Friday, January 15, 2021

क्या रजिस्ट्री के बाद म्युटेशन करवाना जरूरी है और न करवाने के क्या नुकसान हैं?

ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट १८८२ के अनुसार किसी भी संपत्ति के स्वामित्व हस्तांतरण हेतु अभिलेख ( सेल डीड, गिफ्ट डीड या अन्य ) का पंजीकरण या रजिस्ट्री होना अनिवार्य है.

  • इस रजिस्ट्रेशन या पंजीकरण पर सरकार कर लगाती है जो स्टैंप ड्यूटी के रूप में क्रेता को देनी पड़ती है, जिसका निर्धारण संपत्ति के मूल्य या सरकार द्वारा निर्धारित सर्किल रेट के अनुसार किया जाता है.
  • अगर संपत्ति का विक्रय किया जाता है तो इसे सेल डीड, अगर गिफ्ट दिया जाता है तो इसे गिफ्ट डीड कहा जाता है.
  • रजिस्ट्रेशन या रजिस्ट्री की कार्यवाही रजिस्ट्रार के कार्यालय में संपादित की जाती है जो इस तरह के स्थानांतरण और विक्रय का रिकॉर्ड रखते हैं.
  • रजिस्ट्रेशन या रजिस्ट्री संपत्ति हस्तांतरण की पहली प्रक्रिया है और यह एक तरह से संपत्ति हस्तांतरण के लिए प्रमाण पत्र की तरह होती है लेकिन यह अपने आप में स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं है.

इसे थोड़ा विस्तार से समझ लेना बहुत आवश्यक है.

  • हर संपत्ति का ब्यौरा सरकार के संपत्ति रजिस्टर या सरकारी दस्तावेजों में होता है और यह किसी भी संपत्ति के स्वामित्व या मालिकाना हक का अंतिम दस्तावेज माना जाता है.
  • अगर यह कृषि भूमि है तो इसका विवरण राजस्व दस्तावेजों में होता हैं, जो तहसील या स्थानीय राजस्व कार्यालय में होते हैं.
  • अगर यह शहरी भूमि या मकान है, तो इसका विवरण संबंधित विकास प्राधिकरण, नगर निगम, नगर महापालिका या अन्य संबंधित विभाग में होता है.
  • जब भी कभी संपत्ति का क्रय - विक्रय होता है तो इन सरकारी दस्तावेजों में संपत्ति स्वामी के नाम के स्थान पर नए खरीदार का नाम लिखवाना अत्यंत आवश्यक है.
  • मूल सरकारी दस्तावेजों में नाम परिवर्तित करने की इस प्रक्रिया को म्यूटेशन, इंतकाल या दाखिल खारिज कहा जाता है. इसलिए जब तक म्यूटेशन इंतकाल या दाखिल खारिज नहीं हो जाता है तकनीकी रूप से खरीदार को स्वामित्व नहीं मिलता और सम्पत्ति पर पुराने मालिक का नाम अंकित रहता है .

म्यूटेशन इंतकाल या दाखिल खारिज न करवाने के नुकसान

  • म्यूटेशन न करवाए जाने पर संपत्ति के सरकारी दस्तावेजों में पहले वाले भू -स्वामी का नाम रहता है और तकनीकी तौर पर वह संपत्ति का मालिक होता है.
  • जब तक संपत्ति रजिस्टर में पुराने भू - स्वामी का नाम है, किसी धोखाधड़ी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
  • बिना धोखाधड़ी किये भी एक स्वाभाविक परेशानी होती है कि सरकारी दस्तावेजों में दर्ज भू स्वामी की मृत्यु के पश्चात उत्तराधिकार कानून के अनुसार थोड़ी सी औपचारिकता के बाद ( मृत्यु प्रमाण पत्र और उत्तराधिकार प्रमाण पत्र) तहसील, नगर निगम और नगर महापालिका में मृतक के उत्तराधिकारियों का नाम आ जाना बहुत आम बात है.
    • ये उत्तराधिकारी खरीदार को अनावश्यक कोर्ट कचहरी के चक्कर में डाल सकते हैं.
  • मूल भूस्वामी भी लालच में आकर अपनी संपत्ति की दोबारा रजिस्ट्री कर सकता है और इस तरह एक ही संपत्ति के दो खरीदार हो जाएंगे.
  • अगर दूसरा खरीदार ज्यादा तेज हुआ और उसने पहले म्यूटेशन करा लिया तो भी अनावश्यक मुकदमे बाजी शुरू हो जाएगी.
  • रजिस्ट्री कराने के बाद यदि काफी समय हो गया है तो भी संबंधित विभाग को एक लंबी प्रक्रिया का पालन करना होता है जिसके अनुसार क्षेत्रीय समाचार पत्रों में इस म्यूटेशन के आवेदन की सार्वजनिक सूचना दी जाती है ताकि यदि किसी को आपत्ति हो तो वह अपनी आपत्ति दर्ज करा सके.
    • इसमें अनावश्यक परेशानी तो होगी ही समय और पैसे की भी बर्बादी होगी.
    • दुर्भाग्य से अगर किसी ने आपत्ति दाखिल कर दी तो व्यर्थ की मुकदमे बाजी भी शुरू हो सकती है.

क्या सावधानी बरतें ?

  • जब भी कोई संपत्ति खरीदें चाहे वह कृषि भूमि हो या शहरी भूमि या कोई बना बनाया मकान , उसकी सर्च रिपोर्ट किसी वकील के माध्यम से जरूर बनवानी चाहिए.
  • यह वकील संबंधित रजिस्ट्री ऑफिस और संबंधित संपत्ति कार्यालय के कम से कम 12 साल के रिकॉर्ड देखेगा और नॉन इनकंब्रेंस सर्टिफिकेट बनाएगा.
  • इसके साथ ही वह वकील बिक्री करने वाले व्यक्ति और संपत्ति दस्तावेजों में अंकित अंतिम व्यक्ति की छानबीन करेगा और पिछले 30 सालों में संपत्ति हस्तांतरण की श्रंखला की जांच करेगा ( चैन ऑफ टाइटल डीड)
  • उपरोक्त दोनों चीजें सही होने पर ही संपत्ति खरीदनी चाहिए.
    • अगर आप किसी अच्छे बैंक से ऋण ले रहे हैं तो संभवत इन बातों का पालन किया जाएगा
      • स्टेट बैंक में बिना इन रिपोर्ट्स के ऋण नहीं दिया जा सकता . इस प्रक्रिया में काफी समय भी लगता है और थोड़ा खर्चा भी होता है इसलिए कई बार लोगों को स्टेट बैंक की प्रक्रिया काफी जटिल और लंबी लगती है.
      • मेरे राय में यह अत्यंत आवश्यक है कि जिस संपत्ति में आप इतना निवेश कर रहे हैं उसकी पूरी तरह से जांच पड़ताल होनी ही चाहिए.
  • एक बार जब आप सभी तरह की कमियों से मुक्त, साफ और स्वच्छ स्वामित्व वाली संपत्ति खरीदते हैं तो इसके तुरंत बाद संभव हो तो एक माह के अंदर नाम स्थानांतरण के लिए आवेदन कर देना चाहिए.
  • यही नहीं जब आपका नाम आ जाता है तो उसके बाद भी आप किसी वकील के माध्यम से एक छोटी सर्च रिपोर्ट प्राप्त कर सकते हैं ताकि आप सुनिश्चित कर सकें कि वह संपत्ति आपके नाम आ चुकी है.

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