शुक्रवार, 2 सितंबर 2022

बाल बाल बचे योगी

 

बाल बाल बचे योगी

सर्वोच्च न्यायालय नी अपनी 26 अगस्त 2022 के फैसले ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बड़ी राहत देते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उनके विरुद्ध 2007 में गोरखपुर में हुए सांप्रदायिक दंगों के संबंध में मुकदमा चलाए जाने का आदेश देने का अनुरोध किया गया था. 15 साल पुराना यह मामला अब सदा सर्वदा के लिए बंद हो गया है लेकिन जहाँ इस मुकदमे द्वारा योगी को फंसाने की बड़ी साजिश रची गई थी वहीं इस मुकदमे का अनायास और आनन फानन में सर्वोच्च न्यायालय में लिस्ट कराया जाना भी किसी बड़े रहस्य से कम नहीं है. अगर सर्वोच्च न्यायालय इस याचिका पर मुकदमा चलाए जाने का आदेश दे देता तो योगी के लिए बहुत बड़ी मुसीबत साबित हो जाता क्योंकि इस मुकदमे धारा 302 जैसी अत्यंत संगीन धाराएं भी जोड़ी गई थी, जिसके कारण उनका मुख्यमंत्री का पद भी खतरे में पड़ सकता था.

जनवरी 2007 में मोहर्रम के जुलूस में हुए उपद्रव के कारण उपजे सांप्रदायिक तनाव कि कारण इस मुकदमे की उत्पत्ति हुई जिसका मुख्य कारण तुष्टीकरण और वोटों की राजनीति था. उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव जो कार सेवकों पर गोली चलवाकर एक वर्ग विशेष वोटों पर आधिपत्य हासिल कर चूके थे, शशी डे योगी आदित्यनाथ की गिरफ्तारी का आदेश दिया कुशीनगर से गोरखपुर आते समय रास्ते में ही उन्हें गिरफ्तार किया गया क्योंकि शहर के अंदर या मंदिर परिसर में उन्हें गिरफ्तार करना बहुत मुश्किल था. योगी की गिरफ्तारी के बाद पूर्वांचल की राजनीति ने अभूतपूर्व राजनीतिक घटनाक्रम देखा. योगी को पुलिस लाइन से केवल चार किलोमीटर दूर स्थित जेल ले जाए जाने में  8 घंटे  से अधिक समय लगा. गोरखपुर तथा आसपास के अन्य जिलों में  भी सांप्रदायिक तनाव फैल गया. योगी आदित्य नाथ को 11 दिन बाद जमानत मिल सकी और तब तक स्वतः स्फूर्ति  में गोरखपुर के सभी बाजार बंद रहे. गोरखपुर के इतिहास में यह सबसे लंबी बाजार बंदी थी. मुलायम सिंह यादव ने गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों में योगी आदित्यनाथ के इतने अधिक राजनीतिक प्रभाव कल्पना नहीं की थी. उन्हें भय सताने लगा कि कहीं  तुष्टीकरण के कारण हिंदू मतों से भी हाथ धोना पड़ जाए और इस कारण गोरखपुर के जिलाधिकारी और पुलिस प्रमुख को रातों रात हटा दिया गया. गोरखपुर में आंदोलन की धार को देखते हुए नव नियुक्त जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान को  हेलिकॉप्टर से पुलिस लाइन में उतारा गया था.

योगी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनसे मिलने वालों का तांता लगा रहता था और इसलिए जेल में सुरक्षा चेकिंग को बंद करना पड़ा और जेल की दीवार तोडकर उनकी बैरक तक पहुँचने का एक रास्ता तैयार किया गया ताकि बड़ी संख्या में मिलने आने वाले लोगों भीड़ में तब्दील होने से रोका जा सके. हे जेल में भी योगी की दिनचर्या में कोई खास परिवर्तन नहीं आया और वो हमेशा की तरह ब्रह्म मुहूर्त में जागकर पूजा अर्चना करते थे  और इसलिए 11 दिनों में जेल में  गोरखनाथ मंदिर की तरह माहौल बनने लगा था. योगी ने संसद में रुंधे गले से जब प्रशासन द्वारा उन पर ज्यादती करने और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा तुष्टिकरण के आधार पर पक्षपातपूर्ण कार्रवाई करते हुए जेल भेजे जाने की घटना का उल्लेख किया तो पूरा सदन सकते में आ गया.

यद्यपि पुलिस ने योगी के विरुद्ध उपयुक्त धाराओं में मुकदमा पहले ही दर्ज कर रखा था. एक वर्ग विशेष के मामले में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ इतनी  उदार वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं की वह कभी कभी देश की मुख्यधारा के विरुद्ध हे षडयंत्र का रूप ले लेता है.  गोरखपुर के मामले में भी वर्ग विशेष से संबंध रखने वाले एक तथाकथित पत्रकार और एक समाजसेवी ने सरकार से अनुरोध किया कि योगी के विरुद्ध जो प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई है हैं उसमें कड़ी धाराएं नहीं लगाई गई है और इसलिए धारा 302 सहित अत्यन्त सख्त धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए.  

उस समय जनसामान्य में आम चर्चा थी कि मुलायम सिंह यादव ने तुष्टिकरण के लिए योगी आदित्यनाथ को गिरफ्तार किया  था क्योनी  मुलायम सिंह को  लगता था कि योगी की  गिरफ्तारी से उनकी अल्पसंख्यक समाज में पैठ बढ़ेगी।  योगी के पक्ष में अपार जनसमर्थन  देखते हुए मुलायम सिंह ये आशंका होने लगी थी कि अगर साम्प्रदायिक तनाव बढ़ता गया तो मतों का ध्रुवीकरण भाजपा की तरफ हो सकता है, हे जिससे उनकी सरकार की वापसी मुश्किल हो जाएगी. हे आगामी चुनाव को देखते हुए हे और खासतौर से भाजपा को रोकने के लिए उन्होंने गोरखपुर की अपनी योजना से कदम पीछे खींच लिए. लाख कोशिशों के बाद भी मुलायम सिंह मुस्लिम समुदाय को खुश नहीं कर सके। विधानसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय ने बसपा का समर्थन किया और मायावती ने 206 सीटें जीत कर पहली बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी।

गोरखपुर के इन तथाकथित पत्रकार और समाजसेवियों की योगी पर अतिरिक्त  धाराओं के साथ नई एफआईआर दायर करने की मांग नहीं मानी गई हे तो वे लोग उच्च न्यायालय पहुँच गए जहाँ से उन्हें स्थानीय अदालत भेजा गया. हे स्थानीय अदालत में तमाम कार्रवाई के बाद भी याचिकाकर्ता अदालत को संतुष्ट नहीं कर सके और इसलिए उनकी नई एफआईआर दायर करने की मांग नहीं मानी गई. हे इसके बाद ये लोग पुन: उच्च न्यायालय पहुँच गए  तो एक नई एफआइआर दायर करने का आदेश दे दिया गया और इस प्रकार 2008 में  योगी  तथा उनके अन्य नजदीक लोगों के विरुद्ध धारा 302 सहित कई अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया. राज्य सरकार ने दबाव में आकर पूरे मामले की जांच सीबीसीआईडी से करवाई लेकिन जांच में अंकित उचित और पर्याप्त सबूत नहीं मिले. 2015 में सीबीसीआईडी ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सरकार को सौंप दी और योगी के विरुद्ध कार्यवाही करने की अनुमति मांगी. राज्यपाल ने योगी के विरुद्ध मुकदमा चलाने की अनुमति पर फैसला नहीं किया. इस बीच मार्च 2017 में योगी ने प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और मई 2017 में सरकार ने योगी के विरुद्ध मुकदमा चलाने की अनुमति देने से इंकार कर दिया. इसके बाद याचिकाकर्ता पुनः उच्च न्यायालय पहुंचे और उन्होंने जांच किसी निष्पक्ष और स्वतंत्र एजेंसी से कराने की मांग के साथ साथ योगी के विरुद्ध मुकदमा चलाने का आदेश देने का अनुरोध किया.

2018 में उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए सरकार द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में कोई खामी नजर नहीं आती और इसलिए योगी के विरुद्ध मुकदमा चलाए जाने का कोई आधार नहीं है. उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की उच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त करते हुए योगी के विरुद्ध मुकदमा चलाने का आदेश देने की मांग की, जहाँ यह मामला 2018 से लगातार लंबित था. 26 जुलाई 2022 को  सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले से  योगी के विरुद्ध पिछले 15 वर्षों से लगातार की जा रही एक गहरी  साजिश का पटाक्षेप कर दिया गया ये बिलकुल सही फैसला है. अगर इस मामले की पूरी क्रोनोलॉजी को देखा जाए तो एकदम से स्पष्ट हो जाता है कि यह मुकदमा एक बहुत बड़ी साजिश का हिस्सा था जिसमें न केवल योगी आदित्यनाथ बल्कि उनके निकटवर्ती प्रमुख सहयोगी जिसमें डॉक्टर राधा मोहन अग्रवाल, डॉक्टर वाईडी सिंह आदि को भी शामिल किया गया था. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि सांप्रदायिक दुर्भावना के मुकदमे की रूप में शुरू हुई इस साजिश का प्रारंभिक उद्देश्य राजनीतिक लक्ष्य प्राप्त करना  था, जिसके अंतर्गत गोरखपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में गोरक्षनाथ पीठ का असर कम करना और मुस्लिम वोटों को एकजुट करना था. जनवरी 2007 में गोरखपुर में सांप्रदायिक तनाव की पटकथा उस समय लिखी गई थी जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे ओर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का माहौल था.  इसका फायदा मुलायम सिंह यादव नहीं उठा सके और उस साल हुए विधानसभा चुनाव में उनकी सरकार की वापसी नहीं हो सकी.

 इंटरनेट मीडिया पर एक विश्लेषण तैर रहा है जिससे लोग खासे हैरान है. इसके अनुसार राज्य सरकार के  कुछ अधिकारियों ने स्वयं  अत्यधिक सक्रियता दिखाते हुए हुए सर्वोच्च न्यायालय में विशेष उल्लेख के जरिये इस मामले को अतिशीघ्र  सुनवाई के लिए खुलवाया. प्रयागराज उच्च न्यायालय द्वारा  22 फरवरी 2018 को दिए गए निर्णय के विरुद्ध फाइल की गई यह अपील से लंबित थी. यह मामला  परवेज परवाज तथा अन्य  ( वादी) बनाम उत्तर प्रदेश सरकार ( प्रतिवादी) थे.

20 जुलाई 2022 को प्रदेश के संयुक्त सचिव स्तर का एक अधिकारी अपने पत्र द्वारा  इस मामले को शुरू से देख रहे प्रदेश के एक अपर महाअधिवक्ता से लेकर एक अन्य नए अपर महाधिवक्ता को सौंपते हुए एक्सपीडाइट ऐप्लिकेशन दाखिल करके शीघ्र सुनवाई हेतु सूचीबद्ध कराने का अनुरोध करता है. ये मामला शीघ्रता से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हो  जाता है  और 24 अगस्त की सुनवाई पूरी हो जाती है और सुरक्षित कर लिया जाता है, जिसे 26 अगस्त को सुनाया जाता है. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले द्वारा योगी के विरुद्ध मुकदमा चलाए जाने का आदेश नहीं दिया और याचिकाकर्ताओं की अपील खारिज कर दी. अगर सर्वोच्च न्यायालय मुकदमा चलाए जाने की अनुमति दे देता तो क्या होता ? प्रथम सूचना रिपोर्ट में जो धाराएं लगाई गई है उनमें धारा 302 भी शामिल है, जिसमे सामान्यतः अग्रिम जमानत नहीं दी जाती है. योगी तथा उनके अन्य सहयोगियों को जिन्हें याचिकाकर्ता ने अपनी प्रथम सूचना रिपोर्ट में नामित किया था उनकी गिरफ्तारी  अवश्यंभावी हो जाती. ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ता क्योंकि भाजपा में सुचिता के नाम पर पहले भी कई मुख्यमंत्रियो के विरुद्ध इस तरह की कार्यवाही की गई है जिसमें दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना और मध्य प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती शामिल हैं. ये बहुत स्वाभाविक था कि योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक भविष्य पर सदा सर्वदा के लिए ग्रहण लग जाता.

ऐसे में यह प्रश्न उठना बहुत स्वाभाविक है कि जब सरकार प्रतिवादी थी तो सरकार की ओर से इस मामले की जल्दी से जल्दी सुनवाई के लिए प्रयास क्यों किए गए और इसमें किसकी रुचि थी और क्यों. क्या पार्टी और सरकार में बैठे कुछ लोग योगी को निपटाना चाहते थे. इसका उत्तर मिलना बहुत मुश्किल है लेकिन योगी के विरुद्ध इस तरह के प्रयास होते रहे हैं. अभी हाल ही में राज्य कर्मचारियों के स्थानांतरण में हुई गड़बड़ियों ने राजनीतिक हलचल पैदा कर दी थी और लगभग उसी समय एक मंत्री के इस्तीफ़े ने भूचाल लाने का काम किया था. योगी के पहले कार्यकाल में भी उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने के प्रयास किए गए थे. तब यह माहौल बनाने की कोशिश की गई थी कि योगी राज़ में प्रदेश के अधिकारी विधायको, पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की बात नहीं सुनते और इस कारण जनता में नाराजगी बढ़ रही है. ये भी जोड़ा गया कि एक जाति विशेष का बोलवाला है. बिकरू कांड के बाद तो सोशल मीडिया पर बकायदा अभियान चलाया गया और  कहा जाने लगा था कि  प्रदेश के ब्राह्मण योगी से बहुत नाराज है क्योंकि उनका उत्पीड़न किया जा रहा है और ऐसे में वह भाजपा की बजाय किसी अन्य दल को चुनाव में समर्थन करेंगे. इन सब का सारांश ये था कि योगी के मुख्यमंत्री रहते भाजपा की प्रदेश की सत्ता में वापसी नहीं हो पाएगी. इस तरह के अभियान ने जहाँ भाजपा के कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित किया वहीं विपक्ष के हौसले बुलंद किये. भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने वस्तुस्थिति का जायजा लेने के लिए बकायदा एक टीम बनाकर प्रदेश में भेज दी थी. जनता में “योगी प्रभाव” की महती भूमिका को देखते हुए भाजपा ने योगी के नेतृत्व में ही विधानसभा चुनाव में जाने का फैसला किया. इस विवेकपूर्ण निर्णय से न केवल योगी बाल बाल बच गए बल्कि भाजपा की सत्ता में वापसी भी संभव हो सकी. इस पत्र के 23 जुलाई के अंक में छपे अपने लेख में मैंने लिखा था कि प्रदेश में अच्छे, निस्वार्थ और निष्पक्ष अधिकारियों की कमी नहीं है, योगी को गंभीरता पूर्वक अपने आस पास देखना चाहिए और जहाँ जरूरत हो वहाँ तुरंत बदलाव करना चाहिए और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से अपनी निष्ठावान टीम का निर्माण करना चाहिए जो उन्हें संभावित खतरों से न केवल समय रहते आगाह कर सके बल्कि बचा सके.

-    शिव मिश्रा ResponseToSPM@gmail.com

रविवार, 28 अगस्त 2022

 

भारत छोड़ो, भारत तोड़ो और भारत जोड़ों







कांग्रेस पार्टी एक लंबे अरसे बाद किसी जन संपर्क की शुरुआत करने जा रही है, जिसे नाम दिया गया है भारत जोड़ों यात्रा जो 7 सितंबर 2022 से शुरू होकर कन्याकुमारी से कश्मीर तक 3570 किलोमीटर की दूरी तय करेगी. इसमें 12 राज्य और दो केंद्र शासित प्रदेश शामिल होंगे. मज़े की बात यह है कि यह पद यात्रा होगी और राहुल गाँधी के नेतृत्व में होगी जबकि वह न तो कांग्रेस के अध्यक्ष और न ही इस समय  कांग्रेस का कोई अध्यक्ष हैं. प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि यह यात्रा 1942 में भारत छोड़ो यात्रा से मिलती जुलती बनाई गई होगी लेकिन वास्तविकता में ऐसा बिलकुल भी नहीं है क्योंकि भारत छोड़ो यात्रा ऐसे  समय की गई थी जब  देशभक्ति का ज्वार चरम पर था, उसके बाद “भारत तोड़ो” यात्रा हुई जिसमें कांग्रेस ने देश का विभाजन स्वीकार किया और जिस कारण सांप्रदायिक दंगों में लाखों लोगो  की दर्दनाक हत्या की गई.



स्वतंत्रता के बाद देश में अधिकांश समय कांग्रेस या कांग्रेस समर्थित सरकार ही थी जो भारत के आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन जैसी मूलभूत समस्याएं तो नहीं हल कर सकीं  लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए वोटबैंक की राजनीति के अंतर्गत मुस्लिम तुष्टीकरण को बढ़ावा देकर विभाजन की पहले वाली स्थितियां जरूर उत्पन्न कर दीं गईं. इस अभियान का नाम “भारत जोड़ो” किसी के गले नहीं उतर रहा. आखिर भारत कहाँ  टूट रहा है, कहाँ अलगाववादी गतिविधियों चल रही है. पूर्वोत्तर में जहाँ कांग्रेस के समय तमाम अलगाववादी आंदोलन चलते थे वहाँ भी सबकुछ सामान्य है. कांग्रेस शासन में रेडियो, टीवी, बस स्टैंड एअरपोर्ट और हर रेलवे स्टेशन पर उद्घोषणा होती थी कि किसी भी अनजान वस्तु को हाथ न लगाए यह बम हो सकता है, वह स्थिति भी अब नहीं रही. कश्मीर में छुटपुट घटनाएं जरूर हो रही है लेकिन पहले जैसी भयानक स्थिति अब नहीं है. धारा 370 और 35 ए खत्म हो चुकी है. पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक हो चुकी है और अब वह पूरी तरह दबाव  और बेहद खस्ताहाल में है. तो फिर भारत में  क्या जोड़ा  जा रहा है ?  जब राहुल गाँधी और दिग्विजय सिंह कहते हैं कि नफरत का माहौल है, और नफरत के माहौल के विरुद्ध यात्रा निकाली जा रही है, तो इसका निहितार्थ है कि वे भारत का वातावरण विषाक्त करने जा रहे हैं. भारत जोड़ो की परिणति तुष्टीकरण के रूप में निकलने की पूरी संभावना है तब राहुल गाँधी की मंदिर परिक्रमा, जनेऊधारी अवतार और दत्तात्रेय गोत्र का क्या होगा ?

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भारत जोड़ों अभियान के संयोजक  मध्यप्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह हैं जो कांग्रेस के उन चुनिंदा नेताओं में से है जो पार्टी को फायदा कम नुकसान ज्यादा पहुंचाते हैं. इस यात्रा में उनके साथ मणिशंकर अय्यर, और सलमान खुर्शीद जैसे नेता भी जुड़ गए तो सोने में सुहागा हो जाएगा. दिग्विजय सिंह ने कहा है कि यह यात्रा नफरत के माहौल में, नफरत के खिलाफ़ की जा रही है. सरकार संविधान विरोधी  कार्य कर रही है, महंगाई और बेरोजगारी बढ़ती जा रही है, रुपए का अवमल्यून हो रहा है, बड़े उद्योपतितियों का कर्ज माफ हो रहा है, इसलिए देश बचाने के लिए यह यात्रा आयोजित की गई है. कांग्रेस अध्यक्ष चाहती है कि  एक ऐसी यात्रा हो जिसमे सभी धर्म और वर्ग के लोग शामिल हों और देश तथा संविधान बचाया जा सके.

कांग्रेस की इस भारत जोड़ो यात्रा में  योगेन्द्र यादव, मेधा पाटेकर सहित लगभग 150 सिविल सोसायटी के नेता और कार्यकर्ता भी भाग लेंगे, उन्हें  राहुल ने अपनी यात्रा को तपस्या बताते हुए  कहा है कि नफरत फैलाने वालों के अलावा इस यात्रा में सभी का स्वागत किया जाएगा यानी इसमें भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए कोई स्थान नहीं होगा. योगेंद्र यादव और मेधा पाटेकर जैसे नेताओं के बारे में पूरा देश जानता है कि ये पेशेवर आंदोलनकारी हैं और कहीं भी, कभी भी, किसी के भी साथ आंदोलन कर सकते हैं बशर्ते इनका इनका स्वार्थ पूरा हो. यह सभी आंदोलनकारी शाहीन बाग और किसान आंदोलन में  भी थे. मेधा पाटेकर ने तो वर्षों तक नर्मदा बचाओ आंदोलन की आड़ में सिंचाई और अन्य जरूरतों के लिए नर्मदा पर  बनाए जाने वाले बांध को रोके रखा. योगेन्द्र यादव तो यूपीए सरकार के खिलाफ़ अन्ना आंदोलन में भी थे.

कांग्रेस की भारत जोड़ों यात्रा ऐसे समय शुरू हो रही है जब उस उसके पास कोई पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है. सिकुड़ते सिमटते जनाधार के बीच कांग्रेस के दिग्गज नेता कांग्रेस छोड़ते जा रहे हैं और ऐसे में ये सवाल खड़ा होना बहुत लाजिमी है कि जो पार्टी अपने नेताओं को ही नहीं जोड़ पा रही है वह देश को कैसे जोड़ पाएगी. ये आशंका सही साबित होती जा रही है कि कांग्रेस पार्टी केवल गाँधी परिवार की पार्टी बनकर रह गई है जिसमें केवल परिवार के वफादारों के लिए जगह है और कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति कांग्रेस में नहीं बचेगा.

इस समय विभिन्न क्षेत्रीय नेता प्रधानमंत्री की दावेदारी के लिए अपना दावा ठोक रहे हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव पहले से  ही मैदान में हैं, और बिहार में नीतीश कुमार के पलटी मारने के बाद एक और प्रधानमंत्री मटेरियल दावेदारों में शामिल हो गया है. दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सतेंद्र जैन के भ्रष्टाचार और हवाला मामले में जेल जाने के बाद शराब घोटाला सुर्खियों में है और उसके बाद उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के जेल जाने के हालात बन गए हैं. अपने ऊपर लगे आरोपों को भी अपना हथियार बनाकर विरोधियो पर झूठे आरोप प्रत्यारोप करने में माहिर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने लोगों का ध्यान उनके भ्रष्टाचार से ध्यान  हटाने के उद्देश्य से ही सही, यह घोषणा कर दी है कि 2024 में उनका  सीधा मुकाबला भाजपा से होगा और अरविंद केजरीवाल अगले प्रधानमंत्री बनेंगे. उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बनने में असफल रहे समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने भी प्रधानमंत्री पद के लिए अपना दावा ठोंक दिया है. ऐसे में कांग्रेस की भारत जोड़ों यात्रा  राहुल गाँधी के प्रधानमंत्री पद के दावे को मजबूत कर पाएगी, इसमें भी संदेह है.

समझा जाता है कि पांच महीने तक चलने वाली इस यात्रा के बीच में ही कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिल जाएगा जो राहुल गाँधी की इस यात्रा के बाद उनके कद और महत्त्व के सामने  बौना और लुंज पुंज नजर आएगा और उसकी स्थिति मनमोहन सिंह से भिन्न नहीं हो पाएगी. गाँधी परिवार भी यही चाहेगा कि कांग्रेस का अध्यक्ष गाँधी परिवार के प्रति पूरी तरह से निष्ठावान हो लेकिन ऐसी स्थिति में वह न तो स्वतंत्र रूप से कार्य कर पाएगा और न ही पार्टी को मजबूत कर पाएगा. इसके परिणाम स्वरूप  गाँधी परिवार हमेशा अपरिहार्य बना रहेगा और यही गाँधी परिवार का लक्ष्य भी है.

2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों को लेकर अभी से यह सवाल किए जा रहे हैं कि इस लड़ाई में विपक्षी दलों में आपसी सहयोग और सामंजस्य कैसे बनेगा। यदि  कोई गठबंधन बनता भी  है तो उसका नेतृत्व कौन करेगा। भारत जोड़ो यात्रा परोक्ष रूप से गठबंधन के नेतृत्व करने की कांग्रेस क्षमता को रेखांकित करेगी जिसे कितने  विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त होगा, यह भी यक्ष प्रश्न है, क्योंकि इससे न केवल कांग्रेस की राजनैतिक शक्ति का संदेश पूरे देश में जाएगा बल्कि  विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व के बारे में भी स्पष्ट धारणा बनती नजर आएगी, यद्यपि क्षेत्रीय नेताओं की महत्वाकांक्षा के कारण ऐसा होना बेहद मुश्किल है.

भारत जोड़ों यात्रा के समक्ष एक सबसे बड़ी चुनौती राहुल गाँधी की देश में उपलब्धता को लेकर भी है क्योंकि वह हर एक दो महीने के अंतराल पर विदेश भ्रमण करते हैं इसलिए कहीं ऐसा न हो कि भारत जोड़ों यात्रा में भारत छोड़ों यात्रा भी शामिल हो जाए. सोनिया, राहुल और यात्रा के संयोजक और संचालकों के वक्तव्यों  से यह धारणा भी बनती जा रही है की यात्रा के दौरान जहर की खेती, मौत के सौदागर जैसी राहुल सोनिया की परंपरागत शैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति नफरत के भाव भी व्यक्त किए जा सकते हैं जिससे यह यात्रा सद्भावना की जगह दुर्भावना यात्रा बन सकती है क्योंकि राहुल गाँधी पर किसी का भी नियंत्रण नहीं है और राहुल गाँधी का अपनी भाषा और संवाद शैली पर कोई नियंत्रण नहीं है. इसलिए इस बात की प्रबल संभावना है कि इस यात्रा का लाभ कांग्रेस से ज्यादा भाजपा को मिल सकता है.

एक और अबूझ पहेली यह है कि इस यात्रा से प्रियंका वाड्रा को एकदम दूर रखा गया है. सोनिया की नजरों में क्या राहुल प्रियंका वाड्रा के तुलना में कमजोर पड़ते जा रहे हैं जो प्रियंका की छाया से राहुल को बचाते हुए “रि-लांच” किया जा रहा है.  

इस यात्रा से कांग्रेस यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि नरेंद्र मोदी का विकल्प राहुल हैं, किंतु इसकी त्वरित प्रतिक्रिया स्वरूप विपक्षी एकता खंडित हो जाएगी क्योंकि प्रधानमंत्री पद के अन्य दावेदार कभी राहुल गाँधी को विकल्प स्वीकार नहीं कर सकते. इसलिए इस यात्रा से थोड़े समय के लिए कांग्रेस अपने आंतरिक मुद्दों से जनता का ध्यान तो बंटा सकती है लेकिन लंबी अवधि में इस यात्रा का उसे कोई फायदा होगा यह कहना बहुत मुश्किल है.

-    शिव मिश्रा responsetospm@gmail.com







 

 

 

बॉलीवुड में बायकॉट का ट्रेंड

 

बॉलीवुड और बायकॉट



हाल में आमिर खान की फ़िल्म लाल सिंह चड्ढा के बायकॉट की अपील सोशल मीडिया में सुर्खियों में थी लेकिन आमिर ने इसे हल्के में लिया. जिन कारणों से बायकॉट किया जा रहा था उसके लिए क्षमा याचना तो दूर, खेद भी प्रकट नहीं किया और इसका परिणाम यह हुआ कि फ़िल्म बुरी तरह से फ्लॉप हो गई. इसके पहले भी कई फिल्मों के बायकॉट की अपील की गई थी जिनका प्रभावी असर देखने को मिला था. भारत जैसे देश में जहाँ फ़िल्म सेंसर बोर्ड भी अपना काम निष्पक्षता और ईमानदारी के साथ न कर पा रहा हो तो बायकॉट प्रगतिशील न होते हुए भी एक अच्छा कार्य है जो समाज को फिल्मी कृतियों से बचाने के लिए फ़िल्म निर्माताओं को अनुशासित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है.



स्वतंत्रता प्राप्ति के समय धार्मिक आधार पर देश के बंटवारे के बावजूद यहां के बहुसंख्यक समुदाय ने उदारता दिखाते हुए भारत में सभी धर्मों के अनुयायियों को समान अधिकार दिए जिसमें इस्लाम के मतावलंबी भी शामिल थे जो अपने लिए पाकिस्तान बना चुके थे।  इस बात में किसी को संदेह नहीं हो सकता कि इस देश का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप सिर्फ बहुसंख्यक हिन्दुओं की उदारता और सहृदयता के कारण ही बचा हुआ है।  दुर्भाग्य से विभाजन  के बाद  हिंदी फ़िल्म जगत को ऐसे लोगों ने ही  अपने कब्जे में कर लिया जिन्होंने भारत को  विभाजित करने   और पाकिस्तान बनाने में  महत्त्व पूर्ण भूमिका अदा की थी. विभाजन के बाद ऐसे सांप्रदायिक और जिहादी मानसिकता के तत्व भारत में ही रहे  और कुछ प्रगतिशील लेखक मंच में शामिल हो गए और कुछ वामपंथी दलों में लेकिन बड़ी संख्या में लोग तुष्टीकरण के  लाभार्थी बनने के लिए कांग्रेस से जुड़ गए. इन सभी ने मिलकर हिंदी फ़िल्म जगत का  हिंददुओं  और सनातन संस्कृति के प्रति घातक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया. इस गिरोह ने पटकथा, गीत, संगीत, संवाद और अभिनय  के माध्यम से सनातन संस्कृति को लांछित और अपमानित करने का जितना घृणित कार्य किया उतना  विदेशी आक्रांता भी नहीं कर सके थे.

दुर्भाग्य से फ़िल्म जगत से जुड़े हिंदू और सनातनी लोगों ने भी इसका विरोध नहीं किया और न हीं दर्शकों की तरफ से ही  कोई प्रतिवाद किया गया. दर्शकों के डर से पहले मुस्लिम कलाकार हिंदू नाम रखकर कार्य करते थे. कालान्तर में  यह सभी मुखर होकर  मुस्लिम नाम  से न केवल कार्य करने लगे बल्कि  हिंदू और सनातन संस्कृति पर प्रहार करके पूरे सनातन समाज को विकृत और दिग्भ्रमित करने का कार्य  करने लगे. ऐसे लोगो में नामचीन पटकथा लेखक, गीतकार, संगीतकार, संवाद लेखक ओर नायक नायिकाओं तथा अतिरिक्त भूमिकाएं निभाने वाले लोग भी शामिल हैं.

सनातन धर्म दुनिया का है एक मात्र धर्मनिरपेक्ष और सर्वाधिक  उदार धर्म है जिसकी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम पर आधारित है और जिसमें सभी धर्मावलंबियों के लिये सम्मान  एवं सामानता की अवधारणा का मूल तत्व है. शुरुआत में हिंदी फ़िल्म जगत में  ऐसी फ़िल्में बनती थी जिसमें कोई न कोई धार्मिक गीत भजन आदि अवश्य होता था और उनके कथानक में हिंदू धर्म के प्रति आदर और ईश्वर के प्रति गहरी आस्था होती थी. संभवत: दर्शकों में फ़िल्म की स्वीकार्यता बनाना और पैसे कमाना इसका उद्देश्य रहा होगा. दुर्भाग्य से हिन्दू धर्म की उदारता को मूर्खता और कायरता मानकर सनातन के प्रति घृणा का भाव रखने वाले कट्टरपंथियों  द्वारा  सुनियोजित षड़यंत्र के अंतर्गत हिन्दुओं में  हीनभावना भरने और उनके धर्मग्रंथों के विरुद्ध भ्रामक प्रचार करने के लिए फिल्मों को माध्यम बनाने लगे.

आज ऐसी अनगिनत फ़िल्में हैं जिनमें हिंदू देवी देवताओं का मजाक उड़ाया गया है तथा हिंदू संस्कृति को दकियानूस, अंधविश्वासी और पिछड़ा साबित करने का कार्य किया गया है. सेंसर बोर्ड  भी प्रगतिशीलता के नाम पर खामोश रहा और आज भी यह घृणित कार्य बदस्तूर जारी है. फ़िल्में केवल मनोरंजन का साधन ही नहीं होती बल्कि ये इतिहास का हिस्सा  भी होती  हैं जिनका प्रत्यक्ष रूप से मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है, ये  किसी देश की संस्कृति को प्रदुषित और संक्रमित करने में वायरस सी भी अधिक तेज गति से कार्य करती है. इसलिए हिंदी फ़िल्म जगत में किया गया यह घृणित कार्य, गलत इतिहास लिखे जाने से भी ज्यादा बड़ा संगीन अपराध है .

भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद के तत्कालीन प्रोफेसर धीरज शर्मा ने हिंदी फ़िल्म जगत के इस चलन पर शोध किया था जिसके नतीजे आश्चर्यजनक है, जिसके अनुसार बॉलीवुड की फिल्मों में 58% भ्रष्ट नेताओं को ब्राह्मण दिखाया गया है. 62% फिल्मों में बेइमान कारोबारी को वैश्य दिखाया गया है. फिल्मों में 74% फीसदी सिख किरदार मज़ाक का पात्र बनाया गया. जब किसी महिला को बदचलन दिखाने की बात आती है तो 78 % उनके नाम ईसाई होते हैं. 84% फिल्मों में मुस्लिम किरदारों को मजहब में पक्का यकीन रखने वाला, बेहद ईमानदार दिखाया गया है, यहां तक कि अगर कोई मुसलमान खलनायक हो तो वो भी उसूलों का पक्का हे दिखाया जाता है और उसे गरीबों के मसीहा और रॉबिनहुड की तरह दर्शाया जाता है.

सरकारी संरक्षण में पल रहे इन कट्टरपंथियो का गिरोह इतना शातिर है कि  फ़िल्म सेंसर बोर्ड पर भी इनका कब्जा है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कलात्मकता हे की आड़ में न जाने कितने घृणित कारनामे फिल्मों के माध्यम से किए गए.  2014 में आमिर की फिल्म पीके में हिंदू देवी देवताओं जितना अपमान किया गया उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है. हिंदू संगठनों ने इसके विरुद्ध आवाज तो उठाई लेकिन आमिर खान ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि  जिसे अच्छी लगे वह देखें और जिसे  अच्छी न लगे वह न देखें.  इससे आमिर जैसे एजेंडा धारी कट्टरपंथियों का हौसला पता चलता है. हिंदू संगठनों के बहिष्कार की अपील के बाद भी फ़िल्म ने 340 करोड़ से अधिक की कमाई की थी. पीके फ़िल्म की सफलता से यह बात भी रेखांकित होती है  कि दशकों तक बॉलीवुड द्वारा हिंदू धर्म के विरुद्ध किए जा रहे दुष्प्रचार ने  हिंदुओं का मन मस्तिष्क कितना दूषित कर दिया है .

सोशल मीडिया क्रांति ने हिंदू जन जागरण के  अभियान में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसके कारण हिंदू समाज अब इन कट्टरपंथियों का सफलता पूर्वक सामना करने के लिए तैयार हो गया है. यही कारण है कि द कश्मीर फाइल्स जैसी फ़िल्म के विरुद्ध इस गिरोह के घृणित दुष्प्रचार के बाद भी जनता ने उसे हाथों हाथ लिया और कई ऐसी फिल्मों का सफलतापूर्वक बायकॉट भी किया जिनमें कट्टरपंथियों का एजेंडा शामिल था.

हाल में राष्ट्रवादियों द्वारा आमिर खान की फ़िल्म लाल सिंह चड्ढा के बहिष्कार की अपील की गई थी जिसका कारण आमिर का हिंदू देवी देवताओं और सनातन संस्कृति के प्रति अनादर का भाव और अतीत में किए गए दुष्कृत्य हैं. लाल सिंह चड्ढा बुरी तरह से फ्लॉप हो गयी. यद्द्यपि फिल्म फोरेस्ट गंप के की नक़ल है लेकिन इसमें शातिराना तरीके से बहुत सी आपत्तिजनक् बातें डाली गयी हैं, जैसे मुंबई का आतंकवादी हमला, अयोध्या बाबरी विवाद, कारगिल युद्ध आदि. भारतीय सेना का भी अपमान किया गया है. यह भी समझ से परे है कि फ़िल्म का नाम लाल सिंह चड्ढा ही क्यों रखा गया है? मोहम्मद जमालउद्दीन सिद्दिकी या ताहिर हुसैन कुरेशी आदि क्यों नहीं? इसलिए क्योंकि भारत में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में आमिर जैसा कट्टरपंथी व्यक्ति, हिंदुओं ओर सिखों का अपमान बड़े आराम से कर सकता है. आमिर की ज्यादातर फिल्मों की तरह इसमें भी पाकिस्तान को बहुत अच्छा बताने की कोशिश की गई है.

इस फ़िल्म से एक बार फिर यह साबित हो गया है कि आमिर खान जैसे लोग न सुधरे हैं न सुधरेंगे. आमिर खान कट्टर पंथी मुसलमान है, इससे कोई समस्या लेकिन अगर वह कहें कि उनकी बीवी तो हिंदू होगी लेकिन बच्चे मुसलमान होंगे, तो ये  अपमान जनक है. लव जिहाद से उन्होंने अभी तक दो शादियां की हैं और वह भी दोनों हिंदू लड़कियों से, जिनके बच्चों को मुसलमान बनाकर उन्हें  तलाक दे दिया. उन्होंने नरेन्द्र मोदी की  जमकर भर्त्सना करते हुए उन्हें मुस्लिम नरसंहार का जिम्मेदार ठहराया था, जबकि गोधरा नरसंहार के बारे में उन्होंने जबान भी नहीं खोली थी. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दूसरे कट्टरपंथियों के साथ  उन्हें भी  हिंदुस्तान में डर लगा था. लाल सिंह चड्ढा  की एक पात्र करीना खान का परिवार विभाजन के समय पाकिस्तान से मार कर भगाया गया था लेकिन उसने उन्ही अफगान लुटेरों के वंशज से शादी की ओर बेटे का नाम रखा तैमूर, जो सभी हिंदुओं के लिए अपमानजनक है और  लोग इसे कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं.

किसी भी फ़िल्म या वस्तु का सांप्रदायिक आधार पर बायकाट नहीं होना चाहिए लेकिन जो व्यक्ति या संस्थाये हिंदू देवी देवताओं का अपमान करें, सनातन संस्कृति का उपहास उड़ा कर उसके विरुद्ध अभियान चलाएं,  और  देश विरोधी गतिविधियों में शामिल हों, उनके विरुद्ध लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से विरोध स्वरूप जो भी करना पड़े, अनुचित नहीं कहा जा सकता. सनातन संस्कृति को बचाने, सुरक्षित और सरंक्षित करने के लिए, सरकार की भरोसे न बैठ कर समूचे  हिन्दू समाज को स्वयं आगे आकर आवश्यक कदम उठाने पड़ेंगे.

-    शिव मिश्रा




मंगलवार, 23 अगस्त 2022

आप और भाजपा के बीच सीधी टक्कर - केजरीवाल होंगे प्रधान मंत्री

 



कहते हैं कि जब तक दुनिया में मूर्ख लोग हैं तब तक चालाक और शातिर लोगों की दुकानदारी बड़े मज़े से चलती रहेंगी. ये बात अरविन्द केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के गठन के समय ही सिद्ध कर दी थी.

इस पार्टी का गठन ही छल, कपट, धोखाधड़ी और विश्वासघात की नीति पर हुआ है, इसमें कपटपूर्ण बयानबाजी की महत्वपूर्ण भूमिका है. इसलिए आम आदमी पार्टी के नेता क्या कहते हैं? क्या करते हैं? यह बिलकुल भी महत्वपूर्ण नहीं है, समझदार लोगों को इसके पीछे की सच्चाई को स्वयं समझना और सावधान रहना पड़ेगा, लेकिन लालची और मूर्ख लोगों को फंसते रहना होगा.

भारत के संविधान में बहुदलीय राजनीतिक प्रणाली के रूप में की गई बहुत बड़ी भूल का आम आदमी पार्टी और उनके जैसी पार्टियों के शातिर नेता हमेशा दोहन करते रहेंगे, देश बचे न बचे इनकी बला से.

वामपंथियों ने पूरी दुनिया में यह सफल प्रयोग किया है कि एक झूठ को अगर 100 बार दोहराया जाए तो वह सही जैसा लगने लगता है, जिसके द्वारा लोगों को भ्रमित किया जा सकता है. आदमी पार्टी और उसके सुप्रीमों अरविंद केजरीवाल इस फार्मूले का भरपूर प्रयोग करते हैं.

उनका दूसरा प्रयोग है कि अपनी किसी भी गलती को महिमामंडित करके लोगों की नजरों से दूर किया जा सके. इन दोनों सूत्रों से ही आम आदमी पार्टी वर्तमान परिस्थितियों से लड़ने की कोशिश कर रही है.

जब बात शराब घोटाले की होती है तो वहाँ पर ये लोग शिक्षा नीति की बात करते हैं, जब बात मनी लॉन्ड्रिंग की होती है तो यह मोहल्ला क्लीनिक की बात करते हैं, जब बात अरविंद केजरीवाल के घोटाले में शामिल होने की होती है तो वह 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी से सीधा मुकाबला करने की बात करते हैं.

इसे अति आत्मविश्वास कहा जाए, बेशर्मी या बेहयाई कहा जाए, आम आदमी पार्टी हमेशा ऐसे वक्तव्य देती है जैसे नाटक के मंच पर कोई किरदार अपने डायलॉग बोलता है.

कई बार खराब डायलॉग भी लोगों के दिमाग में बहुत अधिक असर डालते हैं. “ये हाथ हमको दे दे ठाकुर” शोले फ़िल्म के इस डायलॉग की पृष्ठभूमि बहुत अमानवीय, हिंसात्मक, विकृत मानसिकता और राक्षसी प्रवृति की है, लेकिन इसके बाद भी न जाने कितने लोग इस डायलॉग को अपने जीवन में बिना किसी हिचकिचाहट के दोहराते हैं. आम आदमी पार्टी भी अपनी निम्नस्तरीय और विकृति परिस्थितियों को आकर्षक ढंग से पेश करके इसी मानसिकता को भुनाने की विशेषज्ञ है.

आम आदमी पार्टी के लोकसभा में सदस्य संख्या लगभग नगण्य है, और 2024 के चुनावों में भी यह पार्टी चमत्कार करके बहुमत प्राप्त कर लेगी इसकी कल्पना हैरी पॉटर भी नहीं कर सकता. इसलिए इस तरह के वक्तव्य से समझदार व्यक्ति तो आम आदमी पार्टी से और अधिक दूर हो जाते हैं लेकिन दिल्ली घेरकर बैठे रोहिंग्या, बांग्लादेशी और एक वर्ग विशेष के लोग शायद खुशी से उछलने लगते होंगे.

शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

वीर सावरकर नायक या खलनायक

 

वीर सावरकर नायक या खलनायक  


                     (अंडमान सेलुलर जेल फोटो स्वयं )

                  ( सेलुलर जेल में वीर सावरकर की कोठारी) 

वीर सावरकर का नाम एक बार फिर विवादों में घसीटा जा रहा है, जिसकी  शुरुआत “अंतिम जन पत्रिका” में उनकी प्रशंसा में छपे लेखों के बाद शुरू हुई जिसके संपादक भाजपा नेता विजय गोयल हैं. अमृत महोत्सव में हर घर तिरंगा अभियान के दौरान कर्नाटक के सिमोगा में वीर सावरकर के पोस्टर लगाने पर उन्हें सांप्रदायिक विवाद का केंद्र बिंदु बनाने की कोशिश की गयी. मुस्लिम उग्रवादी तत्वों द्वारा सावरकर के पोस्टरों को हटाकर टीपू सुल्तान के पोस्टर लगाए गए, जिससे इस विवाद ने सांप्रदायिक मोड़ ले लिया. वीर सावरकर और टीपू सुल्तान के बीच कोई तुलना नहीं हो सकती क्योंकि जहाँ वीर सावरकर प्रखर  राष्ट्रवादी, महान विचारक, लेखक तथा महान स्वतंत्रता सेनानी थे, वही टीपू सुल्तान घोर सांप्रदायिक और कट्टर मुसलमान था जिसने लाखों हिंदुओं की हत्याएं की और जबरन धर्मांतरण करवाया तथा आतंक का राज्य कायम किया.

कर्नाटक में पिछले काफी दिनों से किसी न किसी कारण साम्प्रदायिक वातावरण बनाने की कोशिश हो  रही है.यहाँ कई क्षेत्र पीएफआई जैसे कट्टर वादी संगठनों की प्रयोगशाला बन गये हैं, जो हर समय  सांप्रदायिक हिंसा फैलाने की कोशिश में लगे रहते हैं. इसके लिए एआईएमआईएम जैसी सांप्रदायिक पार्टियों का समर्थन मिलना तो बहुत स्वाभाविक है लेकिन कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल का इसे राजनीतिक समर्थन देना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. शायद कांग्रेस को नहीं मालूम कि अब वह दिन नहीं रहे जब वह एक वर्ग विशेष का तुष्टीकरण करके, हिंदू और हिंदुत्व की बात करने वाले को लांछित कर, हिंदू समाज को बांटकर अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध कर लेती थी लेकिन  कांग्रेस है कि मानती नहीं.





सेलुलर जेल में प्रदर्शन हेतु रखा कोल्हू)





विश्व के इतिहास में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं  मिलता जो कवि हो, लेखक हो, महान चिन्तक हो, और  क्रांतिकारी भी हो लेकिन विनायक दामोदर सावरकर में यह सब कुछ था, जो उन्हें अन्य सभी समकालीन राजनेताओं से बिल्कुल अलग व्यक्तित्व बनाता है. यह कहना भी अतिश्योक्ति नहीं होगा कि वह विश्व के अत्यंत  प्रतिभावान दुर्लभ राजनेताओं में से एक है, जिनकी राष्ट्रसेवा और विचारधारा को कलंकित करने का महापाप किया गया. भारत की स्वतंत्रता में वीर सावरकर का योगदान अमूल्य है. उन्होंने देश के भीतर और बाहर रहते हुए आज़ादी के लिए क्रांतिकारी गति विधियां चलाई और अंग्रेज़ों के विरुद्ध अभियान छेड़कर, ब्रिटिश सरकार की नाक में दम कर दिया. सावरकर से  घबराकर अंग्रेज़ी सरकार ने 1910 में उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा दी. 1911 में उन्हें दोबारा आजीवन कारावास दिया गया. विश्व इतिहास में ये पहली घटना है जब किसी व्यक्ति को दो-दो बार आजीवन कारावास की सज़ा दी गई हो.


      ( वीर सावरकर की कोठारी के के अन्दर का द्रश्य  फोटो स्वयं )


स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन में जवाहरलाल नेहरू राजनीतिक रूप से शक्तिशाली कभी नहीं रहे लेकिन चूंकि उनका शक्तिपुंज गाँधी और एडविना माउंटबेटन थे, वह अपने समकालीन सभी स्वतंत्रता सेनानियों और राजनेताओं पर भारी पड़ते थे और उन्हें सत्ता हथियाने और सत्ता का केंद्र बनने में कभी  कोई मुश्किल सामने नहीं आई. बावजूद इसके राजनीतिक रूप से वह  सदैव अपने आप को असुरक्षित महसूस करते थे और हर उस व्यक्ति को किसी न किसी तरह निपटाने का काम करते थे जिससे उन्हें राजनीतिक खतरा होता था. वीर सावरकर के व्यक्तित्व को भी इसी तरह कलंकित करने का कार्य किया गया ताकि हिंदू समाज उनकी विचारधारा से प्रभावित होकर नेहरू को राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग थलग न कर दें. नेहरू के संरक्षण में चाटुकार इतिहासकारों ने भारतीय सनातन संस्कृति को कलंकित करने के साथ साथ भारत के महान विचारको और मनीषियों को लांछित करने का कार्य किया ताकि हिंदू समाज कभी एक न हो सके और अंग्रेजों की तरह नेहरू परिवार निर्बाध रूप से भारत की सत्ता पर कब्जा जमाए रख सके, चाहे भारत राष्ट्र नष्ट ही क्यों न हो जाए.

1910 में  वीर सावरकर को नासिक के कलेक्टर की हत्या के आरोप में लंदन से गिरफ्तार किया गया था और  पहले उनके भाई को भी इसी मामले में गिरफ्तार किया जा चुका था. उन पर आरोप था कि उन्होंने लंदन से अपने भाई को एक पिस्टल भेजी थी, जिसका हत्या में इस्तेमाल किया गया था. उन्हें दो दो बार आजीवन कारावास दिया गया था जिसके लिए उन्हें  अंडमान की सेल्युलर जेल की काल कोठरी में डाल दिया गया. नौ वर्ष से अधिक समय तक वह जिस 7x13 फिट की कोठरी में रहे  उसी में उन्हें लघु शंका और कभी कभी दीर्घशंका भी करनी होती थी. उसी कोठरी में कंकड़ की सहायता से उन्होंने दीवारों पर 66 कविताएं लिखीं और कंठस्थ की, जिन्हें जेल से छूटने के बाद ही कागज पर उतारा जा सका. जेल के सभी कैदियों को जानवर की तरह कोल्हू में कंधा देकर तेल निकालना होता था और नारियल तोड़कर उनकी रेसे निकालने का काम दिया जाता था. काम में देर होने या पूरा न होने पर कैदियों को भयानक अमानवीय यातनाएं दी जाती थी. सावरकर की कोठरी के नीचे ही फांसीघर था, जहाँ दो तीन कैदियों को रोज़ फांसी दी जाती थी, जिससे उनके व्यक्तित्व और मानसिक स्थिति पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा था. इस स्थिति में उन्होंने अपने और अन्य कैदियों को जेल से मुक्त करने के लिए लिए अंग्रेजी शासन को कई बार पत्र लिखा, जिसे आज कांग्रेस द्वारा उनके माफीनामे के तौर पर प्रचारित किया जाता है और उनकी राष्ट्रभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगाए जाते हैं.  

वीर सावरकर और जवाहरलाल नेहरू के कैदी जीवन की तुलना नहीं की जा सकती है. नेहरू बहुत कम समय जेल में रहे जहाँ उनसे  नाश्ते और खाने का मीनू पूछा जाता था, उन्हें जरूरत की सभी सुविधाएं मिलती थी. जब सावरकर कोल्हू से तेल निकाल रहे होते थे, नेहरू जेल में मनपसंद स्वादिष्ट भोजन करते थे, समाचार पत्र, पत्रकायें पढ़ते थे और आगंतुकों से मुलाकात करते थे. अपनी बेटी इंदिरा और अन्य नेताओं को पत्र लिखते थे,किताबें लिखते थे. जेल के कई संतरी उनकी सेवा में हमेशा उपस्थित रहते थे. अगर ऐसी जेल मिले तो आज भी भारत की बड़ी संख्या स्वेच्छा से पूरा जीवन जेल में ही व्यतीत करने के लिए तैयार हो जाएगी.

नेहरू के इशारे पर 1948 में गांधी की हत्या के छठवें दिन वीर सावरकर को गाँधी की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया था. आज यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि तत्कालीन सरकार ने गाँधी की हत्या के षड्यंत्र को विफल करने का प्रयास नहीं किया जबकि षडयंत्र की सूचनाएं सरकार तक लोगों ने स्वयं पहुंचाई थी. आज तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि गांधी पर जान लेवा हमले के बाद भी उन्हें यथाशीघ्र अस्पताल क्यों नहीं पहुँचाया गया और उन्हें मृत घोषित करने के बाद पोस्टमॉर्टम क्यों नहीं कराया गया. घटनास्थल पर भी पुलिस ने किसी को भी पकड़ने का प्रयास नहीं किया, नाथूराम गोडसे स्वयं जाकर पुलिस के हवाले हुआ था, अगर वह चाहता तो सफलतापूर्वक भाग सकता था.

गाँधी की हत्या के बाद सरकार ने हत्या की गुत्थी सुलझाने में कम, हिंदूवादी शक्तियां को फंसाने का प्रयास ज्यादा किया. वीर सावरकर को गिरफ्तार करने में भी सरकार के इरादे नेक नहीं दिखाई पड़ते क्योंकि कोई साक्ष्य न होने के कारण उन्हें फरवरी 1949 में रिहा कर दिया गया. ऐसा लगता है कि सरकार ने यह सब वीर सावरकर की  छवि खराब करने और गाँधी हत्या का दोष हिंदू समुदाय के मत्थे मढने ले लिए किया जिसका उद्देश्य समझना मुश्किल नहीं है.  

सावरकर के विरुद्ध दुष्प्रचार में कांग्रेस को स्वाभाविक रूप से वामपंथियों और मुस्लिम समुदाय का समर्थन प्राप्त होता है, क्योंकि सनातन संस्कृति को विकृत रूप में प्रस्तुत करना, हिन्दुत्ववादी शक्तियां को लांछित कर कमजोर करना, हिंदू समाज को बांटकर अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करना, इन सब का पुराना अजेंडा है. अब स्थितियां पूरी तरह से बदल चुकी है, बदलते भारत में अब इस तरह के दुष्प्रचार और स्वार्थ सिद्धि के प्रयास सफल नहीं हो पाएंगे.

देश के सभी प्रमुख नेताओं ने कभी भी उनकी देशभक्ति पर सवाल नहीं उठाएं और उन्हें महान स्वतंत्रता सेनानी बताया. स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के कारण ही संसद भवन में गांधी के ठीक सामने उनकी तस्वीर लगाई गई है. अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें भारत रत्न देने की तैयारी की थी जिसपर तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायण ने राजनीतिक कारणों से सहमति नहीं दी. अब समय आ गया है कि वर्तमान सरकार देर से ही सही स्वतंत्रता संग्राम में उनकी भूमिका और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान को रेखांकित करने के लिए उन्हें यथाशीघ्र भारत रत्न प्रदान करें.

हाल ही में असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्व सरमा  ने राज्य के एक हजार छात्रों को अंडमान की सेल्युलर जेल का अध्ययन करने के लिए भेजने की घोषणा की है, जो अत्यंत सराहनीय है. निश्चित रूप से इस से वीर सावरकर सहित अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की राष्ट्रभक्ति और  स्वतंत्रता के लिए किए गए अप्रतिम बलिदान की कहानी रेखांकित हो सकेगी. अच्छा तो यह होगा कि अन्य राज्य सरकारे भी इस तरह के कदम उठाए ताकि वीर सावरकर सहित कांग्रेस सरकार के प्रतिशोध और उपेक्षा का शिकार हुए अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बारे में छात्रों और देश को जानकारी उपलब्ध हो.

-             -    शिव मिश्रा

 

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