वन्देमातरम पर संग्राम: राष्ट्रगीत का ऐतिहासिक सफर, नया कानून और तुष्टीकरण की राजनीति
जुलाई २०२६ के मानसून सत्र में मोदी सरकार द्वारा एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, २०२६ पारित किया गया। इस नए कानून के माध्यम से राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रगान 'जन गण मन' के समान पूर्ण वैधानिक दर्जा और सुरक्षा प्रदान कर दी गई है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह नया कानून पूरे देश में लागू हो चुका है। देश जब अपने अस्सीवें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पूर्ण 'वंदे मातरम्' गीत गाए जाने के गौरव से अभिभूत अनुभव कर रहा था, तभी दुर्भाग्यवश इसका अपमान भी शुरू हो गया। और यह विवाद किसी और ने नहीं, बल्कि देश की सबसे पुरानी पार्टी, कांग्रेस द्वारा खड़ा किया गया। यह विडंबना ही है कि जिस गीत ने कभी पूरे देश को आजादी के लिए एक सूत्र में पिरोया था, आज उसी गीत को राजनीतिक तुष्टीकरण की भेंट चढ़ाया जा रहा है।
नया कानून: राष्ट्रगीत को मिला सर्वोच्च सम्मान और कड़े दंड का प्रावधान -
नए वैधानिक संशोधनों के अनुसार अब राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम्' को भी राष्ट्रीय ध्वज, संविधान और राष्ट्रगान की तरह पूरी तरह कानूनी संरक्षण मिल गया है। इस कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम् के गायन को रोकता है या उसके गायन अथवा प्रस्तुति के दौरान सभा में बाधा उत्पन्न करता है, तो इसे एक गंभीर दंडनीय अपराध माना जाएगा। इसके लिए अधिकतम तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया है। गृह मंत्रालय के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, सरकारी कार्यक्रमों और आधिकारिक अवसरों के लिए 'वंदे मातरम्' के पूरे छह छंदों वाले पूर्ण प्रारूप को गाने का समय लगभग तीन मिनट दस सेकंड निर्धारित किया गया है। अब आधिकारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रगान से पहले राष्ट्रीय गीत को स्थान दिया गया है और इसके आधिकारिक गायन या वादन के दौरान 'सावधान' की मुद्रा में खड़े रहने का प्रोटोकॉल अनिवार्य कर दिया गया है।
पंद्रह अगस्त का विवाद और कांग्रेस का अड़ियल रुख -
विवाद की शुरुआत पंद्रह अगस्त को कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान हुई। 'वंदे मातरम्' के गायन के दौरान एक वीडियो सामने आया जिसमें सोनिया गांधी ने स्टाफ से दो छंद पूरे होने के बाद गीत को रोकने के लिए कहा। इस दौरान मल्लिकार्जुन खड़गे और सोनिया गांधी के बीच हुई बातचीत सार्वजनिक हो गई और यहीं से एक बड़े विवाद ने जन्म ले लिया। शुरुआत में कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने इसे छुपाने का प्रयास किया और बहाना बनाया कि यह बातचीत मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी मंगाने के संदर्भ में थी। लेकिन जब विवाद बढ़ा, तो कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने सामने आकर स्पष्ट किया कि कांग्रेस शुरू के दो छंद गाने की अपनी पुरानी नीति पर ही कायम रहेगी और पूरा राष्ट्रगीत नहीं गाएगी। अपने इस कदम को सही ठहराने के लिए कांग्रेस ने अपने लगभग नौ दशक पुराने प्रस्ताव का हवाला दिया।
वन्दे मातरम् का जन्म और स्वतंत्रता संग्राम का प्रयाण-गीत -
अठारह सौ सत्तर के दशक में ब्रिटिश शासकों ने सरकारी समारोहों में 'गॉड सेव द क्वीन' गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था। अंग्रेजों के इस तानाशाही आदेश से बंकिमचन्द्र चटर्जी, जो उन दिनों एक सरकारी अधिकारी थे, को बहुत ठेस पहुँची। इसके विकल्प के तौर पर उन्होंने अठारह सौ पचहत्तर में संस्कृत और बाँग्ला भाषा के मिश्रण से एक नये गीत की रचना की, जिसका शीर्षक था - 'वन्दे मातरम्'।
अठारह सौ बयासी में जब उन्होंने 'आनन्द मठ' नामक उपन्यास लिखा, तब मातृभूमि के प्रेम से ओतप्रोत इस गीत को उसमें शामिल कर लिया। यह उपन्यास अंग्रेजी शासन, जमींदारों के शोषण और अकाल से मर रही जनता को जागृत करने हेतु संन्यासी विद्रोह पर आधारित था। उपन्यास में यह गीत भवानन्द नाम का एक संन्यासी विद्रोही गाता है।
अठारह सौ छियानवे में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अधिवेशन में इस गीत का पूर्ण संस्करण गाया गया, जिसके प्रथम स्टेज परफॉर्मर और कम्पोजर स्वयं रवींद्रनाथ टैगोर थे। उन्नीस सौ पांच में जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया, तो इस गीत ने चमत्कार कर दिया। सात अगस्त उन्नीस सौ पांच को बंग-भंग का विरोध करने जुटी भीड़ के बीच अचानक यह समवेत स्वर गूंज उठा और पूरा आसमान 'वंदे मातरम' के घोष से भर गया। रातों-रात यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रयाण-गीत बन गया।
मदनलाल ढींगरा, खुदीराम बोस, सूर्यसेन, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खान जैसे अनगिनत क्रांतिकारियों ने 'वंदे मातरम' कहते हुए फांसी के फंदे को चूमा। भगत सिंह अपने पिता को लिखे पत्रों में इसी गीत से अभिवादन करते थे। सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिन्द फौज ने इस गीत को अंगीकार किया था।
विरोध के स्वर: मुस्लिम लीग और अलगाववादी राजनीति-
जैसे-जैसे स्वतंत्रता संग्राम आगे बढ़ा, विभाजनकारी ताकतों ने इस महान गीत पर निशाना साधना शुरू कर दिया। इस गीत को एकीकृत करने वाले स्वर के रूप में देखने से सबसे पहले इंकार उन्नीस सौ तेईस में काकीनाड कांग्रेस अधिवेशन में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अहमद अली ने किया। उन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के पुरोधा पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर को वन्दे मातरम् गाने के बीच में ही टोक दिया था। लेकिन पं. पलुस्कर ने उस समय गीत का अपमान नहीं होने दिया और वे पूरा गाना गाकर ही रुके।
उन्नीस सौ तीस के दशक में मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग ने मजहब आधारित राजनीति के तहत इसके खिलाफ एक मजबूत अभियान चलाया। उनका तर्क था कि इसमें भारत माता को देवी दुर्गा के रूप में चित्रित किया गया है, जो इस्लाम की मान्यताओं के अनुकूल नहीं है। मुस्लिम लीग ने इसे मूर्तिपूजक और मुस्लिम विरोधी बताया।
यहां यह ध्यान देना आवश्यक है कि दुनिया के कई देशों के राष्ट्रगीतों या राष्ट्रगानों में उनकी संस्कृति और मान्यताओं का समावेश होता है। ब्रिटेन के राष्ट्रगान में रानी को भगवान द्वारा बचाने की प्रार्थना है, लीबिया का राष्ट्रगीत 'अल्लाहो अकबर' की पुकार लगाता है, और सीरिया के राष्ट्रगीत में 'अरबवाद' की चर्चा है। इन देशों में कभी इन गीतों को सांप्रदायिक चश्मे से नहीं देखा गया, लेकिन भारत में मुस्लिम लीग ने इसे हिंदू-मुस्लिम का मुद्दा बना दिया।
तुष्टीकरण का आरंभ: उन्नीस सौ सैंतीस का वैचारिक आत्मसमर्पण -
मुस्लिम लीग की आपत्तियों और दबावों के आगे तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व ने झुकना शुरू कर दिया। उन्नीस सौ सैंतीस में जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद और सुभाष चंद्र बोस की समिति ने (रवींद्र नाथ टैगोर के मार्गदर्शन में) यह निर्णय लिया कि इस गीत के केवल शुरुआती दो पद ही गाए जाएंगे। उनका तर्क था कि बाद के पदों में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र है, जिससे मुसलमानों को आपत्ति हो सकती है।
नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को एक पत्र लिखा था, जिसमें कहा गया था कि 'आनंदमठ' की पृष्ठभूमि मुसलमानों को परेशान कर सकती है। कांग्रेस ने सांप्रदायिक सद्भाव के नाम पर मुस्लिम लीग के सामने वैचारिक घुटने टेक दिए।
निष्कर्ष: वैचारिक प्रतीकों की महत्ता और राजनीतिक दलों के लिए संदेश-
'वंदे मातरम्' पर उठा यह वर्तमान विवाद केवल एक गीत को गाने या न गाने का साधारण प्रश्न नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की उस वैचारिक यात्रा का प्रतिबिंब है जो उन्नीस सौ पांच के स्वदेशी आंदोलन से शुरू होकर आज तक पहुँची है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जिस 'वंदे मातरम्' के पूर्ण गान ने उन्नीस सौ पांच में विभाजित बंगाल को वापस जोड़ दिया था और अंग्रेजों को अपना फैसला बदलने पर मजबूर कर दिया था, उसी गीत को उन्नीस सौ सैंतीस में सांप्रदायिक दबावों के चलते खंडित कर दिया गया।
गीत का यह बँटवारा भले ही देश के विभाजन का प्रत्यक्ष कारण न रहा हो, लेकिन यह उस वैचारिक कमजोरी, मुस्लिम तुष्टीकरण और समझौतावादी मानसिकता का सबसे बड़ा प्रतीक अवश्य था, जिसने अलगाववादियों के हौसले बढ़ाए और अंततः देश के विभाजन को संभव बनाया। यदि इस गीत रूपी मंत्र के टुकड़े न हुए होते, तो शायद देश के टुकड़े होने की नौबत भी नहीं आती।
सरकार के लिए यह आवश्यक है कि नए कानून के माध्यम से 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रगान के समान वैधानिक दर्जा देना केवल एक कानूनी कदम बनकर न रह जाए।
दूसरी ओर, देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिए यह विवाद एक गंभीर चेतावनी है। उन्नीस सौ सैंतीस में जिस 'मुस्लिम तुष्टीकरण' की नीति के तहत गीत के टुकड़े करने का समझौता किया गया था, उसी तुष्टीकरण की राजनीति को पार्टी आज भी अपनी ढाल बनाए हुए है। राष्ट्र के प्रतीकों से दूरी बनाने का सीधा अर्थ राष्ट्र की मूल चेतना और उसकी आत्मा से कटना है। यदि कांग्रेस पार्टी एक वर्ग विशेष को खुश करने के लिए 'वंदे मातरम्' जैसे अपने ही गौरवशाली ऐतिहासिक प्रतीकों का अपमान या बहिष्कार जारी रखती है, और अपने तुष्टीकरण की चरित्रहीनता से बाज नहीं आती, तो आने वाले समय में उसकी बची-खुची प्रासंगिकता भी समाप्त हो जाएगी और राजनीतिक भविष्य भी। ~~~~~शिव मिश्रा ~~~~


