रविवार, 4 अक्टूबर 2020

पितृ सत्ता


विनय गुप्ता किदवई नगर  के  अपने छोटे से घर की  की बालकनी में बैठे हुए थे. रोज सुबह यहां बैठकर चाय पीते हुए समाचार पत्र पढ़ना उनकी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा था
, पर न जाने क्यों आज की सुबह एकदम अलग थी. चाय तिपाई पर रखी ठंडी हो चुकी थी. कुर्सी पर बैठे हुए उनके हाथों में समाचार पत्र ज्यों का त्यों  रखा था.  सामने हनुमान मंदिर की तरफ से आने वाली सड़क पर चलते हुए वाहन और लोग रोज की तरह आ जा रहे थे.सूर्य की रोशनी काफी फैल चुकी थी लेकिन फिर भी सुबह कुछ अलसाई सी थी ,  लेकिन उसकी  आँखे जैसे अनंत में टंकी हुई थी. निष्क्रिय सा वह न जाने कबसे इसी एक ही  मुद्रा में बैठा था,  जिसका  उसे  शायद अहसास भी  नहीं था.

जब उसकी तंद्रा टूटी तो उसे  लगा कि कानपुर का मौसम अचानक  बदल गया है. बरसात हो चुकी है, चारों तरफ पानी ही पानी है. सड़कें भीगी है, पेड़ पौधे भीगे हैं और आसपास  पानी पानी ही  दिख रहा है. सब कुछ पानी से तरबतर है. कुछ भी साफ दिखाई नहीं पड़ रहा था. उसे आश्चर्य हुआ कि कानपुर के  मौसम में इतना परिवर्तन अचानक तो नहीं होता. नाक पर नीचे खिसक गए अपने चश्मे को ऊपर खिसकाते  हुए उसने ठीक से देखने की कोशिश की लेकिन फिर भी कुछ साफ दिखाई नहीं दिया तो उसने साफ करने के लिए  चश्मा उतारा तो दिखाई पड़ा कि बाहर तो सब कुछ ठीक है, पानी उसके चश्मे में है.  शायद  उसके अंतर्मन  में उमड़ते घुमड़ते हुए बादल आंखों के रास्ते बरस कर चश्मे को पूरी तरह से तरबतर कर चुके हैं . इसीलिए उसको सब कुछ भीगा भीगा सा और अस्तव्यस्त दिख रहा है.  उसने चश्मा भी पोंछा और आँखे  भी और  जल्दी से दाएं बाएं देखा कि किसी ने उसकी भीगी आँखे तो नहीं देंखी.  फिर उसे  याद आया कि घर में तो उसके आलावा कोई है ही नहीं, वह तो अकेला है.

 यही पितृसत्ता है जो पुरुष को रोने  नहीं देती और भूले भटके आंसू भी आ जाय तो छिपाना पड़ता है  कि कोई देख न पाय. पुरुष चाहे पुत्र हो, पति हो या पिता हो, उसे बचपन से ही इस मानसिकता का बोध कराया जाता है और मजबूत होने का आभास देते रहने का अभ्यास कराया जाता है. जैसे-जैसे जीवन एक पुत्र, पति  और पिता  की ओर अग्रसर होता है , पितृसत्ता का क्रमिक विकास होता रहता है. दुखद से दुखद, विषम से विषम परिस्थितियों में भी न रोना और न आंसू बहाना उसके  मजबूत दिखने का आधार बन जाता है. पुरुष  अंदर से मजबूत  भले ही न हो लेकिन मजबूत दिखना उसकी मजबूरी है और शायद जिम्मेदारी भी क्योंकि अगर पितृ ही रोएगा तो और लोग क्या करेंगे? उनको ढांढस कौन बंधायेगा ? यही कारण है कि कभी किसी ने  सामान्यता किसी पुरुष को रोते बिलखते हुए नहीं देखा होगा.

पितृसत्ता की यही मजबूती और स्वभाव की इतनी दृढ़ता, भले ही दिखावटी हो, भरपूर संबल देती है मातृ सत्ता को और इसीलिए मां अपनी करुणा में निर्बाध रूप से बह सकती है या स्वयं ममता के सागर में  स्वछंद हिलोरे ले सकती है. लेकिन जब कभी करुणा के इन तारों को कोई उसके अपने अस्वाभाविक रूप से झंकृत कर देते हैं तो मां के आंसू निकल आते हैं . मां रोती भी है, बिलखती भी है और फिर आंचल से स्वयं ही आंसू पोंछ लेती है और जैसे यह सब कुछ  स्वाभाविक रूप से खुद सामान्य करने का प्रयास होता है. लेकिन पिता तो पिता है, रो नहीं सकता, आंसू नहीं बहा सकता. कभी कभी  बांध में अनायास  अत्यधिक पानी आता है और   बाँध के ऊपर से निकलने लगता  तो यह  बहुत ही असामान्य होता  है.  बाँध की ऊंचाई बढ़ाते जाना ही विकल्प होता है जो उचित भले ही न हो लेकिन मजबूरी है. बाँध चाहे कितने ही वैज्ञानिक तरीके से बने हों, ऊंचाई कितनी भी अधिक क्यों न हो, नमी तो फिर भी आ ही जाती है, सेफ्टी वाल्व से कभी कभी बूंदे तो  टपकती ही हैं. यदि पानी बाँध तोड़ कर निकलने लगे तो परस्थितियाँ बहुत  बिषम और असाधारण ही  होती है.

 विनय सोचने लगा कि अतीत में  वह कब ऐसे आंसुओं के सैलाब में डूबा था ? शायद... कोई 15 साल पहले की बात होगी जब वह अपने बड़े बेटे को इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा दिलाने दिल्ली ले गया था. बेटे को परीक्षा केंद्र छोड़ आने के बाद पहाड़गंज के एक छोटे से होटल के एक छोटे से कमरे में खुद बंद कर बहुत आंसू बहाए  थे . यह वह समय था जब कुछ समय  पहले ही उसे लीवर कैंसर होने  का पता चला था, काफी देर हो चुकी थी और अब उसके पास समय बहुत कम बचा था. उसे तो सहसा विश्वास ही नहीं हो रहा था कि भगवान उसके साथ ऐसा भी  कर सकता है और इसी विश्वास के साथ एक से दूसरे और तीसरे डॉक्टर को दिखाता रहा कि शायद कोई कह दे कि तुम्हे कुछ भी नहीं है,  लेकिन सब की राय एक जैसी थी कि "वह  तेजी से बढ़ने वाले लिवर कैंसर से पीड़ित है  और जितनी जल्दी हो सके उसे ऑपरेशन करवा लेना चाहिए".  वह इसके लिए मानसिक रूप से बिलकुल तैयार नहीं था. उसे मालूम था कि यदि  ऑपरेशन करवाया गया तो उसके बाद कैंसर के  इलाज की एक लंबी प्रक्रिया है. जितने भी आर्थिक संसाधन उसके पास हैं सब उसके आसपास ही सिमट जाएंगे. फिर उसके बच्चों का क्या होगा ? उसकी पत्नी  का क्या होगा ? वह  आर्थिक रूप से बहुत समृद्धि नहीं है. उसकी बेचैनी का कारण था उसका अपने  घर का इतिहास जो एक बार फिर दोहराने के कगार पर खड़ा था . बचपन में ही  उसके पिता की आकस्मिक मृत्यु हो गई थी.  कितनी मुश्किल और तंगहाली से उसकी मां ने उसे पढाया लिखाया. दूसरों के घरों में  झाड़ू पोंछा और चौका वर्तन का काम किया. खुद उसने भी छोटे-मोटे काम किए और स्नातक के बाद नौकरी शुरू कर दी. प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी का समय भी नहीं मिला. किसी इंजीनियरिंग और मेडिकल कोर्स करने के लिए सोचना भी मुश्किल था.  शायद उसकी मां ने जो तपस्या की थी उसी का ये सुखद परिणाम था कि उसे नौकरी  मिल गयी थी. वह सोचता था कि अब सब अच्छा ही होगा और शायद सदा सर्वदा के लिए उसका परिवार गरीबी की रेखा से ऊपर आ जाएगा .  फिर पता नहीं भगवान क्यों इतना निष्ठुर है ? बार-बार उसकी परीक्षा क्यों हो रही है ?

 इस समय उसका  बेटा १२वीं  में पढ़ रहा था और बेटी  नवी क्लास में. वह यह सोच कर परेशान हो रहा था कि इस समय यदि उसे कुछ हो जाता है तो उसका पूरा आशियाना बिखर जायेगा. उसका अपना मकान  नहीं  और नौकरी में पेंशन  नहीं, आमदनी का और कोई साधन नहीं. ऐसी स्थिति  बेटे  की पढ़ाई तो छूटेगी ही, घर चलने के लिए उसे छोटे-मोटे काम करने पड़ेंगे.  बेटी  भी पता नहीं क्या करेगी? उसे भी कुछ ना कुछ करना पड़ेगा और पत्नी को भी, हो सकता है कुछ छोटा मोटा काम करना पड़े. ये सोच कर ही उसका कलेजा मुहं को आ रहा है. जिन परस्थितियों से निकलने के लिए उसने  लंबा संघर्ष किया है, एक बार फिर वही परस्थितियाँ, समय का वही चक्र फिर उसके दरवाजे पर दस्तक दे रहा है.

वह ईश्वर से चाहता था कि उसे कम से  कम  से कम से 5 वर्ष का समय दे दे तो  शायद उसका परिवार बर्बादी से बच जाय. 5 साल का समय इसलिए कि बेटा इंजीनियरिंग पूरी करके किसी नौकरी में आ जाएगा और अगर उसने मां और बहिन  को सहायता दी तो  बेटी  भी पढ़ लिख जाएगी औए  कोई नौकरी कर सकेगी . तब शायद घर परिवार चलने में बहुत मुश्किल नहीं आएगी.  पूरे जीवन में उसने कभी किसी का अहित नहीं किया. भरपूर मेहनत की और भगवान पर पूरी आस्था रखी और सिर्फ इसलिए कि अच्छे व्यक्ति को अच्छे कार्य करने चाहिए,  वैसा ही करने की कोशिश करता रहा. वह  हारना नहीं चाहता था इसलिए आखिरी दम तक  कोशिश करना चाहता था.

 वह लगातार एक के बाद एक डॉक्टर को दिखाता रहा लेकिन  लखनऊ में संजय गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान में एक डॉक्टर ने  उसकी  फ़ाइल् में एक ही मर्ज के लिए अनेकों डाक्टर्स की  की रिपोर्ट और एक ही निष्कर्ष  देख कर कहा कि “क्या तुम  किसी ऐसे डॉक्टर को खोज रहे हो जो यह कह दे कि तुम्हे  कुछ नहीं हुआ है ? और तुम्हे कुछ नहीं होगा ? तो वह मैं नहीं हूँ. तुम्हे कैंसर है और अच्छा तो ये होगा  कि तुम तुरंत ऑपरेशन करा लो  लेकिन चूंकि तुम मामले को टाल रहे हो,  यहाँ के बाद फिर कहीं किसी डॉक्टर के पास जाओगे तो मै इस पर पूर्ण विराम लगा देता हूँ . तुम अभी ऑपरेशन नहीं कराना चाहते हो तो मत कराओ. हफ्ते में एक बार अल्ट्रासाउंड करवाना होगा और वह एक ही पैथोलॉजी सेंटर में, और लीवर में कैंसर की गांठ का माप लेना होगा ताकि यह पता लग सके कि  कैंसर की वृद्धि कितनी तेज  है. अगर वृद्धि बहुत तेजी से हो रही है तो ऑपरेशन का निर्णय लेंगे, अन्यथा जब तक टाला जा सकता है टालते रहेंगे.  आपरेशन के बाद भी ठीक होने की कोई गारंटी तो होती नहीं इसलिए थोडा रिस्क लेकर इन्तजार करना बुरा नहीं. जो दवायें लिखी हैं, लेते रहो, खान पान का ध्यान रखो. कभी कभी चमत्कार भी होतें हैं, उसका इन्तजार करो."   

 यह सुनकर उसे बहुत शांति मिली जैसे कि वह  यही चाहता था और फिर वैसा ही किया. हर हफ्ते  एक पैथोलॉजी में अल्ट्रा साउंड कराने का क्रम शुरू हो गया. घर में तो किसी को मालूम भी नहीं था कि उसे कैंसर की बीमारी है जैसे जैसे समय गुजर रहा था कैंसर की वृद्धि हो रही थी लेकिन जो सीमा उसे दी गयी थी उसमे अभी समय था. उसकी इच्छा अंतिम क्षण तक प्रतीक्षा करने की थी. इसी समय स्वामी रामदेव का योग प्रशिक्षण कार्यक्रम हुआ. उसने भी प्रशिक्षण शिविर में भाग लिया और जैसा कि स्वामी  दावा करते थे कि योग से कैंसर भी ठीक हो जाता है. इस आशा से अनुलोम विलोम और कपालभाति से लेकर  योग की जितनी भी क्रियाएं वह कर सकता था या करना उसके लिए संभव था, करना शुरू कर दिया.

उसे मालूम था के उसके पास समय बहुत कम  है. इसलिए बच्चों की पढ़ाई और घर में पैसे की बचत करने और सारे कार्य समय पर पूरे करने का बहुत ही कठोर परियोजना प्रबंधन शुरू कर दिया  ताकि सब कुछ जितना भी संभव हो समय से हो.  बच्चों की पढ़ाई में छोटी मोटी त्रुटियों को भी बहुत गंभीरता से लेता था और कई बार न चाहते हुए  डांटता भी था क्योंकि   उसे लगता था कि थोड़ी सी असावधानी उसके पूरे प्रोजेक्ट का सत्यानाश कर देगी . 

कुछ महीनो बाद पैथोलॉजी के डाक्टर ने हर सप्ताह के बजाय महीने में एक बार अल्ट्रासाउंड करवाना शुरू किया और एक साल बाद ये क्रम मासिक के स्थान पर त्रैमासिक हो गया . अल्ट्रासाउंड करने वाला डॉक्टर भी उसको बहुत  दिलासा  देता था कि अभी समय है चिंता की बात नहीं है. ऐसा लगता था कि जैसे ईश्वर उसे कुछ समय दे रहा है  और फिर समय मिलता गया. इस बीच बड़े बेटे की इंजीनियरिंग पूरी हो गयी. उसको अच्छा काम भी मिल गया. शादी भी हो गई और  बेटी की भी पढाई पूरी होकर उसे भी नौकरी मिल गई और शादी भी हो गयी तो उसे लगा शायद कि अब उसका प्रोजेक्ट पूरा हो गया है.  उसने ईश्वर को धन्यवाद दिया और प्रार्थना की कि  ईश्वर चाहे तो अब अपना काम कर सकता है. उसने जो समय मांगा था वह पूरा हो गया है और सारे काम भी पूरे हो गए हैं .

अब तो उसकी जिंदगी जैसे बोनस की जिंदगी थी  सब कुछ हो चुका था और एक और जो इच्छा मां-बाप की होती है वह भी पूरी होने वाली थी  वह दादा बनने वाला था. एक  हफ्ते पहले ही वह और उसकी पत्नी बेंगलुरु में बेटे के पास गए हुए थे क्योंकि बहु की डिलीवरी होने वाली थी. इस समय  पितृपक्ष चल रहा था सामान्यतया इस  समय वह किसी यात्रा से बचता था क्योकि इस समय वह अनिवार्य रूप से रोज सुबह अपने पूर्वजों तर्पण करता था. पिता को तो उसने देखा जरूर था लेकिन  ठीक से याद नहीं, लेकिन  मां जरूर उसके लिए आराध्य थी और पूर्वजों के लिए तर्पण शायद मां को धन्यवाद ज्ञापित करने का एक तरीका था.

 इस पितृ पक्ष में  एक बहुत असामान्य घटना हुई . एक दिन सपने में उसे मां दिखाई दी और बताया कि वह उसके घर आ रही है. इशारा था कि  घर में पोती के रूप आ  रही थी. एक  सप्ताह पहले ही  पति-पत्नी बैंगलोर पहुंच गए और उस शुभ घड़ी का बड़ी उत्सुकता से इंतजार करने लगे. विनय के लिए खासी उत्सुकता की वजह  थी कि उनकी बोनस की जिंदगी में और कितनी   खुशियां मिलती चली जा रही हैं. आखिर वह घड़ी आ गई जब बहू को अस्पताल में भर्ती कराया गया. बेटा बहू और उसकी एक दोस्त उसके साथ में थी. चूंकि सारे लोग अस्पताल में नहीं रुक सकते थे इसलिए वे पति और पत्नी, बेटे के कहने के अनुसार घर पर ही रहे. रात भर वे लोग जागते रहे और बेटे की फोन की प्रतीक्षा करते रहे. उसे पहली बार महसूस हुआ कि  किसी खुशी का इंतजार करना कितना उत्सुकता पूर्ण होता है जिसमें   धैर्य  रख पाना भी बहुत मुश्किल होता है. इसलिए उसने बीच बीच में एक दो बार बेटे को फोन कर पूछा भी . जब सुबह होने को आई फिर भी उसका फोन नहीं आया तो एक बार फिर उसने फोन किया तो बेटे  ने झुंझलाते हुए कहा कि “बार-बार फोन करके मुझे  परेशान मत करो मैं वैसे ही बहुत परेशान हूं जब कुछ होगा तो आपको सूचना मिल जाएगी”.

 अच्छा तो नहीं लगा ..लेकिन दिल को तसल्ली दी  कि शायद ठीक ही कह रहा था पूरी रात अस्पताल में जाग रहा था. पता नहीं क्या क्या परेशानी हुई होगी, कहीं ऑपरेशन वगेरह का तो चक्कर तो नहीं. आजकल डाक्टर बिना जरूरत के कुछ भी कर सकते हैं. इसी तरह सोचते सोचते  सुबह हो गयी . स्नान ध्यान के बाद अपने पूर्वजों के तर्पण की प्रक्रिया शुरू की. अब तक कोई समाचार नहीं मिला था ... चिंता हो रही थी लेकिन दोबारा  बेटे को फोन करने की हिम्मत नहीं हो सकी. आज उसे पहली बार एहसास हुआ कि बाप अपने बच्चों से भी  कितना डरता है, उन बच्चों से जिन्हें अपने हाथों बड़ा किया, कभी हाथों में लेकर झूले झुलाये, गोद में लेकर बगीचे में लगे गुलाब के फूल की खुशबू का अहसास कराया , जिनके हाथ पकड़ कर चलना सिखाया  और  कंधे पर बैठाकर घुमाया, सोने के पहले हर दिन कहानी सुनायी , जिनको जुखाम बुखार होने पर  पूरी पूरी रात जागकर बिताई. उसे इस तरह के जवाब की अपेक्षा सपने भी नहीं थी.

तभी अचानक मोबाइल की घंटी बजी और लपक कर उसने फोन उठाया उसे जिस  बहुत बड़ी खुशखबरी की प्रतीक्षा थी अब वह समय आ गया है. सोचा  बेटे का फोन होगा लेकिन यह क्या ये तो कोई विदेशी  अनजान नंबर था. बात हुई तो पता चला समधी जी  लाइन पर थे. दुबई से उसे बधाई देने के लिए फोन किया था  कि घर में पोती आ गई है.

काश ये बात उसको बेटे ने  बताई होती तो कितना अच्छा लगता ! सात समुंदर पार  दूरदराज  बैठे हुए व्यक्ति को यह खबर मिल चुकी है और वह एक सप्ताह से यहाँ है सिर्फ और सिर्फ इसी सूचना के लिए और उसको अपनी पोती के आने की सूचना किसी अन्य से मिल रही है. उसने  संतोष किया कि हो सकता है बेटा पूरी रात  जागता रहा होगा परेशान होगा . पता नहीं कितनी मुश्किलों का सामना किया होगा और इस तरह की तमाम संभावित बातों से उसने अपने आप को संतोष दिया .  जल्दी से तैयार होकर दोनों पति पत्नी  निकल पड़े अस्पताल के लिए.

 अस्पताल पहुंचकर भी उसकी जिज्ञासा शांत नहीं हुई क्योंकि अस्पताल में विजिटिंग आवर्स  होते हैं तभी मरीज से मिला जा सकता है. वह इंतजार करने लगा और यह समय भी कैसे कटा ? उसे नहीं मालूम .  इतनी उत्सुकता अपनी पोती के रूप में मां को देखने के लिए हो रही है इतनी तो अपने बच्चों के लिए भी नहीं हुई थी. आज जो बेचैनी है अपनी बेटी सामान  बहू को देखने के लिए भी है , उसे  धन्यवाद देने के लिए, जिसने उसके परिवार को आगे बढ़ाया.

 अन्दर जाने का समय  भी आ गया और वह पूछता हुआ उस प्राइवेट रूम में पहुंचा जहां उसकी बहू थी. उसने धीरे से दरवाजे पर दस्तक दी और उसका बेटा बाहर आ गया. जिसने बजाय उसे अंदर ले जाने के बाहर आकर कमरे का दरवाजा बंद कर दिया, वह एकटक देख रहा था और कुछ समझ नहीं पा  रहा था . इस समय का एक एक पल उसके लिए बहुत भारी हो रहा था. वह जल्दी से जल्दी अन्दर  जाना चाहता था और अपनी पोती को देखना चाहता था, उससे मिलना चाहता था. लेकिन बेटा था दरवाजा बंद कर ऐसे खड़ा था जैसे कि अभी भी अंदर जाने के लिए कुछ औपचारिकताये  बाकी है.  उससे पूछा “क्या हुआ” तो  बेटे ने जवाब दिया “बहु अभी सो रही है, अंदर जाने से डिस्टरबेंस होगा और अभी कुछ और लोग भी आ रहे हैं, मेरे दोस्त वगैरह सब लोग एक साथ में ही मिल लेंगे तो अच्छा रहेगा. समय बचेगा और बार-बार बच्ची को और उसकी मां को परेशानी नहीं होगी”.

 ये शब्द  उसके  कानों में पिघले  शीशे की तरह अन्दर चले गए. ऐसा लगा कि वह बिल्कुल संज्ञा शून्य हो गया है. ऐसा नहीं लग रहा था कि यह बात उसके  अपने बेटे ने कही है. शायद इस तरह का रूखापन तो किसी अपरचित के पास जाकर देखने को भी  नहीं मिलता. यही है पितृ  सत्ता, जहाँ कोई भी पिता, कोई भी पुरुष, या कोई भी मां बाप चाहे विश्व विजय कर ले लेकिन अपनी औलाद से कभी नहीं जीत सकते.  वह हमेशा हारते  हैं और उन्हें हारना ही पड़ता है. हर बार, स्वयं जानबूझकर हारना भी पितृ सत्ता की जिम्मेदारी है और मजबूरी भी. जितनी असहनीय घुटन और पीड़ा  उसने इस समय महसूस की वह कल्पना से परे है. वह सोचने लगा....कि क्या इस सब के लिए भगवान से समय मांगा था ? परिवार बचाने के लिए ? किसका परिवार ? और क्या पाने के लिए ? किसके लिए ?

 तरह तरह की बातें उसके दिमाग में आने लगी. ऐसा लगा कि उसके आँखों के सामने अँधेरा छा  रहा है और चक्कर खाकर गिरने वाला है, दीवार का सहारा लेते हुए वह पास ही रखी बेंच पर बैठ गया. ये सब क्या हो रहा है ? इतना सब कुछ बदल चूका है और उसे इसका आभास तक नहीं है. शायद ये नए युग के  नए रिश्ते हैं, जो आज बन रहे हैं मां बाप और बच्चों के बीच, जिनमे न अपनेपन की गर्माहट है, न सम्वेदनाएँ हैं, न ही संस्कार और न ही समझ .  रिश्तों का शायद अब कोई  महत्व नहीं है. ऐसा लगता है किसी कारपोरेट जगत की एक श्रेणी बद्ध व्यवस्था है जिसमें कोई बरिष्ठ है तो कोई कनिष्ठ. बस. बरिष्ठ सिर्फ इसलिए बरिष्ठ है क्योकि उसने परिवार रूपी संस्था में पहले प्रवेश किया है और उसका सेवा काल लम्बा है. कनिष्ठ इसलिए कि वह इस परिवार में बाद में आया है. इसके अलावा और  कोई  अंतर नहीं. आज का कनिष्ठ कल बरिष्ठ हो जायेगा और बरिष्ठ इस दुनिया से रिटायर  हो जायेगा. ये समय का चक्र है, चलता रहेगा. न जाने कब तक. वह  भावनाओं के इस ज्वार भाटे में डूबता उतराता रहा और न जाने कब शिथिल होकर अपने आपके लहरों के हवाले कर दिया.

 कुछ और लोग मिलने आए और वह भी कमरे  के दरवाजे पर पहुंचे, जिनका  बेटे ने तपाक से स्वागत किया और अंदर ले गया. शायद उसके कंपनी के अधिकारी  या दोस्त होंगे . बेंच पर बैठे हुए उसकी खुशी और उमंग उस मुकाम पर पहुंच गई थी जैसे समुद्र की ऊंची उठती लहरें किनारे से टकराकर बहुत ही धीमी गति से वापस हो जाती हैं. लेकिन अब तो बहुत समय हो गया था. बेटे से मिलने वाले लोग बाहर निकल रहें थे. बेटा उन्हें छोड़ने निकला. उसकी स्थिति मुंशी प्रेमचंद की बूढ़ी काकी की तरह हो रही थी.  थोड़े इंतजार के बाद बड़ी बेशर्मी से बेटे के पीछे वह कमरे के अंदर चला गया. बिना उसके बुलाने का इंतजार और बिना ये सोचे के उनका बेटा क्या कहेगा? कमरे के अंदर पहुंचाते ही झूले में लेटी बच्ची को देखकर जैसे उसके पुराने घाव बिलकुल  भर गए और  बड़ी उत्सुकता से मुस्कुराता हुआ वह अपनी पोती की तरफ बढ़ा,  उसे पास से देखने, छूने और यह  एहसास करने के लिए कि आखिर वह  उसकी पोती ही नहीं, उसकी मां भी है. 

 इससे पहले कि वह अपनी पोती को हाथ भी लगा पाता बेटे ने  टोकते हुए कहा कि  “डॉक्टर ने इसे छूने से  मना किया है, इंफेक्शन हो सकता है”.

उसने हाथ पीछे खींच लिए और उसको सिर्फ दूर से देखा. तभी किसी ने  पीछे से कहा “ भैया इनके भी दो बच्चे हैं ”

उसने पीछे मुड कर देखा उसकी बेटी कह रही थी. जैसे ये उसके अपने ही दिल के शब्द थे. पहले के समय में तो उसके भी घर परिवार के  सारे लोग आते थे, कभी किसी को इन्फेक्शन नहीं हुआ. उसने बहुत प्यार से पोती को देखा और मन ही मन अपनी मां को प्रणाम करते हुए पीछे जाकर बेटी के पास खड़ा हो गया कि जैसे  कि उसकी मां ने उसको बता दिया है  कि बच्चे कितने कीमती होते हैं ? उतने कीमती जितनी मां बाप की हैसियत होती है.

 क्या परिवार में जिस समय साधन कम होते हैं, प्यार और ममता ज्यादा  होती है?

जैसे-जैसे साधन और संसाधन बढ़ते हैं, ममता और प्यार के  बंधन ढीले हो जाते हैं ?

अपनापन सूखने  लगता है ?

अपने परिवार के लिए किया गया संघर्ष कहीं खो जाता है ?

ऐसी ऐसी परियोजनाएं जिन्हें पूरा करने के लिए व्यक्ति दीवानगी की हद तक लगा रहता है, अपना सबकुछ दांव पर लगा देता है. परियोजनाए सफल होने के बाद ऐसा पारितोषक मिलता है  इसकी तो उसने कभी कल्पना भी नहीं की  थी. एक थके हारे पराजित योद्धा की तरह वह कमरे से बाहर आ गया. पत्नी से उसने कहा कि कुछ बहुत जरूरी काम आ गया है इसलिए उसे आज ही कानपुर वापस जाना पड़ेगा.

“ रिटायरर्मेंट के बाद अब कौन सा जरूरी काम बचा है” पत्नी ने कहा.

“तुम चाहो तो रुक जाओ, मुझे तो जाना  ही पडेगा" यह कह कर वह वापस चल दिया.

 पत्नी तो रुक गई. पता नहीं वह कुछ समझ भी पाई या नहीं किन्तु उसमे इतने सहनशीलता तो   है कि बड़े से बड़ा अपमान और उपेक्षा आंसुओं में बहा देगी, लेकिन वह तो पिता है, पुरुष है जिसके आंसू नहीं निकल सकते हैं, जो किसी को एहसास भी नहीं होने दे सकता कि उसे कितना दुख हुआ है. 

वह कल रात  ही बंगलोर से वापस आया था. रात में कब आँख लगी थी उसे पता नहीं.  आज सुबह उठा और चाय  लेकर हमेशा की तरह बालकनी में बैठा हुआ था.

और .... तभी घंटी बजी, दरबाजा खोला तो सामने काम वाली बाई खड़ी थी.

आश्चर्य उसने से पूछा “अरे तुम्हें कैसे मालूम हुआ मैं आ गया हूं”

“भाभी ने सुबह फोन किया था कि भैया रात में पहुंच गए होंगे, जरा देख लेना” उसने बताया

“भैया पोती की बहुत-बहुत बधाई. भाभी कह रही थी कि सब कुछ बहुत अच्छा हो गया है बहू भी ठीक है और बच्ची भी  ठीक है” उसने कहा

वह मुस्करा कर रह गया. कुछ बोल नहीं पाया.

“भैया मेरे यहां भी बहू को बेटा हुआ है,” उसने बताया

“अरे बहुत अच्छा,  बेटा और बहू तो ठीक है ?’  उसने पूंछा

“हैं भैया बिलकुल ठीक है’

" नाती के  नाक, आँखे बिलकुल सुनील ( सुनील बाई का बेटा था ) के पापा की तरह हैं. ऐसा लगता है कि वो हम लोगों के बीच फिर आ गए हैं. उन्हें आना ही था हम सब पहले से ही जानते थे." बताते हुए उसके चहरे पर चमक आ गई थी.

"भैया आज उसकी छटी  है" उसने आगे बताया .

"बहुत अच्छा,  खूब धूम धाम से करो छटी"  उसने औपचारिकता वस कह दिया 

"भैया अब क्या  धूमधाम से करें ?" कहते हुए उसके आंसू आ गए.

"सुनील के पापा ने सभी बच्चों के छठी, मुंडन सब कुछ  बहुत धूमधाम से किए थे, लेकिन तब की बात और थी. अब हम लोगों के पास है ही क्या? “ लेकिन भैया हमारा लड़का और बहू बहुत अच्छे हैं. बिना हमसे पूंछे बताये कुछ नहीं करते. बहुत ध्यान रखते हैं हमारा.  सुनील तो अपने  पिताजी को याद करके बहुत दुखी हो रहा था कह रहा था कि पिता जी होते तो बात अलग थी. कह रहा था कि  किसी तरह से ऐसे ही कर लो . अब उसे कौन समझाए भैया,  वह  तो बहुत छोटा था, जब उसके पिता जी गुजर गए थे. किसी तरह से आप सब लोगों के घरों में  काम करके बच्चे पाल पोष कर बड़े किये और जितनी हमें समझ थी जितना हम कर सकते थे, किया. अब दोनों काम करते हैं. सुनील ई रिक्शा चलाता है और छोटा वाला दवाई की दुकान में काम करता है.  अब जो भी है भैया किसी तरीके से घर  व्यवस्थित हो गया है.  सब अपना अपना काम कर रहे हैं." उसने संतोष व्यक्त करते हुए जैसे एक साँस में अपने जीवन का सारांश बता दिया

 "पारिवरिक प्रेम  और  पारिवारिक खुशी के लिए  जो भी किया जाता है वह बहुत  अच्छा ही  होता है. ये खुशी का मौका है, परिवार के साथ  इसे उत्सव की तरह  मनाओ, हर एक के नसीब यह सुख नहीं होता " यह कहते हुए वह अंदर गया और  एक पैकेट लाकर बाई के  हाथ में पकड़ा दिया. यह वही  कपड़े थे जो अपने होने वाले पोते / पोती के  लिए बैंगलोर ले गया  था किन्तु अचानक चले आने के कारण दे नहीं पाया था .

"इसमें तुम्हारे नाती के लिए कपड़े हैं, और ये रु.१००००/ रख लो.  यह मौका खुशी का है, इसे हाथ से मत जाने दो" उसने कहा

बाई की आँखों में आंसू आ गए. उसने  आंचल से आंसू पोंछे और कहा " भैया छोटे मुहं, बड़ी बात है लेकिन अगर एक उपकार आप हमारे परिवार पर कर दें तो हम लोंगों को बहुत खुशी होगी"

" क्या ?" उसने पूंछा

"अगर आप आकर हमारे नाती को आशीर्वाद दे दें तो हम लोग धन्य हो जायेंगे" बाई ने हाथ जोड़ लिए 

" हाँ हाँ क्यों नहीं  " उसने तपाक  से जबाब दिया " मैं जरूर आऊँगा "

"भगवान आप जैसे  लोगों को भी बनाता है, तभी तो ये दुनिया चल रही है"  बाई ने जब कहा तो उसे  समझ ही नहीं आया कि वह इसका क्या जबाब दे लेकिन उसने कहा "अब तुम जाओ तैयारियां करो, यहाँ का काम छोड़ दो.  कल देखा जाएगा"

धोती के  आंचल से अपनी भर आई आंखें पोछती बाई  धीरे-धीरे सीढिया  उतर रही थी.

इसके साथ ही उसका मन भी थोड़ा हल्का  होने लगा था.  वह सोच रहा था कि रिश्तों की डोर से  बंधे  और उसे मजबूत करने के लिए हम सब अपने अपने मां बाप और बुजुर्गों को  अपने पोते पोतियों  के रूप में खोजते रहते हैं ताकि उनसे अटूट संबंध बना रहे और तभी तो हम अपने बच्चों के चहरे में अपने प्रियजनों की शक्ल ढूंडते हैं. उन  चेहरों  में  अपने मां बाप और प्रियजनों  की आँख , नाक , कान  और  पता नहीं क्या क्या खोज निकालते  हैं ताकि हमारी पीढ़ियों  के बीच में सामंजस्य बना रह सकें. आज उसे यह समझ में गया था कि पारिव़ारिक प्रेम और रिश्तों की गर्मजोशी के लिए "क्वालिफिकेशन " और "पोजीशन" बाधक नहीं होती  और परियोजना प्रबंधन से ये चीजें पायीं तो जा सकती हैं, लेकिन पारिवारिक प्रेम और रिश्तों की प्रगाढ़ता भी मिले ये जरूरी नहीं. 

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शिव प्रकाश मिश्रा 

मूल कृति - २५ दिसम्बर २०१८  

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

शाहीन बाग़ का झूठ : और झूठ के पीछे का सच

सबसे बड़ा झूठ
शाहीन बाग का का सबसे बड़ा झूठ है कि यह धरना, प्रदर्शन, आंदोलन संशोधित नागरिक कानून और एनआरसी के विरुद्ध है और यह मुस्लिम महिलाओं द्वारा स्वत: स्फूर्त संचालित है. इसका जेएनयू जामिया और एएमयू से कोई लेना देना नहीं है.आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का इससे दूर दूर का कोई रिश्ता नही।
शाहीन बाग का केवल झूठ जानने से स्थित स्पष्ट नहीं होती इसलिए ये भी जानिए कि इसका सच क्या है ?

शाहीन बाग का सच
शाहीन बाग का सच यह है कि इसका एकमात्र उदेश्य आम आदमी पार्टी को चुनाव में जीत सुनिश्चित करना था और इसकी पूरी योजना का खाका अरिन्द केजरीवाल को रणनीतिक सलाह देने वाले प्रशान्त किशोर ने बनाया था और इसका सञ्चालन फिरोजशाह कोटला रोड पर आप के वॉर रूम से किया जा रहा था . कांग्रेस भी मुश्लिम वोट मिलने की खुशफहमी का शिकार हुयी जबकि इसका उद्देश्य उसका वोट बैंक भी लूट कर आम आदमी पार्टी को देना था. सब कुछ बहुत योजना वद्ध तरीके से हुआ. शायद इतिहास में पहलीवार हिन्दुओं का ध्रुवीकरण रोकते हुए ,जमकर मुश्लिम धुर्वीकरण किया गया। वास्तव में ये एक नायाब प्रयोग था। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का ये कहना कि ये संयोग नही प्रयोग है अक्षरसः सत्य है। आप के सभी मुस्लिम उम्मीदवार रिकार्ड मतो से जीते। उन्हें प्राप्त मतों का प्रतिशत 76% तक गया । ये अपने आप मे एक रिकॉर्ड है ।जो भी हो इस नए प्रयोग से आम आदमी पार्टी की चुनाव में शानदार जीत हुई और शाहीन बाग़ आन्दोलन की “हैप्पी इंडिंग” भी . भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनआंदोलन से उपजी एक पार्टी ने मुफ्त खोरी या/और रिश्वत खोरी का बहुत ही ईमानदारी से उपयोग किया और संविधान और लोकतंत्र की कमजोर कड़ियों को जोड़ कर , सामाजिक ताने बाने को तोड़कर , हिंदुस्तान की आत्मा को रौंदते हुए , देश की बिषम परस्थितयों को अपने फायदे के लिए निचोड़ लिया । ये अभिनव प्रयोग है ऐसा तो कभी कांग्रेस भी नही कर सकी जिसने अमेरिका की एक एजेंसी को चुनाव सलाहकार के रूप में लगा रखा था।

(आम आदमी पार्टी की जीत के बाद शाहींन बाग़ उजड़ गया)

शाहींन बाग की प्रष्ठभूमि
राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर पहले भारतीय जनता पार्टी के लिए काम करते थे । 2014 में लोकसभा चुनाव में भाजपा की विजय के बाद और मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रशांत किशोर की सीधे-सीधे राजनीति में आकर कौशल दिखाने की लालसा जागृत हो गई । सूत्रों के अनुसार उन्होंने अपनी इस इच्छा को अमित शाह के सामने प्रकट किया और अनुरोध किया कि उन्हें भाजपा में पार्टी संगठन में कोई बड़ा पद दिया जाए । भारतीय जनता पार्टी कैडर वाली पार्टी है और प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति ,मुख्यमंत्री ,राज्यपाल समेत कई बड़े नेता, कार्यकर्ता से यहां तक पहुंचे हैं .पार्टी में वैसे चाहे जितनी कमियां हो लेकिन एक बहुत अच्छी चीज है कि बाहर से आए हुए नेताओं को संगठन में किसी बड़े पद पर नहीं बैठाया जाता है ।पार्टी बाहर से आए नेताओं को विधानसभा, लोकसभा का टिकट तो दे सकती है उन्हें विधान परिषद और राज्यसभा भेज सकती है लेकिन संगठन में महत्वपूर्ण पद पर नहीं बैठा सकती . कहा जाता है कि श्री प्रशांत किशोर की मांग पूरी नहीं हो सकी लेकिन अमित शाह के कहने पर उन्हें जेडीयू में न केवल शामिल किया गया बल्कि उपाध्यक्ष भी बना दिया गया । प्रशांत किशोर को इससे बहुत कुछ हासिल नहीं हुआ और उनकी फर्म विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के लिए कार्य करती रही । इस बीच भारतीय जनता पार्टी से उनके रिश्ते बिगड़ते रहे ।हाल ही में इसकी पराकाष्ठा तब हो गई जब उन्होंने पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को लोक सभा और विधानसभा चुनाव के लिए अपनी फर्म का रणनीतिक सलाह हेतु अनुबंध कर लिया । लोकसभा चुनाव में प्रशांत किशोर के अथक प्रयासों के बावजूद भी भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को सीधी टक्कर देकर 42 में से 18 सीटें जीतने में भी सफल रही । इसबीच अरविंद केजरीवाल ने भी प्रशांत किशोर को दिल्ली विधान सभा चुनाव हेतु अनुबंधित कर लिया। प्रशांत किशोर ने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के लिए संशोधित नागरिकता कानून और एनआरसी को जीत का थीम बना कर योजना बनाई. इस बीच CAA और NRC को लेकर प्रशान्त किशोर के सम्बन्ध भाजपा से इतने ख़राब हो गये कि अमित शाह की सिफारिस पर जेडीयू में लिए गए प्रशांत किशोर को अमित शाह की नाराजगी के बाद ही बाहर का रास्ता दिखाया गया .

(जीत की खुशी- प्रशांत किशोर और केजरीवाल )

जहां पश्चिम बंगाल में स्वयं ममता बनर्जी संशोधित नागरिकता कानून के विरोध में सड़कों पर है, वही दिल्ली में केजरीवाल को इस मुहिम से दूर रखते हुए शाहीन बाग को बहुत सोच समझ कर आन्दोलन का केंन्द्र बनाया गया । लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सभी सातों सीटों पर जीतने वाली भाजपा को हर विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम महिलाओं ने जमकर वोट किए थे । जिसके पीछे तीन तलाक और हलाला खत्म करने की खुशी थी। इसलिए जानबूझकर शाहीन बाग में महिलाओं को आगे किया गया ताकि इन मुस्लिम महिलाओं को भाजपा को वोट देने से रोका जा सके और इस तरह मुस्लिमों को एकजुट करके एकमुश्त वोट आप को दिलवाया जा सके । परोक्ष रूप से आम आदमी पार्टी ने खासतौर से उसके मुस्लिम नेताओं और कुछ मुस्लिम संगठनों ने शाहीन बाग को वित्त पोषित किया । प्रदर्शनकारियों के लिए बहुत ही अच्छे खाने-पीने के इंतजाम किए गए ताकि उनको लंबे समय तक रोका जा सके । प्रदर्शनकारियों में बड़ी संख्या में दिहाड़ी मजदूर और अल्प आय वर्ग के लोग थे । कहा तो यह भी जाता है कि उन्हें प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान किया जा रहा है . इसका नतीजा यह हुआ कि शाहीन बाग में आगे महिलाएं और पीछे एक बहुत बड़ा तंत्र या षड्यंत्र था ।आम आदमी पार्टी की जीत पर शाहीन बाग में जमकर उल्लास मनाया गया लोग एक दूसरे से गले मिले और बिरयानी बांटी गई । धीरे-धीरे कम प्रदर्शन कारी और भी कम होने लगे हैं और वित्त पोषक भी दूर हो रहे हैं . अब शाहीन बाग का आंदोलन अपने आप खत्म हो रहा है क्योंकि उद्देश्य पूरा हो चुका है। जे एन यू, जामिया, और ए एम यू भी अब शांत हो जाएंगे । पूरे घटना क्रम में कांग्रेस एक "आत्मघाती दल" के रूप में उभरा है। उन्हें भाजपा के न जीत पाने या कांग्रेस द्वारा भाजपा को रोक देने की बेहद खुशी है। राहुल, प्रियंका और सोनिया सब बेहद खुश हैं । उन्हें इस बात का जरा भी गुमान नही कि उन्होंने स्वयं कांग्रेस में आत्मघाती टाइम बंम लगा दिया है । अगर स्थिति यही रही तो कांग्रेस स्वयं कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार कर देगी। कांग्रेस वहीं जीत सकती है जहां वह भाजपा के मुख्य मुकाबले में है जैसा मप्र , छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हुआ। जहाँ कहीं भी कांग्रेस ने किसी तीसरे दल को भाजपा के सामने खड़ा कर दिया वहां कांग्रेस फिर कभी खड़ी नही हो पाई। यदि दिल्ली में कांग्रेस और आप के संयुक्त वोट प्रतिशत का औसत निकालें तो भाजपा से 8% से भी ज्यादा कम हैं । इसका मतलब ये है कि कांग्रेस अगर ठीक से चुनाव लड़ती तो भाजपा जीत जाती। ये भी निष्चित है कि कभी आप हारेगी तो जीतने वाली भाजपा होगी। कांग्रेस तो दिल्ली से सदा सर्वदा के लिए विदा हो गई।

कह सकते हैं कि शाहीन बाग आंदोलन का मुख्य मकसद मुस्लिम पुरुष और महिला वोटों को एकजुट करके आम आदमी पार्टी के खाते में डालना था ताकि अरविंद केजरीवाल की जीत सुनिश्चित की जा सके . इसमें कांग्रेस ने भी बहुत सहयोग किया । एक तरफ मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर, दिग्विजय सिंह और सलमान खुर्शीद जैसे फायर ब्रांड नेताओं ने जहरीला माहौल बनाया और उन्हें भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध खड़ा किया दूसरी तरफ कांग्रेस की युवा बिग्रेड राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश से पूर्वी उत्तर प्रदेश तक और शाहीन बाग से इंडिया गेट व जंतर मंतर तक कानून व्यवस्था को तार-तार करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी । जेएनयू, जामिया और एएमयू भी रह रह कर रंग बदलते रहे और केंद्र सरकार को उलझाने का काम करते रहे . इतनी बड़ी पटकथा के लेखक को नमन करना चाहिये , हम लोगों को नही , कम से कम राजनीतिक लोगों को .
**************** शिव मिश्रा *****************
फुट नोट : सूचना श्रोत 

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

क्या आम आदमी की उपेक्षा भाजपा की हार का कारण बना

भाजपा की हार तो हुई ही नही क्योकि वह सत्ता में नही थी। हारता वही है जो पहले जीता हो। हां भाजपा जीत नही सकी या आप को हरा नहीं सकी। ये दिनरात चिल्लाने वाले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का स्टेटमेंट है जहां पढ़े लिखे समझदार पत्रकारों की संख्या लगातार घटती जा रही हैं। दिल्ली में भाजपा पिछले 25 सालों से सत्ता से बाहर है किंतु लगातार जीतने का भरपूर प्रयास कर रही है। आप के पहले यानी 7 साल पहले तक कांग्रेस की सरकार थी जो लगातार 15 वर्षों तक रही , और कांग्रेस भी मैदान में है सिर्फ उपस्थिति दर्ज करने के लिये ।
अब विश्लेषण करते हैं भाजपा के जीत ना पाने के कारणों का जो मुख्यतः निम्न है
दिल्ली की जनता मतदान करने के मामले में शायद काफी परिपक्व है किस चुनाव में किसे वोट देना है इसकी कला शायद देश में सबसे अधिक दिल्ली की जनता को आती है इसलिए 6 सालों में हुए दो लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली की सभी 7 सीटों पर विजय प्राप्त की और यही नहीं नगर निगम के चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी ने विजय श्री प्राप्त की लेकिन पिछले 7 सालों में विधानसभा के हुए 3 चुनाव में भारतीय जनता पार्टी जीत नहीं सकी । आम आदमी पार्टी की सरकार से पहले शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेसी सरकार 15 सालों से थी ।
अरविंद केजरीवाल अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधीआंदोलन से उभरे हुए बेहद सधे और शातिर किस्म के व्यक्ति हैं वह जहां कहीं भी रहते हैं उन्होंने अपने वर्चस्व को कायम करने के लिए वह सब कुछ करते हैं जो किया जा सकता है और संभव हो सकता है । नाटकीयता उनके रग रग में रची बसी है । उन्हें अच्छी तरह से समझ में आ गया है की हिंदुस्तान की जनता भ्रष्टाचार विरोध की बात तो करती है लेकिन दूसरों का . लेकिन असल में भ्रष्टाचार उसे पसंद है अगर वह अपने हित में हो । दिल्ली में केजरीवाल ने यही किया । 200 यूनिट तक बिजली मुफ्त, 20000 लीटर तक पानी मुफ्त, मेट्रो में महिलाओं के लिए यात्रा मुफ्त, हवा में प्रदूषण बढ़ने पर मास्क मुफ़्त। यानी दिल्ली मुफ्त की संस्कृति का शहर बन रहा है और इसे अब आसानी से बदलना संभव नहीं लगता इसलिए सभी राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा इसी बात की होगी की कौन कितनी मुफ्त की रेवड़ी बांट सकता है? मुफ्त की इस स्पर्धा में आम आदमी पार्टी दिल्ली की नंबर एक पार्टी है इसलिए उसे हर वर्ग में वोट दिया। गरीब और अमीर हिंदू और मुसलमान सभी ने वोट किया। संशोधित नागरिक कानून और एनआरसी के आंदोलन और शाहीन बाग के कारण मुसलमानों के वोट का भाजपा के विरुद्ध एकतरफा ध्रुवीकरण हो चुका था । इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं कहा जा सकता क्योकि अगर मुस्लिम तुष्टिकरण या मुस्लिम ध्रुवीकरण होता है तो इसका चोला धर्मनिपेक्ष होता है . मुस्लिम वोट उसी दल को मिलने थे जो भाजपा को हराने की क्षमता रखता हो इसलिए स्वाभाविक रूप से यह वोट आम आदमी पार्टी को मिले और उसने शानदार सफलता प्राप्त की। कांग्रेश पहले ही अपनी वसीयत आप के नाम लिख चुकी है इसलिए उसके नेता भाजपा की हार का जश्न मना रहे हैं .
भारतीय जनता पार्टी एक कैडर वाली पार्टी है जो आज की तारीख में भी सबसे ज्यादा अनुशासित और सक्रिय कार्यकर्ताओं वाली पार्टी है और ज्यादातर देशभक्ति के कार्य करती है इसलिए स्वाभाविक रूप से मुसलमान उसे अपना दुश्मन नंबर एक मानते हैं । 2019 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिम महिलाओं ने तीन तलाक और हलाला कानून बनाने के कारण मोदी भाई जान को बढ़-चढ़कर वोट किया । इससे मुस्लिम वोट बैंक बट गया और यह मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले दलों की हार का कारण भी बना । विभिन्न मुस्लिम संगठन राजनीतिक दल और राजनीत को रणनीतिक दिशा देने वाले कई लोग इसका विश्लेषण कर रहे थे अंत में कुछ सालों से भाजपा के दुश्मन बने प्रशांत किशोर ने एक रणनीति बनाई जिसके अंतर्गत मुस्लिम महिलाओं को भारतीय जनता पार्टी को वोट देने से रोकना था और वह रणनीति संशोधित नागरिक कानून के विरोध में महिलाओं को सामने लाना । शाहीन बाग इसका ज्वलंत उदाहरण है शाहीन बाग में और चाहे कुछ भी किया हो लेकिन उसने मुस्लिम वोट बैंक को एकजुट कर दिया और यह दिल्ली के चुनाव से पता चलता है । आम आदमी पार्टी के पांचों मुसलमान उम्मीदवार भारी अंतर से जीते और उसके एक उम्मीदवार अमानतुल्लाह खान जिसने हिंदुओं और मुस्लिमों में खाई बढ़ाने के लिए बहुत ही जहरीले भाषण दिए और अल्लाह के नाम पर हिंदुस्तान को फतह करने की बात की, ने ७१००० मतों से जीते और रिकॉर्ड बनाया जबकि दिल्ली के विकास पुरुष अरविन्द केजरीवाल केवल २१००० मतों से जीत सके । शिक्षा के क्षेत्र में तथाकथित क्रांति लाने वाले मनीष शिशोदिया बमुश्किल हारते हारते बचे . क्या अमनातुल्लाह खान इन दोनों से बड़े नेता हैं ? क्या अब भी कहा जायेगा कि “बर्मा नहीं निकल जायेंगे, ३५ करोड़ हैं हलख में अटक जायेंगे” का कोई प्रभाव नहीं पडा . अब भी कहा जायेगा कि दिल्ली में शाहीन बाग़ का प्रभाव नहीं पड़ा? यह सब भारत के भविष्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है. हिंदुस्तान को गाली देकर, हिंदुओं को गाली देकर ,देश के विरोध में भाषण देकर, हिंदुत्व से आजादी का नारा लगाकर अगर कोई व्यक्ति चुनाव में रिकॉर्ड जीत हासिल कर सकता है तो हिंदुस्तान को हिंदुओं को, हिंदुत्व को और ज्यादा गाली खाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए . लेकिन आश्चर्यजनक चीज है इस सब पर मुफ्त की संस्कृत भारी पड़ी और लोगों ने इसे नजरअंदाज करते हुए अपने फायदे के लिए आम आदमी पार्टी को वोट दिया ।
ये भी सही है कि भाजपा की जीत न हो पाने का कारण मिडल वलास लोगों की उपेक्षा करना भी हैं। सबसे ज्वलंत उदाहरण है केंद्र का बजट जहां आयकर छूट में ऐसी बाजीगरी की गई हैं कि कोई समझ नही पा रहा कि मिडल क्लास के बूते सरकार बनाने वाली भाजपा ऐसा भी कर सकती है? दरअसल भाजपा की जब भी सरकार बनती है वह इतनी मेहनत करके अर्थव्यवस्था को दीवानगी की हद तक जाकर मजबूत करती है और ऐसे कड़े कदम उठाती है कि सबसे पहले उसके कार्यकर्ता नाराज होते हैं फिर मिडल क्लास और फिर मतदाता । सरकार चली जाती है और मजबूत की गई अर्थव्यबस्था का फायदा नई सरकार उठती है और जमकर ऋण माफी और दूसरी सब्सिडी वाली योजनाए चलाती है।२००४ में अटल सरकार जाने के बाद कांग्रेस ने यही किया. भाजपा को इससे सबक लेना चाहिए कि जब वोए मिलेंगे तभी जीतेंगे और जब जीतेंगे तभी देश की रक्षा कर सकेंगे. लेकिन ये भी सही है कि क्या ये मोदी सब अपने फायदे के लिए कर रहें हैं ? नहीं वह हमारे लिए और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए कर रहे हैं , उन्होंने अभी तक जो किया आज़ादी के बाद कोई भी नहीं कर सका …कोई भी नहीं ! लेकिन हम प्याज की कीमतें देखते हैं , पेट्रोल के दाम देखते हैं , मुफ्त में २०० यूनिट बिजली देखते हैं और २०००० लीटर मुफ्त पानी में अपना वोट बहा देते हैं .
यही है जीत न पाने या हार जाने का असली कारण। लेकिन याद रहे ये मोदी या भाजपा की नहीं हम सबकी शर्म नाक हार है. हमने उन पीढ़ियों को भी हरा दिया हैं, जिन्होंने अभी जन्म भी नहीं लिया है . पता नहीं वे किस रंग के झंडे वाले देश में जन्म लेंगी .

मंगलवार, 11 फ़रवरी 2020

भाजपा की हार के लिए क्या मनोज तिवारी बलि का बकरा होंगे ?

ये बहस अभी सिर्फ मीडिया में है और विशेषतया टीवी पर। भाजपा की तो अभी आधाकारिक तौर पर मीटिंग होनी है जिसमे इस पर चर्चा होगी। जहां जहां तक मैं भारतीय जनता पार्टी को समझता हूं यह इस तरह की पार्टी नहीं है जिसने किसी व्यक्ति को बलि का बकरा बनाया जाए और वैसे भी भारतीय जनता पार्टी में सभी को मालूम है की मनोज तिवारी खाटी राजनीतिक व्यक्ति नहीं है । यद्यपि प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वह हर निर्वाचन क्षेत्र में ऊपर से लेकर नीचे तक अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करते और अब सरकार की कमियां लोगों को बताते । जमीनी स्तर पर जब कार्य होता है तो उसके परिणाम निश्चित रूप से अलग होते हैं। दिल्ली का मामला पूरी तरह से अलग है। यहां कीअति संवेदनशीलता नीचे से लेकर ऊपर तक प्रधानमंत्री तक सभी को मालूम थी और इसलिए स्वयं अमित शाह गली मोहल्लों में घूमे । रोड शो किए । कार्यकर्ताओं में जोश पैदा किया और कई रैलियां भी की। प्रधानमंत्री ने भी तीन रैलियां दिल्ली में की और मतदाताओं में जागरूकता लाने का प्रयास किया। नए भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी बहुत प्रयास किए। दिल्ली के सभी सांसद और विधायक भी काम में जुटे रहे और जैसा माहौल दिल्ली में दिख रहा था उ ससे ऐसा लग रहा था कि परिणाम भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में झुक गया है लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं आए।
भारतीय जनता पार्टी एक केडर वाली पार्टी है । इस तरह के दल सभी चुनाव को बहुत गंभीरता से लेते हैं और अपनी जुझारू प्रवृत्ति का परिचय देते हैं और यह अंतिम समय तक हथियार नहीं डालते हैं। इसलिए अगर हम दिल्ली चुनाव की पूरी गतिविधियों पर नजर डालें तो पाते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली का चुनाव बहुत ही अच्छे ढंग से लड़ा और वास्तव में आम आदमी पार्टी को बहुत ही संशय में डाल दिया था और उसकी वजह से चुनाव के तुरंत बाद आम आदमी पार्टी ने ईवीएम मशीनों पर प्रश्न उठाने शुरू कर दिए थे इसे स्पष्ट है कि आम आदमी पार्टी भी अंदर तक डर गई थी कि हो सकता है इस चुनाव में कुछ उल्टा हो जाए। लेकिन अब जैसा कि स्पष्ट है और विभिन्न पत्रकारों से बातचीत में पता चलता है कि भारतीय जनता पार्टी के जो कार्यकर्ता थे उनको बहुत समय से निर्वाचन क्षेत्रों में गली मोहल्लों में सक्रिय नहीं किया जा सका ।प्रधानमंत्री ने स्वयं बहुत से ऐसे कार्य दिल्ली भारतीय जनता पार्टी को सौपें थे जिन्हें समय बद्ध ढंग से किया जाना था वह नहीं हो पाए। इसका थोड़ा दुष्प्रभाव पड़ा है लेकिन फिर भी मुझे नहीं लगता कि भारतीय जनता पार्टी का कोई भी नेता मनोज तिवारी को बलि का बकरा बनायेगा ।यह सिर्फ मीडिया में अटकलें हैं और खासतौर से आम आदमी पार्टी के नेता टीवी बहस के दौरान इस तरह की बातें उठा रहे हैं कि इस तरह की हार की जिम्मेदारी किसी न किसी व्यक्ति को लेनी चाहिए। तकनीकी आधार पर कहा जाए तो यह भारतीय जनता पार्टी की हार नहीं है । इसको कहा जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी तमाम प्रयासों के बावजूद दिल्ली चुनाव जीत नहीं सकी और केजरीवाल का किला ध्वस्त नहीं कर सकी। इस मिशन में भाजपा न जाने बहुत देर से क्यो आई? लेकिन अपने वोटर्स को बांधने में कामयाब रही। फिर भी जीत न पाने की जिम्मेदारी नींचे से लेकर प्रधानमंत्री तक की हैं।

भाजपा का जीत से दूर रहने का एक कारण एक वर्ग विशेष की टैक्टिकल वोटिंग को भी जाता है जिसमे कांग्रेस का बिना लड़े आत्म समर्पण करना भी शामिल हैं। कांग्रेस बहुत खुश है कि उसने भाजपा को रोक दिया यानी हमारा चाहे सर्वनाश हो जाय लेकिन पड़ोसी का कुछ नुकसान जरूर होना चाहिए। अब कौन कहेगा कि शाहीन बाग मुद्दा नहीं था?
इन चुनाव से एक बात स्पष्ट है कि दिल्ली के मतदाता बहुत ही परिपक्व है और उन्हें किस चुनाव में किसको वोट देना है इसकी कला मालूम है। पिछले 6 सालों में दो बार लोकसभा के चुनाव हुए और दोनों ही चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली की सारी सीटें जीती और यहां तक नगर निगम के चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी ने विजय हासिल की लेकिन दिल्ली राज्य के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी पिछले 6 चुनावों से यानी पिछले 25 सालों से सरकार से बाहर है। इस पर भाजपा को गंभीरता से विचार करना होगा। अगर मुफ्त बांटने से बोत मिलते हैं तो कोई भी पीछे क्यो रहे ? आखिर उसकी जेब से क्या जाएगा ?
दूसरी सबसे बड़ी बात दिल्ली चुनाव से जो उभरती है वह यह है कि भारतीय मतदाता मुफ्त में मिली हुई चीजों का बहुत आदर करते हैं ( मैं लालच शब्द स्तेमाल नही करना चाहता क्योंकि इससे मतदाताओं का अनादर होगा) और मुफ्त सौगात देने वालों और तात्कालिक लाभ देने बालों को सत्ता सौंपने से भी नहीं हिचकते हैं और इस सब के आगे देश हित के मुद्दे, राष्ट्रहित के मुद्दे , कौमी मुद्दे, सांप्रदायिक मुद्दे सभी गौण हो जाते हैं। आप के पांचों मुस्लिम उम्मीदवारों की विजय ने तुष्टिकरण के नए द्वार खोल दिये है । अमानुल्लाह खान जिन्होंने बेहद निम्न स्तर के साम्प्रदायिक और गैर जिम्मेदार बयान देकर न केवल हिन्दू मुस्लिम खाई को और चौड़ा किया और पूरे देश मे साम्प्रदायिक आग लगाने की पूरी कोशिश की , उन्होंने जीत का रिकॉर्ड बनाया । धन्य है मुफ्तखोरी की संस्कृति जो सब कुछ बर्दास्त कर लंगर वाली लाइन में लग गई। अब समझना मुश्किल नही है कि कोई देश एक हजार साल तक गुलाम कैसे राह सकता हैं।
लगता है भाजपा मुफ्त में हार गई।

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2020

सियासी पारा : दिल्ली २०२०

दिल्ली के विधानसभा चुनाव बहुत ही रहस्य और रोमांच से भरे हुए हैं। एक महीने पहले की स्थिति केजरीवाल के तरफ झुकी हुई थी और उसका सबसे बड़ा कारण बिजली और पानी के बिलों में रियायत था । स्पष्ट है कि इसमें विकास की गाथा या भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन जैसा कुछ भी नहीं है। वास्तव में अन्ना आंदोलन से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाले केजरीवाल सिर्फ इस आधार पर दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे कि वे पारदर्शिता लाएंगे और भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंक देंगे लेकिन ऐसा कुछ भी हुआ नहीं। उनके कई मंत्रियों को भ्रष्टाचार के कारण इस्तीफा देना पड़ा । उनके एक बहुत नजदीकी रिश्तेदार को केंद्रीय जांच ब्यूरो ने भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया है केजरीवाल सरकार ने निर्माण का ठेका दिया था। उनके निजी सचिव के ऑफिस और आवास पर छापे मारे गए उसमें भी काफी आपत्तिजनक चीजें निकली । इन सबसे कम से कम एक बात तो साफ है कि जिस बुनियाद पर केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाई थी और जिस तरह की नई राजनीति जिसमें सुचिता , पारदर्शिता और ईमानदारी हो, कम से कम वह तो परवान नहीं चढ़ सकी । ऑटो रिक्शा , साइकिल और मारुति 800 का प्रयोग करने वाले केजरीवाल की अब पूरी जीवन शैली ही बदल गई है । परिवारवाद की राजनीति का विरोध करने वाले केजरीवाल का पूरा परिवार उनकी राजनीतिक यात्रा का सारथी बन रहा है ।एक से एक ईमानदार मेधावी तेजस्वी संघर्षशील और अन्ना आंदोलन में कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ देने वाले साथियों को उन्होंने बेहद बेआबरू करके पार्टी से निकाल दिया । अब उनके पास सिर्फ हां करने वालों की एक टीम है और इसलिए वह अपनी पार्टी के निर्विवाद नेता है । उनके शासनकाल की एकमात्र उपलब्धि है 200 यूनिट तक बिजली मुफ्त और कुछ सीमा तक पानी मुफ्त। यह कैसी अबधारणा उन्होंने विकसि त की ? हालांकि आज के युग में जबकि हम सभी कुछ न कुछ हद तक मुफतखोरी पसंद करने लगे हैं, बेईमानी का कुछ न कुछ अंश हम सबके अंदर विद्यमान हो चुका है , शायद केजरीवाल के पक्ष में हवा बनने का सबसे बड़ा कारण मुफ्त खोरी ही था।

लेकिन शाहिनबाग आंदोलन ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव की दिशा बदल दी। दरअसल संशोधित नागरिकता कानून के विरोध को एक ऐसा भावनात्मक मुद्दा बनाया गया कि जेएनयू से जामिया तक और एएमयू से जादवपुर तक पूरा मकड़जाल चलाया गया और इस सबके केंद्र में शाहीन बाग को प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है जहां पर 24 घंटे प्रदर्शनकारी जमे हुए हैं । इन मुस्लिम प्रदर्शनकारियों में अधिकांश बुजुर्ग महिलाएं शामिल हैं और उनको भी एक रणनीतिक योजना के तहत शामिल किया गया है क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में मुस्लिम महिलाओं ने ट्रिपल तलाक और हलाला खत्म होने के परिपेक्ष में बहुत जोर शोर से मोदी को वोट किया था। इससे थोक में पड़ने वाले मुस्लिम वोट बैंक में कमजोरी आ गई थी और इस वोट बैंक को पुनः संगठित करने के लिए और इन मुस्लिम वोटर्स को भाजपा से दूर करने के लिए उसी महिलाओं को संशोधित नागरिकता कानून के विरोध का हथियार बनाया गया।शाहीन बाग और उसके आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों की जिंदगी दूभर होती जा रही है । बच्चों की स्कूल पहुंचने में समस्याएं हैं बीमार लोगों को एंबुलेंस पहुंचने ने समस्याएं हैं और जो लोग नौकरी और उद्योग धंधे के सिलसिले में बाहर जाते हैं उनके घंटों ट्रैफिक में बर्बाद होते हैं । शाहीन बाग में जश्न का माहौल है खाने-पीने उठने बैठने सोने का पूरा इंतजाम किया गया है और प्रदर्शनकारी बहुत ही खुश हैं उनके खान-पान का खास ध्यान रखा कर जा रहा है लेकिन सवाल है यह सब कैसे हो रहा है? इनका प्रायोजक कौन है ?और इसका फायदा किसको होने वाला है? शाहीन बाग प्रदर्शन के प्रायोजकों को उम्मीद थी कि इतने बड़े जमावड़े के बाद दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार कोई सख्त कदम उठाएगी प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस पानी की बौछार छोड़ेगी जरूरत पड़ी तो लाठीचार्ज हवाई फायर भी करेगी और तब इस पूरे आंदोलन का फायदा चुनाव में मिलेगा और भाजपा और केंद्र सरकार को हिटलर शाही नादिर शाह आदि जुमलों से नवाजा जाएगा और जनता में एक मैसेज दिया जाएगा कि सरकार का एजेंडा हिंदू मुस्लिम भाईचारे को खत्म करना , समाज में विरोधाभास पैदा करना और देश में अशांति पैदा करना है । इसका तत्कालिक फायदा चुनाव में आप या कांग्रेश को हो सकता था । कांग्रेसियों हांसिए पर है, ऐसा लगता है कि शीला दीक्षित के 15 साल के शासन के बाद और अब उनकी मृत्यु के बाद दिल्ली में कांग्रेस भी मृत्यु शैया पर आ गई है और जो चुनाव कांग्रेस लड़ रही है वह एक दिखावा है क्योंकि एक राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते उसे चुनाव लड़ना है ।इस समय मुकाबला सिर्फ और सिर्फ आप और भाजपा के बीच में है और शाहीन बाग से उठे तूफान का मंजर चुनाव की रूप रेखा तय करेगी। भाजपा की ताबड़तोड़ रैलियों ने और संशोधित नागरिकता कानून पर तमाम स्पष्टीकरण के बाद और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं जैसे मणिशंकर अय्यर, सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह और शशि थरूर आदि के विष बिमन कारी बयानों के परिपेक्ष में दिल्ली की जनता को यह समझ में आ गया है कि शाहीन बाग एक नई प्रयोगशाला है और इस प्रयोगशाला का अंतिम निष्कर्ष देश के लिए बहुत भयानक हो सकता है । हैदराबाद के सांसद सहित कई मुस्लिम नेताओं के बयान आ रहे हैं कि अगर संशोधित नागरिकता कानून वापस नहीं हुआ तो देश की परिस्थितियां 1947 में पहुंच जाएंगी। यह सब आम हिंदुस्तानी को सोचने के लिए मजबूर करता है कि कौन क्या कर रहा है? कौन क्या चाहता है? दिल्ली वासियों को समझ में आ गया है कि उन्हें बिजली और पानी के बिल में थोड़ी रियायत के बाहर निकलना होगा और ऐसा नहीं है कि अगर भारतीय जनता पार्टी की सरकार आएगी तो सब्सिडी बंद हो जाएंगी क्योंकि एक बार जो रियायत शुरू हो जाती है उसे खत्म करना मुश्किल होता है । इसलिए सरकार कोई भी आएगी पानी और बिजली की छूट अनवरत जारी रहेगी। इसलिए धीरे-धीरे अब दिल्ली की जनता लालच से मुक्त हो रही है और माहौल भाजपा के पक्ष में बनता जा रहा है अकाली दल के नेताओं, हरियाणा के नेताओं और बिहार के मुख्य मंत्री और जनता दल यूनाइटेड के नीतीश कुमार ने दिल्ली में रैलियां की। उनके बहुत ही सकारात्मक परिणाम आने की संभावना है और प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की ताबड़तोड़ रैली और उसमें संशोधित नागरिक संहिता के विरुद्ध होने वाले प्रदर्शनों के परिपेक्ष में न झुकने के संकेत देना बहुत ही सकारात्मक रहा है।

अब दिल्ली की हवा बदल रही है आप और केजरीवाल के लिए मुकाबला आसान नहीं रहा और कोई आश्चर्य की बात नहीं कि अगर भारतीय जनता पार्टी बड़े बहुमत के साथ दिल्ली में सरकार बनाएं।

दिल्ली में हाल ही में प्रमुख नेताओं द्वारा की गई जनसभाएं:
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कड़कड़डूमा में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि शाहीन बाग एक संयोग नहीं , एक प्रयोग है और देश के लिए इसके दूरगामी परिणाम भयंकर और खतरनाक हो सकते हैं। दिल्ली को अराजकता के मोड़ पर नहीं छोड़ा जा सकता।
उ. प्र . के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कई जनसभाएं दिल्ली में की हैं . उन्होंने कहा- पाकिस्तान के मंत्री अरविंद केजरीवाल के समर्थन में बयान क्यों दे रहे हैं, क्योंकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि केवल केजरीवाल ही हैं जो शाहीन बाग में प्रदर्शनकारियों को मुफ्त में बिरयानी खिला सकते हैं।
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने विश्वास नगर में पार्टी उम्मीदवार के समर्थन में जनसभा की। इस दौरान उन्होंने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि योगी आदित्यनाथ हमें आकर बताएंगे कि दिल्ली में स्कूल और अस्पताल खराब हैं।
केजरीवाल ने कहा कि योगी को पहले गोरखपुर और यूपी की चिंता करनी चाहिए। गोरखपुर के अस्पतालों की क्या स्थिति है इसे सारी जनता जानती है। केजरीवाल ने कहा कि योगी पहले अपने स्कूल और अस्पताल संभालें।
प्रशांत किशोर की छुट्टी होते ही बीजेपी और जेडीयू में कुछ मीठा हो जाए का माहौल है. दिल्ली के चुनाव में पहली बार बीजेपी ने जेडीयू के साथ गठबंधन किया है. नीतीश कुमार की पार्टी के लिए 2 सीटें छोड़ी गई हैं. गठबंधन में रामविलास पासवान की पार्टी को भी एक सीट दी गई है. दिल्ली में बिहार और उ.प्र. के लोग बड़ी संख्या में हैं .
दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान गृह मंत्री अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बुराड़ी में एक साथ मंच साझा किया। इस दौरान दोनों ने अरविंद केजरीवाल पर जमकर निशाना साधा। अमित शाह ने कहा कि झूठ बोलने में केजरीवाल पहले नंबर पर हैं।
अमित शाह ने कहा, 'कई बार राज्य सरकारों के बीच विभिन्न विकास कार्यों को लेकर स्पर्धा होती है, लेकिन कहीं पर भी दिल्ली सरकार का पहला नंबर नहीं आया। अगर झूठ बोलने की कहीं स्पर्धा हो जाए, तो उसमें केजरीवाल जी का पहला नंबर आएगा।'
वैसे तो दिल्ली में कांग्रेस मृतप्राय है लेकिन राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते चुनाव तो लड़ना ही है. लड़ना कम झगड़ना ज्यादा है . चुनावी प्रचार को धार देने के लिए आखिरी सप्ताह में ताकत झोंकने की रणनीति बनाई है. गांधी परिवार अगले दो दिन दिल्ली चुनाव प्रचार के लिए उतर रहा है. सोनिया गांधी एक रैली को संबोधित करेंगी तो राहुल-प्रियंका संयुक्त रूप से चार रैलियां करेंगे. इसके जरिए कांग्रेस ने जातीय और क्षेत्रीय समीकरण को साधने का प्लान बनाया है.

दिल्ली का माहौल पल-पल बदल रहा है. हर पल कुछ नया हो रहा है. चुनावी के सियासी पारे का केंद्र बिंदु अभी भी शाहीन बाग है . अब यह देखना बाकी है कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अल्पसंख्यकों के 20% वोट पाने के लिए शाहीन बाग़ पर जो इतना बड़ा दांव लगाया है, कहीं उससे बहुसंख्यकों के 80% वोटों को एकजुट होने का मौका तो नहीं दे दिया है ? अगर ये 80% वोट एकजुट होते हैं, तो स्वाभाविक रूप से इनका बड़ा भाग भारतीय जनता पार्टी के पास ही जाएगा . ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के विजय रथ को दिल्ली में रोक पाना, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों के लिए मुश्किल ही नहीं असंभव होगा. 

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