शनिवार, 31 अक्टूबर 2026

विधान परिषद चुनाव में भाजपा की जीत हार से भी बदतर : 2027 का महा संकट

 

विधान परिषद चुनाव में भाजपा की जीत हार से भी बदतर : 2027 का महा संकट  - शिव मिश्रा 




 

चार राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों पर संपन्न हुए चुनावों में यद्यपि भाजपा की कुल संख्यात्मक स्थिति लगभग पूर्ववत रही और उसने कांग्रेस शासित कर्नाटक में कॉंग्रेस को शून्य पर समेट दिया, किंतु उत्तर प्रदेश का परिदृश्य पूरी तरह भिन्न संदेश दे रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े इस सबसे महत्वपूर्ण राज्य में भाजपा की स्थिति तकनीकी तौर पर भले ही स्थिर दिख रही हो, लेकिन राजनीतिक संदर्भों में यह जीत, हार से भी बदतर है।   

 

उत्तर प्रदेश में स्नातक और शिक्षक क्षेत्र की 11 विधान परिषद सीटों पर हुए चुनाव से पूर्व भाजपा के पास 6, समाजवादी पार्टी के पास 3 और निर्दलीयों के पास 2 सीटें थीं। चुनाव के बाद भाजपा अपनी 6 सीटें बरकरार रखने में सफल तो रही, लेकिन समाजवादी पार्टी ने अपनी संख्या 3 से बढ़ाकर 5 कर ली। सबसे चौंकाने वाला परिणाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में सामने आया, जहां समाजवादी पार्टी ने शिक्षक और स्नातक दोनों ही सीटों पर कब्जा जमा लिया। वहीं, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रभाव क्षेत्र गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार मात्र 307 मतों के अत्यंत करीबी अंतर से ही जीत दर्ज कर सका। लखनऊ खंड स्नातक सीट पर समाजवादी पार्टी की कांति सिंह पटेल ने भाजपा के मौजूदा एमएलसी अवनीश कुमार सिंह को लगभग 17,000 मतों से हराया। राजधानी लखनऊ, जो भाजपा का सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ मानी जाती है, वहां स्नातक सीट गंवाना एक बड़ा नीतिगत और राजनीतिक झटका है।

"प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में दोनों सीटें गंवाना और मुख्यमंत्री के प्रभाव क्षेत्र में महज 307 मतों से पार पाना—यह तकनीकी जीत के आवरण में छिपे गहरे संगठनात्मक संकट का स्पष्ट संकेत है।"

"शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में सपा का बढ़ता दायरा रेखांकित करता है कि 'पीडीए' विमर्श अब पारंपरिक सीमाओं से निकलकर बौद्धिक और कर्मचारी वर्ग के भीतर भी जड़ें जमा रहा है।"

"भाजपा का कोर सवर्ण मतदाता यदि विरोधी खेमे में न भी जाए और केवल मतदान केंद्रों से विमुख होकर उदासीन बैठ जाए, तो 2027 की सत्ता-राह बेहद कंटीली साबित होगी।"

 

भाजपा ने इन चुनावों के लिए व्यापक संगठनात्मक ताकत झोंकी थी और शत-प्रतिशत परिणाम का लक्ष्य रखा था, जिससे 2027 के लिए एक अजेय राजनीतिक विमर्श तैयार किया जा सके; किंतु पार्टी इस लक्ष्य से काफी दूर रह गई। राष्ट्रीय स्तर पर भी महाराष्ट्र में संघ के मुख्यालय वाले शहर नागपुर की पदवीधर (स्नातक) सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार की जीत ने भगवा खेमे को असहज किया है। 

 

सैद्धांतिक रूप से इन सीटों के परिणामों से राज्य की सत्ता संरचना पर सीधा असर नहीं पड़ता, क्योंकि इनका चुनावी प्रारूप अलग होता है और मतदाता वर्ग केवल स्नातक और शिक्षक तक सीमित होता है। इसके बावजूद, राजनीतिक विमर्श गढ़ने के लिहाज से यह परिणाम भाजपा की संगठनात्मक तैयारियों पर सवाल खड़े करते हैं। समाजवादी पार्टी इन नतीजों से उत्साहित है और 2027 के चुनावी समर के लिए उसका आत्मविश्वास बढ़ा है। इसका एक रणनीतिक असर यह होगा कि सपा 'इंडिया' गठबंधन में सीटों के तालमेल के दौरान कांग्रेस पर अपनी शर्तें बेहतर ढंग से रख सकेगी, जबकि भाजपा पर उसके घटक दलों का सीट बंटवारे को लेकर दबाव बढ़ेगा।

 

इन परिणामों ने एक बार फिर रेखांकित किया है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक और जातीय गोलबंदी एक निर्णायक तत्व है। गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का चुनावी गणित इसका उदाहरण बना, जहां समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी ब्राह्मण होने के बावजूद मुख्य मुकाबला भाजपा उम्मीदवार और एक निर्दलीय यादव प्रत्याशी के बीच सिमट गया, जिसमें भाजपा प्रत्याशी द्वितीय वरीयता की गणना के बाद बहुत छोटे अंतर से जीत सका। प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी सामाजिक समीकरणों की सक्रियता ने अखिलेश यादव के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले को बौद्धिक व शिक्षक वर्ग के बीच भी एक धरातल प्रदान किया है। 

इसके साथ ही उच्च शिक्षा से जुड़े नीतिगत मुद्दों और शिक्षकों व कर्मचारियों के असंतोष का असर भी परिणामों में परिलक्षित हुआ। शिक्षक और स्नातक एमएलसी चुनावों में सबसे प्रभावी मुद्दा पुरानी पेंशन योजना, तदर्थ शिक्षकों का मानदेय/समायोजन और वित्तविहीन शिक्षकों की सेवा सुरक्षा रहा है।

राज्य के सवर्ण, विशेषकर ब्राह्मण मतदाताओं के एक वर्ग में उपजी नाराजगी भी सतह पर आई है। जमीनी स्तर पर एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के कथित दुरुपयोग की घटनाएं इस वर्ग के असंतोष का मुख्य कारण रही हैं और  यूजीसी मुद्दे ने आग में घी का काम किया है। उच्च शिक्षण संस्थानों में 200-पॉइंट आरक्षण रोस्टर, जिस कारण प्रोफ़ेसर, एसोसिएट प्रोफ़ेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती में सामान्य वर्ग के लिए घटते अवसर और हालिया पेपर लीक/नेट परीक्षा विवादों ने युवा स्नातकों और प्रतियोगी छात्रों में निराशा उत्पन्न की है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 के एक फैसले में प्रारंभिक जांच के बिना त्वरित गिरफ्तारी पर रोक, डीएसपी स्तर के अधिकारी द्वारा सत्यापन और अग्रिम जमानत का प्रावधान कर झूठे मुकदमों से संरक्षण दिया था। किंतु मोदी सरकार ने संसद में संशोधन पारित कर इन सुरक्षा उपायों को निष्प्रभावी कर दिया और कानून को पूर्ववत कड़ा बना दिया। इस अधिनियम के तहत दी जाने वाली आर्थिक राहत राशि के दुरुपयोग और झूठी शिकायतों पर दंडात्मक कार्रवाई के अभाव ने सामान्य वर्ग के भीतर भारी असुरक्षा और क्षोभ पैदा किया है।

 

2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को उत्तर प्रदेश में इसका खामियाजा भुगतना पड़ा था, जब उसकी सीटें 62 से घटकर 33 रह गईं, जबकि समाजवादी पार्टी 5 से उछलकर 37 और कांग्रेस 6 सीटों पर पहुंच गई। केंद्र में भाजपा के अपने बूते पूर्ण बहुमत से चूकने का सबसे बड़ा कारण उत्तर प्रदेश का यह लचर प्रदर्शन ही था। पार्टी व संघ के कार्यकर्ताओं की उदासीनता और सवर्ण वर्ग के एक हिस्से का मतदान केंद्रों तक न पहुंचना भाजपा की बड़ी कमजोरी बना।

 

2024 के लोकसभा चुनाव के विधानसभा-वार आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा गठबंधन केवल 174 विधानसभा क्षेत्रों में आगे था (भाजपा 162, सहयोगी 12), जबकि 'इंडिया' गठबंधन 224 क्षेत्रों (सपा 184, कांग्रेस 39) में बढ़त बनाए हुए था। यदि यही रुझान बना रहा, तो 2027 की डगर भाजपा के लिए अत्यंत चुनौतीपूर्ण सिद्ध होगी। 

 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण मतदाताओं की भूमिका का इतिहास भी महत्वपूर्ण है। प्रदेश में लगभग 13 प्रतिशत ब्राह्मणों के साथ कुल सवर्ण आबादी लगभग 22 प्रतिशत मानी जाती है, जो लंबे समय से भाजपा का परंपरागत कोर वोटर रहा है।  2007 में मायावती ने दलितों के साथ ब्राह्मणों को जोड़कर सोशल इंजीनियरिंग का सफल प्रयोग किया और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। बसपा से मोहभंग हुआ तो इस वर्ग ने 2012 में सपा की सरकार बनवाई, लेकिन जब इस समाज को वहाँ भी निराशा हाथ लगी तो 2017 और 2022 में भाजपा की सत्ता वापसी में भी ब्राह्मणों सहित सवर्ण मतदाताओं का व्यापक समर्थन महत्वपूर्ण रहा। लेकिन अब यक्ष प्रश्न यह है कि क्या यह समर्थन 2027 में भी भाजपा को उसी रूप में मिलेगा? आज तो इसकी संभावना बहुत कम दिखाई पड़ती है।

 

वर्तमान में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली और प्रशासनिक निर्णयों के प्रति सामान्य वर्ग में सहानुभूति और समर्थन होने के बावजूद, केंद्र सरकार के कुछ नीतिगत फैसलों और कानूनी संशोधनों को लेकर उपजा रोष जमीन पर दिख रहा है। यदि यह वर्ग 2027 में भाजपा के खिलाफ न जाकर केवल मतदान से उदासीन या विरत भी रह गया, तो इसका सीधा नुकसान सत्तारूढ़ दल को उठाना पड़ सकता है। विधान परिषद के ये चुनाव परिणाम उसी सुलगती हुई राजनीतिक जमीन की शुरुआती बानगी हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना 2027 के लिए भारी पड़ सकता है। 

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

 

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विधान परिषद चुनाव में भाजपा की जीत हार से भी बदतर : 2027 का महा संकट

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