शनिवार, 3 जनवरी 2026

आतंकवाद का बदलता चेहरा — 2025 का वैश्विक परिदृश्य || हमले घटे — असर और गहरा हुआ || भारत के लिए खतरा बढ़ा — खत्म कब होगा ?

 


आतंकवाद का बदलता चेहरा — 2025 का वैश्विक परिदृश्य || हमले घटे — असर और गहरा हुआ || भारत के लिए खतरा बढ़ा — खत्म कब होगा ?


पिछले वर्ष 2025 ने दुनिया को यह याद दिलाया कि आतंकवाद भले ही अपने पुराने रूप में कुछ जगहों पर कमजोर पड़ा हो, लेकिन उसका खतरा समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि रूप, क्षेत्र और रणनीति बदल रहा है। अफ्रीका का साहेल क्षेत्र, दक्षिण एशिया — विशेषकर भारत का सीमावर्ती इलाका — पश्चिम एशिया और कई पश्चिमी तथा विकसित देश, सभी किसी न किसी रूप में आतंकवाद की चपेट में रहे। पहली बार ऑस्ट्रेलिया जैसे अपेक्षाकृत “सुरक्षित” माने जाने वाले देश में भी बड़ा आतंकी हमला सिडनी के बॉन्डाई बीच पर हुआ। दुर्भाग्य से कट्टरता का स्तर इतना बढ़ चुका है कि समुदाय-विशेष के एक पिता-पुत्र द्वारा यहूदी समुदाय के नरसंहार को धार्मिक कृत्य मानकर अंजाम दिया गया।

2025 में यह प्रतीत हुआ कि आतंकवादी घटनाओं की संख्या कई जगह कम हुई, लेकिन घटनाएँ अधिक घातक और कई देशों तक प्रसार वाली रहीं। घटनाओं का भौगोलिक विस्तार बढ़ गया। अगर यही क्रम जारी रहा, तो आगामी कुछ वर्षों में यह पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले सकता है। वैसे तो “आतंक का कोई धर्म नहीं होता” कहने वालों की कमी नहीं है, लेकिन पिछले वर्ष की लगभग सभी प्रमुख आतंकी घटनाओं में एक धर्म-विशेष के आतंकियों का दबदबा दिखाई दिया।

भारत के लिए 2025 ऐसा वर्ष रहा जिसमें घरेलू सुरक्षा-ढाँचा मजबूत रहा, लेकिन जम्मू-कश्मीर और सीमा-पार से प्रायोजित आतंकवाद ने गंभीर चुनौती दी। भारत में पहलगाम और लाल किला हमलों ने साल भर की सुरक्षा रूपरेखा बदल दी और नीतिगत व सामुदायिक उपायों की आवश्यकता स्पष्ट कर दी। हाई-प्रोफ़ाइल, व्हाइट-कॉलर और उच्च शिक्षित आतंकियों ने सरकारी नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन तथा दृढ़ राजनीतिक इच्छा-शक्ति की आवश्यकता पर बल दिया और घर में उग रही आतंकी विचारधारा को तुरंत समाप्त करने की आवश्यकता भी दर्शाई।


“आतंकवाद अब किसी एक क्षेत्र की समस्या नहीं — यह तकनीक, प्रॉक्सी-नेटवर्क और सॉफ्ट-टारगेट रणनीतियों से संचालित एक वैश्विक सुरक्षा-चुनौती है।”


2025 की वैश्विक समीक्षा बताती है कि आतंकवाद का प्रभाव भू-राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक रहा। इंस्टिट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (जीटीआई) 2025 की रिपोर्ट में कहा गया है कि आतंकवादी घटनाओं का भौगोलिक प्रसार बढ़ा है और प्रभावित देशों की संख्या कई गुना हो गई है। कुछ देशों में प्रभाव घटा, पर नए-नए क्षेत्र बने और नई तकनीक अपनाई गई। ग्लोबल टेररिज़्म इंडेक्स और अन्य रिपोर्टों के अनुसार 2023 तक दुनिया में आतंकवाद से होने वाली वार्षिक मौतें लगभग 12,000 का स्तर पार कर चुकी थीं। 2024 में लगभग 10% की गिरावट के बाद भी आतंकवाद से प्रभावित देशों की संख्या 58 से बढ़कर 80 तक पहुँच गई और आतंकवादियों द्वारा मौतों का आँकड़ा शर्मनाक स्थिति में पहुँच गया। आतंकी घटनाएँ अब अधिक देशों तक फैल रही हैं और इस वर्ष इसमें आश्चर्यजनक वृद्धि की आशंका है।

विश्व की प्रमुख आतंकी घटनाओं में भारत का पहलगाम हमला (22 अप्रैल 2025), जिसमें 26 हिंदू पर्यटकों को धर्म पूछकर मार डाला गया, वर्ष की क्रूरतम आतंकी घटना तथा नृशंस धार्मिक नरसंहार रहा। लाल किला आत्मघाती कार-विस्फोट (10 नवंबर 2025), जिसमें धर्म-विशेष के उच्च शिक्षित डॉक्टर तथा समुदाय-विशेष से जुड़े अल-फ्लाह विश्वविद्यालय के नाम सामने आए, वर्ष की हाई-प्रोफ़ाइल, व्हाइट-कॉलर घटना रही, जिसे कथित रूप से “गजवा-ए-हिन्द” को धार्मिक कृत्य मानकर अंजाम दिया गया। इन घटनाओं ने स्थानीय नागरिकों और पर्यटन-क्षेत्र को भारी क्षति पहुँचाई तथा विश्व के लगभग हर लोकतांत्रिक देश में समुदाय-विशेष के प्रति गंभीर शंका उत्पन्न कर दी। ये दोनों घटनाएँ भारत के 2025 के लेखाजोखा का अत्यंत काला अध्याय हैं और भविष्य के लिए बहुत बड़ी चेतावनी भी। भारत ही नहीं, अन्य देशों में भी धर्म-विशेष के आतंकियों द्वारा सामूहिक हमले, आत्मघाती हमले और बुनियादी ढाँचे पर निशाना साधने की हृदय-विदारक घटनाएँ दर्ज हुईं।


“भविष्य की सुरक्षा-रणनीति केवल बल पर नहीं — तकनीक, जवाबदेही और सामाजिक-विश्वास पर टिकेगी।”


ऑस्ट्रेलिया में 14 दिसंबर 2025 को बॉन्डी बीच पर यहूदियों के एक धार्मिक समारोह में धर्मांध पिता-पुत्र ने गोलीबारी की, जिसमें दर्जनों लोग घायल हुए और अनेक की मृत्यु हुई। यह घटना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा का केंद्र बनी और ऑस्ट्रेलियाई सुरक्षा-नीतियों पर बहस छेड़ी, लेकिन यह किसी देश की लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक उदारता के साथ विश्वासघात भी है। पाकिस्तान जैसे आतंकवादियों की शरणस्थली में भी आतंकी घटनाएँ हुईं। बलूचिस्तान के मस्तूंग में पुलिस बस को निशाना बनाया गया, इस्लामाबाद में आत्मघाती हमला (नवंबर 2025), सीरिया में होम्स मस्जिद बम-विस्फोट (26 दिसंबर 2025), नाइजीरिया के मेडुगुरी में मस्जिद में आत्मघाती हमला (25 दिसंबर 2025) तथा अमेरिका के न्यू ऑरलियन्स में आतंकियों द्वारा भीड़ पर ट्रक चढ़ाकर 14 लोगों की हत्या और 57 लोगों को घायल करने जैसी घटनाएँ सामने आईं। इसके अलावा साहेल (बुर्किना फासो, माली, नाइजर), सोमालिया, कांगो, यमन, अफगानिस्तान आदि में दर्जनों छोटे-बड़े हमले हुए, जिनमें संयुक्त रूप से हजारों लोगों की जान गई और अरबों रुपये की संपत्ति नष्ट हुई।

लगभग सभी हमलों में एक धर्म-विशेष की कट्टरपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों या उससे संबंधित आतंकी संगठनों की भूमिका सामने आई, यद्यपि अधिकांश लोग विश्वभर में यह कहते रहे कि उनका धर्म शांति और भाईचारे का संदेश देता है। यह स्पष्ट नहीं कि ये सभी कट्टरपंथी हैं या धार्मिक कट्टरता का बचाव करते हैं। इसलिए भारत में आतंकी हमलों के संदर्भ में “गंगा-जमुनी तहज़ीब” और भाईचारे की मिसालें बार-बार प्रश्नों के घेरे में आती हैं।

मोदी सरकार चाहे कुछ भी दावा करे, लेकिन वर्ष 2025 ने दिखा दिया कि भारत के लिए आतंकवाद का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उसका स्वरूप तकनीक-सक्षम, प्रॉक्सी-आधारित और सॉफ्ट-टारगेट केंद्रित होता जा रहा है। जम्मू-कश्मीर, पश्चिमी सीमा और ड्रोन नेटवर्क इसके मुख्य क्षेत्र रहे। यह सही है कि 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद आतंकी घटनाएँ कम हुईं। यह भी तथ्य है कि पहले कार्यकाल में जो कट्टरपंथी ताकतें भयभीत थीं, वे दूसरे कार्यकाल में सामने आ गईं और अब खुलकर सक्रिय हैं।

धारा 370 हटने के बाद घाटी के कट्टरपंथी तत्व सदमे में थे और कश्मीर में आतंकवाद में उल्लेखनीय कमी भी आई थी, लेकिन सरकार ने कुछ ऐसे संशोधन छोड़ दिए जिनसे न तो कश्मीरी पंडितों की वापसी हो पाई और न ही राज्य से बाहर का कोई व्यक्ति वहाँ का निवासी बन पाया। एक तरह से यथास्थिति ही बनी रही। राज्य के केंद्र-शासित होने का भी देश को पूरा लाभ नहीं मिल सका। उप-राज्यपाल के रूप में पहले सत्यपाल मलिक घाटी के नेताओं से समीकरण साधते रहे और बाद में मनोज सिन्हा के ढुलमुल रवैये से भी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका। परिसीमन का लाभ भी भाजपा सरकार नहीं उठा सकी और राज्य में घाटी का दबदबा कायम रहा — जिसका अर्थ है यथास्थिति — तथा सही मायनों में राज्य में घाटी-केंद्रित शासन ही चलता रहा, जो जम्मू के साथ सौतेला व्यवहार करने के साथ-साथ लम्बे अरसे से घुसपैठियों को बसाकर जनसांख्यिकीय परिवर्तन की दिशा में कार्यरत रहा।

राज्य में वही घिसे-पिटे देश-विरोधी चेहरे सत्ता में बने रहे, जो कहते हैं कि कश्मीर में हिंदू पर्यटन राज्य पर सांस्कृतिक हमला है। यह कहते समय वे भूल जाते हैं कि कश्मीर का नाम और उत्पत्ति ऋषि कश्यप से जुड़ी है, जिन्होंने नीलमत-पुराण के अनुसार सतीसर नामक विशाल सरोवर को सुखाकर घाटी बसाई। यह क्षेत्र कश्मीर शैव-दर्शन (त्रिक परंपरा) का प्रमुख केंद्र रहा, जो अद्वैत शैव-तंत्र का गढ़ था। आज भी हिंदुओं का पवित्र तीर्थ अमरनाथ धाम आस्था का बड़ा केंद्र है, जहाँ कभी भगवान शिव ने तपस्या की थी। कश्मीर 10,000 वर्ष पुरानी हिंदू संस्कृति का केंद्र रहा, जहाँ आज हिंदुओं का जाना घाटी की सरकार सांस्कृतिक हमला बता रही है।

दुर्भाग्य से भाजपा सहित सभी राजनीतिक दल खामोश रहे। हज़रतबल में करदाताओं के पैसे से किए गए जीर्णोद्धार के शिलापट्ट से सरकारी अशोक की लाट को भीड़ द्वारा ईंट-पत्थरों से तोड़ दिया गया, जबकि पुलिस और कानून-व्यवस्था केंद्र के पास है। इसका दुष्परिणाम लाल किले की आत्मघाती घटना के रूप में सामने आया, जब घाटी के कट्टरपंथियों ने राज्य से बाहर घटना को अंजाम दिया।

भाजपा को राजनीतिक लाभ और चुनावी समीकरण से ऊपर उठकर देशहित में कठोर निर्णय लेने का यह अंतिम समय है, अन्यथा आक्रोशित देशभक्त यदि गुस्से में भाजपा को सत्ता से बाहर कर देंगे, तो इसके साथ देश का भी भारी नुकसान होगा।

आतंकवाद के विरुद्ध भारत की रणनीति में केवल सुरक्षा-व्यवस्था और तकनीक ही नहीं, बल्कि सरकार के साहसिक कदमों की भी आवश्यकता है। भारत में मदरसा-शिक्षा की समीक्षा की सख्त आवश्यकता है, जहाँ से न केवल कट्टरता का बीज बोया जा रहा है, बल्कि आतंकवादी गतिविधियों को प्रेरित और पोषित भी किया जा रहा है। जुमे की नम*ज़ में दी जाने वाली तकरीरों पर भी सकारात्मक निगरानी की व्यवस्था किए जाने की आवश्यकता है। इन तकरीरों में कई बार देश-विरोधी वातावरण बनाया जाता है और भारत को *स्लामी गणराज्य बनाने की प्रेरणा दी जाती है। तमाम प्रयासों के बाद भी सरकार विदेशी फंडिंग पर प्रभावी नियंत्रण और निगरानी स्थापित नहीं कर सकी है। परिणामस्वरूप नेपाल सीमा से लगे क्षेत्रों में *दरसों और *स्जिदों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जहाँ न केवल कट्टरता का पाठ पढ़ाया जाता है, बल्कि धर्मांतरण, अवैध घुसपैठ और आतंकवादियों की शरण-स्थली के रूप में भी उनका प्रयोग हो रहा है।

समुदाय-विशेष को मिलने वाले विशेष अधिकारों की समीक्षा की तत्काल आवश्यकता है। भारत में इस समुदाय के धार्मिक और सामाजिक संगठनों की जितनी संख्या है, उतनी विश्वभर में कुल मिलाकर भी नहीं है। आखिर ये क्यों बने और क्या करते हैं — इस पर निगरानी और नियंत्रण आवश्यक है। अवैध घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर करने का कार्य युद्ध-स्तर पर किया जाना चाहिए।


“भविष्य की लड़ाई — सॉफ्ट-टारगेट्स पर।”


देश की मजबूती का आधार राजनीतिक संस्थाओं की जवाबदेही, सामाजिक समावेशन और नागरिकों का सक्रिय समर्पण है। कड़े कानून और नीतियाँ तभी टिकाऊ होंगी, जब राजनीतिक इच्छा-शक्ति न्यायिक सुरक्षा और मानवाधिकारों में संतुलन लागू कर सके।

हर नागरिक का गिलहरी-सा योगदान — नियमों का पालन, समुदाय में संवाद और सार्वजनिक सेवा — मिलकर बड़े परिवर्तन का कारण बन सकता है।

राजनीतिक सुधारों का उद्देश्य केवल दंडात्मक व्यवस्था नहीं, बल्कि ऐसा पारिस्थितिक तंत्र बनाना होना चाहिए, जहाँ वोट-बैंक राजनीति की जगह जवाबदेही, पारदर्शिता और राष्ट्रहित प्राथमिकता बनें। देश के प्रति सच्चा समर्पण तभी सार्थक होगा, जब वह कठोर नीतियों के साथ-साथ सहानुभूति, न्याय और समावेशन को भी साथ लेकर चले।

~~~~~~~~~शिव मिश्रा~~~~~~~~~

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