शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

राजनीति का 'नाराज़ फूफा

 

राजनीति का 'नाराज़ फूफा': लोकतंत्र, सत्ता और विपक्ष का भटकाव

                 शिव प्रकाश मिश्रा

 

भारतीय पारिवारिक व्यवस्था में 'फूफा' एक अत्यंत दिलचस्प, संवेदनशील और जटिल किरदार होता है। वह घर का सदस्य भी है और थोड़ा बाहर का भी। उसे घर के प्रत्येक मामले पर अपनी राय देने का एक अघोषित नैतिक अधिकार महसूस होता है। शादी में जाए तो पूछेगा कि खाने में नमक कम क्यों है; मकान बने तो बताएगा कि नक्शा ऐसा क्यों है। लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि फूफा हमेशा नाराज़ क्यों रहता है? उसकी नाराजगी की असल वजह यह होती है कि जब किसी भारतीय परिवार में बहन के बाद बेटी की शादी होती है और नया दामाद घर में आ जाता है, तो जाने-अनजाने पुराने दामाद (यानी फूफा) की अनदेखी होने लगती है। घर के सभी लोग नए दामाद की खातिरदारी में जुट जाते हैं, और इसी अनदेखी से आहत फूफा अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए हर चीज़ में कमी निकालने का बहाना ढूँढ़ने लगता है।

'दिमागी नक्सली' जैसे जुमलों की अपार सफलता के बाद, राजनीतिक संदेशों के महारथी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति में इसी घरेलू चरित्र को उतार दिया है—'नाराज़ फूफा'। अब यह मामला केवल एक राजनीतिक जुमले तक सीमित नहीं रह गया है। फूफा जी पहले ५ सितंबर को दिल्ली विश्वविद्यालय के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह में प्रधानमंत्री के भाषण में आए, जहाँ उन्होंने युवाओं से कहा कि हर काम शुरू होते ही कुछ लोग 'नाराज़ फूफा' बन जाते हैं। फिर ८ सितंबर को वडोदरा में 'नमो फॉर विकसित भारत' कार्यक्रम में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने तंज कसा कि अब 'नाराज़ फूफा जी' पूछेंगे कि ट्रकों का क्या होगा।

इसके ठीक अगले दिन ९ सितंबर को जब राहुल गांधी अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली पहुँचे, तो दिशा समिति की बैठक के बाहर भीड़ ने उन्हें देखकर 'नाराज़ फूफा' के नारे लगाए। अर्थात्, प्रधानमंत्री का एक राजनीतिक तंज अब जमीनी नारे में बदल चुका था। राजनीति की यही खूबी हैएक नेता मंच से शब्द उछालता है और दूसरा उसे नारे में बदल देता है। लेकिन 'पप्पू' की तरह यदि 'नाराज़ फूफा' को भी राहुल गांधी के साथ स्थायी रूप से चस्पा हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं लेकिन  “बिना बुआ के फूफा” बनना उनके साथ बहुत नाइंसाफी हो जायेगी ।

लेकिन !  जब राजनीति के मंच से 'फूफा' और 'दामाद' के रूपक गढ़े जा रहे हों, तो यह देखना नितांत आवश्यक हो जाता है कि वर्तमान सत्ता और विपक्ष का असली 'वोट बैंक रूपी नया दामाद' कौन है और उपेक्षित 'फूफा' कौन है? राहुल गांधी पर 'नाराज़ फूफा' का ठप्पा लगाना एक सफल राजनीतिक चतुराई हो सकती है, लेकिन असल में देश का 'सामान्य वर्ग' (सवर्ण समाज) आज खुद को उस पुराने दामाद या उपेक्षित फूफा की तरह महसूस कर रहा है, जिसे हाशिए पर धकेल कर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही 'नए दामादों' (आरक्षित वोट बैंकों) की मनुहार में लगे हुए हैं।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो कांग्रेस ने कभी भी वृहद हिंदू समाज के लिए सकारात्मक कार्य नहीं किया। ऐसा प्रतीत होता है कि नेहरू के कार्यकाल से ही तुष्टिकरण की राजनीति की नींव रखी गई, जिसके लिए एक तरफ हिंदू समाज का विखंडन आवश्यक था, तो दूसरी तरफ एक विशेष वर्ग को असीमित अधिकार दिए गए। देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद बनाए गए, जो औपचारिक रूप से शिक्षित भी नहीं थे जिनकी पृष्ठभूमि विशुद्ध कट्टरपंथी  इस्लामी शिक्षा की थी, जो उन्हे घर पर ही मिली थी। उन्होंने नेहरु की सहमति से वामपंथियों के साथ मिलकर भारत के गौरवशाली इतिहास को इस तरह तोड़ा-मरोड़ा गया जिससे हिंदू समाज हीन भावना (कुंठा) से भर जाए। आक्रांताओं और मुगलों के कसीदे पढ़े गए और भारत के वीर महापुरुषों को हाशिए पर धकेल दिया गया। विभाजन के बाद भी कांग्रेस ने मुस्लिम लीग का नाम बदलकर (इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग) उसके साथ राजनीतिक रिश्ते बनाए, जो केरल में आज भी बदस्तूर जारी है। हिंदुओं का नरसंहार करने वाले कुख्यात 'रजाकार' संगठन पर से प्रतिबंध हटाकर उन्हें राजनीतिक मुख्यधारा में लाया गया। यह सब कांग्रेस की उसी तुष्टिकरण नीति का हिस्सा था, जो वृहद हिंदू समाज के लिए हमेशा विध्वंसक साबित हुई।

किसी राजनीतिक विश्लेषक ने कभी यह सटीक भविष्यवाणी की थी कि आगे चलकर कांग्रेस 'मुस्लिम लीग' बन जाएगी और भाजपा 'कांग्रेस' हो जाएगी।  आज यह कटु सत्य प्रतीत हो रहा है। कॉंग्रेस तो खुले आम कह रही है कि  वह मुसलमानों की पार्टी है और केरल मे उसकी सरकार मुस्लिम लीग के नियंत्रण मे ही चल रही है।  वर्ष दो हज़ार चौदह (2014) में जो मोदी वृहद हिंदू एकता का चेहरा थे, वे प्रधानमंत्री बनते ही 'सबका साथ, सबका विकास' की ओर मुड़ गए। वर्ष दो हज़ार उन्नीस (2019) आते-आते वे स्वयं को पिछड़े वर्ग का बताने लगे और अब हालात यहाँ तक आ पहुँचे हैं कि जातिगत जनगणना का अघोषित आश्वासन भी दिया जाने लगा है

सत्ता की इस अंधी दौड़ में भाजपा के लिए भी अब हिंदू समाज की एकजुटता नहीं, बल्कि आरक्षित वोट बैंक ही सर्वोपरि हो गया है। आज अनुसूचित जाति एवं जनजाति (एससी/एसटी) अधिनियम को इतना सख्त कर दिया गया है कि सामान्य वर्ग के लिए यह एक अभिशाप बन गया है। प्राथमिकी दर्ज होने के कुछ ही दिनों के भीतर लाखों रुपये के सरकारी मुआवजे का प्रावधान है। भले ही बाद में मुकदमे फर्जी साबित हो जाएं, लेकिन फर्जी मुकदमा लिखवाने वालों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती और न ही वह मुआवजा वापस लिया जाता है। यह धंधा आज खूब फल-फूल रहा है और सामान्य वर्ग के निर्दोष युवाओं का जीवन नरक बना रहा है। हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के जो नए दिशा-निर्देश आए, उन्होंने तो जैसे मृतप्राय सामान्य वर्ग को पूरी तरह कुचलने का खाका ही खींच दिया है।

आज सरकारें दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को सशक्त बनाने के नाम पर केवल अपना-अपना वोट बैंक मजबूत कर रही हैं। विडंबना देखिए कि देश को सबसे अधिक कर (टैक्स) चुकाने वाले सामान्य वर्ग के युवाओं को अपनी जायज माँगों के लिए राजधानी के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन तक की अनुमति नहीं मिलती; उन्हें बसों में भरकर मीलों दूर छोड़ दिया जाता है। वहीं दूसरी ओर, अराजक तत्वों को महीनों तक सड़कों पर उपद्रव करने और देश के संसद भवन तक ट्रैक्टर ले जाने की पूरी छूट दे दी जाती है, और बाद में उसी वोट बैंक को साधने के लिए उनके सारे मुकदमे वापस ले लिए जाते हैं।

जब सत्ता पक्ष अपने मूल मतदाता को नजरअंदाज कर नए वोट बैंक को साधने में इस कदर अंधा हो जाए, तो देश के उस उपेक्षित 'फूफा' (सामान्य वर्ग) से क्या शिकायत करें, जो स्वतंत्र भारत में खुद को आखिरी पायदान का दोयम दर्जे का नागरिक महसूस कर रहा है? रही बात राजनीतिक फूफा (विपक्ष) की, तो उनकी सबसे बड़ी परेशानी यह है कि लाख कोशिशों के बाद भी 'बुआ' (सत्ता) उनके हाथ नहीं आ रही है। इसी हताशा में विपक्ष कई बार राष्ट्र-विरोधी विमर्श का भी हिस्सा बन जाता है। 

अगर देश में 'यूपीआई' (डिजिटल भुगतान) सफल हुआ है या माल ढुलाई गलियारों (फ्रेट कॉरिडोर) से परिवहन की क्षमता बढ़ी है, तो उसे केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह कार्य मोदी सरकार में हुआ है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम गुण-दोष के आधार पर नीतियों की समीक्षा करना है, न कि हर अच्छी-बुरी बात का केवल अंधविरोध करना। 

इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य को यदि एक वाक्य में समेटना हो तो यही कहा जाएगासमस्या नाराज़ फूफा से नहीं, समस्या 'फूफागिरी' से है। वह फूफागिरी जो विपक्ष की तरह हर शानदार राष्ट्रीय उपलब्धि में खामी ढूँढ़ती है, और वह फूफागिरी जो सत्ता पक्ष की तरह उठने वाले हर जायज सवाल में षड्यंत्र देखती है तथा अपने ही वफादार करदाता वोटरों को दरकिनार कर देती है।

लोकतंत्र में असहमति एक सुरक्षा-वाल्व है, कोई देशद्रोह नहीं। आज की जागरूक जनता केवल नाराज़गी और आरोप-प्रत्यारोप नहीं चाहती, वह एक ऐसा सकारात्मक विकल्प और ऐसी पारदर्शी सत्ता चाहती है, जहाँ किसी एक 'दामाद' के राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए पूरे घर को दांव पर न लगाया जाए।

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