भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से देशवासियों के समक्ष वर्ष २०४७ तक भारत को एक 'विकसित राष्ट्र' बनाने का स्वप्न प्रस्तुत कर रहे हैं। किंतु दूसरी ओर, कट्टरपंथी शक्तियों ने पीएफआई जैसे संगठनों को मुखौटा बनाकर २०४७ तक भारत को एक इस्लामी राष्ट्र में तब्दील करने का खतरनाक षड्यंत्र रच रखा है। लंबे समय से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो दोनों ही धाराएं एक-दूसरे के मार्ग में बिना हस्तक्षेप किए आगे बढ़ रही हैं। ऐसे में यह एक अत्यंत स्वाभाविक और ज्वलंत प्रश्न उठता है कि यदि २०४७ तक भारत एक विकसित राष्ट्र बन भी जाता है, तो उसका वैचारिक और जनसांख्यिकीय स्वरूप क्या होगा— एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र या एक इस्लामी राष्ट्र? सरकार शायद इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर न दे सके, परंतु वर्तमान परिस्थितियां और जनसांख्यिकीय बदलाव इस बात की ओर स्पष्ट संकेत कर रहे हैं कि एक समुदाय विशेष अपने भयावह एजेंडे में अत्यंत तीव्र गति से आगे बढ़ता जा रहा है।
आज भारत में इस्लामी और ईसाई मिशनरियां व्यापक स्तर पर धर्मांतरण के कुत्सित अभियान में संलग्न हैं। इस राष्ट्र-विरोधी कार्य के लिए विदेशों से भारी मात्रा में फंडिंग की जाती है। यही कारण है कि जब विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम (एफसीआरए) को सख्त किया गया, तो उसका चौतरफा और पुरजोर विरोध हुआ।
आज दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि देश का असली विपक्ष कांग्रेस या कोई अन्य राजनीतिक दल नहीं रह गया है, बल्कि मुस्लिम कट्टरपंथी और धर्मांतरण में लिप्त ईसाई मिशनरियां देश के मुख्य विपक्षी की भूमिका में आ गई हैं। कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दल तो भारत को खंडित करने और इसके राष्ट्रीय स्वरूप को नष्ट करने के इस भयानक अभियान में मात्र मोहरे बनकर रह गए हैं। यदि हम बीते एक सप्ताह के भीतर घटी घटनाओं का सूक्ष्मता से विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कट्टरपंथियों ने जिस भयावह कार्य को १०-१५ वर्ष बाद अंजाम देने की योजना बनाई थी, उसकी शुरुआत उन्होंने अभी से कर दी है।
उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र के पुणे में राहुल गांधी एक आयोजन करते हैं और उसमें पहले से तैयार की गई स्लाइड के माध्यम से 'मनुस्मृति' का विकृत प्रस्तुतीकरण करते हैं। वे एक तीर से दो शिकार करते हैं— एक ओर वे हिंदुओं पर निशाना साधते हुए उनकी महान परंपराओं और पवित्र ग्रंथों का घोर अपमान करते हैं, तो दूसरी ओर सनातन धर्म की सुदृढ़ और पारंपरिक पारिवारिक व्यवस्था पर सीधा कुठाराघात करते हैं। वे हिंदुओं की हजारों वर्षों से चली आ रही पारिवारिक संरचना को छिन्न-भिन्न करने का आह्वान ठीक उसी प्रकार करते हैं, जैसा जिहादी और ईसाई मिशनरियां सदियों से करती आ रही हैं। वे हिंदू महिलाओं से इन तथाकथित 'रूढ़िवादी बंधनों' को तोड़ने की अपील करते हैं। इसके पीछे का छिपा हुआ एजेंडा क्या है? यही कि उन महिलाओं को जिहादियों और मिशनरियों द्वारा आसानी से अपना शिकार बनाया जा सके।
इस घटना के तुरंत पश्चात, केरल में एक मजहबी उन्मादी मुफ्ती शेख अबू बकर अहमद (कांतपुरम एपी अबूबकर मुसलियार) का एक नितांत महिला-विरोधी और विवादित बयान सामने आता है। कोच्चि के एक सम्मेलन में वह फतवा-नुमा फरमान सुनाता है कि महिलाओं को घरों की चारदीवारी तक ही सीमित रहना चाहिए और सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह दूर रहना चाहिए। उसने महिलाओं की तुलना निर्जीव सोने के गहनों से करते हुए कहा कि जैसे कीमती हार को सुरक्षित डिब्बे में रखा जाता है, वैसे ही महिलाओं को भी पर्दा प्रथा के तहत घर में कैद रखना चाहिए। ध्यातव्य है कि यह मध्ययुगीन फरमान विशेष रूप से केवल मुस्लिम महिलाओं के लिए था।
यद्यपि केरल के कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने आरंभ में एक वीडियो संदेश जारी कर मौलाना के इस कृत्य की कड़ी आलोचना की थी, किंतु बाद में आलाकमान और मुस्लिम लीग के भारी राजनीतिक दबाव में उन्हें अपना वह वीडियो डिलीट कर अपनी आलोचना वापस लेनी पड़ी। इस घोर कट्टरपंथी मानसिकता पर गांधी परिवार (राहुल, प्रियंका या सोनिया) के मुख से विरोध का एक शब्द नहीं निकला। आश्चर्यजनक और निराशाजनक तो यह भी है कि भाजपा को छोड़कर देश के किसी अन्य 'तथाकथित प्रगतिशील' राजनीतिक दल ने इसका विरोध करने का साहस नहीं जुटाया।
इसी कड़ी में एक तीसरी और अत्यंत गंभीर घटना यह है कि 'ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड' ने देशभर में 'सेव इंडिया, सेव शरिया' (दीन और दस्तूर बचाओ) नामक एक बड़ा अभियान शुरू करने की घोषणा की है। इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन की औपचारिक शुरुआत १७ सितंबर २०२६ को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक विशाल शक्ति प्रदर्शन के साथ प्रस्तावित है। देश ने पहले भी देखा है कि ऐसे प्रदर्शनों की आड़ में अनेक कट्टरपंथी, जिहादी और अराजक तत्व कैसे सक्रिय हो जाते हैं। उनका वास्तविक उद्देश्य अपने बाहुबल का परीक्षण करना तथा वर्तमान सरकार के विरुद्ध किसी भी प्रदर्शन को हिंसक और उत्तेजक बनाकर व्यवस्था को घुटनों पर लाना होता है।
इस अभियान के जो मुख्य बिंदु घोषित किए गए हैं, वे पूरी तरह से भ्रामक और अलगाववादी मानसिकता से ग्रस्त हैं। उनका नैरेटिव यह है कि पिछले १०-१२ वर्षों में (केंद्र की मोदी सरकार के दौरान) मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया जा रहा है। इस आंदोलन के पांच मुख्य एजेंडे हैं:
१. समान नागरिक संहिता (यूसीसी) का तीखा विरोध करना।,
२. राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के गायन पर अपनी पुरानी मजहबी आपत्ति को फिर से मुखर करना।,
३. अवैध मदरसों, अतिक्रमण कर बनाई गई मस्जिदों और वक्फ बोर्ड की मनमानी संपत्तियों पर होने वाली कानूनी कार्रवाई (बुलडोजर एक्शन) का विरोध करना।,
४. 'मॉब लिंचिंग' का नैरेटिव गढ़कर एकतरफा मुहिम चलाना, और
५. संवैधानिक अधिकारों की आड़ में अपने मजहबी हितों को साधना।
यदि हम इन सभी घटनाओं की कड़ियों को आपस में जोड़ें, तो एक अत्यंत भयानक षड्यंत्र उभरकर सामने आता है। यह षड्यंत्र भारत की लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार के समक्ष ऐसी विकट चुनौती उत्पन्न करने का है, जिससे सरकार घुटने टेक दे और जिहादियों तथा अतिवादियों द्वारा किए जा रहे भारत के इस सुनियोजित 'राष्ट्रान्तरण' के कार्य में कोई बाधा उत्पन्न न करे। संपूर्ण विश्व का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जहाँ-जहाँ इस्लामिक जिहादी और उग्रवादी तत्वों को तनिक भी प्रश्रय मिला है, वहाँ इन्हीं चरणबद्ध योजनाओं के माध्यम से अंततः इस्लामी राष्ट्र की स्थापना हुई है।
स्मरण रहे, स्वतंत्रता आंदोलन के समय ही कट्टरपंथियों द्वारा समूचे भारत पर अपना वर्चस्व स्थापित करने का एक अभियान चलाया गया था। तब यह कुतर्क दिया जाता था कि अंग्रेजों ने सत्ता मुस्लिम साम्राज्य से छीनी थी, इसलिए जाते समय उन्हें यह कमान पुनः मुसलमानों को ही सौंपनी चाहिए। जब ऐसा संभव नहीं हो सका, तो उन्होंने भारत को खंडित कर धर्म के आधार पर एक अलग देश ले लिया, किंतु साथ ही एक विषैला नारा भी गढ़ा— "हंस कर लिया पाकिस्तान, लड़ कर लेंगे हिंदुस्तान।" मुस्लिम आबादी का एक बड़ा वर्ग, जिसने पाकिस्तान बनाने के लिए हिंसक आंदोलन चलाया था, वह विभाजन के बाद पाकिस्तान गया ही नहीं। उनका कुटिल मानना था कि उन्हें भारत भूमि के एक टुकड़े से संतोष नहीं है, उन्हें समूचा भारत चाहिए और वे इसके लिए निरंतर प्रयास करते रहेंगे। और आज ठीक वही प्रयास हो रहे हैं।
यह हमारा दुर्भाग्य रहा कि तत्कालीन नेतृत्व (विशेषकर गांधी और नेहरू) ने सुनियोजित तरीके से इन अलगाववादी प्रयासों को ढाल प्रदान की। स्वतंत्रता के बाद का यदि हम इतिहास देखें, तो ऐसा प्रतीत होता है कि स्वतंत्र भारत की पहली सरकार के समय से ही देश को एक इस्लामी राष्ट्र बनाने का परोक्ष अभियान चलाया जाता रहा, जिसे सत्ता का संरक्षण भी प्राप्त था। इसलिए, आज कांग्रेस से कोई गिला-शिकवा नहीं है। वास्तविक गिला-शिकवा तो उन अचेत हिंदुओं से है, जो आज भी ऐसी राजनीतिक ताकतों के पीछे आंख मूंदकर घूम रहे हैं, जिनका देश की अस्मिता, एकता और अखंडता से कोई सरोकार नहीं है।
जो विनाशकारी कार्य आज से १०-१५ वर्ष बाद अपने चरम पर पहुँचना था, उसकी आक्रामक शुरुआत अभी से हो चुकी है। इसके बाद की जो स्थिति उत्पन्न होती है, वह और भी भयावह होती है, जिसे 'गृहयुद्ध' कहा जाता है। इतिहास गवाह है कि ऐसी स्थिति में कट्टरपंथी 'मोपला विद्रोह' और 'डायरेक्ट एक्शन डे' की तरह देश के मूल निवासियों का बर्बर नरसंहार करते हैं। लोगों को या तो धर्मांतरण के लिए विवश किया जाता है, या वे मौत के घाट उतार दिए जाते हैं। अंततः जबरन उस देश पर शरिया कानून थोप दिया जाता है। बचे-खुचे मूल निवासी कालांतर में उसी तरह विलुप्त हो जाते हैं, जैसे आज पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू कहीं खो गए हैं।
इस पावन भारतवर्ष ने अपने इतिहास में १० करोड़ से अधिक हिंदुओं का नरसंहार झेला है, जो इस पृथ्वी का सबसे बड़ा और क्रूरतम नरसंहार है। लेकिन सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इतनी भयानक ऐतिहासिक त्रासदियों और वर्तमान के स्पष्ट पदचापों के बावजूद, हिंदू समाज आज भी गहरी निद्रा में है। यदि वे अभी भी सचेत नहीं हुए, तो स्वाभाविक रूप से उनके हिस्से में क्या आने वाला है, यह समझना अब तनिक भी मुश्किल नहीं है।
— शिव मिश्रा
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