भारत के विरुद्ध वैश्विक कुचक्र: 'डीप स्टेट' का प्रयोग, पनपती अराजकता और 2027 का महासंग्राम
- शिव मिश्रा
वर्तमान में भारत की राजधानी नई दिल्ली सुनियोजित आंदोलनों और अराजकता का प्रमुख केंद्र बन चुकी है। यद्यपि विरोध-प्रदर्शनों की यह आग देश के अन्य बड़े शहरों में भी सुलग रही है, लेकिन ये सभी शहर मुख्य रूप से भाजपा शासित राज्यों में स्थित हैं। यह महज कोई संयोग नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इस अराजकता का एकमात्र निशाना भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रवादी शक्तियां हैं, ताकि उन्हें किसी भी कीमत पर केंद्र की सत्ता से बेदखल किया जा सके। 'कॉकरोच जनता पार्टी' द्वारा शुरू किए गए इस आंदोलन की आड़ में कांग्रेस, अन्य विपक्षी दल और कई कुख्यात वामपंथी व कथित छात्र संगठन एक के बाद एक आंदोलनों की बाढ़ ला रहे हैं। इन सभी के सूत्रधार और रणनीतिकार एक ही प्रतीत होते हैं।
आज स्थिति यह हो गई है कि यदि विरोध का कोई वास्तविक मुद्दा न मिले, तो प्रतिबंधित जगहों पर तिरंगा फहराने की जिद को ही 'आंदोलन' का रूप दे दिया जाता है। 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने छात्रों के नाम पर आंदोलन शुरू किया, लेकिन देखते ही देखते मुख्य चुनाव आयुक्त और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर भी राष्ट्र-विरोधी विमर्श खड़ा कर दिया गया। इसी बीच, छात्रों की इस गूँज की आड़ में कांग्रेस किसी न किसी बहाने हिंदुत्व पर प्रहार करके और मुस्लिम तुष्टिकरण का कार्ड खेलकर नेहरु युग की उस कांग्रेस के रूप में पुनर्जीवित होने की जुगत में लगी है, जिसे सत्ता का पूर्ण एकाधिकार प्राप्त था। केरल में मुस्लिम समर्थन की बैसाखी पर बनी कांग्रेस की सरकार इस तुष्टिकरण की राजनीति का जीता-जागता प्रमाण है। सबसे बड़ी चिंता का विषय यह है कि देश को अस्थिर करने वाले इन आंदोलनों के लिए विदेशी धन की बेतहाशा बौछार हो रही है, जो भारत की संप्रभुता के लिए सीधा खतरा है।
सरकार का ढुलमुल रवैया और पनपता जन-असंतोष
आम जनता जहाँ एक ओर विपक्ष और अराजक संगठनों की देश-विरोधी मानसिकता से आक्रोशित है, वहीं केंद्र सरकार की इस निष्क्रियता से भी अत्यंत असंतुष्ट है। समाज में अब यह भ्रम भी फैलने लगा है कि कहीं इन आंदोलनों से कोई परोक्ष चुनावी या राजनीतिक लाभ लेने के लिए स्वयं सत्तापक्ष ही तो इन्हें पनपने की मौन स्वीकृति नहीं दे रहा है?
'कॉकरोच' आंदोलन का सच और 'डीप स्टेट' का षड्यंत्र
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में जाना आवश्यक है। 15 मई 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की 'कॉकरोच' संबंधी एक टिप्पणी से ही 'कॉकरोच जनता पार्टी' का जन्म हुआ—ऐसा समझना हमारी सबसे बड़ी भूल होगी। वास्तविकता यह है कि विदेशी शक्तियों के निर्देश पर 'डीप स्टेट' भारत में उथल-पुथल और अराजकता मचाने की एक बड़ी योजना पर लंबे समय से काम कर रहा है। इसके लिए पूरा ढांचा पहले से ही तैयार था। एक गैर-सरकारी संगठन और गैर-राजनीतिक संस्था का मुखौटा पहनकर एक व्यापक राष्ट्रव्यापी आंदोलन की पृष्ठभूमि रची जा रही थी। जैसे ही मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी आई, रातों-रात करोड़ों फॉलोअर्स खड़े हो गए। यदि यह टिप्पणी न भी आती, तो यह संगठन कोई और बहाना ढूंढ लेता; इनका सड़क पर उतरना पूर्व-नियोजित था। लेकिन मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत आज भी पश्चाताप की मुद्रा में फैसले ले रहे हैं।
इसके कार्यवाहक बने अमेरिका से लौटे अभिजीत दीपक, जो जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए सीधे अमेरिका से ही भारत आए थे। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए अनुमति तक नहीं ली गई थी, लेकिन सरकार के भीतर बैठे कुछ लोगों के हस्तक्षेप से यह अनुमति उन्हें मानो चांदी की प्लेट में सजाकर सौंप दी गई। शुरुआत में जनता और सरकार दोनों ने इसे कोई तवज्जो नहीं दी। इसके बाद लद्दाख में विदेशी धन से चलने वाले एक गैर-सरकारी संगठन के संचालक और सरकार के मुखर विरोधी सोनम वांगचुक इस प्रदर्शन में शामिल होकर आमरण अनशन पर बैठ गए। अंततः जब वांगचुक का स्वास्थ्य बिगड़ने लगा, तो सरकार ने उन्हें उठाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया। यहां आंदोलन दम तोड़ चुका था, भीड़ छंट गई थी और पुलिस ने सारे तंबू-कनात उखाड़ फेंके थे। लेकिन जैसे ही अनशन टूटा, कुछ उपद्रवियों की भीड़ फिर जुटी और रातों-रात फिर से तंबू गाड़कर मंच सजा दिया गया।
यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित है कि सरकार में बैठा वह कौन रणनीतिकार था जिसने पहले आंदोलन की अनुमति दी और फिर एक मृतप्राय आंदोलन को दोबारा खड़े होने की 'ऑक्सीजन' दी?
शिक्षा क्षेत्र की विफलताएं और विपक्ष का 'गिद्ध-विमर्श'
इस प्रशासनिक नाकामी का परिणाम यह हुआ कि 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों ने संसद तक एक बड़ा मार्च निकाला। भारी पुलिस बल प्रयोग हुआ और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग लिया गया। सरकार ने भी दबाव में आकर सहज भाव से मंत्री की बलि चढ़ा दी। यह केंद्र सरकार की एक बड़ी रणनीतिक भूल थी।
हालांकि, यूजीसी और बाद में नीट के मामले में शिक्षा मंत्रालय से एक 'हिमालयी भूल' अवश्य हुई थी। इस लापरवाही ने पूरे हिंदू समाज और युवा वर्ग में एक सामाजिक वितृष्णा पैदा कर दी। सरकार यदि चाहती तो संकट की शुरुआत में ही मंत्री से इस्तीफा लेकर इस मुद्दे को शांत कर सकती थी, लेकिन तब ऐसा नहीं किया गया। बाद में सड़क के दबाव में झुककर लिए गए इस इस्तीफे ने यह संदेश दे दिया कि सरकार को झुकाया जा सकता है।
भू-राजनीति: अमेरिका, डीप स्टेट और पड़ोस में सत्ता परिवर्तन
इस अराजकता के पीछे एक बड़ा वैश्विक षड्यंत्र काम कर रहा है। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने इस 'कॉकरोच' पार्टी को इसलिए पनपने दिया ताकि वह विपक्ष (खासकर कांग्रेस) के वोट बैंक को ध्वस्त सके। लेकिन यह आकलन पूरी तरह गलत साबित हुआ।
एक शीर्ष अमेरिकी अधिकारी का यह बयान कि "अमेरिका ने चीन के मामले में जो गलती की है, वह भारत के मामले में नहीं दोहराएगा," इस मानसिकता को उजागर करता है। अमेरिका नहीं चाहता कि भारत एक स्वतंत्र और शक्तिशाली वैश्विक शक्ति बने। अमेरिका भारत को पाकिस्तान के साथ उलझाकर उसी धरातल पर खड़ा देखना चाहता है, ताकि भारत महज एक क्षेत्रीय विवादों में फंसा देश बनकर रह जाए। रूस से भारत की स्वतंत्र तेल खरीद और वेनेजुएला जैसे देशों के लिए अमेरिकी शर्तें इसी दबाव की कूटनीति का हिस्सा हैं।
भारत के पड़ोस पर नजर डालें— पाकिस्तान, श्रीलंका, नेपाल और हाल ही में बांग्लादेश— इन सभी देशों में 'डीप स्टेट' ने तख्तापलट या सत्ता परिवर्तन का सफल खेल खेला है। बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस को अमेरिका से लाकर अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया और काम खत्म होते ही वे वापस लौट गए। यह स्पष्ट दर्शाता है कि कठपुतलियां कहाँ से संचालित हो रही हैं।
भारत कोई छोटा देश नहीं है। यहाँ का लोकतांत्रिक और विकेंद्रीकृत ढांचा इतना मजबूत है कि सीधा तख्तापलट असंभव है। इसलिए विदेशी शक्तियों की रणनीति यह है कि यदि तख्तापलट न भी हो, तो केंद्र में एक ऐसी कमजोर, गठबंधन-मजबूर सरकार, जैसे यूपीए काल में थी, स्थापित कर दी जाए जो 10-15 साल तक कड़े फैसले न ले सके। यदि भारत इस चक्रव्यूह में फंसा, तो 2047 तक 'विकसित राष्ट्र' बनने का हमारा सपना एक सदी पीछे धकेल दिया जाएगा।
जिस 'डीप स्टेट' ने आम आदमी पार्टी के माध्यम से दिल्ली और पंजाब में जो जड़ें जमाई हैं, अब वही सूत्रधार 'कॉकरोच जनता पार्टी' का भी पोषण कर रहे हैं। कांग्रेस भी अब इस नए दल के साथ 'इंडिया' गठबंधन के तहत दोस्ती का हाथ बढ़ा रही है। सत्ता प्राप्ति की भूख ने इन सभी परस्पर विरोधी दलों को एक ही छतरी के नीचे ला खड़ा किया है।
उत्तर प्रदेश में 2027 का महासंग्राम और सवर्ण आक्रोश
2029 के लोकसभा चुनावों से पूर्व 2027 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने हैं। कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है। 80 लोकसभा सीटों वाले इस राज्य में जो जीतेगा, वही देश पर राज करेगा। 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन राज्य में निराशाजनक रहा। 80 में से केवल 33 सीटें भाजपा को मिलीं, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन ने 43 सीटें जीतीं। यदि वोट शेयर को विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से देखा जाए, तो 'इंडिया' गठबंधन 224 सीटों पर आगे था और भाजपा केवल 174 पर। इसी आंकड़े ने विपक्ष में यह उम्मीद जगा दी है कि 2027 में वे सत्ता पा सकते हैं।
उत्तर प्रदेश की राजनीति गहराई से जातियों में विभाजित है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली, सख्त कानून-व्यवस्था और माफियाराज के अंत से जनता बेहद खुश है। लेकिन मतदान में तो जातिगत समीकरण हावी होंगे। इसके साथ ही, भाजपा के मूल मतदाता माने जाने वाले सवर्ण (विशेषकर ब्राह्मण), जो यूजीसी नियमन और पार्टी की कथित उपेक्षा से आहत हैं, अब एक खामोश बगावत के मूड में हैं। तमाम दावों के बीच भी सवर्णों की यह नाराजगी भाजपा की सबसे बड़ी 'दुखती रग' बनी हुई है। यदि ये नाराज मतदाता विपक्षी गठबंधन को वोट न भी दे, और केवल मतदान के दिन घर बैठ जाए, तो भी भाजपा को ऐतिहासिक नुकसान उठाना पड़ेगा।
लौह-इच्छा शक्ति की आवश्यकता
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस चुनौती को समझते हुए दिन-रात एक कर रहे हैं। यह वह समय है जब केंद्र सरकार और भाजपा के शीर्ष रणनीतिकार भी अपने अहंकार और अपनी राजनीतिक तंद्रा से बाहर आयें । सड़कों पर देश की संप्रभुता को चुनौती दे रहे प्रदर्शनकारियों से ढुलमुल तरीके से नहीं, बल्कि एक प्रभुसत्ता-संपन्न राष्ट्र की लौह-इच्छाशक्ति के साथ निपटना होगा। देश की राष्ट्रवादी जनता आज इन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ स्वयं खड़ी हो रही है। यह वह स्वर्णिम अवसर है जब सरकार को जनता के इस राष्ट्रप्रेम का सम्मान करते हुए अराजकता के इन तंबुओं को हमेशा के लिए उखाड़ फेंकना चाहिए। यदि अब भी देर की गई, तो उत्तर प्रदेश की सत्ता हाथ से फिसल सकती है, और यदि यूपी गिरा, तो दिल्ली का किला ढहने से कोई नहीं रोक पाएगा।
~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~
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