गुरुवार, 7 जुलाई 2022
शनिवार, 2 जुलाई 2022
सर्वोच्च न्यायालय भी बहुत डरा हुआ है.
भारत का सर्वोच्च न्यायालय भी कितना डरा हुआ है, इसका पता हम सबको नहीं है.
नूपुर
शर्मा प्रकरण अब भारत में बच्चे बच्चे को पता है. ज्ञानवापी मस्जिद में काशी विश्वनाथ मंदिर कि अवशेष मिलने के बाद
मुस्लिम समुदाय कोई न कोई बड़ा विवाद खड़ा करने का बहाना ढूंढ रहे थे और जल्द ही उन्हें नूपुर शर्मा के टीवी डिबेट में मिल
गया. बस फिर क्या था तलवारें खिंच गई, देश में मोदी भाजपा विरोधी माहौल बनने लगा
और विदेशों में भारत विरोधी. मोदी और भाजपा ने दबाव में आकर नूपुर शर्मा को पार्टी
से निकाल दिया लेकिन मामला शांत नहीं हुआ
क्योंकि शांतिप्रिय धर्म के लोग मांग कर रहे थे कि गुस्ताख ए रसूल की एक ही सजा सर
तन से जुदा, सर तंन से जुदा.
जुमे
की जंग की शुरुआत कानपुर से होकर प्रयागराज और तमाम शहरों में फैल गई. ऐसा लग रहा
है कि जैसे एक वर्ग हमेशा दंगा, फसाद, और गृह
युद्ध लिए तैयार करता रहता है और समय अमे
पर इसका परीक्षण भी करता है. दुकानें मकान जलाने मैं किसी को कोई संकोच नहीं होता,
सार्वजनिक संपत्तियों की तो बात ही क्या की जाए. आखिर यह देश संविधान और कानून से चलेगा या मजहबी कानून से
. हाल ही में बहुत सी घटनाएं ऐसी हुई है जिन्हें विभिन्न राज्य सरकारों और केंद्र सरकार द्वारा
उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया जितना देश की एकता अखंडता कायम रखने के लिए लिया
जाना चाहिए था. इसका परिणाम यह निकला कि इस तरह की घटनाएं अब जल्दी जल्दी हो रही
है, आम होती जा रही हैं. चाहे केरल में एक व्यक्ति के हाथ काट देने का मामला हो
महाराष्ट्र में एक व्यक्ति का सिर धड़ से जुदा कर देने का मामला हो, लखनऊ में कमलेश
तिवारी की जघन्य और निर्ममता पूर्वक की गई हत्या का मामला हो और अब उदयपुर में
कन्हैयालाल तेली का सर तंग से जुदा करने की दुस्साहसिक वारदात जिसमे जिहादी
आतंकियों ने न केवल कन्हैया लाल के सिर को तन से जुदा किया उन्होंने घटना के पहले भी वीडियो पोस्ट किया था और उसके बाद भी वीडियो
में खून से सने हुए हथियार लहराते हुए न
केवल इस घटना का की जिम्मेदारी ली बल्कि ये
नारा भी बुलंद किया कि गुस्ताखे रसूल की
एक ही सजा सर तन से जुदा .... उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को भी चुनौती दी कि उनकी
तलवार उनकी गर्दन तक भी पहुंचेगी.
नूपुर शर्मा के साथ भी ऐसा हुआ पूरे
देश भर में उनके खिलाफ़ बहुत सारी एफआईआर दर्ज की गई है जिसके लिए उन्होंने
सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया था कि उनकी सारी एफआईआर को एक साथ क्लब करके
उनकी सुनवाई दिल्ली में की जाए ताकि उनकी जान को जो गंभीर खतरा है उसे कुछ हद तक
कम किया जा सके. सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी सुनवाई करते हुए कई टिप्पणियां की और
उनके इस अर्जी को खारिज कर दिया.
सर्वोच्च
न्यायालय के इस निर्णय में किसी कानूनी पेचीदगी का जिक्र नहीं किया गया है. केवल व्यक्तिगत पसंद नापसंद के आधार पर टिप्पणियां की
गई है और इस तरह देश का कोई भी सामान्य बुद्धि और विवेक का व्यक्ति इस का विश्लेषण
कर सकता है.
ट्विटर
पर सर्वोच्च न्यायालय के विरुद्ध लोग तरह तरह की टिप्पणियां कर रहे हैं और मुझे
लगता है शायद हिंदुओं की कोई भावना नहीं होती और इसलिए हिंदू धर्म की कोई कितनी भी
निंदा करें, हिंदू देवी देवताओं का कोई
कितना भी अपमान करें, उनकी भावनाएँ आहत नहीं हो सकती. इस देश में जब हिंदुत्व और
हिंदू देवताओं को गाली दी जाती है तो इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार कहा जाता है
और यही धर्मनिरपेक्षता की खूबसूरती बताई जाती है लेकिन अगर यह कभी दूसरे धर्म की
तरफ मुड़ जाती है तो फिर सर्वोच्च न्यायालय भी दबाव में आ जाता है. जब देश का
सर्वोच्च न्यायालय भी इतना डरा हुआ है इतना भयभीत हैं और उसे लगता है कि नूपुर
शर्मा के बयान से देश की सुरक्षा को खतरा है तो फिर अब क्या बचता है? यह देश इस रूप में कब तक बचता है, कहा नहीं जा सकता.
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- शिव मिश्रा
गुरुवार, 23 जून 2022
मोदी के 8 साल हैं बेमिशाल पर ...
मोदी के 8 साल हैं बेमिशाल पर ...
उस
समय देश में
निराशा का माहौल था. कांग्रेस के नेतृत्व में
संप्रग की लुंज पुंज सरकार के भ्रष्टाचार और अन्य कारनामों से जनता त्रस्त थी. नेहरू द्वारा
शुरू की गई तुष्टिकरण की नीति की सभी सीमाएं तोडती कांग्रेस ने हिंदू और भगवा आतंक गढ़ने के षड्यंत्र
के साथ पूरे विश्व में हिंदू और सनातन संस्कृति को बदनाम करने का कुचक्र रचा था. सांप्रदायिक
हिंसा विरोधी कानून का मसौदा तैयार किया गया था जिसमें
बहुसंख्यक हिंदुओं को सांप्रदायिक हिंसा और दंगों के
लिए दोषी ठहराये जाने का प्रावधान था. गुजरात के
तत्कालीन मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रधानमंत्री पद के
घोषित उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने इसका विरोध किया और जनता
से जुड़े अन्य संवेदनशील मुद्दे उठाते हुए अपनी स्पष्ट और प्रखर राय रखी. इस तरह कांग्रेश के भ्रष्ट और मुस्लिम परस्त शासन से मुक्त की उत्कंठा में हिंदू जनमानस मोदी के पीछे चट्टान की तरह खड़ा हो गया और पूर्ण बहुमत से सत्ता सीन कर
दिया.
इस सबके बावजूद ऐसा भी नहीं है कि मोदी लोगों की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरे उतर रहे हैं. चुनाव में उनकी जीत लगभग सत प्रतिशत हिंदू मतदाताओं के कारण ही होती है लेकिन फिर भी "सबका साथ, सबका विकास" में "सबका विश्वास" भी जुड़ गया है, जिसमें कुछ भी गलत नहीं है लेकिन यदि "सबका विश्वास" हासिल करने के उपक्रम में हिंदू हितों की अनदेखी की जाए, सनातन संस्कृति के क्षरण को न रोका जाए और मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कर दाताओं कि पैसे की बर्बादी की जाती रहे तो हिंदू जनमानस का विचलित होना स्वाभाविक है, जिसकी शुरुआत हो गयी है. एक हाथ में कुरान और दूसरे में लैपटॉप की बात करके धर्मांधता और कट्टरता बढ़ाने वाले मदरसों पर अंधाधुंध पैसा खर्च किया जा रहा है, जो विश्व के किसी भी धर्मनिरपेक्ष देश में नहीं होता. दुःख की बात है कि मोदी के दिमाग में “एक हाथ में पुराण और दूसरे में लैपटॉप की बात क्यों नहीं आती? और देश में लगभग खत्म हो रही गुरुकुल परंपरा में चलने वाले संस्कृत विद्यालयों की सुध क्यों नहीं ली जाती?
ज्ञानवापी
मस्जिद मामले में तमाम तथ्य और प्रमाण उपलब्ध हो जाने के बाद भी भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद,
बजरंग दल आदि का कहीं अता पता नहीं है.
इसके विपरीत मुस्लिम समुदाय का हर छोटा बड़ा नेता बेहद
आक्रामक होकर अनर्गल प्रलाप कर रहा है. कुछ नेताओं के
बयान तो राष्ट्र की एकता और अखंडता पर सीधा हमला हैं
लेकिन सरकार ने उनके विरुद्ध अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की है. पीएफआई जैसे संगठन पर दिल्ली दंगों के बाद से
ही रोक लगाने की मांग की जा रही है, लेकिन सरकार सबका
विश्वास पाने के लिए खामोश है.
महाराष्ट्र में राजनैतिक नंगनांच और कानून का दुरूपयोग, केरल में हिन्दुओं की राजनैतिक हत्याएं आदि अनेक ऐसे मामले हैं, जिससे लोग धीरे धीरे व्याकुल हो रहें हैं. समान नागरिकता कानून, मुस्लिमों को अल्पसंख्यक का अनावश्यक दर्जा और मदरसों का वित्त पोषण, मंदिर मुक्ति के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया, संशोधित नागरिकता कानून को ठंडे बस्ते में डालना जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण मसलों पर ढुलमुल रवैया, मोदी और भाजपा को बहुत भारी पड़ेंगा. समय रहते अगर भाजपा ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाये तो केंद्र की सत्ता में उसका सफ़र बहुत लंबा नहीं होगा.
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- शिव मिश्रा
मोहन की भागवत और मोदी का समर्पण
मोहन की भागवत और मोदी का समर्पण
अभी हाल ही में मैंने एक लेख में प्रधानमंत्री मोदी की जमकर तारीफ की थी कि सरकार किसी दबाव में नहीं आती और ऐसा कहने के
पीछे तर्क था कि कुछ समय पहले ही विदेश मंत्री जयशंकर अमेरिका और यूरोप को खरी खरी
सुना कर आए थे और यूक्रेन रूस युद्ध में भारत ने अमेरिका और पश्चिमी देशों का रूस
का विरोध करने का दबाव बड़ी विनम्रता से अस्वीकार कर दिया था. कोविड-19 के
दौरान की स्वयं प्रधानमंत्री मोदी पर
अमेरिकी वैक्सीन खरीदने का देश विदेश के किसी दबाव का कोई असर नहीं हुआ था
लेकिन पूरा देश उस समय निराश हुआ जब भारत सरकार ने कतर के दबाव में आकर अपनी पार्टी की राष्ट्रीय
प्रवक्ता नूपुर शर्मा को पार्टी से निष्कासित कर दिया और कतर को जो जवाब दिया वह न
केवल भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान के भी अनुकूल नहीं
था.
कतर वही देश है जिसने हिंदू देवी देवताओं के नग्न और अपमानजनक चित्र
बनाने वाले एम एफ हुसैन को नागरिकता
प्रदान की थी. ऐसा लगता था कि सरकार इस्लामिक देशों से अपने व्यापारिक और अन्य
संबंधों को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया लेकिन इससे यह मामला ठंडा नहीं होगा और इस्लामिक देशों का संगठन और इसके सभी सदस्य देश प्रत्यक्ष या
अप्रत्यक्ष रूप से भारत को कटघरे में खड़ा करने का काम करेंगे . इसमें पाकिस्तान
ही नहीं अफगानिस्तान भी शामिल है, जहां ना तो लोकतंत्र है और न ही मानवाधिकार.
धार्मिक सहिष्णुता की तो बात ही क्या करना, जहां
विशाल बौद्ध प्रतिमा का सत्तारूढ़ तालिबान ने अपनी क्रूरता और बहसीपन से विध्वंस किया था. इस्लाम किसी भी
धर्म के साथ सह अस्तित्व स्वीकार नहीं करता. यह हमेशा अपनी मांगे मनवाने के लिए वाद,
विवाद, दबाव और हिंसा / जिहाद का सहारा लेता
है, जिससे उसे 1400 वर्षों से सफलता मिलती आ रही है. यह हर उस देश में दोहराई जाती है, जहां इसका समुचित प्रतिकार नहीं किया जाता. चीन के बारे में तो
दुनिया का कोई भी मुसलमान या मुस्लिम देश बात करने से भी डरते हैं.
इस घटनाक्रम की कड़ी ज्ञानवापी प्रकरण से जुड़ी है जहां न्यायालय के
आदेश से सर्वे कराया गया था जिसमें फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी भी की गई थी. सर्वे
के दौरान काशी विश्वनाथ के प्राचीन मंदिर के मिले प्रमाण पूरे विश्व के लिए
चौंकाने वाले थे लेकिन हिंदुओं और मुस्लिमों के एक बड़े वर्ग को यह सब पहले से ही
मालूम था. मुस्लिम पक्ष ने 1991 में बनाए गए पूजा स्थल विशेष अधिनियम कानून का
हवाला देकर पहले सर्वे का विरोध किया था और जब उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय
से भी बात नहीं बनी तो सर्वे में व्यवधान और विलंब किया. सर्वे पूरा होने के बाद
न्यायालय से सर्वे रिपोर्ट, वीडियो और फोटो सार्वजनिक न करने का अनुरोध किया, यद्यपि उसके पहले ही कुछ फोटोग्राफ लीक हो गए थे. इसमें कोई संदेह
नहीं है कि प्राचीन मंदिर तोड़कर ही ज्ञानवापी मस्जिद को बनाया गया था जिसमें
मंदिर के अवशेष आज भी पूरी तरह से स्पष्ट है. जब कोई शो टाइम सुरेश म्यूजिक
स्टार्ट डॉट डॉट पिक्चर लें किसानों स्टार्ट तर्क नहीं रह गया तो मुस्लिम नेताओं
के खासतौर से असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं के भड़काऊ बयान आने लगे.
सर्वोच्च न्यायालय ने स्थानीय न्यायालय के स्वयंभू ज्योतिर्लिंग के
स्थान को सील करके सुरक्षित और संरक्षित करने के आदेश को बनाए रखा लेकिन बड़ी सफाई
से मुकदमे की सुनवाई जिला न्यायाधीश को स्थानांतरित कर दी, जिसका कोई तार्किक आधार नजर नहीं आता. उल्लेखनीय है कि जो न्यायाधीश इस मामले की
सुनवाई कर रहे थे वह पूरी तरह से न्याय के प्रति समर्पित थे और और उन्होंने पूरी
पारदर्शिता, निष्पक्षता और निडरता से मामले की
सुनवाई की. उन्हें डराने धमकाने की कोशिश भी की गई लेकिन वह विचलित नहीं हुए.
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मामले की सुनवाई स्थानांतरित करने से न केवल उनका मनोबल
गिरेगा बल्कि पूरी न्यायपालिका में चीफ
मिनिस्टरगलत संदेश चला गया है. जिला न्यायाधीश की अदालत में, मुस्लिम पक्ष ने मामले को लंबा खींचने की
भूमिका तैयार की और तारीखों का सिलसिला शुरू हो गया है, अगली सुनवाई 4 जुलाई को है. आशंका है कि इस मामले का हश्र भी वैसा न हो
जैसा अयोध्या में राम मंदिर के मामले में हुआ था, यानी तारीख पर तारीख, साल दर साल, लगातार.
इस बीच संघ प्रमुख श्री मोहन
भागवत ने नागपुर में कहा कि ज्ञानवापी
जैसे विशेष श्रद्धा स्थलों के मामले आते रहते हैं लेकिन इस तरह हर रोज नया मामला
नहीं लाना चाहिए और हर मस्जिद में शिवलिंग की खोज नहीं करनी चाहिए. पहले भी वह
वक्तव्य दे चुके हैं कि हिंदू और मुसलमानों के पूर्वज एक हैं, डीएनए एक
है. एक कदम आगे जाते हुए उन्होंने यह भी कहा था कि इस्लाम के बिना हिंदुत्व अधूरा
है. यह अलग बात है कि जब भी किसी पीएफआई जैसे संगठन पर प्रतिबंध लगाने की मांग
की जाती है, मुस्लिम पक्ष आरएसएस को आईएसआईएस और बोको हराम जैसा संगठन बताते हुए
प्रतिबंध लगाने की मांग करता है. मोहन भागवत जी बड़े विद्वान
हैं लेकिन पता नहीं उन्हें यह बात मालूम है कि नहीं कि इस्लाम किसी दूसरे
धर्म के साथ सह अस्तित्व स्वीकार नहीं करता और जिन देशों के महापुरुषों ने इस्लाम के प्रति उदारता की है, वे सभी देश आज इस्लामिक राष्ट्र हैं. इस तरह की उदारता भी तुष्टीकरण ही है. ऐसे में "इस्लाम के बिना
हिंदुत्व अधूरा है" कहना सनातन
संस्कृति को श्रद्धांजलि देने जैसा है.
इस बीच मुस्लिम पक्ष द्वारा धार्मिक
ध्रुवीकरण कर मुस्लिमों को लामबंद करने और अपने पक्ष में समर्थन जुटाने के
लिए किया जाने लगा. सोशल मीडिया पर तरह तरह की भ्रामक एवं हिंदूओं और सनातन धर्म के लिए अपमानजनक सामग्री परोसी जाने लगी.
टीवी चैनलों पर गरमागरम बहस होने लगी. ऐसी ही एक टीवी डिबेट में जहां भगवान
भोलेनाथ का अपमान किया जा रहा था, भाजपा
की राष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने चुनौती देते हुए कहा था कि यदि आप ऐसा कहेंगे तो हम भी ऐसा कहेंगे. मुस्लिम पक्ष शायद इसी का इंतजार कर रहा
था इसलिए इस मामले को इतना तूल दिया गया ताकि यह मामला अंतरराष्ट्रीय बन जाय इसके
लिए उन्हें विपक्षी दलों का भी भरपूर समर्थन मिला जो तुष्टिकरण करने में इतना आगे चले गए कि वे स्वधर्म और राष्ट्र धर्म की मर्यादा भी भूल गए और मोदी विरोध करते करते देश का विरोध
करने लगे, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब हो रही है.
नूपुर शर्मा को बलात्कार करने और उनको और उनके परिवार को जान से मारने की
धमकियां मिल रहीं हैं और उन्हें मारने के
लिए इनाम घोषित किए जा चूके हैं. जिस दिन राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और प्रदेश के मुख्यमंत्री, कानपुर
के पास राष्ट्रपति के पैतृक गांव में थे,
मुस्लिम पक्ष द्वारा जुमे की नमाज के बाद कानपुर में बवाल किया गया और दंगा करने का प्रयास किया गया.
कानपुर के दंगो में पीएफआई का हाथ सामने आया है, जिस को प्रतिबंधित करने के लिए केंद्र सरकार पिछले 2 वर्ष
से विचार कर रही है. कानपुर के काजी
भड़काऊ बयान दे रहे हैं, वे कहते हैं कि
पुलिस ज्यादती कर रही है और केवल मुस्लिमों को पकड़ रही है. उनके अनुसार
दंगा कोई भी करें दोनों पक्ष के लोगों को पकड़ा जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि
दंगे में कोई ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है तो फिर ज्यादा लोगों को गिरफ्तार क्यों
किया जा रहा है. वे यह भी कहते हैं कि वह सिर पर कफन बांध कर निकलेंगे.
सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर बहस के दौरान हिंदू देवी देवताओं का
लगातार अपमान किया जा रहा है और उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हो रही है. पता नहीं मोदी सरकार इतनी रक्षात्मक
होकर क्यों कार्य कर रही है. धारा 370 तो
हट गई लेकिन कश्मीर में जमीनी हालात मैं बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ है और टारगेट
किलिंग का दौर एक बार फिर वापस आ रहा है. संशोधित नागरिकता का कानून तो बन गया
लेकिन इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया
है. समान नागरिक संहिता का कानून बनाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय भी कई अनुस्मारक
दे चुका है, लेकिन सरकार इस पर विचार भी नहीं कर
रही. पश्चिम बंगाल में भयानक नरसंहार हुआ लेकिन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री
खामोश रहे. पंजाब यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री की स्वयं की जान खतरे में पड़ गयी
लेकिन कार्यवाही ठंडे बस्ते में पड़ी है.
इन सब बातों से नाराज चल रहे मोदी भक्त गुस्से में हैं,नूपुर शर्मा के निष्कासन ने आग में घी
का काम किया है. यही कारण है कि बिना किसी स्वार्थ के हिंदुओं का एक बहुत बड़ा
वर्ग जो मोदी के पीछे चट्टान की तरह खड़ा था, आज सोशल मीडिया पर उनके विरुद्ध आक्रमक है.
इस बात से सभी सहमत होंगे कि मोदी की हर चुनावी जीत के पीछे लगभग शतप्रतिशत हिंदू मतों का योगदान है. ऐसे में उनकी
मोदी से अपेक्षाएं बहुत स्वभाविक है. इनकी
नाराजगी मोदी और भाजपा को बहुत भारी बढ़ सकती है इसलिए इन्हें नजरंदाज नहीं किया
जाना चाहिए. मोदी के समर्थकों को भी इस बात को समझना चाहिए कि उन्होंने जो किया है
वह देश हित में ही किया होगा. जब मोदी और देश के विरुद्ध राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र रचे जा
रहे हों, उन्हें थोड़ा धैर्य रखना चाहिये.
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शिव मिश्रा responsetospm@gmail.com
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नेशनल हेराल्ड घोटाला और गांधी परिवार
नेशनल हेराल्ड घोटाला और गांधी परिवार
प्रवर्तन निदेशालय द्वारा राहुल और
सोनिया गाँधी को पूछ्ताछ के लिए बुलाए जाने से कांग्रेस बुरी तरह तिलमिला गई है और
इसे लोकतंत्र का अपमान, विपक्ष
की आवाज कुचलने और प्रतिशोध की कार्यवाही बता रही है. पार्टी के वफादारों ने राहुल गांधी को प्रवर्तन निदेशालय में पेश होने की घटना को राजनीतिक रूप से भुनाने के लिए पूरे भारत में प्रवर्तन निदेशालय के कार्यालय के सामने प्रदर्शन आयोजित किए. दिल्ली
में अशोक गहलोत और भूपेश बघेल, राहुल गांधी के साथ कार्यकर्ताओं
को लेकर प्रवर्तन निदेशालय में जाना चाहते थे,जिन्हें पुलिस ने हिरासत में लिया
गया. घटनास्थल दिल्ली में होने के कारण पूरा तमाशा मीडिया में छाया रहा.
राहुल गांधी से 3
दिन तक लगातार पूछताछ के
बाद अगली तारीख का सम्मन भी थमा दिया गया. संभावना है कि राहुल से कई चक्र में पूछताछ की जाएगी और थकी हुई
कांग्रेश
हर बार तमाशा नहीं कर पाएगी और पूरे घटनाक्रम से जनता की उत्सुकता भी स्वत: समाप्त
हो जाएगी 23 जून को सोनिया गांधी को प्रवर्तन निदेशालय के
सामने पेश होना है, उस समय तक कांग्रेश अपने विरोध की धार कितनी कायम रख पायेगी यह देखने की बात होगी, यद्यपि कांग्रेस ने जनता की सहानुभूति बटोरने
के लिए उनकी बीमारी को भी हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है.
यह मामला जिस नेशनल हेराल्ड से जुड़ा है उसे 1938 में जवाहरलाल नेहरू ने लगभग पांच हजार स्वतंत्रता सेनानियों से चंदा लेकर शुरू
किया था जिसके लिए एसोसिएटेड जर्नल लिमिटेड (एजेएल) नाम की कंपनी बनाई गई थी. यह कंपनी अंग्रेजी में नेशनल
हेराल्ड, हिंदी में नवजीवन और उर्दू में कौमी आवाज प्रकाशित करती थी. यद्यपि एजेएल बनाने वाले सभी लोग कांग्रेसी नहीं थे फिर भी आजादी
के बाद इस पर कांग्रेस का कब्जा हो गया और सभी समाचार पत्र केवल कांग्रेस का मुखपत्र बनकर
रह गये. पक्षपातपूर्ण और एक तरफा समाचार देने वाले पत्र-पत्रिकाओं और टीवी चैनलों की उम्र बहुत लंबी नहीं
होती और यही इन सब अखबारों के साथ हुआ. कांग्रेस के सत्ता में होने के बाद भी इस
की वित्तीय स्थिति अच्छी कभी नहीं रही जो शोध का
विषय है कि यह स्वाभाविक था या वित्तीय गड़बड़ियों के कारण हो रहा था. इस कंपनी के पास दिल्ली, मुंबई और अन्य जगहों पर कई हजार करोड़ की अचल
संपत्तियां हैं.
एजेएल की वित्तीय हालत सुधारने के लिए कांग्रेस ने इसे पार्टी फंड से ₹90 करोड़
का ऋण दिया लेकिन कंपनी की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ
और 2008 में कंपनी ने सभी प्रकाशन बंद कर दिए. यह बहुत असामान्य बात है कि केंद्र में सत्ताधारी कांग्रेश की कंपनी के समाचार पत्रों का प्रकाशन वित्तीय संकट के कारण बंद हो जाए जबकि पार्टी राजीव
गांधी फाउंडेशन जैसे पारिवारिक ट्रस्ट और संगठनों के लिए बड़ी कुशलता से वित्तीय
प्रबंधन करती है. 2010 में यंग
इंडियन प्राइवेट लिमिटेड (वाईआईएल) नाम की एक कंपनी बनाई गयी, जिसमें
राहुल और सोनिया गांधी की 76 % हिस्सेदारी है, बाकी
परिवार के विश्वसनीय स्वर्गीय मोती लाल बोहरा और ऑस्कर फर्नांडीज जैसे लोगों के
पास है. कांग्रेश ने एजेएल को दिया गया 90 करोड का
ऋण यंग इंडियन को ट्रांसफर कर दिया, जिसमें से यंग इंडियन कांग्रेस को केवल ₹50 लाख का भुगतान करती है और शेष
89.5 करोड़ रुपए का ऋण कांग्रेस द्वारा माफ कर दिया
जाता है. यह भी सामान्य नहीं है क्योंकि इस तरह के सौदे
बैंकिंग उद्योग में होते हैं जहां फंसे हुए ऋणों को पारदर्शी
तरीके से कोई ऐसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी खरीदती है. इस 50 लाख
रुपए के भुगतान के बदले यंग इंडियन को एजेएल कंपनी का मालिकाना हक प्राप्त हो जाता हैं. इस अधिग्रहण के बाद यंग
इंडियन ने एजेएल के समाचार पत्रों को पुनः प्रकाशित करने का कोई प्रयास नहीं किया और यहीं से संदेह गहराता चला गया कि आखिर इस अधिग्रहण का उद्देश्य क्या था?
सबसे पहली बात कांग्रेस जो एक राजनीतिक दल है, ने
एजेल कंपनी को ऋण क्यों दिया ?
जबकि एजेएल के पास हजारों
करोड़ रुपए की अचल संपत्तियां थी, जिसके
आधार पर कोई भी बैंक ऋण दे सकता था और कंपनी की वित्तीय स्थिति पर
नजर भी रख सकता था जिससे बहुत
संभव था कि कंपनी बच जाती और आज भी यह समाचार पत्र प्रकाशित हो रहे
होते. दूसरी बात अगर कांग्रेस का उद्देश्य अपना ऋण वसूल करना था तो इसे पारदर्शी
तरीके से एजेएल की अचल संपत्तियां बेंच कर
क्यों नहीं किया गया ? कांग्रेस ने अपने ₹90 करोड़ के ऋण के बदले केवल 50 लाख
रुपए लेकर आईजेएल कंपनी और उसकी सभी चल अचल संपत्तियां यंग इंडियन को क्यों दे दी ? अगर कांग्रेस 89.5
करोड़ रुपए का का ऋण माफ कर सकती है तो फिर पूरे ₹90 करोड़ का पूरा ऋण माफ माफ क्यों नहीं किया ? अगर कांग्रेस पूरे 90 करोड़
का ऋण माफ कर देती तो एजीएल को पुनर्जीवित करने की संभावना बनी रह
सकती थी. अगर कांग्रेस एजेएल कंपनी को पुनर्जीवित नहीं भी करना चाहती थी तो भी इसकी अचल संपत्तियां पार्टी के लिए खरीद सकती थी. चूंकि यंग इंडियन, राहुल और सोनिया गांधी
के व्यक्तिगत स्वामित्व का संगठन है, इसलिए
एजेएल की हजारों करोड़ की परिसंपत्तियों के मालिक भी राहुल और सोनिया गांधी बन गए या कांग्रेश द्वारा बना दिए गए.
साधारण
समाज का कोई भी व्यक्ति इस पूरे खेल को समझ
सकता है जिस आधार पर डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने कोर्ट
का दरवाजा खटखटाया था, जहां यह मामला लंबित है और इस मामले में सोनिया
और राहुल जमानत पर चल रहे हैं.
इस खेल को अगर सावधानी से
देखें तो पाते हैं कि यंग इंडियन ने केवल 50 लाख
रुपए के बदले एजेएल की दो हजार करोड़ से भी अधिक कीमत की चल अचल संपत्तियां हासिल कर ली. इस तरह
कमाए गए लाभ पर आयकर देना होता है, जिसकी नोटिस आयकर विभाग ने दे रखी
है.
प्रवर्तन
निदेशालय इस प्रकरण में मनी लांड्रिंग की जांच कर रहा है, जिसमें पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं. सबसे
बड़ी बात है कि कांग्रेस या गांधी परिवार अब तक आयकर और प्रवर्तन निदेशालय की
कार्यवाही के विरोध में न्यायालय नहीं पहुंचा है. शायद उन्हें
लगता है कि कोई राहत नहीं मिलेगी. इसलिए
कांग्रेस पूरे जोर शोर से यह प्रदर्शित
करना चाहती है कि मोदी सरकार राजनीतिक पूर्वाग्रह के कारण गांधी परिवार के विरुद्ध बदले की
भावना से कार्य कर रही है. ऐसा
करके वह जनता की सहानुभूति बटोरना चाहती है, लेकिन कांग्रेस का नाम
भ्रष्टाचार के साथ इतना जुड़ चुका है इसलिए शायद ही वह अपने उद्देश्य में सफल हो सके.
प्रवर्तन निदेशालय ने पिछले कुछ महीनों में कई मामलों में काफी सावधानी और मेहनत से साक्ष्य एकत्रित करने की प्रणाली विकसित की है जिसके कारण महाराष्ट्र के दो मंत्रियों अनिल देशमुख और नवाब मलिक तथा दिल्ली सरकार के मंत्री सत्येंद्र जैन को जमानत भी नहीं मिल सकी है. राहुल और सोनिया गांधी को भी प्रवर्तन निदेशालय के मामले में न्यायालय से कोई अग्रिम जमानत नहीं मिली है. चूंकि प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ में आरोपित अपने साथ एडवोकेट नहीं ले जा सकता, इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि राहुल और सोनिया गांधी प्रवर्तन निदेशालय की पूछताछ में कुछ ऐसे महत्वपूर्ण राज उगल देंगे जो उनके जेल जाने का मार्ग प्रशस्त करेंगे. केंद्र सरकार फूंक-फूंक कर कदम रख रही है ताकि किसी भी स्तर पर जनता को यह संदेश न जाए कि गांधी परिवार या कांग्रेश के साथ ज्यादती की जा रही है.
इस बात
का पूरा प्रयास किया जा रहा है कि यदि राहुल
और सोनिया को जेल जाने की नौबत आती है तो इसके पीछे न्यायिक बल अवश्य हो ताकि
राजनीतिक विद्वेष का कांग्रेस का आरोप झूठा साबित हो जाए. इस तरह
की जेल यात्रा के बाद गांधी परिवार का राजनीतिक तिलिस्म पूरी तरह ढह जाएगा और
कांग्रेश में विखंडन और बिखराव की प्रक्रिया इतनी तेज हो
जाएगी जिसे संभालना कांग्रेस के किसी नेता के
बस में नहीं होगा.
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शिव मिश्रा ResponseToSPM@gmail.com
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