हिंदुत्व के इर्द-गिर्द घूमने लगी भारतीय राजनीति
भारतीय राजनीति इस समय एक अभूतपूर्व वैचारिक संक्रांति काल से गुजर रही है। दशकों तक धर्मनिरपेक्षता का चोगा ओढ़ने और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले तमाम प्रमुख राजनीतिक दल आज हिंदुत्व और सनातन संस्कृति की 'पिच' पर कदमताल करने को मजबूर हैं। अब तक तो केवल भारतीय जनता पार्टी को ही 'हिंदूवादी दल' कहकर घेरा जाता था, लेकिन आज स्थिति यह है कि विपक्ष के सारे दल खुद को भाजपा से बड़ा सनातनी सिद्ध करने की होड़ में जुट गए हैं। यह भारतीय राजनीति का एक ऐसा अप्रत्याशित यू-टर्न है, जिसने देश के पुराने सभी राजनीतिक और वैचारिक समीकरणों को उलट कर रख दिया है।
अवसरवाद की राजनीति और रामलला की शरण
विपक्ष के इस अचानक बदले सुर और राजनीतिक हृदय-परिवर्तन को राम मंदिर के दान में कथित हेरफेर के मामले से नई हवा मिली है। इस विवाद के सामने आते ही अचानक विपक्ष के उन नेताओं में भी रामभक्ति हिलोरे मारने लगी, जो अयोध्या में भव्य मंदिर बनने के बाद आज तक कभी रामलला के दर्शन करने नहीं गए थे। आज वे राजनेता दान चोरी पर हिंदुत्व और सनातन को चोट लगने तथा हिंदुओं की आस्था व श्रद्धा को आघात पहुँचने का दावा कर रहे हैं, जिन्होंने राम मंदिर या किसी भी अन्य मंदिर में कभी एक नया पैसा भी दान नहीं दिया था।
हाल ही में अयोध्या पहुँचने वालों में आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल भी शामिल थे, जिन्होंने वहाँ पहुँचकर हिंदुओं की आस्था व विश्वास को खंडित करने का बड़ा आरोप लगाया। उनके राज्यसभा सांसद संजय सिंह तो राम मंदिर बनने के पहले से ही मुखर होकर चंदा चोरी का आरोप लगाते रहे हैं। इसी क्रम में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और अमेठी के सांसद भी अपने-अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ रामलला के दर्शन करने पहुँचे, यद्यपि उनके इस दौरे का वास्तविक उद्देश्य श्रद्धालुओं के बीच पहुँचकर राजनीतिक बवाल काटना तथा धरना-प्रदर्शन करना अधिक दिखाई दिया।
सबसे अधिक आश्चर्यचकित करने वाली घोषणा समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की रही, जिन्होंने कहा कि उनकी सरकार बनने के बाद अयोध्या को सनातन की 'आध्यात्मिक नगरी' घोषित कर दिया जाएगा और उसे सनातन की धार्मिक राजधानी के रूप में विकसित करने के सभी प्रयास किए जाएँगे। यह वही समाजवादी पार्टी है जिसके अतीत को देखकर इस बयान को एक अद्भुत और अप्रत्याशित यू-टर्न ही कहा जाएगा।
इसी तरह कांग्रेस के शीर्ष नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी भी राम मंदिर में दान चोरी पर अपनी गहरी चिंता प्रकट कर चुके हैं और हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचने का रोना रो चुके हैं। लेकिन कांग्रेस के इन शीर्ष नेताओं के बारे में यह बात इसलिए हैरान नहीं करती क्योंकि चुनाव के मौसम में दोनों भाई-बहन अक्सर कई मंदिरों में चक्कर काटते नजर आते हैं। कभी माथे पर चंदन का गहरा लेप लगाए, कभी भगवा वस्त्र धारण किए, कभी रुद्राक्ष पहने और राहुल गांधी तो कोट के ऊपर जनेऊ पहने भी देखे गए हैं। अपनी इस छवि को और चमकाने के लिए राहुल गांधी अभी हाल ही में बनारस पहुँचे थे और भगवान परशुराम का भेष धारण करके गंगा तट पर खड़े दिखाई दिए थे।
तुष्टिकरण का रक्तरंजित इतिहास और अतीत के पन्ने
इन सभी राजनीतिक दलों में यदि कुछ सबसे समान है, तो वह यह कि ये सभी अतीत में सनातन के विरोध की कीमत पर भी खुलकर मुस्लिम तुष्टिकरण करते रहे हैं। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के बारे में तो इतिहास में जितना दर्ज है, उसे देखकर जनता आसानी से इस नए बदलाव को स्वीकार नहीं कर पाती। यह मुलायम सिंह यादव की सरकार के समय की ही बात है, जब अयोध्या में कारसेवा करने गए निहत्ठे रामभक्तों पर क्रूरतापूर्वक गोलियाँ चलाई गई थीं और हजारों कारसेवकों को गोलियों से भून दिया गया था। कई कारसेवकों का तो आज तक कोई अता-पता नहीं चला।
उस समय के प्रत्यक्षदर्शी अयोध्यावासियों का कहना था कि उस दिन अयोध्या की नालियों में खून बह रहा था और पूरी देवभूमि रक्तरंजित हो गई थी। इस अमानवीय कृत्य के बाद भी मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक रूप से यह कहने में कभी संकोच नहीं किया कि बाबरी मस्जिद की रक्षा के लिए और मुसलमानों का विश्वास जीतने के लिए उन्हें अगर हिंदुओं पर हजारों बार भी गोलियाँ चलानी पड़तीं, तो वे चलाते और इसका उन्हें कोई अफ़सोस नहीं है।
राज्यसभा सदस्य और उनके भाई रामगोपाल यादव ने तो यहाँ तक दावा किया था कि मुलायम सिंह की सरकार ने ऐसी सुरक्षा व्यवस्था की थी कि 'परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा'। उन्होंने गर्व से कहा था कि लोग गुंबद पर चढ़ तो गए लेकिन फिर जीवित उतर नहीं पाए। आज लोग उन्हें 'मौलाना मुलायम' या 'मुल्ला मुलायम' कहते हैं, तो कहते रहें; हिंदू उन्हें वोट दें या न दें, उन्हें अपने इस कार्य पर न अफ़सोस था, न है और न कभी होगा। उन्होंने न्यायालय में यहाँ तक कह दिया था कि भगवान राम, बाबरी मस्जिद में एक अवैध कब्जेदार हैं।
मुलायम सिंह यादव की सरकार के कार्यकाल में ही काशी में ज्ञानवापी स्थित शृंगार गौरी के मंदिर को जबरन बंद कर दिया गया था और एक बहुत ऊँची लोहे की बैरिकेडिंग (दीवार) बनाकर हिंदू भक्तों का रास्ता रोक दिया गया था, जबकि नमाजियों के लिए रास्ता खोल दिया गया था। अखिलेश यादव की सरकार के समय भी यही नीति जारी रही, जब संभल के कल्कि धाम में स्थित 'विश्व हरि मंदिर' (जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है) से उसके अधिकारियों और कर्मचारियों को बाहर खदेड़ दिया गया था। यही नहीं, परिसर में स्थित उस ऐतिहासिक कूप (कुएं) पर भी रोक लगा दी गई थी, जहाँ हिंदू रीति-रिवाजों का पालन किया जाता था।
उस दौर में कब्रिस्तानों की बाउंड्री वॉल बनाने के लिए सरकारी खजाना पूरी तरह खोल दिया गया था। वक्फ बोर्ड द्वारा जमीनों पर कब्जे और मनमानी का अभियान भी अखिलेश यादव की सरकार के समय ही अपने चरम पर था। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मुलायम सिंह और अखिलेश यादव की सरकारें तथा समाजवादी पार्टी मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कुख्यात रही हैं, लेकिन उनकी एक बात साफ थी कि उन्होंने कभी अपने इस एजेंडे को छिपाया नहीं। ऐसे में अखिलेश यादव के भीतर अचानक हिंदुत्व के प्रति अगाध प्रेम उमड़ पड़ना किसी के गले नहीं उतर रहा है। ऐसा लगता है कि आगामी चुनाव को नजदीक देखकर अखिलेश यादव का यह अचानक 'हृदय परिवर्तन' हुआ है।
कांग्रेस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
जहाँ तक कांग्रेस पार्टी के इतिहास का प्रश्न है, तो इस पार्टी की स्थापना भले ही एक अंग्रेज एओ ह्यूम ने अंग्रेजों के हितों की रक्षा के लिए की हो और उसका प्रारंभिक उद्देश्य ब्रिटिश शासन को सुरक्षा कवच पहुँचाना रहा हो, लेकिन स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस का जैसे ही भारतीयकरण हुआ, उसका झुकाव एकतरफा रूप से अल्पसंख्यकों की तरफ़ हो गया। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने जीवनपर्यंत केवल मुसलमानों के तुष्टिकरण को ही सर्वोपरि रखा।
जवाहरलाल नेहरू ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कश्मीर की समस्या तो खड़ी की ही, साथ ही जूनागढ़ और हैदराबाद रियासत को भी पाकिस्तान को सौंपने की ढीली नीति अपनाई। इस तरह के कई ऐतिहासिक पत्र और सामग्रियां आजकल सार्वजनिक की जा चुकी हैं, जिन्हें कोई भी देख सकता है। हैदराबाद का मामला तो देश के गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वयं अपने हाथों में लिया और 'ऑपरेशन पोलो' के अंतर्गत सैन्य कार्रवाई करके हैदराबाद का भारत में विलय करवाया, अन्यथा नेहरू की नीतियों के कारण आज हैदराबाद भी पाकिस्तान का एक हिस्सा होता।
जवाहरलाल नेहरू ने रज़ाकार संगठन के उस खूंखार मुखिया को, जिसे सरदार वल्लभभाई पटेल ने जेल में डलवाया था, जेल से मुक्त करके सुरक्षित पाकिस्तान भेजने का प्रबंध किया था। इतना ही नहीं, रज़ाकारों के कुख्यात राजनीतिक दल एमआईएम (मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन) पर से प्रतिबंध हटाकर इसका नेतृत्व आज के ओवैसी के पिता को सौंप दिया था। उन्हें केवल इतना करना पड़ा कि उन्होंने इसके आगे 'ऑल इंडिया' शब्द जोड़ दिया और उसका नाम एआईएमआईएम कर दिया।
नेहरू ने इसी तरह केरल में मुस्लिम लीग पर से भी प्रतिबंध हटा लिया और उसके नाम के आगे 'इंडियन यूनियन' शब्द जोड़कर उसके साथ चुनावी गठबंधन कर लिया, जो कांग्रेस का गठबंधन आज भी जारी है। जवाहरलाल नेहरू ने हिंदू कोड बिल तो बनाया और संवैधानिक रूप से हिंदुओं को सामाजिक नियमों में बांध दिया, लेकिन मुसलमानों को छोड़ दिया। उन्होंने मंदिरों का सरकारीकरण किया और उन पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए। देश की प्राचीन शिक्षा पद्धति के गुरुकुल तंत्र को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया और भारतीय संस्कृति को और अधिक आघात पहुँचाने के लिए देश का पहला शिक्षा मंत्री एक ऐसे मुस्लिम नेता को बनाया जिनका जन्म भी भारत में नहीं हुआ था और जिन्हें भारतीय रीति-रिवाज, संस्कृति व सभ्यता की कोई बुनियादी समझ नहीं थी। जिनका एकमात्र उद्देश्य भारत की पाठ्यपुस्तकों में वामपंथी और इस्लामी शिक्षा को बढ़ावा देना था। यही कारण है कि कांग्रेस के नेता आज भी बंद कमरों में बड़े शौक से कहते हैं कि वह मुसलमानों की पार्टी है।
अरविंद केजरीवाल का राजनीतिक पाखंड
अरविंद केजरीवाल एक नवोदित राजनेता हैं जिन्होंने दिल्ली की सत्ता पर लगभग पंद्रह साल तक राज किया। आरोप है कि उन्होंने वोट बैंक की राजनीति के लिए पूरी दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्याओं को बसाया और उन्हें संरक्षण दिया। आजकल दिल्ली की सत्ता खोकर और कानूनी मुश्किलों में घिरकर अरविंद केजरीवाल राजनीतिक रूप से काफी असहज हैं। वहीं पंजाब, जहाँ कुछ समय बाद चुनाव होने वाले हैं, वहाँ भी वे सत्ता से बाहर होने की कगार पर पहुँच चुके हैं।
यह वही केजरीवाल हैं जिन्होंने कभी भव्य राम मंदिर के विरोध में सार्वजनिक रूप से कहा था कि 'मेरी नानी कहती थीं कि मेरे भगवान राम किसी की ढहाई गई मस्जिद के स्थान पर बने मंदिर में बैठने नहीं जाएँगे।' लेकिन आज राजनीति का पहिया ऐसा घूमा है कि राम मंदिर में दान चोरी का कथित मामला सामने आने के बाद वामपंथियों सहित कई मुस्लिम नेता भी इस 'चोरी' से बहुत आहत दिखाई दे रहे हैं और हिंदुओं के प्रति हमदर्दी जता रहे हैं।
सात राज्यों की चुनावी बिसात और क्षेत्रीय समीकरण
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के पीछे आगामी समय में होने वाले सात राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, मणिपुर, गोवा तथा गुजरात में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और उसके ठीक बाद वर्ष 2029 का महत्वपूर्ण लोकसभा चुनाव है। वर्तमान में हिमाचल प्रदेश और पंजाब को छोड़कर शेष सभी राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की मजबूत सरकारें हैं।
जहाँ पंजाब में आम आदमी पार्टी को कांग्रेस से और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को भाजपा से कड़ी चुनौती मिल रही है और दोनों ही जगह विपक्ष की सरकारें जाने का अनुमान है, वहीं उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी पिछले दस वर्षों से सत्ता से बाहर रहकर छटपटाहट में है और किसी भी तरह सत्ता पाने की विकट लालसा पाले हुए है। यद्यपि वर्ष 2012 में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कुर्सी उनके पिता मुलायम सिंह यादव के सौजन्य से चांदी की तश्तरी में सजाकर दे दी गई थी, लेकिन उसके बाद से अखिलेश यादव अपने दम पर राजनीतिक रूप से कोई बड़ा कमाल नहीं दिखा पाए हैं।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश में जो आशा से अधिक सफलता मिली, उसे वे अपना सबसे बड़ा कीर्तिमान मानते हैं और उसी के आधार पर वे वर्ष 2027 में लखनऊ की गद्दी पर बैठने का ताना-बाना बुन रहे हैं। समाजवादी पार्टी घोषित रूप से अपने पारंपरिक 'एम-वाई फैक्टर' यानी मुस्लिम और यादवों के वोटों पर आधारित रही है। लेकिन इतिहास गवाह है कि बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी केवल मुस्लिम-यादव या दलित वोटों के सहारे कभी पूर्ण बहुमत से सत्ता में नहीं पहुँचीं। उन्हें सत्ता तक पहुँचने के लिए हमेशा सवर्ण यानी ब्राह्मण या ठाकुर वोटों की बड़ी दरकार रही है।
अब चूँकि ये दोनों सवर्ण समुदाय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा के साथ मजबूती से खड़े हैं, इसलिए भी इन क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक शक्ति बेहद कमजोर हो चुकी है। उत्तर प्रदेश में इस समय मुख्य मुकाबला सीधे तौर पर भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच ही है। प्रदेश की जनता के सामने अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ में से किसी एक को मुख्यमंत्री पद के लिए चुनने का विकल्प होगा। ऐसे में अखिलेश यादव बहुसंख्यक समाज की पहली पसंद बनने के लिए हिंदुत्व की राह पर लगातार कदम बढ़ा रहे हैं। अपनी इस हिंदुत्व यात्रा को धार्मिक प्रखरता प्रदान करने के लिए उन्होंने एक विवादित शंकराचार्य की शरण ली है, जो उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए धार्मिक समर्थन दे रहे हैं।
शंकराचार्य की गो-यात्रा का राजनीतिक खेल
महाकुंभ के पावन समय पर एक ऐसे शंकराचार्य ने (जिनकी नियुक्ति स्वयं विवादित है और जिसका मामला देश की सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है) खुलकर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार का विरोध किया था और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर व्यक्तिगत रूप से तीखे हमले किए थे। उन्होंने समाजवादी पार्टी के गुप्त इशारे पर महाकुंभ और मौनी अमावस्या के पवित्र स्नान पर भी जानबूझकर विवाद खड़ा करने की कोशिश की थी। उनके इस हर राजनीतिक पैंतरे का समाजवादी पार्टी और विशेष रूप से अखिलेश यादव ने खुलकर समर्थन किया था।
वर्तमान में वही शंकराचार्य पूरे उत्तर प्रदेश में गोवध के विरोध में यात्राएं निकाल रहे हैं। यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि उत्तर प्रदेश सभी भाजपा शासित राज्यों में अकेला ऐसा राज्य है जहाँ गोवंश के वध पर पहले से ही बेहद कड़ा कानून लागू है और पूरी पाबंदी है। यह शंकराचार्य केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे विपक्षी शासित राज्यों में जाकर ऐसी कोई यात्रा नहीं करते, जहाँ खुलेआम गोवध होता है और वहाँ के रेस्टोरेंट और होटलों के मेन्यू में बीफ के व्यंजन सरेआम छपे रहते हैं। इस दोहरे मापदंड से आसानी से समझा जा सकता है कि शंकराचार्य की यह कथित गो-यात्रा वास्तविक न होकर राजनीतिक रूप से समाजवादी पार्टी को नैतिक समर्थन देने और योगी आदित्यनाथ की हिंदूवादी छवि को कमजोर करने के लिए ही प्रायोजित की गई है।
उत्तर प्रदेश: दिल्ली की सत्ता का प्रवेश द्वार
जिन सात राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं, उनमें उत्तर प्रदेश का राजनीतिक महत्व सबसे अधिक है, क्योंकि दिल्ली की केंद्रीय सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर ही जाता है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश में वैचारिक और राजनीतिक रूप से एक बड़ा झटका लगा था, जब उसे राज्य में मात्र 33 सीटों पर सफलता मिली थी। इसके विपरीत समाजवादी पार्टी को 37 सीटें मिली थीं, जो उसके इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है। उत्तर प्रदेश में मिली इसी सीमित सफलता के कारण ही भाजपा केंद्र में अपने दम पर पूर्ण बहुमत का आंकड़ा नहीं छू सकी थी, यद्यपि वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सहयोगियों के साथ सरकार बनाने में सफल रही थी।
इसलिए भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सरकार बनाना साख का सवाल है और बेहद महत्वपूर्ण है। यदि भाजपा को यहाँ आशा के अनुरूप सफलता मिलती है, तो वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए केंद्र की सत्ता का उसका रास्ता बिल्कुल साफ हो जाएगा। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी अगर इस बार भी राज्य की सत्ता से दूर रह जाती है, तो वह न केवल राज्य में बल्कि देश की राजनीति में भी पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाएगी। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय रोज एक नई करवट ले रही है।
निष्कर्ष: योगी की पिच और विपक्ष की चुनौती
सभी विपक्षी राजनीतिक दलों में अचानक उमड़े इस 'हिंदुत्व प्रेम' का सबसे बड़ा कारण बिहार, बंगाल और असम के पिछले चुनाव भी हैं, जहाँ हिंदू मतों के भारी ध्रुवीकरण के कारण विपक्षी दलों को शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा था। इन राज्यों के चुनावों ने यह संदेश पूरी तरह साफ कर दिया कि केवल मुस्लिम मतों के सहारे अब चुनाव जीतना और सरकार बनाना संभव नहीं रह गया है। इसीलिए अखिलेश यादव और कांग्रेस जैसी पार्टियां भी अपनी पुरानी रणनीति बदलकर प्रभु श्री राम की शरण में पहुँच गई हैं।
लेकिन इस प्रयास में जाने-अनजाने उन्होंने भाजपा को एक बड़ी वैचारिक बढ़त दे दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले नौ वर्षों में उत्तर प्रदेश में कानून और व्यवस्था की अब तक की सबसे सर्वोत्तम स्थिति, सुदृढ़ प्रशासनिक नीति और वित्तीय प्रदर्शन से हिंदुत्व की एक बेहद मजबूत पिच तैयार कर दी है। अब उस पिच पर अखिलेश यादव उतरकर कितनी सफल बैटिंग कर पाएंगे, इसमें राजनीतिक विश्लेषकों को गहरा संदेह है।
वह भी तब, जब भाजपा के पास योगी आदित्यनाथ के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर हिमंत बिस्वा सरमा, सुवेंदु अधिकारी, पुष्कर सिंह धामी और देवेंद्र फडणवीस जैसे हिंदुत्व के कद्दावर और धुरंधर चेहरे उपलब्ध हैं। साथ ही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह जैसे चुनावी बिसात के सदाबहार महारथी भी उत्तर प्रदेश की इस चुनावी व्यूह रचना का स्वयं संचालन करेंगे।
ऐसे में हिंदुत्व की पिच पर उत्तर प्रदेश के भीतर अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और उनके सहयोगियों का प्रदर्शन कैसा रहेगा, या उत्तर प्रदेश भी अंततः बिहार और असम की राह पर जाएगा—यह तो आने वाला समय ही तय करेगा। लेकिन यदि चुनाव परिणाम समाजवादी पार्टी की उम्मीदों के विपरीत आते हैं, तो उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की स्थिति भी बिहार के तेजस्वी यादव जैसी हो जाएगी, जो सत्ता की लालसा में केवल किनारे पर ही खड़े रह गए; और वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए इसकी संभावना लगातार प्रबल होती जा रही है।
~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~
वैचारिक समर्पण या चुनावी मजबूरी : घूमने लगी हिन्दुत्व के इर्द-गिर्द भारत की राजनीति
भारतीय राजनीति इस समय एक अभूतपूर्व वैचारिक संक्रांति काल से गुजर रही है। धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले तमाम प्रमुख राजनीतिक दल आज हिंदुत्व और सनातन संस्कृति की 'पिच' पर बल्लेबाजी करने को मजबूर हैं। जो दल कभी भाजपा को 'हिंदूवादी' कहकर घेरते थे, आज वे खुद को सबसे बड़ा सनातनी सिद्ध करने की होड़ में जुट गए हैं। यह भारतीय राजनीति का एक ऐसा अप्रत्याशित यू-टर्न है, जिसने पुराने सारे समीकरण बदल दिए हैं।
अवसरवाद और राम लला की शरण : विपक्ष के इस अचानक बदले सुर और राजनीतिक हृदय-परिवर्तन को राम मंदिर के दान में कथित हेरफेर के मामले से नई हवा मिली है। इस विवाद के सामने आते ही अचानक विपक्ष के उन नेताओं में भी रामभक्ति हिलोरे मारने लगी, जो अयोध्या में भव्य मंदिर बनने के बाद आज तक कभी रामलला के दर्शन करने नहीं गए थे। आज वे राजनेता दान चोरी पर हिंदुत्व और सनातन को चोट लगने तथा हिंदुओं की आस्था व श्रद्धा को आघात पहुँचने का दावा कर रहे हैं, जिन्होंने राम मंदिर या किसी भी अन्य मंदिर में कभी एक नया पैसा भी दान नहीं दिया था।
आप और कांग्रेस की सक्रियता: आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल से लेकर कांग्रेस के प्रांतीय नेताओं तक, सभी अचानक हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचने का दावा करने लगे हैं। यह वही केजरीवाल हैं जिन्होंने कभी अपनी नानी का हवाला देकर मंदिर निर्माण पर तंज कसा था। उनके राज्यसभा सांसद संजय सिंह तो राम मंदिर बनने के पहले से ही मुखर होकर चंदा चोरी का आरोप लगाते रहे हैं। इसी क्रम में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजयराय और अमेठी के सांसद भी अपने-अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ रामलला के दर्शन करने पहुँचे, यद्यपि उनके इस दौरे का वास्तविक उद्देश्य श्रद्धालुओं के बीच पहुँचकर राजनीतिक बवाल काटना तथा धरना-प्रदर्शन करना अधिक दिखाई दिया।
अखिलेश यादव का मास्टरस्ट्रोक: सबसे चौंकाने वाला बयान समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव का आया है। उन्होंने घोषणा की है कि सपा सरकार बनते ही अयोध्या को 'सनातन की धार्मिक राजधानी' के रूप में विकसित किया जाएगा।
चुनाव के मौसम में राहुल गांधी का जनेऊ धारण करना, भगवा पहनना या बनारस के घाट पर परशुराम का भेष धारण करना अब हैरान नहीं करता, क्योंकि यह वैचारिक प्रतिबद्धता से अधिक चुनावी 'इमेज मैनेजमेंट' का हिस्सा बन चुका है। प्रियंका वाड्रा भी ईसाई की पत्नी होने और बेटे की सगाई मुस्लिम से करने के बाद भी हिन्दुत्व का ढोंग करने में नाटकीय रूप से संलग्न रहती हैं।
अतीत और वर्तमान का छद्म : विपक्ष के इस 'सनातनी अवतार' को स्वीकार करना जनता के लिए इसलिए कठिन है, क्योंकि इनका अतीत मुस्लिम तुष्टिकरण के इतिहास से भरा पड़ा है।
समाजवादी पार्टी का रक्तरंजित इतिहास : सपा के इतिहास पर नजर डालें तो मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियाँ चलाई गईं, जिसमें दर्जनों निहत्थे रामभक्त मारे गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने गर्व से कहा था कि मुसलमानों का भरोसा जीतने के लिए उन्हें हजारों बार भी गोली चलानी पड़ती, तो वे चलाते। इसी तरह काशी में ज्ञानवापी स्थित शृंगार गौरी मंदिर की बैरिकेडिंग करना हो या संभल के कल्कि धाम में 'विश्व हरि मंदिर' के कूप (कुएं) पर रोक लगाना—सपा का इतिहास बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को आहत करने वाला रहा है। कब्रिस्तान की बाउंड्री वॉल के लिए सरकारी खजाना खोलना और वक्फ बोर्ड को खुली छूट देना इसी तुष्टिकरण नीति का हिस्सा था। पुलिस और दूसरी सरकारी नौकरियों में एक जाति और एक मजहब के लोगों धांधली पूर्वक भर्ती के जीते जागते किस्से भरे पड़े हैं।
लोग अभी भी काँवड़ यात्रा पर रोक, हिन्दू उत्सव यात्राओं पर प्रतिबंध, मुस्लिम त्योहारों के कारण दुर्गा और गणेश की प्रतिमाओं के विसर्जन पर प्रतिबंध, आदि को भूले नहीं हैं। पुलिस थानों और कारागारों में सदियों से चली आ रही कृष्ण जन्माष्टमी की उत्सव परंपरा पर रोक लगाने को तो खुद पुलिस कर्मी भी नहीं भूल सकते। मजहब विशेष के सजायाफ्ता आतंकियों के मुकदमें वापस लेने वालो को भला कोई कैसे पसंद कर सकता है। जबरन वसूली, फिरौती और संपत्तियों पर कब्जे वाली घटनाएं आज भी लोगों में सिहरन पैदा कर देतीं हैं।
राज्यसभा सदस्य और उनके भाई रामगोपाल यादव ने तो यहाँ तक दावा किया था कि मुलायम सिंह की सरकार ने ऐसी सुरक्षा व्यवस्था की थी कि 'परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा'। उन्होंने गर्व से कहा था कि लोग गुंबद पर चढ़ तो गए लेकिन फिर जीवित उतर नहीं पाए। आज लोग उन्हें 'मौलाना मुलायम' या 'मुल्ला मुलायम' कहते हैं, तो कहते रहें; हिंदू उन्हें वोट दें या न दें, उन्हें अपने इस कार्य पर न अफ़सोस था, न है और न कभी होगा। उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि भगवान राम, बाबरी मस्जिद में एक अवैध कब्जेदार हैं। ऐसे में हिन्दुओं के लिए अखिलेश की रामभक्ति तो प्रश्नों के घेरें में रहेगी ही, उनका तुष्टिकरण का वोट बैंक भी छिटक सकता है।
तुष्टीकरण की जननी : जहाँ तक कांग्रेस का प्रश्न है, स्वतंत्रता के बाद उसका झुकाव एकतरफा रूप से अल्पसंख्यक राजनीति की ओर रहा। जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में हैदराबाद के सैन्य विलय (ऑपरेशन पोलो) में ढील देना, रज़ाकारों के संगठन मजलिस ए इत्तहादुल मुसलमीन से प्रतिबंध हटाना और उसका भारतीयकरण करना और केरल में मुस्लिम लीग से प्रतिबंध हटाना और उसका भारतीय कारण करके उसके साथ चुनावी गठबंधन करना इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। हिंदू कोड बिल के जरिए बहुसंख्यकों को कानून में बांधना, पर मंदिरों के सरकारीकरण की नीति अपनाना और देश की पहली शिक्षा नीति की कमान भारतीय संस्कृति से अनभिज्ञ हाथों में सौंपना—यह सब कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति की नींव थी। देश की प्राचीन शिक्षा पद्धति के गुरुकुल तंत्र को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया और भारतीय संस्कृति को और अधिक आघात पहुँचाने के लिए देश का पहला शिक्षा मंत्री एक ऐसे मुस्लिम नेता को बनाया जिसका जन्म भी भारत में नहीं हुआ था और जिसे भारतीय रीति-रिवाज, संस्कृति व सभ्यता की कोई बुनियादी समझ नहीं थी। जिसका एकमात्र उद्देश्य भारत की पाठ्यपुस्तकों में वामपंथी और इस्लामी शिक्षा को बढ़ावा देना था। यही कारण है कि कांग्रेस के नेता आज भी बंद कमरों में बड़े शौक से कहते हैं कि वह मुसलमानों की पार्टी है।
2027 की चुनावी गणित और ध्रुवीकरण का डर : इस अचानक उमड़े 'हिंदुत्व प्रेम' के पीछे गहरी चुनावी छटपटाहट है। आगामी विधानसभा चुनाव (विशेषकर उत्तर प्रदेश) और आगामी लोकसभा चुनाव विपक्ष के अस्तित्व की लड़ाई बन चुके हैं।
बदला हुआ सियासी समीकरण: असम, बिहार और बंगाल जैसे राज्यों के पिछले चुनावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल मुस्लिम मतों के सहारे अब चुनाव जीतना और सरकार बनाना संभव नहीं है। जब तक बहुसंख्यक हिंदू मतों में सेंध नहीं लगेगी, तब तक सत्ता की दहलीज तक पहुँचना नामुमकिन है।
उत्तर प्रदेश में मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच है। 2024 के लोकसभा चुनाव में 37 सीटें जीतकर उत्साहित अखिलेश यादव को पता है कि उनका पारंपरिक 'एम-वाय ' (मुस्लिम-यादव) फैक्टर पूर्ण बहुमत के लिए नाकाफी है। ब्राह्मण और ठाकुर जैसे सवर्ण मतदाता इस समय भाजपा के साथ मजबूती से खड़े हैं। ऐसे में अखिलेश जनता की पहली पसंद बनने के लिए एक विवादित शंकराचार्य की शरण में हैं, ताकि उनकी गो-यात्राओं के बहाने योगी आदित्यनाथ सरकार को घेरा जा सके।
यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि उत्तर प्रदेश सभी भाजपा शासित राज्यों में अकेला ऐसा राज्य है जहाँ गोवंश के वध पर पहले से ही बेहद कड़ा कानून लागू है और पूरी पाबंदी है। यह शंकराचार्य केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे विपक्षी शासित राज्यों में जाकर ऐसी कोई यात्रा नहीं करते, जहाँ खुलेआम गोवध होता। इस दोहरे मापदंड से आसानी से समझा जा सकता है कि शंकराचार्य की यह कथित गो-यात्रा वास्तविक न होकर राजनीतिक रूप से समाजवादी पार्टी को नैतिक समर्थन देने और योगी आदित्यनाथ की हिंदूवादी छवि को कमजोर करने के लिए ही प्रायोजित की गई है।
योगी की मजबूत पिच पर विपक्ष की बैटिंग : अखिलेश यादव और उनके सहयोगी दल जिस हिंदुत्व की पिच पर रन बनाने की कोशिश कर रहे हैं, उसे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले 9 वर्षों में अपने कड़े प्रशासनिक निर्णयों, कानून-व्यवस्था और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से बेहद मजबूत कर दिया है। उत्तर प्रदेश गोवंश वध पर सबसे कड़े कानून वाले राज्यों में से एक है, इसलिए वहाँ गोवंश के नाम पर राजनीति करना बेअसर दिखता है।
भाजपा के पास इस पिच पर खेलने के लिए न केवल योगी आदित्यनाथ हैं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर हिमंत बिस्वा सरमा, सुवेंदु अधिकारी, पुष्कर धामी और देवेंद्र फडणवीस जैसे धुरंधर भी मौजूद हैं। साथ ही, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की चुनावी बिसात इस पिच को और अभेद्य बनाती है।
भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश में लगातार तीसरी बार सरकार बनाना साख का सवाल है और बेहद महत्वपूर्ण है। यदि भाजपा को यहाँ आशा के अनुरूप सफलता मिलती है, तो वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव के लिए केंद्र की सत्ता का उसका रास्ता बिल्कुल साफ हो जाएगा। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी अगर इस बार भी राज्य की सत्ता से दूर रह जाती है, तो वह न केवल राज्य में बल्कि देश की राजनीति में भी पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाएगी। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय रोज एक नई करवट ले रही है।
लेकिन विपक्ष ने अनजाने में ही सही, भाजपा को वैचारिक मोर्चे पर एक बड़ी बढ़त दे दी है। हिंदुत्व की इस राजनीतिक पिच पर अखिलेश यादव और उनके सहयोगी कितनी सफल बैटिंग कर पाएंगे, यह तो समय बताएगा। लेकिन यदि यह दांव उलटा पड़ा, जिसकी संभावना बहुत ज्यादा है, तो अखिलेश यादव की राजनीतिक स्थिति बिहार के तेजस्वी यादव जैसी हो जाएगी, जो सत्ता की छटपटाहट में किनारे पर खड़े रह गए।
~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें