भारत-पाकिस्तान वार्ता की नई पुकार:
शांति की पहल या कुछ और?
— शिव प्रकाश मिश्रा, वरिष्ठ
स्तंभकार
शांति एक सुंदर शब्द है। इतना सुंदर कि उसके नाम पर उठने वाले प्रश्न
भी कई बार असुविधाजनक लगने लगते हैं। कौन चाहेगा कि दो पड़ोसी देश हमेशा तनाव में
रहें? कौन युद्ध चाहेगा? कौन नहीं चाहेगा कि सीमाओं पर
बंदूकें शांत हों, व्यापार बढ़े, लोग
एक-दूसरे से मिलें और आने वाली पीढ़ियां भयमुक्त वातावरण में जी सकें? लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल सुंदर शब्दों से नहीं चलती। वहां
सदिच्छा के साथ स्मृति भी चाहिए, आदर्शों के साथ अनुभव और
शांति की इच्छा के साथ राष्ट्रीय हितों की समझ भी। विशेष रूप से तब, जब सामने पाकिस्तान जैसा पड़ोसी हो, जिसके साथ भारत
के संबंधों का इतिहास जितना वार्ताओं से भरा है, उतना ही
युद्धों, विश्वासघात और सीमा पार आतंकवाद के रक्तरंजित
अध्यायों से भी।
इसी पृष्ठभूमि में भारत के 61 और पाकिस्तान के 56 प्रमुख
नागरिकों द्वारा दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों—नरेंद्र
मोदी और शहबाज शरीफ—को लिखा गया खुला पत्र महत्वपूर्ण हो
जाता है। इस पत्र में पूर्ण राजनयिक संबंधों की बहाली, उच्चायुक्तों
की वापसी, सामान्य वीजा सेवाओं को फिर शुरू करने, व्यापार और परिवहन संपर्क खोलने, व्यापक द्विपक्षीय
संवाद आरंभ करने और जम्मू-कश्मीर सहित विवादित विषयों पर बातचीत की मांग की गई है।
भारतीय हस्ताक्षरकर्ताओं में डॉ. फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती,
मीरवाइज उमर फारूक, मणिशंकर अय्यर, प्रो. मनोज झा और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के पूर्व प्रमुख ए. एस. दुलत
जैसे चर्चित नाम शामिल बताए गए हैं, जो पाकिस्तान के साथ खड़े होने का आभास देते रहे
हैं।
लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को शांति की अपील करने का अधिकार है। इस
पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की नीयत पर प्रश्न न भी उठाए तो भी
किसी राजनीतिक अथवा कूटनीतिक पहल का मूल्यांकन केवल उसके शब्दों से नहीं, उसके समय, संदर्भ और संभावित परिणामों से भी किया जाता है। इसलिए पहला प्रश्न यही है—यह अपील इसी समय
क्यों?
क्या यह केवल संयोग है कि पाकिस्तान इस समय सिंधु जल संधि को पुनः
सक्रिय कराने के लिए अंतरराष्ट्रीय वातावरण बनाने में लगा है; लगभग उसी समय
भारत-पाकिस्तान संबंधों को सामान्य करने की मांग उठ रही है; और
भारत के भीतर भी कुछ राजनीतिक शक्तियां सरकार की पाकिस्तान नीति को लेकर नया
विमर्श खड़ा करती दिखाई दे रही हैं?
पहलगाम के बाद इतनी जल्दी सामान्य
संबंधों की बात क्यों?
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए
आतंकवादी हमले में 26 निर्दोष लोगों की हत्या कर दी गई। इस
हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया। इसके बाद भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से
पाकिस्तान स्थित आतंकवादी ढांचे के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई की और कई महत्वपूर्ण
कूटनीतिक कदम उठाए। इनमें 1960 की सिंधु जल संधि को स्थगित
करना सबसे दूरगामी निर्णयों में एक था। भारत का घोषित रुख स्पष्ट है—सिंधु जल संधि तब तक स्थगित रहेगी, जब तक पाकिस्तान
विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय रूप से सीमा पार आतंकवाद का समर्थन नहीं छोड़ता।
शांति का आह्वान तभी विश्वसनीय होता है, जब उसमें पीड़ित और आक्रांता के
बीच अंतर करने का नैतिक साहस भी हो। पहलगाम कोई अकेली घटना नहीं थी। भारत 1993
के मुंबई सीरियल बम विस्फोट, संसद भवन पर हमला,
मुंबई ट्रेन विस्फोट, 26/11, पठानकोट, उरी और पुलवामा जैसी अनेक भीषण आतंकवादी घटनाएं झेल चुका है। हजारों
परिवारों ने इसकी कीमत चुकाई है।
पानी की बेचैनी और
शांति की नई पुकार : भारत-पाकिस्तान संबंधों
के वर्तमान घटनाक्रम को सिंधु जल संधि से अलग करके नहीं देखा जा सकता। 1960 में हस्ताक्षरित इस संधि को विमर्श के माध्यम से लंबे
समय तक दुनिया के सफल जल-वितरण समझौतों में गिनाया जाता रहा है। जबकि यह एक तरफा पाकिस्तान
के लिए अत्यधिक उदार और लाभप्रद और भारतीय
हितों के प्रतिकूल था। युद्ध हुए, सीमाएं रक्तरंजित हुईं, कूटनीतिक संबंध टूटे,
भारत ने आतंकवाद झेला—लेकिन सिंधु का पानी
बहता रहा। पहलगाम के बाद पहली बार भारत ने एक नई रणनीतिक सीमा रेखा खींची। संदेश
था— सहयोग और आतंकवाद अनंतकाल तक साथ-साथ
नहीं चल सकते। पानी और खून एक साथ नहीं बह सकता । यही पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता है।
पाकिस्तान की कृषि, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सिंधु नदी
प्रणाली पर अत्यधिक निर्भर है और इस समय गंभीर जल संकट से गुजर रहा है। 30 जून 2026 को इस्लामाबाद में सिंधु जल संधि पर एक
अंतरराष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया, भारत के विरुद्ध विमर्श
बनाने के लिए। पाकिस्तान के वरिष्ठ नेताओं ने इस मंच का उपयोग भारत की नीति के
विरुद्ध अपना पक्ष रखने के लिए किया। पाकिस्तान ने भारत पर “जल
को हथियार बनाने” का आरोप लगाया, जबकि
भारत का तर्क है— एकतरफा सद्भावना आधारित व्यवस्था का लाभ पाकिस्तान
अनंतकाल तक कैसे मांग सकता है, जो सीमा पार आतंकवाद को
संरक्षण देता रहे?
अब पाकिस्तान सिंधु जल विवाद को अंतरराष्ट्रीय कानूनी, मानवीय और पर्यावरणीय
विमर्श में बदलने का प्रयास करता दिखाई दे रहा है। इस्लामाबाद सम्मेलन के बाद कोलंबो
में एक प्रस्तावित आयोजन की भी सूचना है। यदि ऐसी श्रृंखलाबद्ध गतिविधियां आगे
बढ़ती हैं, तो उन्हें अलग-अलग अकादमिक आयोजनों के रूप में
नहीं, बल्कि एक बड़े कूटनीतिक अभियान के संदर्भ में देखना
होगा।
पाकिस्तान का संभावित उद्देश्य समझना कठिन नहीं है—सिंधु जल प्रश्न का
अंतरराष्ट्रीयकरण, भारत को कठोर और असहयोगी पक्ष के रूप में
प्रस्तुत करना और ऐसा वातावरण तैयार करना, जिसमें नई दिल्ली
पर संधि की पुरानी व्यवस्था बहाल करने का आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़े। यहीं
117 प्रमुख नागरिकों के पत्र का समय प्रश्नों के घेरे में
आता है।
वार्ता की मेज और आतंक की बंदूक : पाकिस्तान के संदर्भ में वार्ता और हिंसा हमेशा एक-दूसरे के
विकल्प नहीं रहे बल्कि समानांतर चलते रहे हैं। फरवरी 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस से लाहौर गए। लाहौर
घोषणा हुई, विश्वास बहाली की बातें हुईं। लेकिन कुछ ही
महीनों बाद कारगिल हो गया। 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हमला हुआ। 166 लोग मारे गए और तीन दिनों
तक भारत की आर्थिक राजधानी आतंक के साये में रही। दिसंबर 2015 में
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाहौर गए और तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मिले।
इसे शांति की दिशा में साहसिक व्यक्तिगत कूटनीति माना गया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद
पठानकोट वायुसेना स्टेशन पर हमला हुआ। फिर उरी, पुलवामा और
अंततः पहलगाम।
इसलिए समस्या
संवाद की कमी नहीं, पाकिस्तान की उस सुरक्षा संरचना में है, जिसमें भारत-विरोधी
आतंकवादी संगठनों का उपयोग रणनीतिक साधन के रूप में किया जाता है?
छद्म युद्ध का बदलता चेहरा : 1971 के युद्ध के बाद पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व के सामने
यह वास्तविकता स्पष्ट हो गई थी कि पारंपरिक युद्ध में भारत को निर्णायक रूप से
पराजित करना अत्यंत कठिन है। इसके बाद छद्म युद्ध, आतंकवादी
संगठनों, कट्टरपंथी नेटवर्क, जाली
मुद्रा, मादक पदार्थों और सामाजिक अस्थिरता पैदा करने वाली
गतिविधियों का महत्व बढ़ता गया।
विमर्श का घरेलू राजनीतिक पक्ष भी है :
विपक्ष के सामने सरकार को चुनौती देने के लिए एक
प्रभावी वैकल्पिक राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने की चुनौती है। पश्चिम एशिया की
अस्थिरता, ऊर्जा आपूर्ति की चिंता, तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक व्यापार तनाव के बीच विपक्ष ने भ्रम
फैलाया कि भारत में आर्थिक सुनामी आएगी लेकिन
वित्त वर्ष 2025-26 में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि
दर 7.7 प्रतिशत रही। प्रमुख
आर्थिक आंकड़े भारत की स्वस्थ अर्थव्यवस्था की गवाही दे रहे हैं. जिसे विनिर्माण
और मजबूत घरेलू मांग से बल मिला। वित्तीय वर्ष 2026-27 में भी किसी गंभीर संकट की संभावना निकट भविष्य में दिखाई नहीं पड़ती. आंकड़ों के अनुसार खुदरा महंगाई दर 3.93% के आसपास नियंत्रित है। बिजली और ऑटोमोबाइल सेक्टर में तेज वृद्दि के कारण
देश का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक पांच महीने के उच्चतम
स्तर 5.1% पर पहुंच गया है। जून 2026 में देश का सकल जीएसटी संग्रह सालाना आधार पर 13.9% बढ़कर
₹1.95 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गया है। भारत का
विदेशी मुद्रा भंडार $682.32 बिलियन के बेहद मजबूत स्तर पर
है, जो किसी भी बाहरी आर्थिक झटके से सुरक्षा प्रदान करता है.
ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है—क्या भारत-पाकिस्तान संबंधों, युद्ध-विरोध,
शांति-वार्ता और अल्पसंख्यक असुरक्षा जैसे विषयों को आने वाले
चुनावों के लिए एक राजनीतिक विमर्श में बदला जा सकता है? यह
प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 में उत्तर
प्रदेश सहित 7 राज्यों में विधानसभा चुनाव
होंगे।
शांति चाहिए, लेकिन किस कीमत पर? 117 नागरिकों के पत्र का सबसे गंभीर परीक्षण इसी कसौटी पर
होना चाहिए। यदि शांति की मांग
की जा रही है, तो आतंकवाद पर उतनी ही स्पष्ट
मांग क्यों नहीं? पाकिस्तान से क्यों न कहा जाए कि वह
आतंकवादी संगठनों के विरुद्ध सत्यापन योग्य कार्रवाई करे? आतंकवादी
ढांचे को नष्ट करे? आतंकवादी वित्तपोषण और भर्ती तंत्र
समाप्त करे? मुंबई हमलों के षड्यंत्रकारियों को दंडित करे और
यह सुनिश्चित करे कि उसकी धरती भारत के विरुद्ध आतंकवाद के लिए इस्तेमाल नहीं होगी?
यदि इतिहास से कुछ सीखना है, तो भारत को यह चक्र तोड़ना होगा। वार्ता अवश्य हो
सकती है, लेकिन पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि वार्ता आतंकवाद
का विकल्प बनेगी या आतंकवाद को ढकने वाला पर्दा। भारत को शांति चाहिए—लेकिन विस्मृति की कीमत पर नहीं। भारत को संवाद चाहिए—लेकिन आतंकवाद की छाया में नहीं। भारत को अच्छे पड़ोसी संबंध चाहिए—लेकिन अपनी सुरक्षा और संप्रभुता से समझौते की कीमत पर नहीं।
और शायद आज इन 117 हस्ताक्षरकर्ताओं से पूछा जाने वाला सबसे
महत्वपूर्ण प्रश्न यही है—आप शांति चाहते हैं, यह स्वागतयोग्य है। लेकिन क्या
आपने उस पक्ष से भी उतनी ही स्पष्टता से कहा है—बंदूक नीचे
रखो, आतंक के कारखाने बंद करो और पहले यह सिद्ध करो कि इस
बार बातचीत केवल अगले हमले तक का विराम नहीं होगी?
~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~