शनिवार, 17 अक्टूबर 2026

भारत में अराजकता और 2027 का महासंग्राम,

      भारत के विरुद्ध वैश्विक कुचक्र: 'डीप स्टेट' का प्रयोग, पनपती अराजकता और 2027 का महासंग्राम

                                                                     - शिव मिश्रा 

 

वर्तमान में भारत की राजधानी नई दिल्ली सुनियोजित आंदोलनों और अराजकता का प्रमुख केंद्र बन चुकी है। यद्यपि विरोध-प्रदर्शनों की यह आग देश के अन्य बड़े शहरों में भी सुलग रही है, लेकिन ये सभी शहर मुख्य रूप से भाजपा शासित राज्यों में स्थित हैं। यह महज कोई संयोग नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इस अराजकता का एकमात्र निशाना भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रवादी शक्तियां हैं, ताकि उन्हें किसी भी कीमत पर केंद्र की सत्ता से बेदखल किया जा सके। 'कॉकरोच जनता पार्टी' द्वारा शुरू किए गए इस आंदोलन की आड़ में कांग्रेस, अन्य विपक्षी दल और कई कुख्यात वामपंथी व कथित छात्र संगठन एक के बाद एक आंदोलनों की बाढ़ ला रहे हैं। इन सभी के सूत्रधार और रणनीतिकार एक ही प्रतीत होते हैं।

 

आज स्थिति यह हो गई है कि यदि विरोध का कोई वास्तविक मुद्दा न मिले, तो प्रतिबंधित जगहों पर तिरंगा फहराने की जिद को ही 'आंदोलन' का रूप दे दिया जाता है। 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने छात्रों के नाम पर आंदोलन शुरू किया, लेकिन देखते ही देखते मुख्य चुनाव आयुक्त और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर भी राष्ट्र-विरोधी विमर्श खड़ा कर दिया गया। इसी बीच, छात्रों की इस गूँज की आड़ में कांग्रेस किसी न किसी बहाने हिंदुत्व पर प्रहार करके और मुस्लिम तुष्टिकरण का कार्ड खेलकर नेहरु युग की उस कांग्रेस के रूप में पुनर्जीवित होने की जुगत में लगी है, जिसे सत्ता का पूर्ण एकाधिकार प्राप्त था। केरल में मुस्लिम समर्थन की बैसाखी पर बनी कांग्रेस की सरकार इस तुष्टिकरण की राजनीति का जीता-जागता प्रमाण है। सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि देश को अस्थिर करने वाले इन आंदोलनों के लिए विदेशी धन की बेतहाशा बौछार हो रही है, जो भारत की संप्रभुता के लिए सीधा खतरा है।

 

सरकार का ढुलमुल रवैया और पनपता जन-असंतोष

आम जनता जहाँ एक ओर विपक्ष और अराजक संगठनों की देश-विरोधी मानसिकता से आक्रोशित है, वहीं केंद्र सरकार की इस निष्क्रियता से भी अत्यंत असंतुष्ट है। समाज में अब यह भ्रम भी फैलने लगा है कि कहीं इन आंदोलनों से कोई परोक्ष चुनावी या राजनीतिक लाभ लेने के लिए स्वयं सत्तापक्ष ही तो इन्हें पनपने की मौन स्वीकृति नहीं दे रहा है?

 

'कॉकरोच' आंदोलन का सच और 'डीप स्टेट' का षड्यंत्र

इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में जाना आवश्यक है। 15 मई 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की 'कॉकरोच' संबंधी एक टिप्पणी से ही 'कॉकरोच जनता पार्टी' का जन्म हुआ—ऐसा समझना हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। वास्तविकता यह है कि विदेशी शक्तियों के निर्देश पर  'डीप स्टेट' भारत में उथल-पुथल और अराजकता मचाने की एक बड़ी योजना पर लंबे समय से काम कर रहा है। इसके लिए पूरा ढांचा पहले से ही तैयार था। एक गैर-सरकारी संगठन और गैर-राजनीतिक संस्था का मुखौटा पहनकर एक व्यापक राष्ट्रव्यापी आंदोलन की पृष्ठभूमि रची जा रही थी। जैसे ही मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी आई, रातों-रात करोड़ों फॉलोअर्स खड़े हो गए। यदि यह टिप्पणी न भी आती, तो यह संगठन कोई और बहाना ढूंढ लेता; इनका सड़क पर उतरना पूर्व-नियोजित था। लेकिन मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत आज भी पश्चाताप की मुद्रा में फैसले ले रहे हैं।   

 

इसके कार्यवाहक बने अमेरिका से लौटे अभिजीत दीपक, जो जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए सीधे अमेरिका से ही भारत आए थे। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए अनुमति तक नहीं ली गई थी, लेकिन सरकार के भीतर बैठे कुछ लोगों के हस्तक्षेप से यह अनुमति उन्हें मानो चांदी की प्लेट में सजाकर सौंप दी गई। शुरुआत में जनता और सरकार दोनों ने इसे कोई तवज्जो नहीं दी। इसके बाद लद्दाख में विदेशी धन से चलने वाले एक गैर-सरकारी संगठन के संचालक और सरकार के मुखर विरोधी सोनम वांगचुक इस प्रदर्शन में शामिल होकर आमरण अनशन पर बैठ गए। अंततः जब वांगचुक का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा, तो सरकार ने उन्हें उठाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया। यहां आंदोलन दम तोड़ चुका था, भीड़ छंट गई थी और पुलिस ने सारे तंबू-कनात उखाड़ फेंके थे। लेकिन जैसे ही अनशन टूटा, कुछ उपद्रवियों की भीड़ फिर जुटी और रातों-रात फिर से तंबू गाड़कर मंच सजा दिया गया।

 

यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है कि सरकार में बैठा वह कौन रणनीतिकार था जिसने पहले आंदोलन की अनुमति दी और फिर एक मृतप्राय आंदोलन को दोबारा खड़े होने की 'ऑक्सीजन' दी?

 

शिक्षा क्षेत्र की विफलताएं और विपक्ष का 'गिद्ध-विमर्श'

इस प्रशासनिक नाकामी का परिणाम यह हुआ कि 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों ने संसद तक एक बड़ा मार्च निकाला। भारी पुलिस बल प्रयोग हुआ और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग लिया गया। सरकार ने भी दबाव में आकर सहज भाव से मंत्री की बलि चढ़ा दी। यह केंद्र सरकार की एक बड़ी रणनीतिक भूल थी।

हालांकि, यूजीसी और बाद में नीट के मामले में शिक्षा मंत्रालय से एक 'हिमालयी भूल' अवश्य हुई थी। इस लापरवाही ने पूरे हिंदू समाज और युवा वर्ग में एक सामाजिक वितृष्णा पैदा कर दी। सरकार यदि चाहती तो संकट की शुरुआत में ही मंत्री से इस्तीफा लेकर इस मुद्दे को शांत कर सकती थी, लेकिन तब ऐसा नहीं किया गया। बाद में सड़क के दबाव में झुककर लिए गए इस इस्तीफे ने यह संदेश दे दिया कि सरकार को झुकाया जा सकता है।

 

भू-राजनीति: अमेरिका, डीप स्टेट और पड़ोस में सत्ता परिवर्तन

इस अराजकता के पीछे एक बड़ा वैश्विक षड्यंत्र काम कर रहा है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इस 'कॉकरोच' पार्टी को इसलिए पनपने दिया ताकि वह विपक्ष (खासकर कांग्रेस) के वोट बैंक को ध्वस्त  सके। लेकिन यह आकलन पूरी तरह गलत साबित हुआ।

 

एक शीर्ष अमेरिकी अधिकारी का यह बयान कि "अमेरिका ने चीन के मामले में जो गलती की है, वह भारत के मामले में नहीं दोहराएगा," इस मानसिकता को उजागर करता है। अमेरिका नहीं चाहता कि भारत एक स्वतंत्र और शक्तिशाली वैश्विक शक्ति बने। अमेरिका भारत को पाकिस्तान के साथ उलझाकर उसी धरातल पर खड़ा देखना चाहता है, ताकि भारत महज एक क्षेत्रीय विवादों में फंसा देश बनकर रह जाए। रूस से भारत की स्वतंत्र तेल खरीद और वेनेजुएला जैसे देशों के लिए अमेरिकी शर्तें इसी दबाव की कूटनीति का हिस्सा हैं।

 

भारत के पड़ोस पर नजर डालें— पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और हाल ही में बांग्लादेश— इन सभी देशों में 'डीप स्टेट' ने तख्तापलट या सत्ता परिवर्तन का सफल खेल खेला है। बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस को अमेरिका से लाकर अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया और काम खत्म होते ही वे वापस लौट गए। यह स्पष्ट दर्शाता है कि कठपुतलियां कहाँ से संचालित हो रही हैं।

 

भारत कोई छोटा देश नहीं है। यहाँ का लोकतांत्रिक और विकेंद्रीकृत ढांचा इतना मजबूत है कि सीधा तख्तापलट असंभव है। इसलिए विदेशी शक्तियों की रणनीति यह है कि यदि तख्तापलट न भी हो, तो केंद्र में एक ऐसी कमजोर, गठबंधन-मजबूर सरकार, जैसे यूपीए काल में थी, स्थापित कर दी जाए जो 10-15 साल तक कड़े फैसले न ले सके। यदि भारत इस चक्रव्यूह में फंसा, तो 2047 तक 'विकसित राष्ट्र' बनने का हमारा सपना एक सदी पीछे धकेल दिया जाएगा।

जिस 'डीप स्टेट' ने आम आदमी पार्टी के माध्यम से दिल्ली और पंजाब में जो जड़ें जमाई हैं, अब वही सूत्रधार 'कॉकरोच जनता पार्टी' का भी पोषण कर रहे हैं। कांग्रेस भी अब इस नए दल के साथ 'इंडिया' गठबंधन के तहत दोस्ती का हाथ बढ़ा रही है। सत्ता प्राप्ति की भूख ने इन सभी परस्पर विरोधी दलों को एक ही छतरी के नीचे ला खड़ा किया है।

 

उत्तर प्रदेश में 2027 का महासंग्राम और सवर्ण आक्रोश

2029 के लोकसभा चुनावों से पूर्व 2027 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने हैं। कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है। 80 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में जो जीतेगा, वही देश पर राज करेगा। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन राज्य में निराशाजनक रहा। 80 में से केवल 33 सीटें भाजपा को मिलीं, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन ने 43 सीटें जीतीं। यदि वोट शेयर को विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से देखा जाए, तो 'इंडिया' गठबंधन 224 सीटों पर आगे था और भाजपा केवल 174 पर। इसी आंकड़े ने विपक्ष में यह उम्मीद जगा दी है कि 2027 में वे सत्ता पा सकते हैं।

 

उत्तर प्रदेश की राजनीति गहराई से जातियों में विभाजित है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली, सख्त कानून-व्यवस्था और माफियाराज के अंत से जनता बेहद खुश है। लेकिन मतदान में तो जातिगत समीकरण हावी होंगे। इसके साथ ही, भाजपा के मूल मतदाता माने जाने वाले सवर्ण (विशेषकर ब्राह्मण), जो यूजीसी नियमन  और पार्टी की कथित उपेक्षा से आहत हैं, अब एक खामोश बगावत के मूड में हैं। तमाम दावों के बीच भी सवर्णों की यह नाराजगी भाजपा की सबसे बड़ी 'दुखती रग' बनी हुई है। यदि ये नाराज मतदाता विपक्षी गठबंधन को वोट न भी दे, और केवल मतदान के दिन घर बैठ जाए, तो भी भाजपा को ऐतिहासिक नुकसान उठाना पड़ेगा।

 

 लौह-इच्छा शक्ति की आवश्यकता

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस चुनौती को समझते हुए दिन-रात एक कर रहे हैं। यह वह समय है जब केंद्र सरकार और भाजपा के शीर्ष रणनीतिकार भी  अपने अहंकार और अपनी राजनीतिक तंद्रा से बाहर आयें । सड़कों पर देश की संप्रभुता को चुनौती दे रहे प्रदर्शनकारियों से ढुलमुल  तरीके से नहीं, बल्कि एक प्रभुसत्ता-संपन्न राष्ट्र की लौह-इच्छाशक्ति के साथ निपटना होगा। देश की राष्ट्रवादी जनता आज इन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ स्वयं खड़ी हो रही है। यह वह स्वर्णिम अवसर है जब सरकार को जनता के इस राष्ट्रप्रेम का सम्मान करते हुए अराजकता के इन तंबुओं को हमेशा के लिए उखाड़ फेंकना चाहिए। यदि अब भी देर की गई, तो उत्तर प्रदेश की सत्ता हाथ से फिसल सकती है, और यदि यूपी गिरा, तो दिल्ली का  किला ढहने से कोई नहीं रोक पाएगा।

             ~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~ 

 


शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026

नवरात्र 2026: आस्था, शक्ति, और समकालीन समाज में परिवर्तन का महापर्व



 नवरात्र 2026: आस्था, शक्ति, और समकालीन समाज में परिवर्तन का महापर्व

                                                            ~ शिव प्रकाश मिश्रा 

 

शरद ऋतु की हल्की ठंडक और वातावरण में गूंजती शंख, ढोल और मंत्रों की ध्वनियां इस बात का उद्घोष हैं कि शक्ति की उपासना का महापर्व—शारदीय नवरात्र—एक बार फिर हमारे द्वार पर है। वर्ष 2026 का यह नवरात्र केवल कैलेंडर में दर्ज नौ दिनों का एक कर्मकांड मात्र नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे संक्रमण काल में शक्ति की आराधना है, जहां मनुष्य को भौतिक प्रगति के साथ-साथ आत्मिक शांति और सामाजिक समरसता की सर्वाधिक आवश्यकता है। ‘नवरात्र’ दो शब्दों से मिलकर बना है— ‘नव’ (नौ या नया) और ‘रात्र’ (रात्रि)। रात्रि को विश्राम और कायाकल्प का प्रतीक माना जाता है। इसलिए नवरात्र शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा को नया जीवन देने का एक वैज्ञानिक और दैवीय अवसर है।

आज के इस विशेष लेख में हम नवरात्र के पौराणिक आख्यानों से लेकर आधुनिक अर्थव्यवस्था तक इसके व्यापक प्रभाव और उपयोगिता का विस्तृत मूल्यांकन करेंगे।

पौराणिक पृष्ठभूमि: अंधकार पर प्रकाश की शाश्वत विजय

नवरात्र की नींव इसके अत्यंत समृद्ध पौराणिक इतिहास पर टिकी है। मार्कण्डेय पुराण और देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) के अनुसार, जब महिषासुर नामक असुर का अत्याचार पृथ्वी और स्वर्ग दोनों स्थानों पर असहनीय हो गया और ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित कोई भी देवता उसे पराजित नहीं कर सका, तब सभी देवताओं ने अपने तेज़ को एक बिंदु पर केंद्रित किया। उस दिव्य तेज़ से माता दुर्गा (महिषासुरमर्दिनी) का प्राकट्य हुआ। देवी और महिषासुर के बीच नौ दिनों तक भयंकर युद्ध चला और दसवें दिन देवी ने असुर का वध कर दिया। यह कथा केवल एक युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि जब आसुरी प्रवृत्तियां (अहंकार, लालच, क्रोध) चरम पर होती हैं, तब सामूहिक चेतना और आंतरिक शक्ति (नारी शक्ति) ही उनका नाश कर सकती है।

एक अन्य प्रमुख पौराणिक मान्यता भगवान श्रीराम से जुड़ी है। लंका पर चढ़ाई करने और रावण जैसे महाज्ञानी परंतु अहंकारी राक्षस का वध करने से पूर्व, श्रीराम ने समुद्र तट पर नौ दिनों तक शक्ति की आराधना की थी। उन्होंने देवी का आह्वान कर विजय का आशीर्वाद प्राप्त किया, जिसके बाद दसवें दिन (विजयादशमी) रावण का वध हुआ। ये आख्यान हमें सिखाते हैं कि सत्य की स्थापना और बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए शक्ति का संचय और एकाग्रता अनिवार्य है।

धार्मिक स्वरूप: नौ दिनों की नौ शक्तियां और नवदुर्गा

धार्मिक दृष्टि से नवरात्र हिंदू धर्म के सबसे पवित्र और अनुशासित व्रतों में से एक है। इन नौ दिनों में आदिशक्ति के नौ अलग-अलग स्वरूपों—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री—की पूजा की जाती है।

हर स्वरूप मानव जीवन की एक विशेष अवस्था और गुण का प्रतीक है। उदाहरण के लिए, माता ब्रह्मचारिणी तप और त्याग की प्रतीक हैं, तो माता चंद्रघंटा वीरता और साहस की। माता कालरात्रि भयंकर से भयंकर संकटों का नाश करने वाली हैं, जबकि महागौरी और सिद्धिदात्री शांति, पवित्रता और पूर्णता का आशीर्वाद देती हैं।

घटस्थापना (कलश स्थापना) से शुरू होने वाला यह पर्व कन्या पूजन के साथ संपन्न होता है। छोटी कन्याओं को साक्षात देवी मानकर उनके चरण पखारना और उन्हें भोजन कराना केवल एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह धर्म के माध्यम से बालिकाओं को समाज में सर्वोच्च सम्मान देने की एक सुंदर प्रथा है। घर, परिवार तथा समाज के व्यापक हित में महिलाओं की शक्ति केंद्र के रूप सर्वोच्चता स्थापित करना है।  

आध्यात्मिक दर्शन: आत्म-मंथन और ऊर्जा का उर्ध्वगमन

आध्यात्मिक दृष्टिकोण से नवरात्र बाहरी कर्मकांडों से कहीं अधिक एक आंतरिक यात्रा है। योग और तंत्र शास्त्रों के अनुसार, मानव शरीर में सात प्रमुख चक्र - मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा तथा सहस्रार चक्र होते हैं। नवरात्र के नौ दिन कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करने और उसे मूलाधार चक्र (भौतिक इच्छाओं का केंद्र) से सहस्रार चक्र (परम चेतना का केंद्र) तक ले जाने का समय है। यह पर्व मानव के त्रिगुणों—तमस (आलस्य, अज्ञान), रजस (अति-सक्रियता, महत्वाकांक्षा) और सत्त्व (ज्ञान, पवित्रता, शांति)—के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया है। प्रथम तीन दिन तमस को नष्ट करने (महाकाली की आराधना), अगले तीन दिन रजस को सही दिशा देने (महालक्ष्मी की आराधना) और अंतिम तीन दिन सत्त्व गुण को प्राप्त करने (महासरस्वती की आराधना) के लिए होते हैं। व्रत और उपवास केवल भूखे रहना नहीं है, बल्कि यह 'उप' (समीप) और 'वास' (रहना)—अर्थात ईश्वर या अपनी मूल चेतना के समीप रहने की आध्यात्मिक विद्या है।

सामाजिक महत्त्व एवं मूल्यांकन: समरसता और नारी सशक्तिकरण

सामाजिक दृष्टि से नवरात्र भारत की विविधता में एकता का सबसे भव्य उदाहरण है। यह त्योहार उत्तर भारत में रामलीलाओं, गुजरात और महाराष्ट्र में गरबा और डांडिया, पश्चिम बंगाल में भव्य दुर्गा पूजा पंडालों, और दक्षिण भारत में बोम्मा कोलु (गुड़ियों की प्रदर्शनी) के रूप में मनाया जाता है।

नारी शक्ति का वास्तविक सम्मान:

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, जहां समाज एक ओर महिला सशक्तिकरण की बात करता है और दूसरी ओर महिलाओं के विरुद्ध अपराधों से जूझ रहा है, नवरात्र एक बहुत बड़ा सामाजिक संदेश देता है। जो समाज नौ दिनों तक स्त्री को 'शक्ति', 'बुद्धि' और 'धन' की अधिष्ठात्री मानकर पूजता है, उस समाज में महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान सर्वोच्च होना चाहिए। नवरात्र का सामाजिक मूल्यांकन इस बात की मांग करता है कि हम पंडालों की देवी के साथ-साथ घरों और समाज में विचरती जीवित देवियों (महिलाओं) के प्रति भी अपना दृष्टिकोण बदलें।

वर्ग-भेद का मिटना:

दुर्गा पूजा के पंडाल या गरबा के मैदान एक महान 'सोशल इक्वलाइज़र' (सामाजिक समानता लाने वाले) के रूप में कार्य करते हैं। पंडालों में प्रसाद ग्रहण करते समय या गरबा की ताल पर घूमते समय अमीर-गरीब, ऊंच-नीच या जाति-पाति का भेद मिट जाता है। समाज का हर वर्ग एक ही सामूहिक चेतना का हिस्सा बन जाता है, लेकिन सुनिश्चित करें कि इसका दुरुपयोग लव जिहाद जैसे कुकृत्यों के लिए न होने पाए।   

आर्थिक मूल्यांकन: 'त्योहारी अर्थव्यवस्था' का महायज्ञ

नवरात्र केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि 2026 के भारत में यह एक विशाल आर्थिक इंजन बन चुका है। नवरात्र से शुरू होने वाला त्योहारी काल, जो दिवाली तक चलता है, भारतीय अर्थव्यवस्था में खपत का सबसे बड़ा दौर होता है। सनातन धर्म के अधिकांश पर्व अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं। प्राचीन भारत में इसी अर्थव्यवस्था के कारण भारत का सकल घरेलू, विश्व अर्थव्यवस्था के एक तिहाई से भी अधिक था।       इसे मंदिर आधारित अर्थव्यवस्था या सनातन अर्थव्यवस्था कहना अनुचित नहीं होगा।    इसलिए यह समय अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।   

 

1. असंगठित क्षेत्र और कारीगरों को रोज़गार:

महीनों पहले से मूर्तिकारों, सजावट करने वालों, लाइट और साउंड वालों के लिए यह सबसे बड़ा रोज़गार सृजन का समय होता है। बांस, मिट्टी, कपड़े और पेंट के स्थानीय व्यापारियों से लेकर पंडाल बनाने वाले मज़दूरों तक, लाखों परिवारों की आजीविका नवरात्र पर निर्भर करती है।

2. परिधान, आभूषण और खुदरा बाज़ार:

गरबा और डांडिया नाइट्स ने एक पूरी 'पारंपरिक परिधान और आभूषण इंडस्ट्री' खड़ी कर दी है। इसके साथ ही, घर के सामान कपड़े, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और रियल एस्टेट सेक्टर में लोग नवरात्र के शुभ दिनों में खरीदारी करना पसंद करते हैं, जिससे बाज़ार में तरलता  बढ़ती है।

3.  तीर्थ पर्यटन, धार्मिक कार्यक्रम और अनुष्ठान :

वैष्णो देवी, विंध्याचल, कामाख्या और भारत के 51 शक्तिपीठों पर नवरात्र के दौरान पर्यटन अपने चरम पर होता है। इससे परिवहन, विमानन, होटल और आतिथ्य सत्कार  क्षेत्र में भारी राजस्व आता है।

4. कृषि और एफएमसीजी सेक्टर:

उपवास और फलाहार के कारण फल, दूध, कुट्टू, सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, और मखाने की मांग अचानक कई गुना बढ़ जाती है। इससे सीधे तौर पर किसानों और छोटे खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को आर्थिक लाभ पहुँचता है।

आर्थिक मूल्यांकन स्पष्ट करता है कि नवरात्र धन के विकेंद्रीकरण का एक उत्कृष्ट प्राकृतिक मॉडल है, जहाँ समाज के उच्च वर्ग का धन खरीददारी और चंदे के माध्यम से समाज के निचले और मेहनतकश वर्ग तक प्रवाहित होता है।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उपयोगिता :

वर्ष 2026 के इस तेज़, तकनीक-चालित और तनावग्रस्त युग में नवरात्र की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है।

मानसिक स्वास्थ्य और डिजिटल डिटॉक्स: आज की जीवनशैली में अवसाद (डिप्रेशन) और तनाव आम हो गए हैं। नवरात्र के नौ दिन भक्ति, संगीत और ध्यान के माध्यम से मन को शांत करने का प्राकृतिक 'एंटी-डिप्रेसेंट' हैं। यह डिजिटल दुनिया के शोर से कटकर अपनी जड़ों और अंतरात्मा से जुड़ने का समय है।

शारीरिक स्वास्थ्य और आयुर्वेद: ऋतु परिवर्तन (मानसून की समाप्ति और सर्दियों की शुरुआत) के समय शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) कम होती है। आयुर्वेद के अनुसार, इस समय सात्विक भोजन और उपवास शरीर को डिटॉक्स करने और पाचन तंत्र को आराम देने का सबसे वैज्ञानिक तरीका है, जिसे आज आधुनिक विज्ञान भी 'इंटरमिटेंट फास्टिंग' के रूप में मान्यता दे रहा है।

पर्यावरण के प्रति जागरूकता: 

वर्ष 2026 का शारदीय नवरात्र हमें इस बात का स्मरण कराता है कि भारतीय संस्कृति में त्योहार केवल अतीत को याद करने का माध्यम  नहीं हैं, बल्कि वे हमारे वर्तमान को सुधारने और भविष्य को दिशा देने के जीवंत माध्यम हैं। पौराणिक रूप से यह सत्य की विजय का उद्घोष है, धार्मिक और आध्यात्मिक रूप से यह चेतना के परिष्कार का मार्ग है, सामाजिक रूप से यह नारी सम्मान और समरसता का संकल्प है, और आर्थिक रूप से यह देश के विकास चक्र को गति देने वाला एक शक्तिशाली इंजन है।

आवश्यकता इस बात की है कि हम नवरात्र की इस विराट और बहुआयामी ऊर्जा को केवल नौ दिनों के उत्सव तक सीमित न रखें। जब हम देवी की आराधना से प्राप्त हुए अनुशासन, पवित्रता, महिला सम्मान और कर्मठता को अपने दैनिक जीवन के आचरण में स्थायी रूप से उतार लेंगे, तभी नवरात्र का वास्तविक और समग्र उद्देश्य सिद्ध होगा।

सत्य और शक्ति की इस अनवरत यात्रा में, यह नवरात्र हम सभी के लिए मंगलकारी हो।

~~~~~~~~~~~~  शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~

 

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

धरती से आसमान तक नफरत का साया: दुबई-इजराइल उड़ान की घटना


 
धरती से आसमान तक नफरत का साया: दुबई-इजराइल उड़ान की घटना और सभ्यतागत चुनौतियां
                                                          — शिव प्रकाश मिश्रा

 

आसमान को मानव सभ्यता ने सदा से भौगोलिक सीमाओं और संकीर्ण दीवारों से परे एक ऐसी दुनिया के रूप में देखा है, जहाँ देशों के बीच की दूरियां सिमट जाती हैं। जब सैकड़ों टन वजनी कोई विमान बादलों को चीरता हुआ उड़ान भरता है, तो उसमें सवार विभिन्न राष्ट्रीयताओं, संस्कृतियों, धर्मों और भाषाओं के लोग एक साझी पहचान में बंध जाते हैं— ‘सहयात्री’ होने की पहचान। उनकी एक ही सामूहिक अपेक्षा होती है: अपनी मंजिल तक सुरक्षित पहुँचना।  

 

परंतु ३० सितंबर २०२६ को दुबई से तेल अवीव जा रही ‘फ्लाईदुबई’ की उड़ान एफजेड-१०७३ के चालक-कक्ष (कॉकपिट) में जो कुछ घटा, उसने न केवल वैश्विक विमानन सुरक्षा व्यवस्था की रीढ़ को हिला दिया, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया कि धार्मिक उन्माद और वैचारिक विषवल्ली अब धरती की संकीर्ण गलियों से निकलकर ३३ हज़ार फीट ऊँचे खुले आसमान में भी मानव सभ्यता का पीछा कर रही है।

 

रोंगटे खड़े कर देने वाले पल: हवा में मौत से मुकाबला
विमान में १७४ से अधिक यात्री सवार थे, जिनमें अधिकांश इजराइली नागरिक थे। जब विमान ३३ 
हज़ार फीट की ऊँचाई पर संतुलन बनाए हुए था, तभी चालक-कक्ष के भीतर एक भयावह षड्यंत्र का पर्दाफाश हुआ। ओमान मूल के सह-चालक ने अचानक मुख्य कप्तान—भारतीय नागरिक स्मित मच्छार—पर धारदार चाकू से प्राणघातक हमला बोल दिया।

 

हमलावर सह-चालक का मंसूबा अत्यंत स्पष्ट था—ग्यारह सितंबर (नाइन-इलेवन) की तर्ज पर मुख्य विमानचालक को मारकर विमान का नियंत्रण अपने हाथ में लेना और उसे सामूहिक कब्रगाह में तब्दील कर देना। चालक-कक्ष के भीतर शुरू हुए इस खूनी संघर्ष के कारण अनियंत्रित हुआ विमान मात्र २९ सेकंड के भीतर लगभग १४,००० फीट नीचे आ गिरा। शून्य वायुदाब, तेजी से घटती ऊँचाई और शरीर से बहते खून के बीच यदि नियंत्रण-कक्ष में कोई दुर्बल मनोबल वाला व्यक्ति होता, तो परिणाम सैकड़ों चिताओं के रूप में सामने आता।

 

परंतु लहूलुहान और असहनीय पीड़ा से जूझते हुए भी भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार ने अदम्य साहस, संयम और अद्वितीय जीवटता का परिचय दिया। उन्होंने हमलावर का डटकर मुकाबला किया और अत्यंत विषम परिस्थितियों में चालक-कक्ष का सुरक्षित द्वार खोलने में सफलता पाई। द्वार खुलते ही विमान परिचारक दल और यात्रा कर रहे अन्य प्रशिक्षित चालक तुरंत सहायता के लिए अंदर दौड़े। हमलावर को काबू कर लिया गया और अंततः विमान को सऊदी अरब के तबुक हवाई अड्डे पर आपातकालीन परिस्थितियों में सुरक्षित उतार लिया गया। कैप्टन मच्छार की सूझबूझ और अदम्य कर्तव्यनिष्ठा ने लगभग एक सौ अस्सी निर्दोष जिंदगियों को मौत के जबड़े से खींच निकाला।

 

अंदरूनी खतरा और कूटनीतिक सुरक्षा चूक
पारंपरिक विमानन सुरक्षा का संपूर्ण ढांचा अब तक बाहरी खतरों पर केंद्रित रहा है—यात्रियों की तलाशी, सामान की छायाचित्र (एक्स-रे) जांच, धातु संसूचक (मेटल डिटेक्टर) और यात्री दीर्घा में हथियारों के प्रवेश को रोकना। किंतु इस घटना ने सुरक्षा तंत्र के सामने एक नया और अधिक खतरनाक रूप प्रस्तुत किया है—‘इनसाइडर थ्रेट’ यानी तंत्र के भीतर बैठे भेदी का खतरा। जब वह व्यक्ति ही विध्वंसक बन जाए जिसके हाथों में विमान का संचालन और सैकड़ों यात्रियों के जीवन की बागडोर सौंपी गई हो, तो धरती के सारे सुरक्षा उपकरण निरर्थक सिद्ध हो जाते हैं।

 

यह घटना केवल एक आपराधिक कृत्य नहीं, अपितु अंतरराष्ट्रीय उड्डयन नियमों और कूटनीतिक कार्यप्रणाली की एक अक्षम्य विफलता भी है:

 

 - सुरक्षा मंजूरी (क्लीयरेंस) पर प्रश्न: स्थापित नियमों और द्विपक्षीय संवेदनशीलता के अनुसार, इजराइल जाने वाले संवेदनशील मार्गों पर उन देशों के चालक दल के सदस्यों की तैनाती वर्जित या अत्यधिक नियंत्रित होनी चाहिए जिनके इजराइल के साथ सामान्य राजनयिक संबंध नहीं हैं।


 

-  प्रशासनिक शिथिलता: ओमान और इजराइल के बीच संबंधों की स्थिति जगजाहिर है। ऐसे में एक ओमानी नागरिक को तेल अवीव जाने वाले विमान में सह-चालक के रूप में नियुक्त किया जाना यह दर्शाता है कि व्यावसायिक विमान सेवा कंपनियों में पृष्ठभूमि सत्यापन (वेटिंग) की प्रक्रिया कितनी ढीली और सतही हो चुकी है।


पश्चिम एशिया की भू-राजनीति और वैचारिक कट्टरपंथ की जड़ें

दुबई-तेल अवीव उड़ान का अस्तित्व २०२० के ऐतिहासिक ‘अब्राहम समझौते’ की देन है, जिसने इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात के मध्य कूटनीतिक, व्यापारिक और पर्यटन के नए द्वार खोले थे। परंतु यह उड़ान जिस भौगोलिक आकाश से गुजरती है, वह नीचे गाजा संघर्ष, हमास के आतंकी हमलों, ईरान-इजराइल तनाव और फिलिस्तीन के अनसुलझे प्रश्नों से सुलग रहा है।


प्रारंभिक जांच और इजराइली नेतृत्व के बयानों से यह स्पष्ट हुआ है कि हमलावर सह-चालक गहन कट्टरपंथी इस्लामी विचारधारा से ग्रसित था। जब कोई विचारधारा अपने अनुयायियों के मन में यह जहर घोल देती है कि दूसरे विचार, धर्म या नस्ल के लोगों का संहार करना कोई पुण्य-कार्य या पवित्र कर्तव्य है, तब मानवीय संवेदना और पेशेवर निष्ठा समाप्त हो जाती है।


सुलगता परिदृश्य और सभ्यताओं का संघर्ष

७ अक्टूबर २०२३ को हमास द्वारा इजराइल पर किए गए नृशंस आतंकी हमले, नरसंहार और बंधक संकट के बाद से संपूर्ण मध्य पूर्व निरंतर युद्ध की ज्वाला में झुलस रहा है। गाजा, लेबनान, यमन और ईरान से जुड़े संघर्षों ने वैचारिक और धार्मिक ध्रुवीकरण को चरम पर पहुँचा दिया है। सोशल मीडिया और भूमिगत नेटवर्क के माध्यम से चलाए जा रहे विमर्श में कई बार आतंकवाद और नागरिक हत्याओं को वैचारिक आवरण पहनाकर सही ठहराने का कुत्सित प्रयास किया जाता है।


जब कोई विचारधारा अपने अनुयायियों को यह पाठ पढ़ाने लगती है कि किसी विशेष धर्म, जाति या नस्ल के लोगों का जीवन मूल्यहीन है, तब मानव मस्तिष्क से करुणा का लोप हो जाता है। इतिहास साक्षी है कि इसी मतांधता और असहिष्णुता के चलते दुनिया की कई समृद्ध प्राचीन संस्कृतियों और स्वतंत्र चिंतन का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया। आज यहूदी समाज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, तो दूसरी ओर भारत जैसी प्राचीन बहुलवादी सभ्यता भी सीमा पार से प्रायोजित धार्मिक जिहाद, कट्टरपंथ और जनसांख्यिकीय बदलाव की चुनौतियों से जूझती रही है। कट्टरपंथी तत्वों की दृष्टि में सभ्य, लोकतांत्रिक और मानवीय समाज हमेशा निशाने पर रहते हैं।


वैश्विक सभ्यताओं पर संकट: यहूदी और सनातन परंपरा के साझा सबक

मानव इतिहास की प्राचीनतम जीवंत संस्कृतियों में यहूदी और हिंदू (सनातन) परंपराएं अग्रणी रही हैं। विडंबना यह है कि इतिहास के विभिन्न कालखंडों में ये दोनों ही सभ्यताएं एकतरफा वैचारिक असहिष्णुता, मजहबी विस्तारवाद और नरसंहारों की शिकार रही हैं।


जहाँ इजराइल अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए चौतरफा चुनौतियों के बीच अडिग खड़ा है, वहीं भारत ने भी सदियों से बाहरी आक्रांताओं, धर्मांतरण के षड्यंत्रों, विभाजन की विभीषिका और सीमा-पार से संचालित छद्म युद्धों (जैसे 'गजवा-ए-हिंद' की परिकल्पना) का दंश झेला है।


भारत की आंतरिक राजनीति में अक्सर तुष्टिकरण और वोट-बैंक की विवशताएं इस खतरे की गंभीरता को धुंधला कर देती हैं। पश्चिमी एशिया की इस घटना ने भारत के नीति-निर्माताओं और समाज को स्पष्ट चेतावनी दी है कि वैचारिक कट्टरपंथ किसी सीमा या पेशे का संकोच नहीं करता; यदि समय रहते इसकी पहचान न की जाए, तो यह समाज के ताने-बाने को भीतर से खोखला कर देता है।


भारतीय पेशेवरता, धैर्य और सर्वोच्च मानवीय मूल्य

इस पूरे घटनाक्रम में कैप्टन स्मित मच्छार की भूमिका भारत के लिए केवल क्षणिक राष्ट्रीय गौरव का विषय नहीं है, बल्कि यह विदेशों में कार्यरत लाखों भारतीय पेशेवरों की कार्यसंस्कृति, नैतिक निष्ठा और मानसिक सुदृढ़ता का एक स्वर्णिम प्रमाण है।


चाहे चिकित्सा का क्षेत्र हो, सूचना प्रौद्योगिकी हो या अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन—भारतीय प्रतिभाएं संकट के समय अपने धैर्य, पेशेवर प्रशिक्षण और मानवीय मूल्यों के लिए जानी जाती हैं। जब चालक-कक्ष में स्वयं की साँसें उखड़ रही थीं, तब भी कैप्टन मच्छार ने 'यात्री रक्षा' को अपने जीवन से ऊपर रखा। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजराइल के नेतृत्व द्वारा उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि उस भारतीय जीवन-दृष्टि का सम्मान है जो 'वसुधैव कुटुम्बकम्' और 'परोपकाराय सतां विभूतयः' के आदर्शों पर पोषित होती है।


भारत के लिए बहुआयामी सबक: आंतरिक सतर्कता और विदेश नीति

भारत के लिए इस घटना के निहितार्थ गहरे और दूरगामी हैं:


- प्रवासियों की सुरक्षा और कूटनीतिक संतुलन: खाड़ी देशों में ९० लाख से अधिक भारतीय पेशेवर और कामगार कार्यरत हैं। पश्चिम एशिया की स्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए अपरिहार्य है। भारत के इजराइल के साथ रणनीतिक व तकनीकी संबंध हैं, तो अरब देशों के साथ ऐतिहासिक व आर्थिक साझेदारी। इस जटिल संतुलन के बीच विदेश में काम करने वाले भारतीयों की सुरक्षा और उनकी प्रतिष्ठा की रक्षा सर्वोपरि है।


- संवेदनशील बुनियादी ढाँचे में गहन निगरानी: भारत को अपने घरेलू नागरिक उड्डयन, परमाणु प्रतिष्ठानों, रेलवे और सामरिक नेटवर्क में 'आंतरिक घुसपैठ' के खतरे को हल्के में नहीं लेना चाहिए। केवल तकनीकी पृष्ठभूमि ही नहीं, बल्कि किसी भी तरह के कट्टरपंथी प्रभाव की समय-समय पर पहचान की व्यवस्था सुदृढ़ करनी होगी।


- तुष्टिकरण बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा: जब सुरक्षा और कानून के अनुपालन में किसी संप्रदाय या वर्ग के तुष्टिकरण की नीति अपनाई जाती है, तो राज्य की संप्रभुता और नागरिकों का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है। कानून का समान और कठोर अनुप्रयोग ही उग्रवाद की काट है।


भविष्य की सुरक्षा रणनीति - 

भारत को इस घटना को केवल विदेशी सरजमीं या पराये आकाश का वाकया मानकर भुला नहीं देना चाहिए। भारत स्वयं एक विशाल, विविध और संवेदनशील भू-भाग है। भारत के हित पश्चिम एशिया की स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और वहाँ रहने वाले करोड़ों प्रवासी भारतीयों से अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं।


इस घटना से मिलने वाले रणनीतिक सबक स्पष्ट हैं:


सतत मनोवैज्ञानिक एवं सुरक्षा जांच: संवेदनशील पदों—जैसे विमान चालक, वायु यातायात नियंत्रक (एटीसी), परमाणु और रक्षा प्रतिष्ठानों के अभियंताओं की पृष्ठभूमि जांच केवल नियुक्ति के समय न हो, बल्कि उनकी कार्यप्रणाली और डिजिटल व्यवहार का समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य होना चाहिए।

साइबर व वैचारिक कट्टरपंथ (रेडिकलाइजेशन) पर नियंत्रण: ऑनलाइन कट्टरपंथ की रोकथाम के लिए खुफिया तंत्र को तकनीकी रूप से और अधिक चुस्त बनाना होगा ताकि मस्तिष्कों में बोए जा रहे वैचारिक विष की समय रहते पहचान हो सके।

सभ्यतागत सतर्कता: किसी भी समुदाय के प्रति अंध-संदेह किए बिना, कानून का कठोर और समान अनुप्रयोग सुनिश्चित करना होगा ताकि धर्म या मजहब की आड़ में राष्ट्रविरोधी या विध्वंसक तत्वों को कोई राजनीतिक संरक्षण न मिल सके।


मानवता की रक्षा का संकल्प

आधुनिक रडार, उपग्रह दिशा-सूचक (जीपीएस) प्रणालियां और स्वतः चालन (ऑटो-पायलट) तकनीकें कितनी भी परिष्कृत क्यों न हो जाएं, अंततः किसी भी व्यवस्था की सुरक्षा उसके संचालक के मस्तिष्क और नीयत पर निर्भर करती है। यदि मन में नफरत का बारूद भरा हो, तो सबसे उन्नत तकनीक भी विनाश का अस्त्र बन जाती है।


दुबई-इजराइल उड़ान की इस घटना ने पूरी दुनिया को झकझोर कर यह संदेश दिया है कि वैचारिक आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई केवल सीमाओं पर तोपों और बंदूकों से नहीं लड़ी जा सकती। इसके लिए विवेक, सतर्कता, कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल और कैप्टन स्मित मच्छार जैसे अदम्य मानवीय साहस की आवश्यकता है। कट्टरपंथ रूपी इस नासूर का समूल उन्मूलन किए बिना न तो हमारी धरती सुरक्षित रह सकती है और न ही वह खुला आसमान, जो समस्त मानवता को एक सूत्र में पिरोने का सपना देखता है।

                     ~~~~~~~~~~~~  शिव मिश्रा ~~~~

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