शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

यूजीसी नियमों पर मोदी सरकार की लीपापोती

 

यूजीसी नियमों पर मोदी सरकार की लीपापोती

                   - शिव मिश्रा 

 

केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में यूजीसी नियमों पर चल रही सुनवाई के दौरान कहा कि वह शिक्षण संस्थानों में समता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाए गए 'विश्वविद्यालय अनुदान आयोग समता नियम, 2026' की पुनर्विचार/समीक्षा हेतु एक विशेष समिति गठित करने पर विचार कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने प्रत्येक छात्र के हितों की रक्षा करने की आवश्यकता पर बल दिया। चार सप्ताह पश्चात सर्वोच्च न्यायालय इस मामले पर पुनः सुनवाई करेगा।

 

सर्वोच्च न्यायालय ने इन नियमों पर 29 जनवरी 2026 को सुनवाई करते हुए इनके क्रियान्वयन पर अंतरिम स्थगन आदेश (स्टे) दिया था। नौ महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी इतने संवेदनशील विषय पर सरकार की ओर से कोई ठोस समाधान न देना केवल मामले की लीपापोती प्रतीत होता है। 13 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 'उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026' अधिसूचित किए थे। अपने नाम के विपरीत, इन नए नियमों में विभाजनकारी असंतुलन उत्पन्न करने वाले कई बिंदु समाहित थे। देश भर में इस व्यवस्था का व्यापक विरोध हुआ, जिसे आरंभ में शासन द्वारा प्रशासनिक सख्ती से नियंत्रित करने का प्रयास किया गया।

 

सामाजिक समरसता और जातिगत विद्वेष को समाप्त करने का संकल्प दोहराने वाली सत्ताधारी पार्टी ने यहाँ व्यापक जनभावनाओं के विपरीत जाकर संकीर्ण राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता दी।  हिंदू समाज पहले से ही एससी-एसटी संशोधन कानून की कठोरताओं को लेकर असहज था; ऐसे में यूजीसी के  नए नियमों ने सामान्य वर्ग को भीतर तक उद्वेलित कर दिया। यह स्थिति 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करते समय विश्वनाथ प्रताप सिंह की उस रणनीति की याद दिलाती है, जहाँ यह मान लिया गया था कि लाभार्थी वर्ग स्थायी रूप से सत्ता के प्रति निष्ठावान रहेगा। किंतु इतिहास गवाह है कि संकुचित राजनीतिक लाभ के लिए किए गए ऐसे प्रयोग दीर्घकालिक जनाधार की गारंटी नहीं बनते।

 

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज के समाज में, जहाँ जातिगत भेदभाव, छुआछूत और जाति के आधार पर सामाजिक दूरी की भावना काफी हद तक कमजोर हुई है, वहाँ इस प्रकार के विभेदकारी कानून बनाकर सरकार ने हिंदू समाज को एक बार फिर जातिवादी कुचक्र में फँसाने का प्रयास किया है। भारत की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में वोटों के लालच में जातिवादी और विभेदकारी नियम बनाना एक सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया बनती जा रही है। यही कारण है कि किसी भी राजनीतिक दल ने यूजीसी के इन भेदभावपूर्ण नियमों के विरुद्ध प्रभावी ढंग से आवाज नहीं उठाई। सभी राजनीतिक दलों को समाज की अपेक्षा अपने वोटों की चिंता अधिक रहती है। यही प्रवृत्ति राष्ट्र के नैतिक पतन के प्रमुख कारणों में से एक है।

पृष्ठभूमि पर दृष्टि डालें तो वर्ष 2016 में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला और 2019 में मुंबई में डॉ. पायल तडवी की कथित जातिगत भेदभाव के चलते हुई आत्महत्याओं के बाद 2019 में सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई थी। याचिका में वर्ष 2012 के यूजीसी दिशा-निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए एक पारदर्शी तंत्र की माँग की गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने मौजूदा तंत्र को सुदृढ़ करने का निर्देश दिया था, किंतु नियामक संस्था ने एक कदम आगे बढ़कर ऐसे नए नियम गढ़े जिनकी माँग मूल याचिका में भी नहीं थी। ओबीसी को शामिल करने और नियमों के दायरे को इस प्रकार निर्धारित करने पर संवैधानिक दृष्टि से भी गंभीर सवाल उठते हैं। 

 

नए नियमों में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को केवल विशिष्ट वर्गों तक सीमित कर दिया गया, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए संस्थागत शिकायत और सुरक्षा के रास्ते लगभग बंद हो गए। ऐसा मान लिया गया कि सामान्य वर्ग का छात्र कभी पीड़ित नहीं हो सकता। इसके अलावा, परिसरों में गठित होने वाली 'इक्विटी कमेटी' और 'इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर' में सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों या प्राध्यापकों के अनिवार्य प्रतिनिधित्व का कोई प्रावधान नहीं रखा गया।

 

पुराने नियमों में झूठी या द्वेषपूर्ण शिकायत दर्ज कराने पर दंड का प्रावधान था, जिसे नए मसौदे से हटा दिया गया। इससे इस आशंका को बल मिला कि दुर्भावना या आपसी रंजिश के चलते सामान्य वर्ग के छात्रों के विरुद्ध इन प्रावधानों का दुरुपयोग हो सकता है, जिससे किसी भी युवा का शैक्षणिक भविष्य और सामाजिक प्रतिष्ठा बिना निष्पक्ष जाँच के नष्ट हो सकती है।

 

सर्वोच्च न्यायालय ने प्रथम दृष्टया इन नए प्रावधानों की विसंगतियों को देखते हुए इन पर रोक लगाई थी, किंतु विगत नौ महीनों से सरकार ने कोई ठोस सुधारात्मक कदम नहीं उठाया। इस उपेक्षा का सीधा राजनीतिक प्रभाव भी अब दृष्टिगोचर होने लगा है।

इस बीच हुए उपचुनावों में भाजपा को सामान्य वर्ग की नाराजगी का खामियाजा भुगतना पड़ा और उसे कुछ प्रतिष्ठित सीटों पर हार का सामना करना पड़ा। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा खाली की गई बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट तथा मध्य प्रदेश की दतिया सीट पर भी, जहाँ सामान्य वर्ग के मतदाताओं का प्रभाव माना जाता है, भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। उत्तर प्रदेश में हाल ही में हुए विधान परिषद चुनावों में प्रधानमंत्री के लोकसभा क्षेत्र वाराणसी की दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी ने जीत हासिल की। भाजपा की परंपरागत लखनऊ स्नातक सीट पर भी समाजवादी पार्टी ने विजय प्राप्त की।  गोरखपुर-फैजाबाद सीट पर भाजपा केवल 307 मतों के अंतर से जीत सकी।

उत्तर प्रदेश विधान परिषद चुनाव में एक और अत्यंत उल्लेखनीय घटना सामने आई। इन चुनावों में लगभग 53,615 मत अवैध पाए गए जिनमें मतदाताओं ने भाजपा प्रत्याशियों के नाम के सामने मतपत्रों पर 'यूजीसी रोलबैक' लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया था। इसका निहितार्थ यह है कि इन मतदाताओं ने समाजवादी पार्टी को वोट देने के बजाय जानबूझकर अपने मतपत्र इस प्रकार भरे कि उनके मत अवैध घोषित हो जाएँ। उनका संदेश स्पष्ट था कि वे समाजवादी पार्टी को वोट नहीं देना चाहते, लेकिन यदि यूजीसी के नियमों में बदलाव नहीं किया गया तो वे भाजपा को भी वोट देने से परहेज कर सकते हैं। यह घटना भाजपा के लिए एक गंभीर राजनीतिक संकेत के रूप में देखी जानी चाहिए।

सवर्ण मतदाताओं की यह नाराजगी उत्तर प्रदेश के  विधानसभा चुनावों के संदर्भ में भाजपा के लिए खतरे की घंटी है। प्रदेश में लगभग 14 प्रतिशत ब्राह्मण, 10 प्रतिशत ठाकुर, 4 प्रतिशत वैश्य और 2 प्रतिशत अन्य सवर्ण जातियों के मतदाता हैं। ये परंपरागत रूप से भाजपा के निष्ठावान समर्थक है। चुनावी सर्वेक्षणों में  लगभग 85% सवर्ण मतदाताओं की भाजपा के पक्ष में मतदान करने की प्रवृत्ति सामने आती रही है। यदि यूजीसी के नए नियमों से उत्पन्न नाराजगी के कारण सवर्ण मतदाताओं का आधा हिस्सा भी मतदान से विरत रहता है या  भाजपा से दूरी बना लेता है, तो भाजपा मुश्किल में पड़ सकती  है। इसलिए भाजपा को हाल के चुनावी घटनाक्रम से सबक लेते हुए इस मामले में शीघ्र और प्रभावी कदम उठाने चाहिए।

कहावत है कि सफलता का नशा सिर चढ़कर बोलने लगता है, तो वह मनुष्य सही और गलत का विवेक खो बैठता है। यही स्थिति अंततः उसकी असफलता का कारण बनती है। लगातार चुनावी सफलताओं से उत्पन्न आत्मविश्वास यदि अहंकार में बदल जाए, तो वही गलतियाँ होती हैं जो भाजपा कर रही है। यदि उत्तर प्रदेश में भाजपा सत्ता में वापसी नहीं कर पाती है, तो 2029 में केंद्र की सत्ता में फिर से सरकार बनाने की उसकी राजनीतिक रणनीति पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में यही कहा जाएगा कि भाजपा ने अपनी पराजय की पटकथा स्वयं लिखी।

एससी-एसटी एक्ट के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय को संसद में नया कानून बनाकर बदलने के लिए भाजपा सरकार बाध्य नहीं थी, लेकिन उसने ऐसा किया। यह कदम राजीव गांधी द्वारा शाहबानो प्रकरण में लिए गए निर्णय की याद दिलाता है। यूजीसी के मामले में भी सरकार ने नए नियम बनाकर एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया, जिसने उसके सामने राजनीतिक और सामाजिक चुनौतियाँ उत्पन्न कर दी हैं।

राजनीति में कभी-कभी एक गलत निर्णय वर्षों की मेहनत से अर्जित जनसमर्थन को प्रभावित कर देता है। यूजीसी नियमों का मामला भी भाजपा के लिए ऐसा ही एक गंभीर मोड़ साबित हो सकता है। यदि सरकार ने समय रहते अपनी गलती स्वीकार कर नियमों में निष्पक्षता और समानता के अनुरूप संशोधन नहीं किया, तो इसके दूरगामी राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। सत्ता से बेदखली के साथ-साथ भाजपा को अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता और जनाधार के क्षरण का भी सामना करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में उसके लिए 'पुनर्मूषिको भव' वाली कहावत चरितार्थ होने का खतरा रहेगा।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~

यूजीसी नियमों पर मोदी सरकार की लीपापोती

  यूजीसी नियमों पर मोदी सरकार की लीपापोती                    - शिव मिश्रा    केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में यूजीसी नियमों पर चल रही स...