सोमवार, 20 जनवरी 2020

JNU : हिंसा छात्रों की ...... जिम्मेदारी सरकार ??

जेएनयू में हुई हिंसा के लिए केंद्रीय गृहमंत्री , प्रधानमंत्री या केंद्र सरकार को दोष देना कितना उचित है इसका निर्णय आप मेरा लेख पढ़ने के बाद करेंगे तो मेहरबानी होगी। सबसे पहले इस बात पर विचार करना चाहिए कि जेएनयू में हिंसा क्यों हुई ? हिंसा के पीछे क्या संभावित कारण हो सकते हैं ? क्या इस हिंसा का सम्बन्ध जामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से है ?

संशोधित नागरिक अधिनियम के खिलाफ दिल्ली में सबसे पहले प्रदर्शन जामिया में किए गए और इसने कुछ भी असामान्य नहीं क्योंकि हिंदुस्तान एक लोकतांत्रिक देश है और यहां विरोध करना संविधान प्रदत्त अधिकार है लेकिन अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का निर्वाहन भी बहुत जरूरी है। इसके पहले भी जामिया आतंकवादियों के मुठभेड़ के मामले में काफी चर्चा में रहा था और उसमें भी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता वादी और लोकतंत्र की रक्षा करने के नाम पर तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों ने बहुत ही घड़ियाली आंसू बहाए थे और मुठभेड़ में एक शहीद पुलिस अधिकारी के विरुद्ध भी आरोप गढ़े गए थे। एक राष्ट्रीय पार्टी की तत्कालीन अध्यक्ष भी बिलख बिलख कर रोयी थी। जामिया में CAA के विरुद्ध हुए प्रदर्शन ने हिंसा का रूप ले लिया था । उपलब्ध वीडियो फुटेज और मौके पर मौजूद पत्रकारों के अनुसार प्रदर्शनकारी अपने साथ पत्थर के टुकड़े लाए हुए थे और भी पत्थर छोटी छोटी गाड़ियों में , टेंपो आदि में भरकर लाये जा रहे थे । कई ऐसे प्रदर्शनकारी थे जिनके बैग में पत्थर भरे हुए थे और उन्होंने पत्थरों का इस्तेमाल पुलिस पर किया। कश्मीर के बाहर पुलिस पर यह अपनी तरह की पत्थरबाजी की पहली घटना है । इसके पहले पत्थरबाजी सेना और पुलिस पर केवल कश्मीर घाटी में होती थी। इस प्रदर्शन में प्रदर्शनकारी पत्थरबाजी करते हुए जामिया के कैंपस के अंदर चले गए और लगातार वहां से पत्थरबाजी होती रही। कहा जाता है कि पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने जामिया के उच्च प्रबंधन से संपर्क किया लेकिन कोई जवाब न मिलने पर पुलिस को जामिया के अंदर प्रवेश करना पड़ा और ऐसा करना इस पत्थरबाजी के रूप में हो रही आतंकवाद की इस घटना को रोकने के लिए जरूरी था। जामिया कैंपस के अंदर बड़ी मात्रा में फर्जी आईडी कार्ड बरामद किए गए जिससे पता चलता है कि प्रदर्शन और पत्थरबाजी की घटना कितनी पूर्व नियोजित थी और जामिया के अंदर नियमित स्टूडेंट्स के अलावा भी उपद्रवी लोग रहते थे या उस समय मौजूद थे। इस घटना की पीछे की साजिश का पर्दाफाश होते ही साजिशकर्ता और उनके तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रवादी लोग सक्रिय हो गए और इस पूरी घटना की भर्त्सना इस कदर की गई कि कई दिन तक टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में सुर्खियां बटोरते रहे। बहुत दुर्भाग्य पूर्ण बात है कि कुछ बड़े नेताओं ने जामिया की तुलना जलियांवाला कांड से की और विपक्ष के लगभग हर छोटे-बड़े नेता ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के खिलाफ बिगुल बजा दिया । जामिया हिंसा का प्रचार करने के लिए समाचार पत्रों, टीवी और सोशल मीडिया का भरपूर दुरुपयोग किया गया और पूरे देश में एक लहर बनाने की कोशिश की गई कि केंद्र की भाजपा सरकार छात्र विरोधी है, मुस्लिम विरोधी है, और एक निश्चित हिंदुत्व के एजेंडे पर काम कर रही है। विपक्ष के सभी राजनीतिक दलों और तथाकथित प्रगतिशील विचारों वाले लोगों और लुटियन दिल्ली की सत्ता में स्थापित कई विद्वान लोगों ने भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। अब यह परिपाटी बन गई है कि जब भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह का विरोध होता है , तथाकथित पेशेवर धर्मनिरपेक्ष संत और विद्वान लोग इतना आगे निकल जाते हैं कि उन्हें मोदी विरोध और देश विरोध में कोई अंतर समझ में नहीं आता।

जामिया के प्रदर्शन मैं जेएनयू स्टूडेंट भी शामिल हुए और उन्होंने पुलिस के खिलाफ दिल्ली पुलिस मुख्यालय घेर कर लगातार प्रदर्शन किया। जेएनयू के पेशेवर छात्रों और उनके राजनीतिक संरक्षकों ने आंदोलन को जेएनयू कैंपस तक ले आने के लिए जी तोड़ प्रयास किया और पुराने गड़े मुर्दे उखाड़े गए । एक हिंदूवादी विचारधारा से संबंधित छात्रों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। कोशिश की गई कि किसी भी तरीके से जेएनयू को पुनः आंदोलन का बड़ा केंद्र बनाया जाए। इसके लिए एक विशेष विचारधारा से संबंधित स्टूडेंट्स यूनियन ने दूसरे विचारधारा से संबंधित लोगों को चेहरे ढक कर और मास्क लगाकर आक्रमण किया। इससे कई लोगों को चोटें आई। पुलिस जेएनयू के गेट पर पहुंच गई लेकिन कहते हैं कि दूध का जला मट्ठा भी फूंक फूंक कर पीता है। जामिया कांड में पुलिस पर दोषारोपण किया गया था कि वे बिना इजाजत के कैंपस में कैसे घुसी ? जिसमें जावेद अख्तर से लेकर कई गणमान्य स्वयंभू लोग शामिल है। दिल्ली पुलिस जेएनयू के अंदर नहीं घुसी और और जेएनयू गेट पर ही योगेंद्र यादव जैसे छात्रों के परम हितैषी चिल्लाते देखे गए कि पुलिस अंदर क्यों नहीं जा रही है। और बेचारी पुलिस ! अंदर जाए तो मुश्किल और न जाए तो मुश्किल। एक बड़े नेता को इतना दुख पहुंचा की उन्होंने इस मारपीट की घटना में 26/11 याद आ गया ।

अब जेएनयू के अंदर हुई हिंसा की एक उच्चस्तरीय जांच की जा रही है और कई वीडियो और सीसीटीवी फुटेज सामने आ गए हैं जिसे पता चलता है कि इस काण्ड में कई ऐसे छात्र और छात्र संगठन शामिल है जो पुलिस और सरकार पर हिंसा का आरोप लगा रहे थे । पुलिस ने ऐसे कई छात्रों को नामजद किया है और उनसे पूछताछ की जा रही है। एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि जेएनयू स्टूडेंट का एक वर्ग बहुमुखी प्रतिभा का इतना धनी है की कई घटनाओं को नाटकीय अंदाज में अंजाम दिया जाता है जैसे कि कोई नुक्कड़ नाटक। 5 जनवरी को जेएनयू के अंदर हुई हिंसा की चपेट में बहुत से छात्र आए और कई को ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस में भर्ती कराया गया लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि उन छात्रों के वहां पहुंचने के पहले ही कई राजनेता उनकी मिजाज पुर्सी के लिए पहुंच गए थे जैसे कि उन्हें मालूम था कि अब क्या होने वाला है। कुछ चोटिल / घायल छात्रों का फोटो विश्लेषण किया गया और पाया गया कि उनमें से कई की चोटों के स्थान बदल गए है ।जिस के बाएं हाथ में पट्टी बंधी थी , दूसरे दिन वह दाएं हाथ पर पहुंच गई । कई लोगों की गंभीर चोटों के घाव जिनमें 20 से 22 टांके लगे बताए गए थे, वह एक-दो दिन में ही ठीक हो गए और वे पट्टी बांध कर टीवी इंटरव्यू देते रहे और पुलिस के विरुद्ध प्रदर्शन भी करते रहे।

इन प्रदर्शनों में जो जेएनयू से लेकर इंडिया गेट तक और शाहीन बाग से लेकर जंतर-मंतर तक फैलते रहे, धारा 370 और कश्मीर की आजादी से संबंधित पोस्टर भी लहराए गए और नारे भी लगाए गए। इन प्रदर्शनों की एक सबसे खास बात अबकी बार यह रही कि इसमें हिंदुत्व को निशाना बनाया गया जो वास्तव में धर्म नहीं है और हिंदुत्व से आजादी के नारे भी लगाए गए । भाजपा मुर्दाबाद, मोदी ,अमित शाह मुर्दाबाद के नारों से तो शायद किसी को एतराज नहीं होगा लेकिन "हिंदुत्व की कब्र खुदेगी" के नारों से पूरा देश आक्रोशित है क्योंकि हिंदुत्व, धर्म नहीं एक जीवन विधा है और हिंदुस्तान की आत्मा है। इस तरह की वीडियो फुटेज कई टीवी चैनल पर दिखाए गए हैं। इससे ऐसा लगता है कि जो प्रदर्शन जेएनयू में हुए उसमें न तो छात्रों से संबंधित कोई मुद्दे थे और न ही संशोधित नागरिक कानून से संबंधित, बल्कि चिर परिचित मुद्दे जिसके केंद्र में कश्मीर और धारा 370, हिंदू , मोदी और अमित शाह थे।


इस बीच अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी प्रदर्शन हुए और वहां भी हिंदुत्व से आजादी और सावरकर मुर्दाबाद जैसे नारे भी लगाए गए । अलीगढ़ के पुलिस अधिकारी जिनके कई वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहे हैं उनकी तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने बहुत ही अच्छे तरीके से स्टूडेंट को समझाने की कोशिश की और बिना बहुत ज्यादा बल प्रयोग किए हुए आंदोलन पर काबू पाया। यूनिवर्सिटी का प्रबंध तंत्र भी प्रशंसा का पात्र है जिसने समय रहते ही पुलिस को कैंपस में आने की छूट देकर , सार्वजनिक संपत्ति और जान माल के नुकसान को बचाने का प्रयास किया। एक और यूनिवर्सिटी में भी प्रदर्शन हुए उसका नाम है जाधवपुर यूनिवर्सिटी लेकिन उस यूनिवर्सिटी की घटनाएं मीडिया की सुर्खियां नहीं बन सकी क्योंकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री स्वयं विरोध का झंडा लेकर धरना और प्रदर्शनों की अगुवाई कर रही हैं। CAA पर तो उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ को भी एक पक्ष बनाने की अपील की, जनमत संग्रह कराने की बातें की और भी जो कुछ उनकी वोट बैंक की राजनीति के लिए आवश्यक था, कहा और किया जिससे पूरे विश्व में हिंदुस्तान की किरकिरी हुई। उनकी इन हरकतों से न केवल केंद्र सरकार बल्कि राज्य सरकार की संपत्तियों का भी अत्यधिक नुकसान हुआ। ज़ाहिर सी बात है वे मीडिया में छाई रही और जाधवपुर यूनिवर्सिटी सुर्खियों मे नहीं आ सकी। लेकिन वहां भी राज्यपाल के साथ दुर्व्यवहार, दूसरी विचारधारा के छात्रों के साथ मारपीट जैसे सभी कार्य किए गए जो जेएनयू की पहचान होते है ।

इससे यह अंदाजा लगाना बहुत आसान है कि यह प्रदर्शन चिर परिचित प्रदर्शन है और इनके पीछे वही शक्तियां काम कर रही हैं जो हिंदू और मुसलमान को बांटना चाहते हैं और पूरे देश में अराजकता की स्थिति लाना चाहती हैं। ऐसा करने वाले कौन लोग हो सकते हैं ? उत्तर बहुत आसान है ऐसा करने वाले हमारे पड़ोसी देश हो सकते हैं और ऐसे देश हो सकते हैं जो भारत को फलता फूलता नहीं देख सकते जिन्हें भारत में हो रही प्रगति बर्दाश्त नहीं हो सकती। ऐसे देश और ऐसी संस्थाएं इस तरह के आंदोलनों को बढ़ावा दे रही हैं और उसमें अनाप-शनाप पैसा भी खर्च कर रही है। और कुछ राजनैतिक दल जिन की दुकानें बंद हो चली है और कई ऐसे बिचौलिए है जो छोटे-मोटे ठेकों से लेकर रक्षा सौदा तक दलाली करते थे वह भी बेरोजगार हो गए हैं एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल तो सत्ता की आकांक्षा में कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार है , चाहे मोदी के विरुद्ध विदेशों में प्रदर्शन करना पड़े , चाहे पाकिस्तान का साथ देना पड़े या पूरे देश को आग के हवाले करना पड़े। और तो और चाहे देश का एक और विभाजन करना पड़े......सत्ता चाहिए।

क्या 2014 से पहले किसीको मालूम था कि ....

जेएनयू में राष्ट्र विरोधी नारे भी लगाए जाते हैं?
जेएनयू में 40 से 50 साल की उम्र तक छात्र पढ़ते हैं?
जेएनयू में शिक्षक भी हड़ताल और धरना प्रदर्शन में शामिल हो जाते है?
जेएनयू में हिंदू धर्म को खुलेआम गाली दी जाती है?
जेएनयू में खुलेआम हिंदुस्तान से आजादी की मांग की जाती है?
जेएनयू वामपंथी विचारधारा का गढ़ है जहां पढ़ाई लिखाई और राष्ट्रहित के कामों से बामपंथी विचारधारा सर्वोपरि है?

आज जेएनयू सहित कई ऐसी संस्थाएं इस देश में है जो देश के हितों के विरुद्ध काम कर रही हैं और इनमें अराजकता की फैक्ट्रियां चल रही है इन्हें चलाने वाले उसी विचारधारा के लोग हैं जो कभी विभाजन से पहले मुस्लिम लीग की विचारधारा थी । इन्हें देश से कुछ मतलब नहीं है , देश के लोगों से कुछ भी लेना देना नहीं है इन्हें सिर्फ आज की चिंता है यह लोग वर्तमान में जीने वाले लोग हैं ये अपने आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी नहीं सोचते हैं। देश बचेगा या नहीं बचेगा इनकी समझ से बाहर है और शायद इसीलिए ये कश्मीर कीआजादी , टुकड़े-टुकड़े गैंग की हिमायत , आतंकवादियों के मानवीय अधिकारों की वकालत, हिंदुत्व की कब्र खोदने के नारे लगाने का काम कर रहे हैं और संविधान बचाने की कसमें खा रहे हैं । पर वास्तविकता में सिर्फ और सिर्फ इनका स्वार्थ है। रही बात मोदी की ? तो कौन खुश है इस व्यक्ति से ? न विपक्ष के लोग, न अपनी पार्टी के लोग, न नौकरशाह , न पत्रकार और न ही न्यायपालिका । क्या यह व्यक्ति जो कर रहा है वह सिर्फ अपने लिए कर रहा है ? अपने स्वार्थ के लिए कर रहा है ? नहीं ये यह भारत के भविष्य के लिए कर रहा है, भावी पीढ़ियों के लिए कर रहा है, भारत बचाने केलिए कर रहा है क्योंकि जब भारत ही नहीं बचेगा तो कुछ भी करने का क्या फायदा ? ये लोगो को समझ में नहीं आ रहा। और अमित शाह ..........वह केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के साथ पूरी मजबूती से खड़ा हुआ है। देश के लिए वह काम कर रहा है , वह कार्य जो पिछले 70 सालों में कोई करने की हिम्मत नहीं जुटा सका । देश की अधिसंख्य जनता इन कार्यों की बड़ी शिद्दत और उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रही थी और यही शक्ति है जो मोदी और अमित शाह के साथ है। हमें एकजुट होकर इनका इस्तीफा मांगने की जरूरत नहीं है बल्कि सामूहिक रूप से इनका उत्साहवर्धन करने की जरूरत है , हर उस कार्य के लिए जिससे देश मजबूत होता हो , तुष्टिकरण समाप्त होता हो, हिंदुत्व जो धर्म नहीं जीने की कला है , जीवन जीने की एक कला है, हिंदुस्तान की आत्मा है , की रक्षा हो सके। भारतवर्ष अपने पुराने गौरव को पुनः प्राप्त कर सके।
याद रखिए आज देश में लगभग वैसी ही परिस्थितियां हैं जैसे विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण के समय थी। जब हिंदुस्तान के राजा आपस में एकजुट नहीं थे , देश में एकजुटता नहीं थी और जिसका फायदा उठाकर आक्रांताओंं ने इस देश की आत्मा को छलनी कर दिया और देश हजारों साल तक गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा रहा। आज .........आप की एक गलती , आपकी आने वाली पीढ़ियों को फिर से दासता की दहलीज के अंदर धकेल सकती है ।

बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

विपक्ष ने देश को किया शर्मसार

आज कुछ राजनैतिक दलों ने, जिसमे कुछ का दिल पकिस्तान के काफी नजदीक हैं, ने मीटिंग कर पाकिस्तान को एक नया हथियार दे दिया है . राहुल की अगुआई में पढ़े गए एक वक्तब्य में पुलवामा के शहीदों के राजनीतिकरण के लिए सरकार की निंदा के गयी . यानी ४५ जवानों की शहादत के बाद सरकार को जैश के ठिकाने ध्वस्त नहीं करने चाहिए थे क्योंकि ऐसा न हो कि मोदी को कोई राजनैतिक फायदा हो जाये और उन्हें नुकसान.
राहुल की विद्वता पर तो किसी को कोई संदेह नहीं है, सभी जानते हैं किन्तु चन्द्र बाबू नायडू , ममता आदि को क्या कहा जाय जो आज राहुल के पिछलग्गू हो गए ? आज राहुल पाकिस्तान और हिन्दुस्तान दोनों जगह हेड लाइंस में हैं . पकिस्तान की सेना का खोया विश्वाश लौटने लगा है . हिन्दुस्तान के विपक्ष के समर्थन से उनके चेहरे पर मुस्कान आ गयी है. क्या देश को लोग वेबकूफ है जो ये नहीं समझ पाएंगे कि मोदी विरोध और राष्ट्र विरोध में क्या अंतर है ?
इसके पहले पकिस्तान द्वारा जितने भी आक्रमण / अतिक्रमण हुए , विपक्ष ने हमेशा सरकार का साथ दिया क्योकि यदि सरकार का मनोबल कमजोर होगा तो पकिस्तान के खिलाफ कोइ सख्त कदम नहीं उठाया जा सकेगा जिससे सैनिको का मनोबल टूटेगा और ये युद्ध जीता नहीं जा सकेगा .
आज सेना की जीत को विपक्ष ने लगभग हार में बदल दिया . ऐसे समय जब पूरा विश्व हिन्दुस्तान का समर्थन कर रहा है , हिन्दुस्तान का विपक्ष, हिन्दुस्तान के विरोध में उतर कर देश को शर्मसार कर रहा है .

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

कांग्रेस का महाभियोग ......या महाभूल ....


कांग्रेस और उनके सात सहयोगी दलों के राज्यसभा सदस्यों ने सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायधीश श्री दीपक मिश्र के विरुद्ध महा अभियोग प्रस्ताव जो प्रस्ताव लाया था उसे उप राट्रपति ने अस्वीकार कर एक बड़े नाटक पटाक्षेप कर दिया . सुगबुगाहट तो बहुत दिनों से थी लेकिन इसे तब लाया गया जब दीपक मिश्र ने जज लोया की मौत के पुन: जाँच से इंकार कर दिया . आखिर क्या मनसा है कांग्रेस की .
चीफ जस्टिस 2 अक्टूबर को रिटायर होने वाले हैं और कांग्रेस के सहयोगी दलों के पास इतनी संख्या बल नहीं कि महाभियोग पास करा सकें तो फिर ये महाभियोग का नाटक क्यों? क्या इसका एकमात्र मकसद न्याय पालिका को धमकाना है कि अगर कांग्रेस की मांग नहीं मानी तो इज्जत बेइज्जत करेंगे और उन पर आरएसएस और बीजेपी का ठप्पा लगा देंगे ताकि भविष्य में उन्हें कोइ पद और प्रतिष्ठा न मिल सके . इस तरह के हथकंडे भारत जैसे विशाल देश में बहुत काम करते है . जिलों और तहसील स्तर पर यही हो रहा है . अधिकांश अधिकारी हार मान लेते है क्योकि कोई लफड़े में पड़ना नहीं चाहता . मै स्वयं जिलों में पोस्टिंग के दौरान ऐसा महसूस करता रहा हूँ.
राम मंदिरमुद्दे की सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल मामले की सुनवाई २०१९ के बाद करे जिसे दीपक मिश्रा की बेंच ने नही माना और कांग्रेस के निशाने पर आ गए . स्वाभाविक लगता है कि ये महाभियोग का पूरा नाटक मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल के दिमाग की उपज है।
दरअसल राम मंदिर पर नियमित सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में शुरू होने वाली है और उस बेंच को यही दीपक मिश्रा ही लीड करने वाले हैं. सुनवाई तेज़ी से होगी और चूंकि सारे साक्ष्य चाहे वो लैंड रिकार्ड्स हो या पुरातात्विक सब हिन्दू पक्ष में हैं। कांग्रेस को डर है राम मंदिर के पक्ष में फैसला 2019 के चुनाव से पहले आया तो सीधा फायदा बीजेपी को होगा।फिर आखिर महाभियोग से क्या होगा? अगर उप राट्रपति ने इसकी जाँच शुरू कर दी होती या जब सदन में महाभियोग का प्रस्ताव रखा जाता तो नियमानुसार मुख्य न्यायाधीश किसी केस की सुनवाई तब तक न कर सकते जब तक जाँच पूरी न हो और प्रस्ताव पर वोटिंग न हो। कांग्रेस जानती है के जाँच में समय लगेगा और जब तक वोटिंग होगी 3 महीने गुज़र चुके होंगे। उसे पता है के महाभियोग का प्रस्ताव गिर जाएगा लेकिन तब तक केस का काफी समय बर्बाद हो चुका होगा फिर दीपक मिश्रा के पास इतना समय नही होगा के अपने रिटायरमेंट तक केस को निपटा पाएं। 2 अक्टूबर के बाद मुख्य न्यायाधीश बनेंगे रंजन गोगोई । बाकी खेल क्या होगा कहने की ज़रूरत नही है। क्या कांग्रेस राम मंदिर निर्माण रुकवाने के लिए इतना नीचे गिर रही है ?
सबसे अच्छी बात ये रही कि कई कांग्रेस जनों ने भी महा अभियोग का साथ नहीं दिया . अब पूरे नाटक का पटाक्षेप हो गया है ऐसा नहीं है क्योकि कपिल सिब्बल ने कहा है वे उप राष्ट्रपति के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जायेंगे . किसी ऐसी बेंच के सामने उपस्थिति नहीं होंगे जिसमे दीपक मिश्र हों . जाहिर है संवैधानिक पदों पर बैठे लोगो की लानत मलानत करने, डराने धमकाने की निम्न स्तरीय राजनीति अभी होती रहेगी . उन्हें किसी का भी भरोसा नहीं चाहे वह न्यायपालिका हो, सीबीआई हो, राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति हों, लोकसभा या राज्यसभा के अध्यक्ष या उपसभापति हों या राज्यपाल हों . जबतक कांग्रेस के पक्ष में फैसला नहीं तब तक उसका विश्वास नहीं.

शायद हिंदुस्तान और इसके लोकतंत्र की अभी और दुर्गति होना बाकी है. 
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मंगलवार, 20 मार्च 2018

नवरात्रि का तीसरा दिन : मां चंद्रघंटा


आज नवरात्रि का तीसरा दिन है .

या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नमः।"
माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन 'मणिपूर' चक्र में प्रविष्ट होता है।
पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता | प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता”
नवरात्र के तीसरे दिन का महत्व
अपने चंद्रघंटा स्वरूप में मां परम शांतिदायक और कल्याणकारी हैं. उनके मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र है. इसलिए मां के इस रूप को चंद्रघण्टा कहा जाता है. इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है. इनका वाहन सिंह है. इनके दसों हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं और इनकी मुद्रा युद्ध की मुद्रा है. मां चंद्रघंटा तंभ साधना में मणिपुर चक्र को नियंत्रित करती है और ज्योतिष में इनका संबंध मंगल ग्रह से होता है. इनकी पूजा करने से भय से मुक्ति मिलती है और अपार साहस प्राप्त होता है. माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है।माँ का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है। इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति-गुण की वृद्धि होती है। स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है। माँ चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं।
माँ के आराधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से दिखाई नहीं देती, किन्तु साधक और उसके संपर्क में आने वाले लोग इस बात का अनुभव भली-भाँति करते रहते हैं

माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं।

या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नमः।"
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।
इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए। भोजन में दही और हलवा खिलाएँ। भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए
कैसे करें पूजन
मां चंद्रघंटा को लाल फूल चढ़ाएं, लाल सेब और गुड़ चढाएं, घंटा बजाकर पूजा करें, ढोल और नगाड़े बजाकर पूजा और आरती करें, शुत्रुओं की हार होगी. इस दिन गाय के दूध का प्रसाद चढ़ाने का विशेष विधान है. इससे हर तरह के दुखों से मुक्ति मिलती है.
मां चंद्रघंटा के इस मंत्र का करें जाप:
पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते महयं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।
इस मंत्र का जाप भी होता है शुभकारी:
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः
माँ चंद्रघंटा  माँ पार्वती का सुहागिन स्वरुप है. इस स्वरुप में माँ के मस्तक पर घंटे के आकार  का चंद्रमा सुशोभित है इसीलिए इनका  नाम चन्द्र घंटा पड़ा. माँ चंद्रघंटा की आराधना करने वालों का अहंकार नष्ट होता है एवं उनको असीम शांति और वैभवता की प्राप्ति होती है.  माँ चंद्रघंटा के ध्यान मंत्र, स्तोत्र एवं कवच पाठ से साधक का मणिपुर चक्र जागृत होता है जिससे  साधक को  सांसारिक कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है. 
प्रथम नवरात्र के वस्त्रों का रंग एवं प्रसाद
नवरात्र के तीसरे दिन आप पूजा में हरे  रंग के वस्त्रों का प्रयोग कर  सकते हैं. यह दिन ब्रहस्पति पूजा के लिए सर्वोत्तम दिन है. तीसरे  नवरात्रि के दिन दूध या दूध से बनी मिठाई अथवा खीर का भोग माँ को लगाकर ब्राह्मण को दान करें। इससे जीवन में  सभी  प्रकार के कष्टों का निवारण होता है
ध्यान मंत्र
वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥
स्तोत्र पाठ
आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

कवच
रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥



रविवार, 28 जनवरी 2018

दर्द है ..जो रह रह कर छलकता है .....

रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन का कार्य काल मोदी सरकार ने नहीं बढ़ाया था . कारण चाहे जो भी हों लेकिन उन्होंने इसे सहजता से नहीं लिया था और कुछ विशेष राजनैतिक पार्टियों ने ऐसा माहौल बना दिया था कि मानों देश बिना रघुराम राजन के नहीं चल सकता था और राजन सिर्फ देश सेवा के लिए ही विदेश से यहाँ आये थे और उनका कार्यकाल न बढ़ाना शायद मोदी जी का देश विरोधी काम था . स्वाभाविक है, दर्द तो होना ही था . अब जब भी मौका मिलता है वे वर्तमान सरकार की निंदा करना नहीं भूलते . अक्सर बुद्धजीवी तरह के लोग ऐसा करते हैं और उनकी यही आदत उन्हें सामान्य व्यक्ति से भी कम कर देती है . अतीत में हमने कई अमर्त्यसेन भी देखे हैं .


प्रधान मंत्री मोदी के बाद रघुराम राजन भी दावोस पहुंचे और उन्होने मोदी के भाषण सहित हिन्दुस्तान की अर्थ व्यवस्था की गहन समीक्षा कर उसके नकारात्मक पहलुओं को प्रस्तुत किया . यहाँ यह ध्यान रखना उचित है कि अब उनकी पहचान भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर की होती है न कि किसी अमेरिकन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर की . अबकी बार उन्होंने अपने वक्तव्यों के राजनैतिक पुट भी दे दिया और मोदी ने जो लोकतान्त्रिक और विकाशशील हिंदुस्तान की झलक पेश की थी उस पर सवाल उठाये . उन्होंने मोदी के वक्तव्य " भारत में लोकतंत्र बहुरंगी आबादी और गतिशीलता देश का भाग्य तय कर रहें हैं और इसे विकाश के रस्ते पर ले जा रहे हैं ." की जमकर धाज्जिया उडाई . उन्होंने संदेह व्यक्त किया कि मोदी सरकार का काम काज लोकतान्त्रिक है ? उन्होंने कहा कि सरकार में सिर्फ कुछ लोग फैसले लेते हैं और नौकरशाहों को दरकिनार कर दिया गया है . समझा जा सकता है कि कांग्रेस और राजन का सूचना श्रोत एक ही है .


विश्व पटल पर हिन्दुस्तान की नकारात्मक छवि पेश करने से सभी को बचना चाहिए भले ही कितने ही राजनैतिक मतभेद क्यों न हों . 
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शनिवार, 9 सितंबर 2017

डिज़ाइनर नेता और स्तरहीन पत्रकारिता

डिज़ाइनर नेता और स्तरहीन पत्रकारिता

गौरी लंकेश की हत्या के बाद अवार्ड वापसी गैंग एक बार फिर सक्रिय हो गयी और इस बार कई डिज़ाइनर नेता भी खुलकर मैदान में आ गए और उन्होंने आरएसएस और बेजीपी के आलावा प्रधानमंत्री मोदी को भी सीधे लपेट लिया . दूसरे दिन मुम्बई, दिल्ली और बंगलौर में कैंडिल मार्च हुआ और एक जैसी मोम् बत्तिया जैसे वे एक ही जगह बनी हों और फिल्म के किसी सीन की तरह अनुशासित निर्देशन में प्रदर्शन कारी रोते बिलखते देखने को मिले.          
            गौरी जैसे पत्रकार की हत्या निंदनीय है और इसकी जाँच कर अपराधियों को सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए. उ.प्र.  और बिहार में हाल ही में कई पत्रकारों की न्रशंस हत्या की गयी लेकिन अफ़सोस ! न कोई डिज़ाइनर नेता और न ही कोई मोमबत्ती धारी प्रदर्शन कारी कहीं दिखाई पड़ा . ये भेद क्यों ?


            गौरी लंकेश कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरामैय्या की बहुत नजदीकी मित्र थी और उनके राज्य में पोश इलाके में उनकी हत्या की गयी जो बेहद दुखदायी है. जब उन्हें धमकियाँ मिल रही थी और  उनकी जान को खतरा था, तो मुख्यमंत्री ने उन्हें सुरक्षा क्यों नहीं दी ? जिस दिन उनकी हत्या हुई वे मुख्य मंत्री से मिल कर आ रही थी. बताया जाता है कि वे एक गुप्त मिशन पर थी और उनके भाई ने बताया कि ये गुप्त मिशन था कई नक्सली नेताओं को आत्म समर्पण कराना और इसलिए वे कुछ नक्सलियों के निशाने पर थी . किन्तु सिद्धरामैय्या सहित सभी ने देश में बढ़ रही असहिष्णुता और प्रधान मंत्री मोदी को इस ह्त्या का इसका जिम्मेदार बताया . गौरी को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गयी  और पुलिस ने उन्हें सलामी दी.


ओम थानवी, रबीश कुमार और दिग्विजय सिंह जैसे लोगों ने कपडे उतार कर नागिन डांस किया. टी आर पी  को लालाइत कुछ टी वी चैनलों  ने घंटो बहस की और एक छोटी सी साप्ताहिक मैगजीन “गौरी लंकेश” जिसकी कीमत रु. १५ और खरीदार पता नहीं कितने थे, के पत्रकार को राष्ट्रीय हीरो बना दिया. जाहिर है ये मग्जीन बिना पैसे के नहीं चल सकती, इसके श्रोत क्या है ? इसका स्तेमाल एक विशेष विचारधारा जो राष्ट्र भक्तों को कठघरे में खड़ा कर सके , के प्रचार और प्रसार के लिए किया जाता था. गौरी जो वामपंथी थी, को एक बीजेपी नेता के बारे में मिथ्या समाचार प्रकाशित करने के अपराध में अभी हाल ही  में ६ महीने के जेल की सजा सुनाई गयी थी  और वे जमानत पर थीं. वामपंथियों के पास अब सिवाय आडम्बर के और कुछ नहीं बचा है. एक सजायाफ्ता पत्रकार के प्रति एक राजनैतिक दल की इतनी हमदर्दी ... कुछ तो गड़बड़ है .


                    एस आई टी ने संकेत दिए हैं कि उनकी हत्या नक्सलियों ने की हो सकती है . 

लेकिन जो लोग हिट  एंड रन करके चले गए उनका क्या किया जाय ? 

 राजनीति और पत्रकारिता कितना  नीचे गिरेगी ? क्या कोई भविष्य वाणी कर सकता है ?  

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शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

भारत में भटक रही है रघुराम राजन की आत्मा ......

भारत में भटक रही है रघुराम राजन की आत्मा ......


क्या मोदी सरकार द्वारा उनका कार्यकाल न बढ़ाये जाने का फैसला सही था ?


यों तो रघुराम राजन को रिज़र्व बैंक का गवर्नर पद छोड़े हुए काफी समय हो गया है . पद छोड़ते हुए उन्होने अध्यापन को अपना पसंदीदा कार्य बताया था और इसीलिये जहाँ से आये थे वहीं चले गए थे . अक्सर किसी न किसी बहाने अनचाहे और आवंछित बयान देकर वे भारत में सुर्खिया बटोरते रहते हैं. मुद्दा चाहे नोट बंदी का हो या असहिष्णुता और सहन शीलता का, वे जब बोलते हैं तो उनका दर्द छलकता है . हाल ही में गौरी लंकेश हत्या पर बोलते हुए उन्होंने भारत की आर्थिक प्रगति को सहनशीलता से जोड़ दिया . कई बार उनकी टिप्पड़ी और पी चिदंबरम की टिप्पड़ी में कोइ अंतर नहीं होता है . 


उन्होंने अपने बयानों से सिद्ध कर दिया कि मोदी सर कार द्वारा उनका कार्यकाल न बढ़ाये जाने का फैसला शायद सही फैसला था.


देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था

भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ल...