शनिवार, 18 अप्रैल 2026

भगवान परशुराम - शस्त्र और शास्त्र का 'अक्षय' समन्वय | आज की परस्थितियों में भगवान परशुराम के आदर्शो की महत्ता

 


भगवान परशुराम जन्मोत्सव पर हार्दिक शुभकमनाएं !

भगवान परशुराम: शस्त्र और शास्त्र का 'अक्षय' समन्वय || आज की परस्थितियों में भगवान परशुराम के आदर्शो की महत्ता


भारतीय अध्यात्म और इतिहास के महासागर में जब हम किसी ऐसी विभूति की खोज करते हैं जो ज्ञान की अगाध गहराई और वीरता की अदम्य ऊँचाई को एक साथ समाहित किए हो, तो केवल एक ही नाम उभरता है— भगवान परशुराम। त्रेतायुग की देहरी से लेकर कलियुग के अंत तक, परशुराम जी एक ऐसी 'चिरंजीवी' सत्ता हैं जो काल के बंधन से मुक्त है। उन्हें अक्सर केवल एक क्रोधी और क्षत्रिय-हन्ता योद्धा के रूप में चित्रित किया गया है, लेकिन उनके व्यक्तित्व की गहराइयां सामाजिक क्रांति, नारी सम्मान और पर्यावरण संरक्षण की अद्भुत मिसाल हैं।

ब्रह्म-क्षत्र का वैज्ञानिक संगम: चरु का रहस्य

परशुराम जी का व्यक्तित्व उस प्राचीन भारतीय व्यवस्था का प्रमाण है जहाँ गुणों का हस्तांतरण केवल संयोग नहीं, बल्कि एक चेतनागत प्रक्रिया थी। उनकी वंशावली भृगु कुल के ब्राह्मणों से जुड़ी है, लेकिन उनके भीतर क्षत्रियोचित तेज का संचार उनकी माता सत्यवती के पक्ष से हुआ। पौराणिक 'चरु' (मंत्रपूत खीर) प्रसंग केवल एक कथा नहीं है, बल्कि यह एक सूक्ष्म संकेत है कि स्वभाव किसी भी कुल की सीमाओं को लांघ सकता है।

जब महर्षि भ्रगु ने अपनी पुत्रवधू सत्यवती और उसकी माता (राजा गाधि की पत्नी) के लिए दो अलग-अलग गुणों वाली खीर तैयार की, तो उन चरुओं का अदला-बदली होना यह सिद्ध करता है कि परशुराम जी के नाना राजा गाधि और उनके मामा महर्षि विश्वामित्र का राजसी और जुझारू तेज उनके रक्त में बीज रूप में विद्यमान था। उन्होंने ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी संसार को यह संदेश दिया कि जब धर्म (शास्त्र) पर संकट आए, तो उसे अपनी रक्षा के लिए शस्त्र उठाने में तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिए।

"अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनुः। इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि ॥"

(आगे चार वेद हों और पीछे प्रत्यंचा चढ़ा हुआ धनुष हो। यह ब्राह्मणत्व और क्षत्रित्व का वह संगम है जो शाप और बाण, दोनों से रक्षा करने में समर्थ है।)

जाति बंधन से मुक्त 'कर्म' का सिद्धांत

आज के समय में जब समाज जातिवाद की संकीर्ण बेड़ियों में जकड़ा हुआ है, परशुराम और विश्वामित्र के उदाहरण हमें 'वर्ण' की वास्तविक परिभाषा समझाते हैं। विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय थे लेकिन अपनी तपस्या से 'ब्रह्मर्षि' बने, वहीं परशुराम जन्म से ब्राह्मण थे लेकिन अपने दायित्वों से 'महापराक्रमी योद्धा'। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि प्राचीन भारत में वर्ण व्यवस्था जन्म-आधारित नहीं, बल्कि 'गुण और कर्म' आधारित थी। परशुराम जी ने यह सिद्ध किया कि वीरता किसी की विरासत नहीं है; वह संकल्प से अर्जित की जाती है।

“पितृ भक्ति” का अनुपम उदाहरण

भगवान परशुराम द्वारा अपनी माता का वध करने की कथा भारतीय पुराणों में 'पितृ-भक्ति' और 'अटूट आज्ञापालन' के सबसे कठिन उदाहरणों में से एक मानी जाती है। यह कहानी जितनी हृदयविदारक है, उसका अंत उतना ही कल्याणकारी है। यह कहानी केवल हिंसा की नहीं, बल्कि परशुराम के दृढ़ संकल्प और दूरदर्शिता की है। उन्होंने दिखाया कि पिता की आज्ञा उनके लिए सर्वोपरि है। लेकिन उन्हें विश्वास था कि यदि उनके पिता अपनी शक्ति से श्राप दे सकते हैं या मार सकते हैं, तो वे प्रसन्न होकर जीवनदान भी दे सकते हैं। और अपनी बुद्धिमत्ता से न केवल अपनी माता को बल्कि भाइयों को भी जीवित कर समर्पण और बुद्दिमत्ता सिद्ध कर दी ।

पृथ्वी को 21 बार क्षत्रिय विहीन करने का सच

कहा जाता है कि परशुराम ने एक बार नहीं, बल्कि 21 बार पृथ्वी पर अभियान चला कर क्षत्रियों का समूल नाश किया। लेकिन उन्होंने हर बार उन राजाओं का अंत किया जो अधर्मी थे और प्रजा पर अत्याचार करते थे, सभी राजा क्षत्रिय कहलाते थे। उन्होंने जीता हुआ सारा राज्य महर्षि कश्यप को दान कर दिया और स्वयं महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने चले गए। इस कथा का बहुत गहरा अर्थ है। अक्सर लोग इसे जातियों के बीच का संघर्ष मान लेते हैं, लेकिन शास्त्रों के अनुसार यह 'अत्याचारियों, जो मद में अंधे होकर धर्म की मर्यादा भूल चुके थे, के विरुद्ध एक युद्ध था। त्रेता युग में उन्होंने भगवान राम जो स्वयं एक क्षत्रिय थे, को अपना तपोबल और शक्ति सौंपकर अपनी यात्रा पूरी की। द्वापर युग में उन्होंने श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र भेंट किया था।

चिरंजीवी परशुराम

उनका प्राकट्य सतयुग में हुआ और वे आज भी जीवित हैं क्योंकि वे सात चिरंजीवियों में से एक हैं, जिसका उद्देश्य समय-समय पर धर्म की रक्षा के लिए मार्गदर्शन करना है।

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषण:। कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन:॥

कल्कि अवतार के 'गुरु' की भूमिका

पुराणों, विशेषकर कल्कि पुराण में उल्लेख है कि जब कलयुग के अंत में अधर्म अपनी चरम सीमा पर होगा, तब भगवान विष्णु 'कल्कि' के रूप में अवतार लेंगे। उस समय परशुराम जी एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। वे कल्कि को अस्त्र-शस्त्र चलाने की विद्या देंगे। और उनके गुरु के रूप में वे अधर्म के विनाश के लिए युद्ध कौशल सिखाएंगे।

इतिहास का प्रथम नारी-जागृति अभियान

भगवान परशुराम के व्यक्तित्व का सबसे कम चर्चित लेकिन सबसे क्रांतिकारी पक्ष उनका नारी गरिमा के प्रति अनन्य समर्पण है। उन्होंने केवल आततायी राजाओं का दमन नहीं किया, बल्कि एक ऐसी सामाजिक संरचना की नींव रखी जहाँ स्त्री का स्थान सर्वोच्च हो। हैहयवंशी राजाओं के विलासी और अनैतिक शासन के विरुद्ध उन्होंने 'एक-पत्नीव्रत' के सिद्धांत को पुरुषार्थ का अनिवार्य हिस्सा बनाया।

इस महान अभियान को धरातल पर उतारने के लिए उन्होंने उस समय की सबसे प्रबुद्ध महिलाओं को एक मंच पर लाया। महर्षि अत्रि की पत्नी माता अनसूया, अगस्त्य मुनि की पत्नी लोपामुद्रा और उनके प्रिय शिष्य अकृतवण इस विराट नारी-जागृति अभियान के मुख्य स्तंभ थे। अनसूया जी ने जहाँ महिलाओं को आध्यात्मिक और नैतिक स्वावलंबन की शिक्षा दी, वहीं लोपामुद्रा ने नारी के बौद्धिक और दार्शनिक स्वरूप को समाज के सामने रखा। परशुराम जी का स्पष्ट मत था कि जिस समाज में पुरुष अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर एकनिष्ठ नहीं होगा, वहां नारी को वह सम्मान कभी नहीं मिल सकता जिसकी वह नैसर्गिक अधिकारी है।

प्रकृति के मूक मित्रों के 'वैद्य' और 'मित्र'

एक हाथ में प्रलयंकारी 'परशु' धारण किए हुए परशुराम जी का चित्र देखकर कोई उनके भीतर की अपार करुणा का अंदाजा नहीं लगा पाता। लेकिन वे एक ऐसे महान प्रकृति प्रेमी और 'सिद्ध योगी' थे जो पशु-पक्षियों की भाषा समझने की क्षमता रखते थे। महेंद्र पर्वत के एकांत में उनका सान्निध्य पाकर हिंसक से हिंसक वन्य प्राणी भी अपनी हिंसा त्याग देते थे। उनके तप का ओज इतना था कि उनके आश्रम में बाघ और हिरण एक ही घाट पर पानी पीते थे। कामधेनु की रक्षा के लिए उनका ऐतिहासिक युद्ध केवल एक गौ-सेवा नहीं थी, बल्कि मूक प्राणियों के शोषण के विरुद्ध विश्व का पहला संगठित 'पशु-अधिकार' आंदोलन था।

मार्शल आर्ट्स के आदि गुरु: कलारीपयट्टू की विरासत

आज विश्व जिस मार्शल आर्ट्स (कुंग-फू, कराटे) पर गर्व करता है, उसका उद्गम भारत के केरल राज्य में है, जिसके आदि गुरु साक्षात भगवान परशुराम हैं। उन्होंने केरल की पवित्र भूमि का उद्धार किया और वहां धर्म की रक्षा हेतु ब्राह्मणों को शस्त्र शिक्षा देने के लिए १०८ कलारियों की स्थापना की। परशुराम जी द्वारा विकसित 'वदक्कन कलरी' (उत्तरी शैली) केवल एक युद्ध कला नहीं है, बल्कि इसमें आयुर्वेद, प्राणायाम और मर्म विद्या का अद्भुत संगम है। यही विद्या आगे चलकर बोधिधर्मन के माध्यम से चीन पहुँची और शाओलिन कुंग-फू के रूप में विकसित हुई।

साहितियक धरोहर और वर्तमान प्रासंगिकता

परशुराम जी की कलम उतनी ही शक्तिशाली थी जितना उनका फरसा। उनके द्वारा रचित "शिव पञ्चचत्वारिंशन्नाम स्तोत्र" महादेव के प्रति उनकी गहन भक्ति का प्रमाण है। इसके अतिरिक्त, 'परशुराम कल्पसूत्र' और 'त्रिपुरा रहस्य' जैसे ग्रंथ आज भी शक्ति साधना के गूढ़ रहस्यों को समझने के लिए आधार माने जाते हैं।

आज २०२६ के भारत में, जब हम भ्रष्टाचार, बढ़ते अपराध और नैतिक पतन जैसे 'सहस्रार्जुन' रूपी संकटों से जूझ रहे हैं, तब भगवान परशुराम के आदर्श एक 'प्रकाश-स्तंभ' की तरह हमारा मार्गदर्शन करते हैं। वे हमें सिखाते हैं कि अत्याचार को सहना, अत्याचार करने से भी बड़ा पाप है। ज्ञान (ब्राह्मणत्व) और शक्ति (क्षत्रियत्व) का संतुलन ही एक विकसित राष्ट्र की नींव हो सकता है।

महान वास्तुकार, नगर नियोजक और समाज निर्माता

उन्होंने समुद्र से भूमि निकालकर (कोंकण, गोवा, केरल) ‘परशुराम क्षेत्र’ बनाया, जो भूमि सुधार का प्राचीन उदाहरण माना जाता है। इस पर 64 ग्रामों की स्थापना की जिन्हें विशेषज्ञता के आधार पर विकसित किया गया, इनमें कई आज भी जीवित हैं। ये गाँव सुव्यवस्थित थे, जहाँ जल प्रबंधन, मंदिर, पंचायत और सामाजिक संरचना का संतुलित विकास किया गया। उन्होंने स्वशासन (ग्राम सभा) की व्यवस्था लागू की, जिससे गाँव आत्मनिर्भर बने। उनकी योजना में प्रकृति के साथ संतुलन प्रमुख था। परशुराम जी का यह मॉडल आज के “स्मार्ट सिटी” से पहले “स्मार्ट विलेज” और “क्लस्टर आधारित विकास” की एक उन्नत परिकल्पना था, जिसमें विकास और प्रकृति का संतुलन मुख्य आधार था।

भगवान परशुराम केवल अतीत की कोई पौराणिक कथा नहीं हैं, बल्कि वे हमारे 'भविष्य' के रक्षक भी हैं। इस जन्मोत्सव पर, हमें उनके 'क्रोध' की नहीं, बल्कि उनके 'बोध' की आवश्यकता है। हमें अपने भीतर उस परशुराम को जगाना होगा जो शास्त्र का ज्ञाता हो और शस्त्र का स्वामी, जो स्वभाव से शांत हो लेकिन अन्याय के विरुद्ध वज्र की तरह कठोर। हम यह संकल्प लें कि हम अपनी शक्ति का उपयोग दुबर्लों की रक्षा के लिए करेंगे और अपने ज्ञान को समाज के उत्थान के लिए समर्पित करेंगे। तभी हम अपने समाज और राष्ट्र को बचा सकेंगे ।

~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

ईरान-इजरायल / अमेरिका युद्ध के बीच भारत का 'भीतरी' संकट उजागर

 


ईरान-इजरायल / अमेरिका युद्ध के बीच भारत का 'भीतरी' संकट उजागर | अमेरिका का प्रशंसनीय कार्य भी विमर्श का शिकार | इजरायल के बाद भारत पर होगा ईरान का आक्रमण


ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच दो सप्ताह का युद्धविराम भले ही हो गया हो, लेकिन इसे शांति समझना आत्मघाती भूल होगी। यह केवल एक 'विराम' है, अल्प विराम, युद्ध का अंत नहीं। पूरी दुनिया राहत की सांस ले रही है, लेकिन भारत के लिए यह मंथन का समय है। विडंबना देखिए, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वैश्विक और आंतरिक दबाव झेल रहे थे, जब नाटो जैसे संगठन बिखर रहे थे, तब भारत सहित पूरे विश्व में एक अलग तरह का 'युद्ध' लड़ा जा रहा था—नैरेटिव का युद्ध।

यूरोप के कई देशों में बढ़ते सामाजिक ध्रुवीकरण का असर उनकी विदेश नीति पर भी पड़ा। फ्रांस, ब्रिटेन, इटली और स्पेन जैसे देशों द्वारा अमेरिकी सैन्य अभियानों में प्रत्यक्ष सहयोग से हिचकिचाहट ने नाटो जैसे संगठनों की एकजुटता पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए।

भारत के भीतर 'विदेशी' वफादारी का प्रदर्शन

मानसिक और सामरिक रूप से भारत आज इजरायल के साथ खड़ा है, लेकिन तुष्टिकरण की राजनीति हमें आज भी फिलिस्तीन के पक्ष में खड़े होने को मजबूर करती है। हद तो तब हो गई जब भारतीय मीडिया के एक धड़े ने ट्रंप को 'अस्थिर' बताकर उपहास उड़ाया और ईरान को ऐसे पेश किया जैसे उसने किसी 'सुपरपावर' को घुटने पर ला दिया हो।

जब पाकिस्तान की मध्यस्थता की खबरें आईं, तो भारत की विदेश नीति को 'विफल' बताने वालों की बाढ़ आ गई। असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं ने तो इसे प्रधानमंत्री मोदी की 'गलती' बता दिया। क्या यह विडंबना नहीं है कि जब देश का नेतृत्व वैश्विक संकट में कूटनीति कर रहा हो, तब देश के भीतर ही कुछ लोग विदेशी ताकतों के पक्ष में बैटिंग कर रहे हों?

लखनऊ से कश्मीर तक: वफादारी का 'ईरानी' टेस्ट

हाल ही में ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही का लखनऊ और कश्मीर दौरा कई सवाल खड़े करता है। प्रश्न यह है कि समर्थन सरकार से मांगा जाता है या किसी विशेष समुदाय के नागरिकों से? कश्मीर में ईरान के समर्थन में हुए प्रदर्शन हिंसक हो गए। क्या इसे 'राष्ट्रभक्ति' की श्रेणी में रखा जा सकता है? बिल्कुल नहीं। जब देश की घोषित विदेश नीति के विपरीत जाकर प्रदर्शन किए जाएं और देश विरोधी नारे लगें, तो वह स्पष्ट रूप से राष्ट्रद्रोह है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि भारतीय महिलाओं ने अपने गहने-जेवर तक ईरान की युद्ध सहायता के लिए दान कर दिए। समुदाय ने ईरान के लिए चंदा इकठ्ठा किया ताकि युद्ध के लिए धन की कमी न हो।

सोचने वाली बात है कि जिस धन का उपयोग भारत की प्रगति में होना चाहिए था, वह एक विदेशी युद्ध की आग सुलझाने के लिए भेजा जा रहा है। क्या इन लोगों की प्राथमिकता भारत है या उनकी धार्मिक पहचान?

यूरोप का 'इस्लामीकरण' और भारत को चेतावनी

आज जो सांप्रदायिक समस्या भारत झेल रहा है, वही आग अब यूरोप (फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्पेन) में भी लग चुकी है। अवैध घुसपैठियों ने इन देशों के जनसांख्यिकीय ढांचे को इतना बिगाड़ दिया है कि वहां की सरकारें अब नाटो का साथ देने से भी डर रही हैं। तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति ने नाटो जैसे सशक्त संगठन में दरार डाल दी है। यह भारत के लिए एक कड़ा सबक है—यदि समय रहते जनसांख्यिकीय असंतुलन और अवैध घुसपैठ को नहीं रोका गया, तो भारत की विदेश नीति भी 'भीतरी दबाव' की बंधक बन कर तुष्टिकरण की भेंट चढ़ जाएगी, जैसा कि पहले होता था।

नैरेटिव का खेल: जब 'मक्का' से ऊपर कट्टरपंथ हो गया

ईरान ने सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे मुस्लिम देशों पर मिसाइलें दागीं, लेकिन दुनिया भर का कट्टरपंथी तबका फिर भी ईरान के साथ खड़ा रहा। क्यों? क्योंकि इस्लामिक नैरेटिव का मूल मंत्र ही यही है—जो सबसे कट्टर होगा, समर्थन उसे ही मिलेगा। मस्जिदों की तकरीरों के माध्यम से पूरी दुनिया में यह नैरेटिव फैला दिया है कि वह इस्लाम का रक्षक है, इसलिए उस पर युद्ध थोपा गया है। और इसी नैरेटिव के जाल में फंसकर कई देशों के नागरिक अपनी ही चुनी हुई सरकारों के खिलाफ खड़े हो गए।

ईरान ने स्वयं को फ़िलिस्तीन के समर्थन में अग्रणी शक्ति के रूप में स्थापित किया है और हमास तथा हिज़बुल्लाह जैसे संगठनों के प्रति उसके रुख ने इस संघर्ष को और जटिल बनाया है। यदि ईरान इज़राइल के अस्तित्व को स्वीकार कर ले और इन संगठनों को समर्थन देना बंद कर दे, तो संघर्ष की तीव्रता कम हो सकती है—परंतु वर्तमान परिस्थितियाँ इसके विपरीत संकेत देती हैं।

प्राचीन परसिया से आधुनिक शरिया तक: एक सभ्यता का पतन

ईरान के लोग अपनी भूमि को हमेशा से 'ईरान' ही कहते थे। यह शब्द प्राचीन अवेस्तन भाषा के 'ऐर्यानाम' से निकला है, जिसका अर्थ है "आर्यों की भूमि"। सासैनियन राजाओं के समय तीसरी शताब्दी ईस्वी के शिलालेखों में भी इस देश को 'ईरान-शह्र' अर्थात आर्यों का साम्राज्य, कहा गया है। ईरान को कभी 'परसिया' भी कहा गया लेकिन यह एक महान प्राचीन संस्कृति थी जो भारत से विशेष रूप से जुडी थी। हम 'देव' पूजक थे, वे 'अहुर' (असुर) पूजक थे, दोनों ही मूर्तिपूजक और प्रकृति पूजक थे। लेकिन इस्लामिक आक्रांताओं ने उस महान सभ्यता को निगल लिया।

1979 की इस्लामिक क्रांति ने उसे एक कट्टर शरिया राष्ट्र बना दिया। जिसमे कितना बड़ा नरसंहार किया गया, ये आज शायद ही किसी को याद हो। इसके बाद ही अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाये जो आज तक चले आ रहे हैं। क्या अमेरिका का यह कदम गलत था? इस्लामिक आक्रमणों ने दुनिया की कई सभ्यताओं को निगल लिया और जो मौत के मुँह से निकलकर बची, यहूदी उनमें से एक है । आज इजरायल उसी कट्टरपंथ के खिलाफ अपनी संप्रभुता की लड़ाई लड़ रहा है। यहूदी अपनी ही जमीन पर अस्तित्व बचाने को संघर्ष कर रहे हैं, जबकि ईरान ने हमास और हिजबुल्लाह जैसे आतंकी पालकर उन्हें मिटाने की कसम खाई है। इजराइल के बाद गजवा-ए-हिन्द को वैश्विक धार्मिक नारा नहीं दिया जाएगा, इस ओर से आँखे बंद नहीं की जा सकती ।

भारत के लिए सीधा खतरा: क्या हम अगला निशाना हैं?

भारत के लिए सीधा खतरा: क्या हम अगला निशाना हैं?

ईरान के सर्वोच्च नेता खामनेई ने बार-बार कश्मीर की 'स्वतंत्रता' और भारत में मुसलमानों के 'शोषण' का राग अलापा है। उन्होंने खुलेआम जेहाद की अवधारणा को हवा दी है। कल्पना कीजिए:

· यदि ईरान परमाणु शक्ति संपन्न हो गया, तो उसका पहला निशाना इजरायल होगा और दूसरा भारत हो सकता है।

· यदि भविष्य में ईरान और पाकिस्तान 'मुस्लिम ब्रदरहुड' के नाम पर एक हो गए, तो भारत के अस्तित्व पर बड़ा संकट मंडराएगा।

· भारत के भीतर मौजूद कट्टरपंथी इलाके, इस स्थिति में देश के लिए कैंसर बन सकते हैं।

इस युद्ध के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि ईरान के पास पर्याप्त सैन्य संसाधन—मिसाइल, ड्रोन और उन्नत हथियार—उपलब्ध हैं। यदि इन क्षमताओं के साथ परमाणु शक्ति जुड़ती है, तो यह क्षेत्रीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। इसी संदर्भ में अमेरिका की नीतियों को समझा जा सकता है, जो स्वयं को इज़राइल की सुरक्षा और व्यापक रणनीतिक स्थिरता से जोड़ता है।

अंततः, यह संघर्ष केवल सीमाओं का विवाद नहीं, बल्कि विचारधाराओं, पहचान और शक्ति संतुलन का जटिल संगम है। युद्धविराम अस्थायी राहत दे सकता है, किंतु स्थायी समाधान तभी संभव है जब सभी पक्ष एक-दूसरे के अस्तित्व और संप्रभुता को स्वीकार करें—और वैचारिक टकराव को संवाद में परिवर्तित करें।

यहीं से एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील प्रश्न उठता है—यदि भविष्य में परिस्थितियाँ बदलती हैं और भारत व ईरान के संबंधों में टकराव उत्पन्न होता है, तो उसका स्वरूप क्या हो सकता है? वर्तमान में भारत और ईरान के बीच प्रत्यक्ष सैन्य टकराव की संभावना अत्यंत कम है, किंतु भू-राजनीतिक समीकरण—विशेषकर पाकिस्तान जैसे कारकों की भूमिका—इस परिदृश्य को जटिल बना सकते हैं।

कल्पना कीजिए कि यदि पश्चिम एशिया की अस्थिरता दक्षिण एशिया तक फैलती है, या वैचारिक ध्रुवीकरण क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित करता है, तो भारत के लिए चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं। यही कारण है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी सैन्य क्षमताओं को लेकर वैश्विक चिंता केवल इज़राइल तक सीमित नहीं है।

राष्ट्रहित सर्वोपरि

राष्ट्रहित सर्वोपरि

अमेरिका का ईरान पर प्रतिबंध लगाना केवल इजरायल को बचाने के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को एक 'परमाणु कट्टरपंथी' देश से बचाने के लिए विचारणीय विषय है। हिंसा को रोकने के लिए कभी-कभी बड़ी हिंसा होती है और शक्ति प्रदर्शन अनिवार्य हो जाता है।

ईरान की जनता आज खुद अपनी सत्ता से त्रस्त है। बुनियादी ढांचा तबाह हो चुका है और अर्थव्यवस्था गर्त में है। भारत को भी अब स्पष्ट होना होगा—हमारी सहानुभूति किसी विदेशी कट्टरपंथी देश के साथ नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों और अपनी सुरक्षा के साथ होनी चाहिए। जो लोग भारत में रहकर ईरान के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि यदि कल भारत पर संकट आया, तो ईरान की मिसाइलें उन्हें बचाने नहीं आएंगी। इसलिए - राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम।

~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

राष्ट्र शर्मसार है मोदी की ममता से

 


बंगाल ही नहीं, संपूर्ण राष्ट्र शर्मसार है मोदी की ममता से || किसकी हठधर्मिता और किसकी विवशता ? आज की स्थिति का कौन जिम्मेदार?


लोकतंत्र के दुर्ग में दरकती दीवारें

पश्चिम बंगाल, जिसे कभी अपनी बौद्धिक चेतना और सांस्कृतिक शुचिता के लिए "भारतीय पुनर्जागरण का केंद्र" माना जाता था, आज राजनीतिक हिंसा और प्रशासनिक पतन के एक अंतहीन भंवर में फंसा हुआ है। वर्तमान परिदृश्य में यह प्रश्न उठाना अनिवार्य हो गया है कि क्या बंगाल में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसके लिए केवल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का प्रशासन उत्तरदायी है, या फिर केंद्र की मोदी सरकार भी अपनी 'मौन सहमति' या 'रणनीतिक विवशता' के कारण परोक्ष रूप से जिम्मेदार है? एक संघीय ढांचे में जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों और सुरक्षा की धज्जियां उड़ाई जा रही हों, तब केंद्र की निष्क्रियता राष्ट्र की अखंडता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

मालदा की घटना: न्यायपालिका बंधक

हाल ही में मालदा जिले के कालियाचक क्षेत्र में जो हुआ, वह आधुनिक भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय है। सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देश पर मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) के कार्य में संलग्न सात न्यायिक अधिकारियों को, जिनमें तीन महिलाएं भी शामिल थीं, दिनदहाड़े एक उन्मादी भीड़ द्वारा बंधक बना लिया गया।

यह घटना केवल एक आपराधिक कृत्य नहीं थी, बल्कि सीधे तौर पर न्यायपालिका की गरिमा पर प्रहार था। कोलकाता उच्च न्यायालय के निरंतर अनुरोधों और हस्तक्षेप के बावजूद, घंटों तक पुलिस और प्रशासन का कोई भी वरिष्ठ अधिकारी घटनास्थल पर नहीं पहुंचा। यह कर्तव्यहीनता किसी प्रशासनिक चूक का परिणाम नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से उच्च-स्तरीय राजनीतिक दबाव का संकेत देती है। जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को स्वयं रात भर जागकर न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष करना पड़े और रात 1 बजे जाकर पुलिस बल मौके पर पहुंचे, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राज्य में 'कानून का शासन' नहीं, बल्कि 'शासक का कानून' प्रभावी है।

मतदाता सूची और 'फर्जी मतदाताओं' का सच

एसआईआर (SIR) का कार्य कोई सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं थी। यह चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायिक अधिकारियों का एक निष्पक्ष प्रयास था ताकि ममता बनर्जी की उन शिकायतों का निस्तारण किया जा सके जिनमें उन्होंने आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाया था। किंतु जब इन अधिकारियों ने काम शुरू किया, तो वे 'खिसियाहट' और 'हिंसा' का शिकार हुए।

इस हिंसा का मूल कारण गहरा है। न्यायिक अधिकारियों की उपस्थिति ने उस 'फर्जी मतदाता' नेटवर्क के भंडाफोड़ का डर पैदा कर दिया, जिसके दम पर सत्ताधारी दल अपनी जीत सुनिश्चित करता रहा है। यदि मतदाता सूची से संदिग्ध नाम कट जाते, तो वर्तमान सरकार की चुनावी जमीन खिसक सकती थी। इसी असुरक्षा ने उस भीड़ को उकसाया जिसने अधिकारियों के काफिले पर पथराव किया। यह भारतीय लोकतंत्र के निम्नतम स्तर का प्रमाण है।

ऐतिहासिक तुलना: लखनऊ से कोलकाता तक

राजनीतिक पतन का ऐसा ही उदाहरण उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल के दौरान देखा गया था, जब समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ पर "हल्ला बोल" दिया था और मायावती के विरुद्ध "स्टेट गेस्ट हाउस कांड" रचा गया था। किंतु उस समय के राज्यपाल मोतीलाल वोहरा ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सरकार को बर्खास्त करने का साहस दिखाया था। इसके विपरीत, बंगाल की स्थिति यह है कि यहाँ राज्यपाल स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करते। मालदा की घटना ने सिद्ध कर दिया है कि आगामी चुनाव केवल एक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की जीवित रहने की एक परीक्षा है।

सर्वोच्च न्यायालय की तल्ख टिप्पणी और एनआईए की जांच

स्थिति की भयावहता को देखते हुए, मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने स्वतः संज्ञान लिया। न्यायालय ने इसे 'संवैधानिक व्यवस्था का ध्वस्त होना' करार दिया। मुख्य सचिव, डीजीपी और गृह सचिव को अवमानना का नोटिस जारी करना यह दर्शाता है कि प्रशासनिक मशीनरी का किस कदर राजनीतिकरण हो चुका है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक 'योजनाबद्ध और प्रेरित' घटना थी जिसका उद्देश्य न्यायिक मनोबल को तोड़ना था। वर्तमान में, एनआईए (NIA) द्वारा इस मामले की जांच शुरू कर दी गई है, जो इस बात की पुष्टि करती है कि मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी शुचिता से जुड़ा है।

केंद्र सरकार की 'रहस्यमयी' चुप्पी

सबसे विचलित करने वाला तथ्य यह है कि चुनाव आयोग द्वारा राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी को बदले जाने के बावजूद, नव-नियुक्त अधिकारी भी उसी 'सिंडिकेट' के अधीन काम करते प्रतीत हो रहे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि केंद्र सरकार अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का प्रयोग करने से क्यों कतरा रही है?

ममता बनर्जी का एक खास कौशल रहा है—हर हिंसात्मक घटना का दोष विरोधियों पर मढ़ना। अब भी संभावना है कि राज्य की एजेंसियां (CID) इस मामले में हुमायूँ कबीर या असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के लोगों को बलि का बकरा बनाएंगी ताकि मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण को अपने पक्ष में रखा जा सके। केंद्र की मोदी सरकार, जो राष्ट्रवाद के मुद्दे पर मुखर रहती है, बंगाल के मामले में 'मूकदर्शक' क्यों बनी हुई है? क्या यह किसी राजनैतिक लाभ की प्रतीक्षा है या साहस की कमी?


बंगाल में हिंसा की एक लंबी और रक्तरंजित श्रृंखला

बंगाल की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए पिछले कुछ वर्षों की इन वीभत्स घटनाओं पर दृष्टि डालना आवश्यक है:

    1. आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज कांड (2024): एक महिला डॉक्टर के साथ कार्यस्थल पर जघन्य बलात्कार और हत्या। प्रशासन का संदिग्ध रवैया और सबूतों के साथ कथित छेड़छाड़।
    2. संदेशखाली हिंसा (2024): महिलाओं का व्यवस्थित यौन उत्पीड़न और शाहजहां शेख जैसे नेताओं द्वारा जमीन हड़पने का संगठित तंत्र।
    3. बोगतुई नरसंहार (2022): महिलाओं और बच्चों सहित 10 लोगों को जिंदा जला देना। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इसे "बर्बर" करार दिया था।
    4. 2021 विधानसभा चुनाव पश्चात हिंसा: चुनाव परिणामों के बाद हुई व्यापक हिंसा, जिसे एनएचआरसी (NHRC) ने राज्य समर्थित करार दिया।
    5. सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला: कैनिंग (2013), धुलागढ़ (2016), बसीरहाट (2017) और रिसड़ा (2023) में हुई हिंसा ने यह सिद्ध किया कि तुष्टीकरण की नीति ने राज्य के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है।

घोटालों का 'सिंडिकेट' राज

बंगाल की सत्ता केवल हिंसा के दम पर नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के विशाल तंत्र पर भी टिकी है।

    • शिक्षक भर्ती घोटाला (SSC Scam): मंत्री के घर से करोड़ों की नकदी बरामद होना और हजारों मेधावी छात्रों का भविष्य अंधकार में डालना।
    • शारदा और रोज वैली: लाखों गरीबों की मेहनत की कमाई डकारने वाली पोंजी स्कीमें, जिनके तार सत्ता के गलियारों तक जुड़े पाए गए।

घुसपैठ: राष्ट्र की सुरक्षा पर मंडराता खतरा

ममता बनर्जी ने बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को अपना वोट बैंक बनाकर जो कीर्तिमान स्थापित किया है, वह कश्मीर के अलगाववाद से भी अधिक घातक सिद्ध हो रहा है। सीमावर्ती जिलों में बदलती जनसांख्यिकी और घुसपैठियों को सरकारी संरक्षण देना देश की एकता और अखंडता के साथ सीधा खिलवाड़ है।

राष्ट्र के प्रति कर्तव्य से विमुख भारतीय राजनीति

प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और यहाँ तक कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों का बार-बार अपमान होने के बाद भी केंद्र सरकार का कोई ठोस कदम न उठाना चिंताजनक है। यदि केंद्र केवल राजनीतिक लाभ-हानि के गणित में बंगाल को जलने के लिए छोड़ देता है, तो यह राष्ट्र के प्रति उसके कर्तव्य का उल्लंघन होगा।

बंगाल की अराजकता आज एक 'गेटवे' बन चुकी है—घुसपैठ के लिए, भ्रष्टाचार के लिए और संवैधानिक अवमानना के लिए। अब समय आ गया है कि राजनीति से ऊपर उठकर बंगाल में कानून के शासन को पुनः स्थापित किया जाए। यदि आज बंगाल नहीं बचा, तो कल राष्ट्र की एकता को अक्षुण्ण रखना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। बंगाल का यह संकट केवल एक राज्य का संकट नहीं, बल्कि पूरे भारत के लोकतंत्र की अस्मिता का प्रश्न है।

बंगाल की अराजकता आज एक 'गेटवे' बन चुकी है—घुसपैठ के लिए, भ्रष्टाचार के लिए और संवैधानिक अवमानना के लिए। अब समय आ गया है कि राजनीति से ऊपर उठकर बंगाल में कानून के शासन को पुनः स्थापित किया जाए। यदि आज बंगाल नहीं बचा, तो कल राष्ट्र की एकता को अक्षुण्ण रखना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। बंगाल का यह संकट केवल एक राज्य का संकट नहीं, बल्कि पूरे भारत के लोकतंत्र की अस्मिता का प्रश्न है।

शनिवार, 4 अप्रैल 2026

नकली दलित बनाम असली दलित


 

 

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: नकली दलित बनाम असली दलित | 75 साल से हो रही एक धोखाधडी का अंत


“धर्मांतरित होकर ईसाई या मुसलमान बन चुके दलित अब दलित होने का फायदा नहीं उठा पाएंगे.”


धर्मांतरित होकर ईसाई या मुसलमान बन चुके दलित, अब दलित होने का फायदा नहीं उठा पाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस समय आया है जब पिछले 75 वर्षों से संविधान की अवहेलना करते हुए धर्मांतरण के बाद भी धड़ल्ले से इसका फायदा उठाया जा रहा था। धर्मांतरण के लिए दलित आसान शिकार होते हैं जिन्हें सब्ज बाग़ दिखाया जाता था कि उन्हें जातिगत भेदभाव से छुटकारा मिल सकेगा और साथ ही साथ उन्हें जातिगत आधार पर मिलने वाले आरक्षण तथा अन्य लाभ भी मिलते रहेंगे — यानी आम के आम, गुठलियों के दाम। तत्कालीन कांग्रेस सरकारों के संरक्षण में पनपा यह गोरखधंधा आज भी केंद्र सरकार की नाक के नीचे हो रहा था।

24 मार्च 2026 को सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने चिंतादा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण और स्पष्ट निर्णय सुनाया है, जो सामाजिक और कानूनी दृष्टिकोण से एक बड़ी नजीर है। यह मामला आंध्र प्रदेश के एक ईसाई पादरी, चिंतादा आनंद से जुड़ा था, जिनका जन्म दलित परिवार में हुआ था, लेकिन वे धर्मांतरित होकर ईसाई बन गए थे। उन्होंने जन्म से दलित होने का दावा करते हुए अपने ऊपर हुए कथित हमले के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था। पीड़ित पक्ष ने निचली अदालतों और फिर हाईकोर्ट में इसे इस आधार पर चुनौती दी कि ईसाई होने के कारण वे अब अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं आते।

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जैसे ही कोई व्यक्ति ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाता है, उसका अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत और पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है। न्यायालय ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 का हवाला दिया, जो कहता है कि केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानने वाले ही अनुसूचित जाति के सदस्य माने जा सकते हैं। चूँकि जो व्यक्ति अब ईसाई बन चुका है, इसलिए वह अब अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रहा; इसलिए वह एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत सुरक्षा या सरकारी आरक्षण का दावा नहीं कर सकता।

यह निर्णय कई मामलों में ऐतिहासिक है, लेकिन यह गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है कि पिछले 75 वर्षों से संवैधानिक व्यवस्था के साथ की जा रही धोखाधड़ी के लिए कौन जिम्मेदार है — राजनीति, सरकार या सर्वोच्च न्यायालय।

दलितों में समानता के उद्देश्य से की गई आरक्षण की व्यवस्था तथा अन्य संवैधानिक कानूनों का किस हद तक दुरुपयोग हुआ है, बहुत चिंताजनक है। इसमें सबसे अधिक नुकसान असली दलितों का हुआ है, जिनके हक पर ईसाई और मुस्लिम बन चुके नकली दलितों ने डाका डाला है। अगर यह सब नहीं किया गया होता तो उनकी स्थिति आज काफी बेहतर होती।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज यही नकली दलित यूजीसी मामले में विभिन्न संगठनों के बैनर तले सवर्ण और सामान्य वर्ग से मोर्चा खोल रहे हैं, जिन्हें निहित स्वार्थ वाली हिंदू-विरोधी शक्तियाँ वित्तीय सहायता और संसाधन उपलब्ध करा कर सामाजिक विद्वेश फैलाने का काम कर रहीं हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने उन सभी संशयों को खत्म कर दिया जहाँ लोग धर्म परिवर्तन के बाद भी जाति प्रमाण पत्र का लाभ लेते थे और ईसाई या मुस्लिम होते हुए भी कागजी दलित बने रहते थे। इस निर्णय के प्रभाव बहुत व्यापक होंगे और इनका सीधा लाभ दलित समुदायों को होगा।

अब ईसाई और मुस्लिम बन चुके दलित सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं उठा पाएंगे और न ही उन्हें प्रोन्नति के मामले में कोई लाभ मिलेगा। शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के मामले में भी उन्हें अनुसूचित जाति का लाभ नहीं मिलेगा। अनुसूचित जाति को मिलने वाली तमाम सरकारी रियायतें — जैसे शिक्षण शुल्क में छूट, मुफ्त कोचिंग, नौकरी तथा प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए निशुल्क आवेदन और अन्य सरकारी सुविधाएँ — भी इन नकली दलितों को नहीं मिलेंगी। धर्मांतरित नकली दलित उत्पीड़न के मामलों में एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं कर पाएंगे। लोकसभा और विधानसभा में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों में भी इन नकली दलितों की घुसपैठ बंद हो जाएगी।

अनुसूचित जाति का दर्जा मुख्य रूप से ‘अस्पृश्यता’ की ऐतिहासिक सामाजिक बुराई से जुड़ा है, जिसके लिए संवैधानिक अधिकार 1950 के राष्ट्रपति आदेश (अनुच्छेद 341) द्वारा दिया गया है; इसके अनुसार अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के व्यक्तियों को ही मिल सकता है। इसलिए यदि कोई दलित, ईसाई या मुस्लिम बनता है तो वह कानूनन अपनी अनुसूचित जाति की श्रेणी खो देता है।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यह नियम अनुसूचित जनजाति पर लागू नहीं होगा, क्योंकि अनुसूचित जनजाति का दर्जा धर्म से नहीं, बल्कि उनकी ‘नृवंशविज्ञान’ और ‘विशिष्ट संस्कृति’ से तय होता है। संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित जनजाति के निर्धारण के लिए धर्म की कोई शर्त नहीं है। एक आदिवासी व्यक्ति की पहचान उसके रक्तपूर्वजों, विशिष्ट भाषा, रीति-रिवाजों और भौगोलिक अलगाव से होती है। ये गुण धर्म बदलने से नहीं बदलते।

इस संवैधानिक व्यवस्था में भी पिछले दरवाजे से सेंध लगाई जा रही है। झारखंड में भीषण समस्या उत्पन्न हो गयी है जहाँ बांग्लादेशी घुसपैठियों ने स्थानीय आदिवासी महिलाओं से शादियाँ कर उन्हें इस्लाम में धर्मांतरित कर लिया है। उनकी संतानों में नृवंशविज्ञान, एथनिक और सांस्कृतिक पहचान समाप्त हो जाती है, तो उनका अनुसूचित जनजाति बने रहना एक बड़ी धोखाधड़ी है। इसलिए जितनी जल्दी संभव हो सके इस संदर्भ में केंद्र सरकार को उचित संवैधानिक संशोधन करना चाहिए अन्यथा वहां का मूल आदिवासी समूह पूरी तरह समाप्त हो सकता है।

मुस्लिम बन चुके लोगों को वोटों की राजनीति और मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण अनुसूचित जाति की तरह ही, अन्य पिछड़ा वर्ग का लाभ दिया जा रहा है। मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 13 अगस्त 1990 से सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27% आरक्षण की घोषणा की गई थी, जिसे 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने मंजूरी दी थी। अनुसूचित जाति के मामले में 1950 का राष्ट्रपति आदेश इसे केवल हिंदू, सिख और बौद्धों तक सीमित रखता है; लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए इस तरह की कोई स्पष्ट संवैधानिक या कानूनी व्यवस्था नहीं है।

कई राज्य सरकारों ने मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग के कोटे से सरकारी आरक्षण देकर उन्हें लाभान्वित भी कर दिया है। सैयद, शेख, मुगल तथा पठान, जिनकी संख्या कुल मुसलमानों में 10% से भी कम है, को छोड़कर शेष सभी मुसलमानों को पसमांदा कह कर अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लिया गया है।

यदि एक ही पृष्ठभूमि का कोई व्यक्ति ईसाई होने के बाद अनुसूचित जाति होने का लाभ नहीं ले सकता, तो फिर मुसलमान होने के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग का लाभ कैसे ले सकता है — यह एक बड़ी विसंगति है जिस पर सर्वोच्च न्यायालय को ध्यान देना चाहिए। केंद्र सरकार से इसकी अपेक्षा करना व्यर्थ है क्योंकि भाजपा शासित महाराष्ट्र तथा अन्य राज्यों ने मुसलमानों की अनेक जातियों को पहले ही अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर दिया है।

यह एक यक्ष प्रश्न है। यदि उन्हें बराबरी का हक देने की गारंटी देकर धर्मांतरित करवाया, लेकिन फिर भी उनकी सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ तो फिर धर्मांतरण का उद्देश्य क्या था !

यह व्यवस्था की विसंगति है, या हिंदुओं को उनके ही देश में धर्मांतरित कर दिए जाने का सुनियोजित षड्यंत्र, ताकि भारत का राष्ट्रीयकरण किया जा सके — यह विचारणीय प्रश्न है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नकली दलितों पर दिया गया ऐतिहासिक निर्णय अंतिम नहीं है। इसके विरुद्ध पुनर्विचार याचिका दायर की जा सकती है । सरकार भी इस मामले में हस्तक्षेप करके कानून बना सकती है, जैसा कि मोदी सरकार ने एससी/एसटी एक्ट के मामले में किया था।

सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि केंद्र की मोदी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालकृष्णन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया है, जो यह अध्ययन कर रहा है कि क्या दलित ईसाइयों और दलित मुस्लिमों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाना चाहिए। आयोग को इसी वर्ष अप्रैल में अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। यदि आयोग पाता है कि धर्म परिवर्तन के बाद भी इन समुदायों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधर नहीं हुआ है, तो केंद्र सरकार संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में संशोधन करके हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म के साथ ‘ईसाई’ और ‘इस्लाम’ धर्म को भी शामिल करने का प्रावधान कर सकती है; ऐसी स्थिति में न्यायालय का वर्तमान निर्णय स्वतः निष्प्रभावी हो जाएगा।

मोदी सरकार की मंशा कुछ ऐसा करने की प्रतीत भी होती है, अन्यथा इस आयोग के गठन की कोई आवश्यकता नहीं थी। यदि मोदी सरकार ऐसा नहीं भी करती है तो भविष्य की कोई भी सरकार कभी भी इस रिपोर्ट को निकाल कर लागू कर सकती है, जैसा कि बी. पी. सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट के मामले में किया था। इसलिए मोदी सरकार द्वारा गठित वालकृष्णन आयोग की रिपोर्ट विष का बीज साबित होगी।

जो भी हो, नकली दलितों और नकली पिछड़ों के आरक्षित कोटे में शामिल होने का सबसे बड़ा नुकसान अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को उठाना पड़ेगा। इसका एहसास जितनी जल्दी उन्हें हो जाए उतना ही अच्छा है; अन्यथा यह व्यवस्था उनके तथा राष्ट्र दोनों के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगी।

~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~

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