शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

भारत का राष्ट्रांतरण कब तक? एफसीआरए कानून कितना प्रभावी?

 

भारत का राष्ट्रांतरण कब तक? एफसीआरए कानून कितना प्रभावी?  

धर्मांतरण और जातिगत आरक्षण का दोहरा खेल

अगर आज आपसे यह सीधा प्रश्न किया जाए कि भारत के 'राष्ट्रांतरण' यानी धर्मांतरण का कार्य कब तक पूरा हो जाएगा, तो शायद यह सुनकर आपको अटपटा लगे और प्रथम दृष्टया आपको इसका कोई स्पष्ट जवाब न सूझे। लेकिन यह एक कड़वा और जमीनी तथ्य है कि कुछ विशेष समुदायखासकर मुस्लिम और ईसाई संस्थाएंदिन-रात एक करके भारत में धर्मांतरण के इस सुनियोजित एजेंडे पर कार्य कर रही हैं। धर्मांतरण के पीछे हमेशा यह तर्क गढ़ा जाता है कि हिंदू धर्म में बहुत सारी कमियां हैं, जिनमें से विशेषकर 'जाति-व्यवस्था' को मुख्य कारण बताया जाता है। कहा जाता है कि जातिगत भेदभाव के कारण लोग ईसाई या इस्लाम धर्म स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन विडंबना देखिए कि धर्मांतरित होने के बाद भी ये लोग अपना 'जातिगत लाभ' लेने का पराक्रम नहीं छोड़ पाते। वे स्वयं उसी जाति-बंधन से बंधे रहना चाहते हैं ताकि सरकारी सुविधाओं का दोहन कर सकें। यही कारण है कि आज मुसलमान और ईसाइयों में न केवल दलित, बल्कि पिछड़े वर्ग के लोग भी बड़ी संख्या में शामिल हैं और वे लगातार आरक्षण का लाभ भी ले रहे हैं।

शिक्षा मंत्रालय की विफलता और जंतर-मंतर का प्रायोजित आंदोलन

आज देश की शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी परीक्षाओं में जो अराजकता दिख रही है, वह इसी ऐतिहासिक विफलता का परिणाम है। नीट परीक्षा के विरोध के नाम पर जंतर-मंतर पर हुए 'कॉकरोच जनता पार्टी' के आंदोलन को ही लें। इस प्रदर्शन में नीट परीक्षा में बैठे या फेल हुए वास्तविक विद्यार्थी तो बमुश्किल ही नजर आए, अधिकांश प्रभावशाली उपस्थिति 'आपराधिक इतिहास' वाले लोगों की थी।

सोनम वांगचुक के आंदोलन का मंच खाली होते ही जंतर-मंतर रातों-रात अराजक तत्वों की कर्मस्थली बन गया। वहां अचानक तंबू-कनात लग गए। सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि इस भीड़ को खाना खिलाने के लिए विदेशों से ऑर्डर दिए जा रहे थे। शाहीन बाग और किसान आंदोलन की तर्ज पर वहां भारत और हिन्दू विरोधी नारे भी लगे। हैरानी की बात तो यह है कि जब पुलिस ने तंबू उखाड़ने का प्रयास किया, तो 'सरकार के भीतर' से ही कोई संदेश आया कि इन्हें न रोका जाए। चर्चा है कि इस पूरी प्रक्रिया में गृहमंत्री अमित शाह को दरकिनार किया गया।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के विवादित नियमों और शिक्षा तंत्र की इस दुर्दशा के बीच धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा तो एक औपचारिकता मात्र थी। मोदी सरकार के पास पिछले 12 साल का लंबा समय थाजो किसी भी देश में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए पर्याप्त होता हैलेकिन शिक्षा मंत्रालय अपंग व्यवस्था के ही भरोसे रहा। भाजपा के आंतरिक सूत्र बताते हैं कि कोई अद्रश्य शक्ति शिक्षा मंत्रियों को काम करने की छूट ही  नहीं देती। नकल रोकने के लिए जो नया विधेयक लाया गया है, वह विज्ञान की कोई बहुत बड़ी पहेली नहीं है। इसे 2014 के तुरंत बाद लाया जा सकता था।

संविधान, आपातकाल का कलंक और इतिहास का विरूपण

भारत के संविधान निर्माण का श्रेय किसी को भी दिया जाए, लेकिन एक बड़े वर्ग का यह स्पष्ट मानना है कि यह संविधान प्रथम दृष्टया बहुसंख्यक हिंदू विरोधी और सनातन समाज के हितों की पूरी तरह अनदेखी करता है। संविधान सभा का गठन अंग्रेजों की छत्रछाया में हुआ और इसमें जवाहरलाल नेहरू व गांधी जैसी मुस्लिम-परस्त नीतियों वाले नेताओं का गहरा प्रभाव था, जिन्होंने संविधान सभा में उन मुस्लिम नेताओं को भी शामिल किया जो पाकिस्तान बनाने के लिए बेहद सांप्रदायिक आंदोलन किया था लेकिन पाकिस्तान बनने के बाद वहाँ गए नहीं। इसलिए तुष्टीकरण तो संविधान बनाने से ही शुरू हो गया । इस तुष्टिकरण को सबसे बड़ा कानूनी जामा 1976 में आपातकाल के काले दौर में इंदिरा गांधी द्वारा पहनाया गया, जब बिना किसी जन-चर्चा के संविधान की प्रस्तावना में 'पंथनिरपेक्ष' शब्द थोप दिया गया।

संविधान से इतर भी, नेहरू और कांग्रेस की अन्य सरकारों ने समय-समय पर सनातन की जड़ें खोदने का ही कार्य किया। मुगलों और मुस्लिम आक्रांताओं का महिमामंडन कर एक 'गौरवशाली इस्लामिक इतिहास' गढ़ा गया। इसके लिए वामपंथी और इस्लामी परस्त इतिहासकारों की एक पूरी फौज खड़ी की गई, जिन्होंने जानबूझकर भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति और सभ्यता को बौद्धिक रूप से नष्ट करने का कुत्सित प्रयास किया।

वक्फ कानून: राष्ट्रांतरण और भूमि एकाधिकार का हथियार

राष्ट्रांतरण केवल जनसंख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भौगोलिक और आर्थिक संसाधनों पर कब्ज़े का भी खेल है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 1995 का 'वक्फ अधिनियम' है। इस काले कानून ने वक्फ बोर्ड को असीमित और असंवैधानिक अधिकार दे दिए हैं कि वह देश की किसी भी संपत्ति को अपनी बता सकता है। इसी तुष्टिकरण का परिणाम है कि आज वक्फ बोर्ड, भारतीय सेना और भारतीय रेलवे के बाद, देश का तीसरा सबसे बड़ा जमींदार बन गया है। लाखों एकड़ बहुमूल्य भूमि, यहाँ तक कि सदियों पुराने मंदिर और गाँव के गाँव रातों-रात वक्फ की संपत्ति घोषित किए जा रहे हैं। बिना जमीन के राष्ट्रांतरण अधूरा है, और यह कानून उसी सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा है।

विदेशी चंदे का मायाजाल और एनजीओ की फौज

सरकार ने हाल ही में 'विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम' (एफसीआरए) में संशोधन का बिल पेश किया है। यद्यपि यह सच है कि वर्तमान सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में बीस हजार से अधिक संदिग्ध गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के लाइसेंस रद्द किए हैं, लेकिन यह प्रयास ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।

आधिकारिक आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में वर्तमान में 30 लाख से अधिक एनजीओ पंजीकृत हैं। अधिकृत संस्थाओं को प्रतिवर्ष औसतन 15 हजार से 20 हजार करोड़ रुपये तक की भारी-भरकम विदेशी धनराशि प्राप्त होती है। इन संस्थाओं का घोषित कार्य समाज सेवा है, लेकिन इस चंदे का एक बहुत बड़ा हिस्सा सीधे तौर पर हिंदुओं के धर्मांतरण और जनसांख्यिकीय बदलाव के लिए उपयोग किया जा रहा है। विकसित राष्ट्र का सपना बेचने वाली सरकार को विदेशी चन्दा, दान, भीख  या धर्मांतरण के लिए भेजी जाने वाले धन पर पूरी तरह से रोक लगानी चाहिए। अगर हमारी सामाजिक आवश्यकताएं वास्तविक हैं, जिनके लिए धन आवश्यक है तो भारत के हिंदू और राष्ट्रभक्त देशहित के लिए तन-मन-धन से सहयोग करने को तत्पर हैं, फिर हमें पश्चिम की दया और भिक्षा क्यों चाहिए?

डेबिट कार्ड फ्रॉड और हवाला का खौफनाक गठजोड़

कानून से बचने के लिए इन ताकतों ने तकनीकी रास्ते खोज लिए हैं। हाल ही में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में सामने आया है कि अमेरिका की एक संस्था 'टीटीआई' ने हजारों की संख्या में अमेरिका से निर्गत एटीएम और डेबिट कार्ड भारत के कई संवेदनशील क्षेत्रों में पहुंचा दिए। इन विदेशी कार्डों के जरिए भारत से लगभग 95 करोड़ रुपये निकाले जा चुके हैं। इसके अतिरिक्त, अरब देशों (खासकर दुबई) से 'हवाला' और 'स्मर्फिंग' (टुकड़ों में धन भेजना) के माध्यम से रुपया भेजा जा रहा है। इसका उपयोग सीमावर्ती क्षेत्रों में मदरसे, मस्जिद बनाने और धर्मांतरण के लिए हो रहा है। वित्तीय खुफिया इकाई (एफआईयू) में कर्मचारियों और संसाधनों की कमी के कारण ऐसी जांच महीनों लटकी रहती है।

जनसांख्यिकीय बदलाव: एक टाइम-बम

इन विदेशी फंडिंग्स का सीधा असर जनसांख्यिकी पर पड़ रहा है। 1951 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में मुसलमानों की संख्या लगभग साढ़े तीन करोड़ और ईसाइयों की संख्या 90 लाख के आसपास थी। आज के अनुमानित आंकड़ों के अनुसार, मुसलमानों की संख्या 25 से 30 करोड़ और ईसाइयों की संख्या लगभग 5 करोड़ हो गई है। इतनी बड़ी जनसंख्या केवल 'प्रजनन दर' के आधार पर नहीं बढ़ सकती; इसमें एक बहुत बड़ी संख्या धर्मांतरित लोगों की है, जिसके लिए विदेशी धन का इस्तेमाल किया जाता है। दुर्भाग्य से, राष्ट्रवाद का दम भरने वाली सरकार भी इस भयानक विषय पर गंभीरता से विचार नहीं कर पा रही है और न ही ठोस कदम उठा रही  है ।

स्वर्णिम अतीत और मंदिर आधारित अर्थव्यवस्था

विपक्ष का बौद्धिक स्तर यह है कि प्रियंका गांधी आईआईटी निदेशक पर 'गोमूत्र विशेषज्ञ' का व्यंग्य करती हैं और राहुल गांधी जंतर-मंतर पर बिना किसी तथ्य के 'गोली चलाने' का आरोप लगाते हैं।

दूसरी ओर, प्रधानमंत्री मोदी विकसित भारत का सपना बेच रहे हैं, लेकिन उन्हें समझना होगा कि पहली शताब्दी से 11वीं शताब्दी तक भारत की अर्थव्यवस्था पूरे विश्व की एक-तिहाई (लगभग 33 प्रतिशत) थी। यह किसी प्रधानमंत्री का नहीं, बल्कि हमारी 'मंदिर आधारित अर्थव्यवस्था' का परिणाम था। आज भी अयोध्या, काशी, चार धाम, ज्योतिर्लिंगों और दक्षिण भारत के विशाल मंदिरों की यात्रा, फूल-प्रसाद, होटल और खरीदारी आदि को जोड़ लिया जाए, तो यह अर्थव्यवस्था 10 लाख करोड़ रुपये प्रतिवर्ष से अधिक की है। सरकार विकास तो कर रही है, लेकिन वह जड़ों को सींचने के बजाय केवल पत्तियों पर पानी डाल रही है।

प्रधान मंत्री से अनुरोध - भारत को आज 2047 के 'विकसित राष्ट्र' होने की नहीं, बल्कि वर्तमान में एक 'सुरक्षित राष्ट्र' होने की सबसे पहली आवश्यकता है। अगर राष्ट्र सुरक्षित रहेगा, तो विकसित भी स्वतः हो जाएगा। लेकिन अगर राष्ट्र विकसित हो गया और उसका 'राष्ट्रांतरण' हो गया, तो ऐसे विकास का हम क्या करेंगे? आज कई विदेशी शक्तियां भारत को इस्लामी और ईसाई बहुल बनाने की परियोजना चला  रही रही हैं। हमें विदेशी दान, चंदे के रूप में  भिक्षावृत्ति पर पूर्ण और कठोर प्रतिबंध लगाना होगा, जो वास्तव में भारत के लिए जहर से भी अधिक खतरनाक है । साथ ही वक्फ जैसे काले कानूनों को कूड़ेदान में डालना होगा। हमें उस पूरे बुनियादी ढांचे को जड़ से नष्ट करना होगा जहाँ से राष्ट्र-विरोधी और सनातन-विरोधी भावनाएं पनपती हैं। तभी भारत वास्तविक अर्थों में सुरक्षित और विश्व गुरु बन सकेगा।

~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

भारत का राष्ट्रांतरण कब तक? एफसीआरए कानून कितना प्रभावी?

  भारत का राष्ट्रांतरण कब तक ? एफसीआरए कानून कितना प्रभावी?   धर्मांतरण और जातिगत आरक्षण का दोहरा खेल अगर आज आपसे यह सीधा प्रश्न किया जा...