शनिवार, 10 जनवरी 2026

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 1000 साल बाद इतिहास का पुनर्स्मरण

 


सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 1000 साल बाद इतिहास का पुनर्स्मरण || सोमनाथ का संघर्ष – गजनवी से नेहरू तक लगातार शत्रुता का शिकार || मोदी की उपस्थिति से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नया विमर्श


सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के हमले के 1,000 साल और मंदिर के आधुनिक जीर्णोद्धार के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में 8 से 11 जनवरी 2026 तक चार दिवसीय ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ का आयोजन किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 10 और 11 जनवरी को सोमनाथ मंदिर में रहेंगे और पर्व का हिस्सा बनेंगे। एक हजार वर्ष पूर्व जनवरी 1026 में @स्लामी आक्रांता महमूद गजनवी ने केवल धन-सम्पत्ति की लूट के लिए नहीं, बल्कि जिहादी बर्बरता में इस्लाम के प्रचार और प्रसार तथा @स्लामिक सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए आक्रमण किया था, क्योंकि सोमनाथ मंदिर, भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से सर्वप्रथम है और सबसे महत्वपूर्ण भी है। उसके बाद भी धर्मांध आक्रांताओं के अनेक आक्रमण हुए, लेकिन वे भारत की शाश्वत आस्था को डिगा नहीं सके और सोमनाथ का बार-बार पुनरुद्धार होता रहा।

नेहरू के पत्रों ने खोला कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” में जाने से पूर्व ही सोशल मीडिया पर मंदिर में 50 साल बाद हुए समारोह की फोटो साझा करते हुए कहा कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के पक्ष नहीं थे और उन्होंने इसमें कई अवरोध खड़े किए थे। भाजपा ने नेहरू के सोमनाथ मंदिर से संबंधित 17 पत्र जारी करते हुए न केवल नेहरू बल्कि कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर दिया है। नेहरू के पत्रों के माध्यम से भाजपा ने कांग्रेस की ऐतिहासिक नीतियों पर सवाल उठाए, जिससे यह विमर्श पुनः रेखांकित हो गया है कि कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता का अर्थ हिंदू विरोध है।

पटेल का संकल्प, जनता के चंदे से पुनर्निर्मित सोमनाथ

सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का संकल्प सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्रता के ठीक बाद 11 नवंबर 1947 को समुद्र के सामने खड़े होकर लिया था और जिसे नेहरू की उपस्थिति में केंद्रीय मंत्रिमंडल में सर्वसम्मति से स्वीकार किया था। नेहरू मंत्रिमंडल की बैठक में तो कुछ नहीं बोल सके, लेकिन बाद में उन्होंने इस प्रस्ताव का विरोध किया और उन्होंने हर संभव कोशिश की कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण न हो, लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल के आगे उनकी नहीं चली। नेहरू ने गांधी से शिकायत कर अपनी नाराज़गी प्रकट की। गांधी ने पटेल को सुझाव दिया कि मंदिर का पुनर्निर्माण सरकारी खर्च से न किया जाए। जिसे स्वीकार करते हुए सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ ट्रस्ट की स्थापना की और चंदा लेकर मंदिर का निर्माण कराया।

राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद बनाम नेहरू: प्राण-प्रतिष्ठा का विवाद

सोमनाथ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का निमंत्रण नेहरू को दिया गया, जिसे उन्होंने निर्दयतापूर्वक ठुकरा दिया था। उन्होंने अपने सभी मंत्रियों, यहाँ तक कि राष्ट्रपति को भी संदेश दिया था कि वे सोमनाथ समारोह में हिस्सा न लें, लेकिन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में जाने का निर्णय लिया। नेहरू गिरावट की इस श्रेणी तक पहुँच गए थे कि उन्होंने राष्ट्रपति को एक तरह से निर्देश दिया कि वे सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल करके इस समारोह में हिस्सा नहीं लेंगे। इस कारण उनके आने-जाने का प्रबंध व्यक्तिगत संसाधनों द्वारा के. एम. मुंशी ने किया। इसके बाद नेहरू डॉ. राजेंद्र प्रसाद से इस सीमा तक नाराज हो गए कि जीवन पर्यंत उनसे दुश्मनी निभाते रहे। नियमानुसार पदमुक्त होने के बाद राष्ट्रपति को कई भत्ते मिलते हैं और रहने के लिए जीवन पर्यंत आवास की व्यवस्था सरकार करती है, लेकिन नियम ताक पर रखकर नेहरू ने उन्हें कोई सरकारी आवास उपलब्ध नहीं कराया। स्वास के मरीज राजेंद्र प्रसाद का अंतिम समय पटना में कांग्रेस पार्टी के कार्यालय सदाकत आश्रम की एक सीलन भरी कोठरी में गुजरा और वहीं उनकी मृत्यु भी हुई।

सोमनाथ विरोध में उतरे नेहरु थे लियाकत अली के साथ

1951 में मुख्यमंत्रियों को लिखे एक पत्र में नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में “धूमधाम और समारोह” पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने कहा था कि इससे विदेशों में भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को नुकसान पहुँचता है। उन्होंने यहाँ तक निर्देश दिए थे कि सोमनाथ ट्रस्ट की ओर से पवित्र नदी का जल भेजने के अनुरोधों पर दूतावास ध्यान न दें। नेहरू ने 21 अप्रैल, 1951 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को एक चिट्ठी लिखी, जिसमें उन्हें 'प्रिय नवाबजादा' कहकर संबोधित किया और उन्हें भरोसा दिया कि सोमनाथ मंदिर के निर्माण जैसी कोई बात नहीं हो रही है। नेहरू ने भारतीय दूतावासों को पत्र लिखकर सोमनाथ ट्रस्ट को किसी भी तरह की सहायता देने से मना किया, जिसमें अभिषेक समारोह के लिए नदी से पानी के अनुरोध भी शामिल थे। पाकिस्तान में भारत के राजदूत को लिखे पत्र में नेहरू ने कहा कि सोमनाथ मंदिर में अभिषेक के लिए सिंधु नदी के पानी के इस्तेमाल को औपचारिक रूप से नामंजूर कर दिया जाए। नेहरू ने सेक्रेटरी-जनरल और विदेश सचिव को निर्देश दिया कि दूतावासों को सोमनाथ ट्रस्ट से पवित्र नदियों के पानी के लिए आने वाले अनुरोधों पर बिल्कुल भी ध्यान न दिया जाए।

नेहरू के पत्र जारी करने से कोई नई चीज़ सामने आई हो, ऐसा नहीं है, क्योंकि नेहरू का हिंदू विरोध सार्वजनिक था और इसके अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं।

नेहरु की चलती तो राम मन्दिर का अस्तित्व नहीं बचता

राम मंदिर के मामले में नेहरू का रुख हिंदुओं के प्रति कैसा था, यह अयोध्या मामले में उनके पत्रों से समझा जा सकता है, जो नेहरू वांग्मय में दिए गए हैं। 22/23 दिसंबर 1949 की मध्यरात्रि में राम जन्मस्थान पर रामलला के प्रकट होने की घटना से नेहरू बहुत नाराज थे। रामलला के प्रकट होने का समाचार सुनकर दूर-दराज के लोग सीधे अयोध्या चले आ रहे थे और देखते-देखते हजारों लोगों का जमावड़ा लग गया। जिला प्रशासन के लिए कानून और व्यवस्था बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गई। नेहरू के निर्देश पर जिला कांग्रेस अध्यक्ष अक्षय ब्रह्मचारी के नेतृत्व में स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता धरना-प्रदर्शन और आमरण अनशन कर जिला प्रशासन पर मूर्तियाँ हटाने का दबाव बनाने लगे। नेहरू ने प्रदेश के मुख्यमंत्री पंत को तुरंत मूर्तियाँ हटवाने का निर्देश दिया। पंत द्वारा ठोस कार्रवाई होती न देख नेहरू ने सीधे फैजाबाद के जिलाधिकारी के.के.के. नायर से फ़ोन पर बात की और गर्भगृह से तुरंत मूर्तियाँ हटवाने का निर्देश दिया। जिलाधिकारी नायर ने बताया कि जन्मभूमि पर हजारों की संख्या में लोगों का जमावड़ा है; ऐसे में मूर्तियाँ हटाना बहुत मुश्किल है।

केकेके नैयर ने बचाया राम मंदिर

बढ़ते राजनीतिक दबाव का मुकाबला करने के लिए जिलाधिकारी ने जन्मभूमि परिसर को कुर्क कर रिसीवर नियुक्त कर दिया और उन्हें रामलला की विधिवत पूजा-अर्चना का उत्तरदायित्व भी सौंप दिया। उस समय पूजा-अर्चना की जो विधि अपनाई गई, वह राम मंदिर निर्माण तक लगातार चलती रही। गुस्से में आगबबूला नेहरू ने 29 दिसंबर 1949 को पंत को एक टेलीग्राम भेजा: “मैं अयोध्या के घटनाक्रम से चिंतित हूँ। मैं उम्मीद करता हूँ कि आप जल्दी से जल्दी इस मामले में खुद दखल देंगे। वहाँ खतरनाक उदाहरण पेश किए जा रहे हैं, जिनके बुरे परिणाम होंगे।” मुख्यमंत्री पंत ने प्रदेश के मुख्य सचिव के माध्यम से जिलाधिकारी को लिखित आदेश दिया कि मूर्तियों को तुरंत गर्भगृह से बाहर रख दिया जाए और इसके लिए जितना भी बल प्रयोग करना पड़े, किया जाए। जिलाधिकारी ने बल प्रयोग करने से साफ इनकार करते हुए कहा कि ऐसा करने से जनाक्रोश होगा और बड़ी संख्या में लोग हताहत हो जाएँगे, जो प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से बिल्कुल भी उचित नहीं होगा। जिलाधिकारी नायर की तत्परता और होशियारी से 16 जनवरी 1950 को फैजाबाद के सिविल जज की अदालत में जन्मभूमि का मुकदमा दायर हो गया और मामला न्यायिक विचाराधीन हो गया। पंत ने नेहरू से कहा कि अब दखल देना ठीक नहीं, लेकिन नेहरू किसी भी कीमत पर मूर्तियाँ हटवाना चाहते थे। उन्होंने न्यायलय को भी दबाव में लेने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।

नेहरू ने एक पत्र 5 मार्च 1950 को पंत को लिखा, जिसे फैजाबाद जिला प्रशासन को मूल रूप से भेजा गया, जिसमें नेहरू का गर्भगृह से मूर्तियाँ तुरंत हटाने का आदेश था। जिलाधिकारी नायर ने सीधे प्रधानमंत्री से मिले निर्देशों पर कार्य करने में असमर्थता व्यक्त की। मुख्य सचिव को भेजे पत्र में नायर ने लिखा कि अगर सरकार किसी भी कीमत पर मूर्तियाँ हटाने का फैसला करती है, तो उससे पहले उन्हें पद से हटा दिया जाए, क्योंकि मूर्तियाँ हटाने के लिए बल प्रयोग करने के कारण बड़ी संख्या में लोगों की जानें जा सकती हैं। इस पृष्ठभूमि में नेहरू ने पंत को एक और पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने लिखा कि जिलाधिकारी आदेशों की अवहेलना कर रहे हैं। वे स्वयं अयोध्या आने के लिए तैयार हैं, लेकिन मुख्यमंत्री पंत, जो स्वयं रामभक्तों के आक्रोश के कारण अयोध्या नहीं जा सके थे, ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया।

18 मई 1950 को नेहरू ने बिधान चंद्र रॉय को पत्र लिखा: “16 मई के आपके पत्र के लिए धन्यवाद... अयोध्या में बाबर द्वारा बनाई गई एक पुरानी मस्जिद पर वहाँ के पंडा और सनातनी लोगों के नेतृत्व वाली भीड़ ने कब्जा कर लिया। मैं बड़े दुख के साथ कहता हूँ कि यूपी सरकार ने हालात से निपटने में बहुत कमजोरी दिखाई। आपने गौर किया होगा कि यूपी से बड़े पैमाने पर मु@लमानों का पलायन हुआ है।”

नेहरू ने राम जन्मभूमि को बा@री #स्जिद बनाए रखने का हरसंभव प्रयास किया। राम मंदिर मामले में नेहरू वांग्मय में उनके बड़ी संख्या में पत्र हैं, जिन्हें पढ़कर स्पष्ट होता है कि उनके ये कृत्य हिंदू धार्मिक गतिविधियों और सनातन की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण से उनकी छटपटाहट हैं।

कांग्रेस तथा उसके सहयोगियों की प्रतिक्रिया और राजनीतिक विमर्श स्वभाविक रूप से रक्षात्मक है. भाजपा नेहरू की धर्मनिरपेक्षता पर प्रश्न उठाकर कांग्रेस की हिंदू विरोधी मानसिकता उजागर करते हुए हिंदू सांस्कृतिक पुनर्जागरण को राजनीतिक समर्थन दे रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मोदी की यात्रा से भाजपा भारत की सांस्कृतिक विरासत को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाकर अपने पक्ष में माहौल बनाना चाहती है, जिसमें विपक्ष बहुत बौना साबित हो रहा है। सोमनाथ का मुद्दा केवल मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस वैचारिक टकराव को भी दर्शाता है, जिसमें एक ओर नेहरू की बनावटी धर्मनिरपेक्षता है और दूसरी ओर सरदार पटेल की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा।

स्वतंत्रता के बाद से किसी न किसी तरह कांग्रेस मु@स्लिम ध्रुवीकरण अपने पक्ष में करती रही है। अब उसे हिंदुओं के भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण हो जाने की चुनौती मिल रही है। इससे कांग्रेस चुनाव दर चुनाव हार का मुँह देख रही है। यदि कांग्रेस को हिंदुओं का समर्थन चाहिए, तो उसे उनकी भावनाओं को समझना और सम्मान करना चाहिए; अन्यथा राजनैतिक रूप से वह भाजपा का कभी मुकाबला नहीं कर पाएगी।

वर्ष 2024 में अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का निमंत्रण कांग्रेस ने ठुकरा दिया था। वे चाहते तो शामिल होकर मोदी के हिंदुत्व की धार कुंद कर सकते थे, लेकिन उन्होंने स्वयं अपने ऊपर नेहरूवादी तुष्टिकरण की नीति चस्पा कर ली। इसके पहले भी कांग्रेस 2007 में सेतु समुद्रम परियोजना में सर्वोच्च न्यायालय में शपथ-पत्र देकर कह चुकी है कि राम या रामायण का ऐतिहासिक अस्तित्व नहीं है; ये सब काल्पनिक हैं। ऐसे एक नहीं, अनेक मामले हैं, जिनमें कांग्रेस भी आक्रांताओं की ही तरह बार-बार हिंदू आस्था पर प्रहार करती आयी है। ऐसे में हिंदू जनमानस भी उन्हें लगातार सत्ता से बेदखल करता रहे, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अगर तुष्टिकरण की कीमत होती है तो विरोध की भी कीमत चुकानी होगी.

~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 1000 साल बाद इतिहास का पुनर्स्मरण

  सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 1000 साल बाद इतिहास का पुनर्स्मरण || सोमनाथ का संघर्ष – गजनवी से नेहरू तक लगातार शत्रुता का शिकार || मोदी की उपस्थि...