गुरुवार, 12 अगस्त 2010

भविष्य........

कैसे मुस्कान हो ,
निरुद्वेग अधरों पर,
बदलो सा मिलना,
निकलना भी छूट गया.

जीवन के कतिपय अंश
स्वस्ति के लिए हव्य,
आशातीत बेडा एक,
 सपना सा टूट गया..

कच्ची पगडण्डी सी,
 किस्मत की रेखाए,
धूमिल आशाओं में,
 वर्तमान भटक गया.

अतीत के दलदल में ,
डूबती       तस्वीरे,
कल्पना का यान जीर्ण,
 दूब में अटक गया..

शक्ति के समन्वय में,
 शांति के प्रणेता से ,
वर्षो का खोटा सिक्का,
 गांठ से निकल गया..

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शिव प्रकाश मिश्र
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बुधवार, 11 अगस्त 2010

सड़क पर ........

फुटपाथ पर लेटते हैं ,
हाथ का तकिया लगा कर ।
ओढ़ते अम्बर दिसम्बर में ,
अख़बार की रद्दी बिछा कर॥
सड़क पर ही दिन निकलता ,
रात भी होती सड़क पर ,
सड़क पर ही प्रसव होता ,
मौत भी होती वहीँ पर ।
अभावो में बाल लीला ,
टेकती घुटने सिमट कर॥
गलिया सुन बड़े होते ,
रो रहे होते सिसक कर ।
भूख होती प्यास होती ,
छत नहीं होती सिरों पर ॥
बाल दिवस हर वर्ष होता ,
जान नहीं पाते उम्र भर ॥
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शिव प्रकाश मिश्र

सोमवार, 9 अगस्त 2010

लक्ष्मण रेखा ..........

आज मै उपेक्षित हूँ ,
समाज के घेरे से ,
बहार खड़ा क्षुब्ध हो ताकता हूँ ,
कितनी बिषैली ,
पर-
वास्तविकता है ये,
विस्मय,
 विषाद या
अपेक्षा में सोचता हूं ,
भावनावों में,
 कुछ ज्यादा ही बह गया था मै,
 या  फिर  
किसीने अपने विचारों में ,
जान बूझ कर ,
इतना ऊँचा उठा दिया था,
कि गिर कर
मै उठ भी सकू,
और
उनकी ज्यादितियों का,
प्रतिकार भी कर सकू ,
तभी तो मेरा तिरस्कार हुआ है,
मेरी हर हरकत पर उन्हें संसय है ,
कही
कोई बितंडा न बन दू ,
उनके कलमस कि कहानी,
होठो पर न ला दू,
 तभी तो करते है ,
रोज एक नयी व्यूह रचना ,
शायद  यही लक्ष्मण रेखा है,
या फिर
कोरी बिडम्बना........
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      शिव प्रकाश मिश्र
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सोमवार, 2 अगस्त 2010

HAM HINDUSTANI: धोखा

HAM HINDUSTANI: धोखा: "आँखों का धोखा, जिसे मंजिल समझने की भूल, अक्सर कर जाते है ठोकर लगनी होती है जहाँ , चाह कर भी नहीं संभल पाते है, लड़खड़ाते है, गिरते है ,..."

धोखा

आँखों का धोखा,
जिसे मंजिल
समझने की भूल,
अक्सर कर जाते है
ठोकर लगनी होती है जहाँ ,
चाह कर भी नहीं संभल पाते है,
लड़खड़ाते है,
गिरते है ,
और
फिर उठ कर चल देते है ,
यंत्रवत
उसी राह पर ,
बंद होठो की पीड़ा ,
अंधरे में विसर्जित कर ,
जैसे जो कुछ हुआ
वह कुछ नया नहीं है ,
भुला देते है ,
जल्द ही बड़ी से बड़ी ठोकर ,
और दर्द का अहसास ,
और ,
फिर भटकने लगते है ,
नयी मरीचकाओं के बीच .........
***** शिव प्रकाश मिश्र **********

शुक्रवार, 24 अगस्त 2001

भीड़

भीड़ ही भीड़ है.
मेरे चारो तरफ भीड़ है,
मनुष्यों का रेला सडको पर,
 बिखरा है,
शोरगुल में खड़ा
 पुकारता हूँ मै,
 किसी को,
पर मेरी आवाज़ शोर में घुल रही है,
शायद
कोई नहीं सुन सकता.
रूप रंग और गंध
सभी नकली हैं,
कोई नहीं मिल सकता.
मै नहीं समझता
सब ये कैसे करते हैं,
प्रकृति में मिलावट कैसे करते हैं,
मै नहीं चाहता,
कोई मुझे प्यार करे,
 पर मेरी भावनाओं का
 तिरस्कार न करे.
जरूरी नहीं कोई मेरा अनुयाई   हो,
 पर व्यर्थ के विचार
 मुझ पर न लादे,
क्योंकि
मुझे रोशनी चाहिए,
 चमक नहीं !!
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शिव प्रकाश मिश्र
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बांकीपुर और दतिया: मोदी और भाजपा के लिए सामान्य वर्ग का स्पष्ट संदेश

  बांकीपुर और दतिया: मोदी और भाजपा के लिए सामान्य वर्ग का स्पष्ट संदेश   जंतर-मंतर पर हुए विपक्षी दलों के नाटकीय और आक्रामक प्रदर्शन के संकट...