शुक्रवार, 7 अगस्त 2026

बांकीपुर और दतिया: मोदी और भाजपा के लिए सामान्य वर्ग का स्पष्ट संदेश

 

बांकीपुर और दतिया: मोदी और भाजपा के लिए सामान्य वर्ग का स्पष्ट संदेश

 

जंतर-मंतर पर हुए विपक्षी दलों के नाटकीय और आक्रामक प्रदर्शन के संकट से भाजपा अथक प्रयासों के बाद उबर भी नहीं पाई थी कि उसका सामना एक ऐसी सच्चाई से हो गया, जिससे पार्टी नेतृत्व ने सख्ती से मुंह मोड़ लिया था। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा उपचुनावों में बिहार की बांकीपुर और मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर मिली करारी हार ने भाजपा को आत्ममंथन करने के लिए मजबूर कर दिया है। सवाल यह है कि क्या पार्टी उस सच्चाई का सामना करने के लिए तैयार है, जो इन 'अभेद्य गढ़ों' के ढहने का मूल कारण है? ये हार किसी सामान्य या छोटे-मोटे कारणों का परिणाम नहीं हैं, बल्कि यह एक गहरे होते असंतोष का प्रकटीकरण है।

अभेद्य किलों का पतन: नेतृत्व की विफलता

बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट का परिणाम राज्य में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की एक बड़ी परीक्षा थी, जिसमें पार्टी बुरी तरह असफल रही। आमतौर पर उपचुनावों में सत्ताधारी दल को बढ़त मिलती है, लेकिन बांकीपुर में ऐसा नहीं हुआ। यह वह सीट है, जिसका प्रतिनिधित्व दशकों तक स्वर्गीय नवीन किशोर सिन्हा और उनके बाद उनके पुत्र (वर्तमान भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष) नितिन नवीन करते रहे। 31 वर्ष से जो सीट भाजपा के पास थी, वह एक झटके में जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर के खाते में चली गई और वह भी 19,000 से अधिक वोटों के बड़े अंतर से।

17 जून 2026 को हुए भरत तिवारी हत्याकांड, ने भी भाजपा की हार मे बड़ी भूमिका निभायी,  जो  बिहार के भोजपुर जिले में पुलिस द्वारा किया गया एक कथित फर्जी एनकाउंटर मामला है, जिसने राज्य की कानून-व्यवस्था पर तो गंभीर सवाल खड़े किए ही भाजपा  का ब्राह्मणों के प्रति उपेक्षित वर्ताव भी रेखांकित किया। 26 वर्षीय भरत तिवारी, बीएससी  शिक्षित बेरोजगार था। वह कोई पेशेवर अपराधी नहीं था लेकिन गंगा नदी के कटाव से विस्थापित हुए बाढ़ पीड़ितों के पुनर्वास और हक की लड़ाई लड़ रहा था। फेस बुक लाइव करके, कैमरे के सामने  आत्मसमर्पण करने वाले भरत के  परिजनों और चश्मदीदों  का आरोप है कि पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चला कर उसका फर्जी एनकाउंटर कर दिया । पुलिस ने  मृत भरत के बुजुर्ग पिता और उनके भाई पर भी अवैध हथियार संरक्षण की गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज कर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। सरकार पर ब्राहमण विरोधी आरोप चस्पा होते रहे लेकिन भाजपा ने ठीक से इसका विरोध तक  नहीं किया।   

 

भाजपा के लिए यह पराजय इसलिए भी दुखदायी है क्योंकि बिहार मामलों के प्रभारी स्वयं पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा हैं और यह क्षेत्र कद्दावर नेता रविशंकर प्रसाद का लोकसभा क्षेत्र भी है। बिहार में दशकों से अपनी सरकार बनाने का सपना संजोने वाली भाजपा के नव-नियुक्त नेतृत्व (विशेषकर मुख्य मंत्री सम्राट चौधरी) से जो जादू की उम्मीद थी, वह धरी की धरी रह गई। अप्रैल में ही बिहार के पहले भाजपा मुख्यमंत्री के तौर पर सम्राट चौधरी ने सत्ता संभाली है। ऐसे में बाँकीपुर का चुनाव उनके नेतृत्व पर भी एक मौन जनमत संग्रह की तरह देखा जा रहा है। यह परिणाम यह भी स्पष्ट करता है कि पार्टी का कट्टर माने जाने वाला सवर्ण और शहरी वोटर भी अब आँख मूंदकर वोट देने को तैयार नहीं है। असम में हिमंत बिस्वा सरमा और पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी ने जिस तरह अपने राजनीतिक कौशल से भाजपा को मजबूत किया, बिहार में वैसा कोई चमत्कार देखने को नहीं मिला।

 

वहीं दूसरी ओर, मध्य प्रदेश की दतिया सीट का उपचुनाव भाजपा के अंतर्कलह और संगठनात्मक विफलता की कहानी कहता है। लगातार 15 वर्षों तक नरोत्तम मिश्रा का गढ़ रही इस सीट पर जब कांग्रेस विधायक की सदस्यता रद्द होने के बाद उपचुनाव हुए, तो भाजपा ने मिश्रा का टिकट काटकर नया उम्मीदवार उतारा। मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में यह चुनाव भाजपा को हर हाल में जीतना चाहिए था, लेकिन कार्यकर्ताओं का असंतोष और रणनीतिक चूक भारी पड़ी।


मूल कारण: सामान्य वर्ग की उपेक्षा और आक्रोश

समस्याओं से मुंह मोड़ने या उन्हें हिकारत से देखने से उनका समाधान नहीं होता। बांकीपुर और दतिया में भाजपा का विजय रथ रोकने वाला सबसे बड़ा फैक्टर हैसामान्य वर्ग का बढ़ता आक्रोश

 

यह आक्रोश हाल ही में यूजीसी गाइडलाइंस को लेकर हुए सामान्य वर्ग के छात्रों के आंदोलन को कुचलने और केंद्र सरकार द्वारा उनकी पूरी तरह से उपेक्षा करने के कारण उपजा है। सामान्य वर्ग के छात्रों के प्रदर्शन को भाजपा शासित राज्यों में सख्ती से दबाया गया। जंतर-मंतर पर उन्हें प्रदर्शन की अनुमति तक नहीं दी गई, यह तर्क देकर कि इससे 'वातावरण विषाक्त' होगा। इसके विपरीत, काकरोच जनता पार्टी  को उसी जंतर-मंतर पर बिना किसी बाधा के प्रदर्शन करने की खुली छूट दी गई। भयावह अराजकता की गई और  शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र का इस्तीफा भी हुआ। लेकिन यूजीसी मामले में तत्कालीन शिक्षामंत्री की हठधर्मिता पूर्ण चुप्पी और प्रधानमंत्री की अहंकार भरी अनदेखी ने उस युवा वर्ग को निराश किया है, जो बिना किसी स्वार्थ के सोशल मीडिया और जमीन पर भाजपा के लिए एक वैचारिक योद्धा की तरह खड़ा रहता था।

यूजीसी गाइडलाइंस के अतिरिक्त, एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग ने भी इस वर्ग को लहूलुहान कर रखा है। अध्ययनों में सामने आया है कि इस एक्ट के तहत दर्ज बड़ी संख्या में मामले फर्जी पाए गए हैं, लेकिन इसके बावजूद निर्दोष लोगों (सामान्य वर्ग और ब्राह्मण समुदाय) का जीवन मुकदमों और जेलों में बर्बाद हो रहा है।

"आज का ब्राह्मण, कल का दलित"

सामान्य वर्ग, विशेषकर ब्राह्मण समुदाय की आर्थिक स्थिति आज विपन्नता से भी बदतर हो चुकी है। फ्रांसीसी पत्रकार फ़्राँस्वा गॉटियर के शोध का शीर्षक ही है"आज का ब्राह्मण, कल का दलित"

गॉटियर की रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि ब्राह्मण आज के भारत के नए दलित हैं। देश के बड़े शहरों में 50% से अधिक रिक्शा चालक और सार्वजनिक शौचालयों (सुलभ शौचालय) में कार्यरत कर्मी ब्राह्मण समुदाय से आते हैं। यह वही वर्ग है जो ऐतिहासिक रूप से भारत की बौद्धिक संपदा का संरक्षक था, लेकिन 'एंटी-ब्राह्मण' राजनीति ने इसे गरीबी के दलदल में धकेल दिया है।

·         आर्थिक बदहाली: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और बड़े शहरों के समृद्ध घरों में 75% रसोइये और 50% से अधिक घरेलू कामगार इसी समुदाय से हैं।

·         पलायन और विस्थापन: यूपी-बिहार के गांवों में झूठे मुकदमों के डर से सामान्य वर्ग के युवा शहरों में मजदूरी करने को विवश हैं। कश्मीर घाटी के सम्मानित पंडित आज अपने ही देश में शरणार्थी हैं, लेकिन 'नगण्य वोट बैंक' मानकर उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।

इन सबके बावजूद, यह समुदाय 'राष्ट्र प्रथम' की भावना से विचलित नहीं हुआ है। लेकिन राजनीति को यह समझना होगा कि जिस नींव पर इमारत टिकी है, उसे ही कमजोर कर दिया जाए, तो छत का गिरना तय है।

आंकड़ों की गवाही और भविष्य की चेतावनी

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों की एकमुश्त वोटिंग ने 2007 में मायावती और 2012 में अखिलेश यादव को सत्ता दिलाई थी। दोनों से निराश होकर 2017 में यह समुदाय पूरी आशा और विश्वास के साथ भाजपा से जुड़ा। लेकिन राज्य में लगातार दो बार सरकार बनने के बाद भी इस समाज को कुछ मंत्री पदों के झुनझुने के अलावा कोई ठोस नीतिगत राहत नहीं मिली।

 

हिंदी पट्टी में इस वर्ग की जनसांख्यिकी को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता जो इन आंकड़ों से स्वत: स्पष्ट है ।

·         उत्तर प्रदेश: सामान्य वर्ग 25-26% (ब्राह्मण लगभग 15%)

·         मध्य प्रदेश: सामान्य वर्ग 22-23% (ब्राह्मण 6-7%)

·         राजस्थान: सामान्य वर्ग 20-22% (ब्राह्मण 8-9%)

·         बिहार: सामान्य वर्ग 16-17% (ब्राह्मण 7-8%)

इतनी बड़ी आबादी किसी भी राजनीतिक दल को सत्ता के शिखर पर बैठाने और वहां से बेदखल करने की पूरी क्षमता रखती है। बांकीपुर और दतिया के नतीजे आश्चर्यजनक नहीं हैं; जमीनी हकीकत समझने वाली जनता को इसका अंदेशा पहले से था। यदि भाजपा इसका पूर्वानुमान नहीं लगा सकी तो यह भी उसकी बड़ी विफलता है।

भाजपा के लिए खतरे की चेतावनी -

भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह समझना होगा कि केवल 'सबका साथ, सबका विकास' और सबका विश्वास के नारे से  मुस्लिमों, पिछड़े और दलित समुदायों को रिझाने और विकसित भारत का सपना दिखाने की रणनीति से चुनाव नहीं जीते जा सकते । अन्य दलों की तरह हिन्दू समाज का जातिगत दोहन करने का खामियाजा उसे भगतना ही पड़ेगा।

 

कार्यकर्ताओं की नाराज़गी तो सभी राजनैतिक दलों के  नुकशानदेह होती हैं लेकिन भाजपा जैसे काडर आधारित पार्टी के लिए घातक होती है।  दतिया का संदेश है कि चुनाव केवल हाईकमान के आदेशों से नहीं, बल्कि ज़मीनी कार्यकर्ताओं के उत्साह से जीते जाते हैं। स्थानीय क्षत्रपों को नज़रअंदाज़ करने से पार्टी को ही नुकसान होता है।

 

उप्र, पश्चिम बंगाल, असम, बिहार और दिल्ली के विधानसभा चुनावों ने सभी राजनैतिक दलों को   स्पष्ट संदेश दिया है, कि केवल मुस्लिम तुष्टीकरण के सहारे चुनाव नहीं जीते जा सकते, वहीं बाँकी पुर और दतिया के उपचुनावों ने भाजपा को गंभीर चेतावनी दे दी है कि सामान्य वर्ग की उपेक्षा और अपमानित करके भी चुनाव नहीं जीते जा सकते। यदि कोर वोटर (सामान्य वर्ग) को यह गलतफहमी मानकर उपेक्षित किया जाता रहा कि "ये जाएंगे कहाँ?", तो इसका परिणाम आत्मघाती होगा। यदि समय रहते भाजपा ने सुधारात्मक कदम नहीं उठाए, तो बांकीपुर और दतिया की यह चिंगारी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों और अन्य राज्यों में एक बड़े  राजनीतिक दावानल का रूप ले सकती है।

~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~

बांकीपुर और दतिया: मोदी और भाजपा के लिए सामान्य वर्ग का स्पष्ट संदेश

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