शनिवार, 7 मार्च 2026

मक्का-मदीना मिला रहे इज़रायल से हाथ, लेकिन भारत में उन्माद,

 


मक्का-मदीना मिला रहे इज़रायल से हाथ, लेकिन भारत में उन्माद || भारत के कुछ शहरों में विदेशी कट्टरपंथ के लिए आंसू क्यों बहाए जा रहे हैं ?

ईरान के सर्वोच्च इस्लामिक नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की एक कथित अमेरिकी-इज़रायली हमले में मृत्यु की खबरों के बाद भारत के कई शहरों में मुस्लिम समुदाय, विशेष रूप से शिया मुसलमानों द्वारा विरोध प्रदर्शन और शोक सभाएं आयोजित की गईं। इन प्रदर्शनों में प्रधानमंत्री मोदी और भारत सरकार की 'चुप्पी' पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया गया। कहीं-कहीं राष्ट्र विरोधी बयानबाजी भी देखने को मिली। कांग्रेस, वामपंथी और विपक्षी नेताओं ने मांग की कि भारत सरकार इस हमले की स्पष्ट निंदा करे और ईरान के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करे। सोनिया गांधी ने समाचार पत्र में लेख लिखकर न केवल सरकार की आलोचना की, बल्कि एक विशेष दृष्टिकोण का समर्थन किया।

कट्टरता केवल बंदूकों से नहीं आती, वह विरोध की भाषा से शुरू होती है। आज हम जाने-अनजाने में उसी खाई को खोद रहे हैं, जिसमें कभी पर्शिया जैसी महान सभ्यताएं दफन हो गईं। आस्था का सम्मान करना लोकतंत्र है, लेकिन आस्था के नाम पर राष्ट्र की नीति को बंधक बनाना अराजकता है। भारत की विदेश नीति किसी धर्म के प्रति प्रेम या घृणा पर नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा और आर्थिक भविष्य पर आधारित होनी चाहिए, न कि वोट बैंक के तुष्टिकरण पर। यह देखना दुखद है कि जब अरब दुनिया 'मार्स मिशन' और 'एआई तकनीक' की बात कर रही है, तब भारत में एक वर्ग सातवीं सदी के संघर्षों की मानसिकता में जी रहा है। इज़रायल या अमेरिका का विरोध करना एक 'फैशन' बन गया है, जो राष्ट्रीय हित को ताक पर रखकर किया जाता है। यदि खाड़ी के मुस्लिम देश अपने राष्ट्रीय हितों के लिए इज़रायल से हाथ मिला सकते हैं, तो भारतीय मुसलमानों को यह सोचने की जरूरत है कि वे किसके हितों की लड़ाई लड़ रहे हैं—ईरान के 'प्रॉक्सी' एजेंडे की या अपने देश 'भारत' की तरक्की की?

हमें यह समझना होगा कि ईरान की अपनी राजनीति है, और भारत का अपना भूगोल। जब कोई नागरिक अपने देश की चुनी हुई सरकार को विदेशी संघर्षों के आधार पर 'भला-बुरा' कहता है, तो वह वास्तव में अपनी ही लोकतांत्रिक जड़ों को कमजोर कर रहा होता है।

भारत में खामेनेई के समर्थन में आंसू बहाने वालों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ईरान इस समय इज़रायल के अतिरिक्त सऊदी अरब सहित खाड़ी के कई मुस्लिम देशों पर भी मिसाइल आक्रमण कर रहा है, जिससे भारी धन-जन की हानि हो रही है। इन क्षेत्रों में लगभग 1 करोड़ भारतीय रहते हैं; ऐसे में ईरान के प्रति यह एकतरफा प्रेम प्रदर्शन, क्या भारत सरकार के प्रति 'खिलाफत आंदोलन' की तर्ज पर आक्रोश जाहिर करना तो नहीं है?

इसमें कोई संदेह नहीं कि किसी भी देश द्वारा किसी संप्रभु राष्ट्र पर आक्रमण या किसी राजनीतिक/धार्मिक नेता की हत्या गलत है, जैसा कि अमेरिका पर आरोप है। लेकिन किसी राष्ट्र द्वारा आतंकी संगठन खड़े करना, उन्हें संसाधन उपलब्ध कराना, विरोधी देशों में आतंकी घटनाएं करवाना और उसके नागरिकों का अपहरण व हत्याएं करवाना भी किसी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता। यह मानवता के प्रति जघन्य अपराध है, जो ईरान वर्षों से कर रहा है। कौन कितना गलत है, यह बहस का विषय हो सकता है।

खामेनेई यद्यपि सर्वोच्च मजहबी नेता थे, लेकिन वे किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे, इसलिए उनके निधन पर सरकारी संवेदना या शोक का कोई औचित्य नहीं है। विशेषकर तब, जब वे समय-समय पर भारत के आंतरिक मुद्दों पर विवादित बयान देते रहे हों। खामेनेई ने कई बार कश्मीर की तुलना फिलिस्तीन, गाजा और यमन से की। अगस्त 2019 में जब भारत ने अनुच्छेद 370 हटाया, तब खामेनेई ने भारत सरकार से "दमनकारी नीति" छोड़ने की मांग की थी। मार्च 2020 के दिल्ली दंगों को उन्होंने "मुसलमानों का नरसंहार" बताया और नागरिकता संशोधन कानून की भी कड़ी आलोचना की, जो भारत के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप था। किसी भी संप्रभु राष्ट्र द्वारा इस तरह के "अस्वीकार्य हस्तक्षेप" के बाद संवेदना प्रकट करना, अपने स्वाभिमान और राष्ट्रीय अस्मिता को स्वयं चोट पहुँचाना है।

वर्तमान परिस्थितियों में ईरान, इज़रायल और अमेरिका के बीच छिड़ा यह युद्ध भारत के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। भारत को अपनी "सामरिक स्वायत्तता" की नीति पर कायम रहना चाहिए। मोदी सरकार ने इज़रायल के साथ संबंधों को 'विशेष सामरिक साझेदारी' तक पहुँचाया है, जिसकी गर्मजोशी फरवरी 2026 की प्रधानमंत्री की इज़रायल यात्रा में दिखी। दूसरी ओर, भारत को ईरान के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को भी बनाए रखना चाहिए, यद्यपि ईरान के इस्लामिक राष्ट्र बनने के बाद दोनों प्राचीन सभ्यताओं के बीच का सेतु अब इतिहास बन चुका है। भारत का आधिकारिक रुख "संवाद और कूटनीति" के माध्यम से शांति बहाली का होना चाहिए।

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों (कच्चा तेल और गैस) का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा करता है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव के कारण सप्लाई चेन बाधित हुई है। यद्यपि अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की विशेष छूट दी है, लेकिन बीमा कवर न मिलने के कारण आपूर्ति अब भी बाधित है।

प्राचीन सनातन भारत और प्राचीन पर्शिया के संबंध ऋग्वेद और जेंद-अवेस्ता के पन्नों में जीवित हैं। इन्हें एक ही आर्य कुल की दो शाखाएं माना जाता है, जो कालांतर में अलग-अलग दिशाओं में विकसित हुईं। वैदिक संस्कृत और प्राचीन अवेस्तन भाषाएं "जुड़वां बहनों" की तरह हैं। सनातन परंपरा में जिसे 'यज्ञ' कहा जाता है, पारसी परंपरा में उसे 'यास्ना' कहा गया।

इन दोनों सभ्यताओं के बीच एक अनूठा दार्शनिक विभाजन भी दिखता है। भारत में 'देव' पूजनीय हुए और 'असुर' राक्षसी प्रवृत्तियों के प्रतीक बने, जबकि ईरान में इसके विपरीत 'अहुर' (असुर) सर्वोच्च ईश्वर बने और 'दैव' बुरी शक्तियों के प्रतीक। यह विभाजन संकेत देता है कि एक कालखंड में ये दोनों समूह साथ थे, जो वैचारिक मतभेद के कारण अलग हुए, पर उनके संस्कार एक ही रहे।

तुर्की के बोग़ाज़कुई से मिला 3400 साल पुराना शिलालेख गवाही देता है कि ऋग्वैदिक देवता (इंद्र, वरुण, मित्र, नासत्य) सुदूर पश्चिम तक पूजे जाते थे। यह शिलालेख भारतीय इतिहास की उस कल्पित कहानी को खारिज करता है कि सनातन धर्म केवल एक छोटे से क्षेत्र की उपज था।

ऐतिहासिक काल में, विशेषकर हर्यक और मौर्य वंश के दौरान, दोनों सभ्यताओं के बीच प्रशासनिक और कलात्मक आदान-प्रदान हुआ। प्राचीन गांधार (वर्तमान में अफगानिस्तान का क्षेत्र) जहाँ से होकर व्यापारिक काफिले और विद्वान एक-दूसरे के यहाँ आते जाते थे। आयुर्वेद, गणित और दर्शन का ज्ञान भारत से पर्शिया के माध्यम से ही अरब और यूरोप तक पहुँचा।

पर्शिया से ईरान बनने की यात्रा अपनी जड़ों को खोजने की थी । ईरान शब्द प्राचीन अवेस्तन भाषा के 'ऐर्यानाम' से निकला है, जिसका अर्थ है "आर्यों की भूमि"। सासैनियन राजाओं के समय तीसरी शताब्दी ईस्वी के शिलालेखों में भी इस देश को 'ईरान-शह्र' यानी आर्यों का साम्राज्य कहा गया है। इस नाम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर औपचारिक पहचान 21 मार्च, 1935 को मिली। रज़ा शाह पहलवी, जो ईरान के आधुनिकीकरण के पक्षधर थे, चाहते थे कि उनके देश को पर्शिया के बजाय ईरान से जाना जाए। उनका मानना था कि 'ईरान' नाम का उपयोग करने से देश की 'आर्य विरासत' स्पष्ट रूप से दुनिया के सामने आएगी, जो उस दौर के वैश्विक परिदृश्य में एक गौरवशाली पहचान मानी जाती थी।

लेकिन 1979 की इस्लामी क्रांति ने इसे कट्टरता के 'पाषाण युग' में धकेल दिया। इसने न केवल ईरान की सरकार बदली, बल्कि उसकी सदियों पुरानी पहचान, संस्कृति और वैश्विक राजनीति के दृष्टिकोण को भी पूरी तरह से बदल दिया। ईरान एक 'इस्लामी गणराज्य' बन गया। कानून व्यवस्था को 'शरिया' पर आधारित किया गया। धार्मिक शिक्षा लागू हो गयी और सह-शिक्षा समाप्त हो गयी मनोरंजन के साधनों पर कड़ा सेंसर लागू हुआ। महिलाओं के लिए हिजाब/चादर अनिवार्य कर दी गई। आधुनिक पहनावे और जीवनशैली को प्रतिबंधित कर दिया गया। बाद में, ईरान ने अपनी इस्लामिक क्रांति को अन्य मुस्लिम देशों में निर्यात करने की कोशिश की, जिससे सऊदी अरब जैसे सुन्नी देशों के साथ उसका विवाद गहरा गया। सरकार ने इस्लाम से पूर्व की संस्कृति और इतिहास को दबाने और मिटाने का कार्य किया ।

ईरान का इतिहास हमें सिखाता है कि कट्टरता हमेशा 'धार्मिक सुधार' के नाम पर आती है, लेकिन वह अंततः सभ्यता का संहार कर देती है। भारत की ढाल उसकी 'सहिष्णुता' नहीं, बल्कि उसका 'सजग लोकतंत्र' और 'सभ्यतागत गर्व' होना चाहिए।

"भारत की शक्ति उसकी विविधता में नहीं, बल्कि उस विविधता के 'भारतीयता' के सूत्र में बंधे होने में है। यदि यह सूत्र टूटा, तो हम भी इतिहास के उन पन्नों का हिस्सा बन जाएंगे जिन्हें आज हम एक 'चेतावनी' की तरह पढ़ रहे हैं।"

क्या आप अपनी अगली पीढ़ी को एक 'आधुनिक प्रगतिशील भारत' देना चाहते हैं या किसी विदेशी विचारधारा की 'छाया' मात्र? चुनाव आपका है।

~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~

मक्का-मदीना मिला रहे इज़रायल से हाथ, लेकिन भारत में उन्माद,

  मक्का-मदीना मिला रहे इज़रायल से हाथ, लेकिन भारत में उन्माद || भारत के कुछ शहरों में विदेशी कट्टरपंथ के लिए आंसू क्यों बहाए जा रहे हैं ? ईर...