शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

भागवत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम मदनी की ‘खूनी चेतावनी’ || विचारधारा का मतभेद या टकराव की आहट?

 


भागवत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम मदनी की ‘खूनी चेतावनी’ || विचारधारा का मतभेद या टकराव की आहट?

हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 'घर वापसी' के माध्यम से सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने का आह्वान किया, जिसे उन्होंने 'सांस्कृतिक एकता' का नाम दिया। वैसे तो यह उन सभी के लिए था जिन्होंने हिंदू धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपना लिया है; इसमें क्रिश्चियन, इस्लाम, बौद्ध, जैन, सिख सहित सभी धर्म शामिल हैं। लेकिन इस पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद और देवबंद दारुल उलूम के मुखिया अरशद मदनी ने तुरंत 'खूनी संघर्ष' की चेतावनी दे डाली, जो न केवल चिंताजनक है, बल्कि यह संकेत भी देती है कि कट्टरपंथी नेतृत्व अब संवैधानिक विमर्श के बजाय कत्लेआम की चेतावनी पर उतर आया है। यह परस्पर विरोधी विचारधाराओं का टकराव नहीं, बल्कि गृहयुद्ध की स्पष्ट चेतावनी है। भारत में हर राजनैतिक दल ने वोटों के लालच में कट्टरपंथी तत्वों को पाला-पोसा है और किसी सरकार ने उन्हें नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की, कथित रूप से हिंदूवादी सरकारों ने भी नहीं। आज की स्थिति अनायास उत्पन्न नहीं हुई है।

संवाद से संघर्ष तक: बयान और प्रतिक्रिया

इसके पहले मोहन भागवत ने ज्ञानवापी मंदिर के परिप्रेक्ष्य में हिंदू समुदाय से कहा था कि हर मस्जिद में शिवलिंग नहीं ढूँढ़ना चाहिए; तब मदनी ने उनके बयान का स्वागत किया था। जब भागवत ने समरसता के लिए मस्जिदों में जाकर मुल्ला और मौलानाओं से मिलना शुरू किया था, तब भी उनके कार्य का स्वागत किया गया था। एक बार जब उन्होंने कहा था कि हिंदुओं के 33 करोड़ देवी-देवता हैं, उनमें पैगंबर मोहम्मद और ईसा मसीह को भी शामिल कर लेना चाहिए, तब तो उन्होंने इसकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की थी। तो फिर 'घर वापसी' के बयान में ऐसा कुछ भी नहीं है। यह तो हिंदू धर्म छोड़कर गए लोगों को अपने घर वापस आने और अपनी संस्कृतिक जड़ो से जुड़ने का आह्वान मात्र है।

जनसांख्यिकी का बदलता गणित : आशंका या वास्तविकता?

सुरक्षा एजेंसियों और थिंक-टैंक्स (जैसे विजन आईएएस की रिपोर्ट) के अनुसार, कुछ कट्टरपंथी संगठन जैसे 'गजवा-ए-हिंद' की विचारधारा को बढ़ावा दे रहे हैं। इनका उद्देश्य भारत को एक इस्लामिक राष्ट्र के रूप में बदलना है। सोशल मीडिया पर कट्टरपंथ का प्रसार और युवाओं का कट्टरपंथीकरण ('रेडिकलाइजेशन') राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती है। यदि इसे समय रहते नहीं रोका गया, तो यह आंतरिक विद्रोह और सांप्रदायिक हिंसा का कारण बन सकता है। 'लालच', 'धोखा' और 'लव जिहाद' के माध्यम से बड़े पैमाने पर जनसांख्यिकीय बदलाव की कोशिश की जा रही है। विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों में मिशनरी गतिविधियों और कट्टरपंथी समूहों की सक्रियता एक गंभीर खतरा है।

कट्टरपंथियों द्वारा चलाए जा रहे जनसांख्यिकीय आक्रमण से विश्व के कई देश कराह रहे हैं। भारत के कई क्षेत्रों में हिंदुओं का अल्पसंख्यक होना अब केवल एक आशंका नहीं, बल्कि सांख्यिकीय हकीकत है। पश्चिम बंगाल, असम और केरल के कई जिले इस 'जनसांख्यिकीय आक्रमण' के शिकार हो चुके हैं। आर्थिक प्रलोभन और मनोवैज्ञानिक दबाव के माध्यम से चलाया जा रहा धर्मांतरण का चक्रव्यूह भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक 'टाइम बम' की तरह है। यदि हम आज जनसांख्यिकीय सुरक्षा के प्रति सचेत नहीं हुए, तो आने वाले दशकों में भारत अपनी लोकतांत्रिक पहचान खो सकता है।

हमें उन देशों से सीखना चाहिए जिन्होंने उदारवाद के नाम पर अपनी सीमाओं और संस्कृति को दांव पर लगाया। आज फ्रांस और स्वीडन जैसे देश अपने ही भीतर 'समांतर समाजों' से जूझ रहे हैं। लेबनान का पतन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि जनसांख्यिकीय बदलाव कैसे एक हँसते-खेलते देश को गृहयुद्ध की आग में झोंक सकता है।

कट्टरपंथी समूहों द्वारा भारत में निरंतर चलाए जा रहे गजवा-ए-हिंद के एजेंडे द्वारा भारत को 2047 तक इस्लामिक राष्ट्र बनाने का जो खाका खींचा गया है, उसे रोकने के लिए कठोर विधायी हस्तक्षेप की आवश्यकता है। मदनी के देवबंद मदरसे की वेबसाइट पर इसका फतवा आज भी उपलब्ध है, जिसे वे अपना धार्मिक कर्तव्य बताते हुए कह रहे हैं कि संविधान द्वारा दी गयी धार्मिक स्वतंत्रता इसकी अनुमति देता है।

दुर्भाग्य से मोदी सरकार 2047 तक देश को विकसित राष्ट्र बनाने का सब्ज़बाग दिखा रही है, लेकिन तब यह विकसित देश धर्मनिरपेक्ष होगा या इस्लामिक, इस पर मौन है। यक्ष प्रश्न है कि क्या मौन रहकर मोदी सरकार भी परोक्ष रूप से तुष्टिकरण कर रही है। अब 'तुष्टिकरण' की नीति त्यागकर 'राष्ट्र रक्षण' की नीति अपनानी चाहिए, जिससे राष्ट्रांतरण का संभावित खतरा टाला जा सके। यह देश के लिए भी जरूरी है और उसकी सत्ता वापसी के लिए भी, क्योंकि यूजीसी के नए नियमों के बाद उसका सत्ता में वापस आना संदिग्ध हो गया है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य: क्या दुनिया से सीखने की जरूरत है?

वैश्विक स्तर इस्लामीकरण या जनसांख्यिकीय परिवर्तन के रूप में कई देशों के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे में आए बदलावों को ध्यान में रख कर भारत जैसी उभरती शक्ति के लिए एक बहुआयामी रणनीति आवश्यक है। यूरोप के कुछ देशों जैसे स्वीडन, फ्रांस और बेल्जियम के अनुभवों से सीख लेते हुए भारत सरकार तुरंत प्रभावी कदम उठाने चाहिए।

समाधान की सात सूत्रीय रणनीति : नीति बनाम तुष्टिकरण की बहस

निम्न लिखित उपाय सात सूत्रों के रूप में इस संकट का समाधान में सहायक हो सकते हैं।

पहला, समान नागरिक संहिता यानी एक राष्ट्र, एक कानून। धार्मिक आधार पर मिलने वाली कानूनी रियायतें ही कट्टरपंथ की खाद बनती हैं, जिसमें मोदी सरकार ने नेहरू को भी पीछे छोड़ दिया है।

दूसरा, सख्त जनसंख्या नियंत्रण कानून, जिससे संसाधनों का संकट और जनसांख्यिकीय असंतुलन रोकना आसान हो सके। 'दो बच्चों का मानक' बिना धार्मिक भेदभाव के सभी के लिए अनिवार्य हो।

तीसरा, नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) और सीमा प्रबंधन चुस्त और चौकस हो। घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें नागरिक अधिकारों से वंचित किया जाए और वापस भेजा जाए। सीमाओं को अभेद्य बनाए बिना घुसपैठ रोकना संभव नहीं है।

चौथा, वक्फ कानून में आमूलचूल बदलाव करके भू-अतिक्रमण के कानूनी रास्तों को प्राथमिकता के आधार पर बंद किया जाए।

पाँचवां, कट्टरपंथ विरोधी कानून बनाया जाए, जिसमें लव जिहाद, धर्मांतरण तथा सांप्रदायिकता फैलाने और 'खूनी संघर्ष' जैसी धमकियां देने वालों पर देशद्रोह के तहत त्वरित कार्रवाई हो।

छठा, समान राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू होनी चाहिए, क्योंकि मदरसा शिक्षा पर रोक लगाए बिना कट्टरता रोक पाना संभव नहीं है। इससे क्षेत्रीय संकीर्णता पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा।

सातवां, राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनर्स्थापना की जाए। आक्रांताओं को महिमामंडित करने वाले स्मारकों, प्रतीकों और स्थानों के नाम परिवर्तित किए जाएं। विदेशी आक्रांताओं द्वारा नष्ट या कब्जा किए गए प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक स्थलों का जीर्णोद्धार किया जाए। गुलामी के सभी प्रतीकों को हटाए बिना गुलामी की मानसिकता से मुक्ति संभव नहीं होती; यह पूरे विश्व का अनुभव है। बिना प्राचीन गौरव और राष्ट्रीय अस्मिता की पुनर्स्थापना के कोई भी राष्ट्र सच्चे अर्थों में स्वतंत्र नहीं होता।

भारत का अस्तित्व उसकी 'भारतीयता' और 'सनातन संस्कृति' में निहित है। स्वतंत्रता के 75 साल बाद भी पृथ्वी की सबसे प्राचीन सभ्यता के जिन पूजा स्थलों को आक्रान्ताओं ने तोड़ कर मजहब विशेष के पूजा स्थल बना दिए थे, वे आज भी गुलाम हैं। यही नहीं, सभी महत्वपूर्ण मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं, जिनकी आय सरकार लूटती है ।

आर्थिक उभार बनाम आंतरिक चुनौती

"अंततः, 2026 का भारत आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहां एक ओर 4.2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और 7.5% की विकास दर उसे 'ग्लोबल सुपरपावर' की दहलीज पर ले आई है, तो दूसरी ओर वक्फ बोर्ड जैसी संस्थाओं की असीमित शक्तियां और जनसांख्यिकीय असंतुलन जैसे आंतरिक गतिरोध उसकी नींव को चुनौती दे रहे हैं। आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि यदि 9.4 लाख संपत्तियों वाली वक्फ व्यवस्था प्रशासनिक पारदर्शिता से दूर रहती है और सीमावर्ती क्षेत्रों में जनसांख्यिकी का भूगोल बदलता रहता है, तो आर्थिक समृद्धि का यह महल स्थायी नहीं रह पाएगा।"

‘विश्वगुरु’ की राह: उद्योग से अधिक संस्कृति की आवश्यकता

भारत को 'विश्वगुरु' बनाने का मार्ग केवल आधुनिक फैक्ट्रियों और डिजिटल गेटवे से होकर नहीं गुजरता, बल्कि इसके लिए सनातन संस्कृति को जीवंत और प्रासंगिक बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए उन साहसी विधायी सुधारों की भी आवश्यकता है, जो संविधान को हर मजहबी कानून और समांतर सत्ता से ऊपर स्थापित करें। वक्फ में सुधार और जनसांख्यिकीय सुरक्षा कोई धार्मिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्र की अखंडता का अनिवार्य संकल्प है। इतिहास गवाह है—आर्थिक शिखर उन्हीं राष्ट्रों ने छुआ है, जिनकी आंतरिक नींव सुरक्षित और पारंपरिक सामाजिक ढांचा मजबूत रहा है।

राष्ट्र-निर्माण, सामाजिक एकता और अखंडता केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। मोदी सरकार पर भरोसा यूजीसी प्रकरण के बाद तार-तार हो चुका है। लोग सदमे जैसी स्थिति में हैं, कि अब किस पर विश्वास करें । अब जब सभी राजनीतिक दल तुष्टिकरण और जातिगत राजनीति में आकंठ डूब चुके हैं, तो देश कौन बचाएगा।

भारत की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष संरचना तभी तक सुरक्षित है जब तक इसकी मूल सांस्कृतिक प्रकृति अक्षुण्ण है। वर्तमान परस्थितियों में सभी राष्ट्रभक्तों को यह संकल्प लेना होगा कि हम राष्ट्र की आर्थिक प्रगति में भागीदार बनने के साथ-साथ अपने सामाजिक परिवेश के प्रति भी सजग रहेंगे। जब समाज जागृत होता है, तभी वे सरकारों पर कड़े निर्णय लेने का दबाव बना सकती हैं। याद रखिए, सजग नागरिक ही सुरक्षित भारत की पहली रक्षा पंक्ति है।

~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~

भागवत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम मदनी की ‘खूनी चेतावनी’ || विचारधारा का मतभेद या टकराव की आहट?

  भागवत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम मदनी की ‘खूनी चेतावनी’ || विचारधारा का मतभेद या टकराव की आहट? हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स...