रविवार, 14 जून 2026

मोदी के बारह वर्ष का कार्यकाल बेमिशाल ?

 



कालखंड का न्याय : लोकतांत्रिक निरंतरता का महाशिखर और राष्ट्रहित की शाश्वत चुनौतियां

                                                          लेखक - शिव मिश्रा 

राष्ट्रीय नेतृत्व का नया कीर्तिमान और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में जून २०२६ का यह सप्ताह एक युगांतकारी मोड़ बनकर उभरा है। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लगातार चार हजार तीन सौ निन्यानबे दिनों तक शासन के शीर्ष पर रहकर स्वतंत्र भारत के इतिहास में सर्वाधिक समय तक लगातार सेवा करने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री का कीर्तिमान स्थापित किया है। उन्होंने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित निरंतर कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। यद्यपि ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो पंडित नेहरू का कुल राजनीतिक नेतृत्व स्वतंत्रता से पूर्व ही आरंभ हो गया था, जब २ सितंबर १९४६ को अंतरिम सरकार का गठन हुआ और उन्होंने वायसराय की कार्यकारी परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभाला था। तत्पश्चात १५ अगस्त १९४७ को देश की स्वतंत्रता के साथ वे प्रथम प्रधानमंत्री बने, किंतु लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में उनका अनवरत कार्यकाल वर्ष १९५२ के पहले आम चुनाव में पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के बाद ही प्रारंभ हुआ था, जो चार हजार तीन सौ अठानवे दिनों तक चला। आज इस ऐतिहासिक आंकड़े को पार करना केवल एक राजनीतिक दल की चुनावी विजय मात्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय जनमानस के उस गहरे विश्वास का प्रतीक है जिसने देश की नीति और दिशा को एक नया धरातल दिया है।

एक ओर जहां स्वतंत्र भारत अपनी स्वाधीनता के सतहत्तर से अधिक वर्ष पूर्ण कर चुका है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान नेतृत्व ने अपने सफल बारह वर्ष पूरे किए हैं। इस दीर्घायु कालखंड की सबसे बड़ी महत्ता यह है कि जहां पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों के लंबे कार्यकाल अक्सर राजनीतिक अस्थिरता, गठबंधन की मजबूरियों, आंतरिक अंतर्विरोधों या नीतिगत पंगुता से जूझते रहे, वहीं बीते बारह वर्षों का यह सफर पूर्ण बहुमत के स्थायित्व, दृढ़ इच्छाशक्ति और साहसिक निर्णयों का साक्षी रहा है। भारतीय जनता ने पुराने ढर्रे की शिथिलता को नकारकर राष्ट्रहित, सुरक्षा और सांस्कृतिक स्वाभिमान की इस नई धारा पर अपनी अटूट मुहर लगाई है। परंतु, किसी भी राष्ट्र के इतिहास में केवल कार्यकाल की दीर्घता ही सर्वोच्च मानदंड नहीं हो सकती। वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होता है कि उस कालखंड में राष्ट्र की संप्रभुता, अखंडता और उसकी मूल आत्मा की रक्षा के लिए कितने निर्णायक प्रयास किए गए। आज जब भारत अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ रहा है, तब राष्ट्रवाद की परिभाषा भौगोलिक सीमाओं की रक्षा से आगे बढ़कर सांस्कृतिक अस्तित्व को अक्षुण्ण रखने की अग्निपरीक्षा बन चुकी है।

स्वतंत्रता के प्रारंभिक दशक और सामरिक आदर्शवाद की सीमाएं

यदि हम स्वतंत्र भारत के शुरुआती सरसठ वर्षों का अवलोकन करें, तो देश ने चौदह प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल देखा, जिनमें से प्रत्येक ने अपनी-अपनी वैचारिक प्राथमिकताओं के अनुसार राष्ट्र निर्माण में योगदान दिया। पंडित जवाहरलाल नेहरू के युग को आधुनिक संस्थानों और उद्योगों की नींव रखने का काल माना जाता है। उन्होंने वैज्ञानिक चेतना और तकनीकी विकास के लिए प्रारंभिक ढांचे का निर्माण किया, किंतु उनका राष्ट्रवाद वैश्विक समाजवाद और गुटनिरपेक्षता के आदर्शवादी सिद्धांतों से अत्यधिक प्रभावित था। परिणामतः, परम राष्ट्रहित और सामरिक संप्रभुता के मोर्चे पर तत्कालीन नीतियां कूटनीतिक अदूरदर्शिता का शिकार हो गईं। वर्ष १९६२ में चीन के हाथों मिली सैन्य पराजय तत्कालीन रक्षा नीति की बहुत बड़ी विफलता थी। इसके अतिरिक्त, कश्मीर के आंतरिक भू-भाग के विषय को संयुक्त राष्ट्र संघ की चौखट पर ले जाना और तिब्बत पर चीनी आधिपत्य को मौन स्वीकृति देना ऐसी ऐतिहासिक भूलें थीं, जिन्होंने भारत की सीमाओं को स्थायी रूप से संवेदनशील बना दिया। उस कालखंड का राष्ट्रवाद अत्यंत रक्षात्मक था, जिसमें शत्रु को उसकी सीमा में जवाब देने के शौर्य का अभाव दिखता था।

पंडित नेहरू के पश्चात लाल बहादुर शास्त्री के संक्षिप्त परंतु ओजस्वी कार्यकाल ने देश के राष्ट्रीय स्वाभिमान को पुनर्जीवित किया। वर्ष १९६५ के युद्ध में पाकिस्तान को करारी शिकस्त देकर और कृषि तथा सैन्य शक्ति के समन्वय से 'जय जवान, जय किसान' का उद्घोष कर उन्होंने सिद्ध किया कि भारत किसी भी विदेशी शक्ति के सामने घुटने नहीं टेकेगा। उनके इस सैन्य राष्ट्रवाद को इंदिरा गांधी ने और अधिक विस्तार दिया। वर्ष १९७१ के युद्ध में पाकिस्तान के दो टुकड़े कर मानचित्र को बदल देना और बांग्लादेश का निर्माण करना उनकी सामरिक दृढ़ता का चरमोत्कर्ष था। इसी प्रकार वर्ष १९७४ में पोखरण में प्रथम शांतिपूर्ण परमाणु परीक्षण कर उन्होंने वैश्विक शक्तियों के परमाणु एकाधिकार को चुनौती दी और देश के वित्तीय समावेशन के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया। तथापि, इसी कार्यकाल में वर्ष १९७५ से १९७७ तक लगाया गया आंतरिक आपातकाल भारतीय लोकतंत्र पर एक अमिट कलंक बन गया, जिसने नागरिक स्वतंत्रताओं को कुचलकर राष्ट्रवाद की लोकतांत्रिक आत्मा को गहरी क्षति पहुंचाई।

आर्थिक संक्रांति, गठबंधन की विवशताएं और सुरक्षा की शिथिलता

अस्सी के दशक के राजनीतिक संक्रमण के बाद वर्ष १९९१ में पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में देश ने अभूतपूर्व आर्थिक संकट का सामना किया, जब राष्ट्रीय स्वर्ण भंडार को विदेशी बैंकों में गिरवी रखने की नौबत आ गई थी। उस कठिन घड़ी में राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्विक एकीकरण की नीतियों को लागू किया गया, जिसने देश को दिवालिया होने से बचाया और आर्थिक विकास के नए द्वार खोले। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भारत ने सांस्कृतिक और सामरिक राष्ट्रवाद का एक अत्यंत संतुलित रूप देखा। वर्ष १९९८ में पोखरण में द्वितीय परमाणु परीक्षण कर भारत को एक घोषित परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाना और वैश्विक प्रतिबंधों का निर्भीकता से सामना करना उनकी सरकार की महानतम उपलब्धि थी। उन्होंने सर्व शिक्षा अभियान के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा की नींव को सुदृढ़ किया तथा स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के द्वारा देश के चारों कोनों को राजमार्गों से जोड़कर आर्थिक राष्ट्रवाद को एक नई गति प्रदान की। उनका राष्ट्रवाद राष्ट्रीय अस्मिता और सबको साथ लेकर चलने की सर्वसमावेशी भावना पर आधारित था।

इसके विपरीत, वर्ष २००४ से २०१४ तक का डॉ. मनमोहन सिंह का दशक आर्थिक प्रगति का भ्रम पैदा करने के बावजूद अंततः नीतिगत पंगुता और व्यापक भ्रष्टाचार के दलदल में धंस गया। इस कालखंड में राष्ट्रीय सुरक्षा की स्थिति अत्यंत चिंताजनक हो गई थी। छब्बीस नवंबर को मुंबई में हुए भीषण आतंकवादी हमले के बाद भी शासन की प्रतिक्रिया अत्यंत दुर्बल और केवल कागजी विरोध तक सीमित रही। वैश्विक मंच पर भारत की छवि एक ऐसे असहाय राष्ट्र की बन गई थी जो निरंतर आघात सहने के बाद भी दंडात्मक कार्रवाई करने का साहस नहीं जुटा पाता था। आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर तुष्टिकरण की पराकाष्ठा ने बहुसंख्यक समाज के भीतर एक गहरी हीनभावना, सांस्कृतिक असुरक्षा और अपनी ही पहचान के प्रति संकोच की स्थिति उत्पन्न कर दी थी, जिससे राष्ट्र की आंतरिक शक्ति क्षीण होने लगी थी।

बीते बारह वर्ष: संप्रभुता का शंखनाद और सांस्कृतिक पुनरुत्थान

वर्ष २०१४ में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार के गठन के साथ ही भारत की शासन व्यवस्था में एक युगांतकारी वैचारिक परिवर्तन का सूत्रपात हुआ। उन्होंने 'राष्ट्र प्रथम' के संकल्प को अपनी नीतियों का मूलमंत्र बनाया और तुष्टिकरण के स्थान पर न्यायसंगत संतुष्टीकरण की नीति अपनाई। राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर भारत ने अपनी रक्षात्मक मुद्रा को त्यागकर अग्रगामी और निवारक नीति का अवलंबन किया। उरी और पुलवामा के आतंकवादी हमलों के पश्चात सीमा पार जाकर की गई सैन्य कार्रवाइयों और हवाई हमलों ने संपूर्ण विश्व को यह कड़ा संदेश दिया कि भारत अब केवल सहन नहीं करेगा, बल्कि प्रहार के स्रोतों को उनके घर में घुसकर नष्ट करने की सामर्थ्य रखता है। इसी दृढ़ता का परिणाम था कि दशकों से लंबित जम्मू-कश्मीर के अनुच्छेद ३७० और पैंतीस-ए को निरस्त कर संपूर्ण राष्ट्र में एक विधान, एक प्रधान और एक निशान की अवधारणा को पूर्णतः लागू किया गया, जिसने अलगाववाद के तंत्र को समूल नष्ट कर दिया।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के धरातल पर यह बारह वर्ष का कालखंड भारत के सभ्यतागत गौरव के पुनर्जागरण का स्वर्ण काल रहा है। वर्ष २०२४ में अयोध्या में प्रभु श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण और उनकी प्राण-प्रतिष्ठा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं था, बल्कि वह सदियों की सांस्कृतिक पराधीनता के प्रतीकों से मुक्ति और राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनर्स्थापना का महाप्रतीक बना। इसी प्रकार काशी विश्वनाथ धाम, उज्जैन के महाकाल लोक और केदारनाथ-बद्रीनाथ जैसे प्राचीन तीर्थ क्षेत्रों का कायाकल्प इस बात का जीवंत प्रमाण है कि आधुनिक विकास और प्राचीन विरासत का सह-अस्तित्व संभव है। पूर्ववर्ती सरकारों ने जहां धर्मनिरपेक्षता के छद्म आवरण में भारत की मूल सनातन पहचान को प्रकट करने में सदैव संकोच किया, वहीं वर्तमान नेतृत्व ने वैश्विक मंचों पर योग, आयुर्वेद और भारतीय जीवन दर्शन को पूरे गौरव के साथ प्रतिष्ठित किया है।

आर्थिक और तकनीकी आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में भी इस कालखंड ने नए आयाम स्थापित किए हैं। जनधन खातों, आधार और मोबाइल की त्रिशक्ति के माध्यम से प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की व्यवस्था ने उस बिचौलिया संस्कृति को समाप्त कर दिया, जिसने देश के विकास को दशकों तक लूटा था। आज भारत ने अपनी तकनीकी संप्रभुता को सिद्ध करते हुए एक ऐसी एकीकृत भुगतान प्रणाली विकसित की है, जो विश्व के विकसित देशों के लिए भी अचंभे का विषय है। 'भारत में बनाओ' की नीति के कारण आज देश हथियारों के आयातक की छवि से बाहर निकलकर रक्षा उपकरणों का निर्यातक बनने की दिशा में अग्रसर है। सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत करोड़ों शौचालयों का निर्माण, उज्ज्वला योजना के माध्यम से गैस कनेक्शन, आयुष्मान भारत के तहत स्वास्थ्य सुरक्षा और महामारी के समय अस्सी करोड़ से अधिक नागरिकों को निःशुल्क अन्न की आपूर्ति जैसी योजनाओं ने देश के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन स्तर में स्थायी सुधार किया है। कूटनीतिक स्तर पर भी भारत आज एक याचक नहीं, बल्कि वैश्विक संकटों में अपनी स्वतंत्र नीति पर अडिग रहने वाला एक सशक्त मार्गदर्शक बनकर उभरा है।

राष्ट्रहित की अधूरी कसौटी: सनातन अस्मिता और आंतरिक विडंबनाएं

परंतु, किसी भी निष्पक्ष और राष्ट्रहित-केंद्रित विश्लेषण में केवल उपलब्धियों का गान करना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उन गंभीर चुनौतियों पर आत्ममंथन करना भी आवश्यक है जो देश के भविष्य के लिए संकट बनी हुई हैं। स्वतंत्रता के सात दशक से अधिक समय बीत जाने के उपरांत और चौदह प्रधानमंत्रियों के शासन के बाद भी, यह एक कड़वी वास्तविकता है कि भारत की मूल सनातन संस्कृति अपने ही देश में पूर्णतः स्वतंत्र और सुरक्षित अनुभव नहीं कर पा रही है। वर्ष १९४७ में पंथ और धर्म के आधार पर देश का विभाजन होने और एक बड़े भू-भाग को पृथक राष्ट्र बना दिए जाने के बाद भी, बहुसंख्यक हिंदू समाज को अपनी ही भूमि पर संवैधानिक रूप से दोयम दर्जे की विडंबनाओं का सामना करना पड़ रहा है। हिंदुओं के पवित्र मंदिर आज भी सरकारी नियंत्रण से मुक्त नहीं हो सके हैं, जबकि अन्य समुदायों के धार्मिक स्थलों को पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त है। मंदिरों के चढ़ावे की राशि पर सरकारों का नियंत्रण रहता है, जिसका उपयोग कई बार गैर-सनातनी कार्यों में किया जाता है। जिन प्राचीन मंदिरों को आक्रांताओं ने ध्वस्त किया था, उनमें से कुछ को छोड़कर बहुसंख्यक स्थलों का जीर्णोद्धार आज भी लंबित है।

इस संदर्भ में वर्ष १९९१ में बनाया गया पूजा स्थल कानून एक बहुत बड़ी विसंगति बनकर खड़ा है, जिसे व्यवहार में एक प्रकार से सातवीं शताब्दी के आक्रांताओं के कुकृत्यों को कानूनी संरक्षण देने जैसा माना जाता है। स्वतंत्रता के पूर्व के दो सौ वर्षों के ब्रिटिश शासन और उससे पहले के क्रूर मुस्लिम कालखंड में इन ध्वस्त मंदिरों का उद्धार असंभव था, और स्वतंत्रता के बाद इस कानून ने हिंदुओं को अपनी आस्था के केंद्रों को वापस पाने के कानूनी अधिकार से ही वंचित कर दिया। इसके अतिरिक्त, शिक्षा के क्षेत्र में भी एक गंभीर संवैधानिक असंतुलन दिखाई देता है। हिंदुओं को अपने पारंपरिक गुरुकुलों को स्वतंत्र रूप से चलाने का वह अधिकार प्राप्त नहीं है, जो अन्य समुदायों को अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान चलाने के नाम पर मिला हुआ है। इस प्रकार की संवैधानिक और प्रशासनिक व्यवस्थाएं भारत की मूल सनातनी चेतना को धीरे-धीरे कमजोर कर रही हैं। अनेक वैश्विक और आंतरिक षड्यंत्रों के माध्यम से देश की जनसांख्यिकी को परिवर्तित करने, अवैध धर्मांतरण को हथियार बनाने और राष्ट्र की संप्रभुता को चुनौती देने वाले विभिन्न छद्म अभियानों को रोकने में वर्तमान सरकार की नीतियां भी पूरी तरह सफल नहीं हो सकी हैं।

कई बार यह प्रतीत होता है कि शासन में इस दिशा में दृढ़ इच्छाशक्ति की न्यूनता है, अन्यथा बारह वर्ष का अटूट और प्रचंड बहुमत का कार्यकाल किसी भी राष्ट्र के सांस्कृतिक स्वाभिमान और ऐतिहासिक न्याय को पूर्णतः स्थापित करने के लिए पर्याप्त होता है। मोदी सरकार के इन बारह वर्षों में शिक्षा और संस्कृति जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार वैचारिक रूप से शिथिल रहा, जिसके कारण न तो भारत की पाठ्यपुस्तकों में दर्ज विकृत इतिहास को समूल सुधारा जा सका और न ही संपूर्ण शिक्षा प्रणाली को भारतीय संस्कारों के अनुकूल प्रदूषण मुक्त किया जा सका। प्रधानमंत्री ने वर्ष २०४७ तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का भव्य स्वप्न तो दिखाया है, परंतु राष्ट्रहित का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि वह विकसित भारत अपनी मूल सनातनी आत्मा के साथ जीवित रहेगा या केवल एक भौतिकवादी और सांस्कृतिक पहचान से विहीन भू-भाग बनकर रह जाएगा?

निष्कर्ष: सर्वाधिक कार्यकाल बनाम सर्वाधिक कार्य का संकल्प

स्वतंत्र भारत के समूचे राजनीतिक इतिहास की यात्रा का यदि सूक्ष्म और निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए, तो वर्ष १९४७ से २०१४ तक का समय भारत को एक भौगोलिक इकाई के रूप में सहेजने, उसके अस्तित्व को बाहरी संकटों से बचाने और विभिन्न अंतर्विरोधों के बीच देश की व्यवस्था को चलाए रखने का कालखंड था। पंडित नेहरू से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह तक, प्रत्येक प्रधानमंत्री ने अपनी सीमाओं, वैचारिक दृष्टिकोणों और तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप देश की प्रगति में अपना योगदान दिया, जिसे पूर्णतः नकारा नहीं जा सकता। परंतु वर्ष २०१४ से २०२६ के ये बारह वर्ष भारत के भीतर एक सुसुप्त पड़े आत्मविश्वास को जगाने और उसे वैश्विक पटल पर एक सुदृढ़ आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में स्थापित करने के साक्षी रहे हैं। वर्तमान नेतृत्व ने देश को एक मजबूर राष्ट्र की छवि से निकालकर एक मजबूत और निर्णायक महाशक्ति के मार्ग पर अग्रसर अवश्य किया है।

तथापि, इतिहास का न्याय अत्यंत क्रूर और निष्पक्ष होता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यह सदैव स्मरण रखना होगा कि इतिहास में केवल सर्वाधिक लंबे कार्यकाल का प्रधानमंत्री बन जाना ही उनकी वास्तविक श्रेष्ठता को सिद्ध नहीं करेगा। लोकतांत्रिक कीर्तिमानों की संख्या से कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि क्या उनका नेतृत्व इस देश की प्राचीन सनातन संस्कृति, उसकी जनसांख्यिकीय सुरक्षा, और राष्ट्र की आंतरिक अखंडता को उन गहरे संकटों से स्थायी मुक्ति दिला सका जो भारत को भीतर से खोखला कर रहे हैं। केवल भौतिक और आर्थिक विकास किसी राष्ट्र को अमर नहीं बनाता; राष्ट्र अपने सांस्कृतिक प्राणों से जीवित रहता है। अतः, सर्वाधिक लंबे समय तक पद पर रहने की उपलब्धि की अपेक्षा राष्ट्र की एकता, अखंडता और आदि-अनादि सनातन संस्कृति की चिरंतन सुरक्षा के लिए सर्वाधिक युगांतकारी कार्य करने वाला प्रधानमंत्री बनना ही वास्तविक रूप से ऐतिहासिक, स्मरणीय और परम राष्ट्रीय हित में होगा।

~~~शिव मिश्रा ~~~

मोदी के बारह वर्ष का कार्यकाल बेमिशाल ?

  कालखंड का न्याय : लोकतांत्रिक निरंतरता का महाशिखर और राष्ट्रहित की शाश्वत चुनौतियां                                                       ...