रक्षाबंधन : हिन्दू त्योहार और विज्ञापन: क्या कॉर्पोरेट जगत के निशाने पर हैं हिंदू परंपराएं? || बॉलीवुड और ऐड एजेंसियों का गहरा रिश्ता
अभी हाल ही में चांदी के आभूषण बेचने वाली कंपनी गिवा के रक्षाबंधन विज्ञापन ने हिंदुओं की आस्था और सांस्कृतिक चेतना को अत्यधिक ठेस पहुंचाने का कार्य किया है। बॉलीवुड अभिनेत्री कृति सेनन वाले इस विज्ञापन को लेकर पूरे देश और सोशल मीडिया पर यह भारी आपत्ति उठी कि रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक पर्व की प्रस्तुति और अभिनेत्री के परिधान में भारतीय सांस्कृतिक संदर्भों का लेशमात्र भी ध्यान नहीं रखा गया। इस विज्ञापन में मुख्य कलाकार के कपड़े, जो इंडो-वेस्टर्न स्टाइल के हैं और जिसमें लगभग नग्नता का प्रदर्शन किया गया है, भारतीय परिवार की गरिमा के बिल्कुल भी अनुकूल नहीं हैं। हिंदू परिवारों की बहन और बेटियां अपने भाई और पिता के समक्ष इस तरह का अर्धनग्न प्रदर्शन नहीं करतीं।
इस विज्ञापन का एक और घोर आपत्तिजनक पहलू अभिनेत्री द्वारा अपने भाई से पहले अपने पालतू कुत्ते को राखी बांधना है। यह सीधे तौर पर भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और बहन की दृष्टि में भाई की हैसियत का भद्दा मजाक उड़ाना है।
लेकिन यदि फिल्म या ad बनाने वाले अगर ऐसे समाज से हों जहां न कोई भाई होता है , न कोई बहन, तो क्या अपेक्षा करें. कहीं भी, कभी भी, किसी से कुछ भी करने की चाहत रखने वाले, भाई बहिन के पवित्र रिश्ते को नहीं समझ सकते. उनके लिए रक्षा बंधन उपभोक्ता वाद की एक तारीख होती है और उनकी कोई मां, बहिन, बेटी नहीं होती, सब केवल औरते ही होती हैं. लेकिन अपनी को तिरपाल में ढकने वाला अगर ad में भी किसी हिन्दू महिला को लगभग नग्नावस्था में दिखाता हो, तो वह व्यक्ति निम्नस्तरीय मानसिकता का तो होगा ही, उसके इरादे बेहद खतरनाक होंगे और सभी हिन्दुओं को इस षड्यंत्र से सावधान होने की आवश्यकता है.
गिवा विवाद को केवल कपड़े छोटे थे या बड़े या भाई से पहले कुत्ते को राखी क्यों बांधी, की बहस तक सीमित कर देना शायद इस पूरे प्रकरण की गंभीरता को कम आंकना होगा। विज्ञापन का उद्देश्य उपभोक्ता के मन में किसी भावना को उत्पाद से जोड़ना होता है। यदि रक्षाबंधन को चुना गया है, तो स्वाभाविक रूप से दर्शक उस विज्ञापन में भाई-बहन के संबंध और भारतीय पारिवारिक-सांस्कृतिक वातावरण की अपेक्षा करेगा। भारी विरोध और हिंदू संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद गिवा ने भारतीय संस्कृति और परंपराओं का सम्मान करने का खोखला हवाला देते हुए इस विज्ञापन को वापस ले लिया, लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि क्या कंपनी के संचालकों में इतनी बुद्धि और विवेक भी नहीं है कि वे भारतीय संस्कृति और त्योहारों की संवेदनशीलता का ध्यान रख सकें।
भारत में त्योहार केवल बाजार के लिए उत्पादों की बिक्री का अवसर नहीं हैं। वे हमारी प्राचीन सभ्यता और सनातन संस्कृति के जीवंत प्रमाण हैं। इन उत्सवों के पीछे छिपा हुआ मनोविज्ञान केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और पारिवारिक शुचिता तथा पारस्परिक प्रेम के अनुष्ठान होते हैं। रक्षाबंधन भाई-बहन के पवित्र प्रेम और विश्वास का पर्व है, दीपावली प्रकाश और आध्यात्मिक चेतना का, नवरात्रि शक्ति-उपासना का और होली सामाजिक उल्लास का महान प्रतीक है। इन सब के पीछे गहरे वैज्ञानिक और सामाजिक कारण छिपे हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था के उत्प्रेरक भी रहे हैं।
आजकल भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार का उपयोग केवल उत्पादों की बिक्री के लिए ही नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसके बहाने प्राचीन सनातन संस्कृति और हिंदुत्व को गहरी चोट पहुंचाने का सुनियोजित षड्यंत्र भी रचा जा रहा है। गिवा, तनिष्क, पेटा जैसे अनगिनत संस्थान नाना प्रकार से भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति पर सीधा प्रहार कर रहे हैं। यह सब अचानक शुरू नहीं हुआ है, बल्कि इसका एक लंबा इतिहास है।
असीम प्रेमजी की कंपनी गिवा का विवादित कृत्य
कई बहुराष्ट्रीय तथा घरेलू कंपनियां हिंदू विरोधी कार्य के लिए बड़ी मात्रा में फंडिंग करती हैं और इसमें दिखावे के लिए हिंदू नामों और चेहरों को ही माध्यम बनाया जाता है। त्योहारों के अवसर पर ब्रांड और उत्पादन की बिक्री बढ़ाने के लिए लुभावने विज्ञापन बनाना अनुचित नहीं कहा जा सकता, लेकिन अगर इसे त्योहारों की सांस्कृतिक संवेदनशीलता को समझे बिना इस ढंग से बनाया जाए कि उससे न केवल त्योहार की गरिमा को ठेस लगे बल्कि हिंदुत्व और सनातन संस्कृति का भी अपमान हो, तो यह एक प्रकार का अपराध है।
विवादों का पुराना इतिहास और बहुराष्ट्रीय षड्यंत्र
यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में एक ऐसा पैटर्न उभरा है, जहां हिंदू त्योहारों के समय कॉर्पोरेट ब्रांड्स अपने विज्ञापनों के जरिए तथाकथित सामाजिक सुधार का संदेश देने का ढोंग रचते हैं। आलोचकों का स्पष्ट तर्क है कि जब भी हिंदू त्योहार आते हैं, ब्रांड्स अचानक पर्यावरण, पितृसत्ता या धर्मनिरपेक्षता पर ज्ञान देने लगते हैं। त्योहार की पारंपरिक वेशभूषा, जैसे माथे पर बिंदी न होना, से लेकर रस्मों के अर्थ बदलने तक, विज्ञापनों के जरिए हिंदू संस्कृति को पिछड़ा या सुधार की आवश्यकता वाला दिखाने की कोशिश की जाती है।
यदि हम पिछले कुछ वर्षों के विज्ञापनों पर नजर डालें तो तनिष्क का वर्ष दो हजार बीस का एकत्वम अभियान आज भी चर्चित उदाहरणों में से एक है जिसमें एक हिन्दू महिला को उसके मुस्लिम ससुराल में गोद भराई की रस्म में दिखाया गया था। तनिष्क का घोषित उद्देश्य यदि अलग-अलग समुदायों के बीच एकता का संदेश देना था, तो किसी मुस्लिम लड़की की शादी हिन्दू घर में भी दिखाई जा सकती थी। तनिष्क का विरोध और बहिष्कार हुआ और उसे विज्ञापन वापस लेना पड़ा, लेकिन तब तक कंपनी की काफी व्यावसायिक क्षति हो चुकी थी।
इसी तरह फैबइंडिया ने दीवाली के अपने संग्रह को जश्न-ए-रिवाज़ का उर्दू नाम दिया और मॉडल्स को बिना बिंदी के दिखाया। जो दीवाली के अब्राहमीकरण का सीधा प्रयास है । मान्यवर के विज्ञापन में आलिया भट्ट ने हिंदू विवाह की सबसे पवित्र रस्म कन्यादान पर सवाल उठाते हुए उसे कन्यामान में बदलने की वकालत की, जिसे हिंदू विवाह पद्धतियों के अपमान होता है। सर्फ एक्सेल ने होली के रंगों को नमाज पढ़ने जा रहे एक बच्चे से जोड़कर दिखाया, जिसे अनावश्यक धार्मिक तुष्टिकरण करार दिया गया।
यह केवल विज्ञापन और संस्कृति का टकराव नहीं है। इस तरह के विज्ञापन या फिल्में बनाना लंबे विचार-विमर्श के बाद तय किया जाता है। यदि किसी कंपनी को जानबूझकर सनातन संस्कृति और हिंदुत्व पर चोट करनी हो, तो विज्ञापन को ज्यादा से ज्यादा घातक बनाने की कोशिश की जाती है। यह वामपंथी इस्लामी गठजोड़ और डीप स्टेट द्वारा किया गया एक सुनियोजित हमला है। हिंदुओं के कई त्योहारों पर ऐसा हुआ है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी अन्य धर्म के त्योहार जैसे ईद या क्रिसमस पर भी इस तरह का ज्ञान देने वाला विज्ञापन बनाया जा सकता है।
परोपकार की आड़ में वैचारिक फंडिंग
विज्ञापनों से परे, यह बहस कॉर्पोरेट फंडिंग तक भी जाती है। विप्रो के संस्थापक अजीम प्रेमजी को यद्यपि भारत के सबसे बड़े दानवीरों में गिना जाता है और प्रायः यह बताया जाता है कि उन्होंने शिक्षा और सामाजिक कार्यों के लिए अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा दान किया है। लेकिन उनके फिलैंथ्रोपिक इनिशिएटिव्स और अन्य ट्रस्टों द्वारा की जाने वाली फंडिंग पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि वे अपने दीन की सेवा के लिए जाने जाते हैं और उनके पैसों का उपयोग हिंदुत्व के विरोध में किया जाता है।
आरोप है कि उनके ट्रस्ट का पैसा उन गैर-सरकारी संगठनों, थिंक-टैंक और द वायर जैसे स्वतंत्र मीडिया पोर्टल्स को जाता है, जिनका संपादकीय रुख हमेशा हिंदुत्व विरोधी या हिंदू राष्ट्रवाद का मुखर आलोचक होता है। दीन-हीनों की सेवा के नाम पर दिया गया यह पैसा ऐसी संस्थाओं तक पहुँचता है, जो अदालतों से लेकर सड़कों तक, ऐसे मुद्दे उठाती हैं जो अंततः हिंदू परंपराओं, त्योहारों और राष्ट्रीय सुरक्षा के नैरेटिव के खिलाफ जाते हैं। इस फंडिंग का उद्देश्य केवल सामाजिक कल्याण नहीं है, बल्कि एक विशिष्ट प्रकार की राजनीतिक और वैचारिक जमीन तैयार करना है, जो सनातन धर्म और हिंदुत्व की जड़ों को खोखला करती है।
निष्कर्ष और समाधान
तनिष्क की घटना से जिन्हें सीखना था उन्होंने निश्चित रूप से सीखा होगा, लेकिन जिन्हें जानबूझकर हिंदुत्व और हिंदुओं के त्योहारों को अभद्र रूप से पेश कर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सनातन चेतना को चोट पहुंचानी है, वे आज भी सुनियोजित षड्यंत्र रचते चले आ रहे हैं। सोशल मीडिया के आज के युग में और हिंदुओं की चेतना के पुनर्जागरण के काल में, यह काम अब आसान नहीं रह गया है।
सनातन संस्कृति के विरुद्ध षड्यंत्र रचने वालों को यह बात याद रखनी चाहिए कि भारत केवल एक उपभोक्ता बाजार नहीं है। यहाँ धर्म और संस्कृति करोड़ों लोगों की व्यक्तिगत आस्था और पारिवारिक पहचान से जुड़े हैं। इसलिए कोई विज्ञापन निर्माता यदि हिन्दू विवाह, पूजा, रक्षाबंधन, दीपावली या अन्य धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करता है, तो उसे यह समझना चाहिए कि सनातन धर्म को अन्य धर्मों की अपेक्षा कमतर दिखाकर धर्मांतरण और इस्लामीकरण की योजनाओं को अंजाम देना अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
सभी हिंदुओं को एकजुट होकर इसका विरोध करना चाहिए। यदि भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमला किया जाता है, तो उसका भरपूर जवाब देना आवश्यक है। ऐसे उत्पादों और ऐसी कंपनियों का पूर्ण बहिष्कार करना चाहिए और उनके खिलाफ वैचारिक संघर्ष के लिए सभी को तैयार रहना चाहिए। इसके साथ ही, सरकार पर भी इस बात का भारी दबाव बनाया जाना चाहिए कि ऐसे सख्त कानून बनाए जाएं जिससे भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति पर हो रहे ये हमले बंद हो सकें।
सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि विज्ञापनों के सार्वजनिक प्रदर्शन से पहले उन पर सख्त नियमन हो। जिस तरह फिल्मों के प्रदर्शन से पहले फिल्म सेंसर बोर्ड उनकी समीक्षा करता है, ठीक उसी तरह विज्ञापनों के लिए भी एक कठोर विज्ञापन नियामक बोर्ड की स्थापना होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखाए जा रहे हिंदू विरोधी सामग्री की भी गहन समीक्षा और उस पर सख्त नियंत्रण होना चाहिए ताकि कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में बहुसंख्यक समाज की आस्था के साथ खिलवाड़ करने की इस कुत्सित परंपरा का अंत हो सके।
~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~