शनिवार, 5 सितंबर 2026

देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था

भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र?


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से देशवासियों के समक्ष वर्ष २०४७ तक भारत को एक 'विकसित राष्ट्र' बनाने का स्वप्न प्रस्तुत कर रहे हैं। किंतु दूसरी ओर, कट्टरपंथी शक्तियों ने पीएफआई जैसे संगठनों को मुखौटा बनाकर २०४७ तक भारत को एक इस्लामी राष्ट्र में तब्दील करने का खतरनाक षड्यंत्र रच रखा है। लंबे समय से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो दोनों ही धाराएं एक-दूसरे के मार्ग में बिना हस्तक्षेप किए आगे बढ़ रही हैं। ऐसे में यह एक अत्यंत स्वाभाविक और ज्वलंत प्रश्न उठता है कि यदि २०४७ तक भारत एक विकसित राष्ट्र बन भी जाता है, तो उसका वैचारिक और जनसांख्यिकीय स्वरूप क्या होगा— एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र या एक इस्लामी राष्ट्र? सरकार शायद इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर न दे सके, परंतु वर्तमान परिस्थितियां और जनसांख्यिकीय बदलाव इस बात की ओर स्पष्ट संकेत कर रहे हैं कि एक समुदाय विशेष अपने भयावह एजेंडे में अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ता जा रहा है।

आज भारत में इस्लामी और ईसाई मिशनरियां व्यापक स्तर पर धर्मांतरण के कुत्सित अभियान में संलग्न हैं। इस राष्ट्र-विरोधी कार्य के लिए विदेशों से भारी मात्रा में फंडिंग की जाती है। यही कारण है कि जब विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम (एफसीआरए) को सख्त किया गया, तो उसका चौतरफा और पुरजोर विरोध हुआ।

आज दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि देश का असली विपक्ष कांग्रेस या कोई अन्य राजनीतिक दल नहीं रह गया है, बल्कि मुस्लिम कट्टरपंथी और धर्मांतरण में लिप्त ईसाई मिशनरियां देश के मुख्य विपक्षी की भूमिका में आ गई हैं। कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल तो भारत को खंडित करने और इसके राष्ट्रीय स्वरूप को नष्ट करने के इस भयानक अभियान में मात्र मोहरे बनकर रह गए हैं। यदि हम बीते एक सप्ताह के भीतर घटी घटनाओं का सूक्ष्मता से विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कट्टरपंथियों ने जिस भयावह कार्य को १०-१५ वर्ष बाद अंजाम देने की योजना बनाई थी, उसकी शुरुआत उन्होंने अभी से कर दी है।

उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र के पुणे में राहुल गांधी एक आयोजन करते हैं और उसमें पहले से तैयार की गई स्लाइड के माध्यम से 'मनुस्मृति' का विकृत प्रस्तुतीकरण करते हैं। वे एक तीर से दो शिकार करते हैं— एक ओर वे हिंदुओं पर निशाना साधते हुए उनकी महान परंपराओं और पवित्र ग्रंथों का घोर अपमान करते हैं, तो दूसरी ओर सनातन धर्म की सुदृढ़ और पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था पर सीधा कुठाराघात करते हैं। वे हिंदुओं की हजारों वर्षों से चली आ रही पारिवारिक संरचना को छिन्न-भिन्न करने का आह्वान ठीक उसी प्रकार करते हैं, जैसा जिहादी और ईसाई मिशनरियां सदियों से करती आ रही हैं। वे हिंदू महिलाओं से इन तथाकथित 'रूढ़िवादी बंधनों' को तोड़ने की अपील करते हैं। इसके पीछे का छिपा हुआ एजेंडा क्या है? यही कि उन महिलाओं को जिहादियों और मिशनरियों द्वारा आसानी से अपना शिकार बनाया जा सके।

इस घटना के तुरंत पश्चात, केरल में एक मजहबी उन्मादी मुफ्ती शेख अबू बकर अहमद (कांतपुरम एपी अबूबकर मुसलियार) का एक नितांत महिला-विरोधी और विवादित बयान सामने आता है। कोच्चि के एक सम्मेलन में वह फतवा-नुमा फरमान सुनाता है कि महिलाओं को घरों की चारदीवारी तक ही सीमित रहना चाहिए और सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह दूर रहना चाहिए। उसने महिलाओं की तुलना निर्जीव सोने के गहनों से करते हुए कहा कि जैसे कीमती हार को सुरक्षित डिब्बे में रखा जाता है, वैसे ही महिलाओं को भी पर्दा प्रथा के तहत घर में कैद रखना चाहिए। ध्यातव्य है कि यह मध्ययुगीन फरमान विशेष रूप से केवल मुस्लिम महिलाओं के लिए था।

यद्यपि केरल के कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने आरंभ में एक वीडियो संदेश जारी कर मौलाना के इस कृत्य की कड़ी आलोचना की थी, किंतु बाद में आलाकमान और मुस्लिम लीग के भारी राजनीतिक दबाव में उन्हें अपना वह वीडियो डिलीट कर अपनी आलोचना वापस लेनी पड़ी। इस घोर कट्टरपंथी मानसिकता पर गांधी परिवार (राहुल, प्रियंका या सोनिया) के मुख से विरोध का एक शब्द नहीं निकला। आश्चर्यजनक और निराशाजनक तो यह भी है कि भाजपा को छोड़कर देश के किसी अन्य 'तथाकथित प्रगतिशील' राजनीतिक दल ने इसका विरोध करने का साहस नहीं जुटाया।

इसी कड़ी में एक तीसरी और अत्यंत गंभीर घटना यह है कि 'ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड' ने देशभर में 'सेव इंडिया, सेव शरिया' (दीन और दस्तूर बचाओ) नामक एक बड़ा अभियान शुरू करने की घोषणा की है। इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन की औपचारिक शुरुआत १७ सितंबर २०२६ को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक विशाल शक्ति प्रदर्शन के साथ प्रस्तावित है। देश ने पहले भी देखा है कि ऐसे प्रदर्शनों की आड़ में अनेक कट्टरपंथी, जिहादी और अराजक तत्व कैसे सक्रिय हो जाते हैं। उनका वास्तविक उद्देश्य अपने बाहुबल का परीक्षण करना तथा वर्तमान सरकार के विरुद्ध किसी भी प्रदर्शन को हिंसक और उत्तेजक बनाकर व्यवस्था को घुटनों पर लाना होता है।

इस अभियान के जो मुख्य बिंदु घोषित किए गए हैं, वे पूरी तरह से भ्रामक और अलगाववादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। उनका नैरेटिव यह है कि पिछले १०-१२ वर्षों में (केंद्र की मोदी सरकार के दौरान) मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। इस आंदोलन के पांच मुख्य एजेंडे हैं:

 

१. समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का तीखा विरोध करना।,

२. राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के गायन पर अपनी पुरानी मजहबी आपत्ति को फिर से मुखर करना।,

३. अवैध मदरसों, अतिक्रमण कर बनाई गई मस्जिदों और वक्फ बोर्ड की मनमानी संपत्तियों पर होने वाली कानूनी कार्रवाई (बुलडोजर एक्शन) का विरोध करना।,

४. 'मॉब लिंचिंग' का नैरेटिव गढ़कर एकतरफा मुहिम चलाना, और

५. संवैधानिक अधिकारों की आड़ में अपने मजहबी हितों को साधना।

 

यदि हम इन सभी घटनाओं की कड़ियों को आपस में जोड़ें, तो एक अत्यंत भयानक षड्यंत्र उभरकर सामने आता है। यह षड्यंत्र भारत की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के समक्ष ऐसी विकट चुनौती उत्पन्न करने का है, जिससे सरकार घुटने टेक दे और जिहादियों तथा अतिवादियों द्वारा किए जा रहे भारत के इस सुनियोजित 'राष्ट्रान्तरण' के कार्य में कोई बाधा उत्पन्न न करे। संपूर्ण विश्व का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जहाँ-जहाँ इस्लामिक जिहादी और उग्रवादी तत्वों को तनिक भी प्रश्रय मिला है, वहाँ इन्हीं चरणबद्ध योजनाओं के माध्यम से अंततः इस्लामी राष्ट्र की स्थापना हुई है।

स्मरण रहे, स्वतंत्रता आंदोलन के समय ही कट्टरपंथियों द्वारा समूचे भारत पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का एक अभियान चलाया गया था। तब यह कुतर्क दिया जाता था कि अंग्रेजों ने सत्ता मुस्लिम साम्राज्य से छीनी थी, इसलिए जाते समय उन्हें यह कमान पुनः मुसलमानों को ही सौंपनी चाहिए। जब ऐसा संभव नहीं हो सका, तो उन्होंने भारत को खंडित कर धर्म के आधार पर एक अलग देश ले लिया, किंतु साथ ही एक विषैला नारा भी गढ़ा— "हंस कर लिया पाकिस्तान, लड़ कर लेंगे हिंदुस्तान।" मुस्लिम आबादी का एक बड़ा वर्ग, जिसने पाकिस्तान बनाने के लिए हिंसक आंदोलन चलाया था, वह विभाजन के बाद पाकिस्तान गया ही नहीं। उनका कुटिल मानना था कि उन्हें भारत भूमि के एक टुकड़े से संतोष नहीं है, उन्हें समूचा भारत चाहिए और वे इसके लिए निरंतर प्रयास करते रहेंगे। और आज ठीक वही प्रयास हो रहे हैं।

यह हमारा दुर्भाग्य रहा कि तत्कालीन नेतृत्व (विशेषकर गांधी और नेहरू) ने सुनियोजित तरीके से इन अलगाववादी प्रयासों को ढाल प्रदान की। स्वतंत्रता के बाद का यदि हम इतिहास देखें, तो ऐसा प्रतीत होता है कि स्वतंत्र भारत की पहली सरकार के समय से ही देश को एक इस्लामी राष्ट्र बनाने का परोक्ष अभियान चलाया जाता रहा, जिसे सत्ता का संरक्षण भी प्राप्त था। इसलिए, आज कांग्रेस से कोई गिला-शिकवा नहीं है। वास्तविक गिला-शिकवा तो उन अचेत हिंदुओं से है, जो आज भी ऐसी राजनीतिक ताकतों के पीछे आंख मूंदकर घूम रहे हैं, जिनका देश की अस्मिता, एकता और अखंडता से कोई सरोकार नहीं है।

जो विनाशकारी कार्य आज से १०-१५ वर्ष बाद अपने चरम पर पहुँचना था, उसकी आक्रामक शुरुआत अभी से हो चुकी है। इसके बाद की जो स्थिति उत्पन्न होती है, वह और भी भयावह होती है, जिसे 'गृहयुद्ध' कहा जाता है। इतिहास गवाह है कि ऐसी स्थिति में कट्टरपंथी 'मोपला विद्रोह' और 'डायरेक्ट एक्शन डे' की तरह देश के मूल निवासियों का बर्बर नरसंहार करते हैं। लोगों को या तो धर्मांतरण के लिए विवश किया जाता है, या वे मौत के घाट उतार दिए जाते हैं। अंततः जबरन उस देश पर शरिया कानून थोप दिया जाता है। बचे-खुचे मूल निवासी कालांतर में उसी तरह विलुप्त हो जाते हैं, जैसे आज पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू कहीं खो गए हैं।

इस पावन भारतवर्ष ने अपने इतिहास में १० करोड़ से अधिक हिंदुओं का नरसंहार झेला है, जो इस पृथ्वी का सबसे बड़ा और क्रूरतम नरसंहार है। लेकिन सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इतनी भयानक ऐतिहासिक त्रासदियों और वर्तमान के स्पष्ट पदचापों के बावजूद, हिंदू समाज आज भी गहरी निद्रा में है। यदि वे अभी भी सचेत नहीं हुए, तो स्वाभाविक रूप से उनके हिस्से में क्या आने वाला है, यह समझना अब तनिक भी मुश्किल नहीं है।

                    — शिव मिश्रा

शनिवार, 29 अगस्त 2026

क्या कॉर्पोरेट जगत के निशाने पर हैं हिंदू परंपराएं?

 


रक्षाबंधन : हिन्दू त्योहार और विज्ञापन: क्या कॉर्पोरेट जगत के निशाने पर हैं हिंदू परंपराएं? || बॉलीवुड और ऐड एजेंसियों का गहरा रिश्ता


अभी हाल ही में चांदी के आभूषण बेचने वाली कंपनी गिवा के रक्षाबंधन विज्ञापन ने हिंदुओं की आस्था और सांस्कृतिक चेतना को अत्यधिक ठेस पहुंचाने का कार्य किया है। बॉलीवुड अभिनेत्री कृति सेनन वाले इस विज्ञापन को लेकर पूरे देश और सोशल मीडिया पर यह भारी आपत्ति उठी कि रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक पर्व की प्रस्तुति और अभिनेत्री के परिधान में भारतीय सांस्कृतिक संदर्भों का लेशमात्र भी ध्यान नहीं रखा गया। इस विज्ञापन में मुख्य कलाकार के कपड़े, जो इंडो-वेस्टर्न स्टाइल के हैं और जिसमें लगभग नग्नता का प्रदर्शन किया गया है, भारतीय परिवार की गरिमा के बिल्कुल भी अनुकूल नहीं हैं। हिंदू परिवारों की बहन और बेटियां अपने भाई और पिता के समक्ष इस तरह का अर्धनग्न प्रदर्शन नहीं करतीं।

इस विज्ञापन का एक और घोर आपत्तिजनक पहलू अभिनेत्री द्वारा अपने भाई से पहले अपने पालतू कुत्ते को राखी बांधना है। यह सीधे तौर पर भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और बहन की दृष्टि में भाई की हैसियत का भद्दा मजाक उड़ाना है।

लेकिन यदि फिल्म या ad बनाने वाले अगर ऐसे समाज से हों जहां न कोई भाई होता है , न कोई बहन, तो क्या अपेक्षा करें. कहीं भी, कभी भी, किसी से कुछ भी करने की चाहत रखने वाले, भाई बहिन के पवित्र रिश्ते को नहीं समझ सकते. उनके लिए रक्षा बंधन उपभोक्ता वाद की एक तारीख होती है और उनकी कोई मां, बहिन, बेटी नहीं होती, सब केवल औरते ही होती हैं. लेकिन अपनी को तिरपाल में ढकने वाला अगर ad में भी किसी हिन्दू महिला को लगभग नग्नावस्था में दिखाता हो, तो वह व्यक्ति निम्नस्तरीय मानसिकता का तो होगा ही, उसके इरादे बेहद खतरनाक होंगे और सभी हिन्दुओं को इस षड्यंत्र से सावधान होने की आवश्यकता है.

गिवा विवाद को केवल कपड़े छोटे थे या बड़े या भाई से पहले कुत्ते को राखी क्यों बांधी, की बहस तक सीमित कर देना शायद इस पूरे प्रकरण की गंभीरता को कम आंकना होगा। विज्ञापन का उद्देश्य उपभोक्ता के मन में किसी भावना को उत्पाद से जोड़ना होता है। यदि रक्षाबंधन को चुना गया है, तो स्वाभाविक रूप से दर्शक उस विज्ञापन में भाई-बहन के संबंध और भारतीय पारिवारिक-सांस्कृतिक वातावरण की अपेक्षा करेगा। भारी विरोध और हिंदू संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद गिवा ने भारतीय संस्कृति और परंपराओं का सम्मान करने का खोखला हवाला देते हुए इस विज्ञापन को वापस ले लिया, लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या कंपनी के संचालकों में इतनी बुद्धि और विवेक भी नहीं है कि वे भारतीय संस्कृति और त्योहारों की संवेदनशीलता का ध्यान रख सकें।

भारत में त्योहार केवल बाजार के लिए उत्पादों की बिक्री का अवसर नहीं हैं। वे हमारी प्राचीन सभ्यता और सनातन संस्कृति के जीवंत प्रमाण हैं। इन उत्सवों के पीछे छिपा हुआ मनोविज्ञान केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और पारिवारिक शुचिता तथा पारस्परिक प्रेम के अनुष्ठान होते हैं। रक्षाबंधन भाई-बहन के पवित्र प्रेम और विश्वास का पर्व है, दीपावली प्रकाश और आध्यात्मिक चेतना का, नवरात्रि शक्ति-उपासना का और होली सामाजिक उल्लास का महान प्रतीक है। इन सब के पीछे गहरे वैज्ञानिक और सामाजिक कारण छिपे हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था के उत्प्रेरक भी रहे हैं।

आजकल भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार का उपयोग केवल उत्पादों की बिक्री के लिए ही नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसके बहाने प्राचीन सनातन संस्कृति और हिंदुत्व को गहरी चोट पहुंचाने का सुनियोजित षड्यंत्र भी रचा जा रहा है। गिवा, तनिष्क, पेटा जैसे अनगिनत संस्थान नाना प्रकार से भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति पर सीधा प्रहार कर रहे हैं। यह सब अचानक शुरू नहीं हुआ है, बल्कि इसका एक लंबा इतिहास है।

असीम प्रेमजी की कंपनी गिवा का विवादित कृत्य

कई बहुराष्ट्रीय तथा घरेलू कंपनियां हिंदू विरोधी कार्य के लिए बड़ी मात्रा में फंडिंग करती हैं और इसमें दिखावे के लिए हिंदू नामों और चेहरों को ही माध्यम बनाया जाता है। त्योहारों के अवसर पर ब्रांड और उत्पादन की बिक्री बढ़ाने के लिए लुभावने विज्ञापन बनाना अनुचित नहीं कहा जा सकता, लेकिन अगर इसे त्योहारों की सांस्कृतिक संवेदनशीलता को समझे बिना इस ढंग से बनाया जाए कि उससे न केवल त्योहार की गरिमा को ठेस लगे बल्कि हिंदुत्व और सनातन संस्कृति का भी अपमान हो, तो यह एक प्रकार का अपराध है।

विवादों का पुराना इतिहास और बहुराष्ट्रीय षड्यंत्र

यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में एक ऐसा पैटर्न उभरा है, जहां हिंदू त्योहारों के समय कॉर्पोरेट ब्रांड्स अपने विज्ञापनों के जरिए तथाकथित सामाजिक सुधार का संदेश देने का ढोंग रचते हैं। आलोचकों का स्पष्ट तर्क है कि जब भी हिंदू त्योहार आते हैं, ब्रांड्स अचानक पर्यावरण, पितृसत्ता या धर्मनिरपेक्षता पर ज्ञान देने लगते हैं। त्योहार की पारंपरिक वेशभूषा, जैसे माथे पर बिंदी न होना, से लेकर रस्मों के अर्थ बदलने तक, विज्ञापनों के जरिए हिंदू संस्कृति को पिछड़ा या सुधार की आवश्यकता वाला दिखाने की कोशिश की जाती है।

यदि हम पिछले कुछ वर्षों के विज्ञापनों पर नजर डालें तो तनिष्क का वर्ष दो हजार बीस का एकत्वम अभियान आज भी चर्चित उदाहरणों में से एक है जिसमें एक हिन्दू महिला को उसके मुस्लिम ससुराल में गोद भराई की रस्म में दिखाया गया था। तनिष्क का घोषित उद्देश्य यदि अलग-अलग समुदायों के बीच एकता का संदेश देना था, तो किसी मुस्लिम लड़की की शादी हिन्दू घर में भी दिखाई जा सकती थी। तनिष्क का विरोध और बहिष्कार हुआ और उसे विज्ञापन वापस लेना पड़ा, लेकिन तब तक कंपनी की काफी व्यावसायिक क्षति हो चुकी थी।

इसी तरह फैबइंडिया ने दीवाली के अपने संग्रह को जश्न-ए-रिवाज़ का उर्दू नाम दिया और मॉडल्स को बिना बिंदी के दिखाया। जो दीवाली के अब्राहमीकरण का सीधा प्रयास है । मान्यवर के विज्ञापन में आलिया भट्ट ने हिंदू विवाह की सबसे पवित्र रस्म कन्यादान पर सवाल उठाते हुए उसे कन्यामान में बदलने की वकालत की, जिसे हिंदू विवाह पद्धतियों के अपमान होता है। सर्फ एक्सेल ने होली के रंगों को नमाज पढ़ने जा रहे एक बच्चे से जोड़कर दिखाया, जिसे अनावश्यक धार्मिक तुष्टिकरण करार दिया गया।

यह केवल विज्ञापन और संस्कृति का टकराव नहीं है। इस तरह के विज्ञापन या फिल्में बनाना लंबे विचार-विमर्श के बाद तय किया जाता है। यदि किसी कंपनी को जानबूझकर सनातन संस्कृति और हिंदुत्व पर चोट करनी हो, तो विज्ञापन को ज्यादा से ज्यादा घातक बनाने की कोशिश की जाती है। यह वामपंथी इस्लामी गठजोड़ और डीप स्टेट द्वारा किया गया एक सुनियोजित हमला है। हिंदुओं के कई त्योहारों पर ऐसा हुआ है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी अन्य धर्म के त्योहार जैसे ईद या क्रिसमस पर भी इस तरह का ज्ञान देने वाला विज्ञापन बनाया जा सकता है।

परोपकार की आड़ में वैचारिक फंडिंग

विज्ञापनों से परे, यह बहस कॉर्पोरेट फंडिंग तक भी जाती है। विप्रो के संस्थापक अजीम प्रेमजी को यद्यपि भारत के सबसे बड़े दानवीरों में गिना जाता है और प्रायः यह बताया जाता है कि उन्होंने शिक्षा और सामाजिक कार्यों के लिए अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा दान किया है। लेकिन उनके फिलैंथ्रोपिक इनिशिएटिव्स और अन्य ट्रस्टों द्वारा की जाने वाली फंडिंग पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि वे अपने दीन की सेवा के लिए जाने जाते हैं और उनके पैसों का उपयोग हिंदुत्व के विरोध में किया जाता है।

आरोप है कि उनके ट्रस्ट का पैसा उन गैर-सरकारी संगठनों, थिंक-टैंक और द वायर जैसे स्वतंत्र मीडिया पोर्टल्स को जाता है, जिनका संपादकीय रुख हमेशा हिंदुत्व विरोधी या हिंदू राष्ट्रवाद का मुखर आलोचक होता है। दीन-हीनों की सेवा के नाम पर दिया गया यह पैसा ऐसी संस्थाओं तक पहुँचता है, जो अदालतों से लेकर सड़कों तक, ऐसे मुद्दे उठाती हैं जो अंततः हिंदू परंपराओं, त्योहारों और राष्ट्रीय सुरक्षा के नैरेटिव के खिलाफ जाते हैं। इस फंडिंग का उद्देश्य केवल सामाजिक कल्याण नहीं है, बल्कि एक विशिष्ट प्रकार की राजनीतिक और वैचारिक जमीन तैयार करना है, जो सनातन धर्म और हिंदुत्व की जड़ों को खोखला करती है।

निष्कर्ष और समाधान

तनिष्क की घटना से जिन्हें सीखना था उन्होंने निश्चित रूप से सीखा होगा, लेकिन जिन्हें जानबूझकर हिंदुत्व और हिंदुओं के त्योहारों को अभद्र रूप से पेश कर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सनातन चेतना को चोट पहुंचानी है, वे आज भी सुनियोजित षड्यंत्र रचते चले आ रहे हैं। सोशल मीडिया के आज के युग में और हिंदुओं की चेतना के पुनर्जागरण के काल में, यह काम अब आसान नहीं रह गया है।

सनातन संस्कृति के विरुद्ध षड्यंत्र रचने वालों को यह बात याद रखनी चाहिए कि भारत केवल एक उपभोक्ता बाजार नहीं है। यहाँ धर्म और संस्कृति करोड़ों लोगों की व्यक्तिगत आस्था और पारिवारिक पहचान से जुड़े हैं। इसलिए कोई विज्ञापन निर्माता यदि हिन्दू विवाह, पूजा, रक्षाबंधन, दीपावली या अन्य धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करता है, तो उसे यह समझना चाहिए कि सनातन धर्म को अन्य धर्मों की अपेक्षा कमतर दिखाकर धर्मांतरण और इस्लामीकरण की योजनाओं को अंजाम देना अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

सभी हिंदुओं को एकजुट होकर इसका विरोध करना चाहिए। यदि भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमला किया जाता है, तो उसका भरपूर जवाब देना आवश्यक है। ऐसे उत्पादों और ऐसी कंपनियों का पूर्ण बहिष्कार करना चाहिए और उनके खिलाफ वैचारिक संघर्ष के लिए सभी को तैयार रहना चाहिए। इसके साथ ही, सरकार पर भी इस बात का भारी दबाव बनाया जाना चाहिए कि ऐसे सख्त कानून बनाए जाएं जिससे भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति पर हो रहे ये हमले बंद हो सकें।

सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञापनों के सार्वजनिक प्रदर्शन से पहले उन पर सख्त नियमन हो। जिस तरह फिल्मों के प्रदर्शन से पहले फिल्म सेंसर बोर्ड उनकी समीक्षा करता है, ठीक उसी तरह विज्ञापनों के लिए भी एक कठोर विज्ञापन नियामक बोर्ड की स्थापना होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाए जा रहे हिंदू विरोधी सामग्री की भी गहन समीक्षा और उस पर सख्त नियंत्रण होना चाहिए ताकि कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में बहुसंख्यक समाज की आस्था के साथ खिलवाड़ करने की इस कुत्सित परंपरा का अंत हो सके।

~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~

रविवार, 23 अगस्त 2026

वन्देमातरम पर संग्राम: राष्ट्रगीत का ऐतिहासिक सफर, नया कानून और तुष्टीकरण की राजनीति


 

वन्देमातरम पर संग्राम: राष्ट्रगीत का ऐतिहासिक सफर, नया कानून और तुष्टीकरण की राजनीति

जुलाई २०२६ के मानसून सत्र में मोदी सरकार द्वारा एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, २०२६ पारित किया गया। इस नए कानून के माध्यम से राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान पूर्ण वैधानिक दर्जा और सुरक्षा प्रदान कर दी गई है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह नया कानून पूरे देश में लागू हो चुका है। देश जब अपने अस्सीवें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पूर्ण 'वंदे मातरम्' गीत गाए जाने के गौरव से अभिभूत अनुभव कर रहा था, तभी दुर्भाग्यवश इसका अपमान भी शुरू हो गया। और यह विवाद किसी और ने नहीं, बल्कि देश की सबसे पुरानी पार्टी, कांग्रेस द्वारा खड़ा किया गया। यह विडंबना ही है कि जिस गीत ने कभी पूरे देश को आजादी के लिए एक सूत्र में पिरोया था, आज उसी गीत को राजनीतिक तुष्टीकरण की भेंट चढ़ाया जा रहा है।

नया कानून: राष्ट्रगीत को मिला सर्वोच्च सम्मान और कड़े दंड का प्रावधान -

नए वैधानिक संशोधनों के अनुसार अब राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' को भी राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान की तरह पूरी तरह कानूनी संरक्षण मिल गया है। इस कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम् के गायन को रोकता है या उसके गायन अथवा प्रस्तुति के दौरान सभा में बाधा उत्पन्न करता है, तो इसे एक गंभीर दंडनीय अपराध माना जाएगा। इसके लिए अधिकतम तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया है। गृह मंत्रालय के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, सरकारी कार्यक्रमों और आधिकारिक अवसरों के लिए 'वंदे मातरम्' के पूरे छह छंदों वाले पूर्ण प्रारूप को गाने का समय लगभग तीन मिनट दस सेकंड निर्धारित किया गया है। अब आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगान से पहले राष्ट्रीय गीत को स्थान दिया गया है और इसके आधिकारिक गायन या वादन के दौरान 'सावधान' की मुद्रा में खड़े रहने का प्रोटोकॉल अनिवार्य कर दिया गया है।

पंद्रह अगस्त का विवाद और कांग्रेस का अड़ियल रुख -

विवाद की शुरुआत पंद्रह अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान हुई। 'वंदे मातरम्' के गायन के दौरान एक वीडियो सामने आया जिसमें सोनिया गांधी ने स्टाफ से दो छंद पूरे होने के बाद गीत को रोकने के लिए कहा। इस दौरान मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी के बीच हुई बातचीत सार्वजनिक हो गई और यहीं से एक बड़े विवाद ने जन्म ले लिया। शुरुआत में कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने इसे छुपाने का प्रयास किया और बहाना बनाया कि यह बातचीत मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी मंगाने के संदर्भ में थी। लेकिन जब विवाद बढ़ा, तो कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने सामने आकर स्पष्ट किया कि कांग्रेस शुरू के दो छंद गाने की अपनी पुरानी नीति पर ही कायम रहेगी और पूरा राष्ट्रगीत नहीं गाएगी। अपने इस कदम को सही ठहराने के लिए कांग्रेस ने अपने लगभग नौ दशक पुराने प्रस्ताव का हवाला दिया।

वन्दे मातरम् का जन्म और स्वतंत्रता संग्राम का प्रयाण-गीत -

अठारह सौ सत्तर के दशक में ब्रिटिश शासकों ने सरकारी समारोहों में 'गॉड सेव द क्वीन' गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था। अंग्रेजों के इस तानाशाही आदेश से बंकिमचन्द्र चटर्जी, जो उन दिनों एक सरकारी अधिकारी थे, को बहुत ठेस पहुँची। इसके विकल्प के तौर पर उन्होंने अठारह सौ पचहत्तर में संस्कृत और बाँग्ला भाषा के मिश्रण से एक नये गीत की रचना की, जिसका शीर्षक था - 'वन्दे मातरम्'

अठारह सौ बयासी में जब उन्होंने 'आनन्द मठ' नामक उपन्यास लिखा, तब मातृभूमि के प्रेम से ओतप्रोत इस गीत को उसमें शामिल कर लिया। यह उपन्यास अंग्रेजी शासन, जमींदारों के शोषण और अकाल से मर रही जनता को जागृत करने हेतु संन्यासी विद्रोह पर आधारित था। उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम का एक संन्यासी विद्रोही गाता है।

अठारह सौ छियानवे में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अधिवेशन में इस गीत का पूर्ण संस्करण गाया गया, जिसके प्रथम स्टेज परफॉर्मर और कम्पोजर स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर थे। उन्नीस सौ पांच में जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया, तो इस गीत ने चमत्कार कर दिया। सात अगस्त उन्नीस सौ पांच को बंग-भंग का विरोध करने जुटी भीड़ के बीच अचानक यह समवेत स्वर गूंज उठा और पूरा आसमान 'वंदे मातरम' के घोष से भर गया। रातों-रात यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रयाण-गीत बन गया।

मदनलाल ढींगरा, खुदीराम बोस, सूर्यसेन, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खान जैसे अनगिनत क्रांतिकारियों ने 'वंदे मातरम' कहते हुए फांसी के फंदे को चूमा। भगत सिंह अपने पिता को लिखे पत्रों में इसी गीत से अभिवादन करते थे। सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज ने इस गीत को अंगीकार किया था।

विरोध के स्वर: मुस्लिम लीग और अलगाववादी राजनीति-

जैसे-जैसे स्वतंत्रता संग्राम आगे बढ़ा, विभाजनकारी ताकतों ने इस महान गीत पर निशाना साधना शुरू कर दिया। इस गीत को एकीकृत करने वाले स्वर के रूप में देखने से सबसे पहले इंकार उन्नीस सौ तेईस में काकीनाड कांग्रेस अधिवेशन में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अहमद अली ने किया। उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के पुरोधा पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर को वन्दे मातरम्‌ गाने के बीच में ही टोक दिया था। लेकिन पं. पलुस्कर ने उस समय गीत का अपमान नहीं होने दिया और वे पूरा गाना गाकर ही रुके।

उन्नीस सौ तीस के दशक में मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने मजहब आधारित राजनीति के तहत इसके खिलाफ एक मजबूत अभियान चलाया। उनका तर्क था कि इसमें भारत माता को देवी दुर्गा के रूप में चित्रित किया गया है, जो इस्लाम की मान्यताओं के अनुकूल नहीं है। मुस्लिम लीग ने इसे मूर्तिपूजक और मुस्लिम विरोधी बताया।

यहां यह ध्यान देना आवश्यक है कि दुनिया के कई देशों के राष्ट्रगीतों या राष्ट्रगानों में उनकी संस्कृति और मान्यताओं का समावेश होता है। ब्रिटेन के राष्ट्रगान में रानी को भगवान द्वारा बचाने की प्रार्थना है, लीबिया का राष्ट्रगीत 'अल्लाहो अकबर' की पुकार लगाता है, और सीरिया के राष्ट्रगीत में 'अरबवाद' की चर्चा है। इन देशों में कभी इन गीतों को सांप्रदायिक चश्मे से नहीं देखा गया, लेकिन भारत में मुस्लिम लीग ने इसे हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा बना दिया।

तुष्टीकरण का आरंभ: उन्नीस सौ सैंतीस का वैचारिक आत्मसमर्पण -

मुस्लिम लीग की आपत्तियों और दबावों के आगे तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने झुकना शुरू कर दिया। उन्नीस सौ सैंतीस में जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद और सुभाष चंद्र बोस की समिति ने (रवींद्र नाथ टैगोर के मार्गदर्शन में) यह निर्णय लिया कि इस गीत के केवल शुरुआती दो पद ही गाए जाएंगे। उनका तर्क था कि बाद के पदों में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र है, जिससे मुसलमानों को आपत्ति हो सकती है।

नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को एक पत्र लिखा था, जिसमें कहा गया था कि 'आनंदमठ' की पृष्ठभूमि मुसलमानों को परेशान कर सकती है। कांग्रेस ने सांप्रदायिक सद्भाव के नाम पर मुस्लिम लीग के सामने वैचारिक घुटने टेक दिए।

निष्कर्ष: वैचारिक प्रतीकों की महत्ता और राजनीतिक दलों के लिए संदेश-

'वंदे मातरम्' पर उठा यह वर्तमान विवाद केवल एक गीत को गाने या न गाने का साधारण प्रश्न नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की उस वैचारिक यात्रा का प्रतिबिंब है जो उन्नीस सौ पांच के स्वदेशी आंदोलन से शुरू होकर आज तक पहुँची है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिस 'वंदे मातरम्' के पूर्ण गान ने उन्नीस सौ पांच में विभाजित बंगाल को वापस जोड़ दिया था और अंग्रेजों को अपना फैसला बदलने पर मजबूर कर दिया था, उसी गीत को उन्नीस सौ सैंतीस में सांप्रदायिक दबावों के चलते खंडित कर दिया गया।

गीत का यह बँटवारा भले ही देश के विभाजन का प्रत्यक्ष कारण न रहा हो, लेकिन यह उस वैचारिक कमजोरी, मुस्लिम तुष्टीकरण और समझौतावादी मानसिकता का सबसे बड़ा प्रतीक अवश्य था, जिसने अलगाववादियों के हौसले बढ़ाए और अंततः देश के विभाजन को संभव बनाया। यदि इस गीत रूपी मंत्र के टुकड़े न हुए होते, तो शायद देश के टुकड़े होने की नौबत भी नहीं आती।

सरकार के लिए यह आवश्यक है कि नए कानून के माध्यम से 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रगान के समान वैधानिक दर्जा देना केवल एक कानूनी कदम बनकर न रह जाए।

दूसरी ओर, देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिए यह विवाद एक गंभीर चेतावनी है।   उन्नीस सौ सैंतीस में जिस 'मुस्लिम तुष्टीकरण' की नीति के तहत गीत के टुकड़े करने का समझौता किया गया था, उसी तुष्टीकरण की राजनीति को पार्टी आज भी अपनी ढाल बनाए हुए है। राष्ट्र के प्रतीकों से दूरी बनाने का सीधा अर्थ राष्ट्र की मूल चेतना और उसकी आत्मा से कटना है। यदि कांग्रेस पार्टी एक वर्ग विशेष को खुश करने के लिए 'वंदे मातरम्' जैसे अपने ही गौरवशाली ऐतिहासिक प्रतीकों का अपमान या बहिष्कार जारी रखती है, और अपने तुष्टीकरण की चरित्रहीनता से बाज नहीं आती, तो आने वाले समय में उसकी बची-खुची प्रासंगिकता भी समाप्त हो जाएगी और  राजनीतिक भविष्य भी।  ~~~~~शिव मिश्रा ~~~~


 

शुक्रवार, 14 अगस्त 2026

मुमकिन से मुश्किल तक: मोदी ही मोदी

 


मुमकिन से मुश्किल तक: मोदी ही मोदी

 

इस वर्ष का मानसून सत्र समाप्त जरूर हो गया, लेकिन देश के राजनीतिक भविष्य और संसदीय लोकतंत्र पर कई ऐसे अनुत्तरित प्रश्न छोड़ गया, जो आने वाले लंबे समय तक गूंजते रहेंगे। यह सत्र कांग्रेस सहित समूचे विपक्ष के लिए अपने आचरण के कारण शर्मनाक रहा, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए रणनीतिक असफलता से भरा रहा, और देश की उस आम जनता के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण रहा जो अपने कर के पैसों से संसद की कार्यवाही का खर्च उठाती है। "मोदी है तो मुमकिन है" के अजेय मिथक को तोड़ते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार देश के राष्ट्रवादी जनमानस को बुरी तरह निराश किया है। ऐसा प्रतीत हुआ मानो एक दशक से चला आ रहा सत्ता का वह इकबाल कहीं खो गया है। देश के गृहमंत्री अमित शाह की बहुचर्चित 'चाणक्य नीति' भी इस पूरे सत्र में दूर-दूर तक नजर नहीं आई। पूरे सत्र के दौरान कदम-कदम पर यह गहराई से महसूस किया गया कि देश की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी और स्वयं प्रधानमंत्री बहुत असहाय, दिशाहीन और भारी दबाव में हैं। विडंबना यह है कि यह सब तब हुआ, जब उनके सभी सहयोगी दल हर संकट में चट्टान की तरह उनके साथ खड़े रहे। ऐसे में सरकार का यह रक्षात्मक रवैया किसी की भी समझ से परे है।

 

संसदीय लोकतंत्र का अवमूल्यन और निराशाजनक आंकड़े

लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर कहलाने वाली संसद केवल ईंट और पत्थर की इमारत नहीं है, बल्कि यह सवा सौ करोड़ देशवासियों की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब है। पच्चीस दिनों वाले इस मानसून सत्र में राज्यसभा और लोकसभा, प्रत्येक में राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर बहस और विधायी कार्यों के लिए अलग-अलग एक सौ चौदह घंटे का समय निर्धारित किया गया था। इसके सापेक्ष लोकसभा केवल साढ़े सत्रह घंटे ही चल सकी, जो कि कुल निर्धारित समय का मात्र पंद्रह प्रतिशत है। वहीं उच्च सदन यानी राज्यसभा लगभग साढ़े सैंतीस घंटे (तैंतीस प्रतिशत) ही चल सकी।

 

ये आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि विपक्ष के लगातार हंगामे, नारेबाजी और सदन के स्थगन के कारण यह मानसून सत्र पिछले एक दशक के सबसे कम उत्पादक सत्रों में से एक बन कर रह गया।  संभवतः यह मोदी सरकार के पूरे कार्यकाल का न्यूनतम उत्पादकता और सबसे खराब गुणवत्ता वाला सत्र था। करदाताओं की गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये केवल तख्तियां लहराने और शोर मचाने में स्वाहा हो गए।

 

दोनों सदनों से कुल बारह विधेयक पारित किए गए। इनमें 'लोक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक', 'खान और खनिज संशोधन विधेयक', और 'केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक' जैसे कई दूरगामी प्रभाव वाले महत्वपूर्ण बिल शामिल थे। संसदीय कार्यप्रणाली के नजरिए से स्थिति इतनी दयनीय थी कि पास हुए बारह में से नौ बिलों पर सदन में कोई सार्थक चर्चा ही नहीं हुई। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवादहीनता इस कदर हावी थी कि कई बिल महज तीन से पांच मिनट के भीतर भयंकर शोर-शराबे के बीच ध्वनि मत से पास कर दिए गए। सरकार से सवाल पूछने का सबसे अहम समय यानी प्रश्नकाल लगभग पूरी तरह ठप रहा।

 

संसद को सुचारू रूप से चलाने, गतिरोध तोड़ने और कामकाज को आगे बढ़ाने का मुख्य दायित्व हमेशा सरकार और सत्ता पक्ष का ही होता है। विपक्ष का काम कड़े प्रश्न करना और सरकार को कटघरे में खड़ा करना है, लेकिन आज विपक्ष का जो विघटित और नकारात्मक स्वरूप बन चुका है, उसका एकमात्र उद्देश्य सदन को ठप करके सस्ता राजनीतिक और चुनावी लाभ उठाना है। ऐसे में सरकार को विपक्ष को विश्वास में लेकर, या दबाव बनाकर, और जरूरत पड़े तो कठोर कदम उठाकर कानून बनाने से नहीं बचना चाहिए था। इतिहास गवाह है कि आपातकाल के दौरान जब समूचा विपक्ष जेल की सलाखों के पीछे था, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने संविधान तक में बड़े संशोधन कर दिए थे। हंगामा करने वाले और अध्यक्ष के आसन का अपमान करने वाले उद्दंड सांसदों को पूरे सत्र के लिए निलंबित या निष्कासित करना सरकार का सबसे बड़ा संवैधानिक हथियार है। लेकिन सत्ता में होने के बावजूद असहाय दिख रही सरकार ने अपने इस वैध अधिकार का उपयोग ही नहीं किया। यह सरकार की वैचारिक कमजोरी को दर्शाता है।

 

नीट विवाद और राजनीतिक दलों का कुत्सित दोहरा मापदंड

मानसून सत्र से ठीक पहले, नीट परीक्षा प्रश्नपत्र लीक मामले को लेकर देश की राजधानी के जंतर-मंतर पर हुए अराजक आंदोलन के समय से ही सरकार भारी मनोवैज्ञानिक दबाव में आ गई थी। सत्र का सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह रहा कि देश के लाखों छात्रों के भविष्य से जुड़े इस नीट मुद्दे पर सरकार पूरे समय घुटनों पर नजर आई। शिक्षा मंत्रालय का बचाव बेहद कमजोर था। इस मामले में उन राजनीतिक दलों ने भी सरकार के विरुद्ध जमकर मगरमच्छ के आंसू बहाए और हाथ साफ किए, जिनके अपने राज्यों में सत्ता में रहते हुए शिक्षा व्यवस्था का पूरी तरह से व्यवसायीकरण कर दिया गया था और 'ठेके पर नकल' एक संगठित उद्योग बन चुका था।

 

अतीत के पन्ने पलटें तो याद आता है कि कैसे परीक्षा केंद्रों के अंदर कक्ष निरीक्षकों की मिलीभगत से श्यामपट्ट पर उत्तर लिखकर सामूहिक नकल कराई जाती थी। सड़कों के किनारे पान की दुकानों पर हल किए गए प्रश्नपत्र खुलेआम बिकते थे और शिक्षा व नकल माफियाओं का समानांतर साम्राज्य कायम था। उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में पूर्व की कुछ विशेष सरकारों ने तो भ्रष्टाचार के ऐसे कीर्तिमान स्थापित किए थे, जहां राज्य स्तरीय बोर्ड परीक्षाओं में शीर्ष स्थान पाने वाले फर्जी परीक्षार्थी अपने मूल विषयों की सही वर्तनी तक नहीं लिख पाते थे। राज्य की सिविल सेवा परीक्षाओं तक में भारी धांधली होती थी और एक विशेष जाति व समुदाय के लोगों को चुन-चुन कर सरकारी पदों पर बैठाया जाता था। पश्चिम बंगाल के कुख्यात शिक्षक भर्ती घोटाले की जांच आज भी उच्च न्यायालय की कड़ी देखरेख में चल रही है, जिसमें भ्रष्ट नेताओं के घरों से भारी मात्रा में करोड़ों की नकदी के पहाड़ बरामद हो चुके हैं। आज यही लोग  शुचिता और ईमानदारी का प्रवचन दे रहे हैं।

 

आज क्षेत्रीय क्षत्रप और कई विपक्षी दल नीट परीक्षा के विकेंद्रीकरण की मांग कर रहे हैं। उनका कुतर्क है कि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए राज्यों को अपने चिकित्सा महाविद्यालयों में प्रवेश के लिए बारहवीं कक्षा के अंकों या अपनी स्वयं की राज्य-स्तरीय परीक्षा को आधार बनाने की पूरी छूट मिलनी चाहिए। इस बेतुकी मांग में वह दल भी सबसे मुखर होकर शामिल है, जिसके मुखिया की सुपुत्री ने अपने पिता के शासनकाल में न केवल राज्य की संयुक्त प्रवेश परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया था, बल्कि बाद में चिकित्सा स्नातक की परीक्षा में भी रहस्यमयी तरीके से शीर्ष स्थान पर रही थी। यह विपक्ष के दोहरे चरित्र का सबसे ज्वलंत प्रमाण है।

 

विदेशी अंशदान विधेयक, बाहरी दबाव और सरकार का आत्मसमर्पण

मोदी सरकार ने अपने सबसे प्रतिबद्ध समर्थकों को सबसे अधिक निराश 'विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम' के प्रस्तावित कड़े संशोधन विधेयक पर किया। यह विधेयक आज के समय में भारत की आंतरिक सुरक्षा, संप्रभुता और अस्तित्व के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसे संसद से पारित कराने का सरकार ने बड़े धूम-धड़ाके से ऐलान किया था, जिससे राष्ट्रवादियों में एक बड़ी उम्मीद जगी थी। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत में वर्तमान में तीस लाख से भी अधिक पंजीकृत गैर-सरकारी संगठन कार्यरत हैं। इनमें से कई संगठनों को प्रतिवर्ष औसतन बीस हजार करोड़ रुपये की भारी-भरकम विदेशी धनराशि प्राप्त होती है।

 

यह तथ्य अब किसी से छिपा नहीं है कि समाज सेवा, शिक्षा और स्वास्थ्य के महान कार्यों की आड़ में इनमें से कई संस्थाएं देश के सुदूर आदिवासी और पिछड़े इलाकों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के कार्य में लगी हैं। इनका अंतिम उद्देश्य भारत की सदियों पुरानी जनसांख्यिकी को बदलकर देश के भीतर नए इस्लामी और ईसाई प्रभाव वाले स्वायत्त क्षेत्र बनाना है। पूर्व की सरकारों ने इस विदेशी अंशदान कानून में जानबूझकर ऐसी कानूनी खामियां छोड़ रखी थीं, जिनकी आड़ में बिना किसी कड़ी निगरानी के मनचाहा विदेशी धन देश में आता था।

 

धर्मांतरण के अलावा, इसी बेहिसाब विदेशी धन का उपयोग लोकतंत्र की रक्षा, पर्यावरण संरक्षण और मानवाधिकारों के नाम पर भारत की बड़ी विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए किया जाता रहा है। गुजरात का सरदार सरोवर बांध हो, उत्तराखंड की टिहरी जलविद्युत परियोजना हो, या फिर ओडिशा, बिहार और झारखंड की अनेक अत्यंत महत्वपूर्ण खनिज व खनन परियोजनाएंइन सभी को विदेशी धन से पोषित संगठनों ने वर्षों तक न्यायालयों और आंदोलनों में उलझाए रखा। इसके पीछे एक गहरी अंतरराष्ट्रीय आर्थिक साजिश है, ताकि भारत अपनी संपदा का उपयोग न कर सके और देश कोयला, तांबा तथा इस्पात जैसी बुनियादी विकास की वस्तुओं के लिए हमेशा विदेशी ताकतों के आयात पर निर्भर रहे। यहां तक कि देश में मुख्यधारा के मीडिया के एक बड़े वर्ग और सोशल मीडिया पर विमर्श तय करने वाले राय-निर्माताओं का वित्तपोषण भी इसी विदेशी धन से होता है, ताकि वे अपने ही देश की चुनी हुई सरकार के विरुद्ध खड़े होकर अपने विदेशी दानदाताओं के भू-राजनीतिक हितों का संवर्धन कर सकें।

 

इस प्रस्तावित कठोर संशोधन विधेयक से भारत में सक्रिय ईसाई संगठनों और कथित समाजसेवी संस्थाओं के साथ-साथ अमेरिका और कुछ यूरोपीय देश भी बेहद चिंतित थे, जो इस विदेशी धन के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय स्रोत हैं। इसलिए, सरकार इस अहम विधेयक को संसद से पारित न कर पाए, इसके लिए देश के भीतर और बाहर एक बहुत बड़े षड्यंत्र को बाकायदा योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया। केवल बहत्तर घंटे के अंदर तैयार हुई एक कथित 'कॉकरोच जनता पार्टी' के माध्यम से राजधानी के जंतर-मंतर पर अचानक एक विशाल और अराजक प्रदर्शन खड़ा कर दिया गया। इस सुनियोजित प्रदर्शन का पूरा वित्तपोषण भी इसी विदेशी अंशदान कानून की वर्तमान खामियों का लाभ उठाकर किया गया। विदेशी धन के माध्यम से महंगे भोजन की सीधी आपूर्ति की व्यवस्था की गई। जंतर-मंतर की सड़कों पर ऐसे अनजान लोगों ने लजीज और महंगे व्यंजनों के स्टॉल लगाए, जिनके अपने घर में शायद दो वक्त की सूखी रोटी का भी जुगाड़ नहीं है। यह भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी धन के सीधे हस्तक्षेप का नग्न प्रदर्शन था।

 

क्या अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक दबाव में झुक गई मोदी सरकार?

पिछले बारह वर्षों से पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में बैठी मोदी सरकार ने देश हित के इस अत्यंत महत्वपूर्ण विधेयक को लाने में पहले ही बहुत देर कर दी थी। लेकिन मानसून सत्र के दौरान परदे के पीछे घटी कूटनीतिक घटनाओं के तार यदि आपस में जोड़े जाएं, तो एक बहुत गहरी और खतरनाक अंतरराष्ट्रीय साजिश साफ नजर आती है। सत्र से ठीक पहले और उस दौरान अमेरिकी नेताओं व राजनयिकों की रहस्यमयी भारत यात्रा, उनका सीधे राजधानी आने के बजाय पहले कोलकाता जाकर मिशनरी ऑफ चैरिटी के वरिष्ठ अधिकारियों से लंबी गुप्त मुलाकात करना, वहां से दिल्ली लौटने के बाद भारतीय विदेश मंत्री से मिलने से पूर्व सीधे प्रधानमंत्री से मुलाकात करनायह सब सामान्य कूटनीति नहीं थी।

 

इसी दौरान, संसद के वर्तमान मानसून सत्र के बीच ही अमेरिकी उपराष्ट्रपति  जेडी वेंस का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अचानक टेलीफोन करना, अमेरिकी दूतावास के उच्च अधिकारियों का भारत के कैथोलिक चर्च के प्रतिनिधियों से लगातार संपर्क साधना, और विपक्ष शासित राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों से अकारण शिष्टाचार भेंट करनायह सब एक बहुत बड़ी और संगठित दबाव की रणनीति का हिस्सा था।

 

अंततः राष्ट्रवादियों को सबसे बड़ी हताशा तब हुई जब मजबूत छवि वाली सरकार ने इन अदृश्य विदेशी दबावों के आगे घुटने टेक दिए। यदि सरकार को यह विधेयक अंततः ठंडे बस्ते में डालते हुए संसदीय समिति में ही भेजना था, तो शुरुआत में इतने राजनीतिक घमासान की क्या आवश्यकता थी? यह विदेशी वित्तपोषण को रोकने का विषय पूरी तरह से भारत का एक संप्रभु और आंतरिक मामला था, फिर किसी विदेशी महाशक्ति के दबाव में आकर कदम पीछे खींचने का क्या औचित्य रह जाता है?

 

राम मंदिर का पावन मुद्दा और उत्तर प्रदेश की आत्मघाती राजनीति

संसद सत्र के दौरान राजनीतिक पतन की एक और पराकाष्ठा देखने को मिली। विपक्ष ने अयोध्या में करोड़ों हिंदुओं की आस्था के प्रतीक भगवान राम के भव्य मंदिर में चढ़ावा चोरी के निराधार मामले को राजनीतिक रंग देने के उद्देश्य से बेहद घटिया स्तर की ड्रामेबाजी की। सदन के भीतर पवित्र भगवा वस्त्र धारी साधु का भेष बनाकर एक विपक्षी सांसद को भगवान राम का चित्र हाथ में लेकर बार-बार उसे अपमानजनक तरीके से जमीन पर रखते और उठाते देखा गया। जीवन भर राम के ऐतिहासिक अस्तित्व को नकारने वाली और न्यायालय में हलफनामा देने वाली कांग्रेस पार्टी ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया।

 

वहीं, दूसरी ओर खुद को उत्तर प्रदेश में नए सिरे से स्थापित करने और पिछड़ों के साथ-साथ अगड़ों को जोड़ने का दावा करने वाली समाजवादी पार्टी ने इस मामले में जो विध्वंसक भूमिका अदा की है, उसकी भारी राजनीतिक कीमत उसे आगामी सत्ताईस के विधानसभा चुनाव में निश्चित रूप से चुकानी पड़ेगी। समाजवादी पार्टी के सांसदों की इस ओछी और धर्म-विरोधी हरकतों से आस्थावान हिंदुओं के मन में भारी पीड़ा हुई है। पिछले लोकसभा चुनाव में जो सामान्य और सवर्ण वर्ग टिकट बंटवारे या स्थानीय मुद्दों को लेकर भाजपा से नाराज होकर घर बैठ गया था, वह समाजवादी पार्टी की इन हिंदू-विरोधी हरकतों के कारण आगामी विधानसभा चुनाव में उससे छिटक कर पूरी तरह दूर हो सकता है।

 

यह स्पष्ट होता जा रहा है कि राहुल गांधी की संगत का जो विषैला असर अखिलेश यादव की राजनीति पर हो रहा है, वह जल्द ही समाजवादी पार्टी को भी कांग्रेस की तरह हाशिए पर लाकर खड़ा कर देगा। राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक प्रयोगों से बिहार में तेजस्वी यादव को जिस रसातल में पहुंचा दिया है, ठीक वही हाल उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव का करने की उनकी पुख्ता और छिपी हुई योजना प्रतीत होती है। धरातल की सच्चाई यही है कि उत्तर प्रदेश में अब भाजपा को यदि कोई हरा सकता है तो वह केवल भाजपा के अपने भीतर का असंतोष ही है, समाजवादी पार्टी तो अब इस दौड़ में कहीं भी नहीं ठहरती।

 

अपनों की घोर नाराजगी और भविष्य की अंतिम चेतावनी

आज की सबसे बड़ी राजनीतिक सच्चाई यह है कि मोदी सरकार विपक्ष के हमलों से ज्यादा अपने स्वयं के समर्थकों, जमीनी कार्यकर्ताओं और प्रतिबद्ध वैचारिक मतदाताओं को लगातार निराश कर रही है। नीट विवाद जब अपने चरम पर था और सड़कों पर छात्रों का आक्रोश उबल रहा था, तब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के नैतिक इस्तीफे की मांग जोर पकड़ रही थी। यदि उस समय त्वरित कार्रवाई करते हुए उनका इस्तीफा ले लिया जाता, तो यह जनता में जवाबदेही का एक सकारात्मक और सार्थक संदेश देता। लेकिन उस समय सरकार जिद पर अड़ी रही और अब, जब अराजक आंदोलन के दबाव में सरकार चारों ओर से घिर चुकी है, तब यदि उनका इस्तीफा लिया भी जाता है तो वह भाजपा के किसी भी शुभचिंतक को रास नहीं आएगा, बल्कि इसे सरकार की कमजोरी ही माना जाएगा।

 

संसद के इस पूरे मानसून सत्र में सरकार की 'असहाय मुद्रा', देश में विदेशी धन के खेल को रोकने वाले विदेशी अंशदान जैसे अहम राष्ट्रीय सुरक्षा के कानून को ठंडे बस्ते में डालते हुए संयुक्त संसदीय समिति के हवाले कर देना, और सड़क पर उपद्रव करने वाले तत्वों व विदेशी ताकतों के आगे बिना लड़े घुटने टेक देने से देश के राष्ट्रवादी जनमानस में भीतर ही भीतर भारी आक्रोश उत्पन्न हो चुका है। भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और उसके तथाकथित अजेय चुनावी महारथियों को अपनी इस रक्षात्मक और ढुलमुल कार्यशैली पर तत्काल सघन मंथन करने की आवश्यकता है। समय रहते यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए और वैचारिक स्पष्टता वापस नहीं लाई गई, तो इसी असहाय मुद्रा और अपनों की उपेक्षा के कारण वे किसी दिन अचानक देश की सत्ता भी हमेशा के लिए न गंवा बैठें। देर आए, पर अब दुरुस्त आना ही होगा, क्योंकि अब समय रेत की तरह मुट्ठी से फिसल रहा है।

 

~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~

देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था

भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ल...