गुरुवार, 13 मई 2021

कोरोना की तीव्रता और न्यायपालिका की सक्रियता

 



( ये लेख मैंने एक हिन्दी साप्ताहिक "माधव भूमि" के लिए लिखा था जो कुछ विलम्ब से १८ मई २०२१ के अंक में प्रकाशित हुआ है, फोटोप्रति लेख के नीचे दिया गया है )

कोरोना की तीव्रता  और  न्यायपालिका की सक्रियता 

 

पिछले साल  चीनी वायरस कोरोना  का संक्रमण  प्रभावी ढंग से रोकने के लिए भारत सरकार की पूरे विश्व में सराहना की गई थी. ऐसी स्थिति में जब भारत में स्वास्थ्य ढांचा विकसित देशों के मुकाबले लगभग न के बराबर था, भारत में कोरोना  महामारी  रोकने का सबसे प्रभावी उपाय बना था लॉकडाउन, जिसके कारण  व्यापक जन हानि से बचा जा सका  था . यद्यपि लॉकडाउन के दुष्परिणाम  स्वरूप  अर्थव्यवस्था को बहुत गहरी चोट लगी थी, लेकिन  “जान है तो जहान है”  के  मोदी मंत्र  ने मानवीय  जीवन को अर्थव्यवस्था से ज्यादा महत्व दिया  था  और ये भारत जैसी प्राचीन सनातन देश की परंपरा के अनुरूप ही था. सनातन परंपरा के  अभिवादन  दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार करने का प्रचलन विश्व के अनेक देशों में शुरू हो गया. भारतीय आयुर्वेदिक दवाओं   और प्राचीन घरेलू  नुस्खों ने भी  सामान्य लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान भी मिली  और इस कारण बहुत से लोगों को संभवत:  संक्रमण हुआ भी होगा, जिसका पता भी नहीं चला  और वह अपने आप ठीक हो गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  अनेक  देशों को  कोरोना संक्रमण में प्रभावी दवाओं की खेप  भेज कर वसुधैव कुटुंबकम का  परिचय  दिया था  जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत ने काफी ख्याति अर्जित की लेकिन भारतीय विपक्ष ने भारत की इस उपलब्धि को सिरे से नकारते हुए   सामान्य दिनों से कहीं ज्यादा सरकार का विरोध   करना जारी रखा.

 

लम्बे  लॉकडाउन  और इस अति आत्मविश्वास के कारण  ज्यादातर लोगों ने  जनवरी  2021 के आरंभ से ही सहज  और सामान्य जीवन  जीना शुरु कर दिया था. जनमानस में  ऐसा माना  जाने लगा था  कि कोरोना  पर भारत ने विजय प्राप्त कर ली है  और इसी बीच कोरोना के लिए दो भारतीय  वैक्सीन भी  उपलब्ध हो चुकी थी  जिसमें एक पूर्णतया भारतीय थी और दूसरी ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सहयोग से बनाई जा रही थी. लोगों का आत्मविश्वास लौट आया था.   केंद्र सरकार  और राज्य सरकारों ने लॉकडाउन की अवधि का इस्तेमाल स्वास्थ्यगत  ढांचा की क्षमता बढ़ाने  में  किया.  इस समय दुनिया के कई विकसित देशों में कोरोना महामारी की दूसरी लहर चल रही थी और जिससे व्यापक जनहानि हुई थी.  जिसे देखते हुए केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को  राज्य के अनुरूप  योजनाएं बनाने और नए ऑक्सीजन प्लांट लगाने हेतु अनुरोध किया था और इसके लिए पीएम केयर्स फंड से धनराशि भी प्रदान की गई थी.  कई राज्यों ने इस दिशा में अच्छा कार्य किया लेकिन दिल्ली जैसे कई राज्य  आत्ममुग्ध होकर अपना गुणगान करने में ही लगे रहे. 


भारत में कोरोना की दूसरी लहर का आगाज मार्च के मध्य में शुरू हुआ और होली का त्यौहार आते आते इसका व्यापक असर दिखाई पड़ने लगा था, जिसके कारण  केंद्र द्वारा  व्यापक दिशा निर्देश दिए गए थे और राज्य सरकारों को  इस नई चुनौती का सामना करने के लिए तैयार रहने को कहा गया था.  अप्रैल में कोरोना महामारी ने कहर बरपाना शुरू कर दिया . कोरोना वायरस  का नए   वेरिएंट  ब्रिटेन और साउथ अफ्रीका के थे जो अपेक्षाकृत बहुत तेज   संक्रमण फैला रहे थे.  इसके अलावा पश्चिम बंगाल और विशाखापट्टनम  से एक नए वेरिएंट का भी आगाज हुआ जिसे  B.1.617 कहा  गया है, वह विश्व के 44 देशों में देखा गया है  जहां इस वैरिएंट ने   अत्यंत विकराल रूप धारण किया और व्यापक जनहानि की. भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में जहां अमेरिका की तुलना में जनसंख्या घनत्व बहुत ज्यादा है, इस तरह की महामारी फैलने की संभावना कहीं ज्यादा होती है, कोरोना  वायरस के कई वेरिएंट्स  और डबल  म्यूटेंट  ने मिलकर भारत में स्वास्थ्य ढांचे को चरमरा दिया.  इसके कारण प्रारंभ में  दिल्ली, महाराष्ट्र, और केरल जैसे राज्य लड़खड़ा गए वहीं बाद में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु भी इससे बुरी तरह से प्रभावित हो गए. ज्यादातर राज्य  ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहें हैं  और इसके कारण अचानक ऑक्सीजन की इतनी मांग बढ़ गई, जिसे उद्योगों को ऑक्सीजन की आपूर्ति रोक कर भी अभी तक पूरा नहीं किया जा सका है.  

 

विपक्ष शासित राज्यों, विशेष  रूप  से दिल्ली सरकार ने  ऑक्सीजन के लिए न केवल अनावश्यक हो हल्ला मचाया  बल्कि केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय भी पहुंच  गई.  दिल्ली सरकार के इशारे पर कई अस्पताल भी उच्च न्यायालय पहुंच गए.  यह सही है कि देश में ऑक्सीजन की कमी थी लेकिन चारों तरफ से ऑक्सीजन की कमी के  शोर के कारण  लोगों ने ऑक्सीजन का  अनावश्यक भंडारण शुरू कर दिया. आपदा में अवसर तलाशने वाले कई  जमाखोर  सक्रिय हो गए और देखते ही देखते ऑक्सीजन सहित कई महत्वपूर्ण दवाइयों की भी कालाबाजारी शुरू हो गई.  इतनी भयंकर महामारी के समय में  भारतीय समाज का इतना गिरा हुआ  क्रूर चेहरा  शायद पहले कभी नहीं देखा गया. 

 

विभिन्न उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में  कोरोना  महामारी  को  लेकर  कई जनहित याचिकाएं दायर की गई.  कुछ उच्च न्यायालयों  ने मामलों का स्वत संज्ञान लेकर सुनवाई शुरू कर दी. ज्यादातर उच्च न्यायालयों  ने अपने अपने राज्य को अधिक से अधिक ऑक्सीजन का कोटा देने के लिए केंद्र सरकार  को निर्देश दिए. दिल्ली की केजरीवाल सरकार के नाट्य  प्रस्तुतीकरण पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार को 700 मीट्रिक टन ऑक्सीजन दिल्ली को देने का निर्देश दिया जो उत्तर प्रदेश को मिल रहे 900 मीट्रिक टन ऑक्सीजन जिसकी जनसंख्या दिल्ली  की तुलना में  13 गुनी अधिक है, की तुलना में बहुत थोड़ा कम है.  आसानी से समझा जा सकता है कि न तो ऑक्सीजन का उत्पादन रातों-रात बढ़ाया जा सकता था और न ही तुरत फुरत किसी राज्य में  ऑक्सीजन पहुंचाई जा सकती थी क्योंकि ऑक्सीजन के प्लांट दूरस्थ स्थानों पर स्थित है और दिल्ली  जैसे कुछ राज्य  होम डिलीवरी की अपेक्षा कर रहे थे और  उच्च न्यायालय के माध्यम से  उन्होंने केंद्र सरकार को होम डिलीवरी करने के लिए मजबूर भी कर दिया.  

 

दिल्ली को ऑक्सीजन देने की सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली और केंद्र सरकार के विरुद्ध काफी सख्त टिप्पणियां भी की  जिसका औचित्य समझना मुश्किल है.  मद्रास उच्च न्यायालय ने तो चुनाव आयोग के खिलाफ सख्त टिप्पणी करते हुए उनके विरुद्ध हत्या का  मुकदमा दर्ज करने की भी धमकी दी.  प्रयागराज उच्च न्यायालय  ने तो उत्तर प्रदेश सरकार को 5 शहरों में लॉकडाउन लगाने का  निर्देश जारी कर दिया जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी और उस पर रोक लगाई जा सकी.  प्रयागराज उच्च न्यायालय ने ही  पंचायत चुनाव में कोरोना  प्रोटोकॉल का पालन न करवा पाने  और उसके कारण हुए  संक्रमण  पर  चुनाव आयोग के विरुद्ध तीखी टिप्पणियां की.  यहां यह भी एक तथ्य है कि उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव उच्च न्यायालय के आदेश देने के  के कारण ही कराने पड़े थे  अन्यथा पंचायत चुनाव  तय समय से कुछ महीने बाद होने से लोकतंत्र खतरे में नहीं पड़ता, लेकिन चुनाव कराने के कारण करोड़ों लोगों का जीवन  कोरोना के खतरे के साये  में है.  उत्तर प्रदेश के गांवों  में  फ़ैली  कोरोना महामारी  प्रथम दृष्टया पंचायत चुनाव के कारण ही फैली है और दूसरा कारण है अहमदाबाद, दिल्ली और मुंबई से  पलायन कर आए श्रमिक.  कोलकाता उच्च न्यायालय ने भी   कोरोना संक्रमण पर सरकार और चुनाव आयोग के विरुद्ध टिप्पणियां की. 

 

इस समय सर्वोच्च न्यायालय देश की वैक्सीन नीति को लेकर सुनवाई कर रहा है जिसके लिए केंद्र सरकार ने एक हलफनामा दाखिल किया है.  इस हलफनामा में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया है कि न्यायपालिका को  अति उत्साह से बचना चाहिए और ऐसे मामले जिनमें विशेषज्ञ परामर्श की आवश्यकता होती है, अपने हाथ में लेने से बचना चाहिए.   केंद्र सरकार का यह अनुरोध बिल्कुल उचित प्रतीत होता है क्योंकि न्यायपालिका इस तरह के मामलों में दखल देकर कार्यपालिका के हाथ बांधने का काम कर रही है, जिसे इस महामारी के समय अपना पूरा ध्यान संकट से उबरने में लगाना चाहिए. 

 

न्यायपालिका को अपना संवैधानिक उत्तरदायित्व निभाते हुए कार्यपालिका को दिशा निर्देश देने का अधिकार है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि न्यायपालिका हर मामले की विशेषज्ञ नहीं हो सकती और  केवल निर्देश दे देने मात्र से किसी बड़े संकट का समाधान नहीं हो सकता क्योंकि हर संकट के लिए विशेषज्ञ नीति और क्रियान्वयन की आवश्यकता होती है. संकट के समय जहां न्यायपालिका की सक्रियता की प्रशंसा की जानी चाहिए, वहीं  न्यायपालिका से यह अपेक्षा है कि वह कार्यपालिका के कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप करके संकट के समाधान में व्यवधान न बने.  कई विपक्षी राजनीतिक दल और विपक्षी राज्य सरकारें अपनी असफलताओं को छुपाने के लिए न्यायपालिका से अनावश्यक और अनुचित हस्तक्षेप के लिए आग्रह कर रही हैं,  न्यायपालिका को इसे अच्छी तरह  समझना चाहिए  और अनावश्यक हस्तक्षेप से परहेज करना चाहिए. 


भारत की न्याय व्यवस्था की हालत भी  बहुत अच्छी तो नहीं कही जा सकती है क्योंकि   सामान्य जनमानस इससे बुरी तरह खिन्न और परेशान है. आम आदमी  में यह धारणा घर कर गई है कि चूंकि न्याय मिलना आसमान से तारे तोड़ने जैसा है, इसलिए जहां तक संभव हो सके कोर्ट कचहरी के चक्कर में ही न पड़ा जाए. इसलिए वह दिल पर पत्थर रख लेता है लेकिन कोर्ट कचहरी की तरफ जाने में हजार बार सोचता है, और जाता भी तभी है जब किसी ने उसे खुद ही घसीट लिया हो. अच्छा हो कि हमारी  न्यायपालिका भारतीय जनमानस की इस व्यथा को समझे और व्यापक सुधार के लिए कदम उठाए. मुझे याद नहीं आता कि न्यायपालिका ने स्वयं आगे आकर कार्यपालिका को कोई सुझाव दिया हो कि न्यायपालिका में लंबित  करोड़ों  मामले शीघ्र कैसे निपटाए जा सकते हैं और इस दिशा में क्या किया जाना चाहिए ?  न्यायालयों में अंग्रेजों के जमाने की पुरानी व्यवस्था चल रही है. अंग्रेज न्यायाधीश गर्मियों में अपने देश ब्रिटेन वापस चले जाते थे और सर्दियों में क्रिसमस मनाने भी अपने देश वापस चले जाते थे ये  छुट्टियां आज भी लगभग उसी तरह चल रही है.   लंबित मामलों का ढेर लगता चला जा रहा है. न्यायपालिका को इस बारे में  तुरंत ध्यान देना चाहिए .

 

राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड पर उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि  भारत में उच्च न्यायालय, जिला न्यायालय और तालुका अदालतों में लगभग  3.77 करोड़  मामले लंबित हैं, जिनमें से करीब 37 लाख मामले पिछले 10 सालों से लंबित पड़े हुए हैं, इसमें 28 लाख मामले जिला और तालुका अदालत में  और  9.20 लाख मामले  उच्च न्यायालयों  में लंबित हैं।  यह भी बेहद चौंकाने वाला है कि 1.31 लाख मामले 30 सालों से  और 6.60 लाख से ज्यादा मामले पिछले 20 सालों से लंबित हैं। उच्च न्यायालय में स्थिति जिला न्यायालय से भी खराब है. देश भर में 25 उच्च न्यायालयों के समक्ष 47 लाख से अधिक मामले लंबित हैं। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पीढ़ियां गुजर जाती हैं लेकिन  वर्तमान न्याय प्रणाली से न्याय नहीं मिलता. 

सर्वोच्च न्यायालय भी स्वत: संज्ञान में कितने ही मामलों की सुनवाई करता है, कितनी ही  जनहित याचिकाओं की प्राथमिकता  के आधार पर  सुनवाई करता है लेकिन  समय  आ गया है जब सर्वोच्च न्यायलय इस बात की स्वत: सुनवाई करे  कि करोड़ों की  संख्या में  लंबित इन मुकदमों का भविष्य कैसे तय किया जाए ? न्यायपालिका के प्रति विश्वास और सम्मान कैसे स्थापित किया जाए ?

देश हित में उचित यही होगा कि न्यायपालिका अपने संवैधानिक दायित्वों का पालन करें और  कार्यपालिका  को जहां जरूरी हो उचित दिशा निर्देश अवश्य  दें लेकिन  न्यायपालिका का जो प्राथमिक दायित्व है   उस दिशा में भी सकारात्मक और सार्थक कदम शीघ्र ही उठाए जाने की अपेक्षा जनता लंबे समय से कर रही है. 





मंगलवार, 11 मई 2021

क्या चीनी वायरस की इस महामारी में सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट जरूरी है ?

 

इस समय सोशल मीडिया में भारत विरोधी गैंग सक्रिय है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि धूमिल करने के लिए केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टारगेट किया जा रहा है. ऐसा करने वाले ज्यादातर वह लोग हैं जो या तो भावनाओं में बह जाते हैं या कुछ उपकार के बदले अपने आपको बेच देते हैं।

यह प्रश्न भी इसी कड़ी में बिना सिर पैर का प्रश्न है, जो महामारी की इस मुसीबत के समय लोगों में सरकार के प्रति रोष पैदा करने के उद्देश्य किया गया लगता है.

आइये समझते हैं -

सेंट्रल विस्ता प्रोजेक्ट एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है जिसकी परियोजना लागत लगभग 20000 करोड रुपए हैं और जिसे लगभग 7 से 8 वर्ष में पूरा किया जाना है। इसमें सारी धनराशि एक बार में खर्च नहीं की जानी है पर यह अगले लगभग 8 साल में किया जाने वाला खर्चा है.

इस धनराशि से भी बड़े-बड़े घोटाले पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में किए गए थे, कोई यह पूछने की हिम्मत नहीं करता कि अगर वह घपले घोटाले नहीं हुए होते और उस धनराशि का निवेश स्वास्थ्य सेवाओं के लिए किया जाता तो आज भारत का स्वास्थ्य ढांचा बहुत अच्छा होता ?

  • सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट में रायसीना हिल के लगभग 3 किलोमीटर लंबे राष्ट्रपति भवन से लेकर इंडिया गेट तक के क्षेत्र को विकसित करने की योजना है इसके अंतर्गत संसद भवन, सांसदों के कार्यालय, केंद्रीय सचिवालय, एसपीजी कार्यालय, प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति के कार्यालय व निवास, सेंट्रल कॉन्फ्रेंस सेंटर, आदि अनेकों कार्यालय शामिल है.
    • इसमें वह कार्य भी शामिल है जिसके अंतर्गत पुराने संसद भवन नॉर्थ और साउथ ब्लॉक के कार्यालय को म्यूजियम में परिवर्तित किया जाना है.
    • पुराना संसद भवन 100 वर्ष से अधिक पुराना हो गया है और इसकी क्षमता सीमित है. कालांतर में संसद सदस्यों की संख्या बढ़ेगी इस को ध्यान में देते हुए अतिरिक्त सांसदों के बैठने की व्यवस्था भी होगी और उनके कार्यालय के लिए भी स्थान आरक्षित किया जाएगा.
  • सबसे बड़ी बात यह है कि इस 20000 करोड़ की परियोजना में 50 से 60% राशि सिर्फ मजदूरी के रूप में श्रमिकों को भुगतान की जाएगी। बची हुई राशि में निर्माण सामग्री आदि शामिल होगी जिस पर भी लगभग 28% तक जीएसटी शामिल होगा जो सरकार को वापस मिल जाएगा.
  • कोरोना महामारी के इस दौर में जहां ज्यादातर आर्थिक गतिविधियां बंद होने के कारण श्रमिक बेरोजगार होने की कगार पर है, सेंट्रल विस्ता प्रोजेक्ट सैकड़ों श्रमिकों को लगातार रोजगार उपलब्ध कराता रहेगा और जिसके कारण इस समय भी इसका महत्व बन जाता है.
  • रही बात प्रधानमंत्री निवास कि वह इस पूरी परियोजना का एक छोटा सा हिस्सा है और वह नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत जागीर बनने नहीं जा रही है बल्कि वह प्रधानमंत्री का निवास होगा और सत्ता परिवर्तन के साथ प्रधानमंत्री आते और जाते रहेंगे.
  • इससे प्रधानमंत्री निवास के रूप में भवनों का दुरुपुयोग रुकेगा जैसा कि कांग्रेस के समय किया गया था कि जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के निवासों को स्मारकों में बदल दिया गया था .
  • प्रधानमंत्री आवास बन जाने के बाद इसका महत्व राष्ट्रपति भवन की तरह होगा और पद त्याग करते समय ही प्रधानमंत्री को यह आवास खाली करना पड़ेगा जिससे भविष्य में धन की बर्बादी रुकेगी.
  • जहां तक प्रश्न चीनी वायरस के कारण उपजी महामारी के लिए स्वास्थ्य संसाधनों की आवश्यकता का है, उसके लिए धनराशि की कमी नहीं है.
  • अकेले वैक्सीन लगाने के लिए चालू वित्त वर्ष के बजट में 35 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है. बजट में स्वास्थ्य संसाधनों पर 3 लाख करोड़ से अधिक का प्रावधान किया गया है.
  • इसलिए भारत की आर्थिक स्थिति इतनी खराब नहीं है कि किसी परियोजना की धनराशि को कोरोना में खर्च करने की मजबूरी आ पड़े.
  • सेंट्रल विस्टा के अलावा पूरे देश में राष्ट्रीय राजमार्गों और अन्य मूलभूत संरचना की परियोजनाएं कोरोना प्रोटो काल का पालन करते हुए इसी उद्देश्य से चलाई जा रही हैं ताकि श्रमिकों को रोजगार भी मिलता रहे और अर्थ चक्कर भी घूमता रहे.

इसलिए लोगों को अफवाहों और भारत विरोधी मानसिकता से सावधान रहना चाहिए .

भारत में लोग बिकते रहें हैं और बिकते रहेंगे, क्योंकि बिकना कुछ लोगों की फितरत है. इसलिए सावधानी ही एकमात्र उपाय है जो आपको और देश को बचा सकती है

रविवार, 9 मई 2021

हिमंत विस्व सरमा असम में भाजपा के मजबूरी के मुख्यमंत्री हैं या स्वाभाविक मुख्यमंत्री ?

 


भारत के कुछ लोगों के दिमाग को , जिसमें विपक्षी पार्टियों के कुछ नेता भी शामिल हैं, भाजपा और मोदी विरोध के वायरस ने बुरी तरह संक्रमित कर रखा है, इस कारण लगातार भाजपा विरोध के लिए अजीबोगरीब कुतर्क ढूंढ कर अनाप-शनाप बोलते रहते हैं. इसलिए ही वे हेमंत विश्व सरमा को असम के नए मुख्यमंत्री के रूप में भाजपा के नवनिर्वाचित विधायकों द्वारा चुनने को वह भाजपा के मजबूरी के मुख्यमंत्री के रूप में परिभाषित कर रहे हैं.

कांग्रेस ने तो यहां तक कह डाला कि भाजपा के इतने दुर्दिन आ गए हैं कि उसे दूसरी पार्टियों से आए थे नेताओं को मुख्यमंत्री बनाना पड़ रहा है.

सभी लोगों को मालूम होगा कि हेमंत विश्व सरमा ने 2016 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे. कांग्रेस छोड़ने के लिए हेमंत विश्व सरमा ने एक घटना का जिक्र किया था. असम की समस्याओं पर विचार करने के लिए वह कांग्रेस पार्टी हाईकमान से मिलना चाह रहे थे बहुत दिनों बाद तो उनको राहुल गांधी से मिलने के लिए कहा गया और जब मिलने पहुंचे तूने बहुत इंतजार करवाया गया और इंतजार के बाद भी जब वह राहुल से मिले तो राहुल लगातार अपनी पिद्दी ( राहुल के डॉगी का नाम) को बिस्कुट खिलाते रहे और उसी से बात करते रहे। इससे हेमंत विश्व शर्मा बहुत आहत हुए और उन्होंने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया और भाजपा में शामिल हो गए.

2016 में उन्होंने विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए सर्वानंद सोनोवाल के साथ मिलकर अथक मेहनत की और भाजपा ने पहली बार असम में अपनी सरकार बनाई. न केवल असम बल्कि पूर्वोत्तर के कई राज्यों में हेमंत विश्व सरमा भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने में सहायता की. वह पूर्वोत्तर में एनडीए के संयोजक हैं और उन्हें पूर्वोत्तर का चाणक्य भी कहा जाता है.

हिमंत बिस्वा सरमा असम की जालुकबारी विधानसभा सीट से लगातार पांचवीं बार विधायक बने हैं, उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार को 101911 वोटों के अंतर से हराया उन्हें 77% मत मिले जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है. मजे की बात यह है कि हेमंत विश्व शर्मा नामांकन कराने के बाद कभी भी अपनी चुनाव क्षेत्र में प्रचार के लिए नहीं जाते हैं, केवल मतदान के मात्र घंटे पहले व्यवस्था देखने जाते हैं और हमेशा उनके रिकॉर्ड जीत होती रही है.

असम में कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के साथ गठबंधन किया था और राहुल गांधी ने अजमल को असम की पहचान बताया था. अजमल ने भी घोषणा कर दी थी कि असम में अबकी बार टोपी लुंगी की सरकार बनेगी. इसके जवाब में हेमंत विश्व शर्मा ने नारा दिया था “ मियां बनाम असमिया” और परिणाम सबके सामने है .

असम में बीजेपी की रैलियों में एक गाना गूंजता था "आहिसे, आहिसे, हिमंतो आहिसे." इसका मतलब है "आएगा, आएगा, हिमंत आएगा." इस चुनाव में बीजेपी ने यद्दपि मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित नहीं किया था लेकिन इस नारे ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था .

कांग्रेस अपनी गलतियों से नहीं सीखती जिन कारणों से हेमंत विश्व सरमा ने कांग्रेसी छोड़ी थी उन्हीं कारणों से ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी कांग्रेस छोड़ी और सचिन पायलट लगभग छोड़ते छोड़ते बच गए.

  • कांग्रेस द्वारा भाजपा पर यह आरोप लगाना कि उन्होंने एक आयातित नेता को असम का मुख्यमंत्री बनाया है, जो मजबूरी के मुख्यमंत्री हैं, केवल खीज मिटाना है, एक तो पार्टी चुनाव नहीं जीत सकी और मुख्यमंत्री भी पार्टी का बागी बना जो असम में पार्टी का बचा खुचा आधार भी ख़त्म कर देगा .
  • सही अर्थों में हेमंत विश्व शर्मा भाजपा के बहुत स्वाभाविक नेता है और उन्होंने भाजपा के लिए जितना काम किया है और क्षेत्र पर उनकी जितनी पकड़ है उससे उन्हें मुख्यमंत्री होना ही चाहिए . वह भाजपा के स्वाभाविक नेता और स्वाभाविक मुख्यमंत्री हैं जो असम के विकास के साथ-साथ असम में भाजपा को और अधिक मजबूत करेंगे.
  • मेरी व्यक्तिगत राय में यह सर्वथा उचित है .
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- शिव मिश्रा 
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रविवार, 2 मई 2021

पश्चिम बंगाल में भाजपा की हार !

 पश्चिम बंगाल में बीजेपी हारी नहीं है, क्योंकि हार वहीं होती है जहां पहले जीत हुई होती है. बीजेपी के पास तो विधानसभा की कुल 3 सीटें थी और 3 से वहां तक पहुंचना आसान काम नहीं है.

लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि अथक प्रयासों के बाद भी भाजपा पश्चिम बंगाल जीत नहीं सकी है. भाजपा का नारा था अबकी बार 200 के पार, वह बहुत मुश्किल लक्ष्य था लेकिन ऐसा लग रहा था कि भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस को कड़ी चुनौती पेश की है और भाजपा सत्ता में अवश्य आएगी भले ही उसकी सीटों की संख्या 150 के आसपास ही क्यों न हो. कई राष्ट्रीय एग्जिट पोल में ऐसा बताया भी गया था लेकिन सबसे बड़ी बात है कई यूट्यूबर जो महीनों से पश्चिम बंगाल की हवा छान रहे थे उन्होंने भी बिल्कुल स्पष्ट कर दिया था की ममता सत्ता में वापसी नहीं कर पाएंगी .

स्वाभाविक है बहुत लोगों को आश्चर्य हुआ होगा और मुझे भी बहुत आश्चर्य हुआ और अफसोस भी लेकिन लोकतंत्र में लोगों का मत ही सर्वोपरि है, चाहे वह घुसपैठियों और रोहिंग्याओं का ही क्यों न हो ?

इसलिए जो जीता वही पांडव.

मेरा प्रारंभिक विश्लेषण यह कहता है कि पश्चिम बंगाल में मुस्लिम मतदाता एकजुट होकर ममता के पीछे खड़े हो गए जो यह दर्शाता है कि भारतीय मुस्लिम मतदान के मामले में जो बीजेपी को हरा सकता है उसी को वोट करते हैं क्योंकि उनकी नजरों में केवल भाजपा ही हिंदूवादी दल है जो उनके इस्लामिक विस्तार बाद को रोक सकता है. इसलिए बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए अगर जिन्ना भी आकर मुस्लिमों से बीजेपी को वोट देने के लिए कहें तो वह नहीं सुनेंगे. यही कारण है कि ओवैसी और फुर्फूरा शरीफ भी बुरी तरह से विफल हो गए और इस चक्कर में कांग्रेस और वाम दलों का भी सफाया हो गया.

अभी तक प्राप्त रुझान में तृणमूल कांग्रेस को 55% से भी अधिक वोट शेयर मिलता दिखाई पड़ रहा है जिससे स्पष्ट है कि मुस्लिमों का एकमुश्त वोट ममता को मिला. इसके अलावा भद्रलोक और कुछ हिंदू विरोधी मानसिकता रखने वाले हिंदुओं के वोट भी ममता को मिले, अन्यथा जो स्थिति पश्चिम बंगाल में इस समय थी उसमें भाजपा का हारना लगभग असंभव था.

  • मुझे बहुत अधिक आश्चर्य नहीं हो रहा है कि बंगाल के मूल निवासी शायद अपने अतीत से भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि उन्होंने कितनी गलतियां की हैं.
  • संपूर्ण भारत में बंगाल ही ऐसा राज्य था जहां बख्तियार खिलजी नाम के एक मुस्लिम ने अपना शासन स्थापित किया था जिसके लिए उसे ज्यादा विरोध का सामना भी नहीं करना पड़ा था.
  • इसके बाद 550 वर्ष तक मुस्लिम साम्राज्य बिना किसी अवरोध के चलता रहा. किसी भी बंगाली हिंदू ने गुलामी से निकलने का प्रयास नहीं किया और 1757 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्लासी के युद्ध में मुस्लिम शासक को हराकर बंगाल विजय की तभी बंगाल से मुस्लिम शासन खत्म हो सका.
  • यह बंगाल ही है जिसका मुस्लिम जनसंख्या के हिसाब से 1905 में सबसे पहले अंग्रेजों ने विभाजन किया .
  • 1947 में भारत के विभाजन के समय पूर्वी बंगाल पाकिस्तान को दिया गया जिसका बंगाल में नाममात्र का भी विरोध नहीं हुआ लेकिन विभाजन के समय और हिंदुओं के पूरी पाकिस्तान से भारत आने के समय भयंकर नरसंहार हुआ.
  • पूर्वी पाकिस्तान जो आज बांग्लादेश बन गया है से लगे सीमावर्ती जिलों में मुस्लिम आबादी का विस्फोट हो चुका है और कई जले 90% तक मुस्लिम बाहुल्य चुके हैं.
  • पश्चिम बंगाल का यह संकट अखंड भारत के लिए बहुत बड़ा संकट है लेकिन आजादी के बाद जिस किसी की भी सरकार रही - कांग्रेस, वामदल या ममता, किसी ने भी इस संकट की तरफ ध्यान नहीं दिया उल्टे मुसलमानों को वोटों की फसल की तरह इस्तेमाल किया.
  • ममता बनर्जी ने अपने पिछले 10 साल के शासन में पश्चिम बंगाल में जो किया वह अत्यंत विभाजन कारी है.
    • करदाताओं के पैसे से उन्होंने मस्जिदों के इमाम और अजान देने वालों के लिए वेतन और भत्ते देना शुरू कर दिए हैं.
    • मुस्लिमों की कई जातियों को अनुसूचित जाति और पिछड़ी जातियों में शामिल कर दिया है.
    • बंगाल के हिंदुओं के हितों पर कुठाराघात हो गया है.
    • कई जिले देश विरोधी और आतंकवादी गतिविधियों के लिए कुख्यात हो गए हैं.

ममता की जीत लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत हुई है भले ही उसमें छापा वोटिंग, डराने धमकाने जैसी गतिविधियां भी शामिल हो, इसलिए इसका स्वागत करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है किंतु अखंड भारत के लिए यह खतरे की घंटी है.

देश में लोग मुस्लिम आक्रमण के समय और विभाजन के समय जो स्थितियां थी वह आज भी बरक़रार हैं. यह देश का दुर्भाग्य है कि लोग वैसे ही बेखबर है जिन कारणों से देश गुलाम हुआ था .

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

कोरोना काल : लॉकडाउन, वैक्सीन और राजनीति

एक  समय था जब भारत में युद्ध और आपदा के समय सत्ता और विपक्ष  देश हित में एक साथ खड़े हो जाते थे लेकिन अब समय बदल गया है पहले का सत्ता पक्ष अब  विपक्ष में आ गया है, जिसने  राजनीति  के नियम बदल दिए हैं. अब आपदा में भी अवसर तलाशे  जाने लगे हैं .  “युद्ध हो या महामारी, राजनीति है जरूरी,”   और वह भी बेहद निम्न स्तर की. कुछ राजनीतिक दल मोदी विरोध करते-करते कब  राष्ट्र विरोध करने लगते हैं  शायद  इसका उन्हें पता ही नहीं चलता. 


पिछले साल  चीनी  वायरस  के भारत में प्रवेश के साथ  ही, राजनीति शुरू हो गई.  लॉकडाउन लगाने का विरोध किया गया,  ताली और थाली  बजाने को लेकर  ताने  मारे गए, प्रवासी श्रमिकों के विस्थापन को लेकर निम्न स्तरीय राजनीति हुई, उत्तर प्रदेश की सीमा पर 1000 बसें खड़ी करने का फर्जीवाड़ा किया गया, विशेष ट्रेनों से श्रमिकों को भेजने का  पूरी तरह राजनीतिकरण किया गया.  प्रवासी  श्रमिकों के रोजगार और  आर्थिक सहायता को लेकर भी अनावश्यक  राजनीति  की गई. 

 

 कोरोना महामारी  के इस संक्रमण काल में किसान आंदोलन को लेकर भी खूब  राजनीति  हुई.  पंजाब से शुरू  हुए इस राजनीतिक आंदोलन   ने दिल्ली की सीमाओं को घेर लिया. मौके की तलाश में बैठे लगभग सभी विपक्षी दलों ने  इसे अपना समर्थन दिया  और कुछ लोग   उनके मंच पर भी जाकर भी  बैठे। दिल्ली की सरकार ने तो जैसे पलक  पावड़े  बिछा दिए और पूरी कैबिनेट सहित अरविंद केजरीवाल ने  आंदोलन स्थल पहुंचकर इन  तथाकथित किसान नेताओं को  तन मन धन से सहायता का आश्वासन भी दिया. 


कोरोना वायरस  की पहली  लहर के प्रबंधन में  भारत को  विश्व में बहुत सराहना मिली. विश्व में संक्रमण के शुरुआती दिनों में भारत ने अमेरिका,  ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी  सहित  विश्व के कई देशों को दवाइयां और अन्य सहायता भेज कर  भारत की प्राचीन “वसुधैव कुटुंबकम”   संस्कृति  का   सराहनीय  उदाहरण प्रस्तुत किया था . 


रिकॉर्ड समय में कोरोना वायरस  की  दो वैक्सीन बनाकर भी  भारत ने  विश्व में ख्याति अर्जित की.  इसमें एक भारत बायोटेक की को-वैक्सीन    पूर्णता स्वदेशी है,  लेकिन विपक्षी  राजनीति ने इस उपलब्धि को भी  देश हित को अनदेखा कर बहुत छोटा  बना दिया.  वैक्सीन के संदर्भ में अनेक भ्रम उत्पन्न किए गए . कुछ राजनीतिक दलों ने इसे जनता की सेहत के साथ खिलवाड़ बताया तो कुछ ने इसे  भाजपा की वैक्सीन बताया और  न लगवाने का  ऐलान कर दिया. 


 वैक्सीन  के  उत्पादन के सापेक्ष  भारत की विशाल जनसंख्या को देखते हुए  टीकाकरण के लिए एक नीति बनाई गई जिसके अंतर्गत  प्रथम चरण में कोरोना योद्धाओं, स्वास्थ्य  सेवाओं से जुड़े हुए कर्मचारियों तथा  सेना एवं अर्धसैनिक बलों का टीकाकरण  किया  गया .   दूसरे चरण में  60 वर्ष और अधिक  आयु के लोगों तथा 45 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के ऐसे लोगों को जो गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हैं, के टीकाकरण  का अभियान शुरू किया गया.  राजनीति ने उसे भी नहीं छोड़ा.  वैक्सीन की गुणवत्ता पर  संदेह प्रकट किया गया   और  प्रश्न  किया गया  कि मोदी  ने वैक्सीन  क्यों नहीं लगवाई ?  ताकि वैक्सीन की गुणवत्ता पर  भ्रम फैलाया  जा सके. यह   झूठ अभियान तब तक चलाया गया जब तक अपनी बारी आ जाने पर मोदी ने वैक्सीन नहीं लगवा ली.  किंतु आज भी कोई नहीं जानता कि सोनिया गांधी ने  कहां और कब वैक्सीन लगवाई ? सूत्रों के अनुसार उन्होंने वैक्सीन लगवा ली है.  कितना अच्छा होता अगर वह स्वयं आकर सार्वजनिक रूप से  यह बताती   तो  जनता पर न सही लेकिन उनकी पार्टी के लोग तो टीकाकरण के लिए प्रेरित होते.  


विपक्ष द्वारा  जहां एक ओर वैक्सीन का विरोध  किया जा रहा था  वही दूसरी ओर  मुफ्त वैक्सीन की  मांग भी की जा रही थी, यह जानते हुए भी कि  टीकाकरण केंद्र सरकार की तरफ से मुफ्त किया जा रहा है.  प्राइवेट अस्पताल में जो ₹250 प्रति व्यक्ति लिए जाते हैं वह अस्पताल  के लिए निर्धारित  शुल्क है  लेकिन सरकारी अस्पतालों में यह पूरी तरह निशुल्क है. 


कोरोना की दूसरी लहर आने पर  विपक्षी दलों ने वैक्सीन के लिए हाय तौबा मचाने शुरू कर दी और कहा कि  “यूनिवर्सल वैक्सीनेशन”  होना चाहिए  यानी  सभी नागरिकों को वैक्सीन उपलब्ध कराई जानी चाहिए.  यह आरोप लगाया गया कि  केंद्र सरकार ने पूरे वैक्सीन कार्यक्रम को हाईजैक कर लिया है. गई कि टीकाकरण का कार्य राज्य सरकारों को सौंप देना चाहिए ताकि वह जल्दी से जल्दी मुफ्त टीकाकरण शुरू करके राज्य के नागरिकों को सुरक्षित कर सकें.  सर्वदलीय बैठक के बाद जब राज्य सरकारों को 18 से 45 आयु वर्ग के लोगों के लिए टीकाकरण करने के लिए अधिकृत कर दिया गया तो  एक बार फिर राजनीति शुरू हो गई.  विपक्षी दलों ने वैक्सीन  के मूल्यों को लेकर हंगामा खड़ा कर दिया.  


दरअसल  सीरम इंस्टिट्यूट  पुणे और भारत बायोटेक हैदराबाद दोनों ही भारत सरकार को ₹150 प्रति डोज के हिसाब से  वैक्सीन  आपूर्ति करते हैं. अब सीरम इंस्टीट्यूट राज्य सरकारों को ₹300 और  प्राइवेट अस्पतालों को ₹600 प्रति डोज़  के हिसाब से  वैक्सीन की आपूर्ति करेगी.  भारत बायोटेक ने राज्य सरकार को ₹400 और प्राइवेट अस्पतालों को रु. 800 प्रति डोज  हिसाब से आपूर्ति का प्रस्ताव दिया है. आश्चर्यजनक  बात यह है कि इन विपक्षी दलों को  वैक्सीन के मूल्य की चिंता नहीं है  उन्हें इस बात पर आपत्ति ज्यादा है कि  वैक्सीन निर्माता केंद्र सरकार से कम और राज्य सरकारों को ज्यादा मूल्य क्यों ले  रहे हैं?  मेरा मत  है कि  सभी वैक्सीन  की डोज  सरकारी खरीद है,   चाहे वह  केंद्र सरकार हो  या राज्य सरकार इसलिए  मूल्य तो एक ही होना चाहिए. मूल्य में अंतर होने  से भारत जैसे देश में  जहां  जमीनी  स्तर पर भ्रष्टाचार  होते देर नहीं लगती कहीं ऐसा न हो कि केंद्र सरकार की  सस्ती  वैक्सीन खुले बाजार में मेडिकल स्टोर पर बिकने लगे. 


पूरे विश्व में दवाओं की  लागत और उनके  मूल्य निर्धारण पर  नियंत्रण एक बहुत बड़ी समस्या है.  इसलिए   बड़े ब्रांड की   दवाएं  कम लागत के बाद भी बेहद महंगी होती हैं. यह सही है कि   वैक्सीन जैसी औषधि में  अनुसंधान की कीमत बहुत ज्यादा होती है इसलिए इसका मूल्य निर्धारण इतना आसान भी नहीं है.  चीन की वैक्सीन जिसकी  प्रमाणिकता संदिग्ध है, को छोड़कर दुनिया की सभी वैक्सीन भारत भारत में बन रही वैक्सीन से कई गुना महंगी है.  उदाहरण के लिए  अमेरिका में एक  वैक्सीन  की कीमत  लगभग 19.5 डॉलर आती है. 

सीरम इंस्टीट्यूट ने अपनी  वैक्सीन  यूरोपीय देशों को 2.18  डॉलर ( लगभग डेढ़ सौ रुपए)  और  दक्षिण अफ्रीका को 5.25  डॉलर (  लगभग ₹400 )  में आपूर्ति की है.  इसलिए मूल्यों पर वैक्सीन  उत्पादक कंपनियों से  बात की जा सकती है. 



इस बीच  आपूर्ति बढ़ाने  और विभिन्न वैक्सीन निर्माताओं के बीच  मूल्य  प्रतिस्पर्धा  करने के लिए भारत सरकार ने रूस की स्पूतनिक V  का अनुमोदन कर दिया है इसका मूल्य लगभग ₹1000 है और जब यह भारत में बनाई जाएगी तो इसका मूल्य कम हो जाएगा.  प्रधानमंत्री मोदी के आग्रह पर रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने उसकी  पहली खेप  1 मई को  भेजने का आश्वासन दिया है.   विपक्षी दलों के शोर में एक छुपा हुआ कारण  यह भी है कि राज्य टीकाकरण की इस कीमत को  स्वयं  वहन नहीं करना चाहते  बल्कि  उनकी इच्छा है कि केंद्र सरकार इसे  वहन करें.  इसलिए  मुफ्त में रेवड़ी बांटने वाले  राज्यों सहित  कई अन्य राज्य सरकारों ने भी हाथ खड़े कर दिए हैं.  


कितना अच्छा होता  कि टीकाकरण  केंद्र सरकार के निर्देशन में  होता और विवादों  से परे होता,  जिससे उसे जल्दी से जल्दी पूरा किया जा सकता था.  देश का दुर्भाग्य है  कि राजनीतिक  गिद्ध  दृष्टि से  कुछ भी नहीं बख्शा जा रहा  है  न आपदा, न  महामारी और न ही  युद्ध जैसी स्थितियां. टीकाकरण भी युद्ध स्तर पर होना चाहिए पर क्या कोई युद्ध ऐसे ही लड़ा और जीता जा सकता है ?


स्वतंत्रता  के बाद लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले दल को भी ये  चिंता नहीं है कि  उसकी कुटिल राजनीति से जनता को कितना कष्ट हो रहा है और  विश्व में भारत की साख को कितना बट्टा लग रहा है. 

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  - शिव मिश्रा  


 












शुक्रवार, 16 अप्रैल 2021

को वैक्सीन और कोवीशील्ड में से कौन सी वैक्सीन ज्यादा अच्छी है ?

 


मेंरे विचार से वैक्सीन लगवाना ज्यादा महत्वपूर्ण है इसलिए जो भी मिल रही है उसको तुरंत लगवा ले. दोनों ही अच्छी हैं और दोनों के ही सफल क्लीनिकल ट्रायल के बाद ही मंजूरी दी गई है.

दूसरी बात यह है कि भारत में कोविड-19 का टीकाकरण कोविन ऐप द्वारा नियंत्रित किया गया है, अगर आप स्वयं रजिस्ट्रेशन करते हैं तो आपको यह विकल्प उपलब्ध नहीं होता है कि आप कौन सी वैक्सीन लगवाना चाहते हैं. रजिस्ट्रेशन करते समय आपको अस्पताल और उपलब्ध स्लॉट ही दिखाई पड़ते हैं और एक अस्पताल में एक ही तरह की वैक्सीन उपलब्ध कराई गई है. इसलिए आपको कौन सी वैक्सीन मिलेगी यह पूरी तरह से आपकी इच्छा पर निर्भर नहीं करता है.

फिर भी अगर आप पहले से ही तय कर चुके हैं कि कौन सी वैक्सीन लगवानी है तो फिर आपको पता करना पड़ेगा कि कौन सा अस्पताल कौन सी वैक्सीन लगा रहा है और तदनुसार आपको रजिस्ट्रेशन करते समय अस्पताल का विकल्प चुनना होगा या अपना आईडी प्रूफ लेकर सीधे अस्पताल पहुंचना होगा.

कोवीशील्ड वैक्सीन को पहले अनुमति दी गई थी क्योंकि इसका क्लीनिकल ट्रायल पहले पूरा हो गया था. को वैक्सीन को बाद में अनुमति दी गई थी इसलिए उसका उत्पादन भी देर से शुरू हुआ. इसलिए ज्यादातर अस्पतालों में कोवीशील्ड वैक्सीन लगाई जा रही है. को वैक्सीन को जब सरकार ने अनुमति दी थी तो इसका अंतिम चरण का ट्रायल चल रहा था लेकिन सीमित संख्या में पूरे के किए गए ट्रायल के आधार पर इसे अनुमति दे दी गई.

कई राजनीतिक दलों और स्वयंसेवी संगठनों ने सरकार के इस कदम का जबरदस्त विरोध किया और लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करने के लिए सरकार को जमकर कोसा . सरकार को घेरने के चक्कर में इन स्वार्थी तत्वों ने भारत बायोटेक की को-वैक्सीन को भी कटघरे में खड़ा कर दिया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी मार्केटिंग को अत्यधिक क्षति पहुंचाई. विरोध करने वालों के अपने निहित स्वार्थ थे. कोई चीन की, तो कोई रूस की स्पूतनिक, तो कोई मनपसंद अमेरिका की कंपनी को इस क्षेत्र में लाना चाहता था. कोई बड़ी बात नहीं यदि कुछ स्वार्थी तत्व सिरम इंस्टीट्यूट पुणे को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य ऐसा कर रहे हो.

स्वार्थ में अंधे होकर कुछ लोगों ने इसे बीजेपी वैक्सीन का नाम भी दे दिया.

आइए समझते हैं क्या अंतर है दोनों वैक्सीन में

  • Covaxin एक इनएक्टिवेटेड वैक्सीन है यानी इसे मृत कोरोना वायरस से बनाया गया है। इसके लिए भारत बायोटेक ने पुणे के नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ वायरलॉजी में आइसोलेट किए गए कोरोना वायरस के एक सैम्‍पल का इस्‍तेमाल किया। जब यह वैक्‍सीन लगाई जाती है तो इम्‍युन सेल्‍स मृत वायरस को पहचान लेती हैं और उसके खिलाफ ऐंटीबॉडीज बनाने लगती हैं। वैक्सीन की दो डोज चार हफ्तों के अंतराल पर दी जाती है और इसे 2 डिग्री सेल्सियस से 8 डिग्री सेल्सियस के बीच स्‍टोर किया जाता है।
  • Covishield को ऑक्‍सफर्ड यूनिवर्सिटी और अस्‍त्राजेनका ने मिलकर विकसित किया है। इसे भारत में सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया तैयार कर रही है। यह वैक्सीन आम सर्दी-जुकाम वाले वायरस के एक कमजोर रूप से बनाई गई है। इस वायरस को परिवर्तित करके कोरोना वायरस जैसा दिखने वाला बनाया गया है। जब वैक्‍सीन लगती है तो वह इम्‍युन सिस्‍टम को कोरोना वायरस के संक्रमण से लड़ने के लिए तैयार करती है। यह वैक्‍सीन शुरुआत में दो डोज में चार हफ्तों के अंतराल में लगाई जा रही थी लेकिन बाद में इस अवधि को बदलकर 6 से 12 हफ्ते कर दिया गया हैं क्योंकि कंपनी के मुताबिक अगर बूस्टर डोज 6 हफ्तों के बाद लगाई जाती है तो इसका प्रभाव बढ़ जाता है. इसे भी 2 डिग्री से 8 डिग्री के बीच स्‍टोर किया जा सकता है।

प्रभावशीलता -

  • 4 सप्ताह के अंतराल पर बूस्टर डोज लेने के बाद Covaxin ने 81% क्लिनिकल एफेकसी दिखाई है। यह वैक्‍सीन ट्रायल के दौरान सेफ पाई गई थी और किसी वालंटियर में सीरियस साइड इफेक्‍ट्स देखने को नहीं मिले थे।
  • 12 सप्ताह के अंतराल पर बूस्टर डोज लेने के बाद ऑक्‍सफर्ड-अस्‍त्राजेनेका के इंटरनैशनल ट्रायल में वैक्‍सीन 90% तक असरदार पाई गई। वैक्‍सीन किसी तरह के अस्‍वीकार्य साइड इफेक्‍ट्स पैदा नहीं करती।

निष्कर्ष :-

  • दोनों वैक्सीन के बनाने की प्रक्रिया बिल्कुल अलग है इसलिए दोनों की तुलना करना उचित नहीं है.
  • हां एक बात अवश्य है कि को-वैक्सीन की दूसरी डोज जिसे बूस्टर डोज कहा जाता है 28 दिन बाद लगाई जाती है लेकिन कोवीशील्ड में इसे 6 से 12 हफ्ते के बाद लगाए जाने का परामर्श दिया जाता है.
    • इसलिए को वैक्सीन की साइकिल 1 महीने में पूरी हो जाती है जबकि को भी सील के लिए 3 महीने का समय चाहिए.
  • चूंकि बूस्टर या दूसरी डोज लगने के 2 सप्ताह बाद बाद वैक्सीन का सुरक्षा कवच कार्य करना शुरू कर देता है.
    • इसलिए को वैक्सीन लेने वाले व्यक्ति 6 हफ्ते बाद और कोवीशील्ड लेने वाले व्यक्ति 8 से 14 हफ्ते बाद सुरक्षित होते हैं.
    • इसलिए समय सीमा के अनुसार को वैक्सीन जल्दी सुरक्षित करना शुरू कर देती है.

मुझे अगर विकल्प मिलता तो मैं को वैक्सीन ही लगव़ाता लेकिन उपलब्धता के आधार पर मुझे कोवीशील्ड ही मिली .


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