बुधवार, 14 अगस्त 2013

अब तो कानून भी अपना काम नही कर पा रहा है


सुनते सुनते यह बात रट  गयी  है कि कानून अपना काम करता है और राजनीतिज्ञ तो हमेशा  जब कभी फंस जाते है तो कहते हैं  कि कानून अपना काम करेगा।  यद्यपि कानून के रास्ते में राजनीतिज्ञों द्वारा ही हजार बाधायें खडी  की जाती रहीं हैं ताकि कानून   सही तरह से अपना काम न कर पा और अगर करे भी तो जितनी देर हो सके उतनी देर की जाय।  इसका नतीजा ये होता है  क़ि साधारण व्यक्ति को अपने लिए न्याय की आशा लगभग धूमिल लागने लगती है   धीरे धीरे लोग न्यायालयों मे लगने वाले अत्यधिक समय के कारण न्याय की गुहार करने से कतराते है । फिर भी सर्वोच्च न्यायालय देश के लिए आज के हालत मे एकमात्र आशा  की किरण है । समान्यतया राजनैतिक दल सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान करते रहे है। न्यायालय के निर्णय बहुत दूरगामी प्रभावों वाले होते हैं । सर्वोच्च न्यायालय की संविधान की रक्षा की ज़िम्मेदारी भी है इसलिए अनेक मौकों पर न्यायालय ने सरकार द्वारा बनाए गए असंवैधानिक क़ानूनों पर रोक भी लगाई है । पिछले कुछ समय से ज़्यादातर राजनैतिक दल संकोच छोड़ सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयो के खिलाफ खुल कर बोलने लगे है और ये प्रथा बढ़ती ही जा रही है ।

अब  एक और चलन चल पड़ा है  जिसमे सारे राजनैतिक दल सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध खड़े हो जाते है । ऐसे मामले या तो सारे राजनैतिक दलों को प्रभवित करते है या फिर इनके वोट बैंक को प्रभावित करते है या ये दल अपने विरोध से अपने वोट बैंक का तुष्टीकरण करना चाहते है। स्पष्ट है कि सारी राजनीति वोट बैंक की है । देश के लिए कौन सोचता है ये सिर्फ सोचने की बात रह गई है। संसद मे किसी भी मुद्दे पर साथ न खड़े होने वाले  धुर विरोधी दल ऐसे कुछ मामलों मे “हम साथ साथ हैं” की तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। ऐसे मुद्दों पर ये दल संविधान संशोधन के लिए भी तैयार हो जाते है जिसके लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है । ये स्थिति हिंदुस्तान के लिए बिलकुल भी अच्छी नहीं है और लोकतन्त्र के लिए तो कतई नहीं ।
भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान मे विशेषज्ञ डाक्टरों मे आरक्षण की व्यवस्था न किए जाने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर राजनैतिक दलों ने बड़ी तीखी  प्रतिक्रिया व्यक्ति की है और सारे दलों ने निर्णय लिया है कि सरकार सर्वोच्च न्यायालय मे पुनरीक्षण याचिका दाखिल करे और इस निर्णय पर पुनर्विचार करे । अगर सर्वोच्च न्यायालय इस पर पुनर्विचार न करे तो संविधान संशोधन के जरिये इसे निरस्त कर दिया जाय ।
दूसरा मामला है सूचना के अधिकार से जुड़ा हुआ है । तमाम अनावश्यक आवेदनों और उस पर होने वाले व्यर्थ पत्राचार के वावजूद ये बहुत ही लोकप्रिय और प्रभावी कानून है । इससे सरकारी कामकाज मे पारदर्शिता को बढ़ावा मिला है और लोकसेवक इससे भय खाते है। धीरे धीरे इसकी स्वीकार्यता जनता और संबंधित विभागो मे बहुत  अधिक हो गई है । आज के दिन ये सबसे लोकप्रिय क़ानूनों मे से एक है । किन्तु राजनैतिक दलों पर इसे लागू किए जाने के मुद्दे पर सारे दल एक हो गए है और शीघ्र ही संसद एक कानून पारित करने वाला है जिससे ये कानून राजनैतिक दलों पर लागू नही हो सकेगा ।
 
तीसरा मामला है सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दो साल की सजा पाये व्यक्तियों और जेल से चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया जाना। इस निर्णय के खिलाफ भी सारे दल लामबंद है और इसे भी निरस्त करने की फिराक मे है । क्या 125 करोड़ से अधिक की आबादी वाले इस देश मे संसद के लिए 545 साफ सुथरे व्यक्ति नाही मिल सकते । कितने दुख की बात है कि सारे राजनैतिक दल आम जनता के हित के किसी भी मुद्दे पर एकसाथ नही खड़े होते पर ऐसे मुद्दे पर सब साथ साथ है।

लोकतन्त्र मे सारे दलो का ऐसे मुद्दो पर एक साथ खड़े होना खतरे की घंटी है । सारे राजनैतिक दलों और आम जनता को इस पर गंभीरता पूर्वक  विचार करना चाहिए ।कम से कम इस पर तो जरूर विचार करना चाहिए कि क्या सर्वोच्च न्यायालय का इस तरह के निर्णय देने के पीछे कोई स्वार्थ है ? नहीं । स्वार्थ नही हो सकता और स्वार्थ नही है यह एक साधारण मनुष्य तुरंत समझ जाएगा । निस्वार्थ भाव से किए गए निर्णय कभी गलत नहीं होते । ऐसे निर्णयों का सम्मान किया जाना चाहिए और ऐसे निर्णय लेने वालों का सम्मान किया जाना चाहिए । अगर हिंदुस्तान को बचाना  है तो हमें ऐसा करना सीखना होगा और ऐसा करना होगा । स्वार्थ तो राजनैतिक दलों का हो सकता है राजनैतिक  चस्मे का हो सकता है । राजनैतिक दलों को भी निस्वार्थ भाव से सोचना चाहिए तभी ये देश बच सकेगा और बचाया जा सकेगा ।

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शिव प्रकाश मिश्रा 

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

पुंछ के शहीदों को नमन

सरहद ने फिर  जख्म खाये हैं,
देश के पाँच वीर पुंछ से शहीद होकर आए हैं,
“ पाकिस्तान और आतंकवादियों की कायराना हरकत जैसे ”
कई बयान एक साथ आए है,
राजनेताओं से,
भारत मे यह एक चलन है ,
पिछले काफी समय से ,
जिसे हर विदेशी और आतंकवादी आक्रमण के बाद,
राज नेता करते आए है ।
इतिहास गवाह है,
आक्रमणकारी कभी कायर नही कहलाते ।  
कायर तो वो कहलाते हैं
जो आक्रमण का मुंह तोड़ जबाब नहीं दे पाते ।
अगर ये आक्रमण कायरता है,
तो पराक्रम  क्या है ?
पाकिस्तान  का बचाव करना,
खामोश रहना,
या समर्पण करना,
अगर यही सच है,
तो ये पराक्रम की उल्टी पराकाष्ठा है,
और  बेहद गैर जिम्मेदाराना है,
सच तो ये है कि ऐसे हमलों को
कायराना कहना ही कायराना है।
क्या हिंदुस्तान इतना
कमजोर है ?
असहाय है ?
लाचार है ?
पर दुनियाँ को संदेश तो यही गया है
कि यह देश बहुत बदहाल हो गया है ।   
पूरा विश्व जनता है कि
पाक है नापाक आक्रमणकारी,
और भारत है उतना ही कुख्यात वार्ताकारी ।
आखिर वार्ता क्यों हो और किसलिए ?
अगर हो ... तो सिर्फ इसलिए
कि बस .... बहुत हो गया
अब बात नहीं हो सकती
सीमा पर एक भी और हरकत
बर्दाश्त नहीं हो सकती,
अब पराक्रम दिखाने का वक्त आ गया है
दुश्मन को करारा जबाब देने का वक्त आ गया है  
पता नहीं ये वोटो की राजनीति है,
या शान्ति दूत दिखने का जोश,
वे सीमा पर जवानों के सिर भी
कलम कर ले जाते है
हम फिर भी रहते है खामोश,
इससे ज्यादा शर्मनाक स्थिति
और कुछ नहीं हो सकती है,
पर  भारत की राजनीति
सत्ता के लिए कुछ भी कर सकती है,    
एक राजनेता कहते है कि
लोग सेना मे शहीद होने के लिए ही जाते है,
और इसी की तनख्वाह पाते है,
संवेदन शून्य इन नेताओं के बेटे,
न तो सेना मे जाते है,
और न ही शहीद होते है,
वे चाहे देश मे पढे या विदेश मे ,
इंजीनियर हो या डाक्टर ,
बनते हैं सिर्फ वोटो के सौदागर,
और लाशों पर पैर रख कर,  
सत्ता की सीढिया चढ जाते हैं ,
मंत्री हो जाते है शासक बन जाते हैं,
आँसुओ से भीगी शहीदो की दहलीजों को
और अधिक मर्माहत कर जाते हैं ।
गुस्से मे उबलते
और वेवसी की आग मे जलते
शहीदो के इन परिवारो को सांत्वना और
सम्मान चाहिए ,
समूचे देश को इन परिवारों के आँसुओ का
और
इन शहीदो के बलिदानों का
हिसाब चाहिए,
ताकि ये बलिदान व्यर्थ न जाय  
और कभी कमी न हो जाय
देश पर जान देने वालों की,
और शहीदो के सम्मान की
रक्षा करने वालों की ।

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शिव प्रकाश मिश्रा
 

 



 



शनिवार, 3 अगस्त 2013

रिश्ते और रास्ते



रिश्ते प्यार के,

और रस्ते पहाड़ के,

कभी  बिल्कुल  आसान

तो  नही होते ।

कभी आंधी, कभी तूफान,

कभी धूप, कभी  छांव ,

 तो कभी  साफ आसमान

नहीं   होते ।  

थोड़ी सी बेचैनी से,

सैलाब उमड़ पड़ते है अक्सर,

और आंखे भी निचोड़ी जाय,

तो कभी  आँसू नहीं होते  ।  


प्यार एक धर्म है,
मर मिटने का ,
जिसमें  मर्म हैं  हर कर्म के ,  
पर हर कर्म के
विधि, विधान और संविधान

 नही होते ।

भावनाओं की,
कभी बैलेंस शीट बनाई नहीं जाती,     
निवेश के समानुपात लाभ  मिले,
ऐसी आश भी लगाई नहीं  जाती,  

कौन समझा है किसे ? और कितना ?
ये समझ कर ही तो ,
दिल की हर बात बताई नही जाती  ।  

सच्चाई क्या है ? कैसी है ?
ठीक अहसास  नहीं देती  है,  
अब तो अपनी ही नजर
काफी कमजोर हुई लगती है ।

दिल है बोझिल,
तो गनीमत है, कुछ मिल सकता है इससे ,

बहुत बेचैन  है,   

परेशान है हर शहर , अपने  खालीपन से ॥    

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       शिव प्रकाश मिश्रा

शुक्रवार, 2 अगस्त 2013

कितना मुश्किल है ? ईमानदार रहना और बेईमान बनना…….

दुनिया मे बहुत से काम मुश्किल है और बहुत सी चीजे प्राप्त करना मुश्किल है। जीवन मे कुछ चीजे व कुछ स्टैंडर्ड सदैव बनाए रखना और भी मुश्किल है। ऐसी ही एक चीज है ईमानदारी जिसे बनाए रखना बहुत ही मुश्किल है (हिंदुस्तान मे )। ईमानदार लोगो की संख्या बहुत ही कम होती जा रही है और ये तेजी से घटती जा रही है । बहुत संभव है की निकट भविष्य मे ये प्रजाति विलुप्त हो जाय ।
         ईमानदारी का दर्द मै अच्छी तरह समझता  हूँ और आप मे से ज़्यादातर लोग भी समझते होंगे। सार्वजनिक जीवन मे ऐसे लोग हमेशा तलवार की धार पर चल रहे होते है। जाहिर है ऐसे व्यक्तियों का स्वयं और उनके परिवार का जीवन हमेशा खतरों से भरा हुआ होता है। ईमानदारी सिर्फ रिश्वत खोर न होने से नही बनती बल्कि इसका व्यापक क्षेत्र है।  जिसमे नियम,कानून और पूर्ण निष्ठा के साथ अपने कर्तव्यो का निर्वहन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है । आज के परिस्थितयो मे ईमानदार  व्यक्ति सिर्फ जनता के कुछ लोगो का ही कोप भाजन नहीं बनते बरन कभी कभी अपने परिवार के लोगो की नाराजगी का शिकार भी  होते है। ऐसे व्यक्ति जिंनका परिवार भी उनके साथ होता है और समाज के कुछ लोग भी उनके साथ होते है ,चट्टान की तरह अडिग रहते है और लगातार पूरी निष्ठा से अपना कर्तव्य पालन करते रहते है । हमेशा छोटे छोटे सम्बल लंबे संघर्ष की ऊर्जा प्रदान करते रहते है ।
         संघर्ष मे ईमानदार व्यक्तियों के टूट जाने की भी सदा से  लंबी फेहरिस्त होती आई है जिन्हे आम लोग ढ़ोंगी या छुपा रुस्तम कह कर अफसोस करते है और भूल जाते है। जब इन व्यक्तियों को सम्बल की जरूरत थी उस समय शायद कोई भी नैतिक  समर्थन मे  खड़ा होने को तैयार नही था ।
         पैसा,पद और प्रतिष्ठा का लालच कैसा वातावरण तैयार कर रहा है इसकी बानगी आप पूरे देश मे कहीं  भी देख सकते है। ऐसे लोगों की संख्या बहुत है जिन्होने जीवन  मे कभी रिश्वत नही ली लेकिन ऐसे लोग की संख्या बहुत कम है जिन्होने कभी रिश्वत नही दी। आज की परस्थितियों मे मजबूरी बस दी जाने वाली रिश्वत की  ज़्यादातर लोगों ने आदत बना ली है। बल्कि कई बार कुछ चर्चित विभागो मे बिना कुछ दिये कम हो जाने पर बहुत आश्चर्य होता है । सार्वजनिक जीवन मे कई ईमानदार अधिकारियों के साथ हास्यपाद स्थिति भी आती है जब जिसका काम हो जाता है बिना मांगे ही रिश्वत  देने का प्रस्ताव करता है जैसे काम कराने वाला पूरे सिस्टम से भली भाँति परिचित ही नही अभ्यस्त भी है । कहीं पूरी दबंगई से निजी हित मे ऐसे काम करवाने के प्रयास किए जाते है जो या तो विधि सम्मत नही होते या फिर जिनसे संस्था, सरकार या समाज का भारी नुकसान होना तय होता है। संघर्ष या फिर सुलह सफाई या हिस्सेदारी जैसे बीच के रास्ते निकल आते है और फिर भ्रष्टाचार की अविरल धारा शुरू हो जाती है। चूंकि दबंगई को राजनैतिक सरंक्षण प्राप्त होता है इसलिए जो संघर्ष करते है समान्यतया निपटा दिये जाते है। जो हिस्सेदार हो जाते है, राजदार होते है और राज करते है। हद तो तब हो जाती है जब विभागों के ऐसे भ्रष्ट तत्व स्वयं भ्रष्टाचार और कमाई  का रास्ता सुझाते है। देश, समाज से उन्हे क्या मतलब उनका जहां तो अलग है और सारे जहां से अच्छा होता है । ऐसी स्थितिया ये रेखांकित करती है की हमारे समाज मे इस अवमूल्यन का स्तर क्या है, उसकी कितनी पैठ है और स्वीकार्यता कितनी बढ़ गई है ।
         कुछ समय से तो लाज शर्म का पर्दा भी उठ रहा है। कितने ही वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी छोटे मोटे किन्तु चलते पुर्जा नेताओं के सार्वजनिक रूप से पैर छूते है। उनका ये बेशर्म अंदाज़ अनायास नही, सर्वसाधारण के लिए  उनके  नापाक गठजोड़ की प्रेस विज्ञप्ति के अलावा कुछ नही होता । ऐसे अधिकारियों का चाहे वह गलत सही कुछ भी करें कभी कुछ नही विगड्ता किन्तु ईमानदारी और देश सेवा के जुनून मे बहुत लोगो का बहुत कुछ हो सकता है और हो रहा है।  
             जरा सोचिए ......  क्या हो रहा है ? हमारा समाज कहाँ जा रहा है ? और हम कहाँ खड़े है ? हमारी क्या भूमिका होनी चाहिए ?

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                    - शिव प्रकाश मिश्रा 
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शनिवार, 27 जुलाई 2013

गरीबी की सीमा .... रेखा

आजकल एक बहस चल पड़ी है गरीबी की रेखा की । वास्तव मे इसकी वजह है योजना आयोग द्वारा घोषित गरीबी की नई परिभाषा की । इसके अनुसार यदि ग्रामीण क्षेत्र मे किसी व्यक्ति की आय रु 27.20  और शहरी क्षेत्र मे 33.30 रुपये प्रतिदिन से अधिक होगी तो उसे गरीब नही माना जाएगा । लोग इसके खिलाफ आंदोलित है । उन्हे लगता है कि ये गरीबों के साथ भद्दा मज़ाक है और गरीबी के आंकड़ो के साथ फ़्राड है। एक राजनैतिक दल के प्रवक्ताओ ने कहा कि वे 5 रुपये और 12 रुपये मे क्रमश: दिल्ली और मुंबई मे भर पेट खाना खा सकते है । एक सज्जन ने कहा कि हाँ खाना तो 1 रुपये मे भी खाया जा सकता है और 100 रुपये मे भी नहीं खाया जा सकता है क्योकि ये इस पर निर्भर करता है कि क्या खाया जा रहा है और कहाँ खाया जा रहा है। इन वक्तव्यों को जिस किसी ने सुना दंग रह गया और लगभग सभी  ने बड़ी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की । ऐसा लगता है कि ये क्र्रूर मज़ाक है और लोगो के घाओं पर नमक छिड़कने जैसा है ।  ये मज़ाक मे कहा गया था या जानबूझ कर पर  लोगो के दिलो मे गहराई तक चोट कर गया । हो सकता है कि कहने वालों के दिमाग मे डालर बसा हो लेकिन इतना जरूर है कि ऐसे लोग आम जनता से पूरी तरह कटे हुये है उन्हे वास्तविकता का बिल्कुल ज्ञान नही है । स्वाभाविक है ऐसे लोग जनता का कितना भला कर सकते है, आसानी से समझा जा सकता है ।   

क्या है गरीबी की रेखा ?

पूरे विश्व मे कई प्रणालिया प्रचलित है जिनसे  गरीबी का निर्धारण किया जाता है ।  इसका उद्देश्य ये होता है कि गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले लोगो को कल्याण कारी योजनाओ द्वारा सहायता पहुंचाई जा सके ताकि ऐसे परिवार स्वालम्बी बन सके । प्रत्येक देश के लिए आर्थिक आधार पर गरीबी की रेखा अलग अलग हो सकती  है। अमेरिका के गरीब, भारत के गरीबों से बहुत अमीर होंगे क्योकि अमेरिका मे गरीबी का पैमाना हिंदुस्तान से पूर्णतया भिन्न है ।  

कैसे निर्धारित होती है गरीबी की रेखा ?

          अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गरीबी रेखा निर्धारण के मूलत: 2 माडल है, पहला प्रत्यक्ष और दूसरा अप्रत्यक्ष। 
प्रत्यक्ष माडल मे जीवन से सीधे जुड़े हुये तीन क्षेत्रो का ध्यान रखा गया है ये है स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर । इन तीनों मे कुल 10 सूचकांक है जिन्हे नीचे के चित्र मे दिखाया गया है ।        


इस माडल मे इस बात का ध्यान रखा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति और परिवार को जीवन के  इन तीन मूलभूत क्षेत्रो मे न्यूनतम सुविधाये उपलब्ध हो । अत: इन क्षेत्रो  मे किए जाने वाला खर्च गरीबी रेखा का आधार होता है । इन तीनों क्षेत्रो मे किसी  मे भी कमी परिवार को गरीबी की रेखा के नीचे ले जा सकती है। यह माडल अमर्त्यसेन की अवधारणा के बिल्कुल नजदीक है।    
          अप्रत्यक्ष माडल मे सिर्फ व्यक्ति या परिवार की आय का ध्यान रखा जाता है और ये कल्पना की जाती है कि अमुक आय मे प्रत्यक्ष माडल के सभी न्यूनतम सूचकांक स्वत:  पूरे हो जाएंगे । ये माडल गणना मे आसानी और मनमाफिक न्यूनतम आय घोषित किए जा सकने के कारण सभी विकाशशील देशो मे सरकारो के लिए बेहद लोकप्रिय हैं । सरकारे न्यूनतम आय घटा कर ये दावा करती है कि उनके शासनकाल मे गरीबी मे कमी आयी है । ऐसा करने का दूसरा सबसे बड़ा फायदा ये होता है कि सरकार द्वारा प्रायोजित गरीबी उन्मूलन के कार्यक्रमों मे आने वाला खर्च कम हो जाता है क्योकि बहुत से लोग न्यूनतम घोषित आय के आधार पर इन योजनाओ मे पात्र नही रह जाते है । एक बड़ी विडम्बना की स्थिति तब खड़ी हो जाती है जब लोग गरीबी की रेखा के नीचे होने का प्रमाण प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते है । स्पष्ट है कि इस तरह के मानक गरीबी के नहीं भुखमरी के मानको के ज्यादा करीब  होते है ।  
               तेंदुलकर कमेटी के अनुसार ग्रामीण भारत  मे 816 रुपये प्रति व्यक्ति और शहरी क्षेत्र मे 1000 प्रति व्यक्ति मासिक आय को गरीबी की रेखा से ऊपर माना गया है । यानी की 5 व्यक्तियों के परिवार मे ग्रामीण क्षेत्र मे 4080 रुपये और शहरी क्षेत्र मे 5000 रुपये की आय वाले परिवार गरीबी के रेखा के नीचे नहीं होंगे ।  इससे गरीबो की संख्या 2011-12 मे रेकॉर्ड 22% पर आ गई । ये 2010-11 मे 29.80% तथा 2004-05 मे  37.2% थी । इसके साथ गरीबो की संख्या 26.93 करोड़ रह गयी है जिसमे 21.63 करोड़ गाँव मे है। बिहार और उड़ीसा जहां गरीबों की संख्या मे सर्वाधिक कमी आई है आश्चर्य चकित है कि ये चमत्कार कैसे हो गया ।
          इस तरह आंकड़ो की बाजीगरी से गरीबी मे तो कमी नहीं आएगी अलबत्ता मानव मूल्यों की विश्वसनीयता मे कमी जरूर आएगी ।
प्राचीन समय से हिंदुस्तान मे मंदिरो और धर्मशालाओं मे प्रसाद बांटने की परंपरा रही है । इसका उद्देश्य भुखमरी की रेखा के नीचे के लोगो को जीने लायक भोजन उपलब्ध कराना था ताकि कोई भूख से मरे नहीं। जो लोग वैष्णो देवी धाम की यात्रा पर गए होंगे उन्होने टी सीरीज़ के गुलशन कुमार का लंगर अवश्य देखा होगा जो चौबीसों घंटे चलता था । झांसी मे मैंने देखा कि साईं बाबा के मंदिर मे न जाने कबसे लगातार लंगर चलाया जा रहा है ये दान के पैसे से चलता है अगर आप इसमे एक दिन का लंगर चलना चाहे तो इसमे सम्भवता: कई महीने लगेंगे क्योकि दान दाताओ ने अग्रिम बुकिंग करा रखी है। इस तरह लखनऊ के संकट मोचन मंदिर तथा लगभग हर बड़े शहर मे इस तरह की कोई न कोई धर्मार्थ व्यबस्था है। हर बड़े गुरु द्वारे मे तो लंगर की अनूठी परंपरा है। किन्तु ये धर्मार्थ और परमार्थ भूख मिटाने के उपाय है गरीबी के रेखा से ऊपर उठाने के नहीं । गरीबी मिटाने के लिए इस देश को व्यापक अर्थो मे कार्य योजना की आवश्यकता है।        
  
************  शिव प्रकाश मिश्रा **************    

बुधवार, 24 जुलाई 2013

देश की शर्मिंदगी

ये देश कहाँ जा रहा है ? वर्तमान राजनीति इस देश को कितना शर्मिंदा करेगी ? आज के दिन कोई इसकी भविष्यवाणी नहीं कर सकता  । इस देश के लोकतन्त्र के मंदिर कहे जाने वाले संसद के लगभग 65 सदस्यों ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को पत्र लिख कर निवेदन किया है कि गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिकी बीजा न दिया जाय । इस चौंकाने वाली कार्यवाही ने समूचे देश को बहुत शर्मिंदा किया है । क्या घरेलू राजनीति का विरोधाभास या राजनैतिक विरोध अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लड़ा जाएगा और दूसरे देशों से अपने राजनैतिक विरोधियों को सबक सिखाने के लिए कहा जाएगा ? क्या भारतीय राजनीति का चेहरा इतना विकृत हो चुका है कि राजनैतिक हिसाब चुकाने के लिए के लिए देश के स्वाभिमान और सम्मान को भी दांव पर लगा दिया जाएगा ?
          अमेरिका का वीज़ा किसी भारतीय के लिए क्या मायने रखता है ? क्या अमेरिका स्वर्ग है जहां जाने के लिए हर कोई लालायित होगा ? या जहां जाए वगैर किसी को मोक्ष नहीं मिल सकता ? या उसका अस्तित्व ही नही होगा ? अपनी पहचान नही होगी ? क्या अमेरिका कोई अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय है कि जिसे वह वीज़ा नहीं देगा उसे अपराधी माना जाएगा ?
          जहां तक नरेंद्र मोदी का सवाल है वह संवैधानिक विधि व्यवस्था के अंतर्गत जनता द्वारा चुने गए मुख्यमंत्री है, जो एक संवैधानिक पद है, और उन्हे यदि कोई देश वीज़ा से इंकार करता है तो ये भारत की संप्रभुता का अपमान है । यह संतोष की बात है कि भारत सरकार ने अमरीकी प्रशासन से इस पर अपना विरोध दर्ज कराया है । पर संसद के दोनों सदनो के लगभग 65 सदस्यों ने अपनी इस कार्यवाही से ये साबित कर दिया है कि उन्हे भारत के संविधान की, जिसके प्रति उन्होने निष्ठा की शपथ ली है, समुचित जानकारी नहीं है या श्रद्धा नहीं है । ये तो अच्छा हुआ कि श्री सीताराम यचूरी ने साफ कर दिया कि उन्होने किसी ऐसे पत्र पर हस्ताक्षर नही किए है और उनके हस्ताक्षर फर्जी है । निश्चित तौर पर यहाँ कानून को अपनी काम करना चाहिए ।         
          किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति को अमेरिकी वीज़ा के लिए इन परस्थितयों मे प्रयास भी नहीं करना चाहिए । इसलिए नरेंद्र मोदी को चाहिए कि वह स्वयं घोषणा करे कि अमेरिकी वीज़ा की उन्हे कोई दरकार नहीं है । उनके दल के अध्यक्ष को भी अमेरिका यात्रा के दौरान इस तरह की मांग से बचना चाहिए था।   *******         

रविवार, 14 जुलाई 2013

हिमालय से भी ऊंचा और राजनीति से भी नीचा

उत्तराखंड मे प्रकृति के रौद्र रूप ने जो विनाश लीला की है उसकी कल्पना करना भी संभव नहीं है । कितने लोग प्रभावित हुए और कितने लोग मारे गए इसकी सही जानकारी उपलब्ध नही है । उत्तराखंड विधान सभाध्यक्ष के अनुसार मरने वालों की संख्या 10 हजार से भी अधिक है किसी ने कहा ये संख्या इससे भी अधिक है। रुद्र प्रयाग व केदारनाथ गए जिले के अधिकारियों ने इस संख्या को बहुत अधिक होने का अनुमान बताया।  किन्तु प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा है कि मरने वालों की सही संख्या का कभी पता नहीं चल सकेगा । शायद सबसे विश्वसनीय और सही बात यही है । प्रकृति के इस तांडव से चमत्कारिक रूप से बच कर आए प्रत्यक्ष दर्शियों और बचाव अभियान मे शामिल लोगो खासतौर से सैन्यकर्मियों से हुई बातचीत से घटना की  विकरालता और बीभत्सता का अंदाजा लगाया जा सकता है। निसंदेह यह इस सदी की सबसे बड़ी मानवीय और प्राकृतिक आपदाओं मे से एक है।
    16 जून की रात और 17 जून 2013 को सुबह हुए इस हादसे के बाद बचाव अभियान शुरू होने मे कतिपय कारणों से काफी समय लगा। एक कारण तो है दुर्गम पहाड़ी इलाको की भौगोलिक संरचना, संचार माध्यम और संपर्क मार्गों का कटना। दूसरा सबसे बड़ा कारण है इस तरह की आपदाओं से निपटने की कोई अच्छी  तैयारी न होना । तीसरा कारण है विभिन्न एजेंसियों मे तात्कालिक बेहतर तालमेल न होना । कहने की आवश्यकता नहीं कि अगर बचाव अभियान जल्दी और नियोजित तरीके से शुरू हुआ होता तो और भी बहुतों की जान बचायी जा सकती थी । लेकिन जैसी हमारी राजनैतिक व्यबस्था है, और जैसी हमारे देश की अवस्था है, उसमे गंभीर और दूरगामी मसलो पर गंभीरता न होना आश्चर्य जनक नहीं, अवश्यंभावी है । इसलिए इस तरह की विभीषिकाओं से पूरी सक्षमता और तैयारियों से निपटने, जान माल के होने वाले नुकशान  को न्यूनतम करने और तुरन्त अधारभूत ढांचा खड़ा कर पुनर्वास करने की क्षमता हम कब तक विकसित कर पाएंगे, कहा नहीं जा सकता।   
    उत्तराखंड त्रासदी मे सेना और इंडो तिब्बत बोर्डर पुलिस के जवानो ने बहुत ही बहदुरी, जवांजी और कर्तव्य परायणता से लोगो का बचाव किया। घायलो, बुजुर्ग व्यक्तियों और बच्चों को अपनी पीठ, कंधे पर बैठा कर निकाला । एक घटना का जिक्र आवश्यक है, लकड़ी और रस्सियों के एक अस्थायी पुल पर, जिसमे तख्ते कम होने के कारण बड़े बड़े रिक्त स्थान थे और जिससे होकर निकलने पर पानी मे गिर जाने का खतरा था, कई जवान पंक्ति बद्ध होकर पेट के बल लेट गए और उनकी पीठ पर पैर रखते हुए आपदा मे फंसे हुए लोग निकले । ये दृश्य जो भी देखता वह यह जरूर कहता कि ये देश के सच्चे सपूत हैं । इनको देख कर मन मे श्रद्धा उत्पन्न होती है । ऐसे एक नहीं अनेक वाकये है जहां इन जवानो ने अपनी जान की बाजी लगा कर मुशीबत मे फंसे लोगो को निकाला । धन्य है ऐसे जवान और ऐसी सेना । ऐसे बहुत से और लोग है जो स्वयं इस आपदा मे फंसे थे फिर भी उन्होने तमाम अजनबियों की जान अपनी जान जोखिम मे डाल कर बचाई। ये सभी इस देवभूमि मे देवदूत के रूप मे थे । इनकी इंसानियत, पराक्रम, लगन और साहस ने इनका कद हिमालय से भी ऊंचा कर दिया है ।
    केदारनाथ धाम मे जो बादल फटे वो पानी के नहीं, कहर और मुशीबतो के बादल थे। जिसके साथ दुखों के पहाड़ भी टूट टूट कर गिर रहे थे। नदियां ऐसे उफन पड़ी जैसे अपना आक्रोश व्यक्त करने के लिए, मानो प्रकृति अपने खिलाफ किए गए मानवीय अन्याय और शोषण का भरपूर बदला लेना चाह रही थी । जीवन मे एक एक पैसा जोड़ कर जुटाये गए गृहस्थी के सामान जल-प्रवाह मे बह गए और अटूट मेहनत से बनाए  भवन ताश के पत्तों की तरह ढह गए । हर ओर मौत और विनाश का भयंकर तांडव हुआ । तबाही के इस मंजर मे जो भी सैलाव के सामने पड़ा नष्ट हो गया । इनमे स्थानीय लोग और दूसरे प्रदेशों से आए श्रद्धालु दोनों थे । लाशों के ढेर मे दबे रहकर जब कोई जिंदा बच गया तो उसे अपनी ज़िंदगी पर विश्वास ही नहीं हुआ। शायद इसे ही कहते है ज़िंदगी और मौत के बीच का बहुत छोटा फासला । जो बचे थे या जो बच सकते थे उन्हे बचा लिया गया है और इसीके साथ बचाव अभियान समाप्त कर दिया गया है । मृतको के बारे मे एक अधिकारी का बयान “ जहां जिंदा लोगों की गिनती नही वहाँ लाशों की गिनती कौन करेगा ” सत्य किन्तु हैरान करने वाला था । बहुत लाशों का सामूहिक दाह संस्कार कर दिया गया है लेकिन दुर्भाग्य से अभी भी बहुत ऐसे है जिनकी लाशे निकाली नही जा सकी है क्योंकि ये मलबे के ढेर मे दबी है और मलबा हटाने के लिए वैज्ञानिकों से परामर्श किया जाएगा । लेकिन आज भी हजारो लोग अपनों के आने का इंतजार कर रहे है। बहुत सी माँए जिनके बेटे केदारनाथ धाम  रोजी रोटी या  अपनी पढ़ायी के लिए कमाई करने गए थे, उनके वापस आने का इंतजार कर रही है। बहुत सी पत्नियाँ अपने पतियों का, बच्चे अपने माता पिता या भाई बहिनों का इंतजार कर रहे हैं । बहुत से लोग तशवीरें हाथ मे लिए देहरादून, हरिद्वार या ऋषिकेश मे घूम घूम कर अपनों को ढूड रहे हैं और इस बात का जबाब भी कि ऐसे कैसे इस आपदा को यों ही गुजर जाने दिया गया ? पता नहीं उनका इंतजार कब खत्म होगा ? होगा भी या नहीं।
    इस आपदा मे एक काम बहुत अच्छी तरह से हुआ और वह है राजनैतिक रोटियाँ सेंकने का । कई दलों ने राहत सामिग्री से भरे ट्रकों को झंडी दिखा कर रवाना किया जैसे ये आपदा मे नही बल्कि देशाटन के लिए जा रहें हों । ऐसे कई ट्रक डीजल न होने से कई दिन रास्ते  मे ही खड़े रहे और कई ट्रको की खाद्य समिग्री तो पहुँचते पहुँचते खराब हो गई थी ।  काफी समिग्री बांटने मे हुयी देरी के कारण पड़े पड़े खराब हो गई थी। भला हो स्वयं सेवी संगठनों का जिन्होने सबसे पहले जो कुछ भी उनसे हो सका पहुंचाया। गुजरात के मुख्य मंत्री नरेंद्र मोदी भी प्रभावित इलाको के दौरे पर पहुंचे। उनके हेलेकोप्टर को प्रभावित इलाकों मे  उतरने नही दिया गया तो उन्होने हवाई सर्वेक्षण ही किया । मोदी जाएँ और चर्चा न हो, सियासत न हो, हो ही नही सकता । 18 हजार गुजरातियों को बचाने की मीडिया मे खबर आने के बाद तो तूफान खड़ा हो गया । उन्हे तरह तरह की उपाधियों से विभूषित किया गया । लेकिन इसका प्रभाव ये हुआ कि लगभग हर बड़े दल के नेताओं ने हवाई सर्वेक्षण किए और हर दल मे अपने अपने प्रदेश के लोगो के ले जाने की होड लग गई । हरिद्वार और देहरादून मे बसो की भीड़ हो गई । चूंकि मोदी ने चार्टड हवाई जहाज से भी देहरादून से अहमदाबाद तक ले जाने की अपने प्रदेश के प्रभावितों के लिए व्यवस्था की थी, कई दल इस अभियान मे कूद पड़े और अपने अपने प्रदेश वासियो के लिए हवाई जहाज की व्यवस्था कर ली । कई दलों के शीर्ष नेता देहरादून हवाई अड्डे पर यात्रियों को  अपने अपने जहाज मे बैठाने के लिए झगड़ते देखे गए जैसा कि आमतौर पर टैंपो चालको के बीच सवारिया भरने को लेकर होता है । कई सियासी दल आपसी वाक्युद्ध मे इतना उलझे कि सभी समाचार पत्रो और टीवी पर छा गए और जो समय और जगह  आपदा प्रबंधन पर विश्लेषण के लिए उपयोग होता, सूचनाए देने के लिए स्तेमाल होता, बलात छिन गया। इससे बचाव अभियान प्रभावित नही हुआ होगा, नही माना जा सकता । बहुत से लोग इस बात का जबाब भी ढूड रहे है कि  राजनीति का निम्नतम स्तर क्या हो सकता है ?
प्रकृति की इस महाविनाश लीला के बीच मानवीय समवेदनाओं की कसौटी पर एक और कृत्य इंसानियत को कलंकित कर गया। खबर है कि कुछ लोगो ने अस्सीम संकट की इस घड़ी मे घायलो को लूटा । महिलाओ से  अभद्रता की, उनके गहने जेवर लूट लिए और उनकी इज्जत पर हमला किया। कुछ घायल जिन्हे सहायता की सख्त जरूरत थी, इस छीना झपटी मे बच नही सके । लाशो से अंगूठिया और बालिया निकालने के लिए इन दानवीय लुटेरों ने उनके कान और अंगुलियाँ काट ली । ऐसे कई लोगो को सेना के जवानो ने स्वर्ण आभूषणो और बहुत नकदी के साथ पकड़ा। मानवीय मूल्यो की इतनी गिरावट ओफ ! शायद ये अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गयी है, राजनीति से भी नीचे ।
    सही अर्थों मे राहत और बचाव का कार्य अभी खत्म नहीं हुआ है। उजड़े हुए लोगो को बसाना, उन्हे जीविकोपार्जन मे सक्षम बनाना, बहुत चुनौती पूर्ण कार्य है। बहुत से बच्चे अनाथ हो गए है उन्हे पढ़ाना, लिखाना और समाज की मुख्यधारा मे शामिल करना, बहुत बड़ा लक्ष्य है । लेकिन इसे सभी को मिलकर पूरा करना है । केवल सरकारें इस कार्य को पूरा नहीं कर सकती । इसमे सभी के सहयोग की आवश्यकता है । आइये हम सब मिलकर इस कार्य मे सहयोग करें, पुनीत कार्य समझ कर नहीं बल्कि अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर ॥****॥    
- शिव प्रकाश मिश्रा  
 

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