शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

नवरात्र 2026: आस्था, शक्ति, और समकालीन समाज में परिवर्तन का महापर्व



 नवरात्र 2026: आस्था, शक्ति, और समकालीन समाज में परिवर्तन का महापर्व

                                                            ~ शिव प्रकाश मिश्रा 

 

शरद ऋतु की हल्की ठंडक और वातावरण में गूंजती शंख, ढोल और मंत्रों की ध्वनियां इस बात का उद्घोष हैं कि शक्ति की उपासना का महापर्व—शारदीय नवरात्र—एक बार फिर हमारे द्वार पर है। वर्ष 2026 का यह नवरात्र केवल कैलेंडर में दर्ज नौ दिनों का एक कर्मकांड मात्र नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे संक्रमण काल में शक्ति की आराधना है, जहां मनुष्य को भौतिक प्रगति के साथ-साथ आत्मिक शांति और सामाजिक समरसता की सर्वाधिक आवश्यकता है। ‘नवरात्र’ दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘नव’ (नौ या नया) और ‘रात्र’ (रात्रि)। रात्रि को विश्राम और कायाकल्प का प्रतीक माना जाता है। इसलिए नवरात्र शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा को नया जीवन देने का एक वैज्ञानिक और दैवीय अवसर है।

आज के इस विशेष लेख में हम नवरात्र के पौराणिक आख्यानों से लेकर आधुनिक अर्थव्यवस्था तक इसके व्यापक प्रभाव और उपयोगिता का विस्तृत मूल्यांकन करेंगे।

पौराणिक पृष्ठभूमि: अंधकार पर प्रकाश की शाश्वत विजय

नवरात्र की नींव इसके अत्यंत समृद्ध पौराणिक इतिहास पर टिकी है। मार्कण्डेय पुराण और देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के अनुसार, जब महिषासुर नामक असुर का अत्याचार पृथ्वी और स्वर्ग दोनों स्थानों पर असहनीय हो गया और ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित कोई भी देवता उसे पराजित नहीं कर सका, तब सभी देवताओं ने अपने तेज़ को एक बिंदु पर केंद्रित किया। उस दिव्य तेज़ से माता दुर्गा (महिषासुरमर्दिनी) का प्राकट्य हुआ। देवी और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक भयंकर युद्ध चला और दसवें दिन देवी ने असुर का वध कर दिया। यह कथा केवल एक युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि जब आसुरी प्रवृत्तियां (अहंकार, लालच, क्रोध) चरम पर होती हैं, तब सामूहिक चेतना और आंतरिक शक्ति (नारी शक्ति) ही उनका नाश कर सकती है।

एक अन्य प्रमुख पौराणिक मान्यता भगवान श्रीराम से जुड़ी है। लंका पर चढ़ाई करने और रावण जैसे महाज्ञानी परंतु अहंकारी राक्षस का वध करने से पूर्व, श्रीराम ने समुद्र तट पर नौ दिनों तक शक्ति की आराधना की थी। उन्होंने देवी का आह्वान कर विजय का आशीर्वाद प्राप्त किया, जिसके बाद दसवें दिन (विजयादशमी) रावण का वध हुआ। ये आख्यान हमें सिखाते हैं कि सत्य की स्थापना और बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए शक्ति का संचय और एकाग्रता अनिवार्य है।

धार्मिक स्वरूप: नौ दिनों की नौ शक्तियां और नवदुर्गा

धार्मिक दृष्टि से नवरात्र हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और अनुशासित व्रतों में से एक है। इन नौ दिनों में आदिशक्ति के नौ अलग-अलग स्वरूपों—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—की पूजा की जाती है।

हर स्वरूप मानव जीवन की एक विशेष अवस्था और गुण का प्रतीक है। उदाहरण के लिए, माता ब्रह्मचारिणी तप और त्याग की प्रतीक हैं, तो माता चंद्रघंटा वीरता और साहस की। माता कालरात्रि भयंकर से भयंकर संकटों का नाश करने वाली हैं, जबकि महागौरी और सिद्धिदात्री शांति, पवित्रता और पूर्णता का आशीर्वाद देती हैं।

घटस्थापना (कलश स्थापना) से शुरू होने वाला यह पर्व कन्या पूजन के साथ संपन्न होता है। छोटी कन्याओं को साक्षात देवी मानकर उनके चरण पखारना और उन्हें भोजन कराना केवल एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह धर्म के माध्यम से बालिकाओं को समाज में सर्वोच्च सम्मान देने की एक सुंदर प्रथा है। घर, परिवार तथा समाज के व्यापक हित में महिलाओं की शक्ति केंद्र के रूप सर्वोच्चता स्थापित करना है।  

आध्यात्मिक दर्शन: आत्म-मंथन और ऊर्जा का उर्ध्वगमन

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से नवरात्र बाहरी कर्मकांडों से कहीं अधिक एक आंतरिक यात्रा है। योग और तंत्र शास्त्रों के अनुसार, मानव शरीर में सात प्रमुख चक्र - मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा तथा सहस्रार चक्र होते हैं। नवरात्र के नौ दिन कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करने और उसे मूलाधार चक्र (भौतिक इच्छाओं का केंद्र) से सहस्रार चक्र (परम चेतना का केंद्र) तक ले जाने का समय है। यह पर्व मानव के त्रिगुणों—तमस (आलस्य, अज्ञान), रजस (अति-सक्रियता, महत्वाकांक्षा) और सत्त्व (ज्ञान, पवित्रता, शांति)—के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया है। प्रथम तीन दिन तमस को नष्ट करने (महाकाली की आराधना), अगले तीन दिन रजस को सही दिशा देने (महालक्ष्मी की आराधना) और अंतिम तीन दिन सत्त्व गुण को प्राप्त करने (महासरस्वती की आराधना) के लिए होते हैं। व्रत और उपवास केवल भूखे रहना नहीं है, बल्कि यह 'उप' (समीप) और 'वास' (रहना)—अर्थात ईश्वर या अपनी मूल चेतना के समीप रहने की आध्यात्मिक विद्या है।

सामाजिक महत्त्व एवं मूल्यांकन: समरसता और नारी सशक्तिकरण

सामाजिक दृष्टि से नवरात्र भारत की विविधता में एकता का सबसे भव्य उदाहरण है। यह त्योहार उत्तर भारत में रामलीलाओं, गुजरात और महाराष्ट्र में गरबा और डांडिया, पश्चिम बंगाल में भव्य दुर्गा पूजा पंडालों, और दक्षिण भारत में बोम्मा कोलु (गुड़ियों की प्रदर्शनी) के रूप में मनाया जाता है।

नारी शक्ति का वास्तविक सम्मान:

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, जहां समाज एक ओर महिला सशक्तिकरण की बात करता है और दूसरी ओर महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से जूझ रहा है, नवरात्र एक बहुत बड़ा सामाजिक संदेश देता है। जो समाज नौ दिनों तक स्त्री को 'शक्ति', 'बुद्धि' और 'धन' की अधिष्ठात्री मानकर पूजता है, उस समाज में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान सर्वोच्च होना चाहिए। नवरात्र का सामाजिक मूल्यांकन इस बात की मांग करता है कि हम पंडालों की देवी के साथ-साथ घरों और समाज में विचरती जीवित देवियों (महिलाओं) के प्रति भी अपना दृष्टिकोण बदलें।

वर्ग-भेद का मिटना:

दुर्गा पूजा के पंडाल या गरबा के मैदान एक महान 'सोशल इक्वलाइज़र' (सामाजिक समानता लाने वाले) के रूप में कार्य करते हैं। पंडालों में प्रसाद ग्रहण करते समय या गरबा की ताल पर घूमते समय अमीर-गरीब, ऊंच-नीच या जाति-पाति का भेद मिट जाता है। समाज का हर वर्ग एक ही सामूहिक चेतना का हिस्सा बन जाता है, लेकिन सुनिश्चित करें कि इसका दुरुपयोग लव जिहाद जैसे कुकृत्यों के लिए न होने पाए।   

आर्थिक मूल्यांकन: 'त्योहारी अर्थव्यवस्था' का महायज्ञ

नवरात्र केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि 2026 के भारत में यह एक विशाल आर्थिक इंजन बन चुका है। नवरात्र से शुरू होने वाला त्योहारी काल, जो दिवाली तक चलता है, भारतीय अर्थव्यवस्था में खपत का सबसे बड़ा दौर होता है। सनातन धर्म के अधिकांश पर्व अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। प्राचीन भारत में इसी अर्थव्यवस्था के कारण भारत का सकल घरेलू, विश्व अर्थव्यवस्था के एक तिहाई से भी अधिक था।       इसे मंदिर आधारित अर्थव्यवस्था या सनातन अर्थव्यवस्था कहना अनुचित नहीं होगा।    इसलिए यह समय अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।   

 

1. असंगठित क्षेत्र और कारीगरों को रोज़गार:

महीनों पहले से मूर्तिकारों, सजावट करने वालों, लाइट और साउंड वालों के लिए यह सबसे बड़ा रोज़गार सृजन का समय होता है। बांस, मिट्टी, कपड़े और पेंट के स्थानीय व्यापारियों से लेकर पंडाल बनाने वाले मज़दूरों तक, लाखों परिवारों की आजीविका नवरात्र पर निर्भर करती है।

2. परिधान, आभूषण और खुदरा बाज़ार:

गरबा और डांडिया नाइट्स ने एक पूरी 'पारंपरिक परिधान और आभूषण इंडस्ट्री' खड़ी कर दी है। इसके साथ ही, घर के सामान कपड़े, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और रियल एस्टेट सेक्टर में लोग नवरात्र के शुभ दिनों में खरीदारी करना पसंद करते हैं, जिससे बाज़ार में तरलता  बढ़ती है।

3.  तीर्थ पर्यटन, धार्मिक कार्यक्रम और अनुष्ठान :

वैष्णो देवी, विंध्याचल, कामाख्या और भारत के 51 शक्तिपीठों पर नवरात्र के दौरान पर्यटन अपने चरम पर होता है। इससे परिवहन, विमानन, होटल और आतिथ्य सत्कार  क्षेत्र में भारी राजस्व आता है।

4. कृषि और एफएमसीजी सेक्टर:

उपवास और फलाहार के कारण फल, दूध, कुट्टू, सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, और मखाने की मांग अचानक कई गुना बढ़ जाती है। इससे सीधे तौर पर किसानों और छोटे खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को आर्थिक लाभ पहुँचता है।

आर्थिक मूल्यांकन स्पष्ट करता है कि नवरात्र धन के विकेंद्रीकरण का एक उत्कृष्ट प्राकृतिक मॉडल है, जहाँ समाज के उच्च वर्ग का धन खरीददारी और चंदे के माध्यम से समाज के निचले और मेहनतकश वर्ग तक प्रवाहित होता है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उपयोगिता :

वर्ष 2026 के इस तेज़, तकनीक-चालित और तनावग्रस्त युग में नवरात्र की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है।

मानसिक स्वास्थ्य और डिजिटल डिटॉक्स: आज की जीवनशैली में अवसाद (डिप्रेशन) और तनाव आम हो गए हैं। नवरात्र के नौ दिन भक्ति, संगीत और ध्यान के माध्यम से मन को शांत करने का प्राकृतिक 'एंटी-डिप्रेसेंट' हैं। यह डिजिटल दुनिया के शोर से कटकर अपनी जड़ों और अंतरात्मा से जुड़ने का समय है।

शारीरिक स्वास्थ्य और आयुर्वेद: ऋतु परिवर्तन (मानसून की समाप्ति और सर्दियों की शुरुआत) के समय शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) कम होती है। आयुर्वेद के अनुसार, इस समय सात्विक भोजन और उपवास शरीर को डिटॉक्स करने और पाचन तंत्र को आराम देने का सबसे वैज्ञानिक तरीका है, जिसे आज आधुनिक विज्ञान भी 'इंटरमिटेंट फास्टिंग' के रूप में मान्यता दे रहा है।

पर्यावरण के प्रति जागरूकता: 

वर्ष 2026 का शारदीय नवरात्र हमें इस बात का स्मरण कराता है कि भारतीय संस्कृति में त्योहार केवल अतीत को याद करने का माध्यम  नहीं हैं, बल्कि वे हमारे वर्तमान को सुधारने और भविष्य को दिशा देने के जीवंत माध्यम हैं। पौराणिक रूप से यह सत्य की विजय का उद्घोष है, धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से यह चेतना के परिष्कार का मार्ग है, सामाजिक रूप से यह नारी सम्मान और समरसता का संकल्प है, और आर्थिक रूप से यह देश के विकास चक्र को गति देने वाला एक शक्तिशाली इंजन है।

आवश्यकता इस बात की है कि हम नवरात्र की इस विराट और बहुआयामी ऊर्जा को केवल नौ दिनों के उत्सव तक सीमित न रखें। जब हम देवी की आराधना से प्राप्त हुए अनुशासन, पवित्रता, महिला सम्मान और कर्मठता को अपने दैनिक जीवन के आचरण में स्थायी रूप से उतार लेंगे, तभी नवरात्र का वास्तविक और समग्र उद्देश्य सिद्ध होगा।

सत्य और शक्ति की इस अनवरत यात्रा में, यह नवरात्र हम सभी के लिए मंगलकारी हो।

~~~~~~~~~~~~  शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~

 

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

धरती से आसमान तक नफरत का साया: दुबई-इजराइल उड़ान की घटना


 
धरती से आसमान तक नफरत का साया: दुबई-इजराइल उड़ान की घटना और सभ्यतागत चुनौतियां
                                                          — शिव प्रकाश मिश्रा

 

आसमान को मानव सभ्यता ने सदा से भौगोलिक सीमाओं और संकीर्ण दीवारों से परे एक ऐसी दुनिया के रूप में देखा है, जहाँ देशों के बीच की दूरियां सिमट जाती हैं। जब सैकड़ों टन वजनी कोई विमान बादलों को चीरता हुआ उड़ान भरता है, तो उसमें सवार विभिन्न राष्ट्रीयताओं, संस्कृतियों, धर्मों और भाषाओं के लोग एक साझी पहचान में बंध जाते हैं— ‘सहयात्री’ होने की पहचान। उनकी एक ही सामूहिक अपेक्षा होती है: अपनी मंजिल तक सुरक्षित पहुँचना।  

 

परंतु ३० सितंबर २०२६ को दुबई से तेल अवीव जा रही ‘फ्लाईदुबई’ की उड़ान एफजेड-१०७३ के चालक-कक्ष (कॉकपिट) में जो कुछ घटा, उसने न केवल वैश्विक विमानन सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ को हिला दिया, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि धार्मिक उन्माद और वैचारिक विषवल्ली अब धरती की संकीर्ण गलियों से निकलकर ३३ हज़ार फीट ऊँचे खुले आसमान में भी मानव सभ्यता का पीछा कर रही है।

 

रोंगटे खड़े कर देने वाले पल: हवा में मौत से मुकाबला
विमान में १७४ से अधिक यात्री सवार थे, जिनमें अधिकांश इजराइली नागरिक थे। जब विमान ३३ 
हज़ार फीट की ऊँचाई पर संतुलन बनाए हुए था, तभी चालक-कक्ष के भीतर एक भयावह षड्यंत्र का पर्दाफाश हुआ। ओमान मूल के सह-चालक ने अचानक मुख्य कप्तान—भारतीय नागरिक स्मित मच्छार—पर धारदार चाकू से प्राणघातक हमला बोल दिया।

 

हमलावर सह-चालक का मंसूबा अत्यंत स्पष्ट था—ग्यारह सितंबर (नाइन-इलेवन) की तर्ज पर मुख्य विमानचालक को मारकर विमान का नियंत्रण अपने हाथ में लेना और उसे सामूहिक कब्रगाह में तब्दील कर देना। चालक-कक्ष के भीतर शुरू हुए इस खूनी संघर्ष के कारण अनियंत्रित हुआ विमान मात्र २९ सेकंड के भीतर लगभग १४,००० फीट नीचे आ गिरा। शून्य वायुदाब, तेजी से घटती ऊँचाई और शरीर से बहते खून के बीच यदि नियंत्रण-कक्ष में कोई दुर्बल मनोबल वाला व्यक्ति होता, तो परिणाम सैकड़ों चिताओं के रूप में सामने आता।

 

परंतु लहूलुहान और असहनीय पीड़ा से जूझते हुए भी भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार ने अदम्य साहस, संयम और अद्वितीय जीवटता का परिचय दिया। उन्होंने हमलावर का डटकर मुकाबला किया और अत्यंत विषम परिस्थितियों में चालक-कक्ष का सुरक्षित द्वार खोलने में सफलता पाई। द्वार खुलते ही विमान परिचारक दल और यात्रा कर रहे अन्य प्रशिक्षित चालक तुरंत सहायता के लिए अंदर दौड़े। हमलावर को काबू कर लिया गया और अंततः विमान को सऊदी अरब के तबुक हवाई अड्डे पर आपातकालीन परिस्थितियों में सुरक्षित उतार लिया गया। कैप्टन मच्छार की सूझबूझ और अदम्य कर्तव्यनिष्ठा ने लगभग एक सौ अस्सी निर्दोष जिंदगियों को मौत के जबड़े से खींच निकाला।

 

अंदरूनी खतरा और कूटनीतिक सुरक्षा चूक
पारंपरिक विमानन सुरक्षा का संपूर्ण ढांचा अब तक बाहरी खतरों पर केंद्रित रहा है—यात्रियों की तलाशी, सामान की छायाचित्र (एक्स-रे) जांच, धातु संसूचक (मेटल डिटेक्टर) और यात्री दीर्घा में हथियारों के प्रवेश को रोकना। किंतु इस घटना ने सुरक्षा तंत्र के सामने एक नया और अधिक खतरनाक रूप प्रस्तुत किया है—‘इनसाइडर थ्रेट’ यानी तंत्र के भीतर बैठे भेदी का खतरा। जब वह व्यक्ति ही विध्वंसक बन जाए जिसके हाथों में विमान का संचालन और सैकड़ों यात्रियों के जीवन की बागडोर सौंपी गई हो, तो धरती के सारे सुरक्षा उपकरण निरर्थक सिद्ध हो जाते हैं।

 

यह घटना केवल एक आपराधिक कृत्य नहीं, अपितु अंतरराष्ट्रीय उड्डयन नियमों और कूटनीतिक कार्यप्रणाली की एक अक्षम्य विफलता भी है:

 

 - सुरक्षा मंजूरी (क्लीयरेंस) पर प्रश्न: स्थापित नियमों और द्विपक्षीय संवेदनशीलता के अनुसार, इजराइल जाने वाले संवेदनशील मार्गों पर उन देशों के चालक दल के सदस्यों की तैनाती वर्जित या अत्यधिक नियंत्रित होनी चाहिए जिनके इजराइल के साथ सामान्य राजनयिक संबंध नहीं हैं।


 

-  प्रशासनिक शिथिलता: ओमान और इजराइल के बीच संबंधों की स्थिति जगजाहिर है। ऐसे में एक ओमानी नागरिक को तेल अवीव जाने वाले विमान में सह-चालक के रूप में नियुक्त किया जाना यह दर्शाता है कि व्यावसायिक विमान सेवा कंपनियों में पृष्ठभूमि सत्यापन (वेटिंग) की प्रक्रिया कितनी ढीली और सतही हो चुकी है।


पश्चिम एशिया की भू-राजनीति और वैचारिक कट्टरपंथ की जड़ें

दुबई-तेल अवीव उड़ान का अस्तित्व २०२० के ऐतिहासिक ‘अब्राहम समझौते’ की देन है, जिसने इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात के मध्य कूटनीतिक, व्यापारिक और पर्यटन के नए द्वार खोले थे। परंतु यह उड़ान जिस भौगोलिक आकाश से गुजरती है, वह नीचे गाजा संघर्ष, हमास के आतंकी हमलों, ईरान-इजराइल तनाव और फिलिस्तीन के अनसुलझे प्रश्नों से सुलग रहा है।


प्रारंभिक जांच और इजराइली नेतृत्व के बयानों से यह स्पष्ट हुआ है कि हमलावर सह-चालक गहन कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा से ग्रसित था। जब कोई विचारधारा अपने अनुयायियों के मन में यह जहर घोल देती है कि दूसरे विचार, धर्म या नस्ल के लोगों का संहार करना कोई पुण्य-कार्य या पवित्र कर्तव्य है, तब मानवीय संवेदना और पेशेवर निष्ठा समाप्त हो जाती है।


सुलगता परिदृश्य और सभ्यताओं का संघर्ष

७ अक्टूबर २०२३ को हमास द्वारा इजराइल पर किए गए नृशंस आतंकी हमले, नरसंहार और बंधक संकट के बाद से संपूर्ण मध्य पूर्व निरंतर युद्ध की ज्वाला में झुलस रहा है। गाजा, लेबनान, यमन और ईरान से जुड़े संघर्षों ने वैचारिक और धार्मिक ध्रुवीकरण को चरम पर पहुँचा दिया है। सोशल मीडिया और भूमिगत नेटवर्क के माध्यम से चलाए जा रहे विमर्श में कई बार आतंकवाद और नागरिक हत्याओं को वैचारिक आवरण पहनाकर सही ठहराने का कुत्सित प्रयास किया जाता है।


जब कोई विचारधारा अपने अनुयायियों को यह पाठ पढ़ाने लगती है कि किसी विशेष धर्म, जाति या नस्ल के लोगों का जीवन मूल्यहीन है, तब मानव मस्तिष्क से करुणा का लोप हो जाता है। इतिहास साक्षी है कि इसी मतांधता और असहिष्णुता के चलते दुनिया की कई समृद्ध प्राचीन संस्कृतियों और स्वतंत्र चिंतन का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया। आज यहूदी समाज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, तो दूसरी ओर भारत जैसी प्राचीन बहुलवादी सभ्यता भी सीमा पार से प्रायोजित धार्मिक जिहाद, कट्टरपंथ और जनसांख्यिकीय बदलाव की चुनौतियों से जूझती रही है। कट्टरपंथी तत्वों की दृष्टि में सभ्य, लोकतांत्रिक और मानवीय समाज हमेशा निशाने पर रहते हैं।


वैश्विक सभ्यताओं पर संकट: यहूदी और सनातन परंपरा के साझा सबक

मानव इतिहास की प्राचीनतम जीवंत संस्कृतियों में यहूदी और हिंदू (सनातन) परंपराएं अग्रणी रही हैं। विडंबना यह है कि इतिहास के विभिन्न कालखंडों में ये दोनों ही सभ्यताएं एकतरफा वैचारिक असहिष्णुता, मजहबी विस्तारवाद और नरसंहारों की शिकार रही हैं।


जहाँ इजराइल अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए चौतरफा चुनौतियों के बीच अडिग खड़ा है, वहीं भारत ने भी सदियों से बाहरी आक्रांताओं, धर्मांतरण के षड्यंत्रों, विभाजन की विभीषिका और सीमा-पार से संचालित छद्म युद्धों (जैसे 'गजवा-ए-हिंद' की परिकल्पना) का दंश झेला है।


भारत की आंतरिक राजनीति में अक्सर तुष्टिकरण और वोट-बैंक की विवशताएं इस खतरे की गंभीरता को धुंधला कर देती हैं। पश्चिमी एशिया की इस घटना ने भारत के नीति-निर्माताओं और समाज को स्पष्ट चेतावनी दी है कि वैचारिक कट्टरपंथ किसी सीमा या पेशे का संकोच नहीं करता; यदि समय रहते इसकी पहचान न की जाए, तो यह समाज के ताने-बाने को भीतर से खोखला कर देता है।


भारतीय पेशेवरता, धैर्य और सर्वोच्च मानवीय मूल्य

इस पूरे घटनाक्रम में कैप्टन स्मित मच्छार की भूमिका भारत के लिए केवल क्षणिक राष्ट्रीय गौरव का विषय नहीं है, बल्कि यह विदेशों में कार्यरत लाखों भारतीय पेशेवरों की कार्यसंस्कृति, नैतिक निष्ठा और मानसिक सुदृढ़ता का एक स्वर्णिम प्रमाण है।


चाहे चिकित्सा का क्षेत्र हो, सूचना प्रौद्योगिकी हो या अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन—भारतीय प्रतिभाएं संकट के समय अपने धैर्य, पेशेवर प्रशिक्षण और मानवीय मूल्यों के लिए जानी जाती हैं। जब चालक-कक्ष में स्वयं की साँसें उखड़ रही थीं, तब भी कैप्टन मच्छार ने 'यात्री रक्षा' को अपने जीवन से ऊपर रखा। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजराइल के नेतृत्व द्वारा उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस भारतीय जीवन-दृष्टि का सम्मान है जो 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और 'परोपकाराय सतां विभूतयः' के आदर्शों पर पोषित होती है।


भारत के लिए बहुआयामी सबक: आंतरिक सतर्कता और विदेश नीति

भारत के लिए इस घटना के निहितार्थ गहरे और दूरगामी हैं:


- प्रवासियों की सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन: खाड़ी देशों में ९० लाख से अधिक भारतीय पेशेवर और कामगार कार्यरत हैं। पश्चिम एशिया की स्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए अपरिहार्य है। भारत के इजराइल के साथ रणनीतिक व तकनीकी संबंध हैं, तो अरब देशों के साथ ऐतिहासिक व आर्थिक साझेदारी। इस जटिल संतुलन के बीच विदेश में काम करने वाले भारतीयों की सुरक्षा और उनकी प्रतिष्ठा की रक्षा सर्वोपरि है।


- संवेदनशील बुनियादी ढाँचे में गहन निगरानी: भारत को अपने घरेलू नागरिक उड्डयन, परमाणु प्रतिष्ठानों, रेलवे और सामरिक नेटवर्क में 'आंतरिक घुसपैठ' के खतरे को हल्के में नहीं लेना चाहिए। केवल तकनीकी पृष्ठभूमि ही नहीं, बल्कि किसी भी तरह के कट्टरपंथी प्रभाव की समय-समय पर पहचान की व्यवस्था सुदृढ़ करनी होगी।


- तुष्टिकरण बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा: जब सुरक्षा और कानून के अनुपालन में किसी संप्रदाय या वर्ग के तुष्टिकरण की नीति अपनाई जाती है, तो राज्य की संप्रभुता और नागरिकों का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है। कानून का समान और कठोर अनुप्रयोग ही उग्रवाद की काट है।


भविष्य की सुरक्षा रणनीति - 

भारत को इस घटना को केवल विदेशी सरजमीं या पराये आकाश का वाकया मानकर भुला नहीं देना चाहिए। भारत स्वयं एक विशाल, विविध और संवेदनशील भू-भाग है। भारत के हित पश्चिम एशिया की स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और वहाँ रहने वाले करोड़ों प्रवासी भारतीयों से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं।


इस घटना से मिलने वाले रणनीतिक सबक स्पष्ट हैं:


सतत मनोवैज्ञानिक एवं सुरक्षा जांच: संवेदनशील पदों—जैसे विमान चालक, वायु यातायात नियंत्रक (एटीसी), परमाणु और रक्षा प्रतिष्ठानों के अभियंताओं की पृष्ठभूमि जांच केवल नियुक्ति के समय न हो, बल्कि उनकी कार्यप्रणाली और डिजिटल व्यवहार का समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए।

साइबर व वैचारिक कट्टरपंथ (रेडिकलाइजेशन) पर नियंत्रण: ऑनलाइन कट्टरपंथ की रोकथाम के लिए खुफिया तंत्र को तकनीकी रूप से और अधिक चुस्त बनाना होगा ताकि मस्तिष्कों में बोए जा रहे वैचारिक विष की समय रहते पहचान हो सके।

सभ्यतागत सतर्कता: किसी भी समुदाय के प्रति अंध-संदेह किए बिना, कानून का कठोर और समान अनुप्रयोग सुनिश्चित करना होगा ताकि धर्म या मजहब की आड़ में राष्ट्रविरोधी या विध्वंसक तत्वों को कोई राजनीतिक संरक्षण न मिल सके।


मानवता की रक्षा का संकल्प

आधुनिक रडार, उपग्रह दिशा-सूचक (जीपीएस) प्रणालियां और स्वतः चालन (ऑटो-पायलट) तकनीकें कितनी भी परिष्कृत क्यों न हो जाएं, अंततः किसी भी व्यवस्था की सुरक्षा उसके संचालक के मस्तिष्क और नीयत पर निर्भर करती है। यदि मन में नफरत का बारूद भरा हो, तो सबसे उन्नत तकनीक भी विनाश का अस्त्र बन जाती है।


दुबई-इजराइल उड़ान की इस घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर कर यह संदेश दिया है कि वैचारिक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल सीमाओं पर तोपों और बंदूकों से नहीं लड़ी जा सकती। इसके लिए विवेक, सतर्कता, कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल और कैप्टन स्मित मच्छार जैसे अदम्य मानवीय साहस की आवश्यकता है। कट्टरपंथ रूपी इस नासूर का समूल उन्मूलन किए बिना न तो हमारी धरती सुरक्षित रह सकती है और न ही वह खुला आसमान, जो समस्त मानवता को एक सूत्र में पिरोने का सपना देखता है।

                     ~~~~~~~~~~~~  शिव मिश्रा ~~~~

बुधवार, 23 सितंबर 2026

पितृ पक्ष 2026 - एक दृष्टि:

 पितृ पक्ष 2026 - एक दृष्टि:  

एक पीढ़ी का दूसरी पीढ़ी से संवाद 

- शिव मिश्रा

सनातन परंपरा में पितृ पक्ष पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने का एक अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण काल है। "श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्" अर्थात् जो पूर्ण श्रद्धा से दिया जाए, वही श्राद्ध है। भागती हुई इस दुनिया में पितृ पक्ष हमें कुछ दिनों के लिए ठहरकर उन लोगों को याद करने का अवसर देता है, जिनके त्याग और संघर्षों से हमारा वर्तमान निर्मित हुआ है। तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान की परंपराओं के पीछे केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि स्मृति, कृतज्ञता, परिवार और आने वाली पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी का गहरा मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक भाव भी छिपा है।

क्या है पितृ पक्ष?  

भारतीय पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक के सोलह दिनों के समय को पितृ पक्ष या महालय कहा जाता है। इन सोलह दिनों में चंद्रमा क्षीण होता है (कृष्ण पक्ष), और मान्यता है कि इस अवधि में पूर्वज सूक्ष्म रूप में पृथ्वी पर अपने परिजनों के पास आते हैं। पितृ पक्ष उन भूली-बिसरी कहानियों और पारिवारिक जड़ों को फिर से सींचने का भारतीय तरीका है।

वर्ष 2026 में प्रचलित उत्तर भारतीय पंचांग के अनुसार, पितृ पक्ष का मुख्य क्रम 27 सितंबर से 10 अक्टूबर तक रहेगा, जबकि 26 सितंबर को पूर्णिमा का श्राद्ध संपन्न होगा। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इस पावन पखवाड़े का समापन होगा।

क्यों मनाया जाता है?

सनातन दर्शन में मनुष्य पर जन्म के साथ ही तीन मुख्य ऋण माने गए हैं—देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। पितृ ऋण से उऋण होने के लिए ही श्राद्ध और तर्पण का विधान है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा पितृ लोक में निवास करती है। पितृ पक्ष के दौरान उन्हें मुक्त किया जाता है ताकि वे अपने वंशजों द्वारा श्रद्धापूर्वक अर्पित किए गए अन्न और जल को ग्रहण कर सकें। इस तर्पण से उन्हें तृप्ति मिलती है, और वे प्रसन्न होकर अपने परिवार को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

कैसे किया जाता है श्राद्ध कर्म?

श्राद्ध कर्म की प्रक्रिया अत्यंत सूक्ष्म और सात्विक होती है। इसके मुख्य अंग इस प्रकार हैं: 

तर्पण: कुशा, काले तिल और जल से पूर्वजों को तृप्त करना तर्पण कहलाता है।
पिंडदान: पके हुए चावल, जौ के आटे, गाय के दूध, घी, शहद और तिल को मिलाकर बनाए गए 'पिंड' पूर्वजों के निमित्त अर्पित किए जाते हैं।
पंचबलि: ब्राह्मणों को भोजन कराने से पूर्व श्राद्ध के अन्न में से पांच हिस्से निकाले जाते हैं—गाय के लिए (गो बलि), कुत्ते के लिए (श्वान बलि), कौवे के लिए (काक बलि), चींटियों के लिए (पिपीलिका बलि) और देवताओं के लिए (देवादि बलि)। यह प्रकृति के सभी जीवों के प्रति सह-अस्तित्व और कृतज्ञता का प्रतीक है।
ब्राह्मण भोज: योग्य और सात्विक ब्राह्मणों को आदरपूर्वक भोजन कराकर सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा व वस्त्र दान किए जाते हैं।
नियम और संयम: इन दिनों में तामसिक भोजन (मांस, मदिरा, लहसुन, प्याज आदि) का पूर्णतः त्याग किया जाता है। क्षौर कर्म (बाल और नाखून काटना) तथा कोई भी नया मांगलिक कार्य (जैसे विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश) इस दौरान वर्जित माना जाता है।

धार्मिक महत्व

गरुड़ पुराण, अग्नि पुराण और वायु पुराण जैसे धर्म ग्रंथों में पितृ पक्ष की महिमा का व्यापक वर्णन है। ग्रंथों के अनुसार, जो व्यक्ति विधि-विधान से श्राद्ध करता है, उसके पितृ तृप्त होकर उसे आयु, संतति, यश, स्वर्ग, कीर्ति, बल, सुख और धन-धान्य का आशीर्वाद देते हैं। पितरों के असंतुष्ट रहने पर परिवार को पितृ दोष का सामना करना पड़ सकता है, जिससे जीवन में कई प्रकार की अकारण बाधाएं उत्पन्न होती हैं।

इतिहास और पौराणिक कथा

पितृ पक्ष की उत्पत्ति के संदर्भ में महाभारत काल की एक अत्यंत प्रसिद्ध कथा प्रासंगिक है। दानवीर कर्ण ने अपने पूरे जीवन में स्वर्ण, आभूषण और अपार धन का दान किया था, परंतु उन्होंने कभी अपने पूर्वजों के निमित्त अन्न या जल का दान नहीं किया। महाभारत युद्ध में वीरगति प्राप्त करने के पश्चात जब कर्ण स्वर्ग पहुंचे, तो उन्हें क्षुधा शांत करने के लिए भोजन के रूप में स्वर्ण और आभूषण ही परोसे गए। जब कर्ण ने देवराज इंद्र से इसका कारण पूछा, तो इंद्र ने बताया कि उन्होंने आजीवन केवल भौतिक वस्तुओं का दान किया है, पितरों को अन्न का नहीं, जिसके कारण उनके पितृ अतृप्त हैं। अपनी इस भूल का प्रायश्चित करने के लिए कर्ण को सोलह दिनों के लिए पुनः पृथ्वी पर भेजा गया। इन सोलह दिनों में कर्ण ने विधि-विधान से पूर्वजों को अन्न और जल का दान किया। कालांतर में यही सोलह दिन पितृ पक्ष के रूप में विख्यात हुए। 

पितृ पक्ष को ‘अशुभ’ क्यों कहा जाता है?

यह एक आम धारणा बन गई है कि पितृ पक्ष अशुभ होता है और इसलिए इस दौरान विवाह या गृहप्रवेश जैसे मांगलिक आयोजन नहीं किए जाते। लेकिन इसका अधिक सटीक और दार्शनिक अर्थ यह है कि पितृ पक्ष उत्सव के बजाय स्मरण का समय है। भारतीय परंपरा में कालखंड का अपना विशिष्ट सांस्कृतिक स्वर रहा है—कुछ समय उत्सव के हैं, कुछ साधना के, कुछ ज्ञान के और कुछ केवल स्मरण के। पितृ पक्ष उसी अंतर्मुखी स्मरण का काल है। इसलिए इसे मात्र “अशुभ समय” कहकर लांछित करना इस महान परंपरा के अर्थ को अत्यंत सीमित कर देता है।

कौए के लिए भोजन क्यों?

श्राद्ध के दिनों में कौए को भोजन देने की परंपरा लगभग पूरे भारत में प्रचलित है। धार्मिक मान्यता में कौए को पितरों का प्रतीक या संदेशवाहक माना गया है। लेकिन इसके भीतर एक व्यापक पर्यावरणीय संकेत भी निहित है। भारतीय दर्शन ने मनुष्य के साथ-साथ पशु-पक्षियों और प्रकृति के प्रति दायित्व को भी धार्मिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा बनाया है। आज जब जैव-विविधता और पर्यावरण संरक्षण ज्वलंत प्रश्न बन चुके हैं, तो इन परंपराओं को प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी की दृष्टि से भी समझा जाना चाहिए।

गया से घर की देहरी तक

पितृकर्म की चर्चा में बिहार के गया तीर्थ का नाम विशेष रूप से आता है। विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी और गया-श्राद्ध की परंपरा ने इसे पिंडदान के प्रमुख केंद्रों में शीर्ष स्थान दिया है, जिसका संबंध गयासुर की पौराणिक कथा से भी है। लेकिन पितृ पक्ष का अर्थ केवल तीर्थयात्रा तक सीमित नहीं है। देश के करोड़ों परिवार अपने घरों की देहरी पर भी पितरों का स्मरण करते हैं। कहीं नदी के तट पर तर्पण होता है, कहीं घर के आंगन में श्राद्ध किया जाता है और कहीं जरूरतमंदों को भोजन कराया जाता है। स्थान और विधियां बदल सकती हैं, लेकिन स्मृति और श्रद्धा का मूल भाव अपरिवर्तित रहता है।

आधुनिक परिवार और भूला हुआ इतिहास

पितृ पक्ष आधुनिक समाज के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है। आज संयुक्त परिवारों की जगह एकाकी और छोटे परिवारों ने ले ली है। युवा पीढ़ी शिक्षा और आजीविका के लिए अपनी जड़ों से दूर दूसरे शहरों या विदेशों में बस रही है। एक ही परिवार के सदस्य कभी-कभी वर्षों तक साथ नहीं मिलते। नतीजा यह है कि परिवार का मौखिक इतिहास दिनों-दिन क्षीण हो रहा है।

इस वर्ष श्राद्ध के साथ एक अभिनव कार्य भी किया जा सकता है—परिवार का इतिहास लिपिबद्ध किया जाए। पुरानी तस्वीरें सहेजी जाएं। बुजुर्गों के पास बैठकर उनके अनुभव सुने जाएं। परिवार की वंशावली तैयार की जाए। पुरानी और प्रेरक कहानियों को दृश्य-श्रव्य माध्यमों में सहेजा जाए। यह भी अपने आप में एक सच्चा पितृ-स्मरण है।

श्रद्धा और तर्क का संतुलन

आधुनिक समय में प्रायः एक तार्किक प्रश्न उठता है—क्या वास्तव में श्राद्ध से पितरों को भोजन या जल मिलता है? यह विशुद्ध रूप से धार्मिक आस्था का विषय है। पितरों तक हमारा अर्पण किस सूक्ष्म रूप में पहुंचता है, इसे भौतिक विज्ञान की कसौटियों पर मापना न तो संभव है और न ही इसकी आवश्यकता है। मृत्यु के बाद प्रियजनों की स्मृति जीवित रहती है, परिवार एक साथ बैठता है, पुराने संबंधों को ऊर्जा मिलती है और दान-सेवा के माध्यम से समाज के वंचित वर्ग को सहायता प्राप्त होती है। इस दृष्टि से पितृ पक्ष एक सांस्कृतिक स्मृति-व्यवस्था है, जो मृत्यु को जीवन से पूर्णतः विच्छेदित करने के बजाय दोनों के मध्य एक अदृश्य संवाद स्थापित करती है।

दान : परंपरा का सामाजिक पक्ष

श्राद्ध कर्म में भोजन और दान का सदैव विशेष स्थान रहा है। परंपरागत रूप से इसमें ब्राह्मण भोज और दक्षिणा की व्यवस्था रही है। आज अनेक परिवार अपनी सामर्थ्य और देश-काल की आवश्यकता के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र, शिक्षा-सामग्री या अन्य आवश्यक वस्तुएं प्रदान करते हैं।

पितृ पक्ष का सबसे आधुनिक संदेश - यदि पूर्वजों के प्रति सच्ची कृतज्ञता है, तो उनके उच्च आदर्शों और श्रेष्ठ परंपराओं को आगे ले जाना हमारा परम कर्तव्य है। यदि उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में परिवार को एकजुट रखा, तो हमें भी वह जिम्मेदारी निभानी होगी। यदि उन्होंने शिक्षा का दीप जलाया, तो हमें अगली पीढ़ी को और बेहतर संस्कार देने होंगे। यदि उन्होंने प्रकृति को सहेजा, तो पर्यावरण संरक्षण हमारा भी धर्म है। यदि उन्होंने समाज में सहयोग का भाव रखा, तो हमें भी जरूरतमंद के लिए खड़ा होना होगा। यहीं आकर पितृ पक्ष केवल अतीत का पन्ना न रहकर भविष्य के निर्माण का मार्गदर्शक सिद्धांत बन जाता है।

स्मृति का यह ऋतुचक्र - पितृ पक्ष के तुरंत पश्चात शारदीय नवरात्र का शुभारंभ होता है। 2026 में सर्वपितृ अमावस्या के अगले ही दिन से शक्ति की आराधना आरंभ हो जाएगी। यह सांस्कृतिक क्रम अपने आप में अत्यंत गूढ़ और अर्थपूर्ण है। पहले अपने पूर्वजों का स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन; तत्पश्चात शक्ति की उपासना; और अंततः उत्सवों की लंबी श्रृंखला। मानो भारतीय जीवन-दर्शन हमें यह संदेश देता है कि जीवन में किसी भी उत्सव और उल्लास की नींव हमारी स्मृतियों और जड़ों पर ही टिकती है। हम विकास के पथ पर आगे अवश्य बढ़ें, परंतु अपने अतीत को विस्मृत करके नहीं।

अंततः पितृ पक्ष किसका पर्व है? पितृ पक्ष केवल मृतकों के शोक का पर्व नहीं है; यह जीवितों के आत्म-मंथन का भी पर्व है। यह हमें बोध कराता है कि हमारा जीवन केवल हमारी अपनी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों की एक लंबी और अनवरत यात्रा का प्रतिफल है। हमसे पहले भी लोग थे, जिन्होंने हमें भाषा दी, संस्कार दिए, सिर पर छांव दी और अपने संघर्षों से हमारे लिए प्रशस्त मार्ग बनाए। एक दिन हम भी किसी आने वाली पीढ़ी की स्मृति का हिस्सा मात्र रह जाएंगे। तब शायद यक्ष प्रश्न यह नहीं होगा कि हमने कितने बड़े-बड़े कर्मकांड किए थे, बल्कि यह होगा कि हमने अपने पीछे कैसी वैचारिक और सामाजिक विरासत छोड़ी है।

क्या हमने अपने बच्चों को उनकी जड़ों से जोड़ा? क्या हमने पारिवारिक स्मृतियों को सहेज कर रखा? क्या हमने समाज के लिए कोई योगदान दिया? क्या हमने आने वाली पीढ़ी के लिए इस संसार को थोड़ा और बेहतर बनाया?

इस अर्थ में पितृ पक्ष केवल तर्पण का कर्मकांड नहीं, बल्कि गहरे आत्मचिंतन का अवसर है। यह हमें वर्तमान की अंधी दौड़ से कुछ पलों के लिए बाहर निकालता है और कहता है— रुको। पीछे मुड़कर देखो। उन लोगों को कृतज्ञता से याद करो जिनसे तुम्हारा अस्तित्व है। और फिर आगे बढ़ो—इस दृढ़ संकल्प के साथ कि तुम्हारे बाद आने वालों को तुमसे कुछ ऐसा प्राप्त हो, जिसे वे भी इसी श्रद्धा के साथ याद कर सकें।

शायद यही पितृ पक्ष का सबसे प्रखर और शाश्वत संदेश है। पूर्वजों का सच्चा सम्मान केवल उन्हें वर्ष में एक बार याद करने में नहीं, बल्कि उनकी पवित्र स्मृति को एक अर्थपूर्ण भविष्य में रूपांतरित करने में है। 

~~~~~~~~~~~~~~~~~ शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~


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