन बाद यह जहाज फिर  कावारती भेजा गया इस बीच संभवत केंद्र सरकार की सलाह पर  प्रशासन ने कवरत्ती में महात्मा गाँधी की मूर्ति स्थापना की योजना रद्द कर दी  और मूर्ति पुनः कोच्चि वापस आ गई. तब से अब तक 11 साल के बाद भी महात्मा गांधी की  यह मूर्ति  लक्षद्वीप में स्थापित नहीं हो सकी है। अब सूचना  है कि  गांधी जी की यह मूर्ति लक्षद्वीप के प्रशासनिक कार्यालय  पहुंच गई है और स्थापित होने  का इंतजार कर रही है । धर्मनिरपेक्षता एवं अहिंसा की पहचान महात्मा गाँधी जिन्होंने  मुस्लिम समुदाय के लिए   बहुत  कुछ किया,  और हिंदुओं को लगता है कि उनकी कीमत पर किया लेकिन इसके बाद भी उनका विरोध किया जा रहा है.  जो भी हो गांधीजी भारत के राष्ट्रपिता हैं और राष्ट्रपिता की  मूर्ति की स्थापना भारत के किसी भी हिस्से में की जा सकती है  और लक्ष द्वीप  इसका अपवाद नहीं हो सकता .

 

अब कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दल  लक्ष द्वीप  के मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं,  और   कांग्रेस   को   इस विरोध में महात्मा गांधी  की भी  याद  नहीं.  उसे महात्मा गांधी की याद तभी आती है जब उनकी हत्या के संबंध में  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को घेरना होता है.  लक्ष द्वीप के प्रस्तावित कानूनों को गृह मंत्रालय की मंजूरी का इंतजार है जो अभी तक नहीं दी गई है और हो सकता है “सबका विश्वास” का नारा लगाने वाली भाजपा इन प्रस्तावित कानूनों को मंजूरी कभी न दें, यद्यपि इन कानूनों का उद्देश्य लक्ष्यदीप का विकास करना है ताकि यह द्वीप भी मालदीप की तरह विकसित हो सके और लोगों को समुचित रोजगार के साथ-साथ उनकी आय में वृद्धि हो सके. लक्षद्वीप में किए जाने वाले सुधारों पर रोक लगाने की माँग के लिए  केरल उच्च न्यायालय में एक याचिका भी दायर की गई थी लेकिन न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी।

 

सबसे चिंताजनक बात यह है कि लक्ष द्वीप में हो रहे प्रदर्शन कुछ उसी तरह है जैसे शाहीन बाग में किए गए थे, जिसमें छोटे छोटे  मासूम बच्चे भी शामिल किए गए थे, ताकि पूरे विश्व का ध्यान आकृष्ट किया जा सके.  प्रदर्शनकारियों की  समुद्र में खड़े होकर,  पानी के अंदर गोता लगाते हुए तस्वीरें  राष्ट्रीय मीडिया में    छप रही हैं,  जिन्हें देखकर ऐसा लगता है कि यह एक  बड़े राष्ट्रीय  षड्यंत्र का हिस्सा है. 

 

भारत में राजनीत का जो वर्तमान स्वरूप है उसमें केंद्र सरकार और भाजपा के हर अच्छे बुरे कार्य का विरोध करने का फैशन है और उसी फैशन के अंतर्गत लक्ष द्वीप  का विरोध भी हो रहा है. हर विरोध की तरह इस विरोध में भी फिल्म, कला व साहित्य, और सेवानिवृत्त अधिकारी भी शामिल हैं. इस विरोध में शामिल सभी लोगों के  अपने अपने स्वार्थ है . दुर्भाग्य से सेवानिवृत्त अधिकारियों , जिनमें एक पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी शामिल हैं, का इतना संकुचित दृष्टिकोण अपना कर विरोध में शामिल होना चिंता का विषय है. इन लोगों में किसी के पास अब वापस करने के लिए पुरस्कार नहीं बचे हैं इसलिए वह प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं.

 

मेरा व्यक्तिगत रुप से मानना है कि  सरकार अगर इस भीड़ तंत्र के सामने झुक जाती है तो भविष्य  में भारत के लिए सुरक्षा की दृष्टि से बहुत घातक परिणाम सामने आने की संभावना है.

  • क्या इन लोगों को यह नहीं मालूम की लक्ष द्वीप भारत का हिस्सा है जो धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है कोई अलग इस्लामिक राष्ट्र नहीं, तो फिर वहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मूर्ति क्यों नहीं लगाई जा सकती ?

  • आतंकवादियों की  समुद्री मार्ग से आक्रमण की साजिशों को रोकने के लिए सैन्य निगरानी की व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती?

  • किसी भी प्रदेश में अपराध चाहे कितने ही कम क्यों न हो, अपराध रोकने और कानून व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने का कानून क्यों नहीं बनाया जा सकता?

  • लक्षदीप भारत का हिस्सा है और भारत के किसी भी हिस्से को राष्ट्रीय परिपेक्ष में आर्थिक गतिविधियां विकसित करने और राष्ट्रीय आय बढ़ाने के लिए उपयोग क्यों नहीं किया जा सकता?

 

जो भी हो सरकार का वर्तमान विरोध और आंदोलन के सामने घुटने टेकना उतनी ही बड़ी भूल होगी जितनी कि संविधान में जम्मू कश्मीर के संबंध में धारा 370 जोड़ने को लेकर की गई थी.

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-शिव मिश्रा

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Thursday, June 17, 2021

लक्ष द्वीप की समस्या क्या है और क्या है इसका मुख्य कारण ? क्या इसका कोई समाधान है?

 लक्ष द्वीप की समस्या, कारण और समाधान

 


लक्ष दीप इतिहास और सामरिक महत्व:

लक्षद्वीप एक संस्कृत का एक शब्द है जिसका मतलब है एक लाख दीपों का समूह. यह भारत के दक्षिणी पश्चिमी तट से 200 से 440 किमी (120 से 270 मील) दूर लक्षद्वीप सागर में स्थित एक द्वीपसमूह है। लक्षद्वीप भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे खूबसूरत स्थानों में से एक माना जाता है यह है भारत का सबसे छोटा केंद्र शासित प्रदेश है जिसमें 32 वर्ग किलोमीटर किलोमीटर की भूमि पर 36 छोटे बड़े द्वीप हैं.

लक्ष्यदीप का भारत के लिए बहुत सामरिक महत्व है क्योंकि 20 हजार वर्ग किलोमीटर का जल क्षेत्र और 4 लाख वर्ग किलोमीटर का विशेष आर्थिक क्षेत्र प्रदान करता है. यह पश्चिमी हिंद महासागर में स्थित है और फारस की खाड़ी की तरफ के समुद्री क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. भारत के क्रूड आयल के जहाज इसी क्षेत्र से आते जाते हैं इसलिए भारत की सुरक्षा की दृष्टि से भी इसका अत्यधिक महत्व है.

कुछ और बातों पर ध्यान देते हैं

  • लक्षदीप की जनसंख्या एक लाख से भी कम है और इसमें 98% मुस्लिम जनसंख्या है और शायद यही इस देश की सबसे बड़ी समस्या भी है क्योंकि इतनी अधिक जनसंख्या प्रतिशत होने के कारण, और भारत का केंद्र शासित प्रदेश होने के बाद भी मुस्लिम इसे इस्लामिक प्रदेश समझते हैं .उनकी अपेक्षा है कि यहां पर इस्लामिक कानून के अनुसार ही शासन व्यवस्था चलाई जाए.

  • यहां की लगभग पूरी जनसंख्या को अनुसूचित जनजाति मैं वर्गीकृत किया गया है. मुस्लिमों का प्रतिशत इतना अधिक होने के बाद भी उन्हें अल्पसंख्यक होने का दर्जा भी प्राप्त है और तदनुसार उन्हें सभी सरकारी सुविधाएं प्राप्त होती हैं.

  • प्राचीन समय में द्वीप पर चोल साम्राज्य का शासन हुआ करता था जो बाद में टीपू सुल्तान के कब्जे में आ गया था और उसी समय यहां पर बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ.

  • अंग्रेजों के शासन काल के बाद 1956 में इसे केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया लेकिन मुस्लिम जनसंख्या का प्रतिशत लगातार बढ़ता गया.

  • अगर प्रतिशत के हिसाब से देखें तो यह भारत का सबसे अधिक मुस्लिम जनसंख्या वाला केंद्र शासित प्रदेश है, जहां मुस्लिम जनसंख्या प्रतिशत जम्मू कश्मीर से भी अधिक है.

  • सुरक्षा की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण होने के बाद भी पिछली सरकारों ने इस केंद्र शासित प्रदेश और द्वीप को सामरिक रूप से उस तरह सुसज्जित नहीं किया जितना किसी देश को अपनी सीमाओं की रक्षा करने के लिए करना चाहिए था.

  • अब जबकि आतंकवादी और जिहादी आक्रमण समुद्री सीमा से भी होने लगे हैं ऐसे में इस द्वीप में सुरक्षात्मक उपाय न करना देश के लिए खतरे की घंटी है.

    • 26 नवंबर को मुंबई में हुआ आतंकी आक्रमण समुद्र के रास्ते से किया गया था और इसके लिए उन्हें विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया था.

    • सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार पाकिस्तान में आतंकवादियों के लिए जो प्रशिक्षण केंद्र चलाए जा रहे हैं उसमें बड़े-बड़े स्विमिंग पूल और तरणताल भी बनाए गए हैं ताकि आतंकवादियों को समुद्री रास्ते से भारत पर आक्रमण करने के लिए तैयार किया जा सके.

    • अब जबकि चीन, पाकिस्तान के बलूचिस्तान में ग्वादर पोर्ट का कार्य बड़ी तेजी से पूरा कर रहा है, भारत को सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण इस क्षेत्र को सुरक्षा के दृष्टिकोण से मजबूत बनाना ही होगा खासतौर से ऐसे समय में जब केरल में बड़ी संख्या में आतंकवादियों और चरमपंथियों ने अपने ठिकाने बना रखे हो.

विरोध की असली वजह :

कांग्रेस के शासनकाल में 2010 में लक्ष्यद्वीप की राजधानी के काबाराती में महात्मा गांधी की मूर्ति स्थापित करने की योजना बनाई गयी और तदनुसार एमवी अमीनदीवी नमक जलयान में महात्मा गाँधी की कई लाख रुपए की लागत से बनी मूर्ति लक्षद्वीप भेजा गई । महात्मा गाँधी की वह अर्ध-मूर्ति लक्षद्वीप में जलयान से उतारी भी नहीं जा सकी क्योंकि लक्षद्वीप के मुस्लिमों ने ऐसे किसी भी पुतले को लक्षद्वीप में स्थापित करने का उग्र विरोध कर दिया . विरोध करने वालों का तर्क था कि इस्लाम में पुतला लगाना हराम माना जाता है इसलिए वह गांधी जी की प्रतिमा नहीं लगने देंगे. उनका कहना था कि किसी भी पुतले या मूर्ति को स्थापित करने से समुदाय की मजहबी भावनाओं को ठेस पहुँचेगी। स्थानीय मुस्लिम यह मानते हैं कि यदि कोई पुतला स्थापित कर दिया गया तो मुस्लिमों को उसे सम्मान देना और फूलों से सजाना होगा जो कि हिन्दुत्व का एक हिस्सा है और शरिया कानून का उल्लंघन करता है। यही कारण था कि लक्षद्वीप के मुस्लिमों ने कवरत्ती में महात्मा गाँधी की अर्ध-मूर्ति की स्थापना नहीं होने दी .

लक्षद्वीप में मुस्लिमों के विरोध के बाद जलयान एमवी अमीनदीवी महात्मा गाँधी की अर्ध-मूर्ति के साथ वापस कोच्चि आ गया. इससे पहले कि विपक्षी दल इसे राजनीतिक रंग देते एक दिन बाद यह जहाज फिर यह कवरती भेजा गया लेकिन प्रशासन ने मुस्लिमों के कड़े विरोध के चलते कवरत्ती में महात्मा गाँधी की मूर्ति स्थापना की योजना रद्द कर दी थी और मूर्ति पुनः कोच्चि वापस आ गई.

तब से अब तक 11 साल हो गए लेकिन महात्मा गाँधी की वह अर्ध-मूर्ति लक्षद्वीप में स्थापित नहीं हो सकी है। अब ऐसा माना जा रहा है कि गांधी जी की यह अर्ध-मूर्ति लक्षद्वीप के प्रशासनिक कार्यालय में पहुंच गई है और स्थापित होने की राह देख रही है। लक्षद्वीप में मुस्लिमों का विरोध बढ़ता जा रहा है और धर्मनिरपेक्षता एवं अहिंसा की पहचान महात्मा गाँधी जिन्होंने हिंदुओं की कीमत पर मुस्लिमों की पुरजोर तरफदारी की थी और उनका मुस्लिम प्रेम ही उनके अंत का कारण भी बना था .

जो भी हो गांधीजी भारत के राष्ट्रपिता हैं और राष्ट्रपिता की यह मूर्ति अभी भी इस उम्मीद में है कि शायद कभी स्थापित किया जाएगा , जिसके लिए उसे लक्षद्वीप लाया गया था।

लक्षदीप का वर्तमान विरोध

आज लक्षद्वीप विपक्षी नेताओं द्वारा भाजपा सरकार और लक्षद्वीप के प्रशासक की आलोचना का माध्यम बन गया है। दरअसल लक्षद्वीप के प्रशासन ने कुछ कानूनों को मंजूरी दी है, जिसके कारण भारतीय द्वीप समूह के प्रशासक प्रफुल्ल के पटेल के खिलाफ विपक्षी नेता और लक्षद्वीप के स्थानीय लोग लामबंद हो रहे हैं। यद्यपि इन कानूनों का उद्देश्य लक्ष्यदीप का विकास करना है ताकि यह द्वीप भी मालदीप की तरह विकसित हो सके और लोगों को समुचित रोजगार के साथ-साथ उनकी आय में वृद्धि हो सके .

इन कानूनों में प्रमुख रूप से ये हैं -

  • लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण (LDA) के निर्माण के लिये जारी नवीनतम लक्षद्वीप विकास प्राधिकरण विनियमन मसौदा, 2021

  • गाय और बैल के अवैध कत्ल पर प्रतिबंध

  • शराब (alcohol) की बिक्री को मंजूरी

  • पंचायत चुनाव में 2 से अधिक संतानों वाले लोगों के उम्मीदवार होने पर प्रतिबंध

  • गुंडा एक्ट लागू करना

विरोध करने वालों में स्थानीय मुस्लिमों, विपक्षी दलों के अलावा कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी प्रमुख रूप से शामिल हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा कि लक्षद्वीप के प्रशासन ने जिन कानूनी परिवर्तनों को मंजूरी दी है वो लक्षद्वीप के स्थानीय समुदाय के ‘सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं’ पर एक आघात है। इस मामले पर कॉन्ग्रेस ने केरल उच्च न्यायालय में याचिका भी दायर की और लक्षद्वीप में किए जाने वाले सुधारों पर रोक लगाने की माँग की लेकिन न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी।

( पोस्टर भी बोलते हैं )

आम लोगों के अलावा लक्षद्वीप प्रशासन द्वारा कथित तौर पर कई विवादित फैसले लिए जाने के बाद 93 रिटायर्ड अधिकारियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा है। उन्होंने वर्तमान प्रशासक प्रफुल्ल के पटेल को हटा कर, लोगों के प्रति संवेदनशील जिम्मेदार एक स्थाई प्रशासक की मांग की है।

इस बीच शरद पवार और केरल के मुख्यमंत्री ने भी नए नियमों का विरोध किया है,और कहां है कि नए प्रशासन राष्ट्रीय स्वयंसेवक का एजेंडा लागू कर रहे हैं. एक बेहद हास्यप्रद बयान में कांग्रेस के एक स्थानीय नेता ने आरोप लगाया है कि सड़क के किनारे पेड़ों पर लाल और सफेद रंग की पट्टियां बनाई गई हैं जो लक्ष्यदीप का भगवाकरण करना है. सभी शहरों में सड़क के किनारे समुद्र किनारे पेड़ों को जड़ों के पास से लाल और सफेद रंग की पट्टियां बनाकर सजाया जाता है और उनमें नंबर डाले जाते हैं.

( पोस्टर बोलते हैं - कश्मीर शाहीन बाघ से लक्षद्वीप तक एक जैसा प्रदर्शन )

भारत में राजनीत का जो वर्तमान स्वरूप है उसमें केंद्र सरकार और भाजपा के हर कार्य का अच्छे बुरे कार्य का विरोध करने का फैशन है और उसी फैशन के अंतर्गत लक्ष्यदीप का विरोध भी हो रहा है. हर विरोध की तरह इस विरोध में भी फिल्म, कला व साहित्य, और सेवानिवृत्त अधिकारी भी शामिल हैं. इस विरोध में शामिल सभी लोगों कि अपने अपने स्वार्थ है . दुर्भाग्य से सेवानिवृत्त अधिकारियों , जिनमें पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जैसे लोग भी शामिल हैं, का इतना संकुचित दृष्टिकोण अपना कर विरोध में शामिल चिंता का विषय है. इन लोगों में किसी के पास अब वापस करने के लिए पुरस्कार नहीं बचे हैं इसलिए वह प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं.

मेरा व्यक्तिगत रुप से मानना है कि अगर सरकार अगर इस भीड़ तंत्र के सामने झुक जाती है तो आगामी सालों में भारत के लिए सुरक्षा की दृष्टि से बहुत घातक परिणाम सामने आने की संभावना है.

लक्ष्यदीप के मुस्लिमों का विरोध तो समझ में आता है लेकिन विपक्षी राजनेताओं सहित सेवानिवृत्त अधिकारियों का सुधारात्मक उपायों का विरोध करना समझ से परे है.

  • क्या इन लोगों को यह नहीं मालूम की लक्ष्यद्वीप भारत का हिस्सा है जो धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है कोई अलग इस्लामिक राष्ट्र नहीं, तो फिर वहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मूर्ति क्यों नहीं लगाई जा सकती ?

  • आतंकवादियों कि समुद्री मार्ग से आक्रमण की साजिशों को रोकने के लिए सैन्य निगरानी की व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती?

  • किसी भी प्रदेश में अपराध चाहे कितने ही कम क्यों न हो, अपराध रोकने और कानून व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने का कानून क्यों नहीं बनाया जा सकता?

लक्षदीप भारत का हिस्सा है और भारत के किसी भी हिस्से को राष्ट्रीय परिपेक्ष में आर्थिक गतिविधियां विकसित करने और राष्ट्रीय आय बढ़ाने के लिए उपयोग क्यों नहीं किया जा सकता?

जो भी हो वर्तमान विरोध और आंदोलन के सामने घुटने टेकना उतनी ही बड़ी भूल होगी जितनी कि संविधान में जम्मू कश्मीर के संबंध में धारा 370 जोड़ने को लेकर की गई थी.

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-शिव मिश्रा

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Tuesday, June 15, 2021

राम मंदिर जमीन विवाद क्या है? विपक्षी दल इसको इतना तूल क्यों दे रहे हैं?

 राम मंदिर जमीन विवाद :  हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाने की साजिश




सभी हिंदुओं को खास तौर से सभी राम भक्तों को एक   प्राचीन वैदिक सिद्धांत, जो आज भी प्रबंधन का सर्वश्रेष्ठ नियम है, याद रखना चाहिए कि- 

"अगर हम किसी व्यक्ति  या संस्था पर विश्वास करते हैं तो यह संपूर्ण होना चाहिए . इसका मतलब है कि यदि हम किसी व्यक्ति या संस्था पर विश्वास करते हैं तो उसके कार्यों पर संदेह नहीं करना चाहिए."

हम टुकड़ों टुकड़ों में विश्वास नहीं कर सकते  कि एक काम पर तो हम विश्वास करें और दूसरे कार्य पर संदेह करें. यदि पौराणिक काल से लेकर आज तक अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं का विवेचन करें तो पाएंगे कि  जानबूझ कर अविश्वास फैलाने के पीछे हमेशा कोई न कोई  बड़ा  षड्यंत्र और दुर्भावना होती है.

राम मंदिर निर्माण के संदर्भ में  खरीदे गए भूखंड  पर  विपक्ष द्वारा जो आरोप लगाए जा रहे हैं वह भी एक राजनीतिक षड्यंत्र के अलावा कुछ नहीं है.  हमें याद रखना होगा  कि राम मंदिर  निर्माण के  हर काम में कुछ न कुछ साजिश और  अड़ंगे   हमेशा लगाए जाते रहे हैं और आगे भी लगाये जाते रहेंगे.  लगभग 500 वर्षों के  सतत  संघर्ष  के बाद अब जबकि राम मंदिर निर्माण का सुअवसर आया है तो भी  कुछ लोग  कुत्सित  राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे हैं. 

हम उन लोगों की बातों का कैसे विश्वास कर सकते हैं  जिन्होंने - 

  • जिन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के साथ धोखा किया हो ?

  • हजारों राम भक्तों  पर  अंधाधुंध   गोलियां  चलाकर  अयोध्या को रक्तरंजित कर दिया हो ?

  • राम के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाया हो?

  • रामसेतु तोड़ने का प्रयास किया हो?

  • राम मंदिर के न्यायिक निर्णय को विलंबित करने का प्रयास किया हो?

अब  इस पूरे मामले  का  विस्तार से विश्लेषण करते हैं.

भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने यह निर्णय लिया है कि मंदिर से लगी और मंदिर के रास्तों में पडने वाली ज्यादा से ज्यादा जमीनों को खरीदा जाए ताकि श्री राम के भव्य मंदिर के साथ-साथ, वास्तु को भी सुधारा जा सके और अयोध्या को पौराणिक भव्यता प्रदान करने के लिए सभी संबंधित निर्माण कार्य किए जा सकें तथा श्रद्धालुओं को भी राम मंदिर पहुंचने   में कोई कठिनाई न हो.  ट्रस्ट ने इसके लिए बड़े पैमाने पर योजना तैयार की है और मंदिर के लिए महत्वपूर्ण जमीन चिन्हित भी कर ली हैं और लोगों से जिसमें दोनों समुदाय के लोग हैं, जमीन खरीदने हेतु विमर्श शुरू कर दिया गया है. ट्रस्ट का यह निर्णय अत्यंत दूरदर्शी और स्वागत योग्य है क्योंकि हमने देखा है कि ज्यादातर पौराणिक और प्रसिद्ध मंदिरों में जगह के अभाव के कारण  श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है जिससे श्रद्धालुओं को असुविधा के साथ साथ दुर्घटनाएं भी होती रहती हैं. ट्रस्ट के इस फैसले के बाद विपक्षी राजनीतिक खेमों में इस बात का विरोध किया गया और कहा गया कि ऐसा करना एक अलग हिंदू शहर बसाने जैसा होगा जिससे अयोध्या में रहने वाले अल्पसंख्यकों के मन में असुरक्षा की भावना उत्पन्न होगी. 

वह  भूखंड जिस पर  आम आदमी पार्टी  समाजवादी पार्टी  सहित  अन्य विपक्षी राजनीतिक पार्टियां घोटाले का आरोप लगा कर कह रही हैं कि 5 मिनट के अंदर 2 करोड़ की जमीन 18.5 करोड़ की कैसे हो गई? 

वास्तव में यह बहुत साधारण मामला है लेकिन आजकल एक चलन है की मूर्खता की  बात केवल  मूर्ख  ही नहीं  बुद्धिमान व्यक्ति भी करते हैं  जिसके पीछे का षड्यंत्र होता है जनता को भ्रमित करना  और यही इस पूरे मामले में किया गया है.  आजकल पत्रकारिता का स्तर भी यह हो गया है  कि बिना  जाने समझे  और छानबीन किए  ऐसी खबरें प्रसारित और प्रकाशित  होने  लगती  हैं,  और ऐसी सनसनीखेज खबरों से टीआरपी के साथ-साथ जनता का भ्रम बढ़ना भी स्वाभाविक है.   आसानी से समझने के लिए  इस भूखंड से  जुड़े  क्रय विक्रय  को    क्रम से देखते हैं

  •  4 मार्च 2011 को महफूज आलम तथा  अन्य  ने  अपने स्वामित्व वाले भूखंड (गाटा संख्या 242,243,244 और 246 कुल भूमि 2.334 हेक्टेयर)  बेचने के लिए  कुसुम पाठक, हरीश पाठक और मोहम्मद इरफान के साथ एक   विक्री  एग्रीमेंट  किया जो 3 साल के लिए वैध था और इस  भूखंड की  विक्रय राशि 1 करोड़  रुपए थी. 

  •  दिनांक 04.03.2011 को  निष्पादित इस बिक्री एग्रीमेंट को 04.03.2014 को रद्द कर दिया गया था।

  •  पुनः 20/11/2017 को महफूज आलम और  अन्य  ने कुसुम पाठक और उनके पति हरीश पाठक  को वही  भूखंड  के लिए (समान 4 गाटा संख्या, कुल भूमि 2.334 हेक्टेयर)  एक बिक्री विलेख पंजीकृत किया  जिसका विक्रय मूल्य  दो करोड़ रुपये  था.   इस एग्रीमेंट  में  एक अंतर यह आया  कि किए एग्रीमेंट कुसुम पाठक और उनके पति के पक्ष में था और क्रेताओं में से मोहम्मद इरफान  बाहर हो गए.  संभवत एग्रीमेंट निरस्त करने के पीछे यही कारण रहा होगा.   

  •  21/11/2017 को कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने   यही भूखंड इच्छा राम सिंह, जितेंद्र कुमार सिंह और राकेश कुमार सिंह को रु. 2.16 करोड़  मैं बेचने हेतु एक बिक्री एग्रीमेंट किया । यह समझौता  भी 17/09/2019 को रद्द कर दिया गया था। 

  •  उसी दिन  यानी 17/09/2019 को कुसुम पाठक और हरीश पाठक द्वारा उपरोक्त भूमि को इच्छा राम सिंह, विश्व प्रताप उपाध्याय, मनीष कुमार, सूबेदार, बलराम यादव, रवींद्र कुमार दुबे, सुल्तान अंसारी और राशिद हुसैन को दो करोड़ में बेचने के लिए एक  नया विक्रय  समझौता किया  जिसकी वैधता अवधि 3 वर्ष थी । यह  विक्रय अनुबंध  भी 18/03/2021 को रद्द करने के लिए पंजीकृत किया गया था।

  •  इसी दिन  यानी 18/03/2021 को कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने रवि मोहन तिवारी और सुल्तान अंसारी  को एक बिक्री विलेख द्वारा गाटा संख्या 243, 244 और 246 क्षेत्र 1.2080 हेक्टेयर भूमि  को   रु. 2 करोड़  में बैनामा कर दिया .  यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि इसमें गाटा संख्या 242 जिसका क्षेत्रफल 1.126 हेक्टेयर था,  विक्रेता कुसुम पाठक और उनके पति ने अपने पास रखा.  विक्रय किये गए इस  भूखंड पर  सर्किल रेट के अनुसार स्टाम्प  ड्यूटी दी गई. 

  •  उसी दिन  क्रेता  रवि मोहन तिवारी और सुल्तान अंसारी ने इस जमीन को राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र  ट्रस्ट को बेचने का समझौता किया जिसकी  विक्रय  राशि रु. 18.50 करोड रुपये  है . इस समझौते के एवज में   ट्रस्ट द्वारा  ऑनलाइन ट्रांजेक्शन से 17 करोड़ रुपए एडवांस के तौर पर  भुगतान किए  गए . 

  • विक्रेताओं के पक्ष में बैनामा और विक्रेताओं द्वारा राम मंदिर के पक्ष में रजिस्टर्ड सेल एग्रीमेंट करने के बीच 5 मिनट का अंतर है जिसका कारण यह हो सकता है कि जब राम मंदिर ट्रस्ट की उस भूखंड के मालिकों से खरीदने की बात पक्की हो गई तो उन्हें इसका बैनामा या रजिस्ट्री करवाना आवश्यक हो गया था  क्योंकि इसके बिना वह सेल एग्रीमेंट नहीं कर सकते थे.

  • राम मंदिर ट्रस्ट की रणनीति के अनुसार विक्रेताओं  के पक्ष में बैनामा होने के तुरंत बाद उन्हें अपना रजिस्टर्ड एग्रीमेंट करवाना था ताकि विक्रेता किसी राजनीतिक दबाव में जमीन बेचने से मुकर न जाएं
  • इसलिए विक्रेताओं के बैनामा और राम मंदिर ट्रस्ट के रजिस्टर्ड एग्रीमेंट का एक ही समय तय किया गया.
  • पहले विक्रेताओं ने अपने नाम पर बैनामा कराया और इसके बाद राम मंदिर ट्रस्ट के पक्ष में रजिस्टर्ड एग्रीमेंट कर दिया.
  • बिक्रेतओं के पक्ष में जो बैनामा हुआ वह वर्षों पहले तय कीमत के अनुसार ही हुआ और  राम मंदिर ट्रस्ट का इससे कोई लेना-देना नहीं है.  ट्रस्ट को तो यह भूखंड वर्तमान कीमत पर खरीदना है  और यह भूखंड ट्रस्ट के लिए किसी भी कीमत पर खरीदना उचित इसलिए है क्योंकि  रेलवे स्टेशन के पास यहीं पर  मंदिर का प्रवेश द्वार बन रहा है. 
  • चूंकि  विक्रेताओं ने  इस भूखंड को सितम्बर 2019 में उस समय खरीदा था  जब राम मंदिर निर्माण का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला नहीं आया था  और उस समय  अयोध्या में जमीन की कीमत  सामान्य थी,  इसलिए इस भूखंड की कीमत उस समय काफी कम थी. इस भूखंड की रजिस्ट्री कभी भी की जाए  पुरानी कीमत पर ही की जाएगी, हां उस पर वर्तमान सर्किल रेट के आधार पर स्टैंप ड्यूटी देनी होगी जो उन्होंने दी है. 
  • ट्रस्ट ने यह भूखंड वर्तमान मूल्य पर खरीदा है इसलिए बहुत स्वाभाविक रूप से इसकी कीमत में अंतर होगा ही  क्योंकि राम मंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद अयोध्या में दिन-प्रतिदिन कीमतें आसमान छू रही हैं . इसे ५ मिनट के अंतर पर  इतनी अधिक मूल्य वृद्धि  का भ्रम  फैलाना राजनीतिक उद्देश्य के अलावा और कुछ भी नहीं है.   
 

एक  सबसे बड़ी बात यह है कि राम मंदिर ट्रस्ट एक प्राइवेट ट्रस्ट है जिसका सरकार से कोई लेना देना नहीं है और यह ट्रस्ट किसी भी व्यक्ति या संस्था से आपसी विचार विमर्श और तय कीमत के अनुसार कोई भी संपत्ति खरीदने के लिए स्वतंत्र है. यह भी संभव है कि राम मंदिर ट्रस्ट को कुछ संपत्तियां बाजार मूल्य से ज्यादा कीमत पर भी खरीदनी पड़े क्योंकि अयोध्या में इस समय जमीन की कीमत आसमान छू रही है और मंदिर के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जमीन के मालिक जमीन बेचने से इंकार कर सकते हैं या मुंह मांगे पैसे मांग सकते हैं लेकिन ट्रस्ट को  अगले  50  वर्ष  के विस्तार को ध्यान में रखते हुए  यह संपत्तियां खरीदनी ही चाहिए.  राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र  ट्रस्ट प्राइवेट ट्रस्ट होने के कारण सरकार इन संपत्तियों का अधिग्रहण कर के ट्रस्ट को नहीं दे सकती.

समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता पवन पांडे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के इस मुद्दे को उछाला जिसे आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने हाथों-हाथ लपक लिया. प्रियंका वाड्रा भी कहाँ पीछे रहने वाली थी तो वह भी इस अभियान में शामिल हो गई. इन  नेताओं और  इनके दलो  का अतीत ऐसा है कि  उन  पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं किया जाना चाहिए.

राम मंदिर निर्माण  आस्था से जुड़ा बहुत संवेदनशील  मामला  है जिसने हिंदू जनमानस को बहुत प्रभावित किया है,  यह प्रभाव आगामी विधानसभा  और लोकसभा चुनाव में भी दिखाई पड़ सकता है.  इसलिए विपक्षी पार्टियां मंदिर मुद्दे की धार को कमजोर करना चाहती हैं.   अपने  कुत्सित  राजनीतिक  उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अभी और भी अनर्गल प्रलाप सामने आएंगे लेकिन  अब जनता बहुत जागरूक है  इसलिए यह राजनीतिक दल  भ्रम फैलाने में  सफल नहीं होगे  बल्कि  उन्हें इसके दुष्परिणाम  भोगने पड़ सकते हैं.

आजकल भारत की राजनीति, गिरावट की  सभी सीमाएं तोड़कर  कुछ भी कर गुजरने को तत्पर दिखती है  और इस विडंबना देखिए कि मंदिर ट्रस्ट पर दान की रकम का दुरुपयोग और हेराफेरी करने  का आरोप  वही लोग लगा रहे हैं जिन्होंने मंदिर निर्माण के लिए एक  पैसे का दान नहीं किया.   क्या  ऐसे लोगों को दान में दुरुपयोग की बात कहने का तो कोई नैतिक अधिकार  है ? 


राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े हुए लोग  लोभ,  लालच   से दूर हैं और जिनकी सत्य निष्ठा किसी भी संदेह से परे है.  ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन राम मंदिर निर्माण के लिए समर्पित कर दिया  और अब राम के काम के अंतिम पड़ाव में  उन पर आरोप लगाना    पूरे  हिंदू जनमानस  की  धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना है.  आरोप लगाने वाले  वही लोग हैं  जिन्होंने मंदिर मुद्दे पर पूरे हिंदू समाज को अपमानित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. इन्होंने राम के अस्तित्व को ही  नकारते हुए   उन्हें  एक काल्पनिक चरित्र  बताया था .  इनमें से एक ऐसी पार्टी भी है जिसने राम मंदिर के स्थान पर सार्वजनिक शौचालय बनाने की भी बात की थी.  मजे की बात यह है कि आरोप लगाने वालों में  वे  दल  सबसे आगे हैं  जिन्होंने  अपने शासनकाल में  भ्रष्टाचार के नए-नए कीर्तिमान  गढ़े  थे .  कुछ दलों ने  फिल्मी सितारों के नाच गाने पर सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च किये थे  और अपने कार्यकाल में इतना भ्रष्टाचार किया जिसकी कुल राशि कई राज्यों की सकल घरेलू उत्पाद से भी ज्यादा हो सकती है . 


कुछ दलों ने  पारिवारिक  ट्रस्ट  के लिए  केंद्रीय बजट से आवंटन भी कराया और  राष्ट्रीय हितों को दरकिनार कर  कई  देशों से  चंदा  भी लिया.  जिनके रिश्तेदारों पर सरकारी सहयोग से  कौड़ियों के मोल जमीन खरीद कर   हजारों करोड़  रुपए कमाने के आरोप लगे. कुछ राजनीतिक दलों  के नेताओं पर कोरोना महामारी के दौरान  ऑक्सीजन  और महत्वपूर्ण दवाओं की कालाबाजारी और  सरकारी विज्ञापनों में  कमीशन खाने, अस्पतालों में  फर्जी नामों से बेड बुक करा कर जनता को बेवजह मारने  के आरोप लगे.  कुछ राजनीतिक दलों  के दामन पर प्रवासी श्रमिकों को  पलायन के लिए मजबूर  करने के भी दाग  है. महामारी के दौरान कुछ राजनीतिक दलों पर केंद्र सरकार की मुफ्त राशन योजना के दुरुपयोग का आरोप भी है जिसे  तथाकथित रूप से  अपात्र  लोगों, बांग्लादेशी घुसपैठियों  और रोहिंग्याओं को  उपलब्ध कराने का संगीन आरोप भी सामने आया है . 


उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव  नजदीक  हैं, जहाँ   समाजवादी पार्टी  सत्ता पाने के लिए बेकरार है,  तो कांग्रेश पार्टी अपनी खोई हुई सियासी जमीन तलाश रही  है, वही  आम आदमी पार्टी  दिल्ली के बाहर पांव पसारने   के लिए व्याकुल है.   इन सब पार्टियों के पास कोई बड़ा और गंभीर  मुद्दा नहीं है इसलिए वे मुद्दे ढूंढ कम,  खोद  ज्यादा रहे  हैं.  यह मुद्दा भी एक खोदा हुआ मुद्दा है. ऐसा लगता है कि 2024 के   लोकसभा चुनाव तक  विपक्ष इस तरह के स्टंट लगातार करता रहेगा.   ऐसे में सभी देशवासियों को चाहिए कि  किसी राजनैतिक दल  की  कोई भी बात सुनने से  पहले  उनकी नियति  और उसका अतीत अवश्य  ध्यान में  रखें तो सबकुछ स्पष्ट हो जाएगा.


                        " उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू" 

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- शिव मिश्रा

  


Friday, June 11, 2021

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का आखिर कांग्रेस इतना विरोध क्यों कर रही है? क्या है इसके पीछे का असली एजेंडा? क्या इसमें भी सांप्रदायिकता का खेल है?

 सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का विरोध, असली एजेंडा सांप्रदायिकता का खेल



गांधी परिवार का सत्ता प्रेम जगजाहिर है. सरदार वल्लभ भाई पटेल के पक्ष में बहुमत होने के बाद भी गांधी जी के कारण जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री की कुर्सी मिल गई, इसके बाद नेहरु ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और सत्ता को 7 पीढ़ियों तक बनाए रखने के लिए जो भी हो सकता था वह उन्होंने किया.

जवाहरलाल नेहरू के हिंदू होने पर भी तमाम सवालिया निशान है, जो खोज का विषय हैं लेकिन उन्होंने स्वयं भी कहा था कि- मैं शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुसलमान और संयोगवस हिंदू हूं।

(“I am Englishman by education, Muslim by culture and Hindu merely by accident of birth.”)

संयोग से ही सही एक हिंदू बहुल देश में नेहरू को प्रधानमंत्री बने रहने के लिए हिंदू बने रहना मजबूरी भी थी . एक और छिपी हुई कड़वी सच्चाई यह है कि वह दिल से वामपंथी थे और अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि बनाने के चक्कर में वामपंथी सोवियत रूस के साथ खड़े होकर भी गुटनिरपेक्ष आंदोलन के अगुआ बनने का नाटक करते रहे.

इस दौरान वह पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक- वामपंथ गठजोड़ की गिरफ्त में आ गए थे . धीरे-धीरे उन्होंने भारत के इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को इस गठजोड़ के हवाले करना शुरू कर दिया और श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तो इस पर इस्लामी वामपंथ गठजोड़ का पूरी तरह से कब्जा हो गया.

ऐसा नहीं कि है यह सब संयोग से या अनजाने में हो गया था, इसके प्रभाव और परिणामों से नेहरू और श्रीमती गांधी दोनों ही भली भांति परिचित थे लेकिन इस्लामिक वामपंथ गठजोड़ के प्रति स्वाभाविक प्रेम और वोटबैंक की राजनीति ने उन्हें देश के प्रति हो रहे इस भितरघात के प्रति आंखें बंद करने के लिए मजबूर कर दिया.

अगर यह नहीं हुआ होता तो क्या भारत का इतिहास इतना विकृत हुआ होता ? आजादी के 70 साल बाद भी सनातन संस्कृति का स्वरूप इतना बदहाल होता? आक्रांताओं के भयानक जुल्म और ज्यादितियाँ सहकर भी अपनी सनातन पहचान बचाए रखने वाले लोग, अब जान बचाने के लिए अपने ही देश में शरणार्थी बनकर भटक रहे होते ?

तुष्टिकरण और वोट बैंक की इस नीति के कारण न केवल मुगल और अंग्रेजी साम्राज्य में बनी इमारतों को ऐतिहासिक स्मारकों / धरोहरों में बदलने बल्कि हिन्दू धार्मिक स्थलों को तोड़कर बनाए गए गुलामी के प्रतीकों को भी संरक्षित और महिमा मंडित करने का षड्यंत्र रचा गया. तत्कालीन सरकारों ने समय समय पर अनेक कानून बना कर इस षड़यंत्र को सफल बनाने और बहुसंख्यक हिन्दुओं के हाँथ बांधने का पाप भी किया. यही नहीं इन इमारतों को इस्लाम धर्म और मुस्लिम स्वाभिमान से भी जोड़ने का कुत्सित प्रयास किया गया ताकि हिन्दू मुस्लिम विद्वेष के कारण लम्बे समय तक वोटों की फसल काटी जा सके. अंग्रेजों ने भारत में यही किया था और अंग्रेजों से सत्ता संभालने वाले भी काले अंग्रेजों ने भी वही किया .

सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट रोकने में कांग्रेस के अपने स्वार्थ हैं, जिसके लिए तरह तरह के कुतर्क दिए जा रहे हैं और भारत में आजमाए जा चुके सभी पुराने नुस्खे प्रयोग किये जा रहे हैं, इनमें सबसे अचूक है उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका.के माध्यम से सरकार को घेरना, परियोजना में विलम्ब करना और मुफ्त का प्रचार पाना है . उसके अलावा सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में भी जमकर दुष्प्रचार किया जा रहा है.

लेकिन इस सब का एक अत्यंत स्याह पक्ष है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किया जा रहा दुष्प्रचार, जिससे देश की छवि को अपूरणीय क्षति पहुंचाई जा रही है. बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय मीडिया हाउस भी इस अभियान में शामिल हैं, जिनमें झूठी और सनसनीखेज खबरें छापी जा रही है. चूंकि प्रधानमंत्री मोदी हैं, तो आवश्यक रूप से गुजरात दंगों की यादें तो ताजा की ही जाएंगी , हिंदू सांप्रदायिकता, हिंदू उग्रवाद, और हिंदू तालिबान जैसे नए और सनसनीखेज नारे भी गढ़े जाएंगे.

आजकल तो टूलकिट का जमाना आ गया है जिसके हिसाब से नए-नए नैरेटिव बनाए जा रहे हैं. और कुछ लोग अगर यह ठान ले कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि कितनी ही खराब क्यों न हो जाए, मोदी की छवि खराब होनी चाहिए, तो फिर वैसा ही होगा जैसा इस समय हो रहा है.

इन सब कारनामों के पीछे असली एजेंडा है किसी भी तरह भारत की सत्ता पर कब्जा करना, जो राहुल गांधी के अनुसार केवल मोदी की छवि ख़राब करके ही पाई जा सकती है.

इसलिए एक सुनियोजित एजेंडा के अंतर्गत मोटे तौर पर दो मोर्चों पर पर कार्य हो रहा है -

१. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मोदी की छवि खराब करना ताकि देश में ही नहीं पूरे विश्व में में भ्रम फैले कि भारत में कुछ भी ठीक नहीं, सब कुछ गलत हो रहा है-

  • चाहे वह कोरोना का प्रबंधन हो,

  • टीकाकरण हो

  • सेंट्रल विस्ता प्रोजेक्ट हो,

  • किसान आंदोलन हो,

  • राज्यों के चुनाव हो या या राष्ट्र हित कोई और मुद्दा

२. मुस्लिम समुदाय को अपने पक्ष में करने के लिए कुछ भी करना पड़े, सब किया जाए चाहे तुष्टिकरण की सीमाएं तोड़ने से देश ही क्यों न टूट जाय.

सेंट्रल विस्टा परियोजना से इतनी नफरत क्यों ?

सेंट्रल विस्टा परियोजना इसी बड़े षड्यंत्र का एक छोटा बिंदु मात्र है जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जोर शोर से उठाकर भारत को कलंकित करना और मोदी को कट्टर हिन्दू और घनघोर मुस्लिम विरोधी साबित करना है . इन घटनाओं का क्रम देखिये -

  • सेंट्रल विस्टा परियोजना के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने परियोजना को हरी झंडी दिखा दी.

  • इसके बाद भी दिल्ली उच्च न्यायालय में कोरोना महामारी में परियोजना जारी रखने के विरुद्ध जनहित याचिका दायर की गई. उच्च न्यायालय ने परियोजना को रोकने की याचिका को दुर्भावना से प्रेरित बताते हुए इसे खारिज कर दिया और कहा कि सेंट्रल विस्टा एक अहम, आवश्यक राष्ट्रीय परियोजना है. अदालत ने याचिकाकर्ताओं पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया.

  • इसके बाद हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए पुन: सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की गयी है ।

  • सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया में सेंट्रल विस्ता प्रोजेक्ट के विरुद्ध बड़े पैमाने पर प्रायोजित दुष्प्रचार किया जा रहा है, जिसके लिए प्रधानमंत्री मोदी पर व्यक्तिगत हमले भी किए जा रहे हैं.

आप यह जान कर हैरान होंगे कि जहां राष्ट्रीय क्षितिज पर सेंट्रल विस्ता परियोजना का विरोध के लिए कोरोना महामारी और और वित्तीय संसाधनों को महामारी पर खर्च करने को आधार बनाया जा रहा है वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके निर्माण के पीछे हिंदू कट्टरता और इस्लाम के प्रति मोदी की घृणा को रेखांकित और प्रचारित किया जा रहा है. पुरानी संसद को मुस्लिम प्रेरित ऐतिहासिक धरोहर और प्रस्तावित नयी ईमारत को हिन्दू वादी स्मारक प्रचारित किया जा रहा है. जबकि तथ्य है कि पुरानी संसद इमारत को तो स्मारक की तरह ही सहेजे जाने का प्रस्ताव है और तोड़ा नहीं जा रहा है. इस परियोजना की शुरूआत तो स्वयं कांग्रेस सरकार ने की थी जो अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाओं की तरह फाइलों में बंद रह गयी

सेंट्रल विस्ता प्रोजेक्ट का मामला वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयार्क टाइम्स, दि गार्जियन, बीबीसी आदि में प्रमुखता से छाया हुआ है. सभी में सेंट्रल विस्ता प्रोजेक्ट के पीछे मोदी की कट्टर हिंदूवादी सोच बताई जा रही है जो भारत से इस्लाम को किसी भी कीमत पर निकाल बाहर करना चाहते हैं और मुगलों से जुड़ी हुई किसी भी चीज को किसी भी कीमत पर ध्वस्त कर देना चाहते हैं..

इनमे प्रकाशित लेखों में पुरानी संसद भवन की इमारत को मुगल शैली से प्रेरित इस्लामिक इमारत बता कर कहा गया है कि इसे मोदी जैसा हिंदू तालिबानी, मुस्लिमों के प्रति अपनी घृणा के कारण ध्वस्त करना चाहता है और एक ऐसी नई इमारत बनाना चाहता है जो हिंदुओं के स्मारक की तरह दिखाई पड़े.

पिछले कुछ समय से द गार्जियन में भारतीय मूल के एक लेखक जो पेशे से मूर्तिकार हैं, और भारत के एक प्रमुख राजनीतिक दल के बेहद करीबी बताए जाते हैं, ऐसे सनसनी खेज लेख छाप रहे हैं. कुछ प्रमुख लेखो के शीर्षक पढ़कर आप हैरान हो जाएंगे -

  • मोदी का संसद पर बुलडोजर चलाना उन्हें एक हिंदू तालिबान के रूप में दर्शाता है, (Modi's bulldozing of parliament shows him as the architect of a Hindu Taliban - The Guardian Jun 2021)

  • कट्टरपंथी मोदी भारत की विरासत को नष्ट करने के लिए कोरोना संकट का उपयोग कर रहे हैं, (Modi the fanatic is using the Coronavirus crisis to destroy India's heritage - The Guardian May 2020)

  • भारत में हिंदू तालिबान का शासन है,( India is ruled by Hindu Taliban- The Guardian)

गार्जियन  के एक लेख Modi’s bulldozing of parliament shows him as the architect of a Hindu Taliban से कुछ अंश जिनसे यह पता चलता है कि भारत के विरुद्ध अन्तराष्ट्रीय स्तर पर षड़यंत्र कितना गहरा है और उससे भी चिंता का विषय है कि इसमें भारत के राजनैतिक दल भी शामिल है.

उद्धरण
" मोदी का संसद पर बुलडोजर चलाना उन्हें एक हिंदू तालिबान के रूप में दर्शाता है. राजसी मुगल-प्रेरित इमारतों को ध्वस्त  करना भारत को इस्लाम से मुक्त करने के लिए घृणित, घमंड से भरे अभियान का नवीनतम चरण है 

भारत की राजधानी नई दिल्ली के केंद्र में, एक मुगल-प्रेरित स्मारक है, जिसमें भारतीय संसद की सीट है। 1911 और 1931 के बीच ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियन द्वारा निर्मित, संसद भवन और उनके भव्य सड़क मार्ग और जल चैनल ईरान के इस्लामी शासकों द्वारा स्थापित और समरकंद के इस्लामी सल्तनत और भारत के मुगल शासकों द्वारा विस्तृत रूप का पालन करते बनायी गयी  हैं। 

लुटियंस ने शायद आधुनिक समय की सबसे महत्वपूर्ण इस्लामी-प्रेरित इमारत को डिजाइन किया था। इमारतें हिंदू मंदिरों और महलों से स्थापत्य प्रतीकों को उद्धृत तो करती हैं, लेकिन भव्य योजना मुगल-इस्लामी परिदृश्य के डिजाइन का अनुसरण करती है, जिसमें रोमन विजयवाद को हल्का संकेत दिया गया है। मेरे विचार से यह दुनिया में कहीं भी सरकारी भवनों का सबसे बड़ा समूह है। 

अप्रत्याशित रूप से, इन इमारतों की इस्लामी उत्पत्ति दिल्ली में वर्तमान शासन को अपमानित करती है। इसलिए तानाशाह मोदी और उसके गुर्गे इसे बर्बाद कर रहे हैं। जैसा कि मैं लिखता हूं, विनाश हो रहा है। यह एक घृणित बात है कि भारत को इस्लाम से मुक्त करने के मोदी के नफरत भरे अभियान को विश्व स्तरीय स्मारक के विनाश के माध्यम से जारी रखने की अनुमति है। हैरानी की बात है कि संयुक्त राष्ट्र विरासत मंच चुप है और विश्व धरोहर निकायों ने अपना मुंह मजबूती से बंद रखा है। क्या वे मोदी से डरते हैं, या उन्हें परवाह नहीं है कि भारत में क्या हो रहा है? 

मोदी ने तीसरे दर्जे के बिमल पटेल को अपना वास्तुकार नियुक्त किया है। पटेल इसके प्रतिस्थापन को इस तरह से डिजाइन करेंगे जैसे अल्बर्ट स्पीयर ने अपने फ्यूहरर के नेतृत्व का अनुसरण किया, लेकिन, निश्चित रूप से, पटेल के पास स्पीयर की प्रतिभा का एक भी हिस्सा नहीं है। 

यह वैचारिक रूप से प्रेरित, नफरत से भरा विनाश 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस और पूरे भारत में इस्लामी और मुगल स्मारकों की बर्बरता का अनुसरण करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी भारत के सभी इस्लामी स्मारकों को मिटाने और 200 मिलियन भारतीय मुसलमानों को हटाने से कम कुछ नहीं चाहते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसने पहले ही लाखों भारतीय मुसलमानों से भारतीय नागरिकता जबरन छीन ली है और उन्हें राज्यविहीन कर दिया है - एक ऐसा अपराध जिसके लिए उन्हें दंडित नहीं किया गया है, भले ही भारत संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकारों की घोषणा का एक हस्ताक्षरकर्ता है। जिनमें से नागरिकता एक केंद्रीय सिद्धांत है। 

संसद के लिए जगह की कमी के कारण इस भव्य दृश्य के विनाश को उचित ठहराने का ढोंग कमजोर है। भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय, जिसे ध्वस्त होने वाली इमारतों में से एक में रखा गया है, को कला के कई अमूल्य और नाजुक कार्यों को खतरे में डालते हुए, अपने अद्भुत संग्रह के लिए अपर्याप्त स्थान पर ले जाया जाना है। मोदी के कार्यकाल की समाप्ति से पहले काम खत्म करने के लिए यह सब ख़तरनाक गति से किया जाएगा। भारतीय अदालतों पर इस मूर्खतापूर्ण योजना को मानने के लिए दबाव डाला गया और पत्रकारों और अन्य टिप्पणीकारों को धमकाया गया। 

दुख की बात है कि कोविड -19 ने देश को तबाह कर दिया है, लेकिन बेपरवाह तानाशाह विचारधारा यह सुनिश्चित करती है कि केंद्रीय विस्टा परियोजना का खर्च  $ 2 बिलियन है, जबकि भारत के करोड़ों गरीब और निराश्रितों को अपने लिए खर्च करना पड़ता है। वे सैकड़ों हजारों की संख्या में मर रहे हैं। अदृश्य और अनाम नागरिकों की लाशों पर मोदी अपने लिए एक अश्लील स्मारक बना रहे हैं। 

मैं यहां मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब से तुलना करता हूँ, जिसने १७वीं शताब्दी में पूरे भारत में धार्मिक घृणा के कारण हिंदू स्मारकों और मंदिरों को नष्ट कर दिया था। मोदी हमारे समय के लिए औरंगजेब हैं। उनके शासन की तुलना अफगानिस्तान में तालिबान से की जाती है, जो वैचारिक उत्साह के साथ शासन करने का भी प्रयास करते हैं। 

सांस्कृतिक स्वीकृति और वर्चस्व स्थापित करने के लिए मोदी के हिंदू तालिबान को स्मारकों की जरूरत है। सभी फासीवादी-झुकाव वाले राजनेताओं की तरह, मोदी को उम्मीद है कि राष्ट्र के दिल में छवियों को नियंत्रित करके, वह अपने भारत की एक नई दृष्टि तैयार करेंगे, जो उन्हें महात्मा गांधी और वल्लभभाई पटेल के साथ केंद्र में रखता है। 

इसमें प्रदर्शित अहंकार और उनकी अन्य व्यर्थ परियोजनाओं ने भारतीय लोकतंत्र को भारी जोखिम में डाल दिया है। मोदी ने हाल ही में उत्तर कोरिया में किम जोंग-उन की हंसी-मजाक वाली मिमिक्री में खुद के नाम पर एक क्रिकेट स्टेडियम खोला। उन्होंने हिंदू-गुजराती स्वतंत्रता सेनानी वल्लभभाई पटेल की एक स्मारकीय प्रतिमा बनवायी। यह स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से चार गुना बड़ा है, अकल्पनीय रूप से अश्लील है और इसकी कीमत $400m से अधिक है। ये अति-राष्ट्रवादी मोदी तालिबानियों के लिए रैली करने के लिए इमारतें हैं। 

ब्रिटिश सिविल सेवक जॉन स्ट्रैची ने 1884 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में दिए गए एक व्याख्यान में घोषणा की कि "भारत जैसा कोई देश नहीं है और यह भारत के बारे में पहला और सबसे आवश्यक तथ्य है जिसे सीखा जा सकता है"। भारत में एकीकृत धर्म, संस्कृति और परंपरा की तलाश में, वह उन्हें नहीं मिला। वे जो देखने में असफल रहे, वह है विविधता के लिए भारत की क्षमता, भारत की अपरिहार्य बहुस्तरीय जटिलता, भारत का विलक्षणता से इंकार। वह भारत को एक साझा भाषा या परंपरा के बिना एक समग्र बनाने के रूप में नहीं देख सकता था। उनकी राष्ट्र-राज्य मानसिकता एकता और विविधता को साथ-साथ रहते हुए नहीं देख सकती थी। 

भारतीयों को एक प्रणाली में मजबूर करने के ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रयासों ने अकाल और दासता को जन्म दिया। इसने भारतीयों को सांस्कृतिक हीनता के लिए मजबूर कर दिया ताकि ईसाई नैतिकता हावी हो सके और ब्रिटिश व्यापारिक हित फल-फूल सकें। मेरा मानना ​​है कि आज भारत में फासीवादी सरकार वही कर रही है जो अंग्रेज नहीं कर सकते थे। मोदी और उनके नव-औपनिवेशिक गुर्गे देश पर हिंदू विलक्षणता थोप रहे हैं। 

संसद भवनों का विनाश एक फासीवादी शासन द्वारा भारतीय मानस पर अधिकार करने का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी अति-राष्ट्रवादी दृष्टि किसी भी कीमत पर सभी भारतीयों पर हिंदू प्रभुत्व की है, और मोदी इसके वास्तुकार के रूप में भारत पर शासन करेंगे, अपने दाहिने हाथ को सलामी, हथेली खोलकर, हिंदू भगवान विष्णु की नकल करते हुए। " उद्धरण समाप्त

ये एक लेख के कुछ अंश हैं दूसरे लेख और भी ज्यादा खरतनाक भाषा में हैं और जब ऐसे लेख विदेशों के बड़े बड़े मीडिया में हों तो इसका मतलब आसानी से समझा जा सकता है .

ऐसे लेख सामान्यतय: प्रायोजित होते है और ऐसे अनेक लेख विदेशी मीडिया में हैं. भारत से सम्बंधित नकारात्मक फोटो और सामिग्री ऊंचे दामों में बिक रही है. सूचना हैं कि बरखा दत्त और राणा अयूब के शमशान में जलते शव और गंगा में बहती लाशों से सम्बंधित फोटो और सामिग्री अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में लाखों डालर में बेंचे जा रहें हैं . ये सब क्या हो रहा है ? कितने लोग भारत में इसके बारें में जानते हैं और समझते हैं और सोचते हैं ?

पूरे भारत में पक्ष और विपक्ष में लोग खड़े हैं, कम से कम सोशल मीडिया से तो यही लगता है. देश में बिलकुल वैसे ही हालात हैं जैसे विदेशी आक्रान्ताओं के भारत पर आक्रमण के समय थे. ऐसे हालातों के कारण ही भारत एक हजार वर्ष तक गुलाम रहा और सनातन संस्कृति को इतनी क्षति हुई, जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं हो पायेगी . अब स्थितियां ज्यादा ख़राब है और अगर ऐसा ही चलता रहा तो अगले २० -३० वर्षों में भारत की तश्वीर एकदम से बदल जायेगी. उस समय आप सब का क्या होगा ? जरा कल्पना कीजिये.

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- शिव मिश्र