मंगलवार, 29 अप्रैल 2025

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का हिंदू विरोध क्यों ?

 



स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का हिंदू विरोध क्यों ?

आजकल एक दंडी बाबा  स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती बहुत चर्चा में है. वह अपने आप को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य कहते हैं. सामान्य जनता भी उन्हें शंकराचार्य ही समझती है और मीडिया ने तो उन्हें शंकराचार्य के रूप में स्थापित कर ही दिया है. उन्होंने पहलगाम में हुई घटना के लिए मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि सबसे पहले तो चौकीदार को पकड़ा जाना चाहिए वह क्या कर रहा था और इस तरह उन्हें जिम्मेदार ठहराया है. पाकिस्तान के विरुद्ध प्रस्तावित कार्रवाई का भी उन्होंने मखौल उड़ाते हुए कहा कि मोदी कहते रहते हैं कि ये कर देंगे वो कर देंगे और जनता को बेवकूफ बनाते हैं. सिंधु नदी का जल रोका ही नहीं जा सकता है क्योंकि भारत के पास इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री झूठ बोल रहे हैं और मीडिया भी सनसनी फैला रहा है कि पाकिस्तान को बूंद बूंद पानी को तरसा देंगे.

इसके पहले भी वह कई मामलों में हिंदू विरोध की दस्तक दे चुके हैं. उन्होंने मुर्शीदाबाद की घटना को कानून और व्यवस्था का मामला बताते हुए कहा कि इसे हिंदू मुस्लिम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. तीर्थराज प्रयाग में आयोजित महाकुंभ 2025 में भगदड़ मचने वाली घटना के बाद उन्होंने योगी आदित्यनाथ पर जमकर प्रहार किया था और उन्हें झूठा मुख्यमंत्री करार दिया था. उनके इस्तीफ़े की मांग की और महाकुंभ को सरकारी कुंभ की संज्ञा देते हुए तमाम अव्यवस्थाओं को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया और योगी सरकार की आलोचना की. दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती भाजपा को घेरने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते और कई मौकों पर तो ऐसा लगता है कि उनका व्यवहार विशुद्ध राजनैतिक है और वे किसी राजनीतिक दल का मोहरा बने हुए हैं. 

उनके व्यवहार से ऐसा लगता है जैसे वह एक असंतुष्ट व्यक्ति हैं और भाजपा से खासे नाराज उनकी नाराजगी की वजह क्या है, इस पर शोध करने से पता चलता है कि अविमुक्तेश्वरानंद को लगता है कि केंद्र की भाजपा सरकार ने उन्हें ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य बनने से रोकने की कोशिश की और उनके कारण ही सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी पट्टाभिषेक पर रोक लगा दी है.

अविमुक्तेश्वरानंद गुजरात की द्वारका-शारदा पीठ और उत्तराखंड की ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य हैं. स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का 11 सितंबर २०२२ को निधन हो गया था। इसके बाद उनकी वसीयत के आधार पर उनके निजी सचिव ने अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ का नया शंकराचार्य घोषित कर दिया था। यह बहुत असामान्य घटना थी क्योंकि किसी भी शंकराचार्य की नियुक्ति वसीयत के आधार पर नहीं हो सकती. वास्तव में शंकराचार्य के चयन की एक प्रक्रिया है जिसका पालन नहीं किया गया था. इस कारण संन्यासी अखाड़े ने अविमुक्तेश्वर को ज्योतिष पीठ का नया शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया। निरंजनी अखाड़ा और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने भी विरोध किया और कहा कि शंकराचार्य की नियुक्ति की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है। मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा. अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने समर्थन में झूठ बोल कर कहा कि उनकी नियुक्ति का समर्थन गोवर्धन पीठ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने भी किया है लेकिन गोवर्धन पीठ पुरी के शंकराचार्य की और से एक हलफनामा दायर कर बताया गया कि उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य के रूप में नियुक्ति का समर्थन नहीं किया है. भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल ने भी इस बात की पुष्टि की जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक समारोह पर अगले आदेशों तक रोक लगा दी, जो आज भी लगी है. पट्टाभिषेक समारोह वह होते हैं जिसमे चयनित शंकराचार्य की विधिवत शंकराचार्य के रूप में पदस्थापना की जाती है. इसलिए अविमुक्तेश्वरानंद ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य नहीं है.

ज्योतिषपीठ की विडंबना यह भी है की अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती भी पूरे कार्यकाल विवादों से घिरे रहे और उनकी नियुक्ति भी शंकराचार्य के रूप में कभी नहीं हो सकी थी. 1973 में जब ज्योतिष्पीठ में शंकराचार्य का पद रिक्त हुआ तो काशी विद्वत परिषद और भारत धर्म महामंडल ने शंकराचार्य की जिम्मेदारी स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को दे दी लेकिन एक अन्य सन्यासी स्वामी वासुदेवानंद ने शंकराचार्य के पद पर अपनी दावेदारी पेश कर दी और मामला प्रयागराज उच्च न्यायालय पहुँचा. 44 साल बाद उच्च न्यायालय ने 2017 में अपने फैसले में वासुदेवानंद  की दावेदारी को ठुकरा दिया और स्वरूपानंद सरस्वती की नियुक्ति को अवैध घोषित कर दिया. उच्च न्यायालय ने काशी विद्वत परिषद को अन्य तीन मठों के प्रमुखों से सलाह करके किसी योग शंकराचार्य को चुनने का निर्देश दिया लेकिन न्यायालय ने यह भी कहा कि जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती स्वरूपानंद सरस्वती ज्योतिर्मठ के कार्यवाहक शंकराचार्य के रूप में कार्य कर सकते हैं. वह अपनी आखिरी सांस तक केयरटेकर शंकराचार्य के रूप में कार्य करते रहे. इन्हीं केयर टेकर शंकराचार्य की वसीयत के आधार पर अपनी दावेदारी पेश करने वाले अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति का मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा और उनके पट्टाभिषेक पर रोक लग गई.

शंकराचार्य के रूप में अपनी नियुक्ति ना हो पाने के लिए वे केंद्र की मोदी सरकार को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराते हैं और इसलिए वह राजनैतिक रूप से अत्यन्त मुखर होकर हर संभव उनका विरोध करते हैं. सर्वोच्च न्यायालय में कांग्रेस ने अपने वकीलों के माध्यम से उनकी सहायता की थी इसलिए वह कांग्रेस के पक्षधर हैं और कांग्रेस के पक्षधर होने के नाते वे पूरे इंडी गठबंधन के भी पक्षधर हैं. कांग्रेस ने अपने मीडिया विभाग के माध्यम से उन्हें शंकराचार्य के रूप में स्थापित कर दिया है और उन्हें इस्तेमाल कर रही है. अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती पर भी कांग्रेसी शंकराचार्य होने का आरोप पूरी जिंदगीभर चस्पा रहा क्योंकि वह धार्मिक मामलों में भी कांग्रेस का पक्ष आगे बढ़ाते थे तथा भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ खुलकर मोर्चा संभालते थे.

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के निवासी अविमुक्तेशरानंद  का नाम उमाशंकर उपाध्याय है जिहोने डॉक्टर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की डिग्रियां लेते हुए राजनीति में भी ज़ोर आजमाइश की और छात्र राजनीति में हिस्सा लिया. अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने शंकराचार्य के प्रतिनिधि के रूप में मुस्लिम त्यौहार के परिदृश्य में गणेश प्रतिमा विसर्जन पर रोक लगाने के सरकार के फैसले के विरुद्ध साधु संतों के एक प्रदर्शन का आयोजन किया था और सरकार के निर्देश पर पुलिस द्वारा उनकी जमकर पिटाई की गई थी.  महाकुंभ के दौरान अखिलेश यादव ने उनसे मिलकर पिछली घटना के लिए खेद व्यक्त किया तो उन्होंने अतीत की पीड़ा भूल कर अखिलेश यादव के साथ मिलकर महाकुंभ के नाम पर केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को जमकर घेरा.

सूत्र बताते हैं कि भाजपा के चुनाव चिन्ह पर उन्होंने 2014 में लोकसभा का चुनाव लड़ने की भी इच्छा ज़ाहिर की थी जिसे भाजपा ने उनके कांग्रेसी संबंधों के चलते स्वीकार नहीं किया. 2019 के लोकसभा चुनावों में अविमुक्तेश्वरानंद ने वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र के खिलाफ एक उम्मीदवार उतारने का प्रयास किया था जो सफल नहीं हो सका लेकिन 2024 में गौ गठबंधन के बैनर तले एक उम्मीदवार उतार भी दिया था. कांग्रेस नेता अजय राय द्वारा वाराणसी में मोदी के विरोध में आयोजित राजनैतिक धरना प्रदर्शन में भी अविमुक्तेश्वरानंद ने बढ़ चढ़कर भाग लिया था.

भाजपा का विरोध करने के लिए वे आज सन्यासी की गरिमा को गिराते हुए हिंदू विरोधी और राष्ट्र विरोधी लाइन ले रहे हैं, जो उन्हें शंकराचार्य के पद हेतु पूरी तरह से अयोग्य सिद्ध करता है . ऐसे धर्मगुरु, साधु, सन्यासी और शंकराचार्य  जो अपने निजी स्वार्थ में लिप्त हैं,  सनातन धर्म और सनातन संस्कृति की रक्षा नहीं कर सकते.

~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

पहलगाम में काफिरों पर कहर | आतंकवाद का धर्म है और धर्म का ही आतंक है

 


पहलगाम में काफिरों पर कहर | आतंकवाद का धर्म है और धर्म का ही आतंक है | आतंवादियों ने न जाति पूँछी और न ये कि पीडीए कौन है

कश्मीर में पहलगाम की खूबसूरत वादियों में छुट्टियां मनाने गए लोगों को इस्लामिक आतंकियों ने बेहद क्रूरता से मौत के घाट उतार दिया. इन मुस्लिम उन्मादी राक्षसों ने सैलानियों से उनका नाम पूछा, धर्म पूछा और हिंदुओं तथा सभी गैरमुस्लिमों को निर्दयता पूर्वक गोलियों से भून दिया. लोगों से कलमा पढ़ने को कहा गया. कपड़े उतरवाकर खतना देखा गया और 28 लोगों को मौके पर ही निर्ममता पूर्वक मार डाला गया. इससे भारत की षड्यंत्रकारी छद्म धर्मनिरपेक्षता ओर मुस्लिम तुष्टीकरण के उस नारे की एक बार पोल खुल गयी कि आतंकवादियों का धर्म नहीं होता. भारत में तो आतंकवाद का धर्म बिल्कुल स्पष्ट है और किसी को भी भ्रम में नहीं रहना चाहिए. जातिगत जनगणना की मांग करने वाले और पीडीए की बदौलत सत्तासीन होने का सपना देखने वाले राजनेताओं की आंखें खुल जानी चाहिए कि मुस्लिम आतंकवादियों ने किसी की जाति नहीं पूछी, नहीं पूछा कि वे पीडीए है. उनके लिए केवल यह जानना जरूरी था कि वे हिंदू हैं और इसी आधार पर सभी को मौत के घाट उतार दिया.

इस घटना से पूरे देश में उबाल है. लोगों में बेहद गुस्सा है आतंकवादियों तथा पाकिस्तान के लिए और थोडा केंद्र सरकार के लिए भी. निश्चित रूप से इस बात की समीक्षा की जानी चाहिए कि इतनी बड़ी घटना की नैतिक जिम्मेदारी किसकी है. राज्य की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी उपराज्यपाल के माध्यम से केंद्र सरकार के पास है, जिसमें गृहमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की महत्वपूर्ण भूमिका है. आखिर इतनी बड़ी सुरक्षा चूक कैसे हो गई. जहाँ खुफिया एजेंसियों की विफलता स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है, वहीं राज्य में स्थानीय राजनेताओं के दबाव में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती में की गई कटौती भी एक प्रमुख कारण है. उपराज्यपाल की कार्यप्रणाली राजनैतिक रूप से सही भले ही हो लेकिन जम्मू कश्मीर जैसे आतंकवाद से प्रभावित अति संवेदनशील राज्य के लिए रणनीतिक रूप से बहुत उपयुक्त कभी नहीं रही. केंद्र सरकार जोरशोर से इस बात का प्रचार करती रही कि राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति बिल्कुल सामान्य है, जिसके पीछे भी उपराज्यपाल का सही वस्तुस्थिति से अवगत न कराना प्रमुख कारण हो सकता है.

अधिकांश क्षेत्रों में सफलता अर्जित करने वाले अजित डोभाल भी राज्य की स्थिति से अनभिज्ञ कैसे बने रहे. केंद्र सरकार को राज्य की सुरक्षा स्थिति की सघन समीक्षा करनी चाहिए और बिना किसी राजनीतिक बाजीगरी के सुरक्षा कमजोरियों को तुरंत दूर किया जाना चाहिए. केंद्रीय सुरक्षा बलों को घाटी में तब तक रहना चाहिए जब तक आतंकवाद का पूरी तरह से खात्मा नहीं हो जाता. राज्य के पुलिस और प्रशासनिक कर्मचारी अब केंद्र शासित प्रदेशों के कैडर का हिस्सा है, इसीलिए राज्य के अधिक से अधिक कर्मचारियों को दूसरे केंद्र शासित प्रदेशों में तत्काल स्थानांतरित करने की आवश्यकता है, जिनके स्थान पर दूसरे केंद्र शासित प्रदेशों के कर्मचारियों अधिकारियों को लाया जा सकता है. इससे राज्य के कर्मचारियों और पृथकतावादियों के बीच का वर्षों से चला आ रहा तंत्र टूट सकेगा और राज्य का वातावरण बदलने में सहायता मिल सकेगी.

पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद भारत के लिए नया नहीं है. दशकों से हम लोग आतंकवाद के साये में ही रहते आए हैं. हमने वह समय भी देखा है जब रेडियो और टीवी पर लगातार सूचनाएं प्रसारित की जाती है कि किसी भी लावारिस वस्तु को हाथ न लगाएं यह बम हो सकता है. रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर गाड़ियों की सूचनाओं के बीच में यह सूचना लगातार प्रसारित की जाती थी. लोग जब घरों से कार्यालय, व्यवसाय या किसी कार्य से बाहर जाते थे तो उन्हें विश्वास नहीं होता था कि वह वापस आ पाएंगे और घर वाले भी वापस आने तक चिंता में डूबे रहते थे. मोदी सरकार बनने के बाद आतंकवाद पर जबरदस्त अंकुश लगा इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती. धारा 370 हटाना, जम्मू कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करना बहुत सकारात्मक कदम था. राज्य में कानून व्यवस्था को सामान्य बनाना बहुत बड़ी चुनौती थी जिसमें भी मोदी सरकार को बहुत सफलता मिली. अच्छा होता यदि जम्मू को भी अलग केंद्र शासित प्रदेश बना दिया जाता, तो आतंकवाद के प्रभाव को केवल घाटी तक सीमित किया जा सकता था. जम्मू कश्मीर में बाहरी लोगों द्वारा संपत्ति खरीदने और स्थायी निवासी बनने के मामले में मोदी सरकार कमजोर पड़ गयी. राज्य में लोकसभा और विधानसभा सीटों के परिसीमन के मामले में भी केंद्र सरकार हिचकिचाहट से बाहर नहीं निकल पाई, इस कारण आज भी राज्य में सत्ता की धुरी कश्मीर घाटी है, जो भारत विरोधियों और पृथकतावादियों से बुरी तरह प्रभावित है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ दिन पहले ही फारूक अब्दुल्ला ने मुर्शीदाबाद हिंदू नरसंहार और पलायन पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह भारत की मुस्लिमों के प्रति नफरत की राजनीति का परिणाम है. इंजीनियर रशीद का लोकसभा में दिया गया भाषण भी कश्मीर घाटी के माहौल को रेखांकित करता है. एक प्रश्न यह भी है कि राज्य में चुनाव करवाने की इतनी जल्दी क्या थी जबकि इससे सुधरते माहौल का पटरी से उतरने का खतरा था, जो सही साबित हो गया. हो सकता है इसके पीछे सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ का दबाव हो जब उन्होंने कहा था कि राज्य को लंबे समय तक लोकतंत्र से बिरत नहीं रखा जा सकता लेकिन देश की एकता और अखंडता की जिम्मेदारी तो केंद्र सरकार की है.

भारत में हर आतंकवादी घटना को पाकिस्तान से जोड़ दिया जाता है, यह भारत के मुस्लिम संगठनों और मुस्लिम तुष्टिकरण का राजनीतिक विमर्श है, जो सरकारों के लिए भी उपयुक्त होता है लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि पाकिस्तान चाहे कितना ही ज़ोर लगा ले बिना स्थानीय समर्थन और सहयोग के भारत में किसी आतंकवादी घटना को अंजाम नहीं दिया जा सकता. भारत की विडंबना है कि हम स्थानीय आतंकवादियों पर कार्रवाई करना तो दूर उनकी तलाश तक नहीं करते और जब कभी स्थानीय रंगे हाथों पकड़े जाते हैं तो विभिन्न राजनैतिक दल उन्हें बचाने का प्रयास करते हैं और सफल भी हो जाते हैं. इस काम में न्यायपालिका का भी भरपूर समर्थन मिलता है उनके लिए रात 12:00 बजे सर्वोच्च न्यायालय खुल जाता है. उन्हें जेल जाने से बचाने के लिए सर्वोच्च न्यायलय में एक ही दिन में तीन तीन बेंचों का गठन कर जमानत देना सुनिश्चित कर लिया जाता है. कोई देश चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, जब तक आतंकवाद की स्थानीय इकाइयों को नष्ट नहीं करता, आतंकवाद का सफाया नहीं कर सकता.

भारत विश्व का इकलौता देश है जहाँ, इस्लामिक आक्रान्ताओं और मुस्लिम आतंकवादियों द्वारा 10 करोड़ हिंदुओं का नरसंहार किया गया. वह देश भी कितना दुर्भाग्यशाली है जो आज तक यह नहीं समझ सका कि आतंकवाद का धर्म होता है. हिंदुओं का नरसंहार करना कुछ लोगों का धार्मिक कृत्य है. इस नासमझी के कारण ही भारत में आतंकवाद के विरुद्ध भारत में कभी कोई गंभीर लड़ाई लड़ी ही नहीं गई. कश्मीर मामले में भी मोदी सरकार का मत था कि घाटी के आतंकवाद पर सांप्रदायिक दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए और इसलिए आतंकवाद से लड़ने के लिए विकास का मॉडल चुना गया. जम्मू कश्मीर को जितनी केंद्रीय सहायता आज तक दी गयी उतनी तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े और गरीब राज्यों को भी कभी नहीं दी गई. घाटी को दी गई इस सहायता राशि का बड़ा हिस्सा राजनेताओ ने हड़प लिया, जो अप्रत्यक्ष रूप से अलगाववादियों और आतंकवादियों को भी पहुंचता रहा क्योंकि राज्य में राजनीति और आतंकवाद दोनों एक दूसरे के पूरक हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की अपेक्षा के अनुरूप आतंकवादियों और उनके आकाओं को मिट्टी में मिला देने की चेतावनी देते हुए कहा है कि उन्हें ऐसी सजा मिलेगी जिसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकते. संतोष की बात है कि पूरा विश्व भारत के साथ खड़ा है लेकिन भारत की उस राजनीति का क्या करें, जिसमें समूचा विपक्ष आतंकवादियों और पाकिस्तान के साथ खड़ा है क्योंकि उनकी पूरी राजनीति मुस्लिम तुष्टिकरण पर ही आधारित है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास” के नारे के साथ भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की धुन में है. उन्हें लगता है कि हिन्दुओं के विरुद्ध नफरत की भावना तथा भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की कामना को विकास के मॉडल से दूर किया जा सकता है, जो पूरी तरह से गलत है. यह वही गलती है जिससे विश्व की कई सभ्यताएं नष्ट हो गई और दुनिया में इस्लामिक राष्ट्रों की संख्या बढ़कर 57 हो गई. इस्लामिक विद्वान कहते हैं कि गज़वा-ए-हिंद धार्मिक कृत्य है, तो फिर इससे कौन इनकार कर सकता है कि भारत निशाने पर हैं.

~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

सोमवार, 10 फ़रवरी 2025

महाकुंभ पर महाभारत

 



महाकुंभ पर महाभारत


29 जनवरी 2025 को मौनी अमावस्या के अमृत स्नान के दिन कुंभ मेले में हुई भगदड़ में कई लोग मारे गए और अनेक घायल हुए, जिससे विपक्ष को योगी और उनकी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करने का मौका मिल गया. विपक्षी दल, जो पहले कुंभ आयोजन पर करदाताओं के पैसे की बर्बादी का राग अलापते थे, लाशों की राजनीति में लग गए. इसके लिए संसद से सड़क तक तरह तरह के उपक्रम किए जा रहे हैं. योगी और मोदी का इस्तीफा भी मांगा गया और जनता में रोष उत्पन्न करने के लिए साधु संतों का सहारा भी लिया गया. दुर्भाग्य से ऐसे अनेक साधु संत हैं भी जो सनातन धर्म और संस्कृति को लांछित करने के लिए विपक्ष का हथियार बन जाते हैं. ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने तो योगी आदित्यनाथ पर सीधे प्रहार करते हुए कहा कि वह मुख्यमंत्री के पद के योग्य नहीं है, वह झूठा है, और उनका इस्तीफा तक मांग लिया. यद्यपि शकाराचार्य स्वयं विवादित व्यक्ति है, लेकिन किसी भी शंकराचार्य को राजनीतिक मोहरा नहीं बनना चाहिए. आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म को समृद्ध और शक्तिशाली बनाने के लिए जिन पीठों की स्थापना की थी उनका दुरुपयोग सनातन धर्म और संस्कृति को अपमानित करने के लिए हो इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता. कुम्भ में अव्यवस्था का आरोप लगाते हुए इस्तीफ़े की मांग तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के नेताओं ने भी की जिससे इस्तीफ़ा मांगने वालों के बीच आपसी सम्बन्ध का भी पता चलता है.

यद्यपि राज्य सरकार ने तुरंत पुलिस और न्यायिक जांच के आदेश दिए लेकिन राजनीतिक गिद्ध लाशों पर बैठ गए और अभी भी मृतकों की संख्या पर विवाद कर रहे हैं. अन्य देशों की घटनाओं से संबंधित भ्रामक वीडियो सोशल मीडिया में प्रसारित किये जा रहे हैं, और उनके आधार पर यह सिद्ध करने की कोशिश की जा रही है कि मृतकों की संख्या हजारों में है. सपा नेत्री जया बच्चन ने तो यहाँ तक कह डाला संगम का पानी तो दिल्ली में यमुना के पानी से भी ज्यादा संक्रमित है क्योंकि वहाँ हजारों लोगों की लाशें पानी में फेंकी गई हैं. कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने यहाँ तक कह डाला है कि कुंभ स्थान से न रोटी मिलती है न रोजगार लेकिन लोग हजारों रुपया बर्बाद करके डुबकी लगाने जा रहे हैं. इन दोनों ही दलों ने शुरुआत से ही कुम्भ के विरुद्ध अभियान चला रखा है त्ताकि यह आयोजन सफल न हो सके.  

यह तुष्टीकरण की ही पराकाष्ठा थी कि ज्ञानवापी में ऋंगार गौरी और संभल में श्री हरि विष्णु मंदिर में हिंदुओं की पूजा अर्चना बंद करवाने वाले राजनेता, कुंभ में मुस्लिमों के स्टाल लगाने  पर प्रतिबंध के विरोध में योगी के विरुद्ध विष वमन कर रहे थे, कुम्भ की भूमि को वक्फ की जमीन बता रहे थे, लेकिन भगदड़ में श्रद्धालुओं के मरने और घायल होने से खासे उत्साहित और प्रफुल्लित यही राजनेता घड़ियाली आंसू बहाने लगे. प्रत्यक्षदर्शियों और घायलों के अनुसार भगदड़ जान बूझकर करवाई गई थी और इसके लिए कुछ अराजक तत्वों को भेजा गया था. इसके बाद सरकार ने कुंभ दुर्घटना की जांच एसटीएफ को सौंपी दी, जिसकी प्रारंभिक जांच में षडयंत्र की पुष्टि हुई है. एसटीएफ ने कई लोगों को हिरासत में लिया है और पूछ्ताछ चल रही है. भगदड़ के लिए कोई भी पार्टी या नेता जिम्मेदार क्यों न हो, लेकिन राजनैतिक दुर्भावना से किया गया यह षड्यंत्र मानवता को शर्मसार करने वाला है. यदि यह षड्यंत्र है तो इसमें शामिल लोग हिंदू और हिंदुस्तान के हितैषी नहीं हो सकते, यह सभी हिन्दुओं को सदैव याद रखना चाहिए.  

144 बरसों बाद बने अद्भुत खगोलीय संयोग से प्रयागराज में हो रहे महाकुंभ 2025 पर कुछ राजनीतिक दल ओछी राजनीति कर रहे हैं. 6 वर्षों के अन्तराल पर अर्धकुंभ, 12 वर्षों पर पूर्ण कुम्भ का संयोग बनता है.144 वर्षों के बाद पडने वाले महाकुंभ का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसमें कोई भी व्यक्ति अपने पूरे जीवनकाल में एक बार ही सम्मिलित हो सकता है. इसलिए इस महाकुंभ में श्रद्धालुओं की संख्या अर्द्धकुंभ और पूर्ण कुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या से कई गुना अधिक होना स्वाभाविक है. इस बार सरकार ने 40 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं के भाग लेने का अनुमान लगाया था और डिजिटल आकलन के अनुसार अब तक आये श्रद्धालुओं का आंकड़ा इसके काफी करीब पहुँच चुका है, जबकि अभी दो सप्ताह से अधिक का समय बाकी है. इस प्रकार यह आंकड़ा 60 करोड़ पार कर सकता है. उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके लिए व्यापक तैयारियां भी की हैं. यह आयोजन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हृदय के बहुत नजदीक है और इसलिए वह लगातार आयोजन की व्यवस्थाओं की सूक्ष्म निगरानी करते रहे और अनेक बार संगम स्थल पर जाकर तैयारियों का जायजा लेने पहुंचे. इसमें कोई संदेह नहीं कि महाकुंभ 2025 की व्यवस्था अब तक के सभी कुंभ आयोजनों में सर्वश्रेष्ठ हैं.

वर्तमान समय में राजनीति में आ रही गिरावट नित नई नीचाइयाँ छू रही है, लेकिन यह अनायास नहीं है क्योंकि लगातार राजनीतिक गिरावट की व्यवस्था तो संविधान में ही निहित  है और उसका मूल कारण है ब्रिटेन की नकल कर बनाई गई बहुदलीय राजनैतिक प्रणाली. भारत में राजनीति अब समाज और राष्ट्रसेवा का माध्यम न हो कर सबसे अधिक फायदेमंद उद्योग बन गयी है. कुकुरमुत्तों की तरह राजनीतिक दल उग आए हैं और अनेक लोग सत्ता पाकर प्रादेशिक क्षत्रप बन गए हैं. यह स्थिति लगभग हर राज्य में हो चुकी है. सत्ता पाने के लिए ये कुछ भी करने को तैयार है लेकिन मुस्लिम तुष्टीकरण इनका अनिवार्य कर्तव्य बन गया है, और हिंदू विरोध स्वाभाविक दिनचर्या. इसलिए केवल समाजवादी पार्टी ही नहीं, कांग्रेस और उसके गठबंधन के राजनीतिक दल हिंदू और उनके तीज त्योहारों, पौराणिक परंपराओं का मुखर विरोध करते हैं. हिन्दुओं को बांटने के लिए जातिगत जनगणना का जाप करते हैं और अन्य पिछड़ा वर्ग में सभी मुसलमानों को भी जोड़ लेते हैं, जैसा कि हाल में तेलंगाना में हुए जातिगत सर्वे में किया गया है. अखिलेश यादव का पीडीए यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक (केवल मुसलमान) मात्र चुनाव जीतने का फॉर्मूला है, जो उनका अपना नहीं है, बल्कि भारत को 2047 तक इस्लामिक राष्ट्र बनाने का पीएफआई फॉर्मूला है. समाजवादी पार्टी का मुस्लिम तुष्टीकरण किसी से छिपा नहीं है. लालू यादव ने जब मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर उनका रामरथ रोक दिया था तो मुलायम सिंह यादव कहाँ पीछे रहने वाले थे उन्होंने राम जन्मभूमि पर राम भक्तों पर गोली चलवाकर सैकड़ों कार सेवकों की हत्या करवा दी. बाद में उन्होंने कहा भी था कि अगर मुस्लिमों को खुश करने के लिए और हिंदुओं को मरवाना होता तो वे जरूर मरवाते.

अखिलेश यादव की साढ़े चार  मुख्यमंत्री वाली सरकार में एक मुख्यमंत्री आजम खान भी थे जो 2013 में प्रयागराज में कुम्भ आयोजन के प्रभारी थे. सरकार द्वारा घोषित आंकड़ों के अनुसार उस समय लगभग 2 करोड़ श्रद्धालु शामिल हुए थे. उस समय भगदड़ में 42 से अधिक श्रद्धालुओं की मृत्यु हो गई थी. इस कारण वह योगी आदित्यनाथ द्वारा कुंभ आयोजन के लिए प्रस्तावित भव्य व्यवस्थाओं पर दिए जा रहे बयानों से काफी कुंठित थे. विपक्षी को इस बात की भी चिंता थी कि दावे के अनुसार यदि कुम्भ में 40 करोड़ लोग शामिल होते हैं और यह सकुशल संपन्न हो जाता है तो भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक लाभ होगा, योगी का कद बढ़ेगा और विपक्ष को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा. इसलिए उन्होंने कुंभ आयोजन में खामियां गिनवाने के नाम पर अनेक भ्रामक बयान दिये. उनकी देखा देखी राहुल भी इस अभियान में जुट गए. समाजवादी पार्टी, कांग्रेस तथा इंडी गठबंधन के घटक दल पूरे कुंभ आयोजन को कटघरे में खड़ा करने के लिये हर संभव गलतबयानी कर  हिंदू समाज को दिग्भ्रमित करने का काम रहे हैं. इसका उद्देश्य केवल हिंदू श्रद्धालुओं को कुम्भ में आने से रोकना नहीं है बल्कि बड़ा उद्देश्य हिन्दुत्व को कमजोर करने, हिंदू समाज को विभाजित करने के साथ हिंदू धर्म और संस्कृति को नष्ट करना है. ये सभी हिंदू विरोधी, वामपंथी और इस्लामिक कट्टरपंथियों के इशारे पर काम कर रहे हैं जो जल्द से जल्द भारत को इस्लामिक राष्ट्र में बदलना चाहते हैं.

समझना मुश्किल नहीं है कि अधिकांश राजनैतिक दल स्वार्थ में पूरी तरह अंधे हो चुके हैं. अब वे अपनी प्राचीन सनातन संस्कृति पर स्वयं प्रहार कर उसे नष्ट करने पर आमादा है. राष्ट्र की एकता और अखंडता पर उत्पन्न हो चुके गंभीर खतरे से भी उन्हें कोई लेना देना नहीं है. सत्य तो यह है कि वे स्वयं राष्ट्र के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं. इसलिए सभी राष्ट्रप्रेमियों को सावधान ही नहीं रहना होगा बल्कि ऐसे तत्वों से जमकर लोहा लेना होगा क्योंकि राष्ट्र की रक्षा के लिए सभी की सहभागिता और योगदान आवश्यक है. 

~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

शनिवार, 25 जनवरी 2025

जिहाद का अर्थशास्त्र है हलाल

 




               जिहाद का अर्थशास्त्र है हलाल

हलाल का बवाल फिर उबाल पर है और इसका कारण है उत्तर प्रदेश सरकार के हलाल उत्पादों पर प्रतिबंध के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में दायर हुई याचिका. योगी  सरकार ने 18 नवंबर 2023 को हलाल उत्पादों की बिक्री, वितरण और भंडारण पर प्रतिबंध लगा दिया था. योगी आदित्यनाथ के इस कदम की जितनी प्रशंसा की जाय कम है क्योंकि यह देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर कलंक होने के साथ देश की अर्थव्यवस्था में सरकार के समानांतर जजिया की तरह टैक्स वसूलने का षडयंत्र है, जो राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए बहुत बड़ा खतरा है क्योंकि इस पैसे का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों, धर्मान्तरण और गजवा-ए-हिन्द के वित्तपोषण के लिए किया जाता है. यह बड़ा और राष्ट्रीय महत्त्व का मुद्दा है, इसलिए यह कार्य तो मोदी सरकार को बहुत पहले करना चाहिए था. दुर्भाग्य से दो पूर्ण बहुमत के कार्यकाल में उन्होंने इस पर कुछ नहीं किया. अब नाइडू और नीतीश की बैसाखी के सहारे चलने वाली सरकार कोई कार्रवाई करेगी या कानून बनाएगी इसकी संभावना नहीं है. वैसे भी मोदी सरकार हिंदू हितों के मामलों में स्वयं साहसिक कदम उठाने के बजाय सर्वोच्च न्यायालय के कंधे पर डाल कर समाधान खोजती है लेकिन भारतीय न्यायपालिका का इस्लामिक और वामपंथी शक्तियों के दबाव में काम करने का पुराना इतिहास है, इसलिए उससे  सकारात्मक निर्णय की अपेक्षा करना व्यर्थ है. इसे शाहीनबाग, किसान आंदोलन आदि के मामले से समझा जा सकता है.

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्यात के लिए उत्पादित वस्तुओं को छोड़कर उप्र की योगी सरकार द्वारा हलाल उत्पादों की बिक्री, वितरण और भंडारण पर लगाए गए प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई प्रारम्भ की. ये याचिकाएं जमीयत उलेमा-ए-हिंद की तरफ से लगाई गई हैं, जो हलाल प्रमाण पत्र देकर जजिया की तरह टैक्स  वसूली करने वाली भारत की सबसे बड़ी संस्था है और यह देवबंद दारूल उलूम के सर्वेसर्वा और गज़वा ए हिंद के प्रमुख कर्ताधर्ता अरशद मदनी की जेबी संस्था है. भारत के महाधिवक्ता तुषार मेहता ने कहा कि यह हैरान करने वाला है कि सीमेंट, सरिया, आटा, बेसन यहां तक कि पानी की बोतल तक का हलाल प्रमाणन किया जा रहा है और लाखों करोड़ रुपये वसूले जा रहे हैं. न्यायमूर्ति बीआर गवाई की अध्‍यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने मांस आधारित उत्पादों के अतिरिक्त अन्य उत्पादों पर हलाल प्रमाणपत्र को लेकर हैरानी जताई. उन्‍होंने कहा कि जहां तक ​​हलाल मांस का सवाल है, किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती लेकिन आश्चर्य की बात है  ​​कि सीमेंट-सरिये को भी हलाल-प्रमाणित किया जा रहा है. बोतलबंद पानी भी हलाल प्रमाणित किया जा रहा है. न्यायालय ने जमीयत उलेमा ए हिंद को प्रतिउत्तर दाखिल करने के लिए 1 मार्च तक का समय दे दिया. न्यायालय ने पहले ही जमीयत उलेमा ए हिंद के मालिक अरशद मदनी और इसके कर्मचारियों के विरुद्ध किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर प्रतिबंध लगा रखा है.

भारत में विभिन्न उत्पादों और सेवाओं के लिए सरकारी मानकीकरण की व्यवस्था है.  खाद्य पदार्थों की शुद्धता और गुणवत्ता के लिए FSSAI, अन्य उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए के लिए ISI (BIS), ISO आदि द्वारा प्रमाणन होता है. इसलिए किसी व्यक्ति या निजी संस्था द्वारा उत्पादों और सेवाओं का प्रमाणन न केवल अनावश्यक बल्कि गैरकानूनी है और देश की संप्रभुता को चुनौती है. स्थिति यह हो गयी है कि हलाल उत्पाद जो हिंदुओं के लिए धार्मिक रूप से अस्वीकार्य हैं, जबरन थोपे जा रहे हैं क्योंकि रेल, हवाई जहाज, होटल, रेस्टोरेंट और सरकारी कैंटीनों हलाल चाय, कॉफी, दूध और दूसरे खाद्य पदार्थ प्रयोग किए जा रहे हैं, और गैर मुस्लिमों को इसकी जानकारी भी नहीं दी जाती.

भारत में संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर कुछ मुस्लिम संस्थाओं द्वारा हलाल प्रमाणपत्र देकर भारी शुल्क वसूला जा रहा है. पिछली सरकारों ने वोट बैंक और तुष्टिकरण की राजनीति के चलते न केवल इसे अनदेखा किया बल्कि निर्यात किए जाने वाले मांस का हलाल प्रमाणन अनिवार्य भी कर दिया था जिस कारण मांस के निर्यात के व्यवसाय गैर मुस्लिम बाहर हो गए. यद्यपि मोदी सरकार ने मांस की  निर्यात प्रक्रिया में थोड़ा सुधार करके ऐसे देश जो हलाल मांस की मांग नहीं करते, उन्हें निर्यात किए जाने वाले मांस में हलाल प्रमाणन की अनिवार्यता खत्म कर दी है लेकिन यह नाकाफी है.

हलाल उत्पाद, जिहाद का ही एक हिस्सा हैं. गैर मुस्लिम राष्ट्र में जहाँ कहीं भी मुसलमान होते हैं, राजनीतिक इस्लाम के वैश्विक षड्यंत्र के अनुसार उस देश की अर्थव्यवस्था को कब्जाने की कोशिश की जाती है. मुसलमानों द्वारा सफाई, कूड़ा और कबाड़ बीनने जैसे छोटे छोटे कार्य अपने हाथ में लेकर बहुसंख्यकों का दिल जीतने की कोशिश की जाती है जिसके लिए अवैध घुसपैठियों को लगाया जाता है. पंचर जोड़ने से लेकर स्कूटर, मोटरसाइकिल और कार की मरम्मत, डेंटिंग, पेंटिंग, वेल्डिंग आदि का काम हथिया लेते हैं. बाल काटने से लेकर लुहार और बढ़ई का काम भी करते हैं. बहुसंख्यकों के तीज त्यौहार और उत्सवों में सेवा प्रदाता के रूप में अपनी पहुँच बनाते हैं. महिलाओं की चूड़ी, सिंदूर और सौंदर्य प्रसाधन की सामग्री से लेकर सिलाई कढ़ाई बुनाई पर इस समुदाय ने अपनी पकड़ बना ली है. सब्जी और फलों के थोक और फुटकर बाजार पर मुस्लिमों का कब्ज़ा है. मंदिरों में फूल और प्रसाद बेचने वाले भी बड़ी संख्या में मुस्लिम मिल जाएंगे. मांस, और चमड़ा उद्योग पूरी तरह से इस समुदाय के पास है. हलाल प्रमाण पत्र के लिए कई औपचारिकताएं होती हैं जिसमें उत्पाद बनाने के लिए मुसलमान कर्मचारियों का होना एक अनिवार्य शर्त है. यह बिना किसी संवैधानिक व्यवस्था के आरक्षण का लाभ लेना है, जो मुस्लिम समुदाय को रोजगार प्राप्त करने के अवसर भी उपलब्ध कराता है. इसके अतरिक्त उस परिसर में प्रार्थना कक्ष, क़िबला दिशा सूचक, नमाज चटाई, स्थानीय नमाज की समय सूची, कुरान की कॉपी, रमजान से संबंधित सेवाएं उपलब्ध होना भी आवश्यक है. इस तरह हलाल प्रमाण पत्र लेने वालों से ही इस्लाम का प्रचार और प्रसार करवाया जाता है.

हलाल का जाल अब केवल मांस तक सीमित नहीं है बल्कि यह दैनिक जीवन में प्रयोग किए जाने वाले सभी उत्पादों और सेवाओं  पर फैल गया है. सौंदर्य प्रसाधन, घर गृहस्थी  के सभी सामान, दवाइयां, अस्पताल, ईट, सीमेंट, सरिया, फ्लैट, विला साहित लगभग सभी वस्तुओं और सेवाओं पर शिकंजा कस दिया है. यही नहीं कच्चे माल, भण्डारण, और पूरी औद्योगिक इकाई पर भी हलाल प्रमाणन आवश्यक है। हलाल प्रमाणन  के नाम पर उत्पादकों और सेवा प्रदाताओं से बड़ी रकम वसूली जाती है, जिसका उपयोग इस्लामीकरण के लिए किया जा रहा है, जिसमे आतंकवादी गतिविधियों का वित्तपोषण, धर्मांतरण तथा जिहाद की सभी परियोजनाये शामिल हैं. जमीयत उलेमा-ए-हिंद गोधरा में 59 हिंदुओं को साबरमती एक्सप्रेस की बोगी में जिन्दा जलाकर मारने वाले सजायाफ्ता आतंकी कैदियों के सर्वोच्च न्यायालय में लड़ रहे हैं. गोधरा तथा गुजरात दंगों में आरोपित मुस्लिमों के मुकदमे भी इसी ने लड़ें. चाहे  अयोध्या, मथुरा और काशी में हिंदू धर्म स्थलों को तोड़ कर बनाई गई मसजिदों के मुकदमें हों, या फिर संशोधित नागरिकता कानून, समान नागरिक संहिता, वक्फ बोर्ड आदि से संबंधित मुकदमे हो सब का वित्तपोषण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जमीयत उलेमा ए हिन्द करता रहा है. देशभर में होने वाले हिंदू मुस्लिम दंगों के मुस्लिम आरोपितो के मुकदमों तथा दंगों में मुस्लिम मृतकों के परिवारों को वित्तीय सहायता भी जमीयत उलेमा-ए-हिंद और हलाल से जुड़े अन्य संगठन करते हैं. इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है कि जजिया की तरह वसूला गया हलाल टैक्स आतंकवादी और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में किया जाता हैं. गज़वा-ए-हिंद से जुड़े हुए सभी जिहादी कार्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से देवबंद दारूल उलूम और जमीयत उलेमा ए हिंद से जुड़े होते हैं.

हलाल जिहाद का अर्थशास्त्र है जिसे हलालोनॉमिक्स कहते हैं. इसका उद्देश्य वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कब्जा करके गैर-मुस्लिमों से पैसा वसूल कर पूरी दुनिया में इस्लाम का वर्चस्व कायम करना है. पूरे विश्व में हलाल अर्थव्यवस्था ८ ट्रिलियन यूएस डॉलर पार कर चुकी है. विश्व हलाल कॉन्फ्रेंस में बोस्निया के ग्रैंड मुफ्ती मुस्तफा सरिक ने  कहा था कि “अब उन्हें हथियार उठाकर युद्ध करने और आतंक फैलाने की  जरूरत नहीं है, हलाल अर्थव्यवस्था के माध्यम से ही वे  पूरे विश्व पर राज कर सकेंगे.” 

सरकार और न्यायालय इस विषय में कुछ करेगा इसकी संभावना नहीं है लेकिन सभी गैर मुस्लिम विशेषकर हिंदू जागरूक बनें और हलाल उत्पादों का बहिष्कार करें. इस प्रकार देश और सनातन संस्कृति को काफी हद तक बचा सकते हैं, और यह काम आप आज से ही शुरू करें क्योंकि कल बहुत देर हो जायेगी. 

~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

 

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2024

बीमार है ! सर्वोच्च न्यायालय

 


बीमार है ! सर्वोच्च न्यायालय | हर पल मिट रही है देश की हस्ती | अब बहुत समय नहीं बचा है भारत के इस्लामिक राष्ट्र बनने में


अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कार्यक्रम में देश के सर्वोच्च न्यायालय की खुलकर आलोचना की तो मैं हैरान रह गया लेकिन कुछ दिन बाद ही वर्तमान राष्ट्रपति जो बिडेन ने अमेरिकी न्यायपालिका के पक्षपात तथा भ्रष्टाचार के लिए जमकर आलोचना करते हुए उस पर अविश्वास व्यक्त किया और इसी आधार पर अपने बेटे को क्षमादान दे दिया. भारत इस मामले में सर्वथा अलग है. न्यायाधीशों की अपारदर्शी नियुक्तियां, भाई भतीजाबाद, भ्रष्टाचार, राजनीतिक पक्षपात तथा इस्लामिक और वामपंथी शक्तियों के दबाव में काम करने के बाद भी न्यायपालिका का यहाँ बहुत सम्मान किया जाता है. यद्यपि सम्मान की यह भावना स्वतः स्फूर्त नहीं है, हो सकता है कि इसके पीछे अवमानना का भय तथा राजनीतिक आडंबर हो.

कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने पूजा स्थल कानून 1991 के विरुद्ध दायर की गई अनेक याचिकाओं पर जो निर्णय दिया, उसने पूरे देश में एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय की कार्यप्रणाली और निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. याचिकाओं में कहा गया है कि अधिनियम धर्मनिरपेक्षता और कानून के शासन के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, जो अदालत का दरवाजा खटखटाने और न्यायिक उपाय मांगने के उनके मौलिक अधिकारों का हनन है. अधिनियम उन्हें अपने पूजा स्थलों और तीर्थस्थलों के प्रबंधन, रखरखाव और प्रशासन के अधिकार से भी वंचित करता है. याचिकाओं में कहा गया है कि यह अधिनियम अक्रांताओं द्वारा नष्ट किए गए हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध पूजा स्थलों और तीर्थस्थलों को बहाल करने के अधिकारों पर भी प्रतिबंध लगाता है.

सर्वोच्च न्यायालय ने बिना सुनवाई किए याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध ही आदेश पारित कर दिया और देशभर की अदालतों को मस्जिदों के सर्वे की मांग करने वाले किसी भी नए मुकदमे या याचिका को स्वीकार करने या आदेश पारित करने पर प्रतिबंध लगा दिया. अदालत ने मौजूदा मुकदमों में भी सर्वे या कोई अन्य प्रभावी आदेश पारित करने पर पूरी तरह से रोक लगा दी है. मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अगुवाई वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि वे केंद्र के जवाब के बिना इस पर फैसला नहीं कर सकते. पीठ ने भारत सरकार से इस संदर्भ में चार सप्ताह में हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा है. इस प्रकार यह मामला एक बार फिर ठंडे बस्ते में चला गया है.

न्यायपालिका में सबसे अधिक विवादास्पद फैसले सर्वोच्च न्यायालय के ही होते हैं लेकिन आज तक उसके फैसलों का बहुसंख्यक हिंदुओं ने कभी खुलकर विरोध नहीं किया. इसके विपरीत मुस्लिम समुदाय, हर उस फैसले का, जो उनके विरुद्ध होता है, विरोध करते हैं. उनके विरोध का प्रभाव भी इतना होता है कि सत्तारूढ़ दल विशेषकर तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले दल पहले तो सर्वोच्च न्यायालय पर दबाव बनाते हैं और फिर भी यदि मुस्लिम समुदाय के मनमाफिक फैसला नहीं आता है तो संसद में कानून बनाकर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले तक बदल देते हैं. आज का सर्वोच्च न्यायालय भारत की ऐसी परिस्थितियों से निपटने में परिपक्व हो गया है. स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग 50 वर्ष तक, जब केंद्र में एक ही राजनीतिक दल और एक ही परिवार की सत्ता थी, सर्वोच्च न्यायालय को भारत सरकार के एक विभाग की तरह काम करने की आदत हो गयी थी. केंद्र सरकार ही उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करती थी और इसलिए ऐसा कोई व्यक्ति न्यायाधीश ही नहीं बन पाता था जो केंद्र सरकार की इच्छा के विरुद्ध फैसला दे सकने की हिम्मत जुटा सके. कांग्रेस के कई संसद सदस्य त्यागपत्र देकर उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश बन जाते थे और फिर वहां से त्यागपत्र देकर या सेवा निवृत्त होकर सांसद भी बन जाते थे. सेवानिवृत्ति के बाद कई पसंदीदा न्यायाधीश आकर्षक / संवैधानिक पदों पर नियुक्ति किये जाते थे. यही नहीं सरकार से सुर न मिलाने वाले न्यायाधीशों को प्रताड़ना भी झेलनी पड़ती थी. वे उच्च न्यायालय से सर्वोच्च न्यायालय नहीं पहुँच पाते थे. उनकी वरिष्ठता को अनदेखा करते हुए कनिष्ठ न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश बना दिया जाता था. केंद्रीय एजेंसियों तथा महा-अभियोग का भय भी एक बड़ा कारक रहता था. ऐसी असहज स्थिति से बचने या अपना सम्मान बचाने के लिए उच्च / सर्वोच्च न्यायालय, कोई ऐसा फैसला नहीं करता था, जो समुदाय विशेष को आक्रोशित करें और केंद्र सरकार को नाराज करें. केंद्र में गैर कांग्रेसी सरकारों के आने के बाद स्थितियां तो बदल गई लेकिन न्यायपालिका की आदत नहीं बदली. संभवत: कांग्रेस और समुदाय विशेष का भय अभी भी उनके मन - मस्तिष्क में व्याप्त है. न्यायपालिका के अलावा यही स्थिति नौकरशाही की भी है. इसीलिए, लोग कहते हैं कि “सरकार बदल गईं लेकिन सिस्टम अभी भी उनका है”

इस बीच प्रयागराज उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति शेखर यादव के बयान की मनचाही व्याख्या करते हुए मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों, विशेषकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने न्यायमूर्ति यादव पर व्यक्तिगत टिप्पणियां करते हुए जबरदस्त हो हल्ला मचा दिया जिससे सर्वोच्च न्यायालय भी इतना भयभीत हो गया कि प्रशासनिक कार्रवाई करने के उद्देश्य से उसे तुरत फुरत प्रयागराज उच्च न्यायालय से आख्या मांगनी पडी. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी सहित पूरे विपक्ष ने न्यायमूर्ति यादव के विरुद्ध महाभियोग लाने की भी तैयारी शुरू कर दी है. इन राजनीतिक दलों का उद्देश्य न्यायपालिका को सन्देश देने के साथ कि वह समुदाय विशेष के विरुद्ध कोई भी आदेश देने और टिप्पणियां करने से बचे, मुस्लिम समुदाय को भी यह संदेश देना है कि वे उनके सच्चे हितैषी हैं और उन्हें, उनके लिए असंवैधानिक और गैरकानूनी कार्य करने में भी कोई संकोच नहीं है.

जहाँ तक पूजा स्थल कानून 1991 का प्रश्न है, कोई अनपढ़ व्यक्ति भी बता सकता है कि यह तुष्टिकरण की पराकाष्ठा है, तथा असंवैधानिक, गैरकानूनी और सनातन धर्मियों के साथ खुला अन्याय है, लेकिन कांग्रेस ने आजतक हिंदू विरोधी कार्य करने में कभी संकोच नहीं किया. गाँधी नेहरू के मुस्लिम प्रेम के कारण ही देश का विभाजन हुआ था लेकिन विभाजन के बाद भी उन्होंने मुस्लिम तुष्टीकरण का खेल बंद नहीं किया. गाँधी नेहरू परिवार आज भी मुस्लिम समुदाय का उसी तरह ध्यान रखता है जैसे वर्तमान परिस्थितियों में कोई मुगल वंश करता.

एक तथ्य यह भी है कि पूजा स्थल कानून 1991 जिस समय संसद में पारित हुआ था, उस समय लोकसभा में भाजपा के लगभग 120 सांसद थे और अटल आडवाणी जैसे दिग्गज नेता सांसद थे. दुर्भाग्य से राष्ट्र के विनाशकारी तीन कानून - पूजा स्थल, वक्फ बोर्ड और अल्पसंख्यक आयोग उस समय बने जब भाजपा के दोनों भारत-रत्न अटल और आडवाणी संसद में थे तथा एक अन्य भारत रत्न पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री थे. इन तीनों भारत रत्नों ने मिलकर हिंदुओं की बर्बादी और भारत के राष्ट्रांतरण के लिए घातक हथियार उपलब्ध करा दिए. क्या इनमें से कोई भी इतना दूरदर्शी नहीं था जो इन कानूनों के दुष्प्रभावों का अंदाज़ा लगा सकता?

केंद्र में 2014 से लगातार 10 साल तक दो कार्यकाल तक नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार थी लेकिन वह भी इन ऐतिहासिक गलतियों को ठीक करने का साहस नहीं जुटा सकी. वह “सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास” के माया मोह में उलझ गई. यहाँ सबका मतलब केवल मुस्लिम समुदाय से हैं. मैं शुरू से ही लिखता रहा हूँ कि आरएसएस, भाजपा और मोदी मुस्लिमों को प्रसन्न करने के लिए चाहे ध्रुव-तपस्या करें, यह समुदाय किसी भी हालत में उनको वोट नहीं करेगा लेकिन यह उनको तभी समझ में आया जब लोकसभा सांसदों की संख्या 240 रह गई. मोदी सरकार हिन्दुओं के हर महत्वपूर्ण मुद्दों का समाधान सर्वोच्च न्यायालय के कंधे पर रखकर करना चाहती है.सर्वोच्च न्यायालय ने बार बार संकेत दिया है कि सरकार स्वयं कुछ करें लेकिन सरकार ने बयानबाजी के अलावा कुछ नहीं किया.

महाराष्ट्र के चुनाव में भाजपा के पक्ष में जितना ध्रुवीकरण हुआ है, वह हाल के कई दशकों में नहीं देखा गया. यह भी भारत की जनता की ओर से संकेत है कि अभी नहीं तो कभी नहीं. मोदी सरकार को कानून बना कर हिन्दुओं की सभी महत्वपूर्ण समस्याओं का समाधान जितनी जल्दी हो सके, निकालना चाहिए. अन्यथा बहुत देर हो जाएगी क्योंकि हर पल देश की हस्ती मिटती जा रही है. भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनने में अब बहुत अधिक समय नहीं बचा है. अगर भाजपा और मोदी सरकार अभी नहीं चेते, तो इतिहास में उनका उल्लेख ऐसे संगठन और ऐसी सरकार के रूप में किया जाएगा जो अपने धर्म और संस्कृति को भी नहीं बचा सके जबकि उनके पास पर्याप्त समय, सुअवसर और सत्ता थी और वे ऐसा कर सकते थे .

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

शनिवार, 23 नवंबर 2024

महाराष्ट्र ने दिखाया रास्ता : नहीं बंटेंगे और जुड़े रहेंगे तो जीतेंगे भी और कटेंगे भी नहीं.

 


महाराष्ट्र ने दिखाया रास्ता : नहीं बंटेंगे और जुड़े रहेंगे तो जीतेंगे भी और कटेंगे भी नहीं.


हरियाणा के चुनाव में जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने “बंटेंगे तो कटेंगे” और “एक रहेंगे तो नेक रहेंगे” का नारा दिया था तो कथित धर्मनिरपेक्षतावादी और हिंदुओं को जातियों में बांटने वाले लोग तिलमिला गए थे, क्योंकि यह बात अटपटी जरूर लेकिन अक्षरस: सत्य है. इन लोगों ने योगी को कठघरे में खड़ा करने के साथ साथ चुनाव आयोग से शिकायत भी की कि यह नारा विभाजनकारी सांप्रदायिकता को बढ़ावा देगा.

महाराष्ट्र के चुनाव में योगी के इस नारे को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का समर्थन मिला. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस नारे को अपना लिया और इस नारे को नई तरह से प्रस्तुत किया कि “एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे”, और इसके बाद तो अमित शाह से लेकर देवेन्द्र फड़णवीस तक सभी ने योगी के बांटेंगे तो कटेंगे नारे को दोहराया. इस नारे का प्रभाव सामान्य जन मानस तक गया ओर विपक्षी महाअघाड़ी गठबंधन को इस बात का पूरा विश्वास था कि मुसलमान तो एकजुट होकर वोट करते हैं लेकिन हिंदू कभी एक नहीं हो सकते और ना ही एक एकजुट होकर वोट कर सकते हैं. महाअघाड़ी के सभी घटक दलों में इस नारे का पुरज़ोर विरोध किया और कहा कि महाराष्ट्र में ये नहीं चल सकता है. बीजेपी की महायुती गठबंधन के घटक अजीत पवार ने भी इस नारे को अनुचित बताया. और तो और महाराष्ट्र बीजेपी के एक बड़े नेता रहे गोपीनाथ गुंडे की बेटी पंकजा मुंडे ने भी इस नारे से अपने को असंबद्ध कर लिया. उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव मौर्या ने भी इस नारे से अपने को अलग कर लिया.

लेकिन ! महाराष्ट्र में तो इस नारे ने सभी राजनीतिक पंडितों को गलत साबित करते हुए चुनावी सफलता के अब तक के सारे कीर्तिमान ध्वस्त करते हुए भाजपा गठबंधन को 235 सीटें जिसमें भाजपा को 136, शिवसेना को 57, और एनसीपी अजित पवार को 41 सीटें मिलती दिख रही है. एक लंबे अरसे बाद महाराष्ट्र में तीन चौथाई बहुमत की सरकार बनेगी.

राहुल गाँधी, शरद पवार और उद्धव ठाकरे ने मुसलमानों की शरण में पहुँच गए. कांग्रेस और महाआघाडी ने उनकी 17 सूत्री मांगों को राष्ट्रीय हित दरकिनार करते हुए स्वीकार कर लिया था कि इसके सहारे वे चुनावी वैतरणी पार कर लेंगे. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड ने उनके पक्ष में फतवे भी जारी कर दिए लेकिन फतवों की फजीहत उड़ गई. उद्धव ठाकरे की शिवसेना 21, कांग्रेस 17 और शरद पवार की एनसीपी 9 सीट पर सिमटने वाली है. इसमें कोई भी अपनी इज्जत बचाने में सफल नहीं हो सका. सबसे अधिक अपमान शरद पवार का हुआ है जिन्होंने उम्र के आखिरी पड़ाव पर भी देश हित से समझौता किया राष्ट्र की एकता और अखंडता से समझौता किया लेकिन जनता ने उनके मुँह पर कालिख पोत दी. अब तो वह सम्मान सहित संन्यास भी नहीं ले पाएंगे.

  1. वैसे तो यही परिस्थितियां झारखंड में भी थी लेकिन वहाँ का राजनैतिक वातावरण थोड़ा अलग हैं जिसमें राष्ट्रवाद प्रमुख मुद्दा नहीं बन पाया उस पर हम लोग अलग से चर्चा करेंगे. 

लेकिन बटेंगे तो कटेंगे आज का यथार्थ है .

साबरमती रिपोर्ट- मार्मिक सच्चाई : हिन्दुओं की जान की कोई कीमत नहीं

 साबरमती रिपोर्ट- मार्मिक सच्चाई : हिन्दुओं की जान की कोई कीमत नहीं


साबरमती रिपोर्ट नाम की फिल्म सिनेमा घरों में प्रदर्शित हो रही है। इस फ़िल्म से आज की युवा पीढ़ी को गोधरा कांड की सच्चाई मालूम पड़ सकेगी और अन्य लोगों को भी सांप्रदायिक भाई चारे के राजनीतिक प्रपंच के गहरे जख्म की यादें ताजा हो जाएंगी. विपक्षी राजनीतिक दल इस पर चर्चा से भी बच रहे हैं, क्योंकि अगर चर्चा होगी और इस फ़िल्म के माध्यम से जो सच सार्वजनिक हो रहा है, उससे कांग्रेस कठघरे में है और कांग्रेस के नेतृत्व में बनी तत्कालीन यूपीए सरकार के सभी घटक दल भी कटघरे में हैं।

पुरानी पीढ़ी के लोगों को तो अच्छे ढंग से याद होगा कि 2002 में गोधरा में क्या हुआ था लेकिन आज की पीढ़ी के वे लोग जिन की उम्र 35 वर्ष से कम है उन्हें शायद इसके बारे में बहुत अधिक पता नहीं होगा। इसलिए उन्हें इस मामले की पृष्ठभूमि बताना आवश्यक है। 27 फरवरी 2002 को सुबह लगभग 7:30 बजे साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन को गोधरा स्टेशन के पास सिग्नल फलिया पर रोका गया और मुसलमानों की उग्र भीड़ इस ट्रेन पर पथराव कर दिया. ट्रेन के कोच नंबर S6 में घुस कर बड़ी मात्रा में पेट्रोल डालकर आग लगा दी और दरवाजे बाहर से बंद कर दिये. 59 श्रद्धालुओं को जिंदा जलाकर मार दिया गया, जिसमे 25 महिलाएं और 20 बच्चे शामिल थे। इस कोच में राम भक्त थे जो अयोध्या से राम लाला के दर्शन का महायज्ञ करके वापस आ रहे थे, जहाँ भगवान श्री राम के मंदिर को आक्रांता बाबर द्वारा तोड़ कर बाबरी मस्जिद का निर्माण करा दिया गया था। 1992 में इस ढांचे को कार सेवकों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था. यह बर्बरतापूर्ण कृत्य इसी का बदला लेने के उद्देश्य से किया गया था. इस घृणित और अमानवीय कृत्य में 59 लोगों की मौके पर ही मृत्यु हो गई थी और अनेक लोग गंभीर रूप से जल गए थे. कई लोग इस कार्रवाई को देख कर अपना दिमागी संतुलन खो बैठे थे.

27 फ़रवरी, 2002 की सुबह जैसे ही साबरमती एक्सप्रेस गोधरा स्टेशन से निकली, आपातकालीन ब्रेक लगाकर मुस्लिम बाहुल्य इलाके में रोक लिया गया. 2000 से अधिक नर पिशाचों की भीड़ ने इस ट्रेन पर पथराव किया और पेट्रोल डालकर एस 6 कोच में आग लगा दी तथा अन्य चार बोगियों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया. इस ट्रेन द्वारा 1700 से अधिक श्रद्धालु अयोध्या से वापस आ रहे थे और इन सभी को जलाकर मार देने की योजना थी. एक कोच को आग के हवाले करके वह 59 श्रद्धालुओं को ज़िंदा जलाकर मारने में सफल हो गए. अचानक 2000 लोगों की भीड़ वहां कैसे इकट्ठा हो गई और वे कौन थे जिन्होंने ट्रेन पर पथराव किया? वे कौन थे जो सैकड़ों लीटर पेट्रोल साथ लेकर आये थे, जिसे डालकर ट्रेन में आग लगायी गयी? इतना पेट्रोल कैसे मिला? वे कौन लोग थे जिन्होंने इस षड्यंत्र को दुर्घटना साबित करने का भरपूर प्रयास किया? देश को ये जानने का अधिकार उस समय भी था और आज भी है लेकिन यह पता चलना तो दूर, इस पर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष और मानवतावादी बात भी नहीं करते. ऐसा शायद इसलिए क्योंकि मरने वाले हिंदू थे और हिंदुओं की जान की इस देश में कोई कीमत नहीं. सोचिए अगर इनकी जगह ट्रेन में जलकर मरने वाले लोग मुसलमान होते तो क्या प्रतिक्रिया होती और कांग्रेस तथा धर्मनिरपेक्षता और मानवतावादियों का विमर्श क्या होता, समझना मुश्किल नहीं है.

इस राक्षसी कार्य की प्रतिक्रिया स्वरूप गोधरा में दंगे भड़क उठे जिसमे लगभग 700 मुसलमान और 350 से अधिक हिंदू हताहत हुए लेकिन विमर्श बनाने वालों ने, जिसमें राजनीतिक दल तथा वामपंथी-इस्लामिस्ट मीडिया भी शामिल थी, साबरमती एक्सप्रेस की असलियत पर पर पर्दा डालने की कोशिश की और इसे दुर्घटना सिद्ध करने का हर संभव प्रयास किया लेकिन इस जघन्य षड्यंत्रकारी नरसंहार की प्रतिक्रिया स्वरूप भड़के दंगों को बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत करने और हिंदुओं को आक्रमणकारी और मुसलमानों को पीड़ित सिद्ध करने का लगातार प्रयास किया.

6 मार्च 2002 को गुजरात सरकार द्वारा ट्रेन में आग के कारणों तथा उसके बाद भड़के दंगों की जांच के लिए एक आयोग का गठन किया गया था जिसके अध्यक्ष गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीष केजी शाह थे. कांग्रेस ने न्यायमूर्ति शाह की राज्य के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से नजदीकी होने का आरोप लगाया और आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया. इस कारण आयोग का पुनर्गठन किया गया और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जी टी नानावती को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया. इसलिए इस आयोग को नानावती आयोग के रूप में जाना जाता है. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि साबरमती एक्सप्रेस के एस 6 कोच में पूर्व नियोजित षड्यंत्र के अंतर्गत आग लगाई गई.

गोधरा दंगों के कारण ही समूचे हिंदू समुदाय, भाजपा, गुजरात सरकार और विशेषकर तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाया गया और पूरी दुनिया में बदनाम भी किया गया. मोदी को अमेरिका का वीजा न मिले इसलिए भारत के कथित बुद्धिजीवियों और मानवाधिकारवादियों ने अमेरिका को ज्ञापन भी भेजे. 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनने के बाद मुस्लिम तुष्टीकरण को और धार देने के उद्देश्य से मोदी को जेल भेजने के लिए जाल बिछाया गया. साबरमती ट्रेन में जिंदा जलाकर मार डाले गए 59 श्रद्धालुओं की मौत को दुर्घटना सिद्ध करने के लिए तत्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश उमेश चन्द्र बेनर्जी की अध्यक्षता में बेनर्जी आयोग का गठन किया जिसने अपनी रिपोर्ट में कार सेवकों द्वारा कोच के अंदर खाना बनाने के कारण आग लगना बता कर इसे दुर्घटना सिद्ध करने की कोशिश की. आप समझ सकते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का भी स्तर क्या हो सकता है.

कांग्रेस ने तीस्ता सीतलवाड़ नाम की एक कट्टरपंथी महिला को आगे किया गया. उसके सबरंग नाम के एनजीओ को विदेशों से करोडो रुपये की फंडिंग मिली जिससे उसने भाजपा और नरेंद्र मोदी के विरुद्ध बहुत बड़ा विमर्श खड़ा किया. गुजरात के कट्टरपंथी नेता अहमद पटेल ने भाजपा और मोदी के विरुद्ध षड्यंत्रकारी विमर्श द्वारा मोदी और अमित शाह को फंसाने के लिए एक आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया. कांग्रेस, वामपंथियों, मुस्लिम चरमपंथियों और अर्बन नक्सलियों के षड्यंत्र के कारण कई पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी तथा भाजपा नेताओं को जेल भी जाना पड़ा. तीस्ता सीतलवाड़ जैसे चरमपंथियों तथा चाटुकार मीडिया को तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा समय समय पर सम्मानित भी किया गया. तीस्ता सीतलवाड को भाजपा और मोदी के विरुद्ध सांप्रदायिक षड़यंत्रों और विमर्शों की लंबी श्रृंखला बनाने में उल्लेखनीय योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया. उसकी कट्टरपंथी और अलगाववादी विचारधारा को प्रोत्साहन देने के लिए उसे सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाली नेशनल एडवाइजरी काउंसिल का सदस्य भी बनाया गया. हिंदुओं का और अधिक दमन करने के लिए कांग्रेस जिस सांप्रदायिक हिंसा विधेयक का प्रारूप तैयार कर रही थी, उसका ड्राफ्ट बनाने वाली समिति में भी तीस्ता सीतलवाड़ को कुछ अन्य चरमपंथियों के साथ शामिल किया गया था.

अनन्तोगत्वा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गुजरात दंगों की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया गया और उसकी रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन मुख्यमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गुजरात दंगों के मामले में क्लीनचिट दी गई लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व में राष्ट्र की विघटनकारी शक्तियों ने हार नहीं मानी और बीबीसी के माध्यम से गुजरात दंगों पर झूठे और षड्यंत्रकारी विमर्श पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री का निर्माण कराया गया, जिसमें साबरमती ट्रेन में कारसेवकों को जिंदा जलाकर मार देने की घटना को दुर्घटना बताया गया है. विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 31 लोगों को दोषी पाया, जिसमें 11 को फांसी, 20 को उम्रकैद की सजा सुनाई। 63 अन्य पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण बरी कर दिया. अरशद मदनी और महमूद मदनी का देवबंदी गिरोह इन सजायाफ्ता अपराधियों के मामले सर्वोच्च न्यायालय में लड़ रहा है, जो शुरू से ही गोधरा मामले को मुसलमानों के विरुद्ध विमर्श के रूप में प्रचारित प्रसारित करता रहा है.

फ़िल्म में सच्चाई प्रदर्शित होने के बाद भी वामपंथ-इस्लामिक और विमर्शवादी मीडिया इससे हिंदू मुस्लिम भाई चारा बिगड़ने की बात कर रहा है लेकिन देश सच का सामना करने के लिए तैयार है. आज की युवा पीढ़ी को देखना और समझना चाहिए कि हिंदू बाहुल्य इस देश में हिंदुओं के साथ कितना भेदभाव किया जाता है. यह समझ उनके भविष्य, अस्तित्व और सुरक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है.

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

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