हिंदू एकता और ब्राह्मण होने का दर्द: ऐतिहासिक षड्यंत्र से वर्तमान संकट तक || क्या भारत का प्रबुद्ध वर्ग (ब्राह्मण) आज के दौर का 'नया दलित' बन चुका है?
विखंडन की त्रासदी
भारत का इतिहास केवल विजयों और पराजयों का लेखा-जोखा नहीं है, बल्कि यह एक महान संस्कृति के आंतरिक बिखराव की भी कहानी है। विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध 'सनातन संस्कृति' का ध्वजवाहक होने के बावजूद, भारत ने सदियों तक विदेशी आक्रांताओं की दासता इसलिए झेली क्योंकि यहाँ 'संगठन' की शक्ति का अभाव था। जब-जब हिंदू समाज में सामाजिक समरसता की डोर कमजोर हुई, तब-तब विदेशी शक्तियों को इस पुण्यभूमि को रौंदने का अवसर मिला। आज के दौर में, जब हम एक बार फिर 'हिंदू एकता' के नारे सुन रहे हैं, तब इस बात का विश्लेषण करना अनिवार्य हो जाता है कि क्या यह एकता वास्तविक है या इसके पीछे ब्राह्मण समुदाय की बलि देने का कोई नया राजनीतिक खेल रचा जा रहा है?
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: वर्ण व्यवस्था बनाम औपनिवेशिक जातिवाद
प्राचीन भारत में सामाजिक संरचना 'वर्ण व्यवस्था' पर आधारित थी, जो पूर्णतः 'गुण और कर्म' पर टिकी थी। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्वयं कहा है— 'चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः'। इसका अर्थ स्पष्ट था कि वर्ण जन्म से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत योग्यता और कार्य के चुनाव से निर्धारित होता था। जो राष्ट्र की रक्षा में लगा, वह क्षत्रिय कहलाया; जो व्यापार और अर्थव्यवस्था का आधार बना, वह वैश्य; जो सेवा कार्यों में संलग्न रहा, वह शूद्र; और जिसने अपना जीवन ज्ञान, विज्ञान, संस्कार और अध्यात्म को समर्पित किया, वह ब्राह्मण कहलाया।
इतिहास साक्षी है कि महर्षि विश्वामित्र जन्म से क्षत्रिय थे, परंतु तप और ज्ञान से वे ब्रह्मर्षि बने। महात्मा विदुर, जिन्हें राजनीति का प्रकांड ज्ञाता माना जाता है, एक दासी पुत्र (शूद्र कुल) होने के बावजूद अपनी मेधा के बल पर हस्तिनापुर के महामंत्री बने। रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि के जीवन की यात्रा भी इसी गतिशीलता का प्रमाण है। प्राचीन भारत में वर्ण परिवर्तन एक सहज प्रक्रिया थी और समुदायों के बीच विवाह संबंधों में कोई रूढ़िवादिता नहीं थी। महाराज शांतनु और निषाद कन्या सत्यवती का विवाह इसका जीवंत उदाहरण है।
अंग्रेजों का 'सेंसस' षड्यंत्र:
परंतु, अंग्रेजों ने भारत को लंबे समय तक गुलाम बनाए रखने के लिए इस गतिशील व्यवस्था को 'जाति' (Caste) के स्थिर और संकीर्ण खांचों में बांट दिया। 1871 से 1901 के बीच की जनगणनाओं के माध्यम से उन्होंने हिंदुओं को हजारों जातियों में विभाजित कर दिया। उनका मुख्य निशाना भारत का 'प्रबुद्ध वर्ग' (Intellectual Class) यानी ब्राह्मण थे। अंग्रेज जानते थे कि जब तक समाज का वैचारिक नेतृत्व करने वाला वर्ग सक्रिय रहेगा, तब तक भारत को मानसिक रूप से गुलाम नहीं बनाया जा सकता। इसलिए उन्होंने 'शोषक बनाम शोषित' का एक कृत्रिम नैरेटिव बुना और बहुसंख्यक समाज को ब्राह्मणों के विरुद्ध खड़ा कर दिया।
2. ब्राह्मणों का बलिदान और सबसे बड़ा नरसंहार
विदेशी आक्रांताओं, चाहे वे इस्लामी रहे हों या यूरोपीय, उनकी राह का सबसे बड़ा कांटा ब्राह्मण ही थे। क्योंकि यह वर्ग शास्त्रों के माध्यम से राष्ट्र की चेतना को जीवित रखता था।
इस्लामी बर्बरता: संयुक्त राष्ट्र और कई स्वतंत्र इतिहासकारों के शोध बताते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में सदियों तक चला नरसंहार पृथ्वी के इतिहास का सबसे भीषण रक्तपात था, जिसमें लगभग 10 करोड़ हिंदुओं की हत्या की गई। इस नरसंहार की सबसे गहरी चोट ब्राह्मणों पर पड़ी। ऐतिहासिक प्रमाण मौजूद हैं कि औरंगजेब और अन्य सुल्तानों के शासनकाल में ब्राह्मणों के 'यज्ञोपवीत' (जनेऊ) को मन के हिसाब से तौलकर हत्याएं की जाती थीं। कश्मीर से लेकर केरल (मालाबार) तक और बंगाल से लेकर तमिलनाडु तक, ब्राह्मणों का रक्त इसलिए बहाया गया क्योंकि उन्होंने धर्मांतरण के सामने घुटने टेकने के बजाय मृत्यु को गले लगाना उचित समझा।
स्वतंत्रता संग्राम: ब्रिटिश काल में भी, मंगल पांडे से लेकर चंद्रशेखर आजाद और बाल गंगाधर तिलक तक, ब्राह्मणों ने स्वतंत्रता की वेदी पर सर्वाधिक बलिदान दिए। अंग्रेजों ने इस वर्ग को सबसे अधिक प्रताड़ित किया और फांसी की सजाएं दीं, क्योंकि वे जानते थे कि यह वर्ग राष्ट्र की रक्षा के लिए 'कृत-संकल्प' है।
3. स्वतंत्रता के बाद: छद्म-धर्मनिरपेक्षता और राजनीतिक दमन
1947 में स्वतंत्रता मिलने के बाद ब्राह्मणों को आशा थी कि उन्हें न्याय मिलेगा, परंतु सत्ता की राजनीति ने उन्हें और अधिक हाशिए पर धकेल दिया।
1948 का विस्मृत नरसंहार: नाथूराम गोडसे द्वारा गांधीजी की हत्या के बाद, महाराष्ट्र में ब्राह्मणों के विरुद्ध एक सुनियोजित हिंसा भड़काई गई। राजनीतिक संरक्षण में हजारों निर्दोष चितपावन ब्राह्मणों के घर जला दिए गए और उनकी हत्या कर दी गई। यह स्वतंत्र भारत का वह काला अध्याय है जिसे इतिहासकारों ने दबा दिया।
नेहरूवादी युग और पाखंड: पंडित जवाहरलाल नेहरू ने स्वयं को 'पंडित' कहलाना तो पसंद किया, ताकि हिंदू समाज में उनकी स्वीकार्यता बनी रहे, लेकिन उनकी नीतियां वामपंथ और मुस्लिम तुष्टिकरण की ओर झुकी रहीं। उन्होंने ब्राह्मण होने का स्वांग रचा, जबकि विचारधारा से वे सनातन परंपरा के घोर विरोधी थे। वही परंपरा आज भी जारी है, जहाँ नेता जनेऊ पहनकर और मंदिरों की परिक्रमा कर केवल चुनावी लाभ लेने का प्रयास करते हैं।
4. वर्तमान चुनौतियां: कश्मीर, केरल और 'लव जिहाद'
आज के समय में भी ब्राह्मण समुदाय सबसे अधिक असुरक्षित है। कश्मीर घाटी में 1990 का पलायन और कत्लेआम इसका सबसे क्रूर उदाहरण है। जो लोग आज भी वहां से विस्थापित हैं, उनमें सर्वाधिक संख्या ब्राह्मणों की है। केरल में मोपला दंगों से लेकर वर्तमान राजनीतिक हिंसा तक, ब्राह्मणों को चुन-चुनकर निशाना बनाया जाता है।
हाल के वर्षों में 'लव जिहाद' के मामलों में भी एक खतरनाक पैटर्न दिखाई दिया है। खुफिया सूचनाओं और सामाजिक रिपोर्टों के अनुसार, ब्राह्मण लड़कियों को विशेष रूप से टारगेट किया जाता है और इसके लिए कट्टरपंथी समूहों द्वारा 'इनाम' तक की घोषणा की जाती है। इसके बावजूद, जेएनयू और जादवपुर जैसे विश्वविद्यालयों में "ब्राह्मण भारत छोड़ो" के नारे गूँजते हैं, लेकिन सरकारें और मानवाधिकार संगठन मौन रहते हैं।
5. 2026 के नए नियम और 'सोशल इंजीनियरिंग' का घातक प्रयोग
वर्ष 2026 भारतीय राजनीति में एक मोड़ के रूप में याद किया जाएगा, जहाँ 'हिंदू एकता' की बात करने वाली भाजपा और उसकी सरकार ने ही सवर्णों, विशेषकर ब्राह्मणों के साथ विश्वासघात किया है।
UGC के नए नियम: यूजीसी (UGC) के हालिया 'इक्विटी रूल्स' ने परिसरों में वैमनस्यता की आग सुलगा दी है। इन नियमों में जिस तरह से 'भेदभाव' की परिभाषा को केवल कुछ वर्गों तक सीमित किया गया है, उसने सवर्ण समुदायों में गहरी असुरक्षा पैदा की है। सुप्रीम कोर्ट ने भले ही इन पर रोक लगा दी है, लेकिन सरकार की मंशा स्पष्ट हो चुकी है। अब भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी भी वही 'जातिगत ध्रुवीकरण' कर रहे हैं जो कभी क्षेत्रीय दल करते थे। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की 'सोशल इंजीनियरिंग' अब 'स्वर्ण उपेक्षा' का दूसरा नाम बन गई है।
6. उत्तर प्रदेश: योगी आदित्यनाथ के विरुद्ध षड्यंत्र
उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने एक संत के रूप में शासन करते हुए बिना किसी जातिगत भेदभाव के न्याय स्थापित किया। परंतु, उनके बढ़ते कद से घबराकर विपक्षी दलों और यहाँ तक कि उनकी अपनी पार्टी के कुछ गुटों ने उन्हें 'ठाकुर मुख्यमंत्री' के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया।
विकास दुबे कांड और ब्राह्मण राजनीति: कानपुर के अपराधी विकास दुबे के एनकाउंटर को आधार बनाकर समाजवादी पार्टी और अन्य दलों ने ब्राह्मणों को योगी के विरुद्ध भड़काने की कोशिश की। जबकि हकीकत यह है कि ब्राह्मण समुदाय वर्षों से केवल आश्वासनों पर जीता रहा है। 2007 में मायावती और 2012 में अखिलेश यादव को ब्राह्मणों ने समर्थन दिया, लेकिन बदले में उन्हें केवल प्रताड़ना मिली। 2017 और 2022 में भाजपा को समर्थन देने के बाद भी 'विप्र बोर्ड' या 'ब्राह्मण परिषद' जैसे वादे ठंडे बस्ते में पड़े रहे।
शंकराचार्य विवाद:
हाल ही में महाकुंभ और माघ मेले के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और प्रशासन के बीच जो टकराव हुआ, वह भी इसी राजनीति का हिस्सा है। एक ओर विपक्षी दल शंकराचार्य को मोहरा बना रहे हैं, तो दूसरी ओर वामपंथी विचारधारा वाले 'पथभ्रष्ट ब्राह्मण' सोशल मीडिया पर ठाकुरों और ब्राह्मणों के बीच संघर्ष को हवा दे रहे हैं। यह सब उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है।
7. भविष्य की आहट और ब्राह्मणों का धर्म
देश के विरुद्ध साजिश रचने वाले जानते हैं कि जब तक सवर्ण और विशेषकर ब्राह्मण संगठित हैं, तब तक हिंदू समाज को पूरी तरह तोड़ा नहीं जा सकता। इसलिए ब्राह्मणों को 'विलेन' (खलनायक) साबित करने का वैश्विक अभियान चल रहा है। वामपंथी विचारधारा द्वारा ब्राह्मण बच्चों को ही उनके धर्म और समाज के विरुद्ध खड़ा किया जा रहा है।
भाजपा को इस बात का भान होना चाहिए कि यदि सवर्णों, विशेषकर ब्राह्मणों का मोहभंग हुआ, तो इसकी शुरुआत पश्चिम बंगाल से होगी और अंत उत्तर प्रदेश में सत्ता खोने के साथ होगा। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी असंतोष की लहर है। यदि 2029 में भाजपा की वापसी कठिन होती है, तो इसके जिम्मेदार उसकी अपनी नीतियां होंगी।
अंतिम संदेश: ब्राह्मणों की आर्थिक और सामाजिक दुर्दशा आज किसी से छिपी नहीं है। फ्रांसीसी पत्रकार फ़्राँस्वा गॉटियर ने अपने शोध में स्पष्ट लिखा है कि "ब्राह्मण आज के भारत के नए दलित हैं।" उनकी शोध रिपोर्ट बताती है कि देश के 50% से अधिक रिक्शा चालक और सुलभ शौचालयों में कार्यरत कर्मी ब्राह्मण समुदाय से हैं। वे तर्क देते हैं कि 'एंटी-ब्राह्मण' राजनीति ने एक ऐसे वर्ग को गरीबी के दलदल में धकेल दिया है जो ऐतिहासिक रूप से भारत की बौद्धिक संपदा का संरक्षक था। इसके बावजूद, वह 'राष्ट्र प्रथम' की भावना से विचलित नहीं हुआ है। संपूर्ण ब्राह्मण समुदाय आज भी हिंदू एकता के लिए खड़ा है और काम करता रहेगा, क्योंकि राष्ट्र और धर्म की रक्षा करना उसका युगांतरकारी कर्तव्य है। परंतु, समाज और राजनीति को यह समझना होगा कि जिस नींव (ब्राह्मण) पर हिंदू धर्म की छत टिकी है, यदि उस नींव को ही कमजोर किया गया, तो पूरी इमारत का ढहना निश्चित है।
यदि किसी जाति, समुदाय या धर्म के व्यक्ति को लगता है, कि ब्राह्मण होना उच्चता है, श्रेष्ठता है, और वे शोषक हैं, तो मैं उसे ब्राह्मण बनने का आमंत्रण देता हूँ. मैं उसे अपना कुल और गोत्र दूंगा और ब्राह्मण बन जाने का प्रमाण पत्र भी दूंगा. कृपया मेरा आमंत्रण स्वीकार करें.
~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~