गुरुवार, 23 जून 2022

नेशनल हेराल्ड घोटाला और गांधी परिवार

 

नेशनल हेराल्ड घोटाला और गांधी परिवार 




प्रवर्तन निदेशालय द्वारा राहुल और सोनिया गाँधी को पूछ्ताछ के लिए बुलाए जाने से कांग्रेस बुरी तरह तिलमिला गई है और इसे लोकतंत्र का अपमान, विपक्ष की आवाज कुचलने और प्रतिशोध की कार्यवाही बता रही है. पार्टी के वफादारों ने राहुल गांधी को प्रवर्तन निदेशालय में पेश होने की घटना को राजनीतिक रूप से भुनाने के लिए पूरे भारत में  प्रवर्तन निदेशालय के कार्यालय के सामने प्रदर्शन आयोजित किए. दिल्ली में अशोक गहलोत और भूपेश बघेल, राहुल गांधी के साथ  कार्यकर्ताओं को लेकर प्रवर्तन निदेशालय में जाना चाहते थे,जिन्हें पुलिस ने हिरासत में लिया गया.  घटनास्थल दिल्ली में होने के कारण पूरा तमाशा मीडिया में छाया रहा.

 

राहुल गांधी से 3 दिन तक लगातार पूछताछ के बाद  अगली तारीख का सम्मन भी थमा दिया गया. संभावना है कि राहुल से कई चक्र में पूछताछ की जाएगी और  थकी हुई  कांग्रेश हर बार तमाशा नहीं कर पाएगी और पूरे घटनाक्रम से जनता की उत्सुकता भी स्वत: समाप्त हो जाएगी 23 जून को सोनिया गांधी को प्रवर्तन निदेशालय के सामने पेश होना हैउस समय तक कांग्रेश अपने विरोध की धार कितनी कायम रख  पायेगी  यह देखने की बात होगी, यद्यपि कांग्रेस ने जनता की  सहानुभूति बटोरने के लिए उनकी बीमारी को भी हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. 

 

यह मामला जिस नेशनल हेराल्ड से जुड़ा है उसे 1938 में जवाहरलाल नेहरू ने लगभग पांच हजार स्वतंत्रता सेनानियों से चंदा लेकर शुरू किया था जिसके लिए एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (एजेएल) नाम की कंपनी बनाई गई थी. यह कंपनी अंग्रेजी में  नेशनल हेराल्ड, हिंदी में नवजीवन और उर्दू में कौमी आवाज प्रकाशित करती थी.  यद्यपि एजेएल बनाने वाले सभी लोग कांग्रेसी नहीं थे फिर भी आजादी के बाद इस पर कांग्रेस का कब्जा हो गया और  सभी समाचार पत्र केवल कांग्रेस का मुखपत्र बनकर रह गये. पक्षपातपूर्ण और एक तरफा समाचार देने वाले पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों की उम्र बहुत लंबी नहीं होती और यही इन सब अखबारों के साथ हुआ. कांग्रेस के सत्ता में होने के बाद भी इस की वित्तीय स्थिति अच्छी कभी नहीं रही जो शोध का विषय है कि यह स्वाभाविक था या वित्तीय गड़बड़ियों के कारण हो रहा था.  इस कंपनी के पास दिल्ली, मुंबई और अन्य जगहों पर कई हजार करोड़ की अचल संपत्तियां हैं. 

 

एजेएल की वित्तीय हालत सुधारने के लिए कांग्रेस ने इसे पार्टी फंड से ₹90 करोड़ का ऋण दिया लेकिन कंपनी की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ और 2008 में कंपनी ने सभी प्रकाशन बंद कर दिए. यह बहुत असामान्य बात है कि केंद्र में सत्ताधारी कांग्रेश की कंपनी के समाचार पत्रों का प्रकाशन वित्तीय संकट के कारण बंद हो जाए जबकि पार्टी राजीव गांधी फाउंडेशन जैसे पारिवारिक ट्रस्ट और संगठनों के लिए बड़ी कुशलता से वित्तीय प्रबंधन करती है. 2010 में यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड (वाईआईएल) नाम की एक कंपनी बनाई गयी, जिसमें राहुल और सोनिया गांधी की 76 % हिस्सेदारी हैबाकी परिवार के विश्वसनीय स्वर्गीय मोती लाल बोहरा और ऑस्कर फर्नांडीज जैसे लोगों के पास है. कांग्रेश ने एजेएल को दिया  गया  90 करोड का   ऋण यंग इंडियन को ट्रांसफर कर दिया,  जिसमें से यंग इंडियन कांग्रेस को केवल ₹50 लाख का भुगतान करती है और शेष 89.5 करोड़ रुपए का ऋण कांग्रेस द्वारा माफ कर दिया जाता है. यह भी सामान्य नहीं है क्योंकि इस तरह के सौदे बैंकिंग उद्योग में होते हैं जहां फंसे हुए ऋणों को पारदर्शी तरीके से कोई ऐसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी खरीदती  है. इस 50 लाख रुपए के भुगतान के बदले यंग इंडियन को  एजेएल कंपनी का मालिकाना हक प्राप्त हो जाता हैं. इस अधिग्रहण के बाद यंग इंडियन ने एजेएल के समाचार पत्रों को पुनः प्रकाशित करने का कोई  प्रयास नहीं किया और यहीं से संदेह  गहराता चला  गया कि आखिर इस अधिग्रहण का उद्देश्य क्या था

 

सबसे पहली बात कांग्रेस जो एक राजनीतिक दल है, ने एजेल कंपनी को ऋण क्यों दिया ? जबकि एजेएल के पास हजारों करोड़ रुपए की अचल संपत्तियां थीजिसके आधार पर कोई भी बैंक  ऋण दे सकता था और कंपनी की वित्तीय स्थिति पर नजर भी रख सकता था जिससे बहुत संभव था कि कंपनी बच  जाती और आज भी यह समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे होते. दूसरी बात अगर कांग्रेस का उद्देश्य अपना ऋण वसूल करना था तो इसे पारदर्शी तरीके से एजेएल की अचल संपत्तियां बेंच  कर क्यों नहीं किया गया कांग्रेस ने  अपने ₹90 करोड़ के ऋण के बदले केवल 50 लाख रुपए लेकर आईजेएल कंपनी और उसकी सभी चल अचल  संपत्तियां यंग इंडियन को क्यों दे दी अगर कांग्रेस 89.5 करोड़ रुपए का का ऋण माफ कर सकती है तो फिर पूरे ₹90 करोड़ का पूरा ऋण माफ माफ क्यों नहीं किया अगर कांग्रेस पूरे 90 करोड़ का ऋण माफ कर देती तो  एजीएल को पुनर्जीवित करने की संभावना बनी रह सकती थी. अगर कांग्रेस एजेएल कंपनी को पुनर्जीवित नहीं भी करना चाहती थी तो भी इसकी अचल संपत्तियां पार्टी  के लिए खरीद सकती थी. चूंकि  यंग इंडियनराहुल और सोनिया गांधी के व्यक्तिगत स्वामित्व का संगठन हैइसलिए एजेएल की हजारों करोड़ की परिसंपत्तियों के मालिक भी राहुल और सोनिया गांधी बन गए या कांग्रेश द्वारा बना दिए गए. 

 

साधारण समाज का कोई भी व्यक्ति  इस पूरे खेल को समझ सकता है जिस आधार पर डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया थाजहां यह मामला लंबित है और इस मामले में सोनिया और राहुल जमानत पर चल रहे हैं.  इस खेल को अगर सावधानी से देखें तो पाते हैं कि यंग इंडियन ने केवल 50 लाख रुपए के बदले एजेएल की दो हजार करोड़ से भी अधिक कीमत की  चल अचल संपत्तियां हासिल कर ली.  इस तरह कमाए गए लाभ पर आयकर देना होता है, जिसकी नोटिस  आयकर विभाग  ने दे रखी है. 

 

प्रवर्तन निदेशालय इस प्रकरण  में मनी लांड्रिंग की जांच कर रहा हैजिसमें  पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं. सबसे बड़ी बात है कि कांग्रेस या गांधी परिवार अब तक आयकर और प्रवर्तन निदेशालय की कार्यवाही के विरोध में न्यायालय नहीं पहुंचा है. शायद उन्हें लगता है कि कोई राहत नहीं मिलेगी. इसलिए कांग्रेस पूरे जोर शोर से  यह प्रदर्शित करना चाहती है कि  मोदी सरकार राजनीतिक पूर्वाग्रह के कारण गांधी परिवार के विरुद्ध बदले की भावना से कार्य कर रही है. ऐसा करके वह जनता की सहानुभूति बटोरना चाहती है, लेकिन कांग्रेस का नाम भ्रष्टाचार के साथ इतना जुड़ चुका है इसलिए  शायद ही वह अपने उद्देश्य में सफल हो सके. 

 

प्रवर्तन निदेशालय ने  पिछले कुछ महीनों में कई मामलों में काफी सावधानी और मेहनत से साक्ष्य एकत्रित करने की प्रणाली विकसित की  है जिसके कारण महाराष्ट्र के दो मंत्रियों अनिल देशमुख और नवाब मलिक तथा दिल्ली सरकार के मंत्री सत्येंद्र जैन को जमानत भी नहीं मिल सकी है. राहुल और सोनिया गांधी को भी प्रवर्तन निदेशालय के मामले में न्यायालय से कोई अग्रिम जमानत नहीं मिली है. चूंकि  प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ में आरोपित अपने साथ एडवोकेट नहीं ले जा सकता, इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि राहुल और सोनिया गांधी प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ में कुछ ऐसे महत्वपूर्ण राज उगल देंगे जो उनके जेल जाने का मार्ग प्रशस्त करेंगे. केंद्र सरकार फूंक-फूंक कर कदम रख रही है ताकि किसी भी स्तर पर जनता को यह संदेश न जाए कि गांधी परिवार या कांग्रेश के साथ ज्यादती की जा रही है. 


इस बात का पूरा प्रयास किया जा रहा है  कि यदि राहुल और सोनिया को जेल जाने की नौबत आती है तो इसके पीछे  न्यायिक बल अवश्य हो ताकि राजनीतिक विद्वेष का कांग्रेस का आरोप झूठा साबित हो जाए.  इस तरह की जेल यात्रा के बाद गांधी परिवार का राजनीतिक तिलिस्म पूरी तरह ढह जाएगा और  कांग्रेश में  विखंडन और बिखराव की प्रक्रिया इतनी तेज हो जाएगी जिसे संभालना कांग्रेस के किसी नेता के  बस में नहीं होगा. 

-    शिव मिश्रा  ResponseToSPM@gmail.com

 

 


 

शिवसेना का विद्रोह - पारिवारिक दलों के लिए सन्देश

 

शिवसेना का विद्रोह - पारिवारिक दलों के लिए सन्देश 




शिवसेना में घट रही घटनाएं अप्रत्याशित जरूर लग रही  हैं लेकिन यह परिवार आधारित राजनीतिक दलों की सत्ता के  लोभ में अवसरवादिता की पराकाष्ठा पार करने और अपने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करने के परिणाम का एक ज्वलंत उदाहरण है. अब हालत यह है कि उद्धव के पास बचे 10- 12 विधायक भी एक एक करके गुवाहाटी पहुँच रहे हैं. उद्धव सरकार का गिरना तय है और  शरद पवार भी अब शायद ही कोई मदद कर सके क्योंकि टूट तो उनकी पार्टी में भी अवश्यंभावी है. स्वाभाविक है कि कांग्रेस और एनसीपी सबसे पहले अपनी अपनी पार्टी संभालेंगे.




शिवसेना में टूट की बुनियाद बहुत पहले तब पड़ गई थी, जब उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के लालच में भाजपा से दशकों पुराना नाता तोड़ कर विपरीत विचारधारा वाले कांग्रेस और एनसीपी के साथ एक बेमेल गठबंधन करके सरकार बनाई थी . 288 सदस्यों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में भाजपा के  106 और शिवसेना के 56 विधायक जीतकर आए थे. राष्ट्रवादी कांग्रेस के 54 और कांग्रेस के 44 सदस्यों के साथ ऐसा समीकरण बन गया था, जिसमें भाजपा सबसे बड़ा दल होने के बाद भी बिना किसी दल से गठबंधन या समझौता किए सरकार नहीं बना सकती थी. शिवसेना ने इस स्थिति का फायदा उठाते हुए भाजपा से मांग कर डाली कि मुख्यमंत्री का पद दोनों दलों के बीच में ढ़ाई ढ़ाई साल रहना चाहिए.  राजनैतिक अवसरवादिता पूर्ण और इस मांग के पीछे भी एक मनोवैज्ञानिक कारण यह था कि महाराष्ट्र में शिवसेना भाजपा गठबंधन में शिवसेना हमेशा बड़े भाई की भूमिका में रही है लेकिन बाला साहब ठाकरे की मृत्यु के उपरान्त, उद्धव ठाकरे शिवसेना को ठीक से संभाल नहीं पाए. इसके ठीक विपरीत केंद्र में नरेंद्र मोदी के  सत्ता में आने के बाद भाजपा ने महाराष्ट्र में बहुत विस्तार किया और अपने आप को शिवसेना से भी बड़ा बना लिया लेकिन शिवसेना भाजपा की  बड़े भाई की भूमिका से असहज थी और इसे  स्वीकार नहीं कर पा रही थी. दोनों के बीच बात इस  हद तक बिगड़ गई की महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एनसीपी के नेता अजीत पवार के साथ मिलकर सरकार बनाने का असफल प्रयास किया और इसके बाद उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री बनने  के लालच में  एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिला लिया और स्वयं को  महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनाने का सपना साकार कर लिया.

उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री  बनने के पहले कभी विधायक भी नहीं रहे थे. उनमें  मुख्यमंत्री बनने की आकांक्षा जगाने और फिर  मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में शरद पवार का बहुत बड़ा योगदान था. पवार ने ही यह सुनिश्चित किया था कि शिवसेना और भाजपा मिलकर सरकार न बनाने पाए ताकि उनकी पार्टी पिछले दरवाजे से महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज हो सके. उद्धव इस खेल को नहीं समझ पाए इसलिए वह शरद पवार के प्रति कृतघ बने रहे और उन्हे हमेशा उपकृत करते रहे.  यही नहीं वह न केवल पवार की अंगुली पकड़ कर चलते रहे बल्कि सरकार की हर छोटी बड़ी समस्या सुलझाने के लिए शरद पवार पर पूरी तरह आश्रित थे. उनकी राजनैतिक अपरिपक्वता और प्रशासनिक अनुभव हीनता का शरद पवार ने जमकर फायदा उठाया. राज्य में कानून के  दुरुपयोग और निरंकुशता पूर्ण सत्ता का भारत में नया दौर शुरू हो गया था. पवार की पार्टी के गृहमंत्री अनिल देशमुख जेल में हैं उन पर मुंबई के पुलिस कमिश्नर परम वीर और अनिल बाझे  के माध्यम से 1000 करोड़ रुपए प्रतिमाह वसूल करने का आरोप है. पवार के दूसरे मंत्री नवाब मलिक भी जेल  में है, उन पर  दाऊद इब्राहिम गैंग की बेनामी संपत्तियों में मनी लॉन्ड्रिंग करने का आरोप है. इससे पहले इस तरह का आरोप परिवार के एक अन्य करीबी प्रफुल्ल पटेल पर भी लगा था, जिसका मामला अभी भी प्रवर्तन निदेशालय के विचाराधीन है. उद्धव ठाकरे के बेहद करीबी संजय राउत और उनकी पत्नी के विरुद्ध भी प्रवर्तन निदेशालय ने मामला दर्ज किया है जिसकी जांच चल रही है. ऐसा लग रहा था कि अपना अपना निहित स्वार्थ पूरा करने की होड़ लगी हुई थी.

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में महाअघाड़ी सरकार बनने के बाद सत्ता के सूत्र शरद पवार के पास है, इसलिए उनके करीबी ऐसे लोग, जिन का कानूनी / गैरकानूनी धंधा पानी पिछली सरकार के समय बंद हो गया था, अब पूरे उफान पर हैं. सांप्रदायिकता का जो माहौल पिछली सरकारों के समय बनाया जाता था उसकी भूमिका भी  पुन: तैयार होने लगी है. हिंदू हृदय सम्राट कहे जाने वाले बालासाहब ठाकरे के सभी आदर्श किनारे रख दिए गए हैं और उद्धव  ठाकरे केवल कांग्रेस और एनसीपी के इशारे पर कार्य कर रहे हैं. यही नहीं शिवसेना के कार्यकर्ता और विधायक भी चाटुकारों से घिरे उद्धव ठाकरे से सीधे संपर्क नहीं कर पाते थे, इस  कारण शिवसेना में बहुत दिनों से असंतोष पनप रहा है. शिवसेना मंत्रिमंडल में एकनाथ शिंदे की स्थिति उद्धव ठाकरे के बाद नंबर दो की थी लेकिन वह भी मुख्यमंत्री से सीधे नहीं मिल पाते थे. बाकी विधायको ने बताया कि कोरोना के संकटकाल में भी मुख्यमंत्री से न तो उनकी मुलाकात हो पाती थी और ना ही उन्हें कोई सहायता मिलती थी. उन्हें जो भी सहायता मिली केवल एकनाथ शिंदे की वजह से मिली, इसलिए वे उनके साथ है. विधायको का यह भी आरोप है की मुख्यमंत्री शिवसेना के विधायको की अपेक्षा कांग्रेस और एनसीपी के विधायको को ज्यादा महत्त्व देते थे और सरकार में केवल उन्हीं की सुनी जाती थी. जनता में भी शिवसेना की छवि तार तार हो रही है. यह समझना मुश्किल नहीं है कि उद्धव ठाकरे और उनके विधायको / मंत्रियों के बीच संपर्क हीनता और संवादहीनता की कितनी बड़ी खाई बन गई थी, जिसकी परिणति इतने बड़े विद्रोह के रूप में सामने आई.

दुर्भाग्य से उद्धव ठाकरे को इसका एहसास भी नहीं है. एक सोंची समझी रणनीति के अंतर्गत उद्धव ठाकरे के  नेतृत्व की छवि इतनी नकारात्मक बना दी गई है, जिसे ठीक करने में बरसों लग जाएंगे.  सुशांत राजपूत और दिशा सालियान की हत्या या आत्महत्या, टीआरपी के मामले में अर्नब गोस्वामी को फंसाने का झूठा मामला और उन्हें सबक सिखाने के लिए एक पुराने मामले में गिरफ्तार किया जाना, कंगना रानावत के विरुद्ध  झूठा मामला दर्ज किया जाना व बंगले में तोड़फोड़ करना, हनुमान चालीसा पढ़ने की धमकी के आरोप में सांसद नवनीत राणा और उनके विधायक पति की गिरफ्तारी और उन पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया जाना, केंद्रीय मंत्री नारायण राणे को मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के विरुद्ध अपशब्द कहने के आरोप में बेहद अमानवीय तरीके से गिरफ्तार किया जाना आदि ऐसे मामलों की बड़ी लंबी सूची है, जिससे जनता में महाआघाडी सरकार और उद्धव ठाकरे के प्रति बेहद नाराजगी है, जो शिवसेना विधायको के गुस्से से स्पष्ट दिखाई पड़ती है.

इन परिस्थितियों  में शिव सेना में विद्रोह होना बिल्कुल भी आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित नहीं. ऐसे सभी राजनीतिक दल जिन पर एक परिवार का कब्जा है, शिवसेना में घट रही घटनाएं, खतरे की घंटी है. शिवसेना में हुए विद्रोह की विपक्ष कितनी भी आलोचना करे  लेकिन प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि एकनाथ शिंदे ने मुख्यमंत्री बनने के लिए या किसी अन्य लालच में यह कदम नहीं उठाया बल्कि उन्होंने इस मुददे को रेखांकित किया है कि शिवसेना को महाअघाड़ी जैसे बेमेल गठबंधन और उसके भ्रष्टाचार से बाहर आकर समान विचारधारा वाली भाजपा के साथ गठबंधन करना चाहिए.




शिवसेना में हुआ विद्रोह इसलिए भी अत्यंत  महत्वपूर्ण है कि विधानसभा में 55 विधेयकों वाली पार्टी के दो तिहाई से अधिक विधायक उद्धव ठाकरे के पारिवारिक नेतृत्व को छोड़कर एकनाथ शिंदे के साथ खड़े हो गए हैं . बागी विधायको की संख्या बढ़ती जा रही है और सभी विधायक सूरत से गुवाहाटी चले गए हैं. विडंबना देखिए कि उद्धव ठाकरे ने अपने करीबी विधायक रविंद्र फाटक को बाकी विधेयकों को मनाने के लिए सूरत भेजा था लेकिन वह स्वयं भी एकनाथ शिंदे के साथ हो गए. इस पर भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए यदि उद्धव के बेटे आदित्य ठाकरे के अलावा सारे विधायक उनका साथ छोड़ दें. आशा है कि उद्धव ठाकरे शीघ्र ही अपने पद से त्यागपत्र दे देंगे और इसका संकेत देते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री आवास खाली कर दिया है. एकनाथ शिंदे ने भी स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उद्धव ठाकरे त्यागपत्र नहीं देते तब तक बातचीत शुरू नहीं हो सकती.

इस घटना में सभी राजनीतिक दलों के लिए संदेश छिपा है कि  राजनीति समाज सेवा का माध्यम होना चाहिए, व्यवसाय का जरिया नहीं और इसमें बदले की भावना से कार्य करने की प्रवृत्ति के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए. उम्मीद की जानी चाहिए की महाराष्ट्र का ये राजनैतिक विक्षोभ  शीघ्र ही शांत हो जाएगा और राज्य में नई सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा जो लोगों की आकांक्षाएं और अपेक्षाएं पूरा करने का कार्य शुरू करेगी .

भारत में वर्तमान राजनीतिक गिरावट के लिए बहुदलीय राजनीतिक प्रणाली काफी हद तक जिम्मेदार है, जिसके कारण अनगिनत राजनैतिक दल खड़े हो गए हैं और लगभग हर राज्य में क्षेत्रीय छत्रप बन गए हैं जिसके कारण राजनैतिक शुचिता, विकास और सामाजिक सेवा के साथ साथ राष्ट्रीय एकता और अखंडता पर भी गंभीर संकट आता जा रहा है. इसलिए चुनाव सुधारों के माध्यम से बहुदलीय राजनीतिक प्रणाली के स्थान पर दो दलीय राजनीतिक प्रणाली तुरंत लागू किए जाने की आवश्यकता है ताकि राजनीति को व्यवसाय बनने से रोका जा सके.

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-    शिव मिश्रा   responsetospm@gmail.com


 

मंगलवार, 17 मई 2022

बाबा विश्वनाथ, ज्ञानवापी और पूजा स्थल कानून

 




                                          ( ज्ञानवापी सर्वे  में वजू  खाने में मिला शिवलिंग)

ज्ञानवापी परिसर के कोर्ट कमिश्नर के   सर्वे जिसमें वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी की गई है, मिले तथ्य एक बार फिर इस बात की पुष्टि करते हैं ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण बाबा विश्वनाथ मंदिर को तोड़कर किया गया था. सर्वे के दौरान ज्ञानवापी परिसर स्थित सरोवर में  शिवलिंग बरामद हुई है, जो प्रथम दृष्टया वहीं प्रतीत होती हैं जो पुराने  विश्वनाथ मंदिर में के गर्भगृह में लगी थी, जिसे ज्ञानवापी मस्जिद के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. पुराणों में वर्णित गर्भ गृह यही है और यही मूल शिवलिंग है .  हैरत और दुख की बात है कि जहाँ यह प्राचीन और मूल  शिवलिंग स्थापित है, उस जगह  पानी भरा हुआ है जिसे  वजू के लिए नमाजियों द्वारा इस्तेमाल किया जाता था.

स्थानीय न्यायालय ने शिवलिंग मिलने के इस स्थान को सील करके सुरक्षित रखने का आदेश दिया है. इस सूचना से काशी में लोग बहुत भावुक हो गए और कुछ लोग अश्रुपूरित नेत्रों से "बाबा मिल गए" कहकर खुशी मनाने लगे. यद्यपि कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट अभी न्यायालय को नहीं सौंपी गई है और उस पर अध्ययन किया जाना बाकी है, किंतु सर्वे में मिले साक्ष्य और शिवलिंग के  वायरल वीडियो ने लोगो में बाबा विश्वनाथ के मूल गर्भगृह पाने  की आकांक्षा जगा दी  है.  इस बीच सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष की याचिका पर, जिसमें सर्वे पर रोक लगाने की मांग की गई थी, सुनवाई शुरू कर दी है.  सर्वोच्च न्यायालय ने भी जिला प्रशासन को निर्देश दिया है कि बरामद की गई शिवलिंग को पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जाए और नमाजियों को नमाज़ भी अदा करने दी जाए.

बाबा विश्वनाथ  का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना काशी का अस्तित्व, और पृथ्वी पर मानव सभ्यता का उदय. पौराणिक मान्यता है कि प्राचीन मंदिर के स्थान पर भगवान विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने की कामना से तपस्या की थी और उनकी नाभि कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई थी जिन्होंने बाद में पूरे विश्व की रचना की थी. इसलिए काशी को आदि सृष्टि स्थली भी बताया जाता है.

मान्यता है कि  प्रलय काल में भी काशी का विनाश  नहीं होता  क्योंकि उस समय भगवान शंकर इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लेते हैं. पृथ्वी निर्माण के समय सूर्य की पहली किरण काशी पर पड़ी थी, इसलिए  काशी  ज्ञान, अध्यात्म और भक्ति की ऊर्जा सेपूरी दुनिया को आलोकित करती है भगवान शिव स्वयं मंदिर के स्थान पर कुछ समय के लिए रुके थे इसलिए उन्हें ही काशी का संरक्षक माना जाता है और उनकी कृपा के कारण ही  काशी को सर्व तीर्थ  और सर्व संताप हारिणी मोक्षदायिनी नगरी कहा जाता है. काशी में प्राण त्यागने वाले व्यक्ति को मोक्ष प्राप्त हो जाता है. श्री विश्वेश्वर विश्वनाथ का यह ज्योतिर्लिंग साक्षात भगवान परमेश्वर महेश्वर का स्वरूप है, यहाँ भगवान शिव सदा विराजमान रहते हैं।

 इसलिए इस मंदिर का हिंदुओं के लिए उतना ही महत्व है जितना मुसलमानों के लिए मक्का और काबा का. बाबा भोलेनाथ का यह मंदिर भारत में सभी ज्ञात मंदिरों में प्राचीनतम है और यह भगवान पार्वती और शंकर का आदि स्थान है.  आधुनिक ज्ञात इतिहास  के अनुसार ईशा से लगभग 5000 वर्ष पूर्व में राजा हरिश्चंद्र ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था.  इसके पश्चात सम्राट विक्रमादित्य ने भी इस मंदिर का जीर्णोद्धार और पुनरुद्धार कराया.   

1194 में मुहम्मद गोरी  नाम के एक मुस्लिम लुटेरे  आक्रांता  ने इसे   तोड़  दिया था. बाद में मंदिर का बारंबार जीर्णोद्धार  होता रहाऔर मुस्लिम आक्रांता इसे तोड़ते रहे. अंतिम बार औरंगजेब के आदेश से मंदिर को तोड़कर मुख्य गर्भ गृह पर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण करवाया गया था. तत्कालीन मुस्लिम लेखक साकी मुस्तइद खां द्वारा लिखित पुस्तक 'मासीदे आलमगिरी' में इस ध्वंस का वर्णन है। 2 सितंबर 1669 को औरंगजेब को मंदिर तोड़ने का कार्य पूरा होने की सूचना दी गई थी। जल्दबाजी मंदिर के अवशेषों में ही मस्जिद बना दी गयी जो प्रमाण के रूप में  आज भी उपलब्ध हैं.   







1809 में इस तथाकथित ज्ञानवापी मस्जिद पर हिंदुओं ने पुनः कब्जा कर लिया . 30 दिसंबर 1810 को बनारस के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी मि. वाटसन ने ‘वाइस प्रेसीडेंट इन काउंसिल’ को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने के लिए कहा था, लेकिन अंग्रेजों ने बड़ी कुटिलता से हिंदू मुस्लिम एकता न होने देने के लिए सांप्रदायिक तनाव बनाए रखना आवश्यक समझा जो उनकी फूट डालो और राज करो की नीति के अनुरूप था. उन्होंने पुरानी इस्तेमाल करते हुए हिंदुओं के आक्रोश को ठंडा करने के लिए मंदिर परिसर में ही एक नए  गर्भ गृह की व्यवस्था कर दी जबकि मंदिर का मूल गर्भ गृह ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में है जिसे वर्तमान में कराए जा रहे सर्वे में शिवलिंग के साथ बरामद किया जाना बताया गया है. मंदिर प्रांगण में नंदी की प्रतिमा इसी बरामद की गई शिवलिंग की तरफ मुंह करके अभी भी खड़ी है. विशाल नंदी का मुख ज्ञानवापी मस्जिद की ओर से होने से काफी समय से इस स्थान के सर्वे की मांग की जा रही थी। शास्त्रों के अनुसार नंदी का मुख सदैव शिव की ओर रहता है इसलिए यही माना जा रहा था  कि शिव का मूल स्थान ज्ञानवापी मस्जिद ही था। 

इसके पहले फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की सहायता से मंदिर के प्रमाण  ढूंढने के आदेश दिए थे और   जरूरत पड़ने पर अत्याधुनिक तकनीक जैसे ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार और जिओ रेडियोलॉजी सिस्टम  आदि के स्तेमाल की भी इजाजत दी थी किन्तु उच्च न्यायलय ने इस पर रोक लगा रखी है.

 सर्वे के विरोध में और ज्ञानवापी मस्जिद के पक्ष में असदुद्दीन ओवैसी सहित कई मुस्लिम नेता पूजा स्थल कानून 1991 का हवाला दे रहे हैं किंतु उन्होंने ज्ञानवापी कैसे बने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है क्योंकि यह उनको भी मालूम है कि ज्ञानवापी मस्जिद मंदिर को तोड़कर ही बनाई गई है. भारत के अधिकांश मुसलमान, वे हिंदू हैं जिन्हें तलवार की नोक पर मुसलमान बनने के लिए मजबूर कर दिया गया था, शायद ही कोई यहां का मुसलमान अरब से आया हो. इसलिए उन्हें सांप्रदायिक सद्भावना कायम करते हुए ज्ञानवापी परिसर समेत सभी ऐसे विवादित परिसरों को हिंदुओं को स्वयमेव दे देना चाहिए. ऐसे किसी भी विवादित परिसर का इस्लाम के लिए धार्मिक किया ऐतिहासिक महत्व नहीं है. इसलिए जो उदाहरण अयोध्या में मस्जिद के लिए अन्यत्र जमीन देकर स्थापित किया गया है उसका अनुकरण अन्य जगहों पर भी किया जाना चाहिए.

 जहां तक 1991 में कांग्रेस की पीवी नरसिम्हा राव सरकार द्वारा बनाए गए पूजा स्थल कानून का संबंध है, वह न्यायिक दृष्टिकोण से उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि यह संविधान के अनेक प्रावधानों का उल्लंघन करता है. किसी लोकतांत्रिक देश में अगर कोई व्यक्ति या समुदाय किसी विवाद को न्यायालय में भी नहीं ले जा सकता तो फिर यह कैसी स्वतंत्रता है कैसा लोकतंत्र है. इस कानून से यह भी साबित होता है कि या तो तत्कालीन सरकार को स्वयं अदालतों और भारत की न्याय प्रणाली पर भरोसा नहीं था या फिर अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण इस हद तक जाकर करना चाहती थी कि हिंदुओं के लिए न्याय का दरवाजा भी बंद कर दिया. इसलिए इसे खत्म होना ही चाहिए. अच्छा हो यदि सर्वोच्च न्यायालय इस पर संज्ञान ले अन्यथा मोदी सरकार को भी इस पर पुनर्विचार करना चाहिए जो उसके लिए वर्तमान परिस्थितियों में बहुतमुश्किल कार्य है क्योंकि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हीन ग्रंथि का शिकार हो चुके हैं , सबका विकास करते-करते, सब का विश्वास हासिल करने में जुट गए हैं, जो कभी संभव नहीं .

दुनिया के हर ऐसे देश में जो गुलामी से आजाद हुए थे उनमें आजादी के तुरंत बाद एक आयोग की स्थापना की गई थी जिसका उद्देश्य आक्रांताओं द्वारा नष्ट किए गए धर्मस्थलों, राष्ट्रीय अस्मिता और संस्कृति से संबंधित स्थलों, दस्तावेजों आज की पुनर्स्थापना करना था. दक्षिण अफ्रीका, जहां गांधी जी ने अपना राजनीतिक कैरियर शुरू किया था, वहां भी इस तरह के कार्यों के लिए आयोग की स्थापना की गई थी.

इसलिए सरकार को चाहिए कि देश में स्थाई रूप से सांप्रदायिक सद्भाव की स्थापना के लिए वह न केवल अलोकतांत्रिक ढंग से बनाए गए पूजा स्थल कानून को समाप्त करें बल्कि एक आयोग का भी गठन करें जो सभी विवादित धार्मिक स्थलों की सूची तैयार कर आपसी विचार विमर्श से धार्मिक स्थलों का आदान प्रदान करने में मध्यस्थ की भूमिका निभा सके. ऐसे मामले जिनका निपटारा आपसी बातचीत से नहीं हो सकता है उनमें आयोग न्यायिक निर्णय दे. सरकार को यह भी चाहिये कि अन्य महत्वपूर्ण विवादित धर्म स्थलों की पुख्ता सुरक्षा की जाए ताकि वहाँ उपलब्ध साक्षियों से  छेड़छाड़ नहीं की जा सके क्योंकि ज्ञानवापी में मिले प्रमाण जो आक्रान्ताओं द्वारा जल्दी जल्दी में की गई निर्माण के कारण छूट गए थे वे अन्य विवादित धर्म स्थलों में मिटाने के प्रयास किए जा सकते हैं.

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             -शिव मिश्रा

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