Tuesday, February 11, 2020

भाजपा की हार के लिए क्या मनोज तिवारी बलि का बकरा होंगे ?

ये बहस अभी सिर्फ मीडिया में है और विशेषतया टीवी पर। भाजपा की तो अभी आधाकारिक तौर पर मीटिंग होनी है जिसमे इस पर चर्चा होगी। जहां जहां तक मैं भारतीय जनता पार्टी को समझता हूं यह इस तरह की पार्टी नहीं है जिसने किसी व्यक्ति को बलि का बकरा बनाया जाए और वैसे भी भारतीय जनता पार्टी में सभी को मालूम है की मनोज तिवारी खाटी राजनीतिक व्यक्ति नहीं है । यद्यपि प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते उनकी जिम्मेदारी बनती है कि वह हर निर्वाचन क्षेत्र में ऊपर से लेकर नीचे तक अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करते और अब सरकार की कमियां लोगों को बताते । जमीनी स्तर पर जब कार्य होता है तो उसके परिणाम निश्चित रूप से अलग होते हैं। दिल्ली का मामला पूरी तरह से अलग है। यहां कीअति संवेदनशीलता नीचे से लेकर ऊपर तक प्रधानमंत्री तक सभी को मालूम थी और इसलिए स्वयं अमित शाह गली मोहल्लों में घूमे । रोड शो किए । कार्यकर्ताओं में जोश पैदा किया और कई रैलियां भी की। प्रधानमंत्री ने भी तीन रैलियां दिल्ली में की और मतदाताओं में जागरूकता लाने का प्रयास किया। नए भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी बहुत प्रयास किए। दिल्ली के सभी सांसद और विधायक भी काम में जुटे रहे और जैसा माहौल दिल्ली में दिख रहा था उ ससे ऐसा लग रहा था कि परिणाम भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में झुक गया है लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं आए।
भारतीय जनता पार्टी एक केडर वाली पार्टी है । इस तरह के दल सभी चुनाव को बहुत गंभीरता से लेते हैं और अपनी जुझारू प्रवृत्ति का परिचय देते हैं और यह अंतिम समय तक हथियार नहीं डालते हैं। इसलिए अगर हम दिल्ली चुनाव की पूरी गतिविधियों पर नजर डालें तो पाते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली का चुनाव बहुत ही अच्छे ढंग से लड़ा और वास्तव में आम आदमी पार्टी को बहुत ही संशय में डाल दिया था और उसकी वजह से चुनाव के तुरंत बाद आम आदमी पार्टी ने ईवीएम मशीनों पर प्रश्न उठाने शुरू कर दिए थे इसे स्पष्ट है कि आम आदमी पार्टी भी अंदर तक डर गई थी कि हो सकता है इस चुनाव में कुछ उल्टा हो जाए। लेकिन अब जैसा कि स्पष्ट है और विभिन्न पत्रकारों से बातचीत में पता चलता है कि भारतीय जनता पार्टी के जो कार्यकर्ता थे उनको बहुत समय से निर्वाचन क्षेत्रों में गली मोहल्लों में सक्रिय नहीं किया जा सका ।प्रधानमंत्री ने स्वयं बहुत से ऐसे कार्य दिल्ली भारतीय जनता पार्टी को सौपें थे जिन्हें समय बद्ध ढंग से किया जाना था वह नहीं हो पाए। इसका थोड़ा दुष्प्रभाव पड़ा है लेकिन फिर भी मुझे नहीं लगता कि भारतीय जनता पार्टी का कोई भी नेता मनोज तिवारी को बलि का बकरा बनायेगा ।यह सिर्फ मीडिया में अटकलें हैं और खासतौर से आम आदमी पार्टी के नेता टीवी बहस के दौरान इस तरह की बातें उठा रहे हैं कि इस तरह की हार की जिम्मेदारी किसी न किसी व्यक्ति को लेनी चाहिए। तकनीकी आधार पर कहा जाए तो यह भारतीय जनता पार्टी की हार नहीं है । इसको कहा जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी तमाम प्रयासों के बावजूद दिल्ली चुनाव जीत नहीं सकी और केजरीवाल का किला ध्वस्त नहीं कर सकी। इस मिशन में भाजपा न जाने बहुत देर से क्यो आई? लेकिन अपने वोटर्स को बांधने में कामयाब रही। फिर भी जीत न पाने की जिम्मेदारी नींचे से लेकर प्रधानमंत्री तक की हैं।

भाजपा का जीत से दूर रहने का एक कारण एक वर्ग विशेष की टैक्टिकल वोटिंग को भी जाता है जिसमे कांग्रेस का बिना लड़े आत्म समर्पण करना भी शामिल हैं। कांग्रेस बहुत खुश है कि उसने भाजपा को रोक दिया यानी हमारा चाहे सर्वनाश हो जाय लेकिन पड़ोसी का कुछ नुकसान जरूर होना चाहिए। अब कौन कहेगा कि शाहीन बाग मुद्दा नहीं था?
इन चुनाव से एक बात स्पष्ट है कि दिल्ली के मतदाता बहुत ही परिपक्व है और उन्हें किस चुनाव में किसको वोट देना है इसकी कला मालूम है। पिछले 6 सालों में दो बार लोकसभा के चुनाव हुए और दोनों ही चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली की सारी सीटें जीती और यहां तक नगर निगम के चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी ने विजय हासिल की लेकिन दिल्ली राज्य के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी पिछले 6 चुनावों से यानी पिछले 25 सालों से सरकार से बाहर है। इस पर भाजपा को गंभीरता से विचार करना होगा। अगर मुफ्त बांटने से बोत मिलते हैं तो कोई भी पीछे क्यो रहे ? आखिर उसकी जेब से क्या जाएगा ?
दूसरी सबसे बड़ी बात दिल्ली चुनाव से जो उभरती है वह यह है कि भारतीय मतदाता मुफ्त में मिली हुई चीजों का बहुत आदर करते हैं ( मैं लालच शब्द स्तेमाल नही करना चाहता क्योंकि इससे मतदाताओं का अनादर होगा) और मुफ्त सौगात देने वालों और तात्कालिक लाभ देने बालों को सत्ता सौंपने से भी नहीं हिचकते हैं और इस सब के आगे देश हित के मुद्दे, राष्ट्रहित के मुद्दे , कौमी मुद्दे, सांप्रदायिक मुद्दे सभी गौण हो जाते हैं। आप के पांचों मुस्लिम उम्मीदवारों की विजय ने तुष्टिकरण के नए द्वार खोल दिये है । अमानुल्लाह खान जिन्होंने बेहद निम्न स्तर के साम्प्रदायिक और गैर जिम्मेदार बयान देकर न केवल हिन्दू मुस्लिम खाई को और चौड़ा किया और पूरे देश मे साम्प्रदायिक आग लगाने की पूरी कोशिश की , उन्होंने जीत का रिकॉर्ड बनाया । धन्य है मुफ्तखोरी की संस्कृति जो सब कुछ बर्दास्त कर लंगर वाली लाइन में लग गई। अब समझना मुश्किल नही है कि कोई देश एक हजार साल तक गुलाम कैसे राह सकता हैं।
लगता है भाजपा मुफ्त में हार गई।

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