बुधवार, 13 अक्टूबर 2021

लखीमपुर खीरी की घटना के निहितार्थ

 


लखीमपुर खीरी में घटी घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन इस घटना ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि भारत में राजनीतिक हित हमेशा  राष्ट्रीय हितों से हमेशा ऊपर रखे जाते हैं और  राजनीतिक दल अपने स्वार्थ के लिए कुछ भी कर सकते हैं। यहां तक कि मानवीय संवेदनाएं भी उनके लिए कोई महत्व नहीं रखती।

 

बताया जाता है कि लखीमपुर खीरी में घटी घटना के पीछे केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा का दिया गया एक तथाकथित विवादास्पद बयान है जिसमें उन्होंने कहा था कि किसानों को सुधार देंगे। बस इसी बात को लेकर स्थानीय किसान नेता उनका विरोध करना चाहते थे और उन्हें काले झंडे दिखाना चाहते थे लेकिन बात इतनी बढ़ गई जिसमें चार  किसान, दो भाजपा कार्यकर्ता, एक मंत्री अजय मिश्रा की गाड़ी का ड्राइवर और एक पत्रकार की मौत हो गई। यह बात सुनने में  तो बहुत साधारण लगती है लेकिन  है नहीं।

 

इस घटना में हुई 8 मौतें  बेहद दुखद है और यह  हिसाब-किताब लगाना कि इसमें कितने किसान थे,  कितने भाजपा के कार्यकर्ता थे और कितने पत्रकार थे, बिल्कुल बेमानी है।  दुर्भाग्य से अपने लाभ के लिए सभी राजनीतिक दलों ने लाशों और मानवीय संवेदनाओं का बंटवारा कर लिया, जिसमें राजनीतिक लाभ मिल सकता था उनके लिए तो धरना प्रदर्शन और राजनीतिक पर्यटन बन गया  लेकिन जिन बातों से  राजनीतिक दलों को कोई फायदा नहीं था वह कहीं चर्चा में भी नहीं आई। बताने  की आवश्यकता नहीं कि घटना में मारे गए एक पत्रकार, ड्राइवर और  भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए किसी भी राजनीतिक दल ने  न तो कोई संवेदना प्रकट की है और न ही कोई इनके घर पर दिखावे के लिए ही पहुंचा। विशुद्ध हाथरस- कांड के आधार  पर लखीमपुर खीरी में भी राजनीतिक पर्यटन शुरू हुआ और सपा, बसपा, कांग्रेस और आप जैसे दलों ने वोटों के लालच में जो कुछ भी संभव था, सब  किया और इसके लिए सभी मर्यादाओं और मानवाधिकारों को तिलांजलि दे दी।

 

 घटना में मारे गए 4 किसानों के ऊपर कथित रूप से केंद्रीय राज्य  मंत्री अजय मिश्रा के पुत्र आशीष मिश्रा ने गाड़ी चढ़ाकर कुचल दिया था, जिसके बाद  गाड़ी में बैठे दो भाजपा कार्यकर्ता और एक ड्राइवर को तथाकथित किसानों की भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। एक पत्रकार भी इन किसानों के हत्थे चढ़ गया उसे  भी बहुत बेरहमी से पिटाई करके मौत के घाट उतार दिया गया।गाड़ियां फूंक दी  गयीं । यह सब बिना पूर्व तैयारी के  नहीं किया सकता था । इस घटना के संबंध में कई वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुए, लेकिन उन्ही  वीडियो का संज्ञान लिया गया और उनका   दुष्प्रचार किया गया जिससे  सरकार को किसान विरोधी ठहराया  जा सके। एक वायरल वीडियो में ड्राइवर से जबरन यह कहलवाने  की कोशिश की जा रही है कि उसे मंत्री ने अपनी गाड़ी से किसानों को कुचलने के लिए भेजा था  लेकिन एक बेहद गरीब परिवार से संबंध रखने वाले इस ड्राइवर ने यह जानते हुए भी कि उसकी न उसकी मौत का कारण बन सकती है, यह झूठ स्वीकार नहीं किया और फिर उसे बेहद बेरहमी से पीट पीट कर मार डाला गया। इस घटना में मृत  ड्राइवर और पत्रकार दोनों  बेहद गरीब परिवार से संबंध रखते हैं लेकिन राजनीतिक फायदे  की लूट के इस युग में किसी भी राजनीतिक दल ने इन दोनों के घर न तो  जाना उचित समझा और ना ही उनकी मौत की निंदा की क्योंकि वोटों का फायदा तथाकथित  किसानों के साथ खड़े होने में  ही है

 

                                           

                                                 ( बेहतरीन अदाकारी के क्षण )

कांग्रेस की  प्रियंका वाड्रा और राहुल गांधी दोनों ने ही लखीमपुर खीरी को हाथरस बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। हास्यास्पद नाटकीयता का पर्याय बने सिद्धू ने  दोषियों की गिरफ्तारी न होने तक आमरण अनशन शुरू  कर दिया। कांग्रेस ने यहां दलित कार्ड खेलने की भी भरपूर कोशिश की। राहुल के साथ तो पंजाब और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भी साथ गए और उन्होंने घटना में मारे गए किसानों के लिए राज्य सरकार की ररफ  ५० लाख रुपये की सहायता राशि की घोषणा की, जो उ.प्र. सरकार द्वारा घोषित ४५ लाख रुपये से ज्यादा है। इसका उद्देश्य पंजाब की राजनीति साधना ज्यादा है ।   उल्लेखनीय है कि अभी हाल ही में छत्तीसगढ़ में पुलिस द्वारा कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था। काग्रेस शासित राजस्थान में भी हनुमानगढ़ जिले में एक दलित की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और नृशंशता की सारी सीमाएं तोड़ते हुए उसके मृत शरीर को उसके घर घर में  परिवार वालों के सामने फेंककर आतंकित किया गया लेकिन इस मामले में हीं कोई राजनीतिक पर्यटन नहीं हुआ और न ही कोई सहयता राशि दी  गयी। स्वाभाविक रूप से यह कार्य स्वयं कांग्रेश स्वयं तो नहीं कर सकती थी, किंतु अन्य विपक्षी दलों ने भी इस मामले में कोई रुचि नहीं दिखाई क्योंकि वहां निकट भविष्य  में चुनाव नहीं होने हैं। निश्चित रूप से यह भाजपा की राज्य इकाइयों  की कमजोरी है जो इन दोनों ही प्रदेशों की इन घटनाओं को उचित तरीके से जनता के सामने ला भी नहीं सकी। 

 


                                                  ( गिद्ध राजनीति )

लखीमपुर  घटना को सबसे खतरनाक मोड़   देकर   ब्राह्मण ( हिन्दू)  बनाम सिख बनाने की कोशिश की गई क्योंकि इस क्षेत्र में सिखों के साथ  ब्राह्मण भी संख्या में ठीक-ठाक होने के साथ ही राजनीतिक रूप से प्रभावशाली भी हैं।  अजय मिश्रा के केंद्रीय राज्य मंत्री बनने के बाद से ही उन्हें निशाना बनाना शुरू कर दिया गया था ताकि इस क्षेत्र से उनके मंत्री होने का  राजनीतिक लाभ भाजपा को न मिल सके। चूंकि  उत्तर प्रदेश में चुनाव बहुत नजदीक है, और प्रदेश की जनता योगी आदित्यनाथ की कानून व्यवस्था और माफियाओं के विरुद्ध अपनाई गई नीति से काफी हद तक  संतुष्ट है, इसलिए   सभी राजनीतिक दल योगी की छवि बिगाड़ कर राजनीतिक लाभ लेना चाहते हैं। इसलिए पिछले काफी समय से लगभग सभी राजनीतिक दलों के निशाने पर योगी और मोदी है। प्रदेश में घटने वाली हर छोटी बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को तूल देकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने की कोशिश की जाती है ताकि  योगी की छवि को धक्का पहुंचाया जा सके और उनकी सरकार  पर प्रश्न चिन्ह  लगाया जा सके। लगातार  चल रहे किसान आंदोलन का राजनीतिक  उद्देश्य  तो किसी से छिपा नहीं है और उसका लक्ष्य उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव और बाद में लोकसभा चुनाव ही हैं।

 



                   

कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण पूजन का दौर शुरू हुआ था और इसके लिए सभी दलों ने विकरू  कांड में विकास दुबे इन काउंटर  की आड़ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ब्राह्मण विरोधी ठहराने की भरपूर कोशिश की थी। इसके साथ ही सभी दलों ने प्रदेश में  ब्राह्मणों की लगभग 14% जनसंख्या को लुभाने के लिए अनेक वायदों की झड़ी लगा दी है। सपा और बसपा में तो   भगवान परशुराम की मूर्तियां बनवाने में भी आपसी  होड़ है कि कौन कितनी ऊंची मूर्ति बना सकता है और कहां कहां बना सकता है, लेकिन दुर्भाग्य से भाजपा सहित किसी भी राजनीतिक दल का कोई भी ब्राह्मण और दलित नेता लखीमपुर खीरी कांड में मारे गए शुभम मिश्रा ( ब्राहमण) और श्याम सुंदर (दलित)  के परिवार वालों को सांत्वना देने भी नहीं पहुंचा, मुआबजा तो बहुत दूर की बात है ।

 

 प्रदेश का  प्रबुद्ध वर्ग सबसे ज्यादा इस बात से चिंतित है कि  विधानसभा चुनाव तक उत्तर प्रदेश में होने वाली हर दुर्भाग्यपूर्ण घटना को राजनीतिक रंग दिया जाएगा और अनेक षड्यंत्रकारी घटनाएं भी प्रायोजित की जाएंगी लेकिन इसके बाद भी केंद्र और राज्य सरकार, इस संदर्भ में कोई ठोस कार्यवाही नहीं कर पा रही  हैं।  किसान आंदोलन के संबंध में केंद्र और राज्य सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि किसी भी आंदोलन या विरोध को केवल अनदेखा करने से ही उसका समाधान नहीं हो जाता। इन आंदोलनों को समाप्त करने के लिए कोई न कोई नीतिगत निर्णय लेना होगा और तदनुसार कठोर कार्रवाई करनी पड़ेगी, आखिर कुछ लोगों के संवैधानिक अधिकारों की स्वतंत्रता के नाम पर सामान्य जनता के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। किसान आंदोलन से आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ सामान्य जनता की दैनिक गतिविधियां भी बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। यह बहुत लंबे समय तक नहीं चल सकता और इससे जनता में सरकार के कमजोर होने का संदेश जा रहा है। इससे पहले भी पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा के संदर्भ में न केवल केंद्र सरकार की साख में बट्टा लगा बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के व्यक्तिगत छवि को भी   गहरी चोट पहुंची है।

 

 दुर्भाग्य से  लखीमपुर खीरी में घटी घटना का स्वत संज्ञान लेने वाले और उत्तर प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर असंतोष प्रकट करने वाले सर्वोच्च न्यायालय  भी किसान आंदोलन के संबंध में अब तक कोई न्यायोचित  निर्णय नहीं दे सका है और इस कारण आर्थिक नुकसान के अलावा सामान्य जनता के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार भी बाधित हुए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने संसद द्वारा  पारित तीनों किसान कानूनों पर रोक लगाने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं किया है इससे ऐसा लगता है कि न्यायालय सरकार पर तो बड़ी आसानी से चाबुक चला सकता है, तीखी टिप्पणियां कर सकता है लेकिन आंदोलनकारियों के विरुद्ध कोई भी सख्त  निर्णय देने में डरता है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐसा ही कुछ शाहीनबाग मामले में भी  किया गया था। देश की निचली अदालतों ने  जनता के  एक बहुत बड़े वर्ग का विश्वास पहले ही खो दिया है। उच्च न्यायालय भी उसी रास्ते पर  हैं लकिन  जनता का  विश्वास  अभी भी  सर्वोच्च न्यायालय पर है। अब   यह आशंका बलवती हो रही है कि यह विश्वास भी बहुत जल्दी न टूट जाए। पश्चिम बंगाल में चुनाव उपरांत हुई हिंसा, बलात्कार और आगजनी के मामले लगभग वैसे ही  थे जो देश के विभाजन के समय हुए  थे लेकिन दुर्भाग्य से सर्वोच्च न्यायालय ने इनका स्वत: संज्ञान नहीं लिया इसके विपरीत पश्चिम बंगाल की सरकार से संबंधित कई मुकदमों से  पश्चिम बंगाल से संबंध रखने वाले न्यायाधीशों ने अपने आप को  अलग कर लिया। इसके क्या मायने हो सकते हैं, समझना मुश्किल नहीं । इससे सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा को अपूरणीय  क्षति पहुंची है और कम से कम प्रबुद्ध वर्ग में न्यायालय के प्रति सम्मान की भावना को गहरा आघात लगा है ।

 

गोरखपुर के मनीष हत्या कांड के बाद लखीमपुर खीरी और उसके बाद कुछ और........। इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का  उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव तक राजनीतिक प्रस्तुतीकरण किया जाता रहेगा। यह भी हो सकता है कि कुछ घटनाओं का मंचन और प्रायोजन भी किया जाए। इस संदर्भ में सरकार को अत्यंत सतर्क रहने की आवश्यकता है और यह सुनिश्चित करना राज्य सरकार का दायित्व भी है कि राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए प्रदेश  को रंगमंच के रूप में प्रयोग करके प्रदेश की जनता को अनावश्यक परेशान न किया जाए।

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                                        - शिव मिश्रा 

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गोरखपुर हत्याकांड - पुलिस का क्रूर और अमानवीय रूप

 



गोरखपुर एक होटल में तलाशी के दौरान पुलिस की पिटाई के कारण वहां ठहरे एक व्यापारी की  मौके पर हुई मौत ने   पुलिस का वीभत्स चेहरा एक बार फिर उजागर कर दिया है.  व्यापारी गोरखपुर के  रामगढ़ ताल क्षेत्र के एक होटल में ठहरा था और पुलिस  उस होटल में तलाशी के लिए गई हुई थी. तलाशी लेने का कोई वैध कारण अभी तक किसी को समझ में नहीं आया है. कोई इसकी   कल्पना भी नहीं कर सकता है कि तलाशी के दौरान ऐसा क्या हुआ कि पुलिस को इस हद तक व्यापारी की पिटाई करनी पड़ी कि उसकी मौके पर ही मौत हो गई.  

इस घटना ने प्रदेश का राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया और विपक्ष ने हाथो हाथ इस मुद्दे को लपक लिया और फिर सियासी गतिविधियों का दौर शुरू हो गया. यद्यपि मुख्यमंत्री योगी  ने संवेदनशीलता को समझते हुए मामले को गोरखपुर से बाहर कानपुर स्थानांतरित कर दिया जहां व्यापारी का परिवार रहता है. जांच के लिए उच्च स्तरीय पुलिस दल गठित कर दिया गया है और घटना में शामिल सभी पुलिस वालों के विरुद्ध हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया है. मृतक की पत्नी को ₹50 लाख की सहायता राशि के अलावा कानपुर विकास प्राधिकरण में विशेष कार्य अधिकारी की नौकरी भी दी गई है. इस तरह विपक्ष द्वारा पूरे मामले को सियासी रंग देने के प्रयासों की हवा जरूर  निकल गई है लेकिन यक्ष प्रश्न है कि एसा हुआ क्यों?

 

 इस घटना ने जहां पुलिस सुधारों की अत्यंत पुरानी मांग को एक बार फिर से तरोताजा कर दिया है. जब भी कभी पुलिस द्वारा इस तरह की क्रूर, असंवेदनशील और अमानवीय घटनाओं को अंजाम दिया जाता है चारों तरफ पुलिस सुधारों की बातें होने लगती हैं . और फिर ऐसा लगने लगता है कि जैसे पुलिस का यह रवैया सिर्फ पुलिस सुधारों को लागू न होने के कारण है जो बिल्कुल भी सही नहीं है. आज भी पूरे भारत में पुलिस का रवैया वही है जो अंग्रेजों के जमाने में हुआ करता था.  यह भी हो सकता है कि सभी पुलिस वालों के लिए अंग्रेजों की समय वाली पुलिस एक आदर्श और स्वयं सुखदाई स्थिति हो लेकिन आज के लोकतांत्रिक परिदृश्य में इस तरह की पुलिस व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जा सकता.

 

 


                             (गोरखपुर के गुनाहगार )

आखिर ऐसा क्यों होता है कि पुलिस बल  लुटेरे और हत्यारों के रूप  में सामने आता है. इसके कई कारण स्पष्ट है जिन पर प्रहार करके फौरी तौर पर पुलिस की स्थिति को काफी हद तक सुधारा जा सकता है, लेकिन राजनीतिक कारणों से कोई भी सरकार इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाती है और इस तरह पुलिस का भयावह चेहरा जस का तस है. आइए इस पर चर्चा करते हैं कि ऐसा क्या किया जा सकता है जिससे पुलिस व्यवस्था में तुरंत कुछ सुधार किया जा सके.

 

 उत्तर प्रदेश सहित किसी भी राज्य की पुलिस अपने काम के प्रति न तो पूरी तरह समर्पित है और न ही दक्ष. इसका सबसे बड़ा कारण है पुलिस में बड़े पैमाने पर व्याप्त भ्रष्टाचार और जब कभी इसे राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होता है, यह अपने चरम पर पहुंच जाता है जैसा कि हमने अभी मुंबई पुलिस के संदर्भ में देखा जहां  किसी विशेष व्यक्ति को जेल में डालने के लिए पुलिस राजनीतिक इशारों पर नाचते हुए कुछ भी कर सकती है और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी पुलिस व्यवस्था द्वारा राजनीतिक मांग पर मासिक  लक्ष्य  बनाकर वसूली की जाती है, लोगों की हत्या और अपहरण किए जाते हैं. ऐसी पुलिस व्यवस्था जनता के लिए सहायक नहीं आतंक से भी बदतर  है और इसी कारण सामान्य जनमानस पुलिस से बचकर रहने की हर संभव कोशिश करता है.

 

 जनता में पुलिस की भूमिका आज भी खलनायक की ही है. मजेदार बात यह है कि पुलिस की यह भ्रष्ट व्यवस्था इतनी लचीली है कि वह किसी भी राजनीतिक दल की सरकार के साथ सामंजस्य बना लेती है और उसके अनुरूप कार्य करने लग जाती है, लेकिन ऐसा करने में उसके अपने हित सबसे पहले होते हैं और राजनीतिक दल के साथ साथ उन्हें भी अपनी जेब  भरने की खुली छूट मिल जाती है. शायद इसीलिए कोई भी सरकार न तो पुलिस सुधार की दिशा में कोई कदम उठाती है और न ही पुलिस के विरुद्ध कोई सख्त कार्यवाही करती है. पुलिस सुधार  की बात भी ज्यादातर सेवा निवृत पुलिस अधिकारी ही करते हैं  जिन्होंने अपने कार्यकाल में इस दिशा में कुछ नहीं किया.  कुल मिलाकर आजादी के बाद से अब तक " चलता है" का  राजनीतिक रवैया बना हुआ है और इसी कारण अंग्रेजों की पुलिस और आज की पुलिस में कोई बहुत अंतर नजर नहीं आता जो कुछ सुधार नजर आता भी है वह सोशल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बढ़ते प्रभाव और सक्रियता के कारण ही है. जब कभी कोई सरकार थोड़ी बहुत सख्ती  करती है उसका भी थोड़ा बहुत असर पुलिस की  कार्यप्रणाली पर परलक्षित होता है.

 

पुलिस की  मुख्यतय: दो  समस्याएं हैं - एक पुलिसकर्मियों के व्यक्तिगत आचरण और दूसरा अनवरत  भ्रष्टाचार. इन दोनों के कारण ही  पुलिस  प्रोफेशनल नहीं हो पाती बल्कि स्वयं राजनीतिक गुलामी की जंजीरों से जकड़ी हुई जनता के शासक बनने का प्रयास करती रहती है. जब पूरा  तंत्र भ्रष्टाचार से लाभान्वित हो रहा तो   कोई नियंत्रण प्रणाली भी विकसित नहीं हो सकती और जिससे पुलिस की निरंकुशता बढ़ना  बहुत स्वाभाविक है. 

 

पुलिस में कम अवधि में व्यापक सुधार के लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की अत्यंत आवश्यकता है और तभी निम्नलिखित परिवर्तन पुलिस व्यवस्था में किया जा सकता है.

 

 अंग्रेजो  के जमाने से लेकर आज भी पुलिस में सिपाही के लिए शैक्षणिक योग्यता केवल हाई स्कूल रखी गई है जो आजकल के वैश्विक परिवेश में लगभग अनपढ़ होने जैसी है. सेना और अर्धसैनिक बलों में  तो यह एक बार फिर भी स्वीकार्य है लेकिन पुलिस बल के लिए जिसका दिन-रात जनता से संपर्क होता हो, यह शैक्षणिक योग्यता बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं है. अतः सरकार को सिपाहियों की भर्ती के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता स्नातक कर देना चाहिए, और इस कारण भर्ती की न्यूनतम और अधिकतम आयु में परिवर्तन किया जा सकता है. ट्रेनिंग में व्यवहार विज्ञान का अधिकतम उपयोग किया जाना चाहिए और इसके साथ ही सिपाहियों के लिए आकर्षक करियर के लिए वर्तमान प्रमुख व्यवस्था में परिवर्तन करना  होगा. ट्रेनिंग व्यवस्था में शारीरिक दक्षता के अलावा अन्य विषयों की ट्रेनिंग को पूरी तरह से आउट सोर्स किया जाना चाहिए जिससे पूरे तंत्र में नए विचारों का संचार हो सके और उन्हें मालूम हो सके कि समाज के लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं और उनसे क्या अपेक्षा रखते हैं. सक्षम और उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले सिपाहियों को सेवा निवृत्ति तक पुलिस अधीक्षक पद तक पहुंचने में कोई भी बाधा नहीं होनी चाहिए. इस कारण उनका मनोबल ऊंचा रहेगा, उनकी सोच का दायरा विस्तारित होगा. उपनिरीक्षक जैसे पद सीधी भर्ती के बजाय प्रोन्नति के आधार पर भरे जाने चाहिए और अगर यह संभव ना हो तो कम से कम 50% पद प्रोन्नति के आधार पर भरने के लिए आरक्षित होने चाहिए. प्रोन्नत की यही व्यवस्था राज्य और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों पर भी लागू होनी चाहिए. किससे न केवल तंत्र में गति मिलेगी बल्कि पुलिस कर्मियों की कर्तव्य परायणता में निश्चित रूप से बढ़ोतरी होगी.

-    पुलिस तंत्र का सबसे पुराना और लगभग लाइलाज हो चुका मर्ज है भ्रष्टाचार जो अंग्रेजों के जमाने से आज तक न केवल बरकरार है बल्कि नित  नए आयाम स्थापित कर रहा है. ऐसे पुलिसकर्मी उंगलियों पर गिनने लायक होंगे जो भ्रष्टाचार में लिप्त नहीं होगे.  भ्रष्टाचार विरोधी कार्यवाही के दायरे में आए कई पुलिस अधिकारियों से मिले तक चौंकाने वाले हैं. कई अधिकारी केवल पांच से दस  साल सेवाकाल  में हजारों करोड़ की  संपति के मालिक  हैं. उत्तर प्रदेश में ही कई बड़े पुलिस अधिकारी, जिन पर भ्रष्टाचार और संगीन अपराधों के आरोप हैं,  फरार घोषित किए गए हैं, क्योंकि उ.प्र. की  दक्ष पुलिस उन्हें पकड़ने में असहाय है. कई पुलिस अधिकारियों पर आतंकवादियों के साथ सांठगांठ के आरोप प्रमाणित हुए हैं. इस दिशा में भी अत्यंत सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है.

प्रत्येक सीधी भर्ती के पदों पर, समुचित संख्या में कर्मियों की भर्ती करके प्रतीक्षा सूची बना ली जाए. भर्ती के विज्ञापन में स्पष्ट तौर पर इसकी घोषणा की जाए कि यह भर्ती प्रतीक्षा सूची बनाने के लिए है जिसे भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों को बर्खास्त किए जाने के बाद समायोजित की जाएगी. शुरुआत में यह संख्या बहुत अधिक हो सकती है क्योंकि मोटे तौर पर एक तिहाई पुलिस तंत्र भ्रष्टाचार में गंभीर रूप से जकड़ा  हुआ है, इनमें से   बड़ी संख्या में ऐसी कर्मी  है जिन्हें तुरंत निकाल बाहर करने की आवश्यकता है . इससे न केवल भ्रष्ट कर्मियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकेगा वरन  दूसरे पुलिस कर्मियों को भी उदाहरण पेश किया जा सकेगा. एक बात हमेशा याद रखी जानी चाहिए कि सरकारी नौकरी की सुरक्षा ऐसा कवच है जो कर्मचारियों की उत्पादकता घटाता है और उन्हें भ्रष्ट रास्ते पर जाने के लिए प्रेरित करता है इसलिए सेवा शर्तों में व्यापक सुधार की आवश्यकता है ताकि अवांछित और सिफारिश के आधार पर आए अक्षम  कर्मियों को बिना समय गवाएं  निकाल बाहर किया  जा सके.

 

इस तरह पुलिस व्यवस्था में तुरंत परिवर्तन दिखाई पड़ने लगेगा और इसके बाद व्यवस्थित रूप से व्यापक विचार-विमर्श के बाद पुलिस या अन्य तरह के सुधार किए जा सकते हैं.

 

यह भी बात ध्यान रखने योग्य है कि  जैसे खरबूजा  को देखकर खरबूजा रंग बदलता है, विभिन्न विभाग भी इसी तरह भ्रष्टाचार की चपेट में आते हैं. अन्य विभाग जहां जनता का सबसे अधिक कामकाज पड़ता है वहां के भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगाने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए.   उत्तर प्रदेश में इस तरह के  विभागों की पहचान मुश्किल नहीं है, - परिवहन विभाग, रजिस्ट्री ऑफिस, तहसील / कचहरी आदि इसके निकृष्टतम  उदाहरण है.   इन विभागों में पासपोर्ट कार्यालय में अपनाई जाने वाली आउटसोर्सिंग सहित  इस तरह के परिवर्तन तुरंत किए जाने की आवश्यकता है अन्यथा भ्रष्टाचार पर शायद कभी भी लगाम नहीं लगाई जा सकती.

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                             - शिव मिश्रा 



 

बुधवार, 29 सितंबर 2021

डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व

 

वैश्विक हिंदुत्व को खत्म करने का आयोजन



 10 से 12 सितंबर 2021को अमेरिका में डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व (वैश्विक हिंदुत्व को खत्म करना) नाम से एक कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें हिंदुत्व के खिलाफ जमकर विष वमन किया गया. वैसे तो इसमें कुछ भी नया नहीं है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह के प्रयास हमेशा से होते रहे हैं लेकिन अबकी बार इस कार्यक्रम की विशेष बात यह है कि यह  ऐसे समय पर आयोजित किया गया है जब अफगानिस्तान पर तालिबान ने बलात कब्जा कर लिया है, जहां  प्रतिदिन मानव अधिकारों का क्रूरतम  हनन किया जा रहा है और सातवीं शताब्दी के  कबीलाई अमानुषिक अत्याचार किये जा रहे हैं. इस समय इन तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय विचारकों को हिंदुत्व में खतरा नजर आ रहा है और इसलिए वैश्विक रूप से इसे खत्म करने के लिए कार्यक्रम आयोजित किया गया है.


इस कार्यक्रम के लिए चयनित  समय भी  विडंबना पूर्ण  इसलिए  रहा क्योंकि  यह वही समय है जब अमेरिका में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर आतंकवादी हमला हुआ था. विश्व अभी भी नहीं भूला  हैं कि  अब से 128 वर्ष पहले 1893 में भारतीय सन्यासी और विचारक स्वामी विवेकानंद जी  ने अमेरिका में आयोजित  धर्म संसद में अपना भाषण देकर दुनिया में  धर्म और हिंदुत्व का पाठ पढ़ाया था.


डिस्मेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व को अमेरिका के 50 से अधिक विश्वविद्यालयों या उनके  विभागों ने समर्थन दिया था और स्वाभाविक रूप से पश्चिमी मीडिया ने जिस में प्रमुख रूप से द वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स, द गार्जियन, बीबीसी आदि ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया. यह सभी संस्थान वैश्विक रूप से सनातन संस्कृत के विरुद्ध हमेशा ही  अभियान छेड़े रहते हैं और जब से नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने  हैं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक संगठन बेहद हताशा और निराशा में लगातार कुछ न कुछ प्रपंच करते रहते हैं. इनकी गतिविधियां राजनीति से प्रेरित होती हैं, जिन्हें भारत के राजनीतिक बिरादरी के कुछ लोगों, मोदी और हिंदू विरोधी संगठनों का साथ भी मिलता है. इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण और कुछ भी नहीं हो सकता कि जब भारत के राजनीतिक दल अपने स्वार्थ मैं अंधे  होकर देश की पूर्ण बहुमत की निर्वाचित सरकार के विरुद्ध अभियान छेड़ने में देश विरोधी संगठनों का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साथ देते हैं और इस तरह वे स्वयं राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में शामिल हो जाते हैं.

 

इस कार्यक्रम में औरंगजेब की फैन ऑड्रे ट्रुश्के, नक्सल पृष्ठभूमि की   कविता कृष्णन,  देश विरोधी प्रचार में लिप्त आनंद पटवर्धन और सोशल मीडिया में भारत विरोधी अभियान की  अति सक्रिय मीना कंडासामी शामिल हैं ।

 

आज पूरा विश्व इस्लामिक चरमपंथी गतिविधियों की भयावहता का शिकार है और ज्यादातर देशों में इस्लामिक चरमपंथियों की धर्मांतरण और आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्तता स्पष्ट दिखाई पड़ती है. ऐसा लगता है कि पूरे विश्व का ध्यान इन आतंकवादी और जिहादी गतिविधियों से  हटाकर विश्व के  प्राचीनतम  और सहिष्णुता की पराकाष्ठा माने जाने वाले सनातन धर्म को कलंकित करने का एक नया हथकंडा है.


यह भी कम भी विडंबना पूर्ण नहीं कि पूरे विश्व में अपने शैक्षणिक उत्कृष्टता का प्रचार करने वाले विश्वविद्यालय जिन पर अब वामपंथ इस्लामिक गठजोड़ का असर साफ दिखाई पड़ता है, भी इस कुत्सित अभियान में  शामिल है. इनके समर्थक प्रायोजकों में Northwestern, हार्वर्ड (Harvard), यूपीएन, प्रिंसटन, स्टैनफोर्ड, कॉर्नेल, यूसी बर्कले और एमोरी जैसे विश्वविद्यालय शामिल हैं। इनके नाम देखकर ही आसानी से समझा जा सकता है कि अफगानिस्तान में हो रही बर्बरता और नरसंहार से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए इस सम्मेलन का आयोजन किया गया है. इनमें से किसी भी विश्वविद्यालय या एकेडमिक संस्थान ने कभी तालिबान या इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं किया है.


वामपंथियों और इस्लामिक चरमपंथियों का गठजोड़ भी बेहद अजीब है, जो देश कम्युनिस्ट होते हैं वहां इस्लाम नहीं होता और जो देश  इस्लामिक होते हैं वहां वामपंथ नहीं होता और जहां यह दोनों ही नहीं होते वहां इनकी दोस्ती दूसरे धर्म के विरुद्ध तरह तरह के षड्यंत्र और प्रपंच करती है. जब पूरी दुनिया इस्लामिक आतंकवाद से त्रस्त है और अफगानिस्तान में जो हो रहा है वह किसी से छुपा नहीं है और ऐसे समय में  हिंदुओं के कथित आतंक की बात करना कितना बड़ा षड्यंत्र है इसकी कल्पना करना मुश्किल नहीं.


इस आयोजन के संदर्भ में एक बात बेहद उल्लेखनीय है कि अबकी बार इस आयोजन का इतना विरोध हुआ जितना आयोजकों ने सोचा भी नहीं था और इस कारण कार्यक्रम की वेबसाइट 2 दिन ठप रही और टि्वटर हैंडल बंद रहा. कई विश्वविद्यालयों के सरवर भी ठप हो गए. इस अप्रत्याशित विरोध से आयोजकों और प्रायोजकों  सहित पूरी दुनिया  को यह संदेश चला गया कि सनातन धर्म को कलंकित करने के  प्रयासों को दुनिया भर का  हिंदू समुदाय अब और अधिक बर्दाश्त नहीं करेगा.

 

अगर हम पिछले 1000 साल का इतिहास खंगाले तो पाते हैं कि  भारत पर वामपंथ, साम्राज्यवाद, इस्लामिक धर्मांधता और ब्रिटिश उपनिवेश सभी ने वार किया।  इतिहास ने मुग़ल, मंगोल, पारसी, पादरी, अंग्रेज़, डच और न जाने कितने शासकों और घटनाओं का दौर देखा लेकिन, इतिहास के इन क्रूरतम झंझावातों  के बाद भी  भारत आज भी इतने मजबूती और शान से खड़ा है। एक कवच है जिसने भारत कि हमेशा रक्षा की है और वह है  ‘’सनातन’’। इस्लाम ने जब कट्टरता से जीतने की कोशिश की, सनातन ने उसे अपने अथाह सिंधु में समाहित कर लिया। अंग्रेज़ो ने जब पाश्चात्य आधुनिकता से जीतने की कोशिश की, सनातन ने उसे और परिष्कृत किया।

 

सनातन धर्म अपनी  वैज्ञानिकता  लचीलेपन, सहिष्णुता, परिवर्तन और वसुधेव कुटुंबकम के सार्वभौमिक सिद्धान्त से  केवल पंथ या मजहब नहीं है  बल्कि यह वैज्ञानिक आधारित तर्कपूर्ण जीवन जीने की अद्भुत कला है. सनातन धर्म में कभी अपने प्रचार और प्रसार के लिए कोई खास प्रयास नहीं किए जबकि दूसरी धर्म छल कपट के आधार पर धर्मांतरण करके अपनी संख्या बढ़ाने का प्रयास करते रहते हैं . इस्लाम और क्रिस्चियन सहित दुनिया के कई धर्म अपने प्रचार और प्रसार के लिए बड़ी संख्या में चरमपंथी प्रचारको की एक भारी-भरकम फौज रखते हैं, जिसे क्रमश: इस्लामिक और पश्चिमी देश वित्तीय सहायता उपलब्ध कराते हैं. वर्तमान दुनिया तो ऐसे  दौर से गुजर रही है जहां यह दोनों धर्म धर्मांतरण के लिए उचित अनुचित और अमानवीय सभी तरह के कुकृत्य कर रहे हैं. हिंदुस्तान इन दोनों ही धर्मों के कुख्यात कारनामों का उदाहरण है.

उत्तर प्रदेश में अभी हाल ही में बहुत बड़े धर्मांतरण रैकेट का पर्दाफाश हुआ  है जिसमें न जाने कितने मुल्ला  और मौलवी शामिल पाए गए हैं जिन्हें  विदेशों से बड़े पैमाने पर वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई है. इस धर्मांतरण गिरोह  के सबसे खतरनाक वे लोग पाए गए है जिन्होंने हाल ही में हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम स्वीकार किया था. कुछ दिन पहले  उत्तर प्रदेश कैडर के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के अपने सरकारी आवास पर  धर्मांतरण के पक्ष में तकरीरें करते हुए वीडियो वायरल हुए हैं. पूरी तरह धार्मिक लिबास में रहने वाले इन आईएएस अधिकारी के विरुद्ध उत्तर प्रदेश सरकार ने उच्च स्तरीय  जांच बैठा दी है लेकिन यह उदाहरण बेहद चिंता उत्पन्न करने वाला है क्योंकि ऐसे लोग पुलिस, सेना और अन्य जगहों पर भी जरूर होंगे और उनके इस तरह के  मजहबी कारनामों के क्या दुष्परिणाम होंगे. कम से कम ये महाशय चन्द भटक हुए लोगों में नहीं हो सकते.   जो भी हो समस्त जनता,  सरकार और समूची व्यवस्था को बेहद सावधान हो जाने की जरूरत है क्योंकि जब घर में ही देश विरोधी गतिविधियां हो रही हो तो इनके रोकने के उपाय बहुत मुश्किल हो जाते हैं.

 

हिंदी फिल्म उद्योग से जुड़े एक मुस्लिम समुदाय के कुख्यात दुष्टात्मा  जिनका धर्मांधता और असहिष्णुता का पुराना इतिहास है और जो  फिल्मों द्वारा सनातन और हिंदुत्व के विरुद्ध नैरेटिव स्थापित करने के अभियान में शामिल रहे हैं,  ने सनातन को बदनाम करने के लिए तालिबान को आरएसएस और इस्लामिक अफगानिस्तान को भारत से जोड़ने की मूर्खतापूर्ण बातें की है।  तालिबान के समर्थन में भारत  कई अन्य लोग भी आ गए .  अच्छा हुआ कि उनके चेहरे से नकाब उठ  गया. लखनऊ के एक मजहबी  शायर  जो पिछले कुछ वर्षों से हिंदू विरोधी और देश विरोधी गतिविधियों में सम्मिलित हैं, तालिबान की तुलना बाल्मीकि से कर दी. उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख राजनीतिक दल के सांसदों ने भी तालिबान शासन की प्रशंसा की और उन्हें अपना समर्थन दे दिया. उत्तर प्रदेश में एटीएस द्वारा धर्मांतरण के षड्यंत्रकारी के रूप में गिरफ्तार एक मुस्लिम सदस्य के घर उत्तर प्रदेश के एक  राजनीतिक दल के पदाधिकारियों ने उनके परिवार को हर संभव सहायता देने का वचन दिया.

 

यह कुछ चंद उदाहरण है लेकिन सभी देश भक्त नागरिकों विशेषकर हिंदू समुदाय  के लिए यह कठिन परीक्षा की घड़ी है कि वह इस अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रम को किस परिपेक्ष में लेता है. आज हिंदू समुदाय के लोग भले ही यह  कहे कि" मिटती नहीं हस्ती  हमारी", लेकिन वर्तमान हालात  निश्चित रूप से सनातन संस्कृति पर एक गंभीर खतरे का आगाज है और ऐसे में सभी सनातन प्रेमियों को एकजुट होकर न  केवल अंतरराष्ट्रीय साजिश का पर्दाफाश करना  चाहिए  बल्कि सरकार के हर राष्ट्रवादी कदम के साथ चट्टान की तरह खड़े रहना चाहिए. बात केवल मोदी विरोध की नहीं है अगर मोदी को कटघरे में खड़ा करने के लिए यदि सनातन संस्कृति को कलंकित करने का पाप किया जाएगा तो उसे हिंदू जनमानस बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करेगा और उसका पुरजोर विरोध करेगा.

लेखक – स्वतन्त्र राजनैतिक विश्लेषक और समसामयिक विषयों के जानकार हैं

बुधवार, 15 सितंबर 2021

गाय, सनातन संस्कृति और न्यायिक दृष्टिकोण

 


 


अभी हाल ही में प्रयागराज उच्च न्यायालय ने वैदिक, पौराणिक, सांस्कृतिक महत्व व सामाजिक उपयोगिता को देखते हुए गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का सुझाव दिया है जो बहुत ही स्वागत योग्य है। हिंदुस्तान के वर्तमान हालात को देखते हुए किसी न्यायाधीश द्वारा इस तरह का निर्णय और सुझाव निश्चित रूप से साहसिक है, वरना आज  कुछ  न्यायाधीश प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष दिखाई देने के चक्कर में संवैधानिक बाध्यता ओं का हवाला देते हुए अजीबोगरीब फैसले दे  देते हैं, या फिर फैसले देने से बचते रहते हैं.

 

न्यायाधीश महोदय का बहुत-बहुत साधुवाद  खास तौर से इस बात के लिए कि उन्होंने  पौराणिक, धार्मिक और आर्थिक महत्व को रेखांकित  करते हुए कहा कि भारत में गाय को माता माना जाता है और यह हिंदुओं की आस्था का विषय है और आस्था पर चोट  करने से देश कमजोर होता है। उच्च न्यायालय ने कहा कि  गौमांस खाना किसी का मौलिक अधिकार नहीं है। जीभ के स्वाद के लिए जीवन का अधिकार नहीं छीना जा सकता। बूढ़ी बीमार गाय भी कृषि के लिए उपयोगी होती है इसलिए  इसकी हत्या की अनुमति देना ठीक नहीं। यह भारतीय कृषि की रीढ़ है।

 

न्यायाधीश ने गौ माता को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की बात इसलिए की क्योंकि ऐसा करने से गाय संरक्षित पशु की श्रेणी में आ जाएगी और फिर गोवध पर लोगों को सख्त सजा का प्रावधान हो जाएगा. हाल के वर्षों में किसी भी उच्च न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार को दी गई यह बेहद अच्छी सलाह  है, लेकिन केंद्र सरकार इस पर अमल करेगी इसकी संभावना बिल्कुल भी दिखाई पड़ती है क्योंकि ऐसा करने से राजनीतिक वातावरण बहुत गर्म हो जाएगा और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगों की जमात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार में लग जाएगी. इसके पहले भी विभिन्न उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय भी केंद्र सरकार को समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए सिफारिश कर चुके हैं  लेकिन केंद्र कि किसी भी सरकार ने राजनीतिक कारणवश उस पर  विचार तक नहीं किया.

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बहुत उम्मीदें हैं लेकिन अब तो वह भी अपने लोकप्रिय  नारे “सबका साथ, सबका विकास” में “सबका विश्वास” भी  जोड़ चुके हैं, और ऐसा लगता है कि इस समय वह छद्म  धर्मनिरपेक्षता वादियों के दबाव में हैं, इसलिए बहुत कम उम्मीद है कि वह भी इस दिशा में जल्द ही कोई कदम उठाएंगे.

गाय इतनी महत्वपूर्ण  क्यों ?

सनातन ​ग्रंथों के अनुसार गाय सृष्टि मातृका कही जाती है। गाय के रूप में पृथ्वी की करुण पुकार और विष्णु से अवतार के लिए निवेदन के प्रसंग पुराणों में बहुत मिलते  हैं। इसलिए  गाय सहज रूप से भारतीय जनमानस में रची-बसी है। गौ सेवा को एक सनातन  कर्तव्य के रूप में माना जाता  है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार गाय के सन्दर्भ में निम्न बिंदु बहुत महत्वपूर्ण हैं  -

  • ·       ऋग्वेद में गाय को अघन्या कहा गया है। यजुर्वेद के अनुसार गौ अनुपमेय है। अथर्ववेद में गाय को संपतियों का घर कहा गया है ।
  • ·       पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गौएँ  साक्षात विष्णु रूप होती है, गौयें  सर्व वेदमयी और वेद गौमय है.
  • ·       भगवान शिव के प्रिय पत्र ‘बिल्वपत्र’ की उत्पत्ति गाय के गोबर में से ही हुई थी।
  • ·       गरुड़ पुराण में  वैतरणी पार करने के लिए गौ दान का महत्व बताया गया है।
  • ·       सप्त ऋषियों ने कामधेनु नामक गाय को देवताओं को प्रदान किया था . कामधेनु के बारे में कहा जाता है कि वह जहां भी होती थीं, वहां किसी भी चीज की कमी नहीं होती थी और संपन्नता, समृद्धि और शक्ति का अनुपम समन्वय होता था.
  • ·       गाय में 33 कोटि देवी-देवता निवास करते हैं। ( कोटि का अर्थ करोड़ नहीं होता बल्कि प्रकार होता है ) ये देवता हैं- 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्‍विन कुमार। ये मिलकर कुल 33 होते हैं।
  • ·       गुरु वशिष्ठ ने गाय के कुल का विस्तार किया और उन्होंने गाय के नए परिवार और प्रकार बनाए थे उनके नाम उस समय  कामधेनु, कपिला, देवनी, नंदनी, भौमा आदि था।
  • ·       भगवान श्रीकृष्ण  तो गाय के महत्व को रेखांकित करने के लिए स्वयं गोपालक (ग्वाला ) बने और गाय पूजा शुरू की. गौशालाओं के निर्माण शुरुआत उन्होंने ही की थी. उन्हें सार ज्ञानकोष गोचरण से ही प्राप्त हुआ था।
  • ·       भगवान राम के पूर्वज महाराजा दिलीप नन्दिनी गाय की पूजा करते थे।

 


सनातन धर्म की बहुत बड़ी विशेषता है कि इसमें किसी नियम को किसी पर  जबरदस्ती नहीं थोपा जाता  है. वेद पुराण भी केवल  मार्गदर्शन का काम करते हैं  और उनमें गाय का इतना महिमामंडन  यह संकेत करता है कि अगर संसार को बचाना है तो गाय को बचाना ही होगा. कम से कम भारत के संदर्भ में तो हमें कह सकते हैं कि गाय को बचा कर ही हम इस देश को बचा सकते है|

 

ऐसा भी  नहीं है कि केवल सनातन धर्म या हिंदू समाज ही गाय के बारे में ऐसी पवित्र सोच रखता है,  बल्कि दूसरे धर्म के संस्थापको, प्रवर्तकों और अन्य महापुरुषों ने भी गाय को अत्यंत पूजनीय और महत्वपूर्ण बताया है.

  • ·       ईसा मसीह ने कहा था  कि एक गाय या बैल को मारना एक मनुष्य को मारने के समान है।
  • ·       गुरु गोविंदसिंहजी ने कहा, ‘यही देहु आज्ञा तुरुक को खापाऊं, गौ माता का दुःख सदा मैं मिटाऊं।'
  • ·       जैन आगमों में कामधेनु को स्वर्ग की गाय कहा गया है और प्राणिमात्र को अवध्या माना है। भगवान महावीर के अनुसार गौ रक्षा बिना मानव रक्षा संभव नहीं।
  • ·       पं. मदनमोहन मालवीय की अंतिम इच्छा थी कि भारतीय संविधान में सबसे पहली धारा सम्पूर्ण गौवंश हत्या निषेध की बने। पंडित मदनमोहन मालवीय का कथन था कि यदि हम गायों की रक्षा करेंगे तो गाएं हमारी रक्षा करेंगी।
  • ·       महर्षि अरविंद ने कहा था कि गौ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की धात्री होने के कारण कामधेनु है। इसका अनिष्ट चिंतन ही पराभव का कारण है।
  • ·       मुस्लिम कवि रसखान ने कहा- 'जो पशु हों तो कहा बसु मेरो, चरों नित नंद की धेनु मंझारन।'
  • ·       स्वामी दयानन्द सरस्वती ने  गाय के लिए आर्थिक व्याख्या करते हुए कहा कि एक गाय अपने जीवनकाल में 4,10,440 मनुष्यों हेतु एक समय का भोजन जुटाती है जबकि उसके मांस से 80 मांसाहारी लोग अपना पेट भर सकते हैं।


क्या कहते हैं प्राचीन ग्रंथ और वैज्ञानिक शोध

    सनातन परम्परा में माना जाता है कि गाय का दूध अमृत और दूध के सभी पदार्थ अमृत तुल्य  होते हैं.  संभवत गाय संसार में एकमात्र प्राणी है जिसके मल मूत्र में भी अनेक औषधीय गुण हैं. आयुर्वेदिक पद्धति में गाय के  मूत्र और गोबर से अनेक जटिल और असाध्य बीमारियों का  सफलतापूर्वक उपचार किया जाता है.

    गाय सकारात्मक ऊर्जा का सृजन करती है और यह दुर्लभ गुण गाय  के अलावा किसी अन्य प्राणी में नहीं देखा गया है.

    गाय की पीठ पर रीढ़ की हड्डी में स्थित सूर्यकेतु स्नायु हानिकारक विकिरण को रोक कर वातावरण को स्वच्छ बनाते हैं। यह पर्यावरण के लिए लाभदायक है।

    गाय की रीढ़ में स्थित सूर्यकेतु नाड़ी सर्वरोगनाशक, सर्वविषनाशक होती है जो सूर्य के संपर्क में आने पर स्वर्ण  उत्पादन करती है जो गाय के सभी उत्पादों में विद्यमान होता है.

    पृथ्वी पर सामान्यतया सभी जीव ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड गैस छोड़ते हैं लेकिन  गाय  एकमात्र ऐसा जीव है जो ऑक्सीजन ग्रहण करता है और ऑक्सीजन ही छोड़ता है.

    गाय के दूध दही घी मूत्र और गोबर द्वारा निर्मित पंचगव्य मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर कई असाध्य रोगों का उपचार करता है ।

    गाय के गोबर में विटामिन B12 प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो रेडियोधर्मी किरणों को भी सोख  लेने की क्षमता रखता हैइससे से निकला धुंआ  कीटाणु और दुर्गंध नाशक होता है ।

    गौमूत्र या खमीर हुए छाछ से बने कीटनाशक प्रकृति के 99% कीट प्रणाली के लिए लाभदायक हैं जो  सहायक कीटों को प्रभावित नहीं करते। अनुमानत:  एक गाय का गोबर 7 एकड़ भूमि को खाद और मूत्र 100 एकड़ भूमि की फसल को कीटों से बचा सकता है।

    गाय का गोबर प्राचीन काल से ही चर्म रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता है और यह अत्यंत लाभकारी पाया गया है. गोबर में अनेक जीवाणु होते हैं जो कीटाणु नाशक होते हैं और भूमि को उर्वरा बनाते हैं । गाय के गोबर का प्रयोग घर और मकानों की लिपाई पुताई में काम आता है. मांगलिक कार्यों में गाय के गोबर आंगन की लिपाई की जाती है.

·       गौ उत्पादों पर किये गए वैज्ञानिक शोधों से  अनेक आश्चर्यजनक तथ्य सामने  आये हैं जिन्हें सम्पूर्ण मानवजाति की भलाई के लिए उपयोग किया जा सकता है. 

 

भारत में गौ हत्या का प्रारंभ उस समय से हुआ जब से राक्षसी प्रवृत्ति के पाशविक और  बर्बर  आक्रांताओं ने भारत में प्रवेश किया। हिन्दू लाख समझाते रहे कि गौमाता सारे संसार की जननी के समान है।उसके शरीर के हर अंश में लोक कल्याण छिपा है. इसलिये उसकी हत्या नहीं, उसका पूजन किया जाना चाहिये पर इन राक्षसों पर कोई असर नहीं पड़ा। आज भी मूर्खता और विद्वेष के कारण बहुत से विधर्मी गौहत्या करते हैं और इसलिए यह गौ रक्षकों और गौ भक्षकों  के बीच विवाद का सबसे बड़ा कारण है.

वैसे तो सनातन संस्कृति नष्ट करने के प्रयास लगभग 2000 वर्षों से किए जा रहे हैं लेकिन आज स्वतंत्र भारत में भी सनातन संस्कृति को आघात पहुंचाने और आस्था को ठेस पहुंचा कर हिंदुओं का अपमान करने के उद्देश्य से कई अन्य धर्मावलंबी सार्वजनिक रूप से गोकशी करते हैं और गौ मांस खाने की पार्टियां ( बीफ फेस्टिवल) आयोजित करते हैं और सरकार असहाय साबित होती हैं. अंग्रेजी शासन में हिंदुओं का इसलिए मजाक उड़ाया जाता था कि वह गाय को माता मानते हैं.  वे अपने अल्प ज्ञान के कारण कभी यह नहीं समझ सके कि हिन्दू गौवंश का इतना सम्मान क्यों करते हैं ?

स्वतंत्रता के बाद भी तथाकथित  धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वालों ने भी बहुसंख्यक हिन्दुओं की इस धार्मिक सामाजिक और वैज्ञानिक मान्यता को बेरहमी से नजरअंदाज किया. कांग्रेसी सांसदों द्वारा गौ हत्या निषेध का बिल लाने पर नेहरू ने कहा था कि पूरे देश में गोवध निषेध का कानून लागू करना बेहद बेतुका और पिछड़ेपन का परिचायक होगा. इस बिल के विरोध में उन्होंने अपने सांसदों को धमकी देते हुए कहा था कि  यदि यह बिल पास हो जाता है तो वह अपने पद से त्यागपत्र दे देंगे. कुछ समकालीन लेखकों के अनुसार जवाहरलाल नेहरू स्वयं गौ मांस खाते थे और इसलिए वह गौ हत्या निषेध विधेयक के बिलकुल  खिलाफ थे.  


गाय और भारत की  राजनीति

भारत में राजनीतिक तुष्टिकरण का धंधा बहुत पुराना है किंतु अब यह निम्नता  के उस  स्तर तक पहुँच चुका  है जब कई राजनीतिक दल भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति पर भी सीधा आघात करने से नहीं चूकते. अयोध्या, मथुरा और  काशी के मुद्दे इसी तुष्टीकरण की पराकाष्ठा है तो हिन्दुओं की भीरुता या बर्दास्त करने की असीमित क्षमता. स्वतन्त्र भारत में गौ हत्या की निरंतरता राजनीतिक तुष्टिकरण और  केंद्र सरकार की दीन हीन स्थिति का परिचायक रही है. ऐसा नहीं है कि यह स्थिति आज आ गई है, आजादी के बाद से यही स्थित चली आ रही है .

 

गोकशी  विदेशी आक्रांताओं  ने जो पाशविक  स्वभाव के  बहसी कबीलाई और बर्बर थे, ने शुरू किया था और अंग्रेजों ने इसे चलने दिया और  हिंदुओं के लिए सबसे ज्यादा मर्माहत करने वाली शर्मनाक बात यह  है कि आजादी के बाद भी तत्कालीन सरकार ने इसे चलते रहने दिया. प्रसिद्ध साधू-सन्यासियों, पंडित मदन मोहन मालवीय सहित कई कांग्रेसी नेता चाहते थे कि गौ हत्या के लिए एक राष्ट्रव्यापी कानून बनाया जाए लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेसी नेताओं द्वारा लाए गए बिल का धमकी देकर विरोध किया था कि यदि बिल पास हो गया तो वह इस्तीफा दे देंगे. इसके पीछे का कारण केवल यह नहीं है कि उन पर स्वयं गौ मांस खाने का आरोप लगता था, बल्कि यह विशुद्ध वोटों की तुष्टिकरण नीति थी. दूसरा कारण कांग्रेस सहित सभी दलों के हिंदू नेताओं  और जनता का अत्यंत भीरू और सब कुछ सहन करनेवाला  स्वभाव था जो हजारों साल के गुलामी के कारण  आज भी बरकरार है.

दूसरे धर्मावलंबियों की धमकियों के आगे नतमस्तक होते हुए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए प्रगतिशील फैसले को रद्द करके रूढ़िवादी कानून बना दिया जाते हैं लेकिन हिंदुओं के इस देश में हिंदुओं की सुनने वाला शायद कोई नहीं है. 1966 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने साधू-सन्यासियों को वचन दिया था कि यदि उनकी  सरकार बनी  तो वह गौ हत्या बंद  करने के लिए कानून बनाएंगी किंतु बाद में वह वामपंथ इस्लामिक गठजोड़ के आगे झुक गई और अपने वायदे से मुकर गई. विरोध स्वरूप साधु सन्यासियों ने संसद के सामने विशाल प्रदर्शन किया जिसकी अगुवाई स्वामी करपात्री जी महाराज कर रहे थे. इंदिरा गांधी  ने निहत्थे साधू सन्यासियों पर गोली चलवा दी, जिससे सैकड़ों साधु मारे गए. बाद में कई साधुओं ने दिल्ली में गौ हत्या कानून बनाने के लिए आमरण अनशन करते हुए अपने प्राण त्याग दिए. 7 नवम्बर 1966 को  घटी इस घटना के बाद स्थिति जस की तस है अंतर केवल यह आया है कि कुछ राज्य सरकारों ने अपने-अपने राज्यों में गौ हत्या कानून बनाये हैं लेकिन ये  कानून भी प्रभावी नहीं है और ज्यादातर क़त्लखानों में आज भी गौ हत्या की जा रही हैं.


आश्चर्यजनक बात यह भी है कि ऐसे राज्यों जहां गौ हत्या पर प्रतिबंध है, से गोवंश की तस्करी दूसरे राज्यों में की जाती है जहां इन पर प्रतिबंध नहीं है और वहां इनका कत्ल कर दिया जाता है.  यही नहीं उत्तर भारत के कई राज्यों से गोवंश  तस्करी करके नेपाल और बांग्लादेश ले जाये  जाते हैं, और सुरक्षा एजेंसियां कुछ नहीं करती जिसका मुख्य कारण सीमा पर  भ्रष्टाचार है.  सिस्टम इतना लाचार और लचर हो गया है कि वह स्वयं देश के विरुद्ध काम कर रहा है. जब कभी गौ रक्षक ऐसे लोगों को पकड़ते हैं, तो अपना अपराध छिपाने के लिए, धर्म विशेष के लोग राजनीतिक दलों की शरण में हाय तौबा मचा कर मॉब लिंचिंग का हव्वा खड़ा करते हैं और   बहुसंख्यको को डराने का काम करते हैं.

 

गौ हत्या निषेध कानून बनाने के अलावा भी केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें गौ संरक्षण की दिशा में सक्रियता नहीं दिखा रही है और न ही गौ संरक्षण के लिए कोई प्रोत्साहन या प्रयाप्त भरण-पोषण राशि ही दी जाती है. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद यद्यपि गौ हत्या निषेध का कानून बहुत सख्ती से अमल में लाया जा रहा है और अनधिकृत रूप से चल रहे क़त्ल खानों पर लगाम लगाई गई है. इसके बहुत ही सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं और गोवंश की रक्षा की जा रही है लेकिन इसके कारण कई नई समस्याओं का भी उदय हो गया है. पर्याप्त संख्या में गौशाला ना होने के कारण, गोवंश  छुट्टा घूमते  हैं और किसानों की फसल बर्बाद करते हैं. किसान और ग्रामीण इनको वंश को पकड़कर  गौशाला में ले जाते हैं लेकिन संसाधन ना होने के कारण गौशाला संचालक इन्हें पुनः छोड़ देते हैं. ग्रामीण अंचलों में यह स्थिति अत्यंत विकराल हो रही है.


 राज्य सरकार को तुरंत इसमें हस्तक्षेप करके पर्याप्त संख्या में नई गौशालाये खोलना चाहिए और इनमें गोवंश के भरण-पोषण के लिए समुचित संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए. पूरे देश में ज्यादातर गौशालाये गो भक्तों के अंशदान से चल रही हैं लेकिन इनकी बढ़ती संख्या जो हर्ष का विषय होनी चाहिए थी वह लोगों की परेशानियों का कारण बनती जा रही है. जब तक केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारें अधिक से अधिक नई गौशालाएं  नहीं खोलती और इन्हें  आर्थिक रूप से मजबूत  नहीं करती, इस समस्या का स्थाई समाधान नहीं निकल सकता.


समय की मांग है कि सरकारें तुरंत  न केवल गौहत्या निषेध कानून  बनाए बल्कि गौसंरक्षण के लिए अधिकाधिक धन उपलब्ध कराएं अन्यथा इस दिशा में कोई विशेष  प्रगति नहीं हो सकेगी. 

                            - शिव मिश्रा 

-    लेखक भारतीय  स्टेट बैंक के सेवा निवृत्त उप महाप्रबंधक एवं समसामयिक मामलो के लेखक हैं

 

       

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