Monday, February 3, 2020

सियासी पारा : दिल्ली २०२०

दिल्ली के विधानसभा चुनाव बहुत ही रहस्य और रोमांच से भरे हुए हैं। एक महीने पहले की स्थिति केजरीवाल के तरफ झुकी हुई थी और उसका सबसे बड़ा कारण बिजली और पानी के बिलों में रियायत था । स्पष्ट है कि इसमें विकास की गाथा या भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन जैसा कुछ भी नहीं है। वास्तव में अन्ना आंदोलन से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाले केजरीवाल सिर्फ इस आधार पर दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे कि वे पारदर्शिता लाएंगे और भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंक देंगे लेकिन ऐसा कुछ भी हुआ नहीं। उनके कई मंत्रियों को भ्रष्टाचार के कारण इस्तीफा देना पड़ा । उनके एक बहुत नजदीकी रिश्तेदार को केंद्रीय जांच ब्यूरो ने भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया है केजरीवाल सरकार ने निर्माण का ठेका दिया था। उनके निजी सचिव के ऑफिस और आवास पर छापे मारे गए उसमें भी काफी आपत्तिजनक चीजें निकली । इन सबसे कम से कम एक बात तो साफ है कि जिस बुनियाद पर केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी बनाई थी और जिस तरह की नई राजनीति जिसमें सुचिता , पारदर्शिता और ईमानदारी हो, कम से कम वह तो परवान नहीं चढ़ सकी । ऑटो रिक्शा , साइकिल और मारुति 800 का प्रयोग करने वाले केजरीवाल की अब पूरी जीवन शैली ही बदल गई है । परिवारवाद की राजनीति का विरोध करने वाले केजरीवाल का पूरा परिवार उनकी राजनीतिक यात्रा का सारथी बन रहा है ।एक से एक ईमानदार मेधावी तेजस्वी संघर्षशील और अन्ना आंदोलन में कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ देने वाले साथियों को उन्होंने बेहद बेआबरू करके पार्टी से निकाल दिया । अब उनके पास सिर्फ हां करने वालों की एक टीम है और इसलिए वह अपनी पार्टी के निर्विवाद नेता है । उनके शासनकाल की एकमात्र उपलब्धि है 200 यूनिट तक बिजली मुफ्त और कुछ सीमा तक पानी मुफ्त। यह कैसी अबधारणा उन्होंने विकसि त की ? हालांकि आज के युग में जबकि हम सभी कुछ न कुछ हद तक मुफतखोरी पसंद करने लगे हैं, बेईमानी का कुछ न कुछ अंश हम सबके अंदर विद्यमान हो चुका है , शायद केजरीवाल के पक्ष में हवा बनने का सबसे बड़ा कारण मुफ्त खोरी ही था।

लेकिन शाहिनबाग आंदोलन ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव की दिशा बदल दी। दरअसल संशोधित नागरिकता कानून के विरोध को एक ऐसा भावनात्मक मुद्दा बनाया गया कि जेएनयू से जामिया तक और एएमयू से जादवपुर तक पूरा मकड़जाल चलाया गया और इस सबके केंद्र में शाहीन बाग को प्रयोगशाला के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है जहां पर 24 घंटे प्रदर्शनकारी जमे हुए हैं । इन मुस्लिम प्रदर्शनकारियों में अधिकांश बुजुर्ग महिलाएं शामिल हैं और उनको भी एक रणनीतिक योजना के तहत शामिल किया गया है क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में मुस्लिम महिलाओं ने ट्रिपल तलाक और हलाला खत्म होने के परिपेक्ष में बहुत जोर शोर से मोदी को वोट किया था। इससे थोक में पड़ने वाले मुस्लिम वोट बैंक में कमजोरी आ गई थी और इस वोट बैंक को पुनः संगठित करने के लिए और इन मुस्लिम वोटर्स को भाजपा से दूर करने के लिए उसी महिलाओं को संशोधित नागरिकता कानून के विरोध का हथियार बनाया गया।शाहीन बाग और उसके आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों की जिंदगी दूभर होती जा रही है । बच्चों की स्कूल पहुंचने में समस्याएं हैं बीमार लोगों को एंबुलेंस पहुंचने ने समस्याएं हैं और जो लोग नौकरी और उद्योग धंधे के सिलसिले में बाहर जाते हैं उनके घंटों ट्रैफिक में बर्बाद होते हैं । शाहीन बाग में जश्न का माहौल है खाने-पीने उठने बैठने सोने का पूरा इंतजाम किया गया है और प्रदर्शनकारी बहुत ही खुश हैं उनके खान-पान का खास ध्यान रखा कर जा रहा है लेकिन सवाल है यह सब कैसे हो रहा है? इनका प्रायोजक कौन है ?और इसका फायदा किसको होने वाला है? शाहीन बाग प्रदर्शन के प्रायोजकों को उम्मीद थी कि इतने बड़े जमावड़े के बाद दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार कोई सख्त कदम उठाएगी प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस पानी की बौछार छोड़ेगी जरूरत पड़ी तो लाठीचार्ज हवाई फायर भी करेगी और तब इस पूरे आंदोलन का फायदा चुनाव में मिलेगा और भाजपा और केंद्र सरकार को हिटलर शाही नादिर शाह आदि जुमलों से नवाजा जाएगा और जनता में एक मैसेज दिया जाएगा कि सरकार का एजेंडा हिंदू मुस्लिम भाईचारे को खत्म करना , समाज में विरोधाभास पैदा करना और देश में अशांति पैदा करना है । इसका तत्कालिक फायदा चुनाव में आप या कांग्रेश को हो सकता था । कांग्रेसियों हांसिए पर है, ऐसा लगता है कि शीला दीक्षित के 15 साल के शासन के बाद और अब उनकी मृत्यु के बाद दिल्ली में कांग्रेस भी मृत्यु शैया पर आ गई है और जो चुनाव कांग्रेस लड़ रही है वह एक दिखावा है क्योंकि एक राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते उसे चुनाव लड़ना है ।इस समय मुकाबला सिर्फ और सिर्फ आप और भाजपा के बीच में है और शाहीन बाग से उठे तूफान का मंजर चुनाव की रूप रेखा तय करेगी। भाजपा की ताबड़तोड़ रैलियों ने और संशोधित नागरिकता कानून पर तमाम स्पष्टीकरण के बाद और कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं जैसे मणिशंकर अय्यर, सलमान खुर्शीद, दिग्विजय सिंह और शशि थरूर आदि के विष बिमन कारी बयानों के परिपेक्ष में दिल्ली की जनता को यह समझ में आ गया है कि शाहीन बाग एक नई प्रयोगशाला है और इस प्रयोगशाला का अंतिम निष्कर्ष देश के लिए बहुत भयानक हो सकता है । हैदराबाद के सांसद सहित कई मुस्लिम नेताओं के बयान आ रहे हैं कि अगर संशोधित नागरिकता कानून वापस नहीं हुआ तो देश की परिस्थितियां 1947 में पहुंच जाएंगी। यह सब आम हिंदुस्तानी को सोचने के लिए मजबूर करता है कि कौन क्या कर रहा है? कौन क्या चाहता है? दिल्ली वासियों को समझ में आ गया है कि उन्हें बिजली और पानी के बिल में थोड़ी रियायत के बाहर निकलना होगा और ऐसा नहीं है कि अगर भारतीय जनता पार्टी की सरकार आएगी तो सब्सिडी बंद हो जाएंगी क्योंकि एक बार जो रियायत शुरू हो जाती है उसे खत्म करना मुश्किल होता है । इसलिए सरकार कोई भी आएगी पानी और बिजली की छूट अनवरत जारी रहेगी। इसलिए धीरे-धीरे अब दिल्ली की जनता लालच से मुक्त हो रही है और माहौल भाजपा के पक्ष में बनता जा रहा है अकाली दल के नेताओं, हरियाणा के नेताओं और बिहार के मुख्य मंत्री और जनता दल यूनाइटेड के नीतीश कुमार ने दिल्ली में रैलियां की। उनके बहुत ही सकारात्मक परिणाम आने की संभावना है और प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह की ताबड़तोड़ रैली और उसमें संशोधित नागरिक संहिता के विरुद्ध होने वाले प्रदर्शनों के परिपेक्ष में न झुकने के संकेत देना बहुत ही सकारात्मक रहा है।

अब दिल्ली की हवा बदल रही है आप और केजरीवाल के लिए मुकाबला आसान नहीं रहा और कोई आश्चर्य की बात नहीं कि अगर भारतीय जनता पार्टी बड़े बहुमत के साथ दिल्ली में सरकार बनाएं।

दिल्ली में हाल ही में प्रमुख नेताओं द्वारा की गई जनसभाएं:
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कड़कड़डूमा में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि शाहीन बाग एक संयोग नहीं , एक प्रयोग है और देश के लिए इसके दूरगामी परिणाम भयंकर और खतरनाक हो सकते हैं। दिल्ली को अराजकता के मोड़ पर नहीं छोड़ा जा सकता।
उ. प्र . के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कई जनसभाएं दिल्ली में की हैं . उन्होंने कहा- पाकिस्तान के मंत्री अरविंद केजरीवाल के समर्थन में बयान क्यों दे रहे हैं, क्योंकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि केवल केजरीवाल ही हैं जो शाहीन बाग में प्रदर्शनकारियों को मुफ्त में बिरयानी खिला सकते हैं।
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने विश्वास नगर में पार्टी उम्मीदवार के समर्थन में जनसभा की। इस दौरान उन्होंने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि योगी आदित्यनाथ हमें आकर बताएंगे कि दिल्ली में स्कूल और अस्पताल खराब हैं।
केजरीवाल ने कहा कि योगी को पहले गोरखपुर और यूपी की चिंता करनी चाहिए। गोरखपुर के अस्पतालों की क्या स्थिति है इसे सारी जनता जानती है। केजरीवाल ने कहा कि योगी पहले अपने स्कूल और अस्पताल संभालें।
प्रशांत किशोर की छुट्टी होते ही बीजेपी और जेडीयू में कुछ मीठा हो जाए का माहौल है. दिल्ली के चुनाव में पहली बार बीजेपी ने जेडीयू के साथ गठबंधन किया है. नीतीश कुमार की पार्टी के लिए 2 सीटें छोड़ी गई हैं. गठबंधन में रामविलास पासवान की पार्टी को भी एक सीट दी गई है. दिल्ली में बिहार और उ.प्र. के लोग बड़ी संख्या में हैं .
दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान गृह मंत्री अमित शाह और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बुराड़ी में एक साथ मंच साझा किया। इस दौरान दोनों ने अरविंद केजरीवाल पर जमकर निशाना साधा। अमित शाह ने कहा कि झूठ बोलने में केजरीवाल पहले नंबर पर हैं।
अमित शाह ने कहा, 'कई बार राज्य सरकारों के बीच विभिन्न विकास कार्यों को लेकर स्पर्धा होती है, लेकिन कहीं पर भी दिल्ली सरकार का पहला नंबर नहीं आया। अगर झूठ बोलने की कहीं स्पर्धा हो जाए, तो उसमें केजरीवाल जी का पहला नंबर आएगा।'
वैसे तो दिल्ली में कांग्रेस मृतप्राय है लेकिन राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते चुनाव तो लड़ना ही है. लड़ना कम झगड़ना ज्यादा है . चुनावी प्रचार को धार देने के लिए आखिरी सप्ताह में ताकत झोंकने की रणनीति बनाई है. गांधी परिवार अगले दो दिन दिल्ली चुनाव प्रचार के लिए उतर रहा है. सोनिया गांधी एक रैली को संबोधित करेंगी तो राहुल-प्रियंका संयुक्त रूप से चार रैलियां करेंगे. इसके जरिए कांग्रेस ने जातीय और क्षेत्रीय समीकरण को साधने का प्लान बनाया है.

दिल्ली का माहौल पल-पल बदल रहा है. हर पल कुछ नया हो रहा है. चुनावी के सियासी पारे का केंद्र बिंदु अभी भी शाहीन बाग है . अब यह देखना बाकी है कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अल्पसंख्यकों के 20% वोट पाने के लिए शाहीन बाग़ पर जो इतना बड़ा दांव लगाया है, कहीं उससे बहुसंख्यकों के 80% वोटों को एकजुट होने का मौका तो नहीं दे दिया है ? अगर ये 80% वोट एकजुट होते हैं, तो स्वाभाविक रूप से इनका बड़ा भाग भारतीय जनता पार्टी के पास ही जाएगा . ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के विजय रथ को दिल्ली में रोक पाना, आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों के लिए मुश्किल ही नहीं असंभव होगा. 

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