शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

वन्दे मातरम् : राष्ट्रभक्ति के महामंत्र से सियासी समझौतों की दहलीज तक

 


वन्दे मातरम् : कट गया, छट गया, लुट गया, पिट गया तब मिला सम्मान || राष्ट्रभक्ति के महामंत्र से सियासी समझौतों की दहलीज तक


एक सराहनीय कदम उठाते हुए मोदी सरकार ने 'वन्दे मातरम्' गीत को अब औपचारिक कार्यक्रमों में अनिवार्य कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जारी नए निर्देशों के अनुसार, सरकारी और आधिकारिक समारोहों में वन्दे मातरम् का गायन या वादन अनिवार्य होगा। अब इस गीत के पूरे 6 छंदों वाले स्वरूप को ही "आधिकारिक संस्करण" माना गया है, जिसकी अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड है।

अब तक राष्ट्रगीत के केवल पहले दो छंद ही गाए जाते थे। अन्य छंदों को तत्कालीन नेहरू सरकार ने तुष्टिकरण की नीति के तहत हाशिए पर धकेल दिया था। अब वन्दे मातरम् को इन अवसरों पर अनिवार्य रूप से प्रस्तुत किया जाना है: सरकारी व औपचारिक समारोह, ध्वजारोहण कार्यक्रम, राष्ट्रपति, राज्यपाल व उप-राज्यपाल के आगमन और प्रस्थान, पद्म सम्मान समारोह तथा शिक्षण संस्थानों में सामूहिक दैनिक प्रार्थना के रूप में। यदि वन्दे मातरम् बैंड या लाइव संगीत के साथ बजाया जाता है, तो उससे पूर्व 7 धीमी 'मार्च धुन' का क्रम होगा। यह नियम समारोहों में अनुशासन और एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए है। केंद्र व राज्य सरकारों, शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक उपक्रमों को इसका अनुपालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।

जब किसी सरकारी कार्यक्रम में 'वन्दे मातरम्' और 'जन गण मन' दोनों शामिल हों, तो पहले वन्दे मातरम् और उसके पश्चात जन गण मन बजाया या गाया जाएगा। आधिकारिक संस्करण (6 छंद) के गायन या वादन के समय श्रोताओं व दर्शकों का खड़े होकर सम्मान देना अपेक्षित है। हालांकि, यदि यह गीत किसी फिल्म, वृत्तचित्र या समाचार रील के हिस्से के रूप में बजता है, तो खड़े होना अनिवार्य नहीं होगा।

इन निर्देशों के बाद उम्मीद के मुताबिक कुछ राजनीतिक दलों और सांप्रदायिक समूहों ने विरोध जताया है। उनका तर्क है कि यह निर्णय संवैधानिक और सांस्कृतिक विविधता के दृष्टिकोण से उचित नहीं है। कई मुस्लिम नेताओं ने भी इसका खुलकर विरोध किया है। विरोध का आधार वही है जो स्वतंत्रता पूर्व जिन्ना और मुस्लिम लीग का था। धार्मिक आधार पर देश के विभाजन और पाकिस्तान बनने के बाद भी शेष भारत में विरोध का वही स्वर दुर्भाग्यपूर्ण है। पूर्व में नेहरू ने सांप्रदायिक शक्तियों के आगे नतमस्तक होते हुए उन छंदों की बलि चढ़ाने में संकोच नहीं किया, जिनका विरोध विभाजन के जिम्मेदार तत्व कर रहे थे।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कोई भी नारा या गीत उतना प्रभावशाली नहीं हुआ, जितना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का 'वन्दे मातरम्'। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि मृतप्राय भारत में प्राण फूंकने वाला एक 'महामंत्र' था। इस गीत ने राष्ट्र की सोई हुई आत्मा को पुनर्जीवित किया और ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी। आज यह गीत राजनीतिक बहसों और सांप्रदायिक विवादों का केंद्र क्यों है? यह समझना केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र की नियति का विश्लेषण है। आज हम उन्हीं कम ज्ञात ऐतिहासिक तथ्यों पर चर्चा करेंगे जो प्रत्येक राष्ट्रभक्त को जानने चाहिए।

(बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय : “क्रांति के शब्दकार” जिन्होंने कलम को मशाल बनाकर भारत माता की पहली छवि उकेरी।)

1870 के दशक में जब भारत अपनी पहचान खो रहा था, तब बंकिम चंद्र ने 'वन्दे मातरम्' की रचना की। 1882 में उनके उपन्यास 'आनंदमठ' के माध्यम से यह जनता तक पहुँचा। बंकिम ने पहली बार देश को केवल 'जमीन का टुकड़ा' नहीं, बल्कि 'माता' के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने भारत माता को जगद्धात्री, लक्ष्मी और दुर्गा के रूपों में चित्रित कर भारतीयों को उनकी सोई हुई 'शक्ति' का अहसास कराया। संस्कृत और बंगाली के इस संगम ने उत्तर से दक्षिण तक सबको एक सूत्र में पिरो दिया। ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इसके माध्यम से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की चेतना जागृत की थी।

1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार इसे राजनीतिक मंच पर स्वर दिया। पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इसे जन-जन तक पहुँचाने के लिए एक ओजस्वी धुन तैयार की। उस समय तक 'जन गण मन' अस्तित्व में नहीं था (जिसकी रचना टैगोर ने 1911 में की)। जब लॉर्ड कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया, तो 'वन्दे मातरम्' विद्रोह का मुख्य नारा बन गया। लोग लाठियां खाते हुए भी इसका उद्घोष करते थे। इसकी लोकप्रियता से घबराकर ब्रिटिश सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसने इसे और भी अधिक लोकप्रिय बना दिया।

खुदीराम बोस, भगत सिंह और बिस्मिल जैसे अनगिनत क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर चढ़ते समय 'वन्दे मातरम्' का उद्घोष करते थे। लाला लाजपत राय ने इसी नाम से पत्रिका निकाली और अरविंदो घोष ने इसे "अंधेरे में जलती हुई मशाल" कहा। 1907 में जर्मनी में मैडम भीकाजी कामा ने जब पहली बार भारत का ध्वज फहराया, तो उस पर "वन्दे मातरम्" ही अंकित था।

जहाँ आज इस गीत पर विवाद होता है, वहीं सावरकर और बोस जैसे महानायकों ने इसे राष्ट्र की 'अविभाज्य आत्मा' माना था। वीर सावरकर के लिए यह सांस्कृतिक अखंडता का मंत्र था। उनका स्पष्ट मत था कि राष्ट्र के प्रतीक बहुसंख्यक समाज की भावनाओं से तय होने चाहिए, न कि किसी की 'वीटो शक्ति' से। वहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अपनी 'आजाद हिंद फौज' में इसे मुख्य उद्घोष बनाया। उनकी फौज में बड़ी संख्या में मुस्लिम सैनिक थे, जिन्होंने इसे गर्व के साथ गाया। नेताजी ने सिद्ध किया कि यदि नेतृत्व दृढ़ हो, तो यह गीत पूरे राष्ट्र को एक कर सकता है।

(वीर सावरकर: "अटल राष्ट्रवाद के लिए वन्दे मातरम् भौगोलिक अखंडता का अकाट्य प्रमाण था।")

(नेताजी सुभाष चंद्र बोस: "रणघोष के नायक: जिन्होंने साबित किया कि वन्दे मातरम् हर सैनिक की साझी विरासत है।")

1930 के दशक में जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने इसे सांप्रदायिक रंग देना शुरू किया। जिन्ना ने इसे 'मूर्तिपूजा' से जोड़कर मुसलमानों को राष्ट्रीय आंदोलन से काटने का प्रयास किया। रोचक तथ्य यह है कि जिन्ना भी 1910 तक इसके सम्मान में खड़े होते थे, किंतु बाद में अलगाववादी राजनीति के कारण उन्होंने विरोध शुरू किया। जमात-ए-इस्लामी के सैयद अबुल अला मौदूदी ने इसे 'तौहीद' (अल्लाह की एकता) के खिलाफ बताकर 'शिर्क' करार दिया, जिससे एक स्थाई धार्मिक नफरत पैदा की गई।

तुष्टिकरण की राजनीति के कारण गांधी और नेहरू इस मामले में निरीह बन गए। गांधीजी ने 'हृदय परिवर्तन' की उम्मीद में कहा कि यदि किसी को कष्ट है तो इसे गाने के लिए विवश न किया जाए। इस 'नैतिक नरमी' ने कट्टरपंथियों के हौसले बुलंद किए। नेहरू भी अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि और मुस्लिम लीग की आपत्तियों के प्रति जरूरत से ज्यादा संवेदनशील थे। 1937 में कांग्रेस ने जिन्ना को खुश करने के लिए गीत के उन हिस्सों को छोड़ दिया जिनमें मातृभूमि की तुलना दैवीय रूपों से थी। आजादी के बाद 'तकनीकी सुगमता' का बहाना बनाकर इसे राष्ट्रगान के बजाय 'सांत्वना पुरस्कार' के रूप में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। यह एक 'वैचारिक समर्पण' था।

"इतिहास गवाह है कि जब राष्ट्र की पहचान को तुष्टिकरण की वेदी पर चढ़ाया जाता है, तो वह एकता नहीं बल्कि विभाजन की नई लकीरें खींचता है। नेहरू और गांधी के इस रवैये से जनता और कई कांग्रेसी भी नाराज थे। अंततः 24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद के हस्तक्षेप से इसे राष्ट्रगान के समान दर्जा मिला, किंतु व्यवहार में इसे दरकिनार किया गया। जहाँ राष्ट्रगान के अपमान के विरुद्ध कड़े कानून बनाए गए, वहीं वन्दे मातरम् को इससे वंचित रखकर जान-बूझकर हाशिए पर डाल दिया गया।"

2017 में मद्रास उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक निर्णय आया, जिसमें देशभक्ति की भावना जागृत करने हेतु शिक्षण संस्थानों में इसे अनिवार्य करने का निर्देश दिया गया। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अनिवार्य करने से यह कहकर इनकार कर दिया कि संविधान में इसके लिए दंडात्मक प्रावधान नहीं हैं, फिर भी इसकी गरिमा बनाए रखना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है।

'वन्दे मातरम्' किसी मजहब के खिलाफ नहीं, बल्कि इस मिट्टी के प्रति कृतज्ञता है। इसे राजनीतिक संकीर्णता से देखना पूर्वजों के बलिदान का अपमान है। राष्ट्रगान (जन गण मन) राष्ट्र के मस्तिष्क (नियम और भूगोल) को दर्शाता है, जबकि राष्ट्रगीत (वन्दे मातरम्) राष्ट्र के हृदय (भावना और संघर्ष) को।

अंततः, वन्दे मातरम् किसी धर्म या दल की बपौती नहीं, बल्कि उस अखंड भारत की चेतना है जिसके लिए शहीदों ने रक्त बहाया है। नेहरू की हिचकिचाहट और जिन्ना के हठ के बीच दबा यह गीत आज भी हर भारतीय से सवाल पूछता है—क्या हम अपनी जड़ों का सम्मान करने के लिए तैयार हैं?

"वन्दे मातरम् केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों के बलिदान की स्याही से लिखा गया वह संकल्प है, जो हमें याद दिलाता है कि यह राष्ट्र किसी समझौते की उपज नहीं, बल्कि सहस्रों वर्षों की तपस्या का फल है। जब तक इस देश के कंठ में वन्दे मातरम् सुरक्षित है, तब तक भारत की सांस्कृतिक अखंडता पर कोई आंच नहीं आ सकती। यह गीत कल भी राष्ट्र का था, आज भी है और अनंत काल तक रहेगा।"

"यह लेख उन गुमनाम शहीदों को समर्पित है जिनके होठों पर अंतिम शब्द 'वन्दे मातरम्' था।"

~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~

राहुल गांधी : स्टार प्रचारक से बने मोदी के संकटमोचक || बन गए मोदी की ढाल

 


राहुल गांधी : स्टार प्रचारक से बने मोदी के संकटमोचक || सेल्फ गोल एक्सपर्ट बन गए मोदी की ढाल


भारतीय लोकतंत्र की राजनीति जितनी गंभीर है, उतनी ही विडंबनाओं से भरी भी है। यहाँ कई बार नेता जिस उद्देश्य से कदम उठाते हैं, उसका परिणाम ठीक उल्टा निकल आता है। रणनीति कुछ और होती है, असर कुछ और। पिछले एक दशक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के संदर्भ में एक तंज बार-बार सुनाई देता रहा है—“वे भाजपा के सबसे बड़े स्टार प्रचारक हैं।” यह वाक्य सुनने में भले ही व्यंग्य लगे, लेकिन हाल की संसदीय घटनाओं ने इसे फिर से प्रासंगिक बना दिया है। संसद के बजट सत्र के दौरान जिस प्रकार मुद्दों का फोकस बदला और सरकार को राहत मिली, उसने यह प्रश्न खड़ा कर दिया कि क्या राहुल गांधी अनजाने में ही नरेंद्र मोदी के लिए संकटमोचक बनते जा रहे हैं?

असंतोष का उबाल और सरकार की मुश्किलें

उस समय देश का राजनीतिक वातावरण भाजपा के लिए बिल्कुल अनुकूल नहीं था। यूजीसी के नए नियमों ने विश्वविद्यालय परिसरों में उथल-पुथल मचा दी थी। छात्र, शोधार्थी और शिक्षक सड़क पर उतर आए थे। प्रदर्शन केवल कुछ महानगरों तक सीमित नहीं थे, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों तक फैल चुके थे। सबसे चिंताजनक बात यह थी कि यह आंदोलन जाति या वर्ग की सीमाओं में बँटा हुआ नहीं था। सवर्ण से लेकर दलित, पिछड़े और आदिवासी—सभी वर्गों के छात्र इसमें शामिल थे।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यही वह स्थिति होती है, जो किसी भी सरकार के लिए सबसे खतरनाक मानी जाती है—जब असंतोष सर्वव्यापी हो जाए और उसके खिलाफ कोई स्पष्ट वैचारिक विभाजन न हो। भाजपा की परेशानी यह भी थी कि उसका पारंपरिक समर्थक युवा वर्ग भी इस बार नाराज दिखाई दे रहा था। जिन युवाओं ने सोशल मीडिया पर भाजपा की विचारधारा को मजबूती दी थी, वही अब सवाल पूछ रहे थे।

सोशल मीडिया, जो भाजपा की ताकत माना जाता था, वहाँ माहौल बदल गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाइव कार्यक्रमों में पहले लाखों लोग जुड़ते थे, लेकिन अब संख्या घटकर सैकड़ों या हजारों में सिमटने लगी। यह गिरावट केवल आँकड़ा नहीं थी, बल्कि संकेत था कि भावनात्मक समर्थन में दरार आ चुकी है।

सरकार दुविधा में थी—नियम वापस ले तो नीति विफल दिखे, लागू रखे तो आंदोलन बढ़े। यह वही स्थिति थी जिसे हिंदी मुहावरे में ‘साँप-छछूंदर’ कहा जाता है।

विपक्ष के लिए सुनहरा मौका

राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह समय विपक्ष के लिए स्वर्णिम अवसर था। संसद का बजट सत्र सरकार को घेरने का आदर्श मंच हो सकता था। बेरोजगारी, शिक्षा, युवाओं की नाराजगी—ये सारे मुद्दे विपक्ष के पास थे। राहुल गांधी, जो नेता विपक्ष की भूमिका में थे, उनसे उम्मीद थी कि वे सरकार को कटघरे में खड़ा करेंगे।

लेकिन राजनीति में कभी-कभी सबसे बड़ा नुकसान ‘गलत समय पर गलत मुद्दा’ उठा देने से होता है।

मुद्दा बदला, बहस बदली, सरकार बची

धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए राहुल गांधी यूजीसी या बजट पर केंद्रित हमला कर सकते थे। लेकिन उन्होंने अप्रत्याशित रूप से सेना प्रमुख मुकुंद नरवणे की एक अप्रकाशित पुस्तक का उल्लेख करते हुए चीन सीमा का मुद्दा उठा दिया। रक्षा मंत्री और प्रधानमंत्री पर आरोप लगाए गए। यह विषय संवेदनशील अवश्य था, किंतु तत्कालीन जनभावना से सीधा जुड़ा हुआ नहीं था।

लोकसभा अध्यक्ष ने संसदीय परंपरा का हवाला देते हुए अप्रकाशित पुस्तक का उल्लेख करने से मना कर दिया। इसके बाद हंगामा शुरू हुआ। कांग्रेस ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया। सदन की कार्यवाही बाधित हुई। मीडिया और सोशल मीडिया पर बहस का केंद्र अचानक बदल गया।

यहीं भाजपा को राहत मिली।

राजनीति में इसे “एजेंडा सेटिंग” कहा जाता है—जो तय करता है कि चर्चा किस विषय पर होगी, वही बहस जीतता है। राहुल गांधी ने अनजाने में सरकार से एजेंडा छीनने के बजाय उसे खुद सौंप दिया।

विवादों की नई श्रृंखला

इसके बाद रवनीत सिंह बिट्टू को ‘गद्दार’ कहे जाने की घटना ने सिख समुदाय में नाराजगी पैदा कर दी। भाजपा ने इसे तुरंत राजनीतिक मुद्दा बनाया। कांग्रेस को सफाई देनी पड़ी।

इसके साथ ही भाजपा ने रणनीतिक जवाबी हमला किया। सांसद निशिकांत दुबे ने इतिहास और पुस्तकों का सहारा लेते हुए नेहरू-गांधी परिवार से जुड़े विवादास्पद प्रसंग उठाए। ‘पुस्तक युद्ध’ शुरू हो गया।

अब बहस यूजीसी से हटकर इतिहास, संस्मरण और निजी जीवन के आरोप-प्रत्यारोप पर आ गई।

पुस्तकों का संदर्भ और उनका सार

इस विवाद में जिन पुस्तकों का उल्लेख हुआ, उनका राजनीतिक महत्व समझना जरूरी है:

‘एडविना एंड नेहरू’ (कैथरीन क्लेमेंट)
यह पुस्तक नेहरू और एडविना माउंटबेटन के निजी संबंधों पर आधारित है। इसमें भारत विभाजन के समय की राजनीतिक और व्यक्तिगत जटिलताओं का वर्णन है। भाजपा ने इसे एडविना -नेहरू के अंतरंग संबंधों और उनकी निर्णय क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए उद्धृत किया।

‘इंडिया रिमेम्बर्ड’ (पामेला माउंटबेटन)
यह संस्मरण सत्ता हस्तांतरण के दौर का प्रत्यक्षदर्शी विवरण है। इसमें नेहरू परिवार के निजी संबंधों और उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख मिलता है।

‘द रेमिनिसेंस ऑफ नेहरू एरा’ (एम.ओ. मथाई)
नेहरू के निजी सचिव द्वारा लिखी गई इस पुस्तक में नेहरू युग के कई अंदरूनी किस्सों का जिक्र है। इसमें सत्ता के भीतर की राजनीति और व्यक्तिगत संबंधों के विवादास्पद विवरण दिए गए हैं।

‘हिमालयन ब्लंडर’ (ब्रिगेडियर जॉन डालवी)
1962 के भारत-चीन युद्ध की असफलताओं पर आधारित यह पुस्तक राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की रणनीतिक गलतियों का विश्लेषण करती है। इसमें तत्कालीन सरकार की तैयारी की कमी की आलोचना है।

‘मित्रोखिन आर्काइव’
शीत युद्ध काल के दस्तावेजों पर आधारित यह संग्रह सोवियत प्रभाव और भारतीय राजनीति के संबंधों पर दावे करता है। भाजपा ने इसे कांग्रेस की विदेश नीति पर सवाल उठाने के लिए इस्तेमाल किया।

इन पुस्तकों के उद्धरणों ने कांग्रेस को रक्षात्मक बना दिया। परिणामस्वरूप, वह सरकार पर हमला करने के बजाय खुद बचाव करती नजर आई।

राजनीतिक मनोविज्ञान की दृष्टि से

राजनीति केवल तथ्यों की लड़ाई नहीं होती, बल्कि धारणा (perception) की लड़ाई होती है। जनता वही याद रखती है, जो सुर्खियों में रहता है। जब यूजीसी मुद्दा मीडिया से गायब हुआ, तो सरकार पर बना दबाव भी स्वतः कम हो गया।

यह वही सिद्धांत है जिसे चुनावी रणनीतिकार कहते हैं—
“जब विपक्ष अपने मुद्दे छोड़कर आपके मुद्दों पर बहस करने लगे, समझिए आपने आधी लड़ाई जीत ली।”

यही यहाँ हुआ।

निष्कर्ष: विरोध या मदद?

राहुल गांधी की मंशा क्या थी, यह अलग प्रश्न है। लेकिन राजनीति में इरादा नहीं, परिणाम मायने रखता है। परिणाम यह रहा कि:

  • सरकार रक्षात्मक से आक्रामक हुई
  • कांग्रेस आक्रामक से रक्षात्मक हुई
  • छात्र आंदोलन हाशिये पर चला गया
  • मीडिया का फोकस बदल गया

इस दृष्टि से देखें तो राहुल गांधी ने अनजाने में भाजपा को वह राहत दे दी, जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत थी।

पहले उन्हें भाजपा का ‘स्टार प्रचारक’ कहा जाता था। अब हालात ऐसे बनते दिखे कि वे ‘संकटमोचक’ की भूमिका में भी नजर आए—ऐसे नेता, जिनकी रणनीति का लाभ अंततः प्रतिद्वंद्वी को मिल जाता है।

राजनीति की यही विडंबना है—कभी-कभी विरोधी ही सबसे बड़ी ढाल बन जाता है।

~~~शिव मिश्रा ~~~

वन्दे मातरम् : राष्ट्रभक्ति के महामंत्र से सियासी समझौतों की दहलीज तक

  वन्दे मातरम् : कट गया, छट गया, लुट गया, पिट गया तब मिला सम्मान || राष्ट्रभक्ति के महामंत्र से सियासी समझौतों की दहलीज तक एक सराहनीय कदम उठ...