शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी

 न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी

सरकार द्वारा  तीनो कृषि  कानून वापस ले लेने के बाद भी तथा कथित  किसान हट धर्मिता दिखाते हुए अभी घर वापसी के मूड में नहीं है. अब  कई नई मांगे भी  की जा रही  हैं लेकिन सबसे बड़ी मांग है न्यूनतम  समर्थन मूल्य की गारंटी का कानून. यह कानून देश और किसानों के लिए कितना लाभकारी हो सकता है, आइये इसे बिना इकनोमिक जोर्गन प्रयोग किये बिलकुल साधारण भाषा में समझने  की कोशिश करते हैं.

जरा सोचिये जिस  देश में गुड १०० रूपये प्रति किलो और चीनी ३० रुपये प्रति किलो बिकती हो  इसका क्या कारण हो सकता हैकारण है गन्ने का न्यूनतम समर्थन मूल्य होता है, लेकिन गुड का नहीं. चीनी मिले ज्यादा कुशन गन्ना खरीदे, इसके लिए आन्दोलन होते हैं.  भुगतान  में विलम्ब करें, भुगतान नहीं करें तो भी आन्दोलन होतें हैं और फिर राज्य सरकारे सक्रिय होती हैं, चीनी मिलो की सहायता करती हैं, तब कहीं जाकर भुगतान हो पाता है. . अक्सर यह चुनावी  मुद्दा भी बनता है. धीरे धीरे गन्ने का वैकल्पिक वाणिज्यिक उपयोग लगभग बंद हो चुका है. बड़ी कंपनिया जैसे रिलायंस फ्रेश, डीमार्ट, बिग बास्केट, स्पेंसर, अमेजन, फ्लिप कार्ट  आदि महाराष्ट्र और गुजरात से अपने रिटेल या ऑनलाइन स्टोर्स पर बेचने के लिए  गुड  तैयार करवाती हैं, जहाँ यह १०० रूपये से १५० रुपये किलो तक बेचा जाता है. सामान्य किसानों को तो शायद यह मालूम भी नहीं होगा. कभी पूरे उत्तर भारत में  पश्चिमी उ.प्र के नए गुड की प्रतीक्षा रहती थी, अब  मेरठ, नोइडा और दिल्ली में भी कोल्हापुर का डिब्बाबंद गुड बिकता है. यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है  कि न्यूनतम समर्थन मूल्य का क्या प्रभाव  हो रहा है खास तौर से पश्चिम उत्तर प्रदेश हरियाणा और पंजाब में.

न्यूनतम समर्थन मूल्य तो अभी भी लागू है और फसल की  शुरुआत में सरकार इसकी घोषणा कर देती है. इसका उद्देश्य होता है कि सरकार किसानों से इसी मूल्य पर खरीदारी करेगी ताकि किसानों को यह मालूम हो सके कि बाजार मूल्य लगभग इसके आस पास रहेगा और वे  फसल बोने के लिए  अपने सही विकल्प का चुनाव कर सकें. लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने के बाद भी सरकार सारी  उपज की खरीदारी नहीं करती. सरकार केवल सार्वजनिक वितरण प्रणाली, सेना और अर्धसैनिक बलों तथा अन्य जरूरतों का ध्यान रखकर सीमित मात्रा में खरीदारी करती है.  सरकार अगर चाहे भी तो किसानों की सारी उपज की खरीदारी कर भी  नहीं सकती क्योंकि उसके पास ना तो भंडारण की क्षमता है और ना ही बिक्री और वितरण का कोई तंत्र. इसलिए सरकारी खरीदारी के बाद जो उपज बचती है, वह खुले बाजार में बिकती है. इसकी विशेषता यह है कि किसान को मूल्य भले ही कम मिले लेकिन  उपज बिना किसी परेशानी के बिक जाती है. यद्दपि   उपज  का  मूल्य  "डिमांड और सप्लाई के सिद्धांत" पर निर्भर  होता है इसलिए बाजार मूल्य न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम या ज्यादा हो सकता है. फसल के समय यह सामान्यतय: कम ही होता है और इसलिए यह तुरंत फायदे का सौदा होता  है. इसके अलावा समय के साथ साथ पूरी खरीद प्रक्रिया में पार दर्शिता का अभाव होता  जा रहा है. अक्सर बिचौलियों की भूमिका सवालों के घेरे में आती है क्योंकि खाद्य निगम ज्यादातर खरीदारी राज्य सरकार द्वारा लाइसेंसी कृत बिचौलियों के माध्यम से करती है. साथ ही खाद्य निगम के गोदामों में खाद्यान्न की बर्बादी भी बहुत सामान्य  है यद्दपि  इसमें हाल के वर्षों में काफी सुधार हुआ है. सबसे बड़ी विडंबना यह है कि  ज्यादातर छोटे किसानों को  न्यूनतम समर्थन मूल्य का कोई  लाभ नहीं मिल पाता और इसलिए किसानों के वर्तमान आन्दोलन में उनकी सहभागिता भी लगभग नहीं के बराबर है.

 

न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी का औचित्य

न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देने का मतलब है कि उस मूल्य पर ही खरीदारी होगी, या तो सारी खरीदारी सरकार करें, जो संभव नहीं है, इसलिए कानून बनाकर न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे खरीद-फरोख्त को गैरकानूनी घोषित कर दिया जाय और इसे दंडनीय अपराध घोषित कर दिया, और कानून तोड़ने वालों को  जेल में डाल दिया जाए. ऐसे कानून के अंतर्गत यदि सरकार पूरी खरीदारी नहीं करेगी तो व्यापारी या स्टॉकिस्ट को सरकारी मूल्य पर ही खरीदारी करनी होगी. यदि उपज की मांग नहीं हुई तो व्यापारी और स्टॉकिस्ट इसे नहीं खरीदेंगे. अगर आयात करने पर किसी जिन्स का मूल्य देश के न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम होता है तो व्यापारी स्थानीय स्तर पर खरीदने के बजाय इसका आयात करेंगे और यदि सरकार आयात प्रतिबंधित करेगी तो फिर पड़ोसी देशों की सीमाओं से स्मगलिंग और काले धंधे शुरू हो जायेंगे. यदि यह भी नहीं हो सका तो किसानों से चोरी छुपे कम कीमत पर खरीदारी की जाएगी.

 

 

 

इस सब का नतीजा यह होगा कि किसान की उपज कितनी ही अच्छी और कितनी ही ज्यादा क्यों ना हो बाजार में खरीदने वाले नहीं होंगे और किसान रुपयों की अत्यंत आवश्यकता होने पर  भी अपनी फसल नहीं बेच पाएंगे. उन्हें फसल या तो अपने पास रखनी पड़ेगी या फिर इसे जानवरों को खिलाने या फेंकने के लिएके लिए मजबूर हो जाएंगे, जैसा कि हम हर साल मौसमी सब्जी और फलों के बारे में देखते हैं.

फुटकर ग्राहकों के लिए भी बहुत बड़ी समस्या हो जाएगी क्योंकि किसानों के पास उपज तो बहुत होगी लेकिन उन्हें या तो बहुत  महंगी मिलेगी या फिर मिलेगी ही नहीं. ऐसी स्थिति में फसलों की उपज और उनके मूल्यों के बारे में भविष्यवाणी करना असंभव हो जाएगा. सरकार के लिए ऐसी स्थिति में उत्पादन और गुणवत्ता बढ़ाना बेहद मुश्किल हो जाएगा.  इसका एक दुष्परिणाम यह  होगा कि  कमोडिटी मार्केट तो ध्वस्त हो जाएगा.

इस सबका मिलाजुला असर यह होगा कि किसानों की आर्थिक स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा और उनके खर्च करने की शक्ति कम हो जाएगी, चाहे वह पारिवारिक खर्च हो या फसलों में लगने वाली लागत या पूंजी हो. कृषि क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा भी लगभग खत्म हो जाएगी.

संपन्न किसान और किसान वेश में बिचौलिए नए-नए आंदोलन चलाकर सरकार को खरीदारी का कोटा बढ़ाने के लिए दबाव बनाएंगे. आज जो किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी के लिए आंदोलन चलाने की बात कर रहे हैं, कल वह सरकारी खरीद का कोटा बढ़ाने के लिए आंदोलन चलाएंगे और यदि सरकार कोटा बढ़ाएगी तो न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की बात होगी.  संपन्न किसान और बिचौलिए तो मालामाल होते जाएंगे लेकिन सामान्य किसानों की स्थिति बद से बदतर होती जाएगी. साथ-साथ सरकार अत्यधिक वित्तीय दबाव बनेगा क्योंकि सरकार इस तरह से खरीदी गई उपज को ना तो निर्यात कर पाएगी और ना ही देसी बाजार में बेच पाएगी. सरकार के पास भंडारण की पर्याप्त क्षमता भी नहीं है इसलिए उपज का बड़ा हिस्सा बर्बाद होने से नहीं रोका जा सकेगा. इसके बाद उपज को या तो मुफ्त में अपने देश के नागरिकों में बांटना होगा, या फिर ओने पौने निर्यात करना होगा या मुफ्त में जरूरतमंद देशों / संयुक्त राष्ट्र संघ को दान करना होगा.

सरकार द्वारा इस पर किया गया खर्चा इतना ज्यादा होगा की अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाएं और रक्षा सहित विकास के कार्य प्रभावित होंगे, जिसकी भरपाई सरकार करों की दर बढ़ाकर यह नए कर लगाकर करेगी. पूरे घटनाक्रम से सबसे अधिक प्रभावित होंगे आम किसान और खेतिहर मजदूर जो अधिकांशत: आज भी गरीबी में जी रहे हैं.

मैंने अपनी आंखों से देखा है और महसूस किया है कि किसानों की हालत बहुत खराब है . खेती किसानी अब लाभदायक कार्य नहीं रहा. मैं अपने गांव और रिश्तेदारी में ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूं,   जिनके पास लगभग 10 एकड़ खेती थी और वे जमीदारों की तरह रहते थे. आजकल उनकी हालत बहुत खराब है. उतनी खेती से घर का खर्चा नहीं चलता. सबसे बड़ी परेशानी की बात यह है कि खेती करने के लिए मजदूरों की भारी कमी है. गांव के ज्यादातर युवा वर्ग गांव छोड़कर दिल्ली, गुजरात, मुंबई और पंजाब चले जाते हैं. केवल वही लोग बचते हैं जिनके पास नरेगा कार्ड होते हैं और साल में १००- ५० दिन का काम मिल जाता है.

खेतों की जोत बहुत छोटी है, कई गावों  में घूमिये तो शायद ही किसी के पास बैल मिलेंगे. किराए पर ट्रैक्टर मंगा कर एक आध बार जोत कर खेती की जा रही है. बटाई पर खेती करने वालों की संख्या भी कम होती जा रही हैं. मेरे पास  बहुत थोड़े खेत है, जो कई बार बटाईदार ना मिलने पर खाली पड़े रहते हैं. मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी कैसे इस पूरी व्यवस्था को परिवर्तित करेगी.

इसलिए सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देने के बजाय किसानों की आमदनी बढ़ाने की अन्य योजनाएं बनाने पर विचार करना चाहिए और ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए जिससे उनकी आय बढे, उनकी क्रय शक्ति बढे. जिससे किसानों के रहन-सहन में सुधार आएगा और देश की जीडीपी भी बढ़ेगी. पंजाब में अधिकांशत: गेहूं और धान की फसलें उगाई जा रही हैं, जिनमें अत्यधिक सिंचाई के  पानी की आवश्यकता पड़ती है और इस कारण पंजाब में भूगर्भ का जलस्तर गिरकर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए अधिकाधिक कीटनाशकों और रासायनिक खादों का उपयोग किया जा रहा है. जिसके कारण पंजाब देश में सबसे अधिक कैंसर रोगियों वाला प्रदेश बन गया है. आय के असमान वितरण के दुष्परिणाम स्वरूप नशे का कारोबार भी अपनी जड़ें जमा रहा है. सरकार नकद या अन्य तरह की सहायता पहुंचा कर फसलों का पैटर्न बदल सकती है, और भूगर्भ जलस्तर बचा कर आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित कर सकती है. जब तक कृषि को उद्योग का दर्जा नहीं दिया जाता और उसी तरह सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जाती, किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं किया जा सकता. सरकार को ऐसे प्रयास करने चाहिए जिससे किसानों की लागत कम हो सके  और वे देश की आवश्यकता के अनुसार फसलें उगा कर अपने लिए आर्थिक स्रोत उत्पन्न कर सकें. रद्द किए गए  कृषि किसान कानूनों की जगह, किसान संगठनों और विशेषज्ञों से वार्ता कर के नए कानून लाई जानी चाहिए जिससे किसान अपनी कृषि योग्य भूमि का अधिकतम उपयोग करके अधिक से अधिक आय अर्जित कर सकें और स्वयं स्वावलंबी बन सके.

अमेरिका, कनाडा जैसे विकसित देश और यहाँ तक कि विश्व व्यापार संगठन भी  भारत पर कृषि क्षेत्रको  तय सीमा से अधिक सब्सिडी देने का आरोप लगाते रहते हैं. मोदी सरकार ने शायद  इससे बचने के लिए किसानों को आर्थिक सहायता देने का नया तरीका निकाला है और वह है  सीधे उनके खाते में धनराशि पहुंचाना, जिसे तकनीकी रूप से  सब्सिडी नहीं सहायता  माना जाता है और इसलिए इस पर कोई आपत्ति भी नहीं की जाती.

अमेरिका और युरोप के  ज्यादातर किसानों की गिनती दनिया के समृद्ध किसानो में होती है लेकिन वहां न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी का कानून नहीं है. इसलिए मूल्यों की  गारंटी के ये मांग किसानो की खुशहाली का द्वार नहीं खोल सकती. 

- शिव मिश्रा 

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कृषि कानून – निराशाजनक वापसी

 

कृषि कानूनों की वापसी – एक  निराशाजनक अध्याय

कृषि कानूनों की वापसी को लोग भले ही मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक कहे लेकिन मुझे तो लगता है कि है कि यह मास्टर स्ट्रोक का ब्रेन स्ट्रोक है. इन कानूनों की वापसी बेहद निराशाजनक है किंतु वापसी के इस कदम की आलोचना भी उचित नहीं कही जा सकती.

यद्दपि  संसद द्वारा पारित तीनों कृषि कानून प्रचलन में नहीं थे, क्योंकि इन पर सर्वोच्च न्यायालय ने रोक लगा रखी थी  किन्तु  इसके बाद भी इन कानूनों के विरुद्ध संपूर्ण विपक्ष और तथाकथित किसानों के भेष में देश विरोधी ताकतें भी  सक्रिय थी और मोदी सरकार पर लगातार निशाना साध रही थी. पिछले एक साल से दिल्ली घेरकर बैठे इन चन्द लोगों ने दिल्ली और  राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लोगों का जीना दूभर कर रखा था और इस क्षेत्र के उद्योगों को माल के आवागमन बाधित होने के कारण भारी क्षति हो रही थी. इस आंदोलन के कारण देश को कितनी आर्थिक क्षति हुई है इसका आकलन करना मुश्किल है लेकिन इतना जरूर है कि इस आंदोलन ने अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की छवि को जितनी क्षति पहुंचाई उसकी भरपाई आसानी से नहीं की जा सकती है.

इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि जो कानून प्रचलन में ही न हो उनका विरोध हो रहा हो  और उसका अंतरराष्ट्रीय करण किया जा रहा है. इसलिए ऐसे कानूनों को वापस लेने से भी कोई अंतर नहीं पड़ने वाला है. फिर भी सरकार के इस काम से देश हित में काम करने वाले  प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को  बेहद निराशा हुई है क्योंकि इससे देश के अधिसंख्य किसानों का लंबी अवधि में बहुत  नुकसान होगा और इसलिए मैं व्यक्तिगत रूप से सरकार के इस कदम का समर्थन नहीं कर सकता खासतौर से तब जबकि आन्दोलन अपनी मौत मर चुका था.

 

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में इन कानूनों को वापस लेने के  क्या कारण बताये  इससे कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन मुझे नहीं लगता है कि सरकार ने यह बिल केवल राजनीतिक दबाव में वापस लिए हैं क्योंकि जो लोग विरोध कर रहे थे वे इनके वापस होने के बाद भी बीजेपी को वोट नहीं करेंगे और यह बात बीजेपी भी अच्छी तरीके से समझती होगी.

कानून वापसी के निहातार्थ

इस तथाकथित किसान आंदोलन को हर उस व्यक्ति का समर्थन मिल रहा था जो व्यक्तिगत रूप से प्रबल मोदी विरोधी था. पूरे विपक्ष सहित अंतर्राष्ट्रीय इस्लामिक वामपंथ गठजोड़ भी इस आंदोलन को न  केवल समर्थन कर रहे थे बल्कि उन्हें इसके लिए धन भी मुहैया करवा रहे थे. ऐसे समय में जब  क्रिस्चियन मिशनरियों द्वारा  पंजाब में बड़े पैमाने पर सिखों का धर्मांतरण किया जा रहा है, इस आंदोलन के कारण पंजाब और तराई क्षेत्रों में हिंदू और सिख आमने-सामने आ  गए, और यही इस आंदोलन को हवा दे रही  देश विरोधी ताकतों की सबसे बड़ी उपलब्धि है. 

 

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है सर्वोच्च न्यायालय का रवैया जिस पर कोई भी खुलकर नहीं बोल रहा है. सर्वोच्च न्यायालय ने अति सक्रियता दिखाते हुए तीनों कृषि कानूनों पर रोक लगा दी किंतु इस आंदोलन के समाधान की दिशा में एक भी कदम नहीं उठाया. आन्दोलनकारियों  द्वारा दिल्ली पहुंचने के  रास्तों को अवरुद्ध करने के विरोध में सर्वोच्च न्यायालय में कई जनहित याचिकायें दायर की गई थीं लेकिन कई मामलों में  स्वत: संज्ञान लेने वाले सर्वोच्च न्यायालय ने इन जनहित याचिकाओं पर कुछ भी नहीं किया. एक समाधान के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कृषि कानूनों की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित की गई जिसने तय सीमा के अंदर अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंप दी लेकिन सुप्रीम कोर्ट को इसे देखने के लिए समय नहीं मिल पाया. यह अपने आप में बहुत बड़ा संकेत है कि कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे आंदोलन के न्यायिक  समाधान में उसकी कोई रुचि नहीं है, चाहे दिल्ली सहित तीनों राज्यों की असंख्य जनता को कितनी ही परेशानी क्यों न हो और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में चल रहे उद्योगों को कितना ही नुकसान उठाना क्यों न उठाना  पड़े.

इसके पहले पश्चिम बंगाल में हुई वीभत्स हत्याएं बलात्कार लूटपाट और आगजनी ठीक वैसे ही थी जैसे विभाजन के समय हुई थी और इसके कारण हजारों लोग अपना घर बार छोड़कर दूसरे राज्यों में पलायन कर गए  लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वत: संज्ञान लेना तो छोड़ दीजिए जनहित याचिकाओं  पर भी कोई कार्यवाही नहीं हुई. इसके ठीक विपरीत लखीमपुर खीरी में हुई हिंसा और उसमें मारे गए 4 किसानों के मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने, एक एसआईटी गठित की  है जिसकी निगरानी दैनिक आधार पर करने के लिए उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश नियुक्त किए गए हैं  और यह ध्यान रखा गया है कि उनकी जड़ें उत्तर प्रदेश से ना हो. सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईटी में भी सीधे  नियुक्त आईपीएस के  आईजी स्तर के वरिष्ठ अधिकारी शामिल किए हैं, और यह ध्यान रखा है कि वे  उत्तर प्रदेश के निवासी  न हो.

 

सर्वोच्च न्यायालय के ऊपर  कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती है, संभवत अवमानना की कार्यवाही के डर से और इसलिए न्यायालय के अत्यंत सम्मान के साथ मुझे यह कहते हुए खेद  है कि सर्वोच्च न्यायालय ने कई राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर उदासीन रवैया अपनाकर न केवल देश को संकट में डाले रखा है वरन सरकार को भी अप्रत्यक्ष रूप से संकट में डालने का काम किया है. न्यायालयों की कार्यप्रणाली की  यह एक नई शुरुआत है. इसके पहले शाहीन बाग के मामले में भी सर्वोच्च न्यायालय ने आंदोलनकारियों से  सड़क खाली कराने का आदेश देने के  बजाय मध्यस्थ वार्ताकार नियुक्त कर दिए थे, जिसका कोई नतीजा नहीं निकला था.

 

ऐसे में सरकार के पास इन कानूनों को वापस लेने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं बचा था. इसलिए सरकार द्वारा इन कानूनों को वापस लेने  की आलोचना करना उचित नहीं है.

 

कृषि कानूनों के वापस होने के बाद भी आंदोलन खत्म नहीं होगा

मेरा मानना है और मैंने कई बार यह  लिखा भी  है कि सरकार द्वारा कृषि कानून वापस लेने के बाद भी आंदोलन समाप्त  नहीं होगा क्योंकि इस आंदोलन का उद्देश्य किसानों का हित तो केवल दिखाव़ा  है असली उद्देश्य राजनीतिक है. इसलिए किसी न किसी बहाने आंदोलन को न केवल  2024 तक जिंदा रखने की कोशिश की जाएगी बल्कि नए नए मुद्दे भी शामिल किए जाते रहेंगे. आंदोलनकारियों के  ताजा रुख से यह बिल्कुल स्पष्ट भी  हो गया है. उन्होंने इसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी रूप देने, स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट अक्षरस: लागू करने, किसानों के सभी मुकदमे वापस लेने, आंदोलन के दौरान किसी भी कारणवश मृत किसानों को शहीद का दर्जा  देने और उचित मुआवजा देने की मांगे शामिल कर ली हैं. किसान नेता राकेश टिकैत ने तो यह भी मांग कर डाली है कि जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने कृषि क्षेत्र के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार से जो मांगे की थी वे भी लागू की जाए क्योंकि अब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं. वास्तव में यह  बेतुकी मांग तो कांग्रेश ने की थी जिसे टिकैत दोहरा रहे हैं.

 

अगर सरकार ये  सभी नई मांगे मान लें तो भी आंदोलन वापस नहीं होगा क्योंकि तब वे  संशोधित नागरिकता कानून की वापसी की मांग करेंगे और अगर वह भी मान ली जाती है तो फिर धारा 370 की वापसी की मांग करेंगे. इस तरह मांगों का  अंतहीन सिलसिला चलता रहेगा.

 

आंदोलन को लंबा खींचने के लिए सरकार भी जिम्मेदार

सरकार ने आवश्यकता से अधिक लचीला रुख अपनाया जिससे आंदोलनकारियों के हौसले बढ़ते गए और उन्हें इस बात का एहसास हो गया कि वह कुछ भी करें सरकार उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं करेगी. इसका परिणाम 26 जनवरी को राष्ट्रीय ध्वज के अपमान, लाल किले पर एक धर्म विशेष का झंडा फहराने और दिल्ली में अराजकता फैलाने के रूप में सामने आया. जांच में विदेशी साजिश का पर्दाफाश हुआ और सरकार के पास कार्यवाही करने का  पर्याप्त आधार  था. ज्यादातर आंदोलनकारियों ने स्वयं को इस अराजक होते आंदोलन से अलग कर लिया था लेकिन सरकार ने जरूरत से ज्यादा सहिष्णुता का परिचय देकर इस आंदोलन को जीवनदान दे दिया.

 

न्यूनतम समर्थन मूल्य समस्या का हल नहीं

किसान नेताओं द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी जामा पहनाने की मांग मानना किसानों और देश के हित में बिल्कुल भी नहीं है. इससे अर्थव्यवस्था को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा  क्योंकि सरकार द्वारा निर्धारित समर्थन मूल्य के नीचे खरीदारी नहीं की जा सकेगी  इसलिए बाजार भाव समर्थन मूल्य से नीचे आने पर खरीदारी बंद हो जाएगी. इससे कमोडिटी बाजार ध्वस्त  हो जाएगा और कोई भी व्यापारी नुकसान होने के डर से स्टॉक नहीं करना चाहेगा.  यह एक ऐसी स्थिति होगी जब कृषि उपज या तो महंगी बिकेगी या फिर बिकेगी ही नहीं. इस सब का  असर किसानों और सामान्य उपभोक्ताओं पर पड़ेगा.  इसलिए सरकार को न्यूनतम समर्थन मूल्य की बजाय किसानों की आय बढ़ाने के अन्य उपाय करने चाहिए.

 

 राजनीतिक नफा नुकसान

किसान आंदोलन से  सबसे अधिक प्रभावित होने वाले राज्य उत्तर प्रदेश और पंजाब हैं. जहां उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है वहीं पंजाब में उसका कोई बहुत बड़ा आधार नहीं है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश और तराई के कुछ इलाके इससे प्रभावित हैं जहां पिछले चुनाव में भाजपा को भारी सफलता मिली थी.  कृषि कानूनों की वापसी के कारण यहां भाजपा को संभावित नुकसान से कुछ राहत अवश्य मिलेगी. राष्ट्रीय लोक दल जिसका जनाधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों तक ही सीमित है, का समाजवादी पार्टी के साथ घोषित गठबंधन है किंतु सीटों के बंटवारे को लेकर मतभेद है. अब  इस बात की प्रबल संभावना है कि जयंत चौधरी अपना भविष्य  सुरक्षित करने के उद्देश्य से भाजपा के पाले में जा सकते हैं  . इससे भाजपा को फायदा भले ही न हो लेकिन समाजवादी पार्टी को नुकसान अवश्य होगा.

पंजाब में भी कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेश छोड़ने  के बाद नई पार्टी बनाने का ऐलान किया था और इस बात की संभावना जताई थी कि यदि  सरकार कृषि कानून वापस लेती है या उनमे  समुचित बदलाव करती है तो वह भाजपा के साथ गठबंधन कर सकते हैं. कृषि कानून लागू होने के बाद अपना अस्तित्व बचाने के लिए शिरोमणि अकाली दल पंजाब में भाजपा से अलग हो गया था लेकिन उसे न माया मिली न राम तो उन्होंने मायावती से गठबंधन कर लिया.  जिसका बहुत फायदा होता नजर नहीं आता,  इसलिए अब इस बात की भी संभावना  है कि  अकाली दल फिर से भाजपा के साथ गठबंधन  पर विचार करें. यदि भाजपा, कैप्टन अमरिंदर सिंह और शिरोमणि अकाली दल का गठबंधन मिलकर चुनाव लड़ता है तो यह  गठबंधन पंजाब में नई सरकार बना सकता है. कृषि  कानूनों की वापसी ने इसकी जमीन तैयार कर दी है.

कृषि कानूनों की वापसी ने आंदोलनकारी नेताओं के पैरों से जमीन खींच ली है और विपक्ष भी   मुद्दा विहीन हो गया है. गुरु नानक जयंती के अवसर पर इन कानूनों को वापस लेना भी एक बहुत बड़ा संदेश है, जिससे पंजाब में भाजपा के विरुद्ध सिखों का रोष कम होगा  और हरियाणा में भी सरकार के खिलाफ असंतोष कम हो सकेगा.

जहां तक  कृषि सुधारों से  संबंधित नए कानून बनाने का का प्रश्न है, हमें याद रखना चाहिए कि मोदी एक गंभीर राजनेता है और वह देश और किसानों के हित में  किसी  महत्वपूर्ण मुद्दे को यूं ही छोड़ देना पसंद नहीं करेंगे. आशा है कि  कृषि सुधारों से संबंधित नए कानून सभी संबंधित पक्षों से व्यापक विचार-विमर्श के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले जरूर आ जाएंगे.

                                                           - शिव मिश्रा




बुधवार, 17 नवंबर 2021

सनराइज ओवर अयोध्या अर्थात सनसेट ऑफ कांग्रेस

 

सनराइज ओवर अयोध्या अर्थात सनसेट ऑफ कांग्रेस

 


कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद की एक और पुस्तक "सनराइज ओवर अयोध्या"  ने कोहराम मचा दिया है, और शायद यही उनकी मंशा भी थी. हासिये  पर पड़ी कांग्रेस  के नेपथ्य में पड़े ऐसे नेताओं की मंशा किसी न किसी प्रकार कांग्रेस और खुद को सुर्खियों में लाने  की रहती है. सलमान खुर्शीद ने इस किताब में हिंदुत्व की तुलना दुनिया के  क्रूरतम  आतंकवादी संगठन बोको हराम और आईएसआईएस से की है. एक हिंदू बहुसंख्यक देश  में इस तरह के बयान देना यह   साबित  करता है कि हिंदुस्तान में मुसलमान कितना  डरा हुआ है या बहुसंख्यकों को कितना डरा कर रखता है.   


सलमान खुर्शीद ने  अपनी किताब में अयोध्या में राम जन्मभूमि पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर भी टिप्पणियां की हैं. प्रत्यक्ष तौर पर तो उन्होंने इस फैसले की प्रशंसा की है लेकिन उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि अयोध्या में राम मंदिर को तोड़कर  मस्जिद बनाई गई थी यह कभी साबित नहीं हुआ. यह लिखकर सलमान खुर्शीद क्या कहना चाहते हैं, यह कोई भी समझ सकता है. असदुद्दीन ओवैसी भी यही बात कहते हैं "वन्स ए मस्जिद ऑलवेज ए मस्जिद" चाहे वह कहीं भी किसी की जमीन पर जबरदस्ती कब्जा करके ही क्यों न बनाई जाए. ओवैसी ने कह रखा है कि वह अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह  राम मंदिर स्वीकार नहीं करते और जब भी उन्हें मौका मिलेगा वह दोबारा वहां पर बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाएंगे. यह दोनों बयान लगभग एक जैसे हैं सिर्फ भाषा का अंतर है.

 

कुछ हिंदू इस बात पर आश्चर्य कर रहे  हैं  और समझ नहीं पा रहे हैं कि सलमान खुर्शीद जैसे  बेहद शिक्षित, प्रगतिशील और नरमपंथी मुसलमान ने  आखिर हिंदुत्व की तुलना आतंकवादी संगठनों से क्यों की ? ऐसे सभी लोगों को यह जान लेने की आवश्यकता है कि ज्यादातर मुसलमान वह चाहे जितनी ही शिक्षित और प्रगतिशील क्यों न हो,  मजहब ही उनके लिए सर्वोपरि होता  है और राष्ट्र, राष्ट्रीयता, व देशभक्ति उनके लिए कोई मायने नहीं रखती.  मजहब के लिए  वे कुछ भी कर सकते हैं. आजकल देश में बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोगों द्वारा धर्मांतरण और जिहादी क्रियाकलापों में संलग्न होने के अनगिनत उदाहरण सामने आ रहे हैं.  उत्तर प्रदेश कैडर के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी इफ्तिखारउद्दीन ने कानपुर में आयुक्त रहते हुए अनेक  परिवारों  का धर्मांतरण कराया और  जिहादी गतिविधियों में भाग लिया . स्वाभाविक है उन्होंने अचानक ऐसा करना शुरू नहीं किया बल्कि  वह शुरू से इस तरह की गतिविधियों में संलग्न रहे होंगे. ऐसा करने वाले वह अकेले नहीं है अगर जांच की जाए तो हैरान-परेशान करने वाले आंकड़े सामने आएंगे.

 

देश के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना आजाद जिनकी धर्मनिरपेक्षता के बारे में जवाहरलाल नेहरू  कसीदे काढ़ते थे और कांग्रेस आज तक मुस्लिमों को लुभाने के लिए उनका नाम इस्तेमाल करती है, उन्होंने भी कहा था कि प्रत्येक मोमिन जो अल्लाह में विश्वास करता है, उसके पैगंबर और उसकी किताब कुरान में विश्वास करता है उसके लिए आज्ञा है कि वह अल्लाह के रास्ते जिहाद के लिए खड़ा हो जाए. पहला जिहाद आर्थिक जिहाद है और फिर जरूरत पड़े तो जिस्म  और जिंदगी का जिहाद.


इसलिए सलमान खुर्शीद ने क्या लिखा इस पर बहुत आश्चर्य नहीं करना चाहिए. वह ऐसे अशराफ हैं जिनकी दिली चाहत है कि जितनी जल्दी हो सके पूरी दुनिया पर इस्लाम का शासन हो और ऐसा करने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार हैं. यह पहली बार नहीं है कि सलमान खुर्शीद ने हिंदुओं के विरुद्ध विषाक्त बयान दिया है या कुछ लिखा है. 1984 के दंगों में सिखों के बर्बर नरसंहार, जिसके केंद्र में स्वयं कांग्रेस  थी, के बाद भी उन्होंने एक किताब लिखी थी और उसका नाम था "एट होम इन इंडिया- रिस्टेटमेंट ऑफ इंडियन मुस्लिम". इस किताब में खुर्शीद ने लिखा था कि 1984 के दंगे बेहद दुखद है किंतु मुसलमानों के लिए बहुत बड़ा संदेश है कि भारत में कोई भी अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं है. 1947 के विभाजन के समय हिंदू और सिखों ने मिलकर मुसलमानों का कत्लेआम किया था, जिसे मुसलमान अभी भी नहीं भूले हैं और आज जब हिंदुओं ने सिखों का नरसंहार किया है, यह देखकर मुसलमानों के कलेजे को ठंडक पहुंची है. हिंदू और सिख दोनों को मुसलमानों का  रक्त बहाने के उनके पाप की सजा मिली है. सिखों  को श्रीमती गांधी की हत्या की सजा भी मिली है, जो जवाहरलाल नेहरू के बाद मुसलमानों की अंतिम आशा थी.


आसानी से समझा जा सकता है कि सलमान खुर्शीद, और जिन्ना की भाषा में अंतर हो सकता है लेकिन भावनाओं में नहीं. बटला कांड के बाद भी सलमान खुर्शीद का विलाप सामने आया था जिसमें उन्होंने कहा था कि जब उन्होंने बटला कांड के मृतकों की फोटो सोनिया गांधी को दिखाई  तो वह बिलख  बिलख  कर रो पड़ी. कश्मीर घाटी से हिंदू पंडितों के विस्थापन पर वह मौन  नहीं रहते, वे कहते हैं अगर घाटी से पंडित बेघर हुए तो  हुए, वह रह तो आज भी अपने देश में ही रहे हैं.

 

इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि  जवाहरलाल नेहरू अपनी  कपट पूर्ण नीति और उसे गांधी के समर्थन के कारण इस प्राचीन सनातन संस्कृति वाले देश को धर्मनिरपेक्षता का लबादा उढाने में  सफल हुए थे  और शायद यह सनातन धर्म और संस्कृति पर अब तक का सबसे बड़ा आक्रमण था. मुस्लिम लुटेरे आक्रमणकारियों, मुगलों और अंग्रेजो  द्वारा सनातन संस्कृति को इतना दुष्प्रभावित और नुकशान  नहीं किया जा सका था जितना स्वतंत्रता के बाद  हुआ है. यह नेहरू और गांधी ही थे जिन्होंने देश का विभाजन  स्वीकार करके हिंदू और मुसलमानों के लिए अलग अलग देश बनाना तो स्वीकार किया लेकिन सोची समझी रणनीति के कारण हिंदुओं के हिस्से  वाले देश से मुसलमानों को जाने नहीं दिया गया. यह कैसा विभाजन था ? इसलिए जब कुछ मुसलमान कहते हैं कि "हंस के लिया  पाकिस्तान, लड़के लेंगे हिंदुस्तान " तो उनकी बात में  दम नजर आता है और उसके पीछे नेहरू गांधी की यह  गलती या सोची समझी साजिश नजर आती है.

 

कई वर्ष पहले सीताराम गोयल ने अपनी किताब में लिखा था कि  जवाहरलाल नेहरू भारत में सनातन धर्म और संस्कृत पर आक्रमण करने वाले इस्लामिक जिहादियों,  क्रिस्चियन मिशनरियों और खतरनाक वामपंथियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए अगर देश को बचाना है तो हम सभी को नेहरूवाद से छुटकारा पाना  होगा. सीताराम गोयल द्वारा यह लिखें जाने के पहले ही डॉक्टर भीमराव अंबेडकर, जॉन मथाई, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे नेताओं ने जवाहरलाल नेहरू के बारे में बहुत सारे रहस्योद्घाटन किए थे, लेकिन एक संगठित अभियान के अंतर्गत इन सभी को किनारे कर दिया गया  था .  

 


सलमान खुर्शीद के बाद   कांग्रेस के एक अन्य नेता राशिद अल्वी भी मैदान में आ गए और उन्होंने कहा कि जय श्री राम बोलने वाले  राक्षस हैं. उनकी बात को और आगे बढ़ाने के लिए कांग्रेश के एक अन्य नेता मणिशंकर अय्यर, जो दून स्कूल में राजीव गांधी के सहपाठी भी रहे हैं, सामने आ गए और उन्होंने कहा कि मुगलों ने कभी भी धार्मिक आधार पर भेदभाव नहीं किया और न ही उन्होंने किसी धार्मिक स्थल को क्षति पहुंचाई. यह वही मणिशंकर अय्यर हैं जिन्होंने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए पाकिस्तान से समर्थन मांगा था. विडंबना देखिए सलमान खुर्शीद राशिद अल्वी और मणि शंकर अय्यर  तीनों ही सोनिया गांधी के अत्यंत करीबी व्यक्ति हैं, इसलिए इनकी बयानों को व्यक्तिगत बयान कहकर नहीं टाला जा सकता क्योंकि कांग्रेस और सोनिया गांधी समय-समय पर इन नेताओं का ऐसा ही इस्तेमाल करती रही हैं.



सलमान खुर्शीद की बात का समर्थन करने के लिए राहुल गांधी स्वयं मैदान में आ गए और उन्होंने भी हिंदुत्व पर अपना ज्ञान लोगों को दिया, जिस पर किसी ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की क्योंकि सभी राहुल गांधी के ज्ञान के बारे में परिचित हैं. आने वाले कुछ महीनों में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में चुनाव होने हैं, इसलिए ज्यादातर लोगों का मत है की चुनाव में वर्ग विशेष के वोट हथियाने के लिए जानबूझकर ऐसा किया गया लेकिन इससे सहमत नहीं हुआ जा सकता क्योंकि इन प्रदेशों  में केवल वर्ग विशेष के मतों के सहारे चुनाव नहीं जीता जा सकता और इतनी आसान सी बात सोनिया गांधी के सलाहकारों को भी मालूम होगी. फिर भी ऐसे समय जब वोटों के लालच में जनेऊ धारी राहुल गांधी वैष्णो देवी सहित अन्य मंदिरों की परिक्रमा कर रहे हो, और प्रियंका वाड्रा गंगा स्नान कर, चंदन लगाकर और शंकराचार्य की चरण वंदना कर स्वयं को विशुद्ध  हिंदू साबित करने की मुहिम चला रही हो, इन नेताओं के बयान कांग्रेश की जीत की मुहिम में करारा झटका साबित हो सकती है.

 

देश को  मुस्लिम शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष वसीम रिजवी का अनुग्रहीत होना चाहिए कि  उन्होंने आशा  की किरण बनकर  इस्लाम धर्म में व्याप्त बुराइयों को सामने लाकर समाज के पथ प्रदर्शन का काम किया है, जिसके लिए कट्टरपंथी मुस्लिमों की तरफ से  उन्हें धमकियां मिल रही हैं और उनकी जान को गंभीर खतरा है. वसीम रिजवी ने कुरान में लिखी  उन आयतों के खिलाफ भी आवाज उठाई है जो आतंकवाद और हिंसा को बढ़ावा देती  हैं. उन्होंने मदरसों पर तत्काल प्रतिबंध लगाने का सरकार से अनुरोध किया है. उनकी इस बात से कोई भी बुद्धिजीवी इनकार नहीं कर सकता कि भारत चाहे कितने ही आतंकवादियों को मार गिराये  लेकिन जब तक आतंकवाद की फैक्ट्री बने मदरसों पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता, भारत से आतंकवाद कभी खत्म नहीं हो सकता.


दुर्भाग्य से भारतीय जनता पार्टी ने भी  वसीम रिजवी की इस मुहिम का न केवल विरोध किया है बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार के एक मुस्लिम मंत्री दिन प्रतिदिन उनकी आलोचना करते रहते हैं. भाजपा और उत्तर प्रदेश सरकार को इससे बचना चाहिए और वसीम रिजवी को आवश्यक सुरक्षा तुरंत प्रदान करनी चाहिए ताकि उनके जैसे अन्य साहसी मुस्लिम व्यक्ति, इस्लामिक जिहाद के खिलाफ संघर्ष करने की हिम्मत कर सकें. सूचना प्रौद्योगिकी के इस क्रांतिकारी युग में सूचनाएं और अन्य पठन सामग्री पर रोक लगाना संभव नहीं है और इसीलिए आज कुरान के हिंदी रूपांतर, और अन्य ऐसी पुस्तकें आसानी से इंटरनेट पर उपलब्ध है जिन पर विभिन्न सरकारों ने रोक लगा रखी है.  इनमें अली सीना की अंडरस्टैंडिंग मोहम्मद, सलमान रशदी की शैतानिक वर्सेस, तस्लीमा नसरीन की लज्जा आदि प्रमुख पुस्तकें इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध है. वैसे तो सभी धार्मिक समुदायों को अन्य धर्मों को समझने के लिए उनकी पुस्तकें  पढ़नी चाहिए लेकिन हिंदुओं को इस्लाम से संबंधित इन पुस्तकों को अवश्य पढ़ना चाहिए ताकि वह किसी गलतफहमी के शिकार न रहे.

- शिव मिश्रा 

 

उप-चुनावों के सन्देश

 

उप-चुनावों  के सन्देश



हाल ही में संपन्न हुए उपचुनावों  का संदेश भाजपा के लिए खतरे की घंटी है । यद्यपि इन चुनावों ने कुछ ऐसे राज्यों में भाजपा को एक दो सीटें प्रदान की है जहां भाजपा का बहुत अधिक प्रभाव नहीं था लेकिन यह बिलुल भी संतोष की बात नहीं है  । उप चुनाव में सत्ताधारी दल को फायदा मिलना एक सामान्य बात  है, लेकिन हिमाचल प्रदेश जैसे भाजपा के  पुराने  गढ़ में सत्ताधारी  भाजपा की दर्दनाक पराजय होना इस बात को रेखांकित   करता है कि भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारें कहीं न कहीं गंभीर गलतियां कर रही है. हिमाचल में  कांग्रेस ने न केवल अपनी  सीटें बचाई बल्कि भाजपा से लोकसभा की एक  सीट ( मंडी) और विधानसभा की एक  सीट छीन ली. भाजपा कोई भी सीट जीतने में सफल नहीं हो सकी. सामान्यतः सत्ताधारी दल को इस तरह की परिस्थिति का सामना नहीं करना पड़ता है और हिमाचल प्रदेश तो भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा का गृह प्रवेश है. इस तरह की घटनाएं तभी सामने आती  हैं जब सत्ताधारी दल के विरुद्ध जनाक्रोश अपने चरम पर हो. ज्यादातर विश्लेषक भाजपा का बचाव करते हुए कहते रहते हैं कि  जनता विधानसभा और लोकसभा के लिए अलग-अलग तरह से वोट करती है, लेकिन ऐसे समय जब प्रदेश के चुनाव शीघ्र ही होने वाले हैं यहां लोकसभा सहित विधानसभा की सभी सीटें  हार जाना केंद्र और राज्य कि दोनों सरकारों  के लिए  एक बहुत बड़ा चेतावनी है.



 पश्चिम बंगाल में तो ऐसा लगता है कि भाजपा ने अपने आप को परिस्थितियों के हवाले छोड़ दिया है और यहां भाजपा लगातार अपने पराभव पर है. कोई बड़ी बात नहीं कि अगले लोकसभा चुनाव और उसके बाद विधानसभा चुनाव तक भाजपा अपने पूर्व स्थिति तक सिमट जाए, जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह सहित भाजपा का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह से जिम्मेदार है. पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने यहां की जनता को बहुत  सब्जबाग दिखाये,  प्रत्येक बूथ पर सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त भी किए लेकिन वावजूद इसके  केंद्र सरकार यह सुनिश्चित नहीं कर सकी कि मतदाता अपने घरों से बिना किसी हिचकिचाहट और डर के मतदान के लिए निकल सके. इसका परिणाम यह हुआ कि ऐसे मतदाता जो टीएमसी के विरोध में मत करना चाहते थे अपने घरों से ही नहीं निकल सके. कई विश्लेषकों ने यह स्पष्ट किया है कि अगर  केंद्र सरकार मतदाताओं को उनके घर से निकलना सुनिश्चित कर सकती तो संभव था भाजपा पश्चिम बंगाल में सरकार बना सकती थी.

यद्यपि पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार नहीं बना सकी लेकिन विधानसभा में उसकी संख्या और प्राप्त मत प्रतिशत  में भारी वृद्धि हुई, फिर भी  जनता को जिसका डर था,वह  तृणमूल कांग्रेस की विजय के बाद सामने आ गया. पूरे प्रदेश में हत्या, लूटपाट, बलात्कार और  पलायन के वैसे ही दृश्य देखने को मिले जैसे देश के बंटवारे के समय देखने को मिले  थे. केंद्र सरकार ने ना तो कोई प्रभावी कार्यवाही की और ना ही प्रदेश की जनता को सांत्वना देने और उसका विश्वास बहाल करने के लिए कोई कदम उठाया. यहां तक कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने हत्या, बलात्कार और आगजनी की घटनाओं की  ना तो खुलकर निंदा की और ना ही जनता को सांत्वना देने के लिए कोई बयान दिया. बात बात पर ट्वीट करने वाले और मन की बात में पूरे देश को समेटने की कोशिश करने वाले प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल की घटनाओं पर एक ट्वीट तक नहीं किया. इसका परिणाम यह हुआ कि प्रदेश की भलाई के लिए भाजपा से जुड़ने  वाले बड़े नेता और कार्यकर्ता अपनी जान बचाने के लिए बेहद मजबूरी और निराशा में भाजपा छोड़कर पुनः तृणमूल कांग्रेस की शरण में चले गए और यह सिलसिला अनवरत चल रहा है. पश्चिम बंगाल में  भाजपा द्वारा अपनाए गए इस रवैये  का क्या कारण है, यह आज तक रहस्य बना हुआ है और इसने  पूरे देश के बुद्धिजीवियों को हैरान किया और भाजपा के प्रति समर्पित या सहानुभूति रखने वाले सभी देशभक्तों को बेहद निराश किया. 

कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने के बाद भी वर्तमान मुख्यमंत्री के गृह जिले की सीट भी भाजपा नहीं जीत सकी यह भी चिंता का बड़ा कारण होना चाहिए. राजस्थान में तमाम उठापटक के बाद भी गहलोत सरकार ने बड़े अंतर से विधानसभा की सीटें जो भाजपा के पास थी जीत ली.  भाजपा ने तेलंगाना में एक सीट जीतकर राज्य में आशा की किरण जगाई है लेकिन भाजपा के लिए सबसे अधिक सफलता असम मैं मिली जहां मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा के नेतृत्व में राज्य की सभी 5 सीटों पर विजय मिली. मध्यप्रदेश में भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भाजपा के साख बचाने में सफल रहे.

भाजपा के इस निराशाजनक प्रदर्शन के पीछे सबसे बड़ा कारण है, जिस पर सबसे कम बहस होती है वह है "सबका विश्वास" जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 के लोकसभा चुनाव की जीत के बाद "सबका साथ, सबका विकास" के साथ जोड़ दिया है. यह कोई छिपी  बात नहीं है  कि सबका विश्वास जोड़ने का  मतलब मुस्लिम समुदाय का विश्वास प्राप्त करना है. इससे सनातन संस्कृति के प्रति आस्था रखने वाले और हिंदूवादी शक्तियों को बेहद निराशा हुई है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख श्री मोहन भागवत  द्वारा भी इसी तरह के प्रयास किए जा रहे हैं.  उनके भी कई वक्तव्य हिंदुओं में घोर निराशा का कारण बने हैं. संघ प्रमुख ने अभी हाल ही  पुणे स्थित ग्लोबल स्ट्रैटेजिक पॉलिसी फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था  कि हिंदुओं और मुसलमानों के पूर्वज एक ही हैं, और हमारी मातृभूमि और गौरवशाली अतीत हमारी एकता का आधार है। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दूरी अंग्रेजों द्वारा पैदा की गई थी . इसके पहले भी वह मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के सम्मेलन में कह चुके हैं कि हिंदू और मुस्लिमों का डीएनए एक है, हिंदू मुस्लिम भाई भाई हैं और हमें मिलजुलकर इस राष्ट्र को आगे बढ़ाना है. इन सब बातों से न तो कोई इनकार  कर सकता है  और ना ही असहमत हो सकता है, लेकिन वास्तविकता बिलकुल अलग है . उन्होंने यह भी कहा की लिचिंग हिंदुत्व के खिलाफ है और लिंचिंग करने वाले हिंदू नहीं हो सकते और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए. ऐसा कहकर  उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से हिंदुओं द्वारा लिंचिंग करना स्वीकार कर लिया.

भाजपा और संघ दोनों के इस दृष्टिकोण में भाजपा को समर्थन देने वाले एक बहुत बड़े पर्व में निराशा पैदा करने का काम किया है. हिंदुओं के एक बड़े वर्ग जो शुरू से ही भाजपा के प्रति समर्पित है और भाजपा को समर्थन करता है, का यह मानना है कि भाजपा ने स्वयं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के माध्यम से वोटों के लालच में मुस्लिमों को लुभाने का कार्य शुरू कर दिया है जो कुछ और नहीं कांग्रेस और अन्य दलों द्वारा किया जाने वाला मुस्लिम तुष्टिकरण ही  है. अभी तक भाजपा को अन्य दलों से इसलिए अलग माना जाता था कि वह हिंदुओं का  समर्थन करने वाला एकमात्र राजनीतिक दल है. बहुत से ऐसे हिंदू भी जो भाजपा की नीतियों और सरकार की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं होते वह भी हिंदूवादी पार्टी होने के कारण परंपरागत रूप से भाजपा को वोट देते हैं. अगर कोई अन्य हिंदूवादी पार्टी होती तो निश्चित रूप से ऐसे लोग भाजपा विकल्प के रूप में उसे वोट देते.   ऐसे लोग भी अब सोचने लगे हैं कि  जब भाजपा भी अन्य दलों की तरह मुस्लिम तुष्टिकरण की राह पर चलने लगे तो फिर उसे वोट देने का क्या औचित्य. ऐसा सोचने  वाले लोगों की संख्या बहुत बड़ी है और अगर भाजपा ने विशाल हिंदू जनमानस की इस संवेदनशीलता पर अति शीघ्र ध्यान नहीं रखा तो आगामी सभी चुनाव में उसे व्यापक नुकसान के लिए तैयार रहना चाहिए.

 दुनिया में जितने भी इस्लामिक  या मुस्लिम बाहुल्य  देश हैं वहां लोकतंत्र नहीं है क्योंकि उनका लक्ष्य धार्मिक कानून (सरिया) लागू  करना होता है. भारत ही नहीं, यदि पूरे वैश्विक परिवेश में  देखे तो एक बात अत्यंत ध्यान देने योग्य है कि जो सरकार मुस्लिम मतों के आधार पर बनती है, वह राष्ट्र के लिए काम नहीं कर सकती. इसका सीधा और स्पष्ट कारण यह है कि ऐसी सरकारें मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मजहबी कट्टरपंथ को बढ़ावा देने का कार्य करती है जो आगे चलकर राष्ट्र की मूल संस्कृति को नष्ट करके इस्लामिक राष्ट्र बनने का मार्ग प्रशस्त करती  हैं. भारत इसका जीता जागता उदाहरण है.अंग्रेजों के शासन से लेकर अब तक आए ज्यादातर सरकारें मुस्लिम तुष्टिकरण की राह पर चलती रही है, जिसके कारण आज देश एक ऐसी विषम परिस्थिति में खड़ा हो गया है जहां राष्ट्र मजहबी  कट्टरपंथ और उन्माद  के ज्वालामुखी पर बैठकर आतंकवाद अलगाववाद से जूझ रहा है. कश्मीर और केरल में क्या हुआ यह हम सभी ने देखा और यह भी देख रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में कैसे जनसंख्या घनत्व बड़ी तेजी से परिवर्तित हो रहा है. नेपाल की सीमा से लगे हुए उत्तर प्रदेश और बिहार के जिलों में खुले अनगिनत मदरसों में आतंक की फैक्ट्रियां चल रही है जिन्हें रोके बिना आतंकवाद पर लगाम लगाना मुश्किल है. धर्मांतरण, लव जिहाद और अन्य कई तरीकों से मुस्लिम आबादी बढ़ाने के युद्ध स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश शिया मुस्लिम वक्फ  बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष वसीम रिजवी जैसे लोग  साहस का परिचय देते हुए लोगों को जागरूक कर रहे हैं कि कुरान में बाद में जोड़ी गई कुछ आयते   वैश्विक स्तर पर इस्लामिक उन्माद बढ़ा रही है और आतंकवाद का वातावरण तैयार कर रही है. एक यूट्यूब चैनल को इंटरव्यू देते हुए उन्होंने बताया उत्तर प्रदेश और बिहार के नेपाल सीमा से जुड़े कुछ जिलों में मदरसों की बाढ़ आ गई है जिनमें आतंकवाद की फैक्ट्रियां चलाई जा रही हैं. उन्होंने स्वयं कुछ मदरसों का दौरा करके इसकी समीक्षा की और सरकार से इन मदरसों के विरुद्ध सख्त कार्यवाही करने और उन्हें बैन करने की मांग की है. दुर्भाग्य से  भाजपा ने शाहनवाज हुसैन जेथे राष्ट्रीय प्रवक्ता  को मैदान में उतारकर वसीम रिजवी कि न केवल आलोचना की बल्कि उनके  विरुद्ध मोर्चा भी खोल दिया. आज वसीम रिजवी मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं और पूरे समाज को जागृत करने का काम कर रहे हैं कि कैसे मुस्लिम समाज के कुछ स्वार्थी तत्व मदरसों तथा अन्य धार्मिक संस्थाओं  की आड़ में राष्ट्र के विरुद्ध जिहाद चला रहे हैं. सरकार उनकी बातों पर ध्यान भले ही ना दें लेकिन सोशल मीडिया के इस युग में उनकी बातें न केवल ध्यान से सुनी जा रही है, बल्कि उनके वायरल प्रसारण के कारण सुखद परिणाम भी सामने आने लगे हैं. भाजपा और केंद्र  सरकार अभी भी सबका विश्वास प्राप्त करने के अभियान में जुटी है. वसीम रिजवी की इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भाजपा चाहे सिर के बल खड़ी हो जाए उसे मुस्लिम समुदाय के वोट नहीं प्राप्त हो सकते.

आज सनातन संस्कृति  के समक्ष गंभीर चुनौती उत्पन्न हो गई है और  संकट दिन प्रतिदिन गहराता जा रहा है. ऐसे में भाजपा अगर सब का विश्वास जीतने के प्रयास में लगे रहे तो उसे बहुसंख्यक वर्ग का विश्वास होना पड़ सकता है और इसका परिणाम यह होगा कि भाजपा "पुनः  मूषक: भव" होने   के लिए अभिशप्त हो जाएगी.


- शिव मिश्रा 

लेखक  आर्थिंक सामाजिक और सम सामायिक विषयों के लेखक  हैं .

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