रायबरेली और अमेठी में राहुल ने निकाली भड़ास || मर्यादविहीन राजनीति, दिशाहीन आक्रोश में तड़प तड़प कर मरती काँग्रेस || कांग्रेस का भविष्य
1. शब्दों का अवमूल्यन और 'राहु' बने राहुल :-
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में वैचारिक मतभेदों के बावजूद शीर्ष नेताओं के बीच परस्पर सम्मान और भाषाई शुचिता की एक गौरवशाली परंपरा रही है। अटल बिहारी वाजपेयी और जवाहरलाल नेहरू से लेकर समकालीन राजनीति तक, कड़वे से कड़वे विरोध को भी संसदीय मर्यादा के दायरे में || व्यक्त किया जाता रहा है। किंतु, हालिया वर्षों में भारतीय राजनीति के भाषाई स्तर में जो गिरावट आई है, उसने इस गौरवशाली इतिहास को झकझोर कर रख दिया है। वर्तमान परिदृश्य को देखकर ऐसा प्रतीत होने लगा है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की अनियंत्रित बयानबाजी और आक्रामक शैली स्वयं कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार के लिए राजनीतिक ‘राहु’ की भूमिका निभा रही है।
राजनीति में आलोचना का स्वागत है, और एक मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की अनिवार्य आवश्यकता है, परंतु जब आलोचना का स्थान व्यक्तिगत कुंठा, अभद्र शब्दावली और गाली-गलौज ले ले, तो वह विमर्श न रहकर आत्मघाती कदम बन जाता है। राहुल गांधी के हालिया बयानों और उनकी भाव-भंगिमाओं ने एक बार फिर यह साबित किया है कि वे राजनीतिक परिपक्वता और संसदीय शिष्टाचार के बुनियादी सिद्धांतों से अब भी कोसों दूर हैं।
2. अमेठी और रायबरेली का मंच: मर्यादा की सभी सीमाएं लांघता नेतृत्व :-
हाल ही में अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली में आयोजित ‘बहुजन स्वाभिमान जनसभा’ को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने जिस प्रकार देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के प्रति अत्यंत अपमानजनक और अमर्यादित टिप्पणियां कीं, उसने लोकतांत्रिक संवाद को एक नए निचले स्तर पर धकेल दिया है। जनसभा में उपस्थित जनता को उकसाते हुए उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा:
"जब आप अपने घर पहुंचें और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के लोग आपके पास आकर नरेंद्र मोदी, अमित शाह और भाजपा की बात करें, तो उनसे साफ कहना कि आपका प्रधानमंत्री गद्दार है, आपका गृहमंत्री गद्दार है और आपका संगठन गद्दार है। इन्होंने देश को बेचने और संविधान को नष्ट करने का कुत्सित कार्य किया है।"
एक जिम्मेदार राष्ट्रीय दल के शीर्ष नेता और संवैधानिक पद (नेता प्रतिपक्ष) पर बैठे व्यक्ति के मुख से देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के लिए ‘गद्दार’ जैसे संगीन शब्द का प्रयोग न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी चोट करता है। इसके बाद, अपने पूर्व संसदीय क्षेत्र अमेठी में—जहाँ से उन्हें वर्ष 2019 में स्मृति ईरानी के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था—उसी तीखे तेवर, आक्रामक भाव-भंगिमा और हठधर्मिता को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि इन लोगों ने देश के महापुरुषों और जनता के साथ गद्दारी की है, इसलिए वे इन्हें 'गद्दार' ही कहेंगे और इसके लिए किसी भी कीमत पर माफी नहीं मांगेंगे।
इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर बेहद सतही और व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि जब देश में गैस, पेट्रोल और रोजगार का संकट है, तब प्रधानमंत्री इटली में मेलोनी के साथ 'मेलोडी' खा रहे हैं। अपनी उम्र और अनुभव में खुद से लगभग दो दशक बड़े, देश के तीन बार निर्वाचित प्रधानमंत्री के लिए "मोदी रोएगा", "पिटेगा" और "गिड़गिड़ाएगा" जैसी मवालिया छाप भाषा का प्रयोग करना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। ऐसी भाषा की अपेक्षा एक हाई स्कूल अनुत्तीर्ण छात्र से भी नहीं की जा सकती। यह आचरण किसी जमाने में बड़े जमींदार या रसूखदार घरों के बिगड़े हुए बच्चों की याद दिलाता है, जो अपनी असफलता के झुंझलाहट में बड़ों का आदर भूल जाते हैं। आज के आधुनिक परिवेश में एक अनपढ़ व्यक्ति भी सार्वजनिक रूप से ऐसी भाषा बोलने से कतराता है, लेकिन राहुल गांधी अपनी इन अमर्यादित टिप्पणियों को बार-बार दोहराकर ऐसा प्रदर्शित करते हैं मानो वे कोई महान और बहादुरी का ऐतिहासिक कार्य कर रहे हों।
3. निरंतर दोहराई जाती रणनीतिक भूलों का इतिहास :-
राहुल गांधी के लिए इस प्रकार की 'सिर-पैर विहीन' और आत्मघाती बयानबाजी कोई नई बात नहीं है। यदि उनके दो दशकों के राजनीतिक जीवन का अवलोकन किया जाए, तो यह साफ दिखाई देता है कि वे 'आलोचना' और 'ओछी गाली-गलौज' के बीच के महीन अंतर को कभी समझ ही नहीं पाए। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने देश भर में "चौकीदार चोर है" का नारा उछाला था। देश की जनता ने इसे प्रधानमंत्री के प्रति व्यक्तिगत द्वेष माना और अंततोगत्वा यह नारा कांग्रेस की ऐतिहासिक और करारी हार का मुख्य कारण बना। देश की संप्रभुता और सुरक्षा के संवेदनशील मुद्दों पर भी उनका रवैया बेहद गैर-जिम्मेदाराना रहा है। पुलवामा के कायरतापूर्ण आतंकी हमले और उसके बाद भारतीय वायुसेना की जांबाज सर्जिकल स्ट्राइक पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री पर सैनिकों के "खून की दलाली" करने का संगीन आरोप लगाया था। इस बयान ने न केवल देश की सेना के मनोबल पर चोट की, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत के विरोधियों को एक मुद्दा थमा दिया। लोकसभा के पटल पर खड़े होकर उन्होंने अत्यंत गैर-संसदीय भाषा में कहा था कि "युवा नरेंद्र मोदी को डंडे से पीटेंगे।" एक लोकतांत्रिक संसद के भीतर ऐसी हिंसक और अमर्यादित भाषा का प्रयोग स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास के काले पन्नों में दर्ज है।
राहुल गांधी की यह अलोकतांत्रिक और हठधर्मी मानसिकता केवल विपक्ष में रहते हुए ही नहीं दिखाई दी, बल्कि 2004 से 2014 के यूपीए शासनकाल के दौरान भी उनका आचरण हमेशा विवादों और संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन के घेरे में रहा। भारतीय संसदीय इतिहास का वह काला दिन कोई नहीं भूल सकता, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह विदेश दौरे पर थे और उनकी कैबिनेट द्वारा सर्वसम्मति से पारित एक अध्यादेश को राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सरेआम फाड़कर रद्दी की टोकरी में फेंक दिया था। यह कृत्य न केवल अपनी ही सरकार के प्रधानमंत्री और कैबिनेट का अपमान था, बल्कि देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं के मुंह पर एक करारा तमाचा था।
4. 2014 का युगांतकारी परिवर्तन और कांग्रेस की हताशा :-
2004 से 2014 तक का वह दशक भारतीय इतिहास में अभूतपूर्व भ्रष्टाचार (2G, कोयला, कॉमनवेल्थ घोटाला), भाई-भतीजावाद, नीतिगत पंगुता, चरमपंथी तुष्टिकरण और बहुसंख्यक समाज के प्रति उपेक्षा के लिए जाना जाता है। इसी जन-आक्रोश के परिणामस्वरूप वर्ष 2014 में देश की जनता ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड और पूर्ण बहुमत देकर सत्ता की चाबी सौंपी।
यह भारतीय राजनीति में एक युगांतकारी परिवर्तन था। भाजपा ने 30 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद देश में एक पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई—एक ऐसा कीर्तिमान जो स्वयं कांग्रेस पार्टी 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति की प्रचंड लहर के बाद कभी अपने दम पर हासिल नहीं कर पाई थी।
यह सच है कि कोई भी सरकार शत-प्रतिशत जन-अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकती, और भाजपा सरकार की भी अपनी सीमाएं रही होंगी, परंतु उसने देश की जनता को निराश नहीं किया। यही कारण है कि देश के राजनैतिक मानचित्र पर भाजपा का निरंतर विस्तार हो रहा है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ कभी भाजपा का वजूद न के बराबर था, वहाँ भाजपा का एक सशक्त विकल्प के रूप में उभरना और दशकों तक शासन करने वाली कांग्रेस का पूरी तरह से समाप्त हो जाना इसका सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण है।
अब परिस्थितियां ऐसी हो चुकी हैं कि कांग्रेस अपने बलबूते पर केंद्र की सत्ता में वापसी कर पाए, इसकी दूर-दूर तक कोई संभावना नजर नहीं आती। इसी ऐतिहासिक विफलता, पराजय और हाशिए पर चले जाने के कारण राहुल गांधी गहरे अवसाद, हताशा और निराशा से घिर चुके हैं। हालांकि, कांग्रेस को इस दयनीय स्थिति में पहुंचाने के लिए स्वयं उनकी नीतियां और अपरिपक्व नेतृत्व ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। राहुल गांधी को लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गगनचुंबी लोकप्रियता को वे गाली देकर, कीचड़ उछालकर या अभद्र भाषा का प्रयोग करके कम कर सकते हैं, तो यह उनकी भारी राजनीतिक भूल और गलतफहमी है। भारत की समझदार और जागरूक जनता इस प्रकार की मूर्खतापूर्ण और अमर्यादित भाषा को कभी स्वीकार नहीं करती, बल्कि इससे पीड़ित नेता के प्रति सहानुभूति और लोकप्रियता और अधिक बढ़ जाती है।
5. राजनैतिक हैसियत और तुष्टिकरण की शरणस्थली :-
अपनी इसी अहंकार और अपरिपक्वता की राजनीति के कारण राहुल गांधी को अपनी पारंपरिक पारिवारिक सीट अमेठी तक गंवानी पड़ी। विडंबना देखिए कि उन्हें अपनी वास्तविक राजनीतिक हैसियत और मोदी लहर की ताकत का अंदाजा तब भी नहीं हुआ। उत्तर भारत से पूरी तरह नकार दिए जाने के बाद, उन्हें संसद पहुंचने के लिए देश के सुदूर दक्षिण में केरल की मुस्लिम बहुल सीट वायनाड का रुख करना पड़ा। वे वायनाड से लोकसभा केवल इसलिए पहुंच सके क्योंकि वहाँ 'मुस्लिम लीग' और उसके कैडर का उन्हें एकतरफा और पूर्ण समर्थन प्राप्त था। एक राष्ट्रीय दल के शीर्ष नेता का संसद पहुंचने के लिए क्षेत्रीय और सांप्रदायिक ताकतों के बैसाखी पर निर्भर होना उनकी राजनीतिक लाचारी को बयां करता है।
इतना ही नहीं, राहुल गांधी की इस ऊलजुलूल और ध्यान भटकाने वाली बयानबाजी के कारण वर्तमान वैश्विक परिदृश्य (ईरान-इजरायल तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका की आर्थिक चुनौतियां) के बीच भारत के समक्ष उत्पन्न होने वाले वास्तविक आर्थिक मुद्दों की गंभीर चर्चा ही गौण हो जाती है। वे देश की आर्थिक प्रणाली को बेचने का बेतुका आरोप लगाते हुए कहते हैं कि "मोदी ने हिंदुस्तान का पूरा आर्थिक सिस्टम अडानी, अंबानी और अमेरिका को सौंप दिया है।"
वे देश के सामने एक कृत्रिम 'आर्थिक तूफान' और मंदी का खौफ पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, और दावा कर रहे हैं कि आने वाले महीनों में पेट्रोल, डीजल और दाल-चावल के दाम इस कदर बढ़ेंगे कि देश एक बड़े झटके से दहल उठेगा। वे हर आर्थिक नीति को क्रोनी कैपिटलिज्म के चश्मे से देखते हैं। हर मंच से वे जीएसटी, नोटबंदी और कोविड लॉकडाउन के पुराने राग अलापते रहते हैं, जिन्हें देश की जनता पहले ही चुनावों के जरिए खारिज कर चुकी है। उनके पास देश के विकास के लिए कोई वैकल्पिक विज़न या ठोस ब्लूप्रिंट नहीं है, बल्कि वही घिसे-पिटे मुद्दे हैं जिन्हें वे अपने प्रायोजित विदेशी दौरों में भी दोहराते हैं, और कई बार तो इस प्रक्रिया में वे अनजाने में देश-विरोधी ताकतों की भाषा बोलते हुए दिखाई देते हैं।
6. विदेशी दौरों का रहस्य और संबित पात्रा का बड़ा खुलासा
जहाँ एक तरफ राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आधिकारिक और रणनीतिक विदेश यात्राओं पर सवाल उठाते हैं, वहीं देश की जनता यह भली-भांति जानती है कि पीएम मोदी की यात्राएं व्यक्तिगत मनोरंजन या पर्यटन के लिए नहीं होतीं। उनकी यात्राओं का उद्देश्य भारत की अर्थव्यवस्था, द्विपक्षीय व्यापार, रक्षा सौदों और वैश्विक मंच पर भारत के भू-राजनीतिक महत्व को बढ़ाना होता है।
इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से एक सनसनीखेज और विस्तृत ब्योरा जारी किया है, कि राहुल गांधी ने अपने पिछले 22 वर्ष के राजनीतिक जीवन में 54 घोषित विदेशी यात्राएं की हैं जिन पर 60 करोड रुपए से भी अधिक का खर्च आया है लेकिन उनकी यह यात्राएं ना तो पार्टी ने फंड की हैं और राहुल गांधी की व्यक्तिगत आय भी इतनी नहीं है। इसका इसका सीधा अर्थ है कि राहुल गांधी की विदेश यात्राएं प्रायोजित होती हैं और इनमें राष्ट्र विरोधी शक्तियों का होना होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। इन यात्राओं में मुख्य रूप से इटली, यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन), यूनाइटेड स्टेट्स (अमेरिका), जर्मनी, वियतनाम, कंबोडिया, सिंगापुर, बहरीन, मालदीव, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) शामिल हैं.
7. आंतरिक कलह और राज्यों के चुनावी समीकरण
यह एक कड़वा सच है कि भारत की समझदार जनता राहुल गांधी को एक गंभीर राजनेता के रूप में स्वीकार नहीं करती और उनके द्वारा उठाए गए किसी भी तथाकथित 'संकट' पर कोई जन-प्रतिक्रिया नहीं होती। स्वयं कांग्रेस पार्टी के भीतर भी एक बहुत बड़ा, अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं का वर्ग उनके इन अपरिपक्व बयानों से असहमत रहता है और खुद को असहज महसूस करता है। परंतु, राहुल गांधी अपने इर्द-गिर्द मौजूद कुछ चाटुकारों और गैर-राजनैतिक सलाहकारों की 'नजदीकी कोठरी' (Coterie) के सहारे हमेशा सुर्खियों में बने रहने का प्रयास करते हैं, जिससे अंततः कांग्रेस पार्टी का ही भारी अहित होता है।
हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। उनकी एकमात्र उल्लेखनीय उपलब्धि केरल में उनके गठबंधन की जीत रही। राजनैतिक पंडितों और केरल के स्थानीय कांग्रेसी नेताओं का आंतरिक रूप से यह मानना है कि केरल में क्रमिक रूप से यूडीएफ और एलडीएफ की सरकारें बदलती रहती हैं। नियमानुसार, यह जीत पिछले चुनाव में ही मिल जानी चाहिए थी।
राजनैतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मत है कि यदि पिछले चुनावों में राहुल गांधी केरल के वायनाड से स्वयं सांसद नहीं होते, तो राज्य में सत्ता-विरोधी लहर का लाभ उठाकर कांग्रेस की सरकार बहुत पहले ही बन गई होती। लेकिन उनके वहां होने से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ा और वामपंथियों को दोबारा आने का मौका मिल गया। अब, जब वे वायनाड सीट छोड़कर उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से सांसद बन गए हैं और वायनाड सीट पर उनकी बहन प्रियंका वाड्रा चुनाव लड़कर संसद पहुँची हैं, तभी जाकर केरल राज्य में कांग्रेस के लिए अपनी खोई हुई जमीन वापस पाना संभव हो सका है। यह साफ दर्शाता है कि राहुल गांधी का चुनावी प्रभाव पार्टी के लिए फायदे की जगह नुकसानदेह साबित हो रहा है।
8. कॉंग्रेस को आत्ममंथन की आवश्यकता
यह स्पष्ट है कि लोकतंत्र के सुचारू संचालन के लिए एक मजबूत, वैचारिक और नीति-आधारित विपक्ष का होना अनिवार्य है। सरकार की गलत नीतियों का विरोध आंकड़ों, तर्कों और संसदीय मर्यादा के भीतर रहकर होना चाहिए। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जैसे गरिमापूर्ण पदों पर बैठे व्यक्तियों को 'गद्दार' कहना या उनके शारीरिक नुकसान को लेकर अमर्यादित टिप्पणियां करना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र का हिस्सा नहीं हो सकता।
यदि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को भारतीय राजनीति के मुख्यधारा में अपनी प्रासंगिकता बचाए रखनी है, तो उन्हें इस नकारात्मकता, व्यक्तिगत द्वेष और आत्मघाती विमर्श की राजनीति का परित्याग करना होगा। गाली-गलौज और विदेशी सरजमीं पर जाकर देश की छवि खराब करने की इस परिपाटी से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता तो कम नहीं होगी, लेकिन देश की जनता के बीच कांग्रेस की बची-खुची साख अवश्य समाप्त हो जाएगी। समय आ गया है कि कांग्रेस अपने इस 'राहु काल' से बाहर निकले और देश के सामने गाली के बदले एक सकारात्मक और रचनात्मक विज़न प्रस्तुत करे।
~~~~~~~~~Shiv Mishra ~~~~~~~~~~
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