बंगाल की (निर)-ममता — केंद्र की दुर्बलता || बंगाल में संवैधानिक व्यवस्था का पतन लेकिन दिल्ली मुँह फेर रही है || अराजकता के डर में डूबा राज्य और केंद्र के राजनीतिक मौन की कीमत चुकाते हिन्दू
जब कोई राज्य निर्मम हो जाए और केंद्र सरकार मौन साध ले, तो जो स्थिति बनती है, वही आज पश्चिम बंगाल की पहचान बन चुकी है।
पश्चिम बंगाल अब केवल किसी एक सरकार की विफलता की कहानी नहीं रह गया है। यह उस गहरे लोकतांत्रिक संकट का आईना बन चुका है, जहाँ सत्ता हिंसा के बल पर सुरक्षित है, संस्थाएँ दबाव में काम कर रही हैं और आम नागरिक भय के साये में जीवन जीने को विवश हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि यह सब कुछ खुलेआम, देश की आँखों के सामने घट रहा है—और केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया या तो विलंबित है या लगभग अनुपस्थित।
परंपरागत रूप से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रहने वाला यह राज्य, आगामी विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में असाधारण रूप से अस्थिर और उग्र राजनीतिक वातावरण से गुजर रहा है। हाल के दिनों में प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा राज्य के विभिन्न स्थानों पर की गई छापेमारियों ने इस अस्थिरता को और बढ़ा दिया। इनमें सबसे प्रमुख था I-PAC कार्यालय, जिसका संबंध कोयला घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग की जाँच से जोड़ा जा रहा है।
जब ED के अधिकारी I-PAC कार्यालय में दस्तावेज़ों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को जब्त करने की वैधानिक प्रक्रिया में थे, उसी समय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ वहाँ पहुँचीं। आरोप है कि जाँच से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज़ और साक्ष्य अधिकारियों से जबरन ले लिए गए। इसके बाद राज्य पुलिस ने स्वयं प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर दी।
न्यायपालिका पर दबाव और संस्थागत विघटन
पूरा देश तब स्तब्ध रह गया, जब प्रवर्तन निदेशालय राहत की आशा लेकर कलकत्ता उच्च न्यायालय पहुँचा और वहाँ भी वही अराजकता दिखाई दी। आरोप लगे कि व्हाट्सएप कॉल के माध्यम से पार्टी कार्यकर्ताओं को बुलाकर न्यायालय परिसर में जानबूझकर अव्यवस्था फैलाई गई, ताकि सुनवाई बाधित हो और न्यायपालिका पर दबाव डाला जा सके। उग्र भीड़ के कारण उस दिन न्यायालय सुनवाई नहीं कर सका।
- बंगाल का संकट अब केवल स्थानीय नहीं रहा
उच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायालय परिसर को जंतर-मंतर जैसे धरना-प्रदर्शन के स्थल में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। सुनवाई स्थगित होने के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। इस मामले को अत्यंत गंभीर मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया और टिप्पणी की कि केंद्रीय एजेंसियों के कार्य में हस्तक्षेप करना तथा उनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज करना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और यह असंवैधानिक भी हो सकता है।
हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय अभी आना शेष है, लेकिन एक बात स्पष्ट हो चुकी है—ममता बनर्जी सरकार इस पूरे घटनाक्रम को लेकर किसी भी प्रकार की जवाबदेही स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखती। यह मामला अब कोई साधारण विवाद नहीं रह गया है; यह भारत की संस्थागत संतुलन व्यवस्था और संवैधानिक मर्यादाओं की एक गंभीर परीक्षा बन चुका है, जिसका प्रभाव आने वाले वर्षों में केंद्र–राज्य संबंधों और जाँच प्रक्रियाओं पर पड़ेगा।
लोकतांत्रिक दुरुपयोग और बंगाल का पतन
पश्चिम बंगाल में लोकतांत्रिक ढाँचे का दुरुपयोग केवल राज्य के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गंभीर चिंता का विषय है। भारत के संविधान में निहित लोकतांत्रिक व्यवस्था धीरे-धीरे सुशासन का माध्यम बनने के बजाय शासन पर बोझ बनती जा रही है—और बंगाल इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है।
- बंगाल: भय के सहारे शासन, मौन की अनुमति
स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक यह राज्य वामपंथियों का गढ़ रहा, जिसके दौरान उद्यमिता, व्यापार और औद्योगिक विकास लगभग ठप हो गया। अंततः त्रस्त जनता ने वामपंथियों को सत्ता से बाहर किया, लेकिन दुर्भाग्यवश वह एक नई समस्या में फँस गई—तृणमूल कांग्रेस के शासन में।
ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथियों को चुनौती देते हुए बेहतर शासन और सुरक्षा का वादा किया। प्रारंभिक वर्षों में कुछ सुधार दिखाई दिए, किंतु समय के साथ इसका शासन अपने पूर्ववर्तियों से भी अधिक घातक सिद्ध होने लगा।
तुष्टिकरण, घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा
सत्ता में बने रहने के लिए तुष्टिकरण की राजनीति को चरम पर पहुँचा दिया गया। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की आड़ में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को खुला संरक्षण दिए जाने के आरोप लगे। धीरे-धीरे यह राजनीति उस खतरनाक सीमा को पार कर गई, जहाँ यह चुनावी रणनीति से आगे बढ़कर भारत की एकता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन गई। स्वाभाविक है कि देश की जनता इसे स्वीकार नहीं कर सकी।
- "बंगाल जहाँ सत्ता की रक्षा हिंसा से होती है"
इसी पृष्ठभूमि में बंगाल की जनता ने विकल्प तलाशने शुरू किए। वामपंथियों का पूर्ण पतन, कांग्रेस की निष्क्रियता और सांप्रदायिक तुष्टिकरण से उपजे शून्य में भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ। हिंदुओं के प्रति कथित अन्याय को भाजपा ने राजनीतिक मुद्दा बनाया और केंद्र में सत्ता में होने के कारण अपने जनाधार का विस्तार भी किया।
भाजपा का उदय—और उससे भी तेज़ पतन
पश्चिम बंगाल में भाजपा का उदय जितना तेज़ रहा, उसका पतन उससे भी अधिक तेज़ सिद्ध हुआ। 2014 में मात्र दो लोकसभा सीटें जीतने वाली भाजपा 2019 में 18 सीटों और लगभग 40 प्रतिशत वोट शेयर तक पहुँच गई। 2021 के विधानसभा चुनावों में उसने तृणमूल के कुशासन से मुक्ति का वादा किया और जनता का व्यापक समर्थन भी प्राप्त किया। किंतु केंद्र में सत्तासीन होने के बावजूद वह राज्य के मतदाताओं को आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराने में विफल रही।
मतदान केंद्रों पर केंद्रीय बलों की तैनाती के बावजूद तृणमूल के अराजक तत्वों ने मतदाताओं को घरों से निकलने तक नहीं दिया। परिणामस्वरूप भाजपा सत्ता से दूर रह गई, हालाँकि वह 2016 में मात्र तीन सीटों से बढ़कर 2021 में 77 सीटें पाकर मुख्य विपक्षी दल बन गई।
हिंसा, पलायन और भय का शासन
चुनावों के दौरान और उसके बाद हिंसा का पैमाना इतना व्यापक था कि भाजपा समर्थकों को योजनाबद्ध ढंग से निशाना बनाया गया। हज़ारों लोग अपने घर-बार छोड़कर पड़ोसी राज्यों में पलायन को मजबूर हुए। उनका एकमात्र ‘अपराध’ भाजपा का समर्थन करना था।
भाजपा अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों की रक्षा करने में असफल रही। कई मामलों में लोगों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया और तृणमूल कार्यालयों में साष्टांग दंडवत करने को विवश किया गया। इस भयावह वातावरण ने यह धारणा मजबूत कर दी कि संकट की घड़ी में भाजपा अपने समर्थकों के साथ खड़ी नहीं हो सकती।
इस धारणा का असर 2024 के लोकसभा चुनावों में दिखाई दिया, जब भाजपा की सीटें घटकर 12 रह गईं और उसका वोट प्रतिशत गिरकर 38 प्रतिशत हो गया।
स्थानीय नेतृत्व और राष्ट्रीय जिम्मेदारी
पश्चिम बंगाल की राजनीति में स्थानीय नेतृत्व हमेशा निर्णायक रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होने के बावजूद भाजपा राज्य में मज़बूत जमीनी संगठन और भरोसेमंद स्थानीय नेतृत्व विकसित नहीं कर सकी। 2021 की हिंसा के घाव आज भी उसके समर्थकों के मन में ताज़ा हैं।
सत्ता प्राप्त करने के लिए सामाजिक और सांप्रदायिक समीकरणों के साथ-साथ यह भरोसा भी आवश्यक होता है कि कोई दल अपने समर्थकों को अराजक तत्वों से सुरक्षित रख पाएगा। दुर्भाग्यवश भाजपा इस कसौटी पर खरी नहीं उतर सकी।
भ्रष्टाचार, हिंसा और केंद्र की निष्क्रियता
तृणमूल शासन के दौरान बंगाल ने सारदा चिटफंड घोटाला, शिक्षक भर्ती घोटाला, चुनावी हिंसा, रामनवमी शोभायात्राओं पर हमले, अराजक पंचायत चुनाव, रामपुरहाट नरसंहार, संदेशखाली में महिलाओं का यौन शोषण और आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की जघन्य घटना जैसी भयावह घटनाएँ देखीं। ये सभी लोकतांत्रिक पतन की एक डरावनी श्रृंखला प्रस्तुत करती हैं।
- “हिंसा से सुरक्षित सत्ता, चुप्पी से संचालित लोकतंत्र”
2025 तक आते-आते केंद्रीय एजेंसियों और राज्य सरकार के बीच टकराव सामान्य हो गया। न्यायालयों की कठोर टिप्पणियाँ न तो राज्य सरकार को शर्मसार कर सकीं और न ही केंद्र सरकार को समय रहते हस्तक्षेप के लिए प्रेरित कर सकीं।
साझा जिम्मेदारी से बचता केंद्र - राजनीतिक लाभ का लालच
“डबल इंजन सरकार” का आकर्षण बेचने से पहले केंद्र को अपनी दोहरी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। पिछले 10–12 वर्षों में पश्चिम बंगाल ने लोकतांत्रिक क्षरण की गंभीर चुनौतियाँ झेली हैं। यह केवल राज्य सरकार की विफलता नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की निष्क्रियता का भी परिणाम है। कई ऐसे अवसर आए जब राष्ट्रपति शासन अपरिहार्य प्रतीत होता था, किंतु मोदी सरकार ने हस्तक्षेप नहीं किया।
यदि यह राजनीतिक रणनीति थी—कि तृणमूल को स्वयं बदनाम होने दिया जाए—तो यह पश्चिम बंगाल की जनता के साथ गंभीर अन्याय है।
आज बंगाल की दयनीय स्थिति के लिए ममता बनर्जी सरकार और केंद्र की मोदी सरकार—दोनों समान रूप से जिम्मेदार हैं। तृणमूल कांग्रेस प्रत्यक्ष दोषी है, लेकिन इस स्थिति को लंबे समय तक बने रहने देने के लिए केंद्र सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती।
— शिव मिश्रा
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