शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

बांकीपुर और दतिया: मोदी और भाजपा के लिए सामान्य वर्ग का स्पष्ट संदेश

 

बांकीपुर और दतिया: मोदी और भाजपा के लिए सामान्य वर्ग का स्पष्ट संदेश

 

जंतर-मंतर पर हुए विपक्षी दलों के नाटकीय और आक्रामक प्रदर्शन के संकट से भाजपा अथक प्रयासों के बाद उबर भी नहीं पाई थी कि उसका सामना एक ऐसी सच्चाई से हो गया, जिससे पार्टी नेतृत्व ने सख्ती से मुंह मोड़ लिया था। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा उपचुनावों में बिहार की बांकीपुर और मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर मिली करारी हार ने भाजपा को आत्ममंथन करने के लिए मजबूर कर दिया है। सवाल यह है कि क्या पार्टी उस सच्चाई का सामना करने के लिए तैयार है, जो इन 'अभेद्य गढ़ों' के ढहने का मूल कारण है? ये हार किसी सामान्य या छोटे-मोटे कारणों का परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह एक गहरे होते असंतोष का प्रकटीकरण है।

अभेद्य किलों का पतन: नेतृत्व की विफलता

बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट का परिणाम राज्य में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की एक बड़ी परीक्षा थी, जिसमें पार्टी बुरी तरह असफल रही। आमतौर पर उपचुनावों में सत्ताधारी दल को बढ़त मिलती है, लेकिन बांकीपुर में ऐसा नहीं हुआ। यह वह सीट है, जिसका प्रतिनिधित्व दशकों तक स्वर्गीय नवीन किशोर सिन्हा और उनके बाद उनके पुत्र (वर्तमान भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष) नितिन नवीन करते रहे। 31 वर्ष से जो सीट भाजपा के पास थी, वह एक झटके में जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर के खाते में चली गई और वह भी 19,000 से अधिक वोटों के बड़े अंतर से।

17 जून 2026 को हुए भरत तिवारी हत्याकांड, ने भी भाजपा की हार मे बड़ी भूमिका निभायी,  जो  बिहार के भोजपुर जिले में पुलिस द्वारा किया गया एक कथित फर्जी एनकाउंटर मामला है, जिसने राज्य की कानून-व्यवस्था पर तो गंभीर सवाल खड़े किए ही भाजपा  का ब्राह्मणों के प्रति उपेक्षित वर्ताव भी रेखांकित किया। 26 वर्षीय भरत तिवारी, बीएससी  शिक्षित बेरोजगार था। वह कोई पेशेवर अपराधी नहीं था लेकिन गंगा नदी के कटाव से विस्थापित हुए बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास और हक की लड़ाई लड़ रहा था। फेस बुक लाइव करके, कैमरे के सामने  आत्मसमर्पण करने वाले भरत के  परिजनों और चश्मदीदों  का आरोप है कि पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चला कर उसका फर्जी एनकाउंटर कर दिया । पुलिस ने  मृत भरत के बुजुर्ग पिता और उनके भाई पर भी अवैध हथियार संरक्षण की गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। सरकार पर ब्राहमण विरोधी आरोप चस्पा होते रहे लेकिन भाजपा ने ठीक से इसका विरोध तक  नहीं किया।   

 

भाजपा के लिए यह पराजय इसलिए भी दुखदायी है क्योंकि बिहार मामलों के प्रभारी स्वयं पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा हैं और यह क्षेत्र कद्दावर नेता रविशंकर प्रसाद का लोकसभा क्षेत्र भी है। बिहार में दशकों से अपनी सरकार बनाने का सपना संजोने वाली भाजपा के नव-नियुक्त नेतृत्व (विशेषकर मुख्य मंत्री सम्राट चौधरी) से जो जादू की उम्मीद थी, वह धरी की धरी रह गई। अप्रैल में ही बिहार के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के तौर पर सम्राट चौधरी ने सत्ता संभाली है। ऐसे में बाँकीपुर का चुनाव उनके नेतृत्व पर भी एक मौन जनमत संग्रह की तरह देखा जा रहा है। यह परिणाम यह भी स्पष्ट करता है कि पार्टी का कट्टर माने जाने वाला सवर्ण और शहरी वोटर भी अब आँख मूंदकर वोट देने को तैयार नहीं है। असम में हिमंत बिस्वा सरमा और पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी ने जिस तरह अपने राजनीतिक कौशल से भाजपा को मजबूत किया, बिहार में वैसा कोई चमत्कार देखने को नहीं मिला।

 

वहीं दूसरी ओर, मध्य प्रदेश की दतिया सीट का उपचुनाव भाजपा के अंतर्कलह और संगठनात्मक विफलता की कहानी कहता है। लगातार 15 वर्षों तक नरोत्तम मिश्रा का गढ़ रही इस सीट पर जब कांग्रेस विधायक की सदस्यता रद्द होने के बाद उपचुनाव हुए, तो भाजपा ने मिश्रा का टिकट काटकर नया उम्मीदवार उतारा। मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में यह चुनाव भाजपा को हर हाल में जीतना चाहिए था, लेकिन कार्यकर्ताओं का असंतोष और रणनीतिक चूक भारी पड़ी।


मूल कारण: सामान्य वर्ग की उपेक्षा और आक्रोश

समस्याओं से मुंह मोड़ने या उन्हें हिकारत से देखने से उनका समाधान नहीं होता। बांकीपुर और दतिया में भाजपा का विजय रथ रोकने वाला सबसे बड़ा फैक्टर हैसामान्य वर्ग का बढ़ता आक्रोश

 

यह आक्रोश हाल ही में यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर हुए सामान्य वर्ग के छात्रों के आंदोलन को कुचलने और केंद्र सरकार द्वारा उनकी पूरी तरह से उपेक्षा करने के कारण उपजा है। सामान्य वर्ग के छात्रों के प्रदर्शन को भाजपा शासित राज्यों में सख्ती से दबाया गया। जंतर-मंतर पर उन्हें प्रदर्शन की अनुमति तक नहीं दी गई, यह तर्क देकर कि इससे 'वातावरण विषाक्त' होगा। इसके विपरीत, काकरोच जनता पार्टी  को उसी जंतर-मंतर पर बिना किसी बाधा के प्रदर्शन करने की खुली छूट दी गई। भयावह अराजकता की गई और  शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र का इस्तीफा भी हुआ। लेकिन यूजीसी मामले में तत्कालीन शिक्षामंत्री की हठधर्मिता पूर्ण चुप्पी और प्रधानमंत्री की अहंकार भरी अनदेखी ने उस युवा वर्ग को निराश किया है, जो बिना किसी स्वार्थ के सोशल मीडिया और जमीन पर भाजपा के लिए एक वैचारिक योद्धा की तरह खड़ा रहता था।

यूजीसी गाइडलाइंस के अतिरिक्त, एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग ने भी इस वर्ग को लहूलुहान कर रखा है। अध्ययनों में सामने आया है कि इस एक्ट के तहत दर्ज बड़ी संख्या में मामले फर्जी पाए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद निर्दोष लोगों (सामान्य वर्ग और ब्राह्मण समुदाय) का जीवन मुकदमों और जेलों में बर्बाद हो रहा है।

"आज का ब्राह्मण, कल का दलित"

सामान्य वर्ग, विशेषकर ब्राह्मण समुदाय की आर्थिक स्थिति आज विपन्नता से भी बदतर हो चुकी है। फ्रांसीसी पत्रकार फ़्राँस्वा गॉटियर के शोध का शीर्षक ही है"आज का ब्राह्मण, कल का दलित"

गॉटियर की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि ब्राह्मण आज के भारत के नए दलित हैं। देश के बड़े शहरों में 50% से अधिक रिक्शा चालक और सार्वजनिक शौचालयों (सुलभ शौचालय) में कार्यरत कर्मी ब्राह्मण समुदाय से आते हैं। यह वही वर्ग है जो ऐतिहासिक रूप से भारत की बौद्धिक संपदा का संरक्षक था, लेकिन 'एंटी-ब्राह्मण' राजनीति ने इसे गरीबी के दलदल में धकेल दिया है।

·         आर्थिक बदहाली: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और बड़े शहरों के समृद्ध घरों में 75% रसोइये और 50% से अधिक घरेलू कामगार इसी समुदाय से हैं।

·         पलायन और विस्थापन: यूपी-बिहार के गांवों में झूठे मुकदमों के डर से सामान्य वर्ग के युवा शहरों में मजदूरी करने को विवश हैं। कश्मीर घाटी के सम्मानित पंडित आज अपने ही देश में शरणार्थी हैं, लेकिन 'नगण्य वोट बैंक' मानकर उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।

इन सबके बावजूद, यह समुदाय 'राष्ट्र प्रथम' की भावना से विचलित नहीं हुआ है। लेकिन राजनीति को यह समझना होगा कि जिस नींव पर इमारत टिकी है, उसे ही कमजोर कर दिया जाए, तो छत का गिरना तय है।

आंकड़ों की गवाही और भविष्य की चेतावनी

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की एकमुश्त वोटिंग ने 2007 में मायावती और 2012 में अखिलेश यादव को सत्ता दिलाई थी। दोनों से निराश होकर 2017 में यह समुदाय पूरी आशा और विश्वास के साथ भाजपा से जुड़ा। लेकिन राज्य में लगातार दो बार सरकार बनने के बाद भी इस समाज को कुछ मंत्री पदों के झुनझुने के अलावा कोई ठोस नीतिगत राहत नहीं मिली।

 

हिंदी पट्टी में इस वर्ग की जनसांख्यिकी को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता जो इन आंकड़ों से स्वत: स्पष्ट है ।

·         उत्तर प्रदेश: सामान्य वर्ग 25-26% (ब्राह्मण लगभग 15%)

·         मध्य प्रदेश: सामान्य वर्ग 22-23% (ब्राह्मण 6-7%)

·         राजस्थान: सामान्य वर्ग 20-22% (ब्राह्मण 8-9%)

·         बिहार: सामान्य वर्ग 16-17% (ब्राह्मण 7-8%)

इतनी बड़ी आबादी किसी भी राजनीतिक दल को सत्ता के शिखर पर बैठाने और वहां से बेदखल करने की पूरी क्षमता रखती है। बांकीपुर और दतिया के नतीजे आश्चर्यजनक नहीं हैं; जमीनी हकीकत समझने वाली जनता को इसका अंदेशा पहले से था। यदि भाजपा इसका पूर्वानुमान नहीं लगा सकी तो यह भी उसकी बड़ी विफलता है।

भाजपा के लिए खतरे की चेतावनी -

भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह समझना होगा कि केवल 'सबका साथ, सबका विकास' और सबका विश्वास के नारे से  मुस्लिमों, पिछड़े और दलित समुदायों को रिझाने और विकसित भारत का सपना दिखाने की रणनीति से चुनाव नहीं जीते जा सकते । अन्य दलों की तरह हिन्दू समाज का जातिगत दोहन करने का खामियाजा उसे भगतना ही पड़ेगा।

 

कार्यकर्ताओं की नाराज़गी तो सभी राजनैतिक दलों के  नुकशानदेह होती हैं लेकिन भाजपा जैसे काडर आधारित पार्टी के लिए घातक होती है।  दतिया का संदेश है कि चुनाव केवल हाईकमान के आदेशों से नहीं, बल्कि ज़मीनी कार्यकर्ताओं के उत्साह से जीते जाते हैं। स्थानीय क्षत्रपों को नज़रअंदाज़ करने से पार्टी को ही नुकसान होता है।

 

उप्र, पश्चिम बंगाल, असम, बिहार और दिल्ली के विधानसभा चुनावों ने सभी राजनैतिक दलों को   स्पष्ट संदेश दिया है, कि केवल मुस्लिम तुष्टीकरण के सहारे चुनाव नहीं जीते जा सकते, वहीं बाँकी पुर और दतिया के उपचुनावों ने भाजपा को गंभीर चेतावनी दे दी है कि सामान्य वर्ग की उपेक्षा और अपमानित करके भी चुनाव नहीं जीते जा सकते। यदि कोर वोटर (सामान्य वर्ग) को यह गलतफहमी मानकर उपेक्षित किया जाता रहा कि "ये जाएंगे कहाँ?", तो इसका परिणाम आत्मघाती होगा। यदि समय रहते भाजपा ने सुधारात्मक कदम नहीं उठाए, तो बांकीपुर और दतिया की यह चिंगारी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों और अन्य राज्यों में एक बड़े  राजनीतिक दावानल का रूप ले सकती है।

~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

भारत का राष्ट्रांतरण कब तक? एफसीआरए कानून कितना प्रभावी?

 

भारत का राष्ट्रांतरण कब तक? एफसीआरए कानून कितना प्रभावी?  

धर्मांतरण और जातिगत आरक्षण का दोहरा खेल

अगर आज आपसे यह सीधा प्रश्न किया जाए कि भारत के 'राष्ट्रांतरण' यानी धर्मांतरण का कार्य कब तक पूरा हो जाएगा, तो शायद यह सुनकर आपको अटपटा लगे और प्रथम दृष्टया आपको इसका कोई स्पष्ट जवाब न सूझे। लेकिन यह एक कड़वा और जमीनी तथ्य है कि कुछ विशेष समुदायखासकर मुस्लिम और ईसाई संस्थाएंदिन-रात एक करके भारत में धर्मांतरण के इस सुनियोजित एजेंडे पर कार्य कर रही हैं। धर्मांतरण के पीछे हमेशा यह तर्क गढ़ा जाता है कि हिंदू धर्म में बहुत सारी कमियां हैं, जिनमें से विशेषकर 'जाति-व्यवस्था' को मुख्य कारण बताया जाता है। कहा जाता है कि जातिगत भेदभाव के कारण लोग ईसाई या इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि धर्मांतरित होने के बाद भी ये लोग अपना 'जातिगत लाभ' लेने का पराक्रम नहीं छोड़ पाते। वे स्वयं उसी जाति-बंधन से बंधे रहना चाहते हैं ताकि सरकारी सुविधाओं का दोहन कर सकें। यही कारण है कि आज मुसलमान और ईसाइयों में न केवल दलित, बल्कि पिछड़े वर्ग के लोग भी बड़ी संख्या में शामिल हैं और वे लगातार आरक्षण का लाभ भी ले रहे हैं।

शिक्षा मंत्रालय की विफलता और जंतर-मंतर का प्रायोजित आंदोलन

आज देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं में जो अराजकता दिख रही है, वह इसी ऐतिहासिक विफलता का परिणाम है। नीट परीक्षा के विरोध के नाम पर जंतर-मंतर पर हुए 'कॉकरोच जनता पार्टी' के आंदोलन को ही लें। इस प्रदर्शन में नीट परीक्षा में बैठे या फेल हुए वास्तविक विद्यार्थी तो बमुश्किल ही नजर आए, अधिकांश प्रभावशाली उपस्थिति 'आपराधिक इतिहास' वाले लोगों की थी।

सोनम वांगचुक के आंदोलन का मंच खाली होते ही जंतर-मंतर रातों-रात अराजक तत्वों की कर्मस्थली बन गया। वहां अचानक तंबू-कनात लग गए। सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि इस भीड़ को खाना खिलाने के लिए विदेशों से ऑर्डर दिए जा रहे थे। शाहीन बाग और किसान आंदोलन की तर्ज पर वहां भारत और हिन्दू विरोधी नारे भी लगे। हैरानी की बात तो यह है कि जब पुलिस ने तंबू उखाड़ने का प्रयास किया, तो 'सरकार के भीतर' से ही कोई संदेश आया कि इन्हें न रोका जाए। चर्चा है कि इस पूरी प्रक्रिया में गृहमंत्री अमित शाह को दरकिनार किया गया।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के विवादित नियमों और शिक्षा तंत्र की इस दुर्दशा के बीच धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा तो एक औपचारिकता मात्र थी। मोदी सरकार के पास पिछले 12 साल का लंबा समय थाजो किसी भी देश में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए पर्याप्त होता हैलेकिन शिक्षा मंत्रालय अपंग व्यवस्था के ही भरोसे रहा। भाजपा के आंतरिक सूत्र बताते हैं कि कोई अद्रश्य शक्ति शिक्षा मंत्रियों को काम करने की छूट ही  नहीं देती। नकल रोकने के लिए जो नया विधेयक लाया गया है, वह विज्ञान की कोई बहुत बड़ी पहेली नहीं है। इसे 2014 के तुरंत बाद लाया जा सकता था।

संविधान, आपातकाल का कलंक और इतिहास का विरूपण

भारत के संविधान निर्माण का श्रेय किसी को भी दिया जाए, लेकिन एक बड़े वर्ग का यह स्पष्ट मानना है कि यह संविधान प्रथम दृष्टया बहुसंख्यक हिंदू विरोधी और सनातन समाज के हितों की पूरी तरह अनदेखी करता है। संविधान सभा का गठन अंग्रेजों की छत्रछाया में हुआ और इसमें जवाहरलाल नेहरू व गांधी जैसी मुस्लिम-परस्त नीतियों वाले नेताओं का गहरा प्रभाव था, जिन्होंने संविधान सभा में उन मुस्लिम नेताओं को भी शामिल किया जो पाकिस्तान बनाने के लिए बेहद सांप्रदायिक आंदोलन किया था लेकिन पाकिस्तान बनने के बाद वहाँ गए नहीं। इसलिए तुष्टीकरण तो संविधान बनाने से ही शुरू हो गया । इस तुष्टिकरण को सबसे बड़ा कानूनी जामा 1976 में आपातकाल के काले दौर में इंदिरा गांधी द्वारा पहनाया गया, जब बिना किसी जन-चर्चा के संविधान की प्रस्तावना में 'पंथनिरपेक्ष' शब्द थोप दिया गया।

संविधान से इतर भी, नेहरू और कांग्रेस की अन्य सरकारों ने समय-समय पर सनातन की जड़ें खोदने का ही कार्य किया। मुगलों और मुस्लिम आक्रांताओं का महिमामंडन कर एक 'गौरवशाली इस्लामिक इतिहास' गढ़ा गया। इसके लिए वामपंथी और इस्लामी परस्त इतिहासकारों की एक पूरी फौज खड़ी की गई, जिन्होंने जानबूझकर भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति और सभ्यता को बौद्धिक रूप से नष्ट करने का कुत्सित प्रयास किया।

वक्फ कानून: राष्ट्रांतरण और भूमि एकाधिकार का हथियार

राष्ट्रांतरण केवल जनसंख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भौगोलिक और आर्थिक संसाधनों पर कब्ज़े का भी खेल है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 1995 का 'वक्फ अधिनियम' है। इस काले कानून ने वक्फ बोर्ड को असीमित और असंवैधानिक अधिकार दे दिए हैं कि वह देश की किसी भी संपत्ति को अपनी बता सकता है। इसी तुष्टिकरण का परिणाम है कि आज वक्फ बोर्ड, भारतीय सेना और भारतीय रेलवे के बाद, देश का तीसरा सबसे बड़ा जमींदार बन गया है। लाखों एकड़ बहुमूल्य भूमि, यहाँ तक कि सदियों पुराने मंदिर और गाँव के गाँव रातों-रात वक्फ की संपत्ति घोषित किए जा रहे हैं। बिना जमीन के राष्ट्रांतरण अधूरा है, और यह कानून उसी सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा है।

विदेशी चंदे का मायाजाल और एनजीओ की फौज

सरकार ने हाल ही में 'विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम' (एफसीआरए) में संशोधन का बिल पेश किया है। यद्यपि यह सच है कि वर्तमान सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में बीस हजार से अधिक संदिग्ध गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के लाइसेंस रद्द किए हैं, लेकिन यह प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।

आधिकारिक आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में वर्तमान में 30 लाख से अधिक एनजीओ पंजीकृत हैं। अधिकृत संस्थाओं को प्रतिवर्ष औसतन 15 हजार से 20 हजार करोड़ रुपये तक की भारी-भरकम विदेशी धनराशि प्राप्त होती है। इन संस्थाओं का घोषित कार्य समाज सेवा है, लेकिन इस चंदे का एक बहुत बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर हिंदुओं के धर्मांतरण और जनसांख्यिकीय बदलाव के लिए उपयोग किया जा रहा है। विकसित राष्ट्र का सपना बेचने वाली सरकार को विदेशी चन्दा, दान, भीख  या धर्मांतरण के लिए भेजी जाने वाले धन पर पूरी तरह से रोक लगानी चाहिए। अगर हमारी सामाजिक आवश्यकताएं वास्तविक हैं, जिनके लिए धन आवश्यक है तो भारत के हिंदू और राष्ट्रभक्त देशहित के लिए तन-मन-धन से सहयोग करने को तत्पर हैं, फिर हमें पश्चिम की दया और भिक्षा क्यों चाहिए?

डेबिट कार्ड फ्रॉड और हवाला का खौफनाक गठजोड़

कानून से बचने के लिए इन ताकतों ने तकनीकी रास्ते खोज लिए हैं। हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में सामने आया है कि अमेरिका की एक संस्था 'टीटीआई' ने हजारों की संख्या में अमेरिका से निर्गत एटीएम और डेबिट कार्ड भारत के कई संवेदनशील क्षेत्रों में पहुंचा दिए। इन विदेशी कार्डों के जरिए भारत से लगभग 95 करोड़ रुपये निकाले जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त, अरब देशों (खासकर दुबई) से 'हवाला' और 'स्मर्फिंग' (टुकड़ों में धन भेजना) के माध्यम से रुपया भेजा जा रहा है। इसका उपयोग सीमावर्ती क्षेत्रों में मदरसे, मस्जिद बनाने और धर्मांतरण के लिए हो रहा है। वित्तीय खुफिया इकाई (एफआईयू) में कर्मचारियों और संसाधनों की कमी के कारण ऐसी जांच महीनों लटकी रहती है।

जनसांख्यिकीय बदलाव: एक टाइम-बम

इन विदेशी फंडिंग्स का सीधा असर जनसांख्यिकी पर पड़ रहा है। 1951 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में मुसलमानों की संख्या लगभग साढ़े तीन करोड़ और ईसाइयों की संख्या 90 लाख के आसपास थी। आज के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, मुसलमानों की संख्या 25 से 30 करोड़ और ईसाइयों की संख्या लगभग 5 करोड़ हो गई है। इतनी बड़ी जनसंख्या केवल 'प्रजनन दर' के आधार पर नहीं बढ़ सकती; इसमें एक बहुत बड़ी संख्या धर्मांतरित लोगों की है, जिसके लिए विदेशी धन का इस्तेमाल किया जाता है। दुर्भाग्य से, राष्ट्रवाद का दम भरने वाली सरकार भी इस भयानक विषय पर गंभीरता से विचार नहीं कर पा रही है और न ही ठोस कदम उठा रही  है ।

स्वर्णिम अतीत और मंदिर आधारित अर्थव्यवस्था

विपक्ष का बौद्धिक स्तर यह है कि प्रियंका गांधी आईआईटी निदेशक पर 'गोमूत्र विशेषज्ञ' का व्यंग्य करती हैं और राहुल गांधी जंतर-मंतर पर बिना किसी तथ्य के 'गोली चलाने' का आरोप लगाते हैं।

दूसरी ओर, प्रधानमंत्री मोदी विकसित भारत का सपना बेच रहे हैं, लेकिन उन्हें समझना होगा कि पहली शताब्दी से 11वीं शताब्दी तक भारत की अर्थव्यवस्था पूरे विश्व की एक-तिहाई (लगभग 33 प्रतिशत) थी। यह किसी प्रधानमंत्री का नहीं, बल्कि हमारी 'मंदिर आधारित अर्थव्यवस्था' का परिणाम था। आज भी अयोध्या, काशी, चार धाम, ज्योतिर्लिंगों और दक्षिण भारत के विशाल मंदिरों की यात्रा, फूल-प्रसाद, होटल और खरीदारी आदि को जोड़ लिया जाए, तो यह अर्थव्यवस्था 10 लाख करोड़ रुपये प्रतिवर्ष से अधिक की है। सरकार विकास तो कर रही है, लेकिन वह जड़ों को सींचने के बजाय केवल पत्तियों पर पानी डाल रही है।

प्रधान मंत्री से अनुरोध - भारत को आज 2047 के 'विकसित राष्ट्र' होने की नहीं, बल्कि वर्तमान में एक 'सुरक्षित राष्ट्र' होने की सबसे पहली आवश्यकता है। अगर राष्ट्र सुरक्षित रहेगा, तो विकसित भी स्वतः हो जाएगा। लेकिन अगर राष्ट्र विकसित हो गया और उसका 'राष्ट्रांतरण' हो गया, तो ऐसे विकास का हम क्या करेंगे? आज कई विदेशी शक्तियां भारत को इस्लामी और ईसाई बहुल बनाने की परियोजना चला  रही रही हैं। हमें विदेशी दान, चंदे के रूप में  भिक्षावृत्ति पर पूर्ण और कठोर प्रतिबंध लगाना होगा, जो वास्तव में भारत के लिए जहर से भी अधिक खतरनाक है । साथ ही वक्फ जैसे काले कानूनों को कूड़ेदान में डालना होगा। हमें उस पूरे बुनियादी ढांचे को जड़ से नष्ट करना होगा जहाँ से राष्ट्र-विरोधी और सनातन-विरोधी भावनाएं पनपती हैं। तभी भारत वास्तविक अर्थों में सुरक्षित और विश्व गुरु बन सकेगा।

~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~



 

रविवार, 12 जुलाई 2026

घूमने लगी हिन्दुत्व के इर्द-गिर्द भारत की राजनीति

 

 हिंदुत्व के इर्द-गिर्द घूमने लगी  भारतीय राजनीति

भारतीय राजनीति इस समय एक अभूतपूर्व वैचारिक संक्रांति काल से गुजर रही है। दशकों तक धर्मनिरपेक्षता का चोगा ओढ़ने और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले तमाम प्रमुख राजनीतिक दल आज हिंदुत्व और सनातन संस्कृति की 'पिच' पर कदमताल करने को मजबूर हैं। अब तक तो केवल भारतीय जनता पार्टी को ही 'हिंदूवादी दल' कहकर घेरा जाता था, लेकिन आज स्थिति यह है कि विपक्ष के सारे दल खुद को भाजपा से बड़ा सनातनी सिद्ध करने की होड़ में जुट गए हैं। यह भारतीय राजनीति का एक ऐसा अप्रत्याशित यू-टर्न है, जिसने देश के पुराने सभी राजनीतिक और वैचारिक समीकरणों को उलट कर रख दिया है।

अवसरवाद की राजनीति और रामलला की शरण

विपक्ष के इस अचानक बदले सुर और राजनीतिक हृदय-परिवर्तन को राम मंदिर के दान में कथित हेरफेर के मामले से नई हवा मिली है। इस विवाद के सामने आते ही अचानक विपक्ष के उन नेताओं में भी रामभक्ति हिलोरे मारने लगी, जो अयोध्या में भव्य मंदिर बनने के बाद आज तक कभी रामलला के दर्शन करने नहीं गए थे। आज वे राजनेता दान चोरी पर हिंदुत्व और सनातन को चोट लगने तथा हिंदुओं की आस्था व श्रद्धा को आघात पहुँचने का दावा कर रहे हैं, जिन्होंने राम मंदिर या किसी भी अन्य मंदिर में कभी एक नया पैसा भी दान नहीं दिया था।

हाल ही में अयोध्या पहुँचने वालों में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल भी शामिल थे, जिन्होंने वहाँ पहुँचकर हिंदुओं की आस्था व विश्वास को खंडित करने का बड़ा आरोप लगाया। उनके राज्यसभा सांसद संजय सिंह तो राम मंदिर बनने के पहले से ही मुखर होकर चंदा चोरी का आरोप लगाते रहे हैं। इसी क्रम में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और अमेठी के सांसद भी अपने-अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ रामलला के दर्शन करने पहुँचे, यद्यपि उनके इस दौरे का वास्तविक उद्देश्य श्रद्धालुओं के बीच पहुँचकर राजनीतिक बवाल काटना तथा धरना-प्रदर्शन करना अधिक दिखाई दिया।

सबसे अधिक आश्चर्यचकित करने वाली घोषणा समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की रही, जिन्होंने कहा कि उनकी सरकार बनने के बाद अयोध्या को सनातन की 'आध्यात्मिक नगरी' घोषित कर दिया जाएगा और उसे सनातन की धार्मिक राजधानी के रूप में विकसित करने के सभी प्रयास किए जाएँगे। यह वही समाजवादी पार्टी है जिसके अतीत को देखकर इस बयान को एक अद्भुत और अप्रत्याशित यू-टर्न ही कहा जाएगा।

इसी तरह कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी भी राम मंदिर में दान चोरी पर अपनी गहरी चिंता प्रकट कर चुके हैं और हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचने का रोना रो चुके हैं। लेकिन कांग्रेस के इन शीर्ष नेताओं के बारे में यह बात इसलिए हैरान नहीं करती क्योंकि चुनाव के मौसम में दोनों भाई-बहन अक्सर कई मंदिरों में चक्कर काटते नजर आते हैं। कभी माथे पर चंदन का गहरा लेप लगाए, कभी भगवा वस्त्र धारण किए, कभी रुद्राक्ष पहने और राहुल गांधी तो कोट के ऊपर जनेऊ पहने भी देखे गए हैं। अपनी इस छवि को और चमकाने के लिए राहुल गांधी अभी हाल ही में बनारस पहुँचे थे और भगवान परशुराम का भेष धारण करके गंगा तट पर खड़े दिखाई दिए थे।

तुष्टिकरण का रक्तरंजित इतिहास और अतीत के पन्ने

इन सभी राजनीतिक दलों में यदि कुछ सबसे समान है, तो वह यह कि ये सभी अतीत में सनातन के विरोध की कीमत पर भी खुलकर मुस्लिम तुष्टिकरण करते रहे हैं। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के बारे में तो इतिहास में जितना दर्ज है, उसे देखकर जनता आसानी से इस नए बदलाव को स्वीकार नहीं कर पाती। यह मुलायम सिंह यादव की सरकार के समय की ही बात है, जब अयोध्या में कारसेवा करने गए निहत्ठे रामभक्तों पर क्रूरतापूर्वक गोलियाँ चलाई गई थीं और हजारों कारसेवकों को गोलियों से भून दिया गया था। कई कारसेवकों का तो आज तक कोई अता-पता नहीं चला।

उस समय के प्रत्यक्षदर्शी अयोध्यावासियों का कहना था कि उस दिन अयोध्या की नालियों में खून बह रहा था और पूरी देवभूमि रक्तरंजित हो गई थी। इस अमानवीय कृत्य के बाद भी मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक रूप से यह कहने में कभी संकोच नहीं किया कि बाबरी मस्जिद की रक्षा के लिए और मुसलमानों का विश्वास जीतने के लिए उन्हें अगर हिंदुओं पर हजारों बार भी गोलियाँ चलानी पड़तीं, तो वे चलाते और इसका उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है। 

राज्यसभा सदस्य और उनके भाई रामगोपाल यादव ने तो यहाँ तक दावा किया था कि मुलायम सिंह की सरकार ने ऐसी सुरक्षा व्यवस्था की थी कि 'परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा'। उन्होंने गर्व से कहा था कि लोग गुंबद पर चढ़ तो गए लेकिन फिर जीवित उतर नहीं पाए। आज लोग उन्हें 'मौलाना मुलायम' या 'मुल्ला मुलायम' कहते हैं, तो कहते रहें; हिंदू उन्हें वोट दें या न दें, उन्हें अपने इस कार्य पर न अफ़सोस था, न है और न कभी होगा। उन्होंने न्यायालय में यहाँ तक कह दिया था कि भगवान राम, बाबरी मस्जिद में एक अवैध कब्जेदार हैं।

मुलायम सिंह यादव की सरकार के कार्यकाल में ही काशी में ज्ञानवापी स्थित शृंगार गौरी के मंदिर को जबरन बंद कर दिया गया था और एक बहुत ऊँची लोहे की बैरिकेडिंग (दीवार) बनाकर हिंदू भक्तों का रास्ता रोक दिया गया था, जबकि नमाजियों के लिए रास्ता खोल दिया गया था। अखिलेश यादव की सरकार के समय भी यही नीति जारी रही, जब संभल के कल्कि धाम में स्थित 'विश्व हरि मंदिर' (जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है) से उसके अधिकारियों और कर्मचारियों को बाहर खदेड़ दिया गया था। यही नहीं, परिसर में स्थित उस ऐतिहासिक कूप (कुएं) पर भी रोक लगा दी गई थी, जहाँ हिंदू रीति-रिवाजों का पालन किया जाता था।

उस दौर में कब्रिस्तानों की बाउंड्री वॉल बनाने के लिए सरकारी खजाना पूरी तरह खोल दिया गया था। वक्फ बोर्ड द्वारा जमीनों पर कब्जे और मनमानी का अभियान भी अखिलेश यादव की सरकार के समय ही अपने चरम पर था। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मुलायम सिंह और अखिलेश यादव की सरकारें तथा समाजवादी पार्टी मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कुख्यात रही हैं, लेकिन उनकी एक बात साफ थी कि उन्होंने कभी अपने इस एजेंडे को छिपाया नहीं। ऐसे में अखिलेश यादव के भीतर अचानक हिंदुत्व के प्रति अगाध प्रेम उमड़ पड़ना किसी के गले नहीं उतर रहा है। ऐसा लगता है कि आगामी चुनाव को नजदीक देखकर अखिलेश यादव का यह अचानक 'हृदय परिवर्तन' हुआ है।

कांग्रेस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

जहाँ तक कांग्रेस पार्टी के इतिहास का प्रश्न है, तो इस पार्टी की स्थापना भले ही एक अंग्रेज एओ ह्यूम ने अंग्रेजों के हितों की रक्षा के लिए की हो और उसका प्रारंभिक उद्देश्य ब्रिटिश शासन को सुरक्षा कवच पहुँचाना रहा हो, लेकिन स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस का जैसे ही भारतीयकरण हुआ, उसका झुकाव एकतरफा रूप से अल्पसंख्यकों की तरफ़ हो गया। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने जीवनपर्यंत केवल मुसलमानों के तुष्टिकरण को ही सर्वोपरि रखा।

जवाहरलाल नेहरू ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कश्मीर की समस्या तो खड़ी की ही, साथ ही जूनागढ़ और हैदराबाद रियासत को भी पाकिस्तान को सौंपने की ढीली नीति अपनाई। इस तरह के कई ऐतिहासिक पत्र और सामग्रियां आजकल सार्वजनिक की जा चुकी हैं, जिन्हें कोई भी देख सकता है। हैदराबाद का मामला तो देश के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वयं अपने हाथों में लिया और 'ऑपरेशन पोलो' के अंतर्गत सैन्य कार्रवाई करके हैदराबाद का भारत में विलय करवाया, अन्यथा नेहरू की नीतियों के कारण आज हैदराबाद भी पाकिस्तान का एक हिस्सा होता।

जवाहरलाल नेहरू ने रज़ाकार संगठन के उस खूंखार मुखिया को, जिसे सरदार वल्लभभाई पटेल ने जेल में डलवाया था, जेल से मुक्त करके सुरक्षित पाकिस्तान भेजने का प्रबंध किया था। इतना ही नहीं, रज़ाकारों के कुख्यात राजनीतिक दल एमआईएम (मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन) पर से प्रतिबंध हटाकर इसका नेतृत्व आज के ओवैसी के पिता को सौंप दिया था। उन्हें केवल इतना करना पड़ा कि उन्होंने इसके आगे 'ऑल इंडिया' शब्द जोड़ दिया और उसका नाम एआईएमआईएम कर दिया।

नेहरू ने इसी तरह केरल में मुस्लिम लीग पर से भी प्रतिबंध हटा लिया और उसके नाम के आगे 'इंडियन यूनियन' शब्द जोड़कर उसके साथ चुनावी गठबंधन कर लिया, जो कांग्रेस का गठबंधन आज भी जारी है। जवाहरलाल नेहरू ने हिंदू कोड बिल तो बनाया और संवैधानिक रूप से हिंदुओं को सामाजिक नियमों में बांध दिया, लेकिन मुसलमानों को छोड़ दिया। उन्होंने मंदिरों का सरकारीकरण किया और उन पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए। देश की प्राचीन शिक्षा पद्धति के गुरुकुल तंत्र को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया और भारतीय संस्कृति को और अधिक आघात पहुँचाने के लिए देश का पहला शिक्षा मंत्री एक ऐसे मुस्लिम नेता को बनाया जिनका जन्म भी भारत में नहीं हुआ था और जिन्हें भारतीय रीति-रिवाज, संस्कृति व सभ्यता की कोई बुनियादी समझ नहीं थी। जिनका एकमात्र उद्देश्य भारत की पाठ्यपुस्तकों में वामपंथी और इस्लामी शिक्षा को बढ़ावा देना था। यही कारण है कि कांग्रेस के नेता आज भी बंद कमरों में बड़े शौक से कहते हैं कि वह मुसलमानों की पार्टी है।

अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक पाखंड

अरविंद केजरीवाल एक नवोदित राजनेता हैं जिन्होंने दिल्ली की सत्ता पर लगभग पंद्रह साल तक राज किया। आरोप है कि उन्होंने वोट बैंक की राजनीति के लिए पूरी दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं को बसाया और उन्हें संरक्षण दिया। आजकल दिल्ली की सत्ता खोकर और कानूनी मुश्किलों में घिरकर अरविंद केजरीवाल राजनीतिक रूप से काफी असहज हैं। वहीं पंजाब, जहाँ कुछ समय बाद चुनाव होने वाले हैं, वहाँ भी वे सत्ता से बाहर होने की कगार पर पहुँच चुके हैं।

यह वही केजरीवाल हैं जिन्होंने कभी भव्य राम मंदिर के विरोध में सार्वजनिक रूप से कहा था कि 'मेरी नानी कहती थीं कि मेरे भगवान राम किसी की ढहाई गई मस्जिद के स्थान पर बने मंदिर में बैठने नहीं जाएँगे।' लेकिन आज राजनीति का पहिया ऐसा घूमा है कि राम मंदिर में दान चोरी का कथित मामला सामने आने के बाद वामपंथियों सहित कई मुस्लिम नेता भी इस 'चोरी' से बहुत आहत दिखाई दे रहे हैं और हिंदुओं के प्रति हमदर्दी जता रहे हैं।

सात राज्यों की चुनावी बिसात और क्षेत्रीय समीकरण

इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के पीछे आगामी समय में होने वाले सात राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, मणिपुर, गोवा तथा गुजरात में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और उसके ठीक बाद वर्ष 2029 का महत्वपूर्ण लोकसभा चुनाव है। वर्तमान में हिमाचल प्रदेश और पंजाब को छोड़कर शेष सभी राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की मजबूत सरकारें हैं।

जहाँ पंजाब में आम आदमी पार्टी को कांग्रेस से और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को भाजपा से कड़ी चुनौती मिल रही है और दोनों ही जगह विपक्ष की सरकारें जाने का अनुमान है, वहीं उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी पिछले दस वर्षों से सत्ता से बाहर रहकर छटपटाहट में है और किसी भी तरह सत्ता पाने की विकट लालसा पाले हुए है। यद्यपि वर्ष 2012 में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी उनके पिता मुलायम सिंह यादव के सौजन्य से चांदी की तश्तरी में सजाकर दे दी गई थी, लेकिन उसके बाद से अखिलेश यादव अपने दम पर राजनीतिक रूप से कोई बड़ा कमाल नहीं दिखा पाए हैं।

वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश में जो आशा से अधिक सफलता मिली, उसे वे अपना सबसे बड़ा कीर्तिमान मानते हैं और उसी के आधार पर वे वर्ष 2027 में लखनऊ की गद्दी पर बैठने का ताना-बाना बुन रहे हैं। समाजवादी पार्टी घोषित रूप से अपने पारंपरिक 'एम-वाई फैक्टर' यानी मुस्लिम और यादवों के वोटों पर आधारित रही है। लेकिन इतिहास गवाह है कि बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी केवल मुस्लिम-यादव या दलित वोटों के सहारे कभी पूर्ण बहुमत से सत्ता में नहीं पहुँचीं। उन्हें सत्ता तक पहुँचने के लिए हमेशा सवर्ण यानी ब्राह्मण या ठाकुर वोटों की बड़ी दरकार रही है।

अब चूँकि ये दोनों सवर्ण समुदाय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा के साथ मजबूती से खड़े हैं, इसलिए भी इन क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक शक्ति बेहद कमजोर हो चुकी है। उत्तर प्रदेश में इस समय मुख्य मुकाबला सीधे तौर पर भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच ही है। प्रदेश की जनता के सामने अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ में से किसी एक को मुख्यमंत्री पद के लिए चुनने का विकल्प होगा। ऐसे में अखिलेश यादव बहुसंख्यक समाज की पहली पसंद बनने के लिए हिंदुत्व की राह पर लगातार कदम बढ़ा रहे हैं। अपनी इस हिंदुत्व यात्रा को धार्मिक प्रखरता प्रदान करने के लिए उन्होंने एक विवादित शंकराचार्य की शरण ली है, जो उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए धार्मिक समर्थन दे रहे हैं।

शंकराचार्य की गो-यात्रा का राजनीतिक खेल

महाकुंभ के पावन समय पर एक ऐसे शंकराचार्य ने (जिनकी नियुक्ति स्वयं विवादित है और जिसका मामला देश की सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है) खुलकर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का विरोध किया था और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर व्यक्तिगत रूप से तीखे हमले किए थे। उन्होंने समाजवादी पार्टी के गुप्त इशारे पर महाकुंभ और मौनी अमावस्या के पवित्र स्नान पर भी जानबूझकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की थी। उनके इस हर राजनीतिक पैंतरे का समाजवादी पार्टी और विशेष रूप से अखिलेश यादव ने खुलकर समर्थन किया था।

वर्तमान में वही शंकराचार्य पूरे उत्तर प्रदेश में गोवध के विरोध में यात्राएं निकाल रहे हैं। यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि उत्तर प्रदेश सभी भाजपा शासित राज्यों में अकेला ऐसा राज्य है जहाँ गोवंश के वध पर पहले से ही बेहद कड़ा कानून लागू है और पूरी पाबंदी है। यह शंकराचार्य केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे विपक्षी शासित राज्यों में जाकर ऐसी कोई यात्रा नहीं करते, जहाँ खुलेआम गोवध होता है और वहाँ के रेस्टोरेंट और होटलों के मेन्यू में बीफ के व्यंजन सरेआम छपे रहते हैं। इस दोहरे मापदंड से आसानी से समझा जा सकता है कि शंकराचार्य की यह कथित गो-यात्रा वास्तविक न होकर राजनीतिक रूप से समाजवादी पार्टी को नैतिक समर्थन देने और योगी आदित्यनाथ की हिंदूवादी छवि को कमजोर करने के लिए ही प्रायोजित की गई है।

उत्तर प्रदेश: दिल्ली की सत्ता का प्रवेश द्वार

जिन सात राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं, उनमें उत्तर प्रदेश का राजनीतिक महत्व सबसे अधिक है, क्योंकि दिल्ली की केंद्रीय सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर ही जाता है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश में वैचारिक और राजनीतिक रूप से एक बड़ा झटका लगा था, जब उसे राज्य में मात्र 33 सीटों पर सफलता मिली थी। इसके विपरीत समाजवादी पार्टी को 37 सीटें मिली थीं, जो उसके इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है। उत्तर प्रदेश में मिली इसी सीमित सफलता के कारण ही भाजपा केंद्र में अपने दम पर पूर्ण बहुमत का आंकड़ा नहीं छू सकी थी, यद्यपि वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगियों के साथ सरकार बनाने में सफल रही थी।

इसलिए भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सरकार बनाना साख का सवाल है और बेहद महत्वपूर्ण है। यदि भाजपा को यहाँ आशा के अनुरूप सफलता मिलती है, तो वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए केंद्र की सत्ता का उसका रास्ता बिल्कुल साफ हो जाएगा। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी अगर इस बार भी राज्य की सत्ता से दूर रह जाती है, तो वह न केवल राज्य में बल्कि देश की राजनीति में भी पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाएगी। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय रोज एक नई करवट ले रही है।

निष्कर्ष: योगी की पिच और विपक्ष की चुनौती

सभी विपक्षी राजनीतिक दलों में अचानक उमड़े इस 'हिंदुत्व प्रेम' का सबसे बड़ा कारण बिहार, बंगाल और असम के पिछले चुनाव भी हैं, जहाँ हिंदू मतों के भारी ध्रुवीकरण के कारण विपक्षी दलों को शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा था। इन राज्यों के चुनावों ने यह संदेश पूरी तरह साफ कर दिया कि केवल मुस्लिम मतों के सहारे अब चुनाव जीतना और सरकार बनाना संभव नहीं रह गया है। इसीलिए अखिलेश यादव और कांग्रेस जैसी पार्टियां भी अपनी पुरानी रणनीति बदलकर प्रभु श्री राम की शरण में पहुँच गई हैं।

लेकिन इस प्रयास में जाने-अनजाने उन्होंने भाजपा को एक बड़ी वैचारिक बढ़त दे दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश में कानून और व्यवस्था की अब तक की सबसे सर्वोत्तम स्थिति, सुदृढ़ प्रशासनिक नीति और वित्तीय प्रदर्शन से हिंदुत्व की एक बेहद मजबूत पिच तैयार कर दी है। अब उस पिच पर अखिलेश यादव उतरकर कितनी सफल बैटिंग कर पाएंगे, इसमें राजनीतिक विश्लेषकों को गहरा संदेह है।

वह भी तब, जब भाजपा के पास योगी आदित्यनाथ के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर हिमंत बिस्वा सरमा, सुवेंदु अधिकारी, पुष्कर सिंह धामी और देवेंद्र फडणवीस जैसे हिंदुत्व के कद्दावर और धुरंधर चेहरे उपलब्ध हैं। साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह जैसे चुनावी बिसात के सदाबहार महारथी भी उत्तर प्रदेश की इस चुनावी व्यूह रचना का स्वयं संचालन करेंगे।

ऐसे में हिंदुत्व की पिच पर उत्तर प्रदेश के भीतर अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और उनके सहयोगियों का प्रदर्शन कैसा रहेगा, या उत्तर प्रदेश भी अंततः बिहार और असम की राह पर जाएगा—यह तो आने वाला समय ही तय करेगा। लेकिन यदि चुनाव परिणाम समाजवादी पार्टी की उम्मीदों के विपरीत आते हैं, तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की स्थिति भी बिहार के तेजस्वी यादव जैसी हो जाएगी, जो सत्ता की लालसा में केवल किनारे पर ही खड़े रह गए; और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए इसकी संभावना लगातार प्रबल होती जा रही है।


~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~

 

वैचारिक समर्पण या चुनावी मजबूरी : घूमने लगी हिन्दुत्व के  इर्द-गिर्द भारत की राजनीति

भारतीय राजनीति इस समय एक अभूतपूर्व वैचारिक संक्रांति काल से गुजर रही है। धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले तमाम प्रमुख राजनीतिक दल आज हिंदुत्व और सनातन संस्कृति की 'पिच' पर बल्लेबाजी करने को मजबूर हैं। जो दल कभी भाजपा को 'हिंदूवादी' कहकर घेरते थे, आज वे खुद को सबसे बड़ा सनातनी सिद्ध करने की होड़ में जुट गए हैं। यह भारतीय राजनीति का एक ऐसा अप्रत्याशित यू-टर्न है, जिसने पुराने सारे समीकरण बदल दिए हैं।

अवसरवाद और राम लला की शरण : विपक्ष के इस अचानक बदले सुर और राजनीतिक हृदय-परिवर्तन को राम मंदिर के दान में कथित हेरफेर के मामले से नई हवा मिली है। इस विवाद के सामने आते ही अचानक विपक्ष के उन नेताओं में भी रामभक्ति हिलोरे मारने लगी, जो अयोध्या में भव्य मंदिर बनने के बाद आज तक कभी रामलला के दर्शन करने नहीं गए थे। आज वे राजनेता दान चोरी पर हिंदुत्व और सनातन को चोट लगने तथा हिंदुओं की आस्था व श्रद्धा को आघात पहुँचने का दावा कर रहे हैं, जिन्होंने राम मंदिर या किसी भी अन्य मंदिर में कभी एक नया पैसा भी दान नहीं दिया था।

आप और कांग्रेस की सक्रियता: आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल से लेकर कांग्रेस के प्रांतीय नेताओं तक, सभी अचानक हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचने का दावा करने लगे हैं। यह वही केजरीवाल हैं जिन्होंने कभी अपनी नानी का हवाला देकर मंदिर निर्माण पर तंज कसा था। उनके राज्यसभा सांसद संजय सिंह तो राम मंदिर बनने के पहले से ही मुखर होकर चंदा चोरी का आरोप लगाते रहे हैं। इसी क्रम में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजयराय  और अमेठी के सांसद भी अपने-अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ रामलला के दर्शन करने पहुँचे, यद्यपि उनके इस दौरे का वास्तविक उद्देश्य श्रद्धालुओं के बीच पहुँचकर राजनीतिक बवाल काटना तथा धरना-प्रदर्शन करना अधिक दिखाई दिया।

अखिलेश यादव का मास्टरस्ट्रोक: सबसे चौंकाने वाला बयान समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का आया है। उन्होंने घोषणा की है कि सपा सरकार बनते ही अयोध्या को 'सनातन की धार्मिक राजधानी' के रूप में विकसित किया जाएगा।

चुनाव के मौसम में राहुल गांधी का जनेऊ धारण करना, भगवा पहनना या बनारस के घाट पर परशुराम का भेष धारण करना अब हैरान नहीं करता, क्योंकि यह वैचारिक प्रतिबद्धता से अधिक चुनावी 'इमेज मैनेजमेंट' का हिस्सा बन चुका है। प्रियंका वाड्रा भी ईसाई की पत्नी होने और बेटे की सगाई मुस्लिम से करने के बाद भी हिन्दुत्व का ढोंग करने में नाटकीय रूप से संलग्न रहती हैं। 

अतीत और वर्तमान का छद्म : विपक्ष के इस 'सनातनी अवतार' को स्वीकार करना जनता के लिए इसलिए कठिन है, क्योंकि इनका अतीत मुस्लिम तुष्टिकरण के इतिहास से भरा पड़ा है।

समाजवादी पार्टी का रक्तरंजित इतिहास : सपा के इतिहास पर नजर डालें तो मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियाँ चलाई गईं, जिसमें दर्जनों निहत्थे रामभक्त मारे गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने गर्व से कहा था कि मुसलमानों का भरोसा जीतने के लिए उन्हें हजारों बार भी गोली चलानी पड़ती, तो वे चलाते। इसी तरह काशी में ज्ञानवापी स्थित शृंगार गौरी मंदिर की बैरिकेडिंग करना हो या संभल के कल्कि धाम में 'विश्व हरि मंदिर' के कूप (कुएं) पर रोक लगानासपा का इतिहास बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को आहत करने वाला रहा है। कब्रिस्तान की बाउंड्री वॉल के लिए सरकारी खजाना खोलना और वक्फ बोर्ड को खुली छूट देना इसी तुष्टिकरण नीति का हिस्सा था। पुलिस और दूसरी सरकारी  नौकरियों में एक जाति  और एक मजहब के लोगों धांधली पूर्वक  भर्ती के जीते जागते किस्से भरे पड़े हैं।

लोग अभी भी काँवड़ यात्रा पर रोक, हिन्दू उत्सव यात्राओं पर प्रतिबंध, मुस्लिम त्योहारों के कारण दुर्गा और गणेश की प्रतिमाओं के विसर्जन पर प्रतिबंध, आदि को भूले नहीं हैं। पुलिस थानों  और कारागारों में सदियों से चली आ रही कृष्ण जन्माष्टमी की  उत्सव परंपरा  पर रोक लगाने को तो खुद पुलिस कर्मी भी नहीं भूल सकते। मजहब विशेष के सजायाफ्ता आतंकियों के मुकदमें वापस लेने वालो को भला कोई कैसे पसंद कर सकता है। जबरन वसूली, फिरौती और संपत्तियों पर कब्जे वाली घटनाएं आज भी लोगों में सिहरन पैदा कर देतीं हैं।          

राज्यसभा सदस्य और उनके भाई रामगोपाल यादव ने तो यहाँ तक दावा किया था कि मुलायम सिंह की सरकार ने ऐसी सुरक्षा व्यवस्था की थी कि 'परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा'। उन्होंने गर्व से कहा था कि लोग गुंबद पर चढ़ तो गए लेकिन फिर जीवित उतर नहीं पाए। आज लोग उन्हें 'मौलाना मुलायम' या 'मुल्ला मुलायम' कहते हैं, तो कहते रहें; हिंदू उन्हें वोट दें या न दें, उन्हें अपने इस कार्य पर न अफ़सोस था, न है और न कभी होगा। उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि भगवान राम, बाबरी मस्जिद में एक अवैध कब्जेदार हैं। ऐसे में हिन्दुओं के लिए अखिलेश की रामभक्ति तो प्रश्नों के घेरें में रहेगी ही, उनका तुष्टिकरण का वोट बैंक भी छिटक सकता है।    

तुष्टीकरण की जननी : जहाँ तक कांग्रेस का प्रश्न है, स्वतंत्रता के बाद उसका झुकाव एकतरफा रूप से अल्पसंख्यक राजनीति की ओर रहा। जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में हैदराबाद के सैन्य विलय (ऑपरेशन पोलो) में ढील देना, रज़ाकारों के संगठन मजलिस ए इत्तहादुल मुसलमीन  से प्रतिबंध हटाना और उसका भारतीयकरण करना  और केरल में मुस्लिम लीग से प्रतिबंध हटाना और उसका भारतीय कारण करके  उसके साथ चुनावी गठबंधन करना इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। हिंदू कोड बिल के जरिए बहुसंख्यकों को कानून में बांधना, पर मंदिरों के सरकारीकरण की नीति अपनाना और देश की पहली शिक्षा नीति की कमान भारतीय संस्कृति से अनभिज्ञ हाथों में सौंपनायह सब कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति की नींव थी। देश की प्राचीन शिक्षा पद्धति के गुरुकुल तंत्र को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया और भारतीय संस्कृति को और अधिक आघात पहुँचाने के लिए देश का पहला शिक्षा मंत्री एक ऐसे मुस्लिम नेता को बनाया जिसका जन्म भी भारत में नहीं हुआ था और जिसे  भारतीय रीति-रिवाज, संस्कृति व सभ्यता की कोई बुनियादी समझ नहीं थी। जिसका एकमात्र उद्देश्य भारत की पाठ्यपुस्तकों में वामपंथी और इस्लामी शिक्षा को बढ़ावा देना था। यही कारण है कि कांग्रेस के नेता आज भी बंद कमरों में बड़े शौक से कहते हैं कि वह मुसलमानों की पार्टी है।

2027 की चुनावी गणित और ध्रुवीकरण का डर :  इस अचानक उमड़े 'हिंदुत्व प्रेम' के पीछे गहरी चुनावी छटपटाहट है। आगामी विधानसभा चुनाव (विशेषकर उत्तर प्रदेश) और आगामी लोकसभा चुनाव विपक्ष के अस्तित्व की लड़ाई बन चुके हैं।

बदला हुआ सियासी समीकरण: असम, बिहार और बंगाल जैसे राज्यों के पिछले चुनावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल मुस्लिम मतों के सहारे अब चुनाव जीतना और सरकार बनाना संभव नहीं है। जब तक बहुसंख्यक हिंदू मतों में सेंध नहीं लगेगी, तब तक सत्ता की दहलीज तक पहुँचना नामुमकिन है।

उत्तर प्रदेश में मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच है। 2024 के लोकसभा चुनाव में 37 सीटें जीतकर उत्साहित अखिलेश यादव को पता है कि उनका पारंपरिक 'एम-वाय ' (मुस्लिम-यादव) फैक्टर पूर्ण बहुमत के लिए नाकाफी है। ब्राह्मण और ठाकुर जैसे सवर्ण मतदाता इस समय भाजपा के साथ मजबूती से खड़े हैं। ऐसे में अखिलेश जनता की पहली पसंद बनने के लिए एक विवादित शंकराचार्य की शरण में हैं, ताकि उनकी गो-यात्राओं के बहाने योगी आदित्यनाथ सरकार को घेरा जा सके।

यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि उत्तर प्रदेश सभी भाजपा शासित राज्यों में अकेला ऐसा राज्य है जहाँ गोवंश के वध पर पहले से ही बेहद कड़ा कानून लागू है और पूरी पाबंदी है। यह शंकराचार्य केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे विपक्षी शासित राज्यों में जाकर ऐसी कोई यात्रा नहीं करते, जहाँ खुलेआम गोवध होता। इस दोहरे मापदंड से आसानी से समझा जा सकता है कि शंकराचार्य की यह कथित गो-यात्रा वास्तविक न होकर राजनीतिक रूप से समाजवादी पार्टी को नैतिक समर्थन देने और योगी आदित्यनाथ की हिंदूवादी छवि को कमजोर करने के लिए ही प्रायोजित की गई है।

योगी की मजबूत पिच पर विपक्ष की बैटिंग : अखिलेश यादव और उनके सहयोगी दल जिस हिंदुत्व की पिच पर रन बनाने की कोशिश कर रहे हैं, उसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले 9 वर्षों में अपने कड़े प्रशासनिक निर्णयों, कानून-व्यवस्था और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से बेहद मजबूत कर दिया है। उत्तर प्रदेश गोवंश वध पर सबसे कड़े कानून वाले राज्यों में से एक है, इसलिए वहाँ गोवंश के नाम पर राजनीति करना बेअसर दिखता है।

भाजपा के पास इस पिच पर खेलने के लिए न केवल योगी आदित्यनाथ हैं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर हिमंत बिस्वा सरमा, सुवेंदु अधिकारी, पुष्कर धामी  और देवेंद्र फडणवीस जैसे धुरंधर भी मौजूद हैं। साथ ही, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की चुनावी बिसात इस पिच को और अभेद्य बनाती है।

भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सरकार बनाना साख का सवाल है और बेहद महत्वपूर्ण है। यदि भाजपा को यहाँ आशा के अनुरूप सफलता मिलती है, तो वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए केंद्र की सत्ता का उसका रास्ता बिल्कुल साफ हो जाएगा। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी अगर इस बार भी राज्य की सत्ता से दूर रह जाती है, तो वह न केवल राज्य में बल्कि देश की राजनीति में भी पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाएगी। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय रोज एक नई करवट ले रही है।

 लेकिन विपक्ष ने अनजाने में ही सही, भाजपा को वैचारिक मोर्चे पर एक बड़ी बढ़त दे दी है। हिंदुत्व की इस राजनीतिक पिच पर अखिलेश यादव और उनके सहयोगी कितनी सफल बैटिंग कर पाएंगे, यह तो समय बताएगा। लेकिन यदि यह दांव उलटा पड़ा, जिसकी संभावना बहुत ज्यादा है, तो अखिलेश यादव की राजनीतिक स्थिति बिहार के तेजस्वी यादव जैसी हो जाएगी, जो सत्ता की छटपटाहट में किनारे पर खड़े रह गए।

~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~

 

बांकीपुर और दतिया: मोदी और भाजपा के लिए सामान्य वर्ग का स्पष्ट संदेश

  बांकीपुर और दतिया: मोदी और भाजपा के लिए सामान्य वर्ग का स्पष्ट संदेश   जंतर-मंतर पर हुए विपक्षी दलों के नाटकीय और आक्रामक प्रदर्शन के संकट...