तमिलनाडु की राजनीति में क्या बदला? सनातन पर गहराया बड़ा खतरा !
तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) के अध्यक्ष सी. जोसेफ़ विजय ने रविवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। इसके साथ ही राज्य में लगभग छह दशकों से जारी दो प्रमुख द्रविड़ दलों—डीएमके और एआईएडीएमके के बारी-बारी से सत्ता में आने का दौर समाप्त हो गया। मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने मंच पर ही तीन आदेशों पर हस्ताक्षर किए। इन आदेशों में हर घर को 200 यूनिट बिजली मुफ्त करना, नशे की समस्या से निपटने के लिए हर जिले में विशेष बल बनाना और महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक 'स्पेशल टास्क फोर्स' बनाना शामिल है।
आइए जानते हैं सी. जोसेफ़ विजय के राजनीतिक करियर के बारे में कि क्या उन्होंने यह करियर स्वयं चुना या उन्हें राजनीति में लाया गया।
विजय की राजनीतिक पार्टी का नाम 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (टीवीके) है और यह नाम डीएमके और एआईएडीएमके से मिलता-जुलता है। डीएमके का नाम 'द्रविड़ मुनेत्र कड़गम' है और एआईएडीएमके यानी 'अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम'। स्वतंत्रता के बाद लगभग 20 साल तक कांग्रेस की सरकार रही और उसके बाद डीएमके सत्ता में आई। 1977 में तमिल सिनेमा के मशहूर नायक एम.जी. रामचंद्रन ने डीएमके से अलग होकर अपनी नई पार्टी बनाई और उसका नाम एआईएडीएमके रखा। उसके बाद से पिछले लगभग 60 सालों से सत्ता का हस्तांतरण डीएमके और एआईएडीएमके के बीच ही होता रहा है।
'द्रविड़ मुनेत्र कड़गम' के नाम से ऐसा लगता है कि यह कोई स्थानीय पार्टी है जो द्रविड़ भावनाओं को आधार बनाकर रखी गई है, लेकिन ऐसा केवल ऊपरी तौर पर देखने से लगता है। वास्तव में, 1944 में ई.वी. रामास्वामी 'पेरियार' द्वारा जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर 'द्रविड़ कड़गम' रखा गया था, इसलिए पेरियार को इस पार्टी का संस्थापक नहीं कहा जा सकता। जस्टिस पार्टी की स्थापना 1916 में अंग्रेजों के इशारे पर टी.एम. नायर, पी. त्यागराज चेट्टी और सी. नटेसा मुदलियार ने की थी।
अंग्रेजों ने देखा कि उत्तर भारत में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा सनातन धर्म को अत्यधिक नुकसान पहुँचाया जा चुका है, मंदिरों को क्षति पहुँचाई गई है और डरे-सहमे हिंदू मंदिर जाने से घबराते हैं। प्रथम दृष्टया देखने से ऐसा लगता है कि शायद हिंदुत्व की धार कुंद हो गई है; इसके विपरीत दक्षिण भारत, और खासतौर से तमिलनाडु में, हिंदुत्व की प्रबल धारा बह रही थी। सनातन का तत्कालीन महत्वपूर्ण केंद्र तमिलनाडु ही था। पूरे प्रदेश में मंदिरों की अत्यधिक संख्या थी, जिनमें धर्म-कर्म के अलावा संस्कृत और सनातनी गतिविधियाँ होती थीं। ये मंदिर संगीत, नृत्य तथा अन्य शिल्पों के केंद्र बने हुए थे और सही अर्थ में देखा जाए तो ये भारत की अर्थव्यवस्था की धुरी थे।
आपको ज्ञात होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा भारत की जीडीपी पर करवाए गए शोध से पता चला कि पहली शताब्दी से लेकर 11वीं शताब्दी तक भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में सबसे बड़ी थी और उसका हिस्सा एक-तिहाई था। 17वीं शताब्दी तक भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में नंबर एक बनी रही और इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण 'मंदिर आधारित अर्थव्यवस्था' थी। अंग्रेजों के शासनकाल में यह लगातार गिरती रही और जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा, उस समय भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में केवल 3% के आसपास बची थी।
अंग्रेज चाहते थे कि जो काम मुस्लिम आक्रांताओं ने उत्तर, पूर्व और पश्चिम भारत में किया, वैसा ही कुछ दक्षिण भारत में भी किया जाए ताकि हिंदुत्व को नुकसान पहुँचाया जा सके और मिशनरियों को धर्मांतरण के लिए अच्छा सुअवसर उपलब्ध हो सके। उनके अनुसार वर्तमान व्यवस्था 'ब्राह्मणवादी' थी जो उनके मार्ग में बाधक थी, इसलिए उससे छुटकारा पाने के लिए एक पार्टी की आवश्यकता थी जिसका नाम 'जस्टिस पार्टी' रखा गया। घोषित तौर पर इसका उद्देश्य गैर-ब्राह्मणों के लिए शिक्षा, नौकरियों और राजनीति में उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना था, ताकि 'ब्राह्मण मुक्त' या 'ब्राह्मण विरोधी' हिंदू समाज में धर्मांतरण का काम आसानी से हो सके।
1919 के 'मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों' के बाद 1920 के पहले चुनावों में जस्टिस पार्टी ने भारी जीत हासिल की और मद्रास प्रेसीडेंसी में सरकार बनाई। इस सरकार के बनते ही पूरे मद्रास प्रेसीडेंसी में जातिगत विभेद की भयानकता बढ़ गई और ब्राह्मणों के विरुद्ध उग्र आंदोलन शुरू हो गए। इस प्रकार विभाजित हिंदू समुदाय में मिशनरियों ने अपनी जड़ें जमाईं और धर्मांतरण का काम धड़ल्ले से शुरू हो गया। चूँकि धर्मांतरण के कार्य में ब्राह्मण बड़ी रुकावट थे, इसलिए हिंदुओं में जातिगत खाई चौड़ी करने के लिए गैर-ब्राह्मणों हेतु आरक्षण की शुरुआत की गई। साथ ही, सनातन धर्म का अपमान करने के लिए देवी-देवताओं को गालियाँ देने से लेकर भ्रामक साहित्य तैयार करने का काम सरकारी संरक्षण में होने लगा।
1921 और 1922 में 'सांप्रदायिक सरकारी आदेश' पारित किए गए, जिससे नौकरियों में आरक्षण की नींव पड़ी और सामाजिक अव्यवस्था शुरू हो गई। हिंदू समाज में मंदिरों के प्रभाव को कम करने और गैर-ब्राह्मणों को मंदिरों से दूर ले जाने के लिए, मंदिर प्रशासन में सुधार के नाम पर 'हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम' (1926) पारित किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य सनातन चेतना की धुरी रहे मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित करना था, ताकि समाज सेवा से जुड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास प्रवाह को रोका जा सके।
इससे हिंदू समाज में जाति-पाति की खाई इतनी चौड़ी हो गई कि पूरा समाज विभाजित हो गया, जिसकी भरपाई आज तक नहीं हो पाई है और तमिलनाडु आज भी इससे बुरी तरह संकटग्रस्त है। 1930 के दशक के मध्य तक जस्टिस पार्टी की लोकप्रियता कम होने लगी। 1937 के चुनावों में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने जस्टिस पार्टी को बुरी तरह हरा दिया। 1944 में ई.वी. रामास्वामी 'पेरियार' ने जस्टिस पार्टी की कमान संभाली और इसका नाम बदलकर 'द्रविड़ कड़गम' (डीके) कर दिया।
अंग्रेजों के इशारे पर पेरियार ने अपनी पार्टी को सामाजिक सुधार आंदोलन के नाम पर सनातन धर्म के विरुद्ध विष-वमन करते हुए हिंदू समाज को टुकड़ों-टुकड़ों में बाँटने की नीति पर अमल शुरू कर दिया। वास्तव में इस सब की आड़ में ईसाई मिशनरी तेजी से धर्मांतरण कर रहे थे और किसी को इसकी भनक भी नहीं लग रही थी, क्योंकि हिंदू अपने जातिगत झगड़ों में ही उलझे हुए थे।
आजादी के बाद यद्यपि कांग्रेस सत्ता में आ गई, लेकिन उसने भी हिंदू समाज में हो रहे इस षड्यंत्र के प्रति आँखें बंद कर लीं और 20 साल तक शासन किया। इस दौरान मिशनरी बिना रोक-टोक के चुपचाप धर्मांतरण का काम करते रहे। बाद में मुस्लिम कट्टरपंथी भी इसी कार्य में लग गए। 1967 में सी.एन. अन्नादुरई के नेतृत्व में डीएमके ने पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई। उनके बाद एम. करुणानिधि ने कमान संभाली। ब्राह्मण विरोध के नाम पर सनातन धर्म का विरोध करना इस पार्टी को विरासत में मिला था और करुणानिधि ने इस काम को बखूबी अंजाम दिया।
इसके बाद एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) ने डीएमके से अलग होकर एआईएडीएमके बनाई और 1977 में मुख्यमंत्री बने। 1987 में उनके निधन तक वे सत्ता में रहे। इसके बाद से राज्य में सत्ता हर पांच साल में डीएमके और एआईएडीएमके के बीच बदलती रही। दोनों ही पार्टियों में जस्टिस पार्टी के सनातन विरोधी दुर्गुण मौजूद थे। कालांतर में डीएमके स्वयं को प्रखर हिंदू विरोधी सिद्ध करती रही, जबकि एआईएडीएमके ने थोड़ा लचीला रुख अपनाया। दोनों पार्टियाँ राष्ट्रीय स्तर पर उपस्थिति दर्ज करने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन करती रहीं और दक्षिणपंथी जनसंघ या भाजपा से उचित दूरी बनाए रखी।
केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद दक्षिण में उसकी स्वीकार्यता कुछ हद तक बढ़ी और तमिलनाडु की दोनों पार्टियों ने कभी न कभी भाजपा की केंद्र सरकार को समर्थन दिया। डीएमके की कार्यप्रणाली में बदलाव यह आया कि उन्होंने मुस्लिम कट्टरपंथियों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। स्टालिन के सत्ता में आने के बाद स्वयं स्टालिन और उनके पुत्र उदयनिधि सनातन धर्म के विरुद्ध विष-वमन करते रहे और उसे डेंगू, मलेरिया, कोरोना जैसी महामारी बताने से गुरेज नहीं किया। हाल ही में स्टालिन सरकार ने एक मंदिर में 'दीपथून' यानी दीप प्रज्वलन की परंपरा को बंद कर दिया। उच्च न्यायालय के निर्देश के बावजूद उन्होंने इसका पालन नहीं किया और सुप्रीम कोर्ट तक गए, लेकिन दीप प्रज्वलन नहीं होने दिया। इस प्रकार उन्होंने स्वयं को सनातन विरोधी सिद्ध कर दिया, जिससे हिंदू संगठन सतर्क और सक्रिय हो गए।
ऐसा करते समय अनजाने में डीएमके ने ईसाई मिशनरियों को भी नाराज कर दिया, जो पहले ही डीएमके की 'प्रो-मुस्लिम' नीतियों से रुष्ट थे। मिशनरी धर्मांतरण का काम बहुत शांति से करते हैं ताकि बहुसंख्यक समाज इसके विरुद्ध आंदोलित न हो। स्टालिन और उदयनिधि की हरकतों से हिंदू समाज में जो हलचल हुई, उससे मिशनरियों के काम में व्यवधान उत्पन्न हुआ। मिशनरी अब डीएमके को और बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थे, इसलिए उनके इशारे पर विजय ने 2 फरवरी 2024 को 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (टीवीके) के गठन की घोषणा की।
विजय ने अपनी पार्टी की विचारधारा को "धर्मनिरपेक्ष सामाजिक न्याय" बताया है। उन्होंने पेरियार, बी.आर. अंबेडकर और के. कामराज को अपना प्रेरणा स्रोत बताया। ईसाई मिशनरियों ने उनका जमकर साथ दिया और कहा जाता है कि उन्हें विदेशी सहायता भी प्राप्त हुई। 2026 के चुनावों में कांग्रेस और राहुल गांधी विजय के साथ गठबंधन करना चाहते थे, लेकिन सोनिया गांधी अपनी नीति पर चलते हुए डीएमके के साथ डटी रहीं।
लेकिन बाजी पलट गई। विजय की पार्टी टीवीके को 108 सीटें मिलीं। 234 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 117 विधायकों की आवश्यकता थी। विजय ने राज्यपाल से मिलकर दावा पेश किया। जब समर्थन की समस्या आई, तो मिशनरियों के निर्देश पर सोनिया गांधी ने (जो पहले गठबंधन नहीं चाहती थीं) विजय को समर्थन देने की घोषणा करवा दी। हालांकि, संख्या बल के अभाव में शुरुआत में राज्यपाल ने निमंत्रण देने से इनकार कर दिया। कांग्रेस के इस कदम को स्टालिन ने 'पीठ में छुरा घोंपना' बताया।
अंततः मिशनरियों ने स्टालिन को समझाया कि यदि भाजपा सरकार ने राष्ट्रपति शासन लगाया, तो सनातन के विरुद्ध टिप्पणियों और न्यायालय की अवमानना के मामले में उनका जेल जाना निश्चित है। घबराकर स्टालिन ने अपने सहयोगियों (सीपीएम, सीपीआई, मुस्लिम लीग और वीसीके) को विजय के समर्थन के लिए राजी किया। इस प्रकार तमाम मोल-भाव के बाद विजय के पास 121 विधायकों का समर्थन हो गया और जोसेफ़ विजय तमिलनाडु के पहले ईसाई मुख्यमंत्री बन गए।
अब ईसाई मिशनरी अपना काम खुलकर कर सकेंगे, जैसा उन्होंने आंध्र प्रदेश में रेड्डी परिवार के कार्यकाल में किया था। एक विशेष बात जो मिशनरियों को अलग करती है, वह यह है कि वे 'लव जिहाद' के बजाय ईसाई लड़कियों को हिंदू परिवारों में बहू बनाकर भेजते हैं और बाद में पूरे परिवार का धर्मांतरण करा लेते हैं। इसके कई राजनीतिक उदाहरण जैसे रेड्डी परिवार, सोनिया गांधी का आगमन, और अन्य चर्चित विवाहों में देखे जा सकते हैं।
इससे स्पष्ट है कि राजनीति केवल सत्ता पाने का खेल नहीं है, इसका प्रभाव अत्यंत व्यापक होता है। इसलिए हमेशा सोते रहने वाले हिंदुओं को सावधान हो जाना चाहिए। सनातन गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है और यह असावधानी इसकी उद्गम भूमि पर ही इसके विलुप्त होने का कारण बन सकती है।
