बुधवार, 11 अगस्त 2010

सड़क पर ........

फुटपाथ पर लेटते हैं ,
हाथ का तकिया लगा कर ।
ओढ़ते अम्बर दिसम्बर में ,
अख़बार की रद्दी बिछा कर॥
सड़क पर ही दिन निकलता ,
रात भी होती सड़क पर ,
सड़क पर ही प्रसव होता ,
मौत भी होती वहीँ पर ।
अभावो में बाल लीला ,
टेकती घुटने सिमट कर॥
गलिया सुन बड़े होते ,
रो रहे होते सिसक कर ।
भूख होती प्यास होती ,
छत नहीं होती सिरों पर ॥
बाल दिवस हर वर्ष होता ,
जान नहीं पाते उम्र भर ॥
*****
शिव प्रकाश मिश्र

घूमने लगी हिन्दुत्व के इर्द-गिर्द भारत की राजनीति

   हिंदुत्व के इर्द-गिर्द घूमने लगी  भारतीय राजनीति भारतीय राजनीति इस समय एक अभूतपूर्व वैचारिक संक्रांति काल से गुजर रही है। दशकों तक धर्मनि...