रविवार, 15 अक्टूबर 2023

इसराइल, हमास और भारत

 

हमें इसराइल, हमास और भारत को आज के परिपेक्ष्य में समझना होगा. हमें हमास और फिलिस्तीन में भी अंतर करना होगा. इस समय फिलिस्तीन कहीं भी परिद्रश्य में नहीं है लेकिन वर्ग विशेष और उसके प्रेमी फिलस्तीन के बहाने आतंकवाद को समर्थ देते हैं.

संयुक्त राष्ट्र संघ की योजनानुसार 14 मई 1948 को रात 12:00 बजे अस्तित्व में आने के बाद से ही इजराइल इस्लामिक जिहाद का सामना कर रहा है क्योंकि अस्तित्व में आने के 5 मिनट बाद ही उस पर आक्रमण हो गया. तब से इजरायल ने न केवल इन आक्रमणों के साथ जीना सीखा बल्कि उनके साथ आगे बढ़ना भी सीखा और अपनी प्रगति और समृद्धि का उदाहरण दुनिया के समक्ष प्रस्तुत किया. विश्व के ज्यादातर लोग तभी से यहूदियों को सही अर्थों जान सके लेकिन उससे पहले इन यहूदियों पर कितना अत्याचार हुआ, इन्हें मिटाने का प्रयास किया गया, अधिकांश लोग नहीं जानते और विमर्श भी ऐसा बनाया जाता है की लोग सच्चाई जान भी नहीं पाते. 1949 में एक आर्मीस्‍टाइस लाइन खींची गई, जिसमें फिलिस्‍तीन के 2 क्षेत्र बने- वेस्‍ट बैंक तथा गाजा और दोनों के बीच इजराइल. इस प्रकार फ़िलिस्तीन दो जगह ठीक उसी प्रकार था जैसे विभाजन के बाद भारत के पश्चिमी और पूर्वी ओर पाकिस्तान था. गाजा लगभग 40 किलोमीटर लंबी और 6 से 8 किलोमीटर चौड़ी समुद्र के किनारे एक पट्टीनुमा जगह है इसलिए इसे गाजा पट्टी भी कहा जाता है, जो 2005 तक इजरायल के कब्जे में थी लेकिन 2005 में इजराइल ने शांति समझौते के अंतर्गत गाजा की इस भूमि से अपना कब्जा हटा कर फ़िलिस्तीन को सौंप दिया. फ़िलिस्तीन के हाथों से गाजा की यह भूमि आतंकी संगठन हमास के हाथों आ गई. हमास के मुखिया कतर में रहकर गाज़ा का शासन चलाते हैं. हमास की वित्तीय जरूरतें अरब देशों के अतिरिक्त ईरान पूरी करता है जिससे वह अपनी आतंकवादी गतिविधियाँ चलाता है. स्वाभाविक है इन देशों की सहायता से ही हमास इसराइल पर इतना बड़ा आक्रमण कर सका.

आतंकी संगठन हमास द्वारा इजराइल पर किया गया आक्रमण हाल के दिनों में इस्लामिक जिहाद की क्रूरतम घटनाओं में से एक है जिसने पूरे विश्व के अधिकांश मनुष्यों की अंतरआत्मा को झकझोर दिया सिवाय कुछ उन लोगों के जिनके अंदर मानवता नाम की कोई चीज़ नहीं होती. दुर्भाग्य से भारत का इतिहास इस्लामिक आक्रांताओं के इससे भी अधिक घिनौने भयानक और अमानवीय कुकृत्यों से भरा पड़ा है, जिसे आज की पीढ़ी ठीक से जानती भी नहीं क्योंकि नेहरू ने इतिहास में लीपापोती कर इस्लामिक आक्रांताओं के कुकृत्यों पर पर्दा डालने का काम किया. ये छिपी हुई बात नहीं कि हमास इजरायल को पूरी तरह समाप्त करके पूरे क्षेत्र को फ़िलिस्तीन घोषित करके इस्लामिक साम्राज्य स्थापित करना चाहता है.

  1. ऐसे समय जब इजराइल छुट्टियां मना रहा था और गाजा पट्टी के निकट संगीत महोत्सव चल रहा था, हमास ने इजराइल की बेहद चाक चौबंद सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए तीन तरफ से आक्रमण किया. संगीत महोत्सव में आये अधिकांश लोगों को आतंकियों नें बेहद निर्ममता से मार डाला और बहुत से लोगों को बंधक बना लिया. आतंकियों ने घरों में घुसकर क्रूरता की सारी सीमाएं तोड़ते हुए परिवार के परिवार साफ कर दिए. अगवा की गई महिलाओं और बच्चों के साथ दरिंदगी की सारी सीमाएं तोड़ दी गई. जीवित महिलाओं के साथ ही नहीं, उनकी लाशों तक के साथ दरिंदगी की गई. मृत महिलाओं के शरीर को निर्वस्त्र करके सार्वजनिक परेड कराई गई. कई छोटे छोटे बच्चो के सिर तन से जुदा कर दिए गए. इजराइल में मृतकों का आंकड़ा अब तक 1300 पार कर चुका है, लगभग 10,000 लोग घायल हैं, जिनमें 2000 की हालत गंभीर हैं. इजराइल ने स्वाभाविक प्रतिक्रिया स्वरूप युद्ध घोषित करते हुए गाजा पट्टी पर ताबड़तोड़ हमले किये. इजराइल की गई कार्रवाई के बाद हमास ने गाजा में अपहृत लोगों की परेड कराकर इजराइल को धमकी दी है कि अगर उसने गाजा पर हमले किए तो बंधकों की हत्या कर दी जाएगी। इस तरह का ब्लैकमेल इस्लामिक आतंकवादियों के लिए नया नहीं है। 

इसके बाद दुनियाभर के देश पक्ष विपक्ष में खड़े होने लगे. एक तरफ ऐसे देश हैं, ऐसे लोग हैं जिन्होंने हमास आतंकियों द्वारा की गई अमानवीय और हृदय विदारक कार्रवाइयों की घोर निंदा की है और आतंकी कार्रवाइयों के विरोध में एकजुटता प्रदर्शित करते हुए इजरायल के साथ खड़े हैं. वहीं दूसरी ओर ऐसे देश हैं जो इस्लामिक भाईचारा और जेहाद को समर्थन करते हुए हमास के साथ खड़े हैं. भारत के अंदर जैसी प्रतिक्रिया हुई है, हैरान करने वाली नहीं है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इजरायल पर आतंकी हमले की निंदा करने में बिल्कुल भी देर नहीं लगायी और आतंक के विरुद्ध इजरायल के साथ मजबूती से खड़े रहने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई. इसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है क्योंकि भारत में अब तक सरकारों द्वारा इस तरह के निर्णय केवल भारतीय मुसलमानों को देखकर ही किए जाते रहे हैं, मानवता या राष्ट्रीय हित गौण होते थे. इस प्रकार अधिकांश समय भारत की विदेश नीति पर तुष्टिकरण की छाया रहती आयी है। स्वतंत्रता के बाद शायद यह पहली बार है, जब किसी सरकार ने सच को सच और झूठ को झूठ कहने की हिम्मत दिखाई है, और ये बेहद साहसिक कदम है. सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत स्वतंत्र फिलिस्तीनी की मांग का भी समर्थन करता है और उसकी परंपरागत विदेशनीति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है लेकिन किसी भी आतंकी कार्रवाई का समर्थन नहीं किया जा सकता है.

मोदी सरकार द्वारा इजरायल को समर्थन देने का फैसला राष्ट्रीय फैसला है, और सभी देशवासियों को इसका सम्मान करना ही चाहिए। दुर्भाग्य से भारत इस मामले में भी एकजुटता नहीं दिखा सका. कांग्रेस कार्यसमिति ने आतंकी कार्रवाई का विरोध नहीं किया लेकिन फ़िलिस्तीन को अपना समर्थन किया. यद्यपि वर्तमान मामला इजराइल और आतंकवादी संगठन हमास के बीच का है, और हमास को फ़िलिस्तीन की सेना नहीं माना जा सकता और अगर फ़िलिस्तीन की सेना भी होती, तो भी अमानवीय कार्रवाई स्वीकार्य नहीं की जा सकती. भारत के मुसलमानों के एक बहुत बड़े वर्ग ने हमेशा की तरह मुस्लिम ब्रदरहुड के नाम पर हमास का समर्थन किया और मोदी द्वारा हमास के बर्बर आतंकी तांडव का विरोध करने और इजरायल के साथ सहानुभूति प्रदर्शित करने की कड़ी भर्त्सना की. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हमास की कार्रवाई का समर्थन किया है। बोर्ड के अध्यक्ष मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने बयान जारी कर कहा कि हमास की मौजूदा कार्रवाई फलस्तीनी जनता के साथ किए जा रहे जुल्म और मस्जिद अल-अक्सा की बेहुरमती (अपमान) की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। उसने कहा कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की परंपरा को नजरअंदाज कर शोषितों के बजाय उत्पीड़न करने वालों का खुला समर्थन किया, जो देश के लिए बेहद शर्मनाक और दुखद है। इस तरह की विचारधारा घृणित, सांप्रदायिक और मानवता विरोधी हैं, जिसकी हर संभव निंदा की जानी चाहिए. फ़िलिस्तीन के अधिकारों पर बात हो सकती है लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित दुर्दांत आतंकी संगठन और उसके कुकृत्यों की तरफदारी नहीं की जा सकती और उसके साथ खड़े होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता, लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अलावा भी कई मुस्लिम राजनेताओं ने हमास की कार्रवाई का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समर्थन किया. भारत में आतंकी घटनाओं पर मुस्लिम समुदाय हमेशा कहता है कि आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता तो फिर आज धर्म के नाम पर हमास का समर्थन क्यों।

इंदिरा गाँधी के इशारे पर गठित मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड शुरू से ही देश में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच घृणा उत्पन्न करके देश का वातावरण सांप्रदायिक बनाने का कार्य कर रहा है. सरकार को चाहिए कि इस राष्ट्र विरोधी संगठन को तुरंत प्रतिबंधित करे. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का बेतुका बयान देश में दंगे कराने की बड़ी साजिश हो सकता है. वैसे भी 2024 के चुनावों के मद्दे नजर अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक बामपंथ गठजोड़ भारत में तरह तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहा है या उनके विमर्श स्थापित कर रहा है. जिसमे हिंदू मुस्लिम टकराव, हिंदुओं में जाति संघर्ष करवाना प्रमुख अजेंडा है। मणिपुर से मेवात तक और गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में घटित तमाम घटनाओं में इस अजेंडे की झलक है।

इस सबके बीच मुस्लिम समाज से आशा की एक किरण भी उभरी है, जो भारतीय मुसलमानों के एक वर्ग के प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचायक है. ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम समाज ने इजराइल और फलस्तीन के बीच चल रहे युद्ध में आम नागरिकों के मारे जाने पर दुख जताते हुए संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष परवेज हनीफ ने कहा कि हम किसी भी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि ये पूरा मामला अंतर्राष्ट्रीय स्तर का है, इसलिये भारत सरकार की जो भी रणनीति होगी, उनका संगठन उसका समर्थन करेगा। निश्चित रूप से ऐसे मुस्लिम संगठनों की जो कट्टरता का जाल तोड़कर राष्ट्र की मुख्यधारा के साथ खड़े होने का साहस रखते हैं, प्रशंसा की जानी चाहिए और उनकी आवाज को महत्त्व भी दिया जाना चाहिए.

भारत के देशभक्त लोगों को बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता है, क्योंकि इजराइल की ही तरह कई इस्लामिक संगठन गज़वा ए हिंद के माध्यम से भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाना चाहते हैं. इसलिए जाति पाति का भेदभाव भुलाकर जिहादी विचारधारा और इसका समर्थन करने वाले राजनैतिक दलों का पुरज़ोर विरोध करके यह यह भी सुनिश्चित करें कि ऐसे राजनीतिक दल किसी भी परिस्थिति में सत्ता में न सके अन्यथा भारत के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है.

~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा~~~~~~~~~~~~~~~



बुधवार, 27 सितंबर 2023

क्या कल के ब्राह्मण (और अन्य ऊंची जातियां) आज के दलित बन रहे हैं?

 

François Gautier

 

THE DALITS AS BRAHMINS AND THE BRAHMINS AS DALITS

(François Gautier की रिपोर्ट का हिन्दी रूपांतर)


क्या कल के ब्राह्मण (और अन्य ऊंची जातियां) आज के दलित बन रहे हैं?

 

    ऐसे समय में जब ट्विटर के  जैक डोरसी भारत की यात्रा पर थे, 'तथाकथित' ब्राह्मण प्रभुत्व और जिसे 'जाति रंगभेद' कहा जाता है, का विरोध करने वाले पोस्टर के साथ फोटो खिंचवाई जाती है, कोई भी उच्च जातियों की दुर्दशा के बारे में बात नहीं करता है। उदाहरण के लिए, ब्राह्मणों की सार्वजनिक छवि एक संपन्न, लाड़-प्यार वाले वर्ग की है। लेकिन क्या आज ऐसा है?


    खैर, आप खुद जज करें: दिल्ली में 50 सुलभ शौचालय (सार्वजनिक शौचालय) हैं; सभी की सफाई और देखभाल ब्राह्मणों द्वारा की जाती है (यह बहुत ही स्वागत योग्य सार्वजनिक संस्थान एक ब्राह्मण द्वारा शुरू किया गया था)। प्रत्येक शौचालय में 5 से 6 ब्राह्मण होते हैं। ये ब्राह्मण आय के स्रोत की तलाश में आठ से दस साल पहले दिल्ली आए थे, क्योंकि वे अपने अधिकांश गाँवों में अल्पसंख्यक थे, जहाँ दलित बहुसंख्यक (60 - 65%) हैं। यूपी और बिहार के अधिकांश गांवों में, दलितों का एक संघ है जो उन्हें गांवों में रोजगार सुरक्षित करने में मदद करता है। ब्राह्मणों के लिए बहुत बुरा ! क्या आप जानते हैं कि दिल्ली रेलवे स्टेशन पर आपको कई ब्राह्मण कुली के रूप में काम करते हुए भी मिलते हैं? उनमें से एक, कृपा शंकर शर्मा का कहना है कि उनकी बेटी विज्ञान में स्नातक कर रही है, लेकिन उन्हें यकीन नहीं है कि वह नौकरी हासिल कर पाएगी या नहीं। वह कहते हैं, ''दलितों के अक्सर पांच से छह बच्चे होते हैं, लेकिन उन्हें भरोसा है कि वे उन्हें आसानी से और अच्छी तरह से पाल लेंगे। नतीजतन, गांवों में दलित आबादी बढ़ रही है। वह कहते हैं: “दलितों को आवास उपलब्ध कराया जाता है, यहाँ तक कि उनके सूअरों के लिए भी जगह है; जबकि ब्राह्मणों की गायों के लिए गोशालाओं का कोई प्रावधान नहीं है”।


    आपको दिल्ली में ब्राह्मण रिक्शा चालक भी मिल जाएंगे। पटेल नगर में 50% रिक्शा चालक ब्राह्मण हैं जो अपने अन्य भाइयों की तरह नौकरी की तलाश में शहर चले गए हैं। पूरे दिन की मेहनत के बाद भी, दो ब्राह्मण रिक्शा चालक, विजय प्रताप और सिद्धार्थ तिवारी का कहना है कि वे मुश्किल से अपना गुज़ारा चला पा रहे हैं। उनके रिक्शा, जो 25/- रुपये दैनिक किराए पर हैं, अक्सर चोरी हो जाते हैं। ये पुरुष हर दिन औसतन लगभग 100/- से 150/- रुपये कमाते हैं, जिसमें से 500/- से 600/- रुपये उनके कमरे के किराए में चला जाता है, जिसे 3 से 4 लोग या उनके परिवार साझा करते हैं।

    पश्चिम पटेल नगर में काम करने वाले रिक्शाचालक, उनमें से अधिकांश की उम्र तीस वर्ष है, बलजीत नगर और शादीपुर गाँव जैसे आस-पास के इलाकों में रहते हैं। ये सभी उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के रहने वाले हैं। उनमें से कुछ 28 वर्षीय ब्राह्मण अरुण कुमार पांडे जैसे योग्य हैं, जिन्होंने हाई स्कूल की पढ़ाई की है। उनका कहना है कि वह एक रिक्शाचालक के रूप में काम कर रहे हैं क्योंकि उनके गांव में रोजगार के अवसर कम हैं और स्कूली शिक्षा स्तर तक नहीं है। वह एक कमरे में किराए पर रह रहा है जिसे चार लोग साझा करते हैं और 600 रुपये मासिक भुगतान करते हैं। क्या आप यह भी जानते हैं कि बनारस के अधिकांश रिक्शेवाले ब्राह्मण हैं ?

    यह उल्टा भेदभाव नौकरशाही और राजनीति में भी पाया जाता है। अधिकांश बौद्धिक ब्राह्मण तमिल वर्ग तमिलनाडु के बाहर चले गए हैं। संयुक्त यूपी और बिहार विधानसभा में 600 में से केवल 5 सीटों पर ब्राह्मणों का कब्जा है - बाकी यादवों के हाथ में हैं। कश्मीर घाटी के पिछले 400,000 ब्राह्मण, कभी सम्मानित कश्मीरी पंडित, अब अपने ही देश में शरणार्थी के रूप में रहते हैं, कभी-कभी जम्मू और दिल्ली में शरणार्थी शिविरों में भयावह स्थिति में रहते हैं। लेकिन उनकी फिक्र किसे है? उनका वोट बैंक नगण्य है।

क्या आपको लगता है कि यह केवल उत्तर में है? आंध्र प्रदेश में 75% घरेलू नौकर और रसोइया ब्राह्मण हैं। में एक जिले में ब्राह्मण समुदाय का एक अध्ययन आंध्र प्रदेश (चुघ प्रकाशन द्वारा प्रकाशित जे.राधाकृष्ण द्वारा रचित ब्राह्मण ऑफ इंडिया) से पता चलता है कि आज सभी पुरोहित गरीबी रेखा से नीचे रहते हैं।

 

सर्वेक्षण में शामिल 80 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनकी गरीबी और पोशाक और बालों की पारंपरिक शैली (टफ्ट) ने उन्हें उपहास का पात्र बना दिया था। "पिछड़े वर्गों" के लिए आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था के साथ मिलकर वित्तीय बाधाओं ने उन्हें अपने बच्चों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा प्रदान करने से रोक दिया।

वास्तव में इस अध्ययन के अनुसार ब्राह्मण छात्रों की संख्या में समग्र गिरावट आई है। ब्राह्मणों की औसत आय गैर-ब्राह्मणों की तुलना में कम होने के कारण, ब्राह्मण छात्रों का एक बड़ा प्रतिशत मध्यवर्ती स्तर पर पढ़ाई छोड़ देता है। 5-18 वर्ष आयु वर्ग में, 44 प्रतिशत ब्राह्मण छात्रों ने प्राथमिक स्तर पर और 36 प्रतिशत ने प्री-मैट्रिक स्तर पर शिक्षा छोड़ दी। अध्ययन में यह भी पाया गया कि सभी ब्राह्मणों में से 55 प्रतिशत गरीबी रेखा से नीचे रहते थे जो प्रति व्यक्ति से नीचे है.

650 रुपये प्रति माह की आय

  • चूंकि भारत की कुल आबादी का 45 प्रतिशत आधिकारिक तौर पर गरीबी रेखा से नीचे बताया गया है, यह प्रतिशत इस प्रकार है
  • निराश्रित ब्राह्मणों की संख्या अखिल भारतीय संख्या से 10 प्रतिशत अधिक है। यह मानने का कोई कारण नहीं है कि ब्राह्मणों की स्थिति देश के अन्य भागों में  अलग है
  • इस संबंध में यह उद्धृत करना भी उचित होगा. राज्य विधानसभा में कर्नाटक के वित्त मंत्री द्वारा बताई गई विभिन्न समुदायों की प्रति व्यक्ति आय: ईसाई रु.1562, वोक्कालिगा रु.914, मुसलमान -794 रुपये, अनुसूचित जाति  680 रुपये, अनुसूचित जनजाति 577 रुपये और ब्राह्मणों  537 रुपये।

भयावह गरीबी कई ब्राह्मणों को शहरों में पलायन करने के लिए मजबूर करती है जिससे स्थानिक फैलाव होता है और परिणामस्वरूप उनके स्थानीय प्रभाव और संस्थानों में गिरावट आती है।

ब्राह्मणों ने शुरू में सरकारी नौकरियों और कानून और चिकित्सा जैसे आधुनिक व्यवसायों की ओर रुख किया। लेकिन गैर-ब्राह्मणों के लिए प्राथिमिकता की  नीतियों के कारण ब्राह्मण इन क्षेत्रों में भी पीछे धकेल दिए गए। आंध्र प्रदेश के अध्ययन के अनुसार, ब्राह्मणों का सबसे बड़ा प्रतिशत आज घरेलू नौकरों के रूप में कार्यरत है। इनमें बेरोजगारी की दर 75 फीसदी तक है.

अमीर और घमंडी ब्राह्मण पुजारी के सम्बन्ध प्रचिलित मिथक ? सत्तर प्रतिशत ब्राह्मण अभी भी अपने वंशानुगत व्यवसाय पर निर्भर हैं। सैकड़ों परिवार ऐसे हैं जो महज 10 रुपये पर गुजर-बसर कर रहे हैं। विभिन्न मंदिरों में पुजारी के रूप में प्रति माह 500 (धर्मस्व सांख्यिकी विभाग) पुजारी आज भारी कठिनाई में हैं, कभी-कभी जीवित रहने के लिए भीख माँगने के लिए भी मजबूर हो जाते है। ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जिनमें वेदों का अध्ययन करने वाले ब्राह्मण पुजारियों का उपहास और अपमान किया जा रहा है। तमिलनाडु के रंगनाथस्वामी मंदिर में, एक पुजारी का मासिक वेतन 300 रुपये (जनगणना विभाग अध्ययन) और एक माप चावल का दैनिक भत्ता है। उन्हीं मंदिरों में सरकारी कर्मचारियों को प्रति माह 2500 रुपये से अधिक मिलते हैं। लेकिन इन तथ्यों ने इन पुजारियों  की " लुटेरे " और "शोषक" की छवि  नहीं बदली है। हिंदू पुजारियों की बदहाली ने किसी को भी विचलित नहीं किया, यहां तक कि हिंदू सहानुभूति के लिए जाने जाने वाले राजनैतिक दलों को भी नहीं।

आधुनिक भारत की त्रासदी यह है कि दलितों, ओबीसी और मुसलमानों के संयुक्त वोट किसी भी सरकार के निर्वाचित होने के लिए पर्याप्त हैं। आजादी के बाद कांग्रेस ने इसे तुरंत भुना लिया, लेकिन सोनिया और राहुल गांधी की कांग्रेस के अलावा शायद किसी  और राजनैतिक दल नें  वोट बटोरने के लिए भारतीय समाज को बांटने में इतनी बेशर्मी  नहीं दिखाई है। उनकी पिछली कांग्रेस सरकार ने मस्जिदों में इमामों के वेतन के लिए 1000 करोड़ और हज सब्सिडी के रूप में 200 करोड़ दिए लेकिन ब्राह्मणों और ऊंची जातियों के लिए ऐसी कोई सहायता उपलब्ध नहीं है।

 गैर-धर्मनिरपेक्ष दिखने के डर से वर्तमान भाजपा सरकार भी ज्यादा प्रयास नहीं कर रही है। नतीजतन, न केवल ब्राह्मण, बल्कि निम्न मध्य वर्ग की कुछ अन्य उच्च जातियां भी आज  पीड़ित और चुपचाप हैं, और धीरे-धीरे अल्पसंख्यकों को अपने बहुमत पर नियंत्रण करते हुए देख रही हैं। ब्राह्मण विरोध हिंदू विरोधी हलकों में उत्पन्न हुआ और अभी भी पनप रहा है। मार्क्सवादियों, मिशनरियों, मुसलमानों, अलगाववादियों और विभिन्न रंगों के ईसाई समर्थित दलित आंदोलनों के बीच इस पर विशेष रूप से खुशी  है। जब वे ब्राह्मणों पर हमला करते हैं, तो उनका लक्ष्य स्पष्ट रूप से हिंदू धर्म होता है।

ट्विटर और फेसबुक अलग नहीं हैं क्योंकि उनके पास इस्लामोफोबिया के खिलाफ दिशानिर्देश हैं, लेकिन हिंदूफोबिया का स्वागत करते हैं।

तो सवाल पूछा जाना चाहिए: क्या कल के ब्राह्मण (और अन्य ऊंची जातियां) आज के दलित बन रहे हैं?

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François Gautier की वेबसाईट -https://www.francoisgautier.com/2019/10/15/the-dalits-as-brahmins-and-the-brahmins-as-dalits-2/

से साभार लिया गया और हिन्दी रूपांतरित किया गया






शनिवार, 29 जुलाई 2023

विपक्ष का इंडिया, न इंडिया और न भारत

 



विपक्ष का इंडिया, न इंडिया और न भारत

 

विपक्षी एकता की जो बैठक बैंगलोर में हुई उसका सबसे बड़ी उपलब्धि ये रही की कांग्रेस ने अपने गठबंधन के पुराने नाम यूपीए से मुक्ति पा ली क्योंकि यूपीए भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता का पर्याय बन कर पूरी दुनिया  कुख्यात हो गया था. इसलिए कांग्रेस ने इस गठबंधन का नाम इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायन्स (आई.एन.डी.आई.ए.) जिसका छोटा रूप इंडिया होता है, रख लिया. बताया गया है कि इंडिया नाम का सुझाव राहुल गाँधी ने दिया था लेकिन  बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि यह नाम आया कहाँ से. दरअसल राहुल गाँधी और कांग्रेस को चुनाव में विजय दिलाने के उद्देश्य से इस समय कई विश्व स्तरीय सलाहकार फर्म काम कर रही है, जो  इस तरह के सनसनीखेज, आई कैचिंग और भावनात्मक मुद्दों को ट्रंप कार्ड की तरह इस्तेमाल करने के लिए चुनाव तक सुझाव देती रहेंगी. अमेरिकन फर्मों  का समन्वय सैम पित्रोदा कर रहे हैं, वहीं  से यह सुझाव आया.

इंडियन नाम रखने के पीछे एक और कारण बताया जा रहा है कि इस नाम को भाजपा के राष्ट्रवाद की काट के रूप में इस्तेमाल किया जा सकेगा. इससे गठबंधन राष्ट्रभक्ति ओत प्रोत दिखाई पड़ेगा तब  इंडिया बनाम भाजपा, इंडिया बनाम मोदी, इंडिया बनाम एनडीए  आदि के नारों के साथ मोदी के राष्ट्रवाद को पीछे ढकेला जा सकेगा और  “सबका साथ, सबका विकास, जैसे लोकप्रिय नारे  की धार को कुंद किया जा सकेगा. कांग्रेस तथा उसके गठबंधन साथियों ने पहले दिन से ही इस मंत्र का जाप करना शुरू कर दिया और चक दे इंडिया, जीतेगा इंडिया आदि प्रतीकात्मक नारों से गठबंधन को राष्ट्रवाद से जोड़ने की कोशिश शुरू कर दी. इन दलों को ऐसा लगता है कि  कोई भी राष्ट्रभक्त इंडिया का कोई विरोध नहीं कर सकेगा तथा इंडिया नाम के कारण ही 2024 के लोकसभा चुनाव की वैतरणी पार हो जाएगी. गठबंधन के कई छोटे छोटे दल तो इतने खुश हैं कि उन्हें लगता है जैसे सरकार बनने ही वाली है.

गठबंधन के इस इंडिया नाम से भ्रम तो फैलेगा ही लेकिन यह अन्यथा भी आपत्तिजनक है और कानून का उल्लंघन भी. गठबंधन के नेता इंडियन नाम पर जश्न मना रहे हैं और इसे उचित भी ठहरा रहे हैं कि  फिर मोदी ने मेक इन इंडिया क्यों बनाया, स्किल इंडिया क्यों बनाया, अटल सरकार ने शाइनिंग इंडिया नाम क्यों दिया. ये तर्क नहीं कुतर्क है. कांग्रेस के इस इंडिया की तुलना संविधान में वर्णित इंडिया दैट इज भारत से की जा रही है और डुगडुगी पीटी जाने लगी है  कि अब मोदी का मुकाबला इंडिया से है. इस संबंध में दिल्ली में एक एफआईआर दर्ज की गई है और समझा जाता है कि कई एडवोकेट पीआईएल दाखिल करने की तैयारी कर रहे हैं. 1950 के “दी एम्ब्लेम्स एंड नेम्स (प्रीवेंसन ऑफ इम्प्रॉपर यूज़ ) एक्ट, 1950 में  यह कानूनी प्रावधान है कि इंडिया नाम व्यक्तिगत उद्देश्यों के लिए उपयोग में नहीं लाया जा सकता है, जहाँ कहीं इस नाम का उपयोग किया जाता है उसमें इंडिया के साथ आगे या पीछे कुछ और शब्द जोड़ने चाहिए ताकि  ऐसा भ्रम न रहे की ये राष्ट्रीय संगठन है जो इंडिया का प्रतिनिधित्व करता है. तकनीकी तौर पर देखा जाए तो विपक्षी गठबंधन का ये इंडिया किसी राजनीतिक पार्टी का नाम नहीं है ये राजनीतिक पार्टियों के गठबंधन का शार्ट फार्म या छोटा रूप है, और इसका इंडिया या भारत से कोई लेना देना नहीं है. लेकिन, अगर विपक्षी गठबंधन केवल ‘INDIA’ नाम से किसी संस्था, वेबसाइट, कंपनी या संगठन को रजिस्टर कराने जाता है तो उसके विरुद्ध कार्रवाई संभव है और तब कानूनी प्रावधान के अनुसार इस  नाम के इस्तेमाल करने पर रोक लगाई जा सकती है. अगर ये मामला कोर्ट में जाता है तो भी शायद गठबंधन की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा क्योंकि उस समय इसे आई.एन.डी.आई.ए. के रूप में बताया जाएगा. निश्चित रूप से इस  भ्रम का फायदा कांग्रेस उठाएगी. चुनाव में इस तरह के  भावनात्मक प्रतीकों, नारों का इस्तेमाल करना कांग्रेस को बहुत अच्छी तरह से आता है. कांग्रेस का चुनाव चिन्ह पहले दो बैलों की जोड़ी, उसके बाद बछड़े को दूध पिलाती गाय और उसके बाद आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ. इस तरह इंडिया शब्द से कुछ न कुछ फायदा तो गठबंधन को जरूर होगा.

विपक्षी  दलों की बंगलुरु मीटिंग को अगर देखा जाए तो कांग्रेस ने बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से  केसीआर, केजरीवाल और ममता बनरजी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनने से रोकने के लिए नीतीश कुमार का इस्तेमाल किया और बड़े सलीके से गठबंधन की बागडोर अपने हाथ में ले ली. नीतीश कुमार नाराज बताए जाते हैं क्योंकि उनको यह एहसास हो गया है कि उनका इस्तेमाल किया जा रहा है. इस बैठक में पवार भी पावरलेस दिखाई पड़े. इसकी संभावना बहुत प्रबल है कि अगर सुप्रिया सुले को लेकर प्रधानमंत्री की तरफ से कोई बड़ा आश्वासन दिया जाता है तो शरद पवार को लुढ़कने में बहुत ज्यादा समय नहीं लगेगा.

ममता बेनर्जी ने राहुल को अपना फेवरेट बताकर सरेंडर कर दिया. राहुल को 2 साल की सजा हुई है, और अगर यह बरकरार रहती है तो वह  6 साल तक चुनाव नहीं लड सकेंगे फिर भी उनको ले कर कांग्रेस और दूसरे दल इतना सकारात्मक कैसे है. क्या उन्हें  लगता है कि सर्वोच्च न्यायालय राहुल गाँधी को राहत दे ही देगा. केजरीवाल के साथ दिल्ली और पंजाब का मसला है, कांग्रेस दिल्ली पूरी तरह से केजरीवाल के  हवाले करने के लिए तैयार हैं लेकिन पंजाब के रोड़ा  है. सजायाफ्ता लालू यादव का भरपूर साथ कांग्रेस को मिल रहा है क्योंकि क्योंकि नीतीश कुमार को कांग्रेस का एजेंट बनाने में उनकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है. गठबंधन के अन्य छोटे दलों  की केंद्रीय महत्वाकांक्षा नहीं है और कांग्रेस पर आश्रित रहेंगे क्योंकि उन्हें तो भाजपा से अपना हिसाब किताब बराबर करना है. चाहे फारूक अब्दुल्ला हो, महबूबा मुफ़्ती, मुस्लिम लीग या कम्युनिस्ट पार्टियां, मोदी समान रूप से सबके निशाने पर हैं. मुंबई में होने वाली आगामी बैठक में सब कुछ कांग्रेस प्रयोजित ही होगा और गठबंधन का नेतृत्व पूरी तरह से कांग्रेस के हाथों में आ जाएगा. सीटों का बंटवारा होने के पहले ही कांग्रेस गठबंधन के साथी दलों को यह संदेश देना चाहती है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके कितने सहयोगी हैं जो हर हाल में में मोदी को हटाना चाहते हैं.

आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव तक सोशल मीडिया तथा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विमर्श बनाने वाली सलाहकार फार्मों द्वारा  गठबंधन के “इंडिया” का जमकर प्रचार किया जाएगा ओर इसे राष्ट्रवादी प्रतीक चिन्ह के रूप में मोदी के विरुद्ध खड़ा किया जाएगा. मोदी विरोध में तड़प रहे गैर सरकारी संगठन और जॉर्ज सोरोस का टूलकिट गैंग भारत में मजबूती के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है. आने वाले दिनों में भाजपा शासित राज्यों में दलितों, आदिवासियों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के साथ नाटकीय घटनाएं होने की संभावना है, जिसका एकमात्र उद्देश्य कांग्रेस को राजनीतिक फायदा पहुंचाना हो सकता है. सबसे अधिक वे राज्य प्रभावित होंगे जहाँ विधानसभा के चुनाव होने हैं और जहाँ लोकसभा की सीटों की संख्या अधिक है.

मणिपुर में हो रही हिंसा भी राजनैतिक प्रभाव से मुक्त नहीं मानी जा सकती विशेषतय: तब, जब विपक्ष लगातार मणिपुर हिंसा के नाम पर मोदी की महत्वपूर्ण और काफी पहले से निर्धारित विदेश यात्राओं को भी राजनीतिक दुष्प्रचार का केंद्र बनाता रहा हो. मणिपुर में 4 मई को हुई वीभत्स और अमानवीय घटना का वीडियो सोशल मीडिया में संसद के मानसून सत्र के ठीक एक दिन पहले वायरल किया गया, जिसका निहितार्थ समझना मुश्किल नहीं है. संसद के अंदर और बाहर जमकर कोहराम मचना स्वाभाविक था. विपक्ष को संसद की कार्यवाही बाधित करने का एक मुद्दा मिल गया और भाजपा और मोदी को जिम्मेदार बता कर देश दुनिया में दुष्प्रचार कर मोदी की छवि धूमिल करने का मौका भी मिल गया.

मणिपुर के वीडियो पर  सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेते हुए सरकार को सख्त किन्तु असामान्य चेतावनी दी जिसने विपक्ष के हौसले और बुलंद कर दिए. यद्यपि मणिपुर की घटना पूरे देश को शर्मसार करने वाली है लेकिन ऐसी अनेक घटनाएं पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव, और पंचायत चुनाव में भी हुई. राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में भी हुई लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने कभी स्वतः संज्ञान नहीं लिया. ये मानने का कोई कारण नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय की चेतावनी में कोई राजनीतिक संदेश छिपा होगा, लेकिन सोशल मीडिया में यह अफवाह बहुत दिनों से गर्म है कि सर्वोच्च न्यायालय 2024 के लोकसभा चुनाव का अजेंडा तय करेगा. राहुल गाँधी की सजा , धारा 370, दिल्ली सरकार ऑर्डिनेंस जैसे कई महत्वपूर्ण मामले सर्वोच्च न्यायालय विचाराधीन हैं जिनके निर्णय सरकार के विरुद्ध आने की संभावना व्यक्त की जा रही है.

केंद्र और राज्य सरकारों, खासतौर से भाजपा शासित को बहुत  सतर्क रहने की आवश्यकता है ताकि राजनीतिक उद्देश्य के लिए सांप्रदायिक और जातिगत विद्वेष भड़काने वाली घटनाएँ  प्रयोजित न की जा सके जिससे राष्ट्र  की एकता, अखंडता और अस्मिता को अक्षुण रखा जा सके.

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~



सोमवार, 17 जुलाई 2023

सर्वोच्च न्यायलय २०२४ के चुनाव का अजेंडा तय करेगा

 

आगामी लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा और विपक्ष अपनी अपनी तैयारियों में जुटा है. विपक्षी एकता की कवायद जारी है. विपक्ष को एकजुट करने के लिए कई नेताओं ने अलग अलग प्रयास किए जिसमें के चंद्रशेखर राव, ममता बनर्जीं, अरविन्द केजरीवाल और नितीश कुमार प्रमुख हैं.

विपक्षी एकता की गंभीर शुरुआत नीतीश कुमार ने की और उसके पीछे मुख्य भूमिका लालू यादव की रही जिन्होंने सोनिया गाँधी के अनुरोध पर नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री बनने का लालच देकर भाजपा से अलग करने में मुख्य भूमिका निभाई. पलटूराम के नाम से कुख्यात नीतीश कुमार शायद इसके लिए मानसिक रूप से पहले से ही तैयार थे क्योंकि भाजपा गठबंधन में वह मुख्यमंत्री जरूर थे लेकिन उनकी भूमिका छोटे भाई की हो गयी थी. उन्हें हमेशा यह खतरा महसूस होता था कि भाजपा उनकी पार्टी को निगल जाएगी. इसलिए उन्होंने बिना समय गंवाए लालू यादव के साथ सरकार बना ली और मुख्यमंत्री बने रहे. तय शर्तों के अनुसार वह लोक सभा चुनाव तक मुख्यमंत्री रहेंगे और केंद्र में प्रधानमंत्री के चेहरे के रूप में अपनी भूमिका तलाशते रहेंगे, ततपश्चात मुख्यमंत्री का पद तेजस्वी यादव को सौंप देंगे.

कांग्रेस से वार्ता में उनके लिए स्वर्गीय देवीलाल वाली भूमिका तय की गई, जिसमे संसदीय दल ने चौधरी देवीलाल को प्रधानमंत्री पद के लिए अपना नेता चुना था लेकिन उन्होंने बड़ी विनम्रता दिखाते हुए अपने को पीछे कर लिया और बी पी सिंह के नाम का प्रस्ताव किया जिस पर नाटकीय अंदाज में तुरंत सहमति बन गई. इस तरह वी पी सिंह ने चंद्रशेखर को किनारे लगा दिया था. नीतीश कुमार को यही काम राहुल गाँधी के लिए करना था. अगर राहुल गाँधी के नाम पर सहमत नहीं बन पाती है, तो कांग्रेस नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री बना सकती है. इसलिए नीतीश कुमार ने विपक्ष को संगठित करने का बीड़ा उठाया . उन्होंने विपक्षी एकता के लंबरदारों की पटना में एक बैठक आयोजित की, जिसमे के चंद्रशेखर राव, नवीन पटनायक और वाईएस जगन मोहन रेड्डी शामिल नहीं हुए. बैठक में लालू यादव ने मज़ाकिया लहज़े में राहुल गाँधी को दूल्हा बना दिया. विरोधाभास के चलते संयोजक का नाम तय किये बिना शरद पवार की सहमति से कांग्रेस ने अगली बैठक शिमला में प्रस्तावित कर दी. शरद पवार, लालू यादव और कांग्रेस के मिलेजुले प्रयास ने नीतीश कुमार की भूमिका सीमित कर दी, जो उनके लिए निराशाजनक भी था.

पवार के सुझाव पर शिमला में होने वाली इस बैठक को बैंगलोर स्थानांतरित कर दिया गया. इससे पहले कि बैठक आयोजित होती, शरद पवार की पार्टी उसी तरह टूट गई जैसे शिवसेना टूटी थी. इससे शरद पवार के साथ साथ कांग्रेस व नितीश कुमार का मनोबल भी टूट गया. नीतीश कुमार को एहसास होने लगा कि लालू और कांग्रेस उनका इस्तेमाल कर रहे हैं. व्यथित नीतीश कुमार ने भाजपा से संपर्क साधा, यद्यपि अमित शाह पहले ही घोषणा कर चुके थे कि भाजपा के दरवाजे नीतीश कुमार के लिए हमेशा हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं. भाजपा ने वापसी के लिए एक शर्त रखी कि बिहार में अब भाजपा का मुख्यमंत्री होगा और नीतीश को केंद्रीय मंत्रिमंडल में समाहित किया जा सकता है. नीतीश ने सुशील मोदी और राज्यसभा उपाध्यक्ष हरिवंश सिंह के माध्यम से भाजपा से मोल तोल करने की कोशिश की लेकिन शायद इसलिए बात नहीं बन सकी क्योंकि उनकी अपनी पार्टी में विभाजन की आशंका प्रबल होती जा रही थी. कुछ विधायक राजद के साथ और बाकी भाजपा के साथ जा सकते थे, जिससे वह बिल्कुल खाली हाथ हो सकते थे. किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में नीतीश कोई निर्णय नहीं कर सके और भाजपा सदन के अंदर और बाहर सरकार का आक्रामक विरोध करती रहीं.

पटना में भाजपा द्वारा आयोजित प्रदर्शन में पुलिस लाठीचार्ज के कारण एक भाजपा नेता की मृत्यु हो गई और कई बुरी तरह से घायल हो गए. इस घटना ने जहाँ भाजपा को अपने दरवाजे पूरी तरह बंद करने पर मजबूर कर दिया, वहीं नीतीश कुमार की राजनैतिक स्थिति अत्यंत दयनीय बना दी. इस तरह दो प्रमुख नेता शरद पवार और नीतीश कुमार विपक्षी एकता के लिए अप्रासंगिक हो चुके हैं. इस बीच पश्चिम बंगाल में हुए पंचायत चुनाव में भारी हिंसा में 45 से अधिक व्यक्ति मारे गए और सैकड़ों बेघर हो गए. यहाँ भाजपा मुख्य विपक्षी भूमिका में हैं लेकिन हिंसा में भाजपा के अतिरिक्त कांग्रेस कार्यकर्ता भी बड़ी संख्या में हताहत हुए जिससे कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी तृणमूल कांग्रेस के विरुद्ध बेहद आक्रामक हैं. अब विपक्षी एकता के लिए ममता बनर्जीं का भी उत्साह ठंडा पड़ गया है. संख्या बढ़ाने के लिए कांग्रेस अब मुस्लिम लीग सहित कई छोटे छोटे दलों को विपक्षी कुनबे में शामिल करने का प्रयास कर रही है ताकि सांसदों की संख्या भले न बढ़ें लेकिन दलों की संख्या बढे जिससे कांग्रेस की बढ़ती स्वीकार्यता का संदेश आम जनमानस में दिया जा सके.

इस बीच भारत में जॉर्ज सोरोस समर्थित गैर सरकारी संगठनों ने अपनी गतिविधियों बढ़ा दी है. बड़ी मात्रा में फंडिंग की जा रही है और नए नए विमर्श गढ़े जा रहे हैं. राहुल गाँधी की छवि तराशने का काम तो काफी पहले से चल रहा है. उन्होंने अपनी ब्रिटेन और अमेरिका यात्रा में भारत विरोधी अंतरराष्ट्रीय शक्तियो के सहारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत विरोधी विमर्श बनाने का हर संभव प्रयास किया. अंतर्राष्ट्रीय वामपंथ इस्लामिक गठजोड़ समर्थित कई भारत विरोधी संगठनों के साथ मिलकर राहुल ने यह स्थापित करने की कोशिश की थी, कि भारत में मुस्लिमों पर अत्याचार किया जा रहा है और लोकतंत्र पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है. इस षड्यंत्र में बराक ओबामा जैसे अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति का शामिल होना यह प्रमाणित करता है कि भारत विरोधी लॉबी कितनी शक्तिशाली है और भारत के विरुद्ध षड्यंत्र कितना बड़ा, गंभीर और घातक है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फ्रांस द्वारा बेस्टिल डे परेड में मुख्य अतिथि बनाए जाने से वहां के वामपंथी और मुस्लिम कट्टरपंथी नाराज है. कुछ संसद सदस्यों ने फ्रांस के इस राष्ट्रीय पर्व का बहिष्कार भी किया. वामपंथी इस्लामिक गठजोड़ समर्थित फ्रांस के कई समाचार पत्रों ने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की इस बात के लिए आलोचना की है कि उन्होंने सांप्रदायिक दंगों के बीच मोदी को बेस्टिल डे परेड का मुख्य अतिथि बनाया. अंतर्राष्ट्रीय अर्थ में भारत और मोदी विरोध का मतलब सामान्यतय: हिंदू और सनातन धर्मियों का विरोध होता है.

2024 के लोकसभा चुनावों की जितनी तैयारी भारत में चल रही है उससे कहीं ज्यादा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही है. राहुल गाँधी की संसद सदस्यता समाप्त होने पर कई देशों की प्रतिक्रिया, संयुक्त राष्ट्रसंघ के कुछ विभागों / आयोगों द्वारा भारत में अल्पसंख्यकों के लिए चिंता व्यक्त करना, हाल में यूरोपीय संसद द्वारा मणिपुर हिंसा पर कड़े शब्दों में प्रतिक्रिया देना और भारत को अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करने की सलाह देना, इसका ज्वलंत उदाहरण है. इस बीच सोशल मीडिया पर नए नए विमर्श गढ़े जा रहे हैं, जो पूरी तरह से भ्रामक और सत्य से परे हैं, लेकिन उन्हें इस तरह प्रचारित और प्रसारित करवाया जा रहा कि इसके पीछे कोई राजनीतिक उद्देश्य नहीं है. इस पूरे खेल में कुछ गैर सरकारी संगठनों के अलावा भाड़े पर काम करने वाले सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी, न्यायाधीश और सैन्य अधिकारी भी शामिल हैं. ये सभी सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को प्रभावित करने की भी कोशिश कर रहे हैं. हाल में फैलाए जा रहे एक नये विमर्श के अनुसार अगले कुछ सप्ताह में सर्वोच्च न्यायालय 2024 के लोकसभा चुनाव की दिशा और दशा तय कर देगा. झूठे और मनगढ़ंत विमर्श के माध्यम से यह भ्रम फैलाने की की कोशिश की जा रही है कि सर्वोच्च न्यायालय राहुल गाँधी की सजा पर रोक लगा कर उनकी संसद सदस्यता बहाल कर देगा, शिवसेना उद्धव ठाकरे ग्रुप को असली शिवसेना की मान्यता प्रदान कर देगा, शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ भी ऐसा ही निर्णय आएगा, जिससे महाराष्ट्र सरकार गिर जायेगी, धारा 370 बहाल कर देगा, दिल्ली की केजरीवाल सरकार के विरुद्ध केंद्र के अध्यादेश को निरस्त कर देगा. अगर मोदी सरकार समान नागरिक संहिता कानून बनाती है तो वह भी निरस्त किया जाएगा. ये लोग तर्क देते हैं कि कैसे उन्होंने प्रवर्तन निदेशक की छुट्टी करवाई, सत्येंद्र जैन की तरह मनीष सिसोदिया को भी जमानत मिलेंगी, दिल्ली में केंद्र सरकार के दखल पर रोक लगेगी आदि आदि.

ही उद्देश्य है कि हर हालत में 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार को सत्ता से बाहर करना है. इस सबके बावजूद, भारत के मतदाता प्रबुद्ध हैं, और वे देशहित में सही फैसला करेंगे. मतदाताओं ने कई बार ऐसा सिद्ध भी किया है जब चुनाव में राज्यों और केंद्र के अलग अलग परिणाम देखने को मिले. भ्रामक और असत्य समाचारों पर समय रहते स्पष्टीकरण देना, अफवाह फैलाने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करना सरकार का दायित्व है. सरकार को राष्ट्रहित में टूलकिट गैंग, अजेंडा धारियों और राष्ट्रविरोधी शक्तियों के विरुद्ध समय रहते सख्त कार्रवाई करने से नहीं हिचकना चाहिए. किसी भी हालत में राष्ट्र की एकता अखंडता और अस्मिता से खिलवाड़ करने वालों के साथ कोई भी उदारता नहीं की जानी चाहिए और यही दृढ़ निश्चय भाजपा को सत्ता में पुनः प्रतिस्थापित कर सकता है.

~~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

रविवार, 9 जुलाई 2023

हिंदू साम्राज्य दिवस और हिंदवी स्वराज

 

हिंदू साम्राज्य दिवस और हिंदवी स्वराज

आधुनिक भारत में छत्रपति शिवाजी महाराज ने हिन्दू सम्राज्य को नए सिरे से पुनः स्थापित किया था और 1674 में ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी तदनुसार 6 जून 1674 को  महाराष्ट्र में पांच हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित रायगढ़ किले में एक भव्य समारोह में शिवाजी का राज्याभिषेक किया गया था । प्रत्येक वर्ष इस दिन को हिंदू साम्राज्य दिवस के रूप में मनाया जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को हिन्दू साम्राज्य, संस्कृति, सभ्यता और सौहार्द के प्रति जागरूक करना है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित कई हिंदूवादी संगठन हर वर्ष इसे त्यौहार के रूप में मनाते हैं. जहाँ कुछ संगठन हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को मनाते हैं, वही पूरे भारत में प्रत्येक वर्ष 6 जून को बहुत उत्साह और गौरव पूर्वक मनाया जाता है। 4 अक्टूबर 1674 को शिवाजी ने दूसरी बार छत्रपति की उपाधि ग्रहण की जिसमे उन्होंने हिंदवी स्वराज्य की स्थापना का उदघोष करते हुए स्वतंत्र शासक के रूप में अपने नाम का सिक्का भी चलाया। इसके पश्चात् शिवाजी पूर्णरूप से छत्रपति अर्थात् एक प्रखर हिंदू सम्राट के रूप में स्थापित हुए। शिवाजी ने अनुशासित सेना व सुसंगठित प्रशासनिक इकाइयों के सहयोग से सुव्यवस्थित प्रशासन की स्थापना की।

शिवाजी के राज्याभिषेक का भारत के लिए अत्यंत महत्त्व है क्योंकि इसने सभी को भारत के हिंदू चरित्र और एक नए साम्राज्य के उद्देश्य से परिचित कराया। सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय तक जो भी हिंदू राजा थे उन्हें किसी मुस्लिम सम्राट ने ही यह उपाधि प्रदान की थी। मेवाड़ और बुंदेलखंड को छोड़कर कोई भी राजा अपनी शक्ति सामर्थ्य के बल पर  राजा नहीं था लेकिन इन दोनों राज्यों में संपूर्ण भारत में हिंदू साम्राज्य स्थापित करने की दूर दृष्टि नहीं थी। इसलिए शिवाजी का प्रसंग सर्वथा  भिन्न है क्योंकि उन्होंने न केवल अपने बलबूते दिल्ली सल्तनत को चुनौती देते हुए अपना राज्य स्थापित किया और संपूर्ण भारत में हिंदवी स्वराज स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयास किया।

शिवाजी उन प्रारंभिक शासकों में से एक थे जिन्होंने समुद्री युद्ध की सर्वोच्च महत्ता को समझते हुए पश्चिमी तट पर दुर्गों का निर्माण किया और समुद्री जहाजों का प्रयोग सेना और व्यापार दोनों के लिए किया. इसलिए शिवाजी को भारतीय नौसेना का जनक माना जाता है. 15  से 50 वर्ष की आयु के मध्य उन्होंने 276 युद्ध लड़ें और उसमें से 268 में उनकी विजय हुई. आसानी से समझा जा सकता है कि उनकी सफलता का प्रतिशत कितना अच्छा था. शिवाजी का कहना था कि मानसरोवर से लेकर कन्याकुमारी तक और कन्याकुमारी से लेके ईरान तक यह राष्ट्र हमारा है और इसे हम लेकर रहेंगे. अपना  उद्देश्य  प्राप्त करने के लिए उन्होंने उत्तर भारत के सभी राजाओं महाराजाओं  को एकजुट करने का कार्य किया. सही अर्थों में मुगल साम्राज्य समाप्त करने का श्रेय क्षत्रपति शिवाजी को ही है.

638 से 711 ई. के बीच खलीफ़ाओं के निर्देश पर भारत पर 15 आक्रमण किए गए जिसमें 14 बार खलीफा की सेना को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा. 15 वां आक्रमण 711 में मोहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में किया गया था, जिसे भी सिंध के राजा दाहिर ने परास्त कर दिया. मोहम्मद बिन कासिम ने पुनः बड़ी सेना लेकर  सिंध पर आक्रमण किया।  उसने राजा दाहिर के सिपहसलार को यह लालच देकर अपने साथ मिल लिया कि युद्ध में विजय के बाद उसे सिंध का राजा बना दिया जाएगा. राजा दाहिर ने सभी भारतीय राजाओं से मुस्लिम आक्रमण के विरुद्ध मदद मांगी लेकिन अधिकांश राजाओं ने कोई सहायता नहीं की. मोहम्मद बिन कासिम ने राजा दाहिर के विश्वासघाती सिपहसालार की सहायता से षड्यंत्र रचकर जीत हासिल की और बाद में विश्वासघाती सिपहसलार को भी मार दिया. इस तरह भारत में इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना की नींव पड़ी. ग्यारहवीं शताब्दी तक दिल्ली पर इस्लामिक आक्रांताओं का कब्जा हो गया. हजरत मोहम्मद की मृत्यु के बाद छह वर्षों के अंदर उनके उत्तराधिकारियों ने सीरिया, मिस्र, उत्तरी अफ्रीका, स्पेन और ईरान को जीत लिया था, जिसके पीछे बहशीपन, क्रूरता, विश्वासघात और धोखाधड़ी का महत्वपूर्ण योगदान था. सारे षड्यंत्रों के बाद भी इस्लामिक जेहाद को  दिल्ली तक पहुँचने में  400 वर्ष लग गए.

 तलवार की  दम पर पूरी दुनिया में फैल रहे इस्लाम का जब भारतीय संस्कृति से सामना हुआ तो भारी खून खराबा और नरसंहार हुआ. अमेरिकी इतिहासकार स्टैनले वोलपर्ट ने लिखा है कि इस्लाम और हिंदू धार्मिक जीवन शैली में इतनी अधिक भिन्नता है कि इनके बीच शांति या सामंजस्य की कल्पना करना भी असंभव है. अनुमान के अनुसार भारत में लगभग 8 करोड़ हिंदुओं का नरसंहार किया गया है जो मानव सभ्यता के इतिहास में सर्वाधिक है।  हिंदुस्तान ने पहली बार ऐसे बाहरी हमलावरों को देखा था, जो मजहब के नाम पर लोगों का क़त्ल करते थे, महिलाओं का बलात्कार करते थे और लूट-पाट करते थे. 1202 में तुर्क-अफगान हमलावरों ने बौद्ध धर्म के महान केंद्र नालंदा पर हमला करके तहस-नहस कर दिया। नालंदा के महाविहार में रह रहे हज़ारों बौद्ध भिक्षुओं का क़त्ल कर दिया गया और हजारों को अपनी जान बचाकर नेपाल और तिब्बत भागना पड़ा। यह इस्लाम का ही असर था कि जिस मिट्टी में बौद्ध धर्म पैदा हुआ था, वहीं से उसे देश निकाला दे दिया गया था।

पृथ्वीराज चौहान ने 17 बार मुहम्मद गौरी को युद्ध में परास्त किया था और भारतीय संस्कृति की महान परंपराओं को ध्यान में रखते हुए लेकिन युद्धनीति और कूटनीति को अनदेखा करते हुए क्षमा कर दिया था।  अठारहवीं बार मुहम्मद गौरी ने जयचंद की सहायता से पृथ्वीराज चौहान को युद्ध में हरा दिया और बंदी बनाकर अपने साथ ले गया. मोहम्मद गौरी के हाथों पृथ्वीराज की हार ने भारत में हिंदू साम्राज्य और सनातन संस्कृति को  पराभव के अंधे मोड़ पर खड़ा कर दिया जिसने दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यता तथा संस्कृति, वैज्ञानिकता पूर्ण जीवन शैली और ज्ञान के वैभव पर ग्रहण लगा दिया। कालांतर में यह भारतीय इतिहास में अमानवीय क्रूरता, मजहबी  कट्टरता और मानसिक संकीर्णता का निकृष्टतम काला अध्याय साबित हुआ.

शिवाजी ने इतिहास की भूलों से शिक्षा लेते हुए नया दृष्टिकोण अपनाया और कम संसाधनों के बाद भी, शक्तिशाली मुस्लिम साम्राज्य से लोहा लेने के लिए छापा मार शैली का उपयोग किया और दिल्ली सल्तनत की चूलें हिला कर अपना साम्राज्य स्थापित किया.  यद्यपि छत्रपति शिवाजी महाराज का कार्यकाल बहुत संक्षिप्त, केवल छह वर्ष के लिए  1674 से 1680 तक रहा  लेकिन उन्होंने सार्वभौमिक सम्राट के रूप में अपना दायित्व निभाया और   साम्राज्य स्थापित करने के संघर्ष, सुचिता, वीरता और नैतिकता के जो मापदंड स्थापित किये उसने  कालांतर में भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक और राजनैतिक दिशा तय कर दी जिसे इस्लामिक आक्रांता परिवर्तित करने का प्रयास कर रहे थे.

मुस्लिम आक्रांताओं ने इस देश को इस्लामिक राष्ट्र बनाने के लिए जितनी बर्बर कार्रवाइयां की थी, तलवार के ज़ोर पर धर्मांतरण करने का प्रयास किया था और सनातन धर्मावलंबियों का मान मर्दन किया था, जिससे उनके अंदर हीन ग्रंथि की भावना घर कर गयी थी. शिवाजी नें इसे बाहर निकलने और नई ऊर्जा से नई दिशा देने का कार्य किया. उनकी युद्ध कला, रणनीतिक कौशल ओर कूटनीतिक सफलता ने  सनातन धर्म और संस्कृति को संजीवनी देने का कार्य किया. जिस इस्लामिक जिहाद ने विश्व की अनेक सभ्यताओं को निगल लिया था, वह भारत में अब तक पूरी तरह से सफल नहीं हो पायी है.

शिवाजी की मृत्यु के बाद हुई अनेक घटनाओं से उनकी दूरदृष्टि और हिंदवी  स्वराज की परिकल्पना को और अधिक रेखांकित किया. शिवाजी की विरासत इतनी मजबूत थी कि उनकी मृत्यु के बाद स्वयं औरंगजेब को उनके राज्य पर चढ़ाई करने के लिए आना पड़ा. मुगलों की क्रूरता के प्रत्युत्तर में प्रत्येक घर एक किला और शारीरिक रूप से योग्य हर युवा हिंदवी स्वराज का सैनिक बन गया था। अप्रतिम वीरता और छापामार पद्धति के नए सेनापति सामने आए, जिन्होंने शत्रुओं की सेना पर जोरदार हमले किए।  अपनी विशाल सेना और सभी पारंगत योद्धाओं के बावजूद औरंगजेब को चार वर्ष तक चले लंबे संघर्ष में आखिरकार हार का सामना करना पड़ा और औरंगजेब की मृत्यु भी वही हो गयी. उसकी कब्र औरंगाबाद, जिसका नाम अब संभाजी नगर रख दिया गया है, में ही बनी, जहाँ इस समय औरंगजेब की फोटो सिर पर रखकर एक धर्म विशेष के लोग उत्पात मचा रहे हैं. औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही मुगलों के उत्कर्ष का भी अंत हो गया।  इस तरह हिंदवी स्वराज के चढ़ते सूरज के साथ भगवा प्रभात का आगमन हुआ।

भारत के धर्मांतरित इस्लाम को यह बात रास नहीं आई उन्होंने अफगानिस्तान के अब्दाली को भारत पर हमले हेतु बुलाया, जिसके पश्चात 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठा साम्राज्य की पराजय हुई लेकिन  कुछ ही वर्षों में मराठियों ने वापसी की ओर अटक से कटक तक भगवा परचम लहरा दिया एक प्रकार से संपूर्ण भारतवर्ष छत्रपति शिवाजी द्वारा प्रतिपादित हिंदवी स्वराज्य की ओर बढ़ चला था. शिवाजी के राजनैतिक आदर्श आज भी प्रासंगिक है, और जब भारत में सनातन धर्म और संस्कृति पर षड्यंत्र पूर्वक खतरे आज उत्पन्न किये जा रहे हैं, उनका समाधान शिवाजी के आदर्शों से ही संभव है।

      ~~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~  

 

 

 








 

 

 

 

 

 

गज़वा-ए-हिंद में हिस्सेदारी

 

गज़वा-ए-हिंद में हिस्सेदारी

आखिर वहीं हुआ जिसका अंदेशा था. कर्नाटक में मिली अप्रत्याशित सफलता के बाद कांग्रेस ने खुलकर खेलना शुरू कर दिया है. मंत्रिमंडल ने अपनी बैठक में ऐसे फैसले लिए जिनसे जनसामान्य हतप्रभ है. धर्मांतरण कानून को वापस लेने का फैसला किया है. गोहत्या कानून पर मंथन हो रहा है कि इसे निष्प्रभावी किया जाए या पूरी तरह से वापस ले लिया जाए. चूंकि  मुस्लिम समुदाय इसे पूरी तरह से वापस लेने के लिए दबाव बना रहा है, इसलिए इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस कानून को भी पूरी तरह से अप्रसंगिक और निष्प्रभावी कर दिया जाएगा. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख चेहरा केशव बलिराम हेडगेवार को शैक्षणिक पाठ्यक्रम से बाहर कर दिया गया है. इसके साथ ही सभी स्कूलों में रोजाना प्रार्थना सभा में संविधान की प्रस्तावना पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया है.

भाजपा सरकार के इन फैसलों को पलटने के साथ ही कांग्रेस सरकार ने मुस्लिमों को बड़ा संदेश दे दिया है, जिनके 98% से भी अधिक मत पाकर कांग्रेस सरकार बनाने में सफल हुई है. कहने की आवश्यकता नहीं है कि धर्मांतरण का उद्देश्य भू जनसांख्यिकी बदल कर इस्लामिक देश की स्थापना करना है और यह बात किसी से भी छिपी नहीं है. वैसे तो कांग्रेस ने खुले तौर पर कर्नाटक की जनता को पांच गारंटी दी थी लेकिन परदे के पीछे एक समुदाय विशेष को कुछ और गारंटी दी थी. चुनाव में विजय के बाद मुस्लिम संगठनों ने कांग्रेस को इन गारंटियों की न केवल याद दिलाई थी बल्कि सत्ता में भागीदारी के लिए भी दबाव बनाया था. कांग्रेस ने समुदाय विशेष को गारन्टी को पूरा करने में विलंब भी नहीं किया. पूरे कर्नाटक में बुर्के का जश्न मनाया जा रहा है उससे लगता है कि शीघ्र ही कानून बना कर स्कूलों कॉलेजों और विश्वविद्यालय में बुर्का पहनने की खुली छूट दे दी जाएगी.

अगर छल कपट, गैर कानूनी और षड्यंत्रपूर्वक धर्मांतरण न किया जाए तो भला किसी को धर्मांतरण कानून से क्या परेशानी हो सकती है. इसलिए धर्मांतरण कानून समाप्त करने का उद्देश्य धर्मांतरण को बढ़ावा देने के अलावा और कुछ नहीं हो सकता. धर्मांतरण द्वारा जनसंख्या परिवर्तन और तदनुसार राष्ट्र परिवर्तन,  गज़वा-ए-हिंद का एक प्रमुख हथियार है. तो क्या कांग्रेस गज़वा-ए-हिंद में सहायता कर रही है या स्वयं भागीदारी कर रही है. इस परिपेक्ष्य में राहुल गाँधी की अमेरिका यात्रा को समझना बेहद आसान है, जिसमें उनकी सभाओं के रजिस्ट्रेशन मस्ज़िदों में किए गए, सभाओं में भाग लेने वालों के लिए बसें भी मस्ज़िदों ने उपलब्ध कराई, सभाओं के प्रायोजक वर्ग विशेष की कुख्यात संस्थाओं से जुड़े हुए थे. ये सभी कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में अंतर्राष्ट्रीय वामपंथ-इस्लामिक गठजोड़ के संगठनों से संबद्ध हैं, जिनके तार पाकिस्तान और अफगानिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों से भी जुड़े हुए हैं. ये चीन और अरब देशों से फंडिंग प्राप्त करके भारत और सनातन संस्कृति के विरुद्ध विदेशों में अभियान चला रहे हैं. प्रत्यक्ष रूप से ये सभी संगठन भारत के गज़वा ए हिंद को गति प्रदान करते हैं. भारत में वर्ग विशेष द्वारा बहुसंख्यकों के प्रति की जाने वाली हिंसा, हिंदू विरोधी, संविधान विरोधी, गैरकानूनी और आतंकवादी गतिविधियों को ढकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदू विरोधी और भारत विरोधी अभियान चलाते हैं. ये सभी अंतरराष्ट्रीय सोशल मीडिया पर भारतीय मुसलमानों के लिए विक्टिम कार्ड भी खेलते हैं.

आज इन संगठनों के अतिरिक्त विश्व के अनेक संगठन हैं  जो जॉर्ज सोरोस जैसे धनकुबेरों से वित्तीय सहायता लेकर मोदी को हटाने का षडयंत्र रच रहे हैं. ऐसे समय में जब मोदी को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने वाला हिंदू समुदाय, मोदी से हताश भी है और नाराज भी, 2024 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की स्थिति को अत्यधिक कमजोर नजर आती है. दुर्भाग्य से भाजपा इस ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दे रही है और केवल विकास के सहारे एक बार फिर 2024 के लोकसभा चुनावों की वैतरणी पार करने की कोशिश कर रही है, जो बेहद खतरनाक और आत्मघाती है. अगर २०२४ भाजपा की सरकार नहीं बन पाती है तो भाजपा सहित देश के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण होगा और शायद सनातन संस्कृति को बचाने का अंतिम प्रयास भी विफल हो जाएगा. इसलिए भाजपा को तो इस पर विचार करना ही होगा किन्तु भाजपा से नाराज समर्थकों और कार्यकर्ताओं को भी राष्ट्रहित में पुनर्विचार करना चाहिए.

कर्नाटक में लोगों को अब भाजपा सरकार याद आ रही है, जिसे उसने हाल के चुनाव में बुरी तरह से हराया था. भाजपा और उसके अनुषांगिक संगठनों के कार्यकर्ताओं को भी अब चुनाव में भाजपा के लिए समुचित मेहनत न करने का पछतावा हो रहा है लेकिन अब पछताने और दुख करने से कोई लाभ नहीं. पता नहीं भाजपा को भी अपनी गलतियों पर पछतावा हो रहा है या नहीं. भाजपा को लोगों की आकांक्षाएं पूरा करने के लिए कटिबद्धता और समय सीमा के लिए निश्चित रूप से कांग्रेस से सीखने की जरूरत है. भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बसव राज बोम्मई ने कर्नाटक में सरकार के नियंत्रण वाले सभी मंदिरों को मुक्त करने की घोषणा की थी, जो संभवत: वरिष्ठ नेताओं के दबाव में नहीं किया जा सका. अगर मंदिर मुक्ति का कानून भी बना दिया गया होता तो कर्नाटक में भाजपा किसी भी कीमत पर चुनाव नहीं हारती. भाजपा पता नहीं किसी हीन ग्रंथि का शिकार है या किसी से भयग्रस्त रहती है कि वह हमेशा रक्षात्मक ढंग से काम करती है. केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार तो केंद्रीय कानून बनाकर सभी राज्यों में सरकार के नियंत्रण वाले मंदिरों को मुक्ति कर सकती थी और इसमें किसी भी दूसरे संप्रदाय के लोगों को आपत्ति भी नहीं हो सकती थी, फिर भाजपा ने ये क्यों नहीं किया, समझ में न आने वाली बात है. भाजपा की वर्तमान पूर्ण बहुमत वाली सरकार की तुलना अगर 1991 की  पी वी नरसिम्हा राव की अल्पमत सरकार से की जाए तो भाजपा और कांग्रेस की कार्यशैली का अंतर स्पष्ट हो जाता है. नरसिम्हा राव सरकार ने अल्पमत में होते हुए भी पूजा स्थल विधेयक कानून बना कर समूचे हिंदू समाज और सनातन संस्कृति के हाथ पैर बांध दिए. वक्फ बोर्ड का ऐसा कानून बना दिया जो कभी भी कहीं भी किसी की भी संपत्ति हड़प सकता है. अल्पसंख्यक आयोग को संवैधानिक दर्जा भी दे दिया गया. उस समय 120 सांसदों के साथ भाजपा मुख्य विपक्ष की भूमिका में थी, कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी और अटल बिहारी वाजपेयी सदन में थे. पीवी नरसिम्हाराव अटल बिहारी वाजपेयी को अपना गुरु मानते थे. इसलिए आज भी कोई यह नहीं समझ पा रहा है कि ये तीनों राष्ट्रविरोधी और सनातन विरोधी कानून, बेहद खतरनाक प्रावधानो के साथ कैसे पास होने दिए गए, जबकि आज छोटी छोटी पार्टियां हफ्तों सदन नहीं चलने देती और पूर्ण बहुमत की सरकार असहाय बनी रहती है.

पूर्ण बहुमत की यह भाजपा सरकार पिछले 10 साल से कार्य कर रही है लेकिन एक भी साहसिक कदम को पूरी निष्ठा और कर्तव्यबोध के साथ आगे नहीं बढ़ा सकी है. धारा 370 हटाने का कदम निश्चित रूप से बेहद साहसिक और प्रशंसनीय है लेकिन बाद में स्थायी निवासी होने तथा संपत्ति खरीदने के लिए 15 साल निवास की अनिवार्यता ने आशाओं पर तुषारापात कर दिया. सीएए और एनआरसी कानून ने सभी राष्ट्रवादियों में नए उत्साह का संचार कर दिया लेकिन एक शाहीन बाग से घबराकर सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जिससे राष्ट्रवादियों का मनोबल  टूट गया. पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं की अनदेखी और उन्हें उनके हाल पर हिंसा का शिकार होने के लिए छोड़ देने से कार्यकर्ता भी नाराज हुए और समर्थक भी. जिसका परिणाम कर्नाटक की बुरी हार के रूप में सामने आया.

गाँधी और नेहरू दोनों ही मुस्लिम प्रेमी थे. गाँधी को साउथ अफ्रीका में ही ये प्रेम रोग हो गया था और नेहरू के तो जैसे खून में ही यह प्रेम था. इसलिए स्वतंत्रता के बाद षड्यंत्रपूर्वक जनसंख्या की अदला बदली नहीं की गई बल्कि नेहरू ने राष्ट्र की कीमत पर मुस्लिमों  के पक्ष में और हिंदुओं के विरुद्ध सुनियोजित षडयंत्र किए. बाद की कांग्रेसी सरकारों ने भी मुस्लिम तुष्टिकरण की नई नई परिभाषाएं गढ़ी और क्षेत्रीय दल तो मानो मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ही गठित किए गए हैं. आज पूरे देश में धर्मांतरण अपने चरम पर है. लव जिहाद, जमीन जिहाद, जनसंख्या जिहाद, और घुसपैठ जिहाद पूरे ज़ोर शोर से बिना किसी भय बाधा के चल रहा है. इनका विरोध कर रहे लोगों को फिरकापरस्त सांप्रदायिक और दक्षिणपंथी करार दिया जा रहा है.  धीरे धीरे गृहयुद्ध जैसे हालात बनते जा रहे हैं. भाजपा की जो सरकार शाहीन बाग, किसान आंदोलन यहाँ तक कि पहलवान आंदोलन को भी रोकने में सफल नहीं हो सकी, उसने उत्तरकाशी में लव जिहाद, जमीन जिहाद और जनसंख्या परिवर्तन के खतरों पर विचार विमर्श के लिए होने वाली महापंचायत को सख्ती से रोक दिया है. पूरा देश आज रोहिंग्याओं और  अवैध घुसपैठियों अपने घेर रखा है. रेलवे ट्रैक के किनारे अवैध झुग्गियां बनी हुई है जिससे रेलवे ट्रैक को किसी भी समय रोका जा सकता है, जिससे यात्री और कारोबार से सेना आवागमन भी निरुद्ध किया जा सकता है. अवैध बाजारों और झुग्गी झोपड़ियों ने हवाई अड्डे की चारदीवारियों को भी घेर रखा है. पूरा परिदृश्य बेहद खतरनाक नजर आता है और ऐसे में पूर्ण बहुमत की सरकार से अपेक्षा है कि वह  उन लोगों का विश्वास और दिल जीतने का प्रयास करें जिससे उसे सत्ता के शिखर पर पहुंचाया है ताकि न केवल राष्ट्र की एकता अखंडता बल्कि भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति की रक्षा की जा सके.

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

 

 

 


 

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