कला और कट्टरता का इम्तिहान, फेल हुआ अल्ला रख्खा रहमान !
जब सुर राजनीति से टकराए, दूसरों का मोहरा बन जाए और अपने स्वार्थ में अँधा दूसरों को दे दे अपना कंधा, तो उसका नाम होता है — अल्ला रख्खा रहमान.
अल्ला रख्खा रहमान कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। वे भारत के वैश्विक सांस्कृतिक प्रतिनिधि हैं। इसलिए जब उनका नाम बीबीसी जैसे विवादास्पद अंतरराष्ट्रीय मंच से जुड़ता है, तो हर शब्द केवल एक साक्षात्कार नहीं, बल्कि एक विमर्श बन जाता है। औपनिवेशिक मंशा से ग्रस्त बीबीसी की मंशा तो स्पष्ट है — भारत में मुसलमानों के साथ भेदभाव का नैरेटिव स्थापित करना, और वह लम्बे समय से कर भी रहा है, यह सभी जानते हैं ।
बीबीसी संवाददाता हारून रशीद को दिए साक्षात्कार के बाद रहमान सुर्खियों में हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें काम नहीं मिल रहा है, पिछले 8 वर्षों में पॉवर शिफ्ट हो गया है और अब "नॉनक्रिएटिव" लोग तय करते हैं कि किसे काम मिले और किसे नहीं। इसका मतलब की जबसे केन्द्र में सत्ता परिवर्तन हुआ है, तबसे ऐसा हुआ. यह विशुद्ध राजनीतिक भाषा है। काम न मिलने के पीछे सांप्रदायिकता भी कारण हो सकता है, कैट हुए उन्होंने फिल्म छावा को भी विभाजनकारी बताया, जिसका संगीत खुद उन्होंने दिया था।
अगर सीधे अर्थों में देखा जाए तो ऐसा लगता है कि वह कोई बहुत ही गरीब और उपेक्षित कलाकार हैं, जो आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि रहमान फिल्म इंडस्ट्री के सबसे धनाढ्य संगीतकारों में से हैं। उनके पास चेन्नई में अत्याधुनिक और बेहद महंगा स्टूडियो है. वैसा कोई फिल्म जगत का कोई संगीतकार तो आज तक नहीं बना सका है। वे नियमित रूप से कार्यक्रम करते हैं, अच्छी कमाई कर रहे हैं — और आज भी बहुत व्यस्त हैं। इसलिए ये बहुत स्वाभाविक प्रश्न है कि
- क्या ए आर रहमान को सचमुच समस्या है? यदि नहीं, तो फिर हिंदूविरोधी और भारतविरोधी वक्तव्य क्यों?
- क्या रहमान के बयान के पीछे भारत विरोधी और कट्टर पंथी शक्तियां हैं? यदि हाँ तो इसके निहतार्थ क्या हैं?
लोकतंत्र में बोलने का अधिकार निर्विवाद सभी को है। लेकिन सवाल तो लाजिमी है, कि उन्होंने क्या कहा — पर उससे भी बड़ा सवाल है कि उन्होंने किस मंच पर कहा?
बीबीसी कोई सांस्कृतिक मंच नहीं है। यह एक कुख्यात भारतविरोधी नैरेटिवबिल्डर है, जिसका झुकाव वामपंथी और इस्लामी संगठनों की तरफ होता है। ब्रिटेन के करदाताओं के पैसे से चलने वाला बीबीसी अपने देश में भी मुख्यधारा के साथ नहीं है — तो भारत क्या चीज है? इसलिए जब आप बीबीसी से बात करते हैं, तो आप उसे भारतविरोधी हथियार थमा देते हैं।
एक बड़ा कलाकार आम नागरिक नहीं होता — वह देश का ब्रांड प्रतिनिधि होता है। भारत ने रहमान को क्या नहीं दिया ! ऑस्कर मंच तक पहुँचाया, अनगिनत राष्ट्रीय पुरुष्कार, पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च सम्मान दिए।
लेकिन उन्होंने देश को क्या दिया? घोर अपमान !
देश के प्रति नैतिक ज़िम्मेदारी, वह कर्तव्य है, जो किसी भी पुरस्कार से बड़ा होता है। मैं नहीं कहता कि रहमान को चुप रहना चाहिए — लेकिन हिंदुओं, हिंदी भाषा, बहुसंख्यकों, अपने प्रशंसकों और अपने देश के विरुद्ध बोलने में उन्हें जरा भी संकोच नहीं हुआ। छावा फिल्म का संगीत उन्होंने दिया, पैसे कमाए लेकिन अब कह रहे हैं कि ये फिल्म विभाजनकारी है। ये कोई सामान्य व्यक्ति तो नहीं कर सकता।
अब तक कोई रहमान को देशविरोधी कहने की कल्पना भी नहीं कर सकता था। लेकिन आज जब उनकी असली भावनाएँ सामने आ गईं — तो हर गलीमोहल्ले में उनके नाम पर थू थू हो रही है। जिस हिन्दू धर्म में उन्होंने जन्म लिया और 22 वर्ष तक जिस धर्म का जीवन जिया, उसका अपमान किया। अपने हिन्दू पिता का अपमान किया। अपने हिन्दू रिश्तेदारों का अपमान किया।
फिल्म जगत में कोई भी कलाकार हमेशा शिखर पर नहीं रह सकता। "सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट" का सिद्धांत यहाँ भी लागू होता है। दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन — सभी को समय के साथ प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।
रहमान का यह कहना कि उन्हें काम नहीं मिल रहा क्योंकि वे मुसलमान हैं — यह ज्यादा गंभीर आरोप है। वह इतने नासमझ तो नहीं होंगे कि इसके प्रभाव को समझते नहीं होंगे।
हिन्दी सिनेमा में खान बंधुओं (शाहरुख, आमिर, सलमान) का दशकों तक वर्चस्व रहा है — और उनके प्रशंसकों में बहुसंख्यक हिंदू ही हैं। मुसलमान, संख्या और फिल्म देखने की आदत के आधार पर किसी को शिखर पर नहीं पहुँचा सकते। शाहरुख़ खान की यदि अमेरिकी एअरपोर्ट पर तलाशी होती है, तो वह भारत आकर कहते हैं कि उनके साथ भेदभाव इसलिए होता है क्योंकि वह समुदाय विशेष से हैं, जबकि भारत से उसका कोई लेना देना नहीं। आमिर खान ने कहा था कि उनकी पत्नी बच्चों को लेकर चिंतित रहती हैं। नशीरुद्दीन के बयान तो जग जाहिर हैं। कई लोगों ने पुरूस्कार वापस कर दिए थे, और कई ने तो देश छोड़ने का एलान कर दिया था। यह सब कुछ 2014 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद हुआ। अब उस श्रंखला को आगे बढ़ने का काम अल्ला रखखा रहमान ने किया है.
रहमान ने वंदे मातरम, जिया जले, छैयाछैया जैसे हिंदी गीतों से प्रसिद्धि पाई — आज जो कुछ भी वह हैं, वह हिन्दी और हिन्दी सिनेमा के कारण लेकिन बीबीसी इंटरव्यू में उन्होंने हिंदी का अपमान किया और उर्दू को "मदर ऑफ म्यूजिक" कहा। या तो उन्हें भारत की समझ नहीं है या कट्टरपंथी अजेंडा चला रहे हैं। भारत के शास्त्रीय संगीत और गायन समझने के लिए उनका एक जीवन भी पर्याप्त नहीं है, उसके लिये उन्हे कई जन्म लेने पड़ेंगे।
बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि रहमान के जन्म का नाम ए. एस. दिलीप कुमार था। उनके पिता आर. के. शेखर तमिल और मलयालम फिल्मों के संगीतकार और धर्म निष्ठ हिन्दू थे । पिता की मृत्यु के बाद, उनका परिवार आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक संघर्ष से गुजर रहा था। उनकी बहन गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। इन मुशीबतों से छुटकारे के लिए, वह एक सूफ़ी करामतुल्ला शाह क़ादिरी के संपर्क में आये और फिर जैसा आम तौर पर होता है, उसके प्रभाव में आकर लगभग 22 वर्ष की उम्र में उन्होंने धर्मान्तरण कर लिया. आज लगभग 59 वर्ष की उम्र के रहमान के शरीर में 22 वर्ष के हिन्दू और 37 वर्ष के मुसलमान का मिश्रण है, तब ये हाल है। रहमान अक्सर कहते रहे हैं : “मैं धर्म को दीवार नहीं, एक पुल की तरह देखता हूँ।” लेकिन अब उसी पुल पर चढ़ कर भारतविरोधी और कट्टरपंथी सांप्रदायिक ताकतों से रिश्ता जोड़ कर देश को गली देकर सिद्ध कर दिया है कि उन्होंने धर्मान्तरण स्वार्थपूर्ति के लिए ही था।
रहमान को मणिरत्नम ने स्वयं निर्देशित फिल्म ‘रोज़ा’ में अवसर दिया — और यह काम उन्हे मुसलमान होते हुए दिया। अगर सांप्रदायिकता कारण होती तो उन्हे काम कैसे मिलता। ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ ने उन्हें ऑस्कर दिलाया। पद्म श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दिया और पद्म विभूषण नरेंद्र मोदी ने। तो अगर उनका इशारा राजनीतिक सत्तापरिवर्तन की ओर है — तो यह तथ्य उन्हें याद रखना चाहिए और इतना कृतघ्न तो कोई अजेंडा धारी ही हो सकता है ।
यह केवल रहमान की बात नहीं है — शाहरुख खान, आमिर खान, सलमान खान, नसीरुद्दीन शाह, सभी ने समयसमय पर सांप्रदायिकता का सार्वजानिक प्रदर्शन किया है। लेकिन इससे भी बड़ी बात है कि अंतर्राष्ट्रीय विमर्शकारी शक्तियाँ अपने गजवा-ए-हिन्द के अजेंडे को आगे बढाने के लिए समय समय पर भारतीय मुस्लिम हस्तियों को लुभाकर अपने जाल में फंसाती हैं और उनका इस्तेमाल करती हैं. ये सिलसिला लगातार चल रहा है. इनका क्षेत्र व्यापक है खेल, सिनेमा, राजनीति और प्रशासन. अजहरुद्दीन से लेकर हामिद अंसारी तक कोई भी, कहीं भी, कभी भी मिल सकता है.
कारगिल युद्ध के समय प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने दिलीप कुमार को दिल्ली बुलवाया ताकि वह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बात करा सकें,और पाकिस्तान को सन्देश दे सकें कि भारत में मुसलमान कितने खुश हैं. दिलीप कुमार ने नवाज शरीफ से बात की लेकिन अटल जी तब हतप्रभ रह गए जब दिलीप कुमार ने फोन पर नवाज शरीफ से कहा कि अल्लाह के लिए आप यह सब मत किया करिए, जब आप यह सब करते हैं,तो यहाँ भारत में हम मुसलमानों का घर से निकलना मुश्किल हो जाता है. दिलीप कुमार वही हैं जिन्होंने अपना नाम छिपाया फिर भी देश ने उन्हे सिर आंखों पर बिठाया।
आज रहमान कट्टरपंथियों के हाथ का मोहरा बने हैं, कल कोई दूसरा बनेगा । उनके पास इतना पैसा है कि अब उन्हें न हिंदी की चिंता है, न हिन्दी सिनेमा की। इसलिए ये न मानने का कोई कारण नहीं है कि उन्होंने जो किया वह सुनियोजित था, प्रायोजित भी । उन्होंने भारतीय पत्रकारों से क्यों कभी ऐसा नहीं कहा — केवल बीबीसी जैसे मंच पर ही क्यों कहा। इस इंटरव्यू का कोई विशेष अवसर भी नहीं था ।
जो व्यक्ति हिंदू, हिंदी और हिंदुस्तान के साथ विश्वासघात करता है — वह माफी भी मांगे तो भी उसे माफ़ नहीं किया जा सकता है और माफ करना भी नहीं चाहिए ।
~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~
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