गुरुवार, 22 जनवरी 2026

A.R. Rahman का बयान या BBC का एजेंडा? | पूरी पड़ताल

 





कला और कट्टरता का इम्तिहान, फेल हुआ अल्ला रख्खा रहमान !

जब सुर राजनीति से टकराए, दूसरों का मोहरा बन जाए और अपने स्वार्थ में अँधा दूसरों को दे दे अपना कंधा,   तो उसका नाम होता है — अल्ला रख्खा रहमान.

अल्ला रख्खा रहमान कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। वे भारत के वैश्विक सांस्कृतिक प्रतिनिधि हैं। इसलिए जब उनका नाम बीबीसी जैसे  विवादास्पद अंतरराष्ट्रीय मंच से जुड़ता है, तो हर शब्द केवल एक साक्षात्कार नहीं, बल्कि एक विमर्श बन जाता है। औपनिवेशिक मंशा से ग्रस्त बीबीसी की मंशा तो स्पष्ट है — भारत में मुसलमानों के साथ भेदभाव का नैरेटिव स्थापित करना, और वह लम्बे समय से कर भी रहा है, यह सभी जानते हैं ।

बीबीसी संवाददाता  हारून रशीद को दिए साक्षात्कार के बाद रहमान सुर्खियों में हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें काम नहीं मिल रहा है, पिछले 8 वर्षों में पॉवर शिफ्ट हो गया है और  अब "नॉनक्रिएटिव" लोग तय करते हैं कि किसे काम मिले और किसे नहीं।  इसका मतलब की जबसे केन्द्र में सत्ता परिवर्तन हुआ है, तबसे ऐसा हुआ. यह विशुद्ध राजनीतिक भाषा है। काम न मिलने के पीछे सांप्रदायिकता भी कारण  हो सकता है, कैट हुए उन्होंने फिल्म छावा को भी विभाजनकारी बताया, जिसका संगीत खुद उन्होंने दिया था।

अगर सीधे अर्थों में  देखा जाए तो ऐसा लगता है कि वह कोई बहुत ही गरीब और उपेक्षित कलाकार हैं, जो आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि रहमान फिल्म इंडस्ट्री के सबसे धनाढ्य संगीतकारों में से हैं। उनके पास चेन्नई में अत्याधुनिक और बेहद महंगा स्टूडियो है. वैसा कोई फिल्म जगत का कोई संगीतकार तो आज तक नहीं बना सका है।  वे नियमित रूप से कार्यक्रम करते हैं, अच्छी कमाई कर रहे हैं — और आज भी बहुत व्यस्त हैं। इसलिए ये बहुत स्वाभाविक प्रश्न है कि

- क्या ए आर रहमान को सचमुच समस्या है? यदि नहीं, तो फिर हिंदूविरोधी और भारतविरोधी वक्तव्य क्यों?

- क्या रहमान के बयान के पीछे भारत विरोधी और कट्टर पंथी शक्तियां हैं? यदि हाँ तो इसके निहतार्थ क्या हैं?

लोकतंत्र में बोलने का अधिकार निर्विवाद सभी को है। लेकिन सवाल तो लाजिमी है, कि उन्होंने क्या कहा —  पर  उससे भी बड़ा सवाल है कि उन्होंने किस मंच पर कहा?

बीबीसी कोई सांस्कृतिक मंच नहीं है। यह एक कुख्यात भारतविरोधी नैरेटिवबिल्डर है, जिसका झुकाव वामपंथी और इस्लामी संगठनों की तरफ होता  है। ब्रिटेन के करदाताओं के पैसे से चलने वाला बीबीसी अपने देश में भी मुख्यधारा के साथ नहीं है — तो भारत क्या चीज है? इसलिए जब आप बीबीसी  से बात करते हैं, तो आप उसे भारतविरोधी हथियार थमा देते हैं।

एक बड़ा कलाकार आम नागरिक नहीं होता — वह देश का ब्रांड प्रतिनिधि होता है। भारत ने रहमान को क्या नहीं दिया ! ऑस्कर मंच तक पहुँचाया, अनगिनत राष्ट्रीय पुरुष्कार, पद्म श्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण जैसे सर्वोच्च सम्मान दिए।

लेकिन उन्होंने देश को क्या दिया?  घोर अपमान !

देश के प्रति नैतिक ज़िम्मेदारी, वह कर्तव्य  है, जो किसी भी पुरस्कार से बड़ा  होता  है। मैं नहीं कहता कि रहमान को चुप रहना चाहिए — लेकिन हिंदुओं, हिंदी भाषा, बहुसंख्यकों, अपने प्रशंसकों और अपने देश के विरुद्ध बोलने में उन्हें जरा भी  संकोच नहीं हुआ।  छावा फिल्म का संगीत उन्होंने दिया, पैसे कमाए लेकिन अब कह रहे हैं कि ये फिल्म विभाजनकारी है। ये कोई सामान्य व्यक्ति तो नहीं कर सकता।

अब तक कोई रहमान को देशविरोधी कहने की कल्पना भी नहीं कर सकता था। लेकिन आज जब उनकी असली भावनाएँ सामने आ गईं — तो हर गलीमोहल्ले में उनके नाम पर थू थू हो रही है। जिस हिन्दू धर्म में उन्होंने जन्म लिया और 22 वर्ष तक जिस धर्म का जीवन जिया, उसका अपमान किया। अपने हिन्दू पिता का अपमान किया। अपने हिन्दू  रिश्तेदारों का अपमान  किया।      

फिल्म जगत में कोई भी कलाकार हमेशा शिखर पर नहीं रह सकता। "सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट" का सिद्धांत यहाँ भी लागू होता है। दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन — सभी को समय के साथ प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा।

रहमान का यह कहना कि उन्हें काम नहीं मिल रहा क्योंकि वे मुसलमान हैं — यह ज्यादा गंभीर आरोप है। वह  इतने नासमझ तो नहीं होंगे कि इसके प्रभाव को समझते नहीं होंगे।

हिन्दी सिनेमा  में खान बंधुओं   (शाहरुख, आमिर, सलमान) का दशकों तक वर्चस्व रहा है — और उनके प्रशंसकों में बहुसंख्यक हिंदू ही हैं। मुसलमान, संख्या और फिल्म देखने की आदत के आधार पर किसी को शिखर पर नहीं पहुँचा सकते। शाहरुख़ खान की यदि अमेरिकी एअरपोर्ट पर तलाशी होती है, तो वह भारत आकर कहते हैं कि उनके साथ भेदभाव इसलिए होता है क्योंकि वह समुदाय विशेष से हैं, जबकि भारत से उसका कोई लेना देना नहीं। आमिर खान ने कहा था कि उनकी पत्नी बच्चों को लेकर चिंतित रहती हैं। नशीरुद्दीन के बयान तो जग जाहिर हैं।  कई लोगों ने पुरूस्कार वापस कर दिए थे, और कई ने तो देश छोड़ने का एलान कर दिया था।   यह सब कुछ 2014 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद  हुआ। अब उस श्रंखला को आगे बढ़ने का काम अल्ला रखखा रहमान ने किया है.        

रहमान ने वंदे मातरम, जिया जले, छैयाछैया जैसे हिंदी गीतों से प्रसिद्धि पाई — आज जो कुछ भी वह हैं, वह हिन्दी और हिन्दी सिनेमा  के कारण लेकिन बीबीसी  इंटरव्यू में उन्होंने हिंदी का अपमान किया और उर्दू को "मदर ऑफ म्यूजिक" कहा। या तो उन्हें भारत की समझ नहीं है या कट्टरपंथी अजेंडा चला रहे हैं। भारत के शास्त्रीय संगीत और गायन समझने के लिए उनका एक जीवन भी पर्याप्त नहीं है, उसके  लिये  उन्हे कई जन्म लेने पड़ेंगे।  

बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि रहमान के जन्म का  नाम ए. एस. दिलीप कुमार था। उनके पिता आर. के. शेखर तमिल और मलयालम फिल्मों के संगीतकार और धर्म निष्ठ  हिन्दू थे । पिता की मृत्यु के बाद, उनका परिवार आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक संघर्ष से गुजर रहा था। उनकी बहन गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। इन मुशीबतों से छुटकारे के लिए, वह एक सूफ़ी करामतुल्ला शाह क़ादिरी के संपर्क में आये और फिर जैसा आम तौर पर होता है, उसके प्रभाव में आकर लगभग 22  वर्ष की उम्र में  उन्होंने धर्मान्तरण कर लिया. आज लगभग 59  वर्ष की उम्र के रहमान के शरीर में 22 वर्ष के हिन्दू और  37 वर्ष  के मुसलमान का मिश्रण है, तब ये हाल है। रहमान अक्सर कहते रहे हैं : “मैं धर्म को दीवार नहीं, एक पुल की तरह देखता हूँ।” लेकिन अब उसी  पुल पर चढ़ कर भारतविरोधी और कट्टरपंथी सांप्रदायिक ताकतों से रिश्ता जोड़ कर देश को गली देकर सिद्ध कर दिया है कि उन्होंने  धर्मान्तरण  स्वार्थपूर्ति के लिए ही था।

रहमान को मणिरत्नम ने स्वयं निर्देशित फिल्म ‘रोज़ा’ में  अवसर दिया — और यह काम उन्हे  मुसलमान होते हुए दिया। अगर सांप्रदायिकता कारण होती तो उन्हे काम कैसे मिलता। ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ ने उन्हें ऑस्कर दिलाया। पद्म श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दिया और पद्म विभूषण नरेंद्र मोदी ने। तो अगर उनका इशारा राजनीतिक सत्तापरिवर्तन की ओर है — तो यह तथ्य उन्हें याद रखना चाहिए और इतना कृतघ्न तो कोई अजेंडा धारी ही हो सकता है ।

यह केवल रहमान की बात नहीं है — शाहरुख खान, आमिर खान, सलमान खान, नसीरुद्दीन शाह, सभी ने समयसमय पर सांप्रदायिकता का सार्वजानिक प्रदर्शन किया है। लेकिन इससे भी बड़ी बात है कि अंतर्राष्ट्रीय विमर्शकारी शक्तियाँ अपने गजवा-ए-हिन्द के अजेंडे को आगे बढाने के लिए समय समय पर भारतीय मुस्लिम हस्तियों को लुभाकर अपने जाल में फंसाती हैं और उनका इस्तेमाल करती हैं. ये सिलसिला लगातार चल रहा है.  इनका क्षेत्र व्यापक है खेल, सिनेमा, राजनीति और प्रशासन. अजहरुद्दीन से लेकर हामिद अंसारी तक कोई भी, कहीं भी, कभी भी मिल सकता है.          

कारगिल युद्ध के समय प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने दिलीप कुमार को दिल्ली बुलवाया ताकि वह  पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बात करा सकें,और पाकिस्तान को सन्देश दे सकें कि भारत में मुसलमान कितने खुश हैं.  दिलीप कुमार ने नवाज शरीफ से बात की लेकिन अटल जी तब हतप्रभ रह गए जब दिलीप कुमार ने फोन पर नवाज शरीफ से कहा कि अल्लाह के लिए आप यह सब मत किया करिए, जब आप यह सब करते हैं,तो यहाँ भारत में हम मुसलमानों का घर से निकलना मुश्किल हो जाता है. दिलीप कुमार वही हैं जिन्होंने अपना नाम छिपाया फिर भी  देश ने उन्हे  सिर आंखों पर बिठाया।  

आज रहमान कट्टरपंथियों के हाथ का मोहरा बने हैं, कल कोई दूसरा बनेगा । उनके पास इतना पैसा है कि अब उन्हें न हिंदी की चिंता है, न हिन्दी सिनेमा की। इसलिए  ये न मानने का कोई कारण नहीं है कि उन्होंने जो किया वह सुनियोजित था, प्रायोजित भी । उन्होंने भारतीय पत्रकारों से क्यों कभी ऐसा नहीं कहा — केवल बीबीसी जैसे मंच पर ही क्यों कहा। इस इंटरव्यू का कोई विशेष अवसर भी नहीं था ।  

जो व्यक्ति हिंदू, हिंदी और हिंदुस्तान के साथ विश्वासघात करता है —  वह माफी भी मांगे तो भी उसे माफ़ नहीं किया जा सकता है और माफ करना भी नहीं चाहिए ।

~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~


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    बंगाल की (निर)-ममता — केंद्र की दुर्बलता

     


    बंगाल की (निर)-ममता — केंद्र की दुर्बलता || बंगाल में संवैधानिक व्यवस्था का पतन लेकिन दिल्ली मुँह फेर रही है || अराजकता के डर में डूबा राज्य और केंद्र के राजनीतिक मौन की कीमत चुकाते हिन्दू


    जब कोई राज्य निर्मम हो जाए और केंद्र सरकार मौन साध ले, तो जो स्थिति बनती है, वही आज पश्चिम बंगाल की पहचान बन चुकी है।

    पश्चिम बंगाल अब केवल किसी एक सरकार की विफलता की कहानी नहीं रह गया है। यह उस गहरे लोकतांत्रिक संकट का आईना बन चुका है, जहाँ सत्ता हिंसा के बल पर सुरक्षित है, संस्थाएँ दबाव में काम कर रही हैं और आम नागरिक भय के साये में जीवन जीने को विवश हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि यह सब कुछ खुलेआम, देश की आँखों के सामने घट रहा है—और केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया या तो विलंबित है या लगभग अनुपस्थित।

    परंपरागत रूप से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रहने वाला यह राज्य, आगामी विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में असाधारण रूप से अस्थिर और उग्र राजनीतिक वातावरण से गुजर रहा है। हाल के दिनों में प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा राज्य के विभिन्न स्थानों पर की गई छापेमारियों ने इस अस्थिरता को और बढ़ा दिया। इनमें सबसे प्रमुख था I-PAC कार्यालय, जिसका संबंध कोयला घोटाले और मनी लॉन्ड्रिंग की जाँच से जोड़ा जा रहा है।

    जब ED के अधिकारी I-PAC कार्यालय में दस्तावेज़ों और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को जब्त करने की वैधानिक प्रक्रिया में थे, उसी समय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ वहाँ पहुँचीं। आरोप है कि जाँच से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज़ और साक्ष्य अधिकारियों से जबरन ले लिए गए। इसके बाद राज्य पुलिस ने स्वयं प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर दी।


    न्यायपालिका पर दबाव और संस्थागत विघटन

    पूरा देश तब स्तब्ध रह गया, जब प्रवर्तन निदेशालय राहत की आशा लेकर कलकत्ता उच्च न्यायालय पहुँचा और वहाँ भी वही अराजकता दिखाई दी। आरोप लगे कि व्हाट्सएप कॉल के माध्यम से पार्टी कार्यकर्ताओं को बुलाकर न्यायालय परिसर में जानबूझकर अव्यवस्था फैलाई गई, ताकि सुनवाई बाधित हो और न्यायपालिका पर दबाव डाला जा सके। उग्र भीड़ के कारण उस दिन न्यायालय सुनवाई नहीं कर सका।

    1. बंगाल का संकट अब केवल स्थानीय नहीं रहा 

    उच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायालय परिसर को जंतर-मंतर जैसे धरना-प्रदर्शन के स्थल में परिवर्तित नहीं किया जा सकता। सुनवाई स्थगित होने के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। इस मामले को अत्यंत गंभीर मानते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया और टिप्पणी की कि केंद्रीय एजेंसियों के कार्य में हस्तक्षेप करना तथा उनके विरुद्ध एफआईआर दर्ज करना राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर है और यह असंवैधानिक भी हो सकता है।

    हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय अभी आना शेष है, लेकिन एक बात स्पष्ट हो चुकी है—ममता बनर्जी सरकार इस पूरे घटनाक्रम को लेकर किसी भी प्रकार की जवाबदेही स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखती। यह मामला अब कोई साधारण विवाद नहीं रह गया है; यह भारत की संस्थागत संतुलन व्यवस्था और संवैधानिक मर्यादाओं की एक गंभीर परीक्षा बन चुका है, जिसका प्रभाव आने वाले वर्षों में केंद्र–राज्य संबंधों और जाँच प्रक्रियाओं पर पड़ेगा।


    लोकतांत्रिक दुरुपयोग और बंगाल का पतन

    पश्चिम बंगाल में लोकतांत्रिक ढाँचे का दुरुपयोग केवल राज्य के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गंभीर चिंता का विषय है। भारत के संविधान में निहित लोकतांत्रिक व्यवस्था धीरे-धीरे सुशासन का माध्यम बनने के बजाय शासन पर बोझ बनती जा रही है—और बंगाल इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है।

    1. बंगाल: भय के सहारे शासन, मौन की अनुमति 

    स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक यह राज्य वामपंथियों का गढ़ रहा, जिसके दौरान उद्यमिता, व्यापार और औद्योगिक विकास लगभग ठप हो गया। अंततः त्रस्त जनता ने वामपंथियों को सत्ता से बाहर किया, लेकिन दुर्भाग्यवश वह एक नई समस्या में फँस गई—तृणमूल कांग्रेस के शासन में।

    ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने वामपंथियों को चुनौती देते हुए बेहतर शासन और सुरक्षा का वादा किया। प्रारंभिक वर्षों में कुछ सुधार दिखाई दिए, किंतु समय के साथ इसका शासन अपने पूर्ववर्तियों से भी अधिक घातक सिद्ध होने लगा।


    तुष्टिकरण, घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा

    सत्ता में बने रहने के लिए तुष्टिकरण की राजनीति को चरम पर पहुँचा दिया गया। अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की आड़ में अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को खुला संरक्षण दिए जाने के आरोप लगे। धीरे-धीरे यह राजनीति उस खतरनाक सीमा को पार कर गई, जहाँ यह चुनावी रणनीति से आगे बढ़कर भारत की एकता और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन गई। स्वाभाविक है कि देश की जनता इसे स्वीकार नहीं कर सकी।

    1. "बंगाल जहाँ सत्ता की रक्षा हिंसा से होती है" 

    इसी पृष्ठभूमि में बंगाल की जनता ने विकल्प तलाशने शुरू किए। वामपंथियों का पूर्ण पतन, कांग्रेस की निष्क्रियता और सांप्रदायिक तुष्टिकरण से उपजे शून्य में भारतीय जनता पार्टी का उदय हुआ। हिंदुओं के प्रति कथित अन्याय को भाजपा ने राजनीतिक मुद्दा बनाया और केंद्र में सत्ता में होने के कारण अपने जनाधार का विस्तार भी किया।


    भाजपा का उदय—और उससे भी तेज़ पतन

    पश्चिम बंगाल में भाजपा का उदय जितना तेज़ रहा, उसका पतन उससे भी अधिक तेज़ सिद्ध हुआ। 2014 में मात्र दो लोकसभा सीटें जीतने वाली भाजपा 2019 में 18 सीटों और लगभग 40 प्रतिशत वोट शेयर तक पहुँच गई। 2021 के विधानसभा चुनावों में उसने तृणमूल के कुशासन से मुक्ति का वादा किया और जनता का व्यापक समर्थन भी प्राप्त किया। किंतु केंद्र में सत्तासीन होने के बावजूद वह राज्य के मतदाताओं को आवश्यक सुरक्षा उपलब्ध कराने में विफल रही।

    मतदान केंद्रों पर केंद्रीय बलों की तैनाती के बावजूद तृणमूल के अराजक तत्वों ने मतदाताओं को घरों से निकलने तक नहीं दिया। परिणामस्वरूप भाजपा सत्ता से दूर रह गई, हालाँकि वह 2016 में मात्र तीन सीटों से बढ़कर 2021 में 77 सीटें पाकर मुख्य विपक्षी दल बन गई।


    हिंसा, पलायन और भय का शासन

    चुनावों के दौरान और उसके बाद हिंसा का पैमाना इतना व्यापक था कि भाजपा समर्थकों को योजनाबद्ध ढंग से निशाना बनाया गया। हज़ारों लोग अपने घर-बार छोड़कर पड़ोसी राज्यों में पलायन को मजबूर हुए। उनका एकमात्र ‘अपराध’ भाजपा का समर्थन करना था।

    भाजपा अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों की रक्षा करने में असफल रही। कई मामलों में लोगों को सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया और तृणमूल कार्यालयों में साष्टांग दंडवत करने को विवश किया गया। इस भयावह वातावरण ने यह धारणा मजबूत कर दी कि संकट की घड़ी में भाजपा अपने समर्थकों के साथ खड़ी नहीं हो सकती।

    इस धारणा का असर 2024 के लोकसभा चुनावों में दिखाई दिया, जब भाजपा की सीटें घटकर 12 रह गईं और उसका वोट प्रतिशत गिरकर 38 प्रतिशत हो गया।


    स्थानीय नेतृत्व और राष्ट्रीय जिम्मेदारी

    पश्चिम बंगाल की राजनीति में स्थानीय नेतृत्व हमेशा निर्णायक रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होने के बावजूद भाजपा राज्य में मज़बूत जमीनी संगठन और भरोसेमंद स्थानीय नेतृत्व विकसित नहीं कर सकी। 2021 की हिंसा के घाव आज भी उसके समर्थकों के मन में ताज़ा हैं।

    सत्ता प्राप्त करने के लिए सामाजिक और सांप्रदायिक समीकरणों के साथ-साथ यह भरोसा भी आवश्यक होता है कि कोई दल अपने समर्थकों को अराजक तत्वों से सुरक्षित रख पाएगा। दुर्भाग्यवश भाजपा इस कसौटी पर खरी नहीं उतर सकी।


    भ्रष्टाचार, हिंसा और केंद्र की निष्क्रियता

    तृणमूल शासन के दौरान बंगाल ने सारदा चिटफंड घोटाला, शिक्षक भर्ती घोटाला, चुनावी हिंसा, रामनवमी शोभायात्राओं पर हमले, अराजक पंचायत चुनाव, रामपुरहाट नरसंहार, संदेशखाली में महिलाओं का यौन शोषण और आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की जघन्य घटना जैसी भयावह घटनाएँ देखीं। ये सभी लोकतांत्रिक पतन की एक डरावनी श्रृंखला प्रस्तुत करती हैं।

    1. “हिंसा से सुरक्षित सत्ता, चुप्पी से संचालित लोकतंत्र” 

    2025 तक आते-आते केंद्रीय एजेंसियों और राज्य सरकार के बीच टकराव सामान्य हो गया। न्यायालयों की कठोर टिप्पणियाँ न तो राज्य सरकार को शर्मसार कर सकीं और न ही केंद्र सरकार को समय रहते हस्तक्षेप के लिए प्रेरित कर सकीं।


    साझा जिम्मेदारी से बचता केंद्र - राजनीतिक लाभ का लालच

    “डबल इंजन सरकार” का आकर्षण बेचने से पहले केंद्र को अपनी दोहरी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। पिछले 10–12 वर्षों में पश्चिम बंगाल ने लोकतांत्रिक क्षरण की गंभीर चुनौतियाँ झेली हैं। यह केवल राज्य सरकार की विफलता नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की निष्क्रियता का भी परिणाम है। कई ऐसे अवसर आए जब राष्ट्रपति शासन अपरिहार्य प्रतीत होता था, किंतु मोदी सरकार ने हस्तक्षेप नहीं किया।

    यदि यह राजनीतिक रणनीति थी—कि तृणमूल को स्वयं बदनाम होने दिया जाए—तो यह पश्चिम बंगाल की जनता के साथ गंभीर अन्याय है।

    आज बंगाल की दयनीय स्थिति के लिए ममता बनर्जी सरकार और केंद्र की मोदी सरकार—दोनों समान रूप से जिम्मेदार हैं। तृणमूल कांग्रेस प्रत्यक्ष दोषी है, लेकिन इस स्थिति को लंबे समय तक बने रहने देने के लिए केंद्र सरकार भी अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती।

    — शिव मिश्रा

    शनिवार, 10 जनवरी 2026

    सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 1000 साल बाद इतिहास का पुनर्स्मरण

     


    सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 1000 साल बाद इतिहास का पुनर्स्मरण || सोमनाथ का संघर्ष – गजनवी से नेहरू तक लगातार शत्रुता का शिकार || मोदी की उपस्थिति से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नया विमर्श


    सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के हमले के 1,000 साल और मंदिर के आधुनिक जीर्णोद्धार के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में 8 से 11 जनवरी 2026 तक चार दिवसीय ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ का आयोजन किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 10 और 11 जनवरी को सोमनाथ मंदिर में रहेंगे और पर्व का हिस्सा बनेंगे। एक हजार वर्ष पूर्व जनवरी 1026 में @स्लामी आक्रांता महमूद गजनवी ने केवल धन-सम्पत्ति की लूट के लिए नहीं, बल्कि जिहादी बर्बरता में इस्लाम के प्रचार और प्रसार तथा @स्लामिक सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए आक्रमण किया था, क्योंकि सोमनाथ मंदिर, भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से सर्वप्रथम है और सबसे महत्वपूर्ण भी है। उसके बाद भी धर्मांध आक्रांताओं के अनेक आक्रमण हुए, लेकिन वे भारत की शाश्वत आस्था को डिगा नहीं सके और सोमनाथ का बार-बार पुनरुद्धार होता रहा।

    नेहरू के पत्रों ने खोला कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” में जाने से पूर्व ही सोशल मीडिया पर मंदिर में 50 साल बाद हुए समारोह की फोटो साझा करते हुए कहा कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के पक्ष नहीं थे और उन्होंने इसमें कई अवरोध खड़े किए थे। भाजपा ने नेहरू के सोमनाथ मंदिर से संबंधित 17 पत्र जारी करते हुए न केवल नेहरू बल्कि कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर दिया है। नेहरू के पत्रों के माध्यम से भाजपा ने कांग्रेस की ऐतिहासिक नीतियों पर सवाल उठाए, जिससे यह विमर्श पुनः रेखांकित हो गया है कि कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता का अर्थ हिंदू विरोध है।

    पटेल का संकल्प, जनता के चंदे से पुनर्निर्मित सोमनाथ

    सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का संकल्प सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्रता के ठीक बाद 11 नवंबर 1947 को समुद्र के सामने खड़े होकर लिया था और जिसे नेहरू की उपस्थिति में केंद्रीय मंत्रिमंडल में सर्वसम्मति से स्वीकार किया था। नेहरू मंत्रिमंडल की बैठक में तो कुछ नहीं बोल सके, लेकिन बाद में उन्होंने इस प्रस्ताव का विरोध किया और उन्होंने हर संभव कोशिश की कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण न हो, लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल के आगे उनकी नहीं चली। नेहरू ने गांधी से शिकायत कर अपनी नाराज़गी प्रकट की। गांधी ने पटेल को सुझाव दिया कि मंदिर का पुनर्निर्माण सरकारी खर्च से न किया जाए। जिसे स्वीकार करते हुए सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ ट्रस्ट की स्थापना की और चंदा लेकर मंदिर का निर्माण कराया।

    राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद बनाम नेहरू: प्राण-प्रतिष्ठा का विवाद

    सोमनाथ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का निमंत्रण नेहरू को दिया गया, जिसे उन्होंने निर्दयतापूर्वक ठुकरा दिया था। उन्होंने अपने सभी मंत्रियों, यहाँ तक कि राष्ट्रपति को भी संदेश दिया था कि वे सोमनाथ समारोह में हिस्सा न लें, लेकिन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में जाने का निर्णय लिया। नेहरू गिरावट की इस श्रेणी तक पहुँच गए थे कि उन्होंने राष्ट्रपति को एक तरह से निर्देश दिया कि वे सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल करके इस समारोह में हिस्सा नहीं लेंगे। इस कारण उनके आने-जाने का प्रबंध व्यक्तिगत संसाधनों द्वारा के. एम. मुंशी ने किया। इसके बाद नेहरू डॉ. राजेंद्र प्रसाद से इस सीमा तक नाराज हो गए कि जीवन पर्यंत उनसे दुश्मनी निभाते रहे। नियमानुसार पदमुक्त होने के बाद राष्ट्रपति को कई भत्ते मिलते हैं और रहने के लिए जीवन पर्यंत आवास की व्यवस्था सरकार करती है, लेकिन नियम ताक पर रखकर नेहरू ने उन्हें कोई सरकारी आवास उपलब्ध नहीं कराया। स्वास के मरीज राजेंद्र प्रसाद का अंतिम समय पटना में कांग्रेस पार्टी के कार्यालय सदाकत आश्रम की एक सीलन भरी कोठरी में गुजरा और वहीं उनकी मृत्यु भी हुई।

    सोमनाथ विरोध में उतरे नेहरु थे लियाकत अली के साथ

    1951 में मुख्यमंत्रियों को लिखे एक पत्र में नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में “धूमधाम और समारोह” पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने कहा था कि इससे विदेशों में भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को नुकसान पहुँचता है। उन्होंने यहाँ तक निर्देश दिए थे कि सोमनाथ ट्रस्ट की ओर से पवित्र नदी का जल भेजने के अनुरोधों पर दूतावास ध्यान न दें। नेहरू ने 21 अप्रैल, 1951 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को एक चिट्ठी लिखी, जिसमें उन्हें 'प्रिय नवाबजादा' कहकर संबोधित किया और उन्हें भरोसा दिया कि सोमनाथ मंदिर के निर्माण जैसी कोई बात नहीं हो रही है। नेहरू ने भारतीय दूतावासों को पत्र लिखकर सोमनाथ ट्रस्ट को किसी भी तरह की सहायता देने से मना किया, जिसमें अभिषेक समारोह के लिए नदी से पानी के अनुरोध भी शामिल थे। पाकिस्तान में भारत के राजदूत को लिखे पत्र में नेहरू ने कहा कि सोमनाथ मंदिर में अभिषेक के लिए सिंधु नदी के पानी के इस्तेमाल को औपचारिक रूप से नामंजूर कर दिया जाए। नेहरू ने सेक्रेटरी-जनरल और विदेश सचिव को निर्देश दिया कि दूतावासों को सोमनाथ ट्रस्ट से पवित्र नदियों के पानी के लिए आने वाले अनुरोधों पर बिल्कुल भी ध्यान न दिया जाए।

    नेहरू के पत्र जारी करने से कोई नई चीज़ सामने आई हो, ऐसा नहीं है, क्योंकि नेहरू का हिंदू विरोध सार्वजनिक था और इसके अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं।

    नेहरु की चलती तो राम मन्दिर का अस्तित्व नहीं बचता

    राम मंदिर के मामले में नेहरू का रुख हिंदुओं के प्रति कैसा था, यह अयोध्या मामले में उनके पत्रों से समझा जा सकता है, जो नेहरू वांग्मय में दिए गए हैं। 22/23 दिसंबर 1949 की मध्यरात्रि में राम जन्मस्थान पर रामलला के प्रकट होने की घटना से नेहरू बहुत नाराज थे। रामलला के प्रकट होने का समाचार सुनकर दूर-दराज के लोग सीधे अयोध्या चले आ रहे थे और देखते-देखते हजारों लोगों का जमावड़ा लग गया। जिला प्रशासन के लिए कानून और व्यवस्था बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गई। नेहरू के निर्देश पर जिला कांग्रेस अध्यक्ष अक्षय ब्रह्मचारी के नेतृत्व में स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता धरना-प्रदर्शन और आमरण अनशन कर जिला प्रशासन पर मूर्तियाँ हटाने का दबाव बनाने लगे। नेहरू ने प्रदेश के मुख्यमंत्री पंत को तुरंत मूर्तियाँ हटवाने का निर्देश दिया। पंत द्वारा ठोस कार्रवाई होती न देख नेहरू ने सीधे फैजाबाद के जिलाधिकारी के.के.के. नायर से फ़ोन पर बात की और गर्भगृह से तुरंत मूर्तियाँ हटवाने का निर्देश दिया। जिलाधिकारी नायर ने बताया कि जन्मभूमि पर हजारों की संख्या में लोगों का जमावड़ा है; ऐसे में मूर्तियाँ हटाना बहुत मुश्किल है।

    केकेके नैयर ने बचाया राम मंदिर

    बढ़ते राजनीतिक दबाव का मुकाबला करने के लिए जिलाधिकारी ने जन्मभूमि परिसर को कुर्क कर रिसीवर नियुक्त कर दिया और उन्हें रामलला की विधिवत पूजा-अर्चना का उत्तरदायित्व भी सौंप दिया। उस समय पूजा-अर्चना की जो विधि अपनाई गई, वह राम मंदिर निर्माण तक लगातार चलती रही। गुस्से में आगबबूला नेहरू ने 29 दिसंबर 1949 को पंत को एक टेलीग्राम भेजा: “मैं अयोध्या के घटनाक्रम से चिंतित हूँ। मैं उम्मीद करता हूँ कि आप जल्दी से जल्दी इस मामले में खुद दखल देंगे। वहाँ खतरनाक उदाहरण पेश किए जा रहे हैं, जिनके बुरे परिणाम होंगे।” मुख्यमंत्री पंत ने प्रदेश के मुख्य सचिव के माध्यम से जिलाधिकारी को लिखित आदेश दिया कि मूर्तियों को तुरंत गर्भगृह से बाहर रख दिया जाए और इसके लिए जितना भी बल प्रयोग करना पड़े, किया जाए। जिलाधिकारी ने बल प्रयोग करने से साफ इनकार करते हुए कहा कि ऐसा करने से जनाक्रोश होगा और बड़ी संख्या में लोग हताहत हो जाएँगे, जो प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से बिल्कुल भी उचित नहीं होगा। जिलाधिकारी नायर की तत्परता और होशियारी से 16 जनवरी 1950 को फैजाबाद के सिविल जज की अदालत में जन्मभूमि का मुकदमा दायर हो गया और मामला न्यायिक विचाराधीन हो गया। पंत ने नेहरू से कहा कि अब दखल देना ठीक नहीं, लेकिन नेहरू किसी भी कीमत पर मूर्तियाँ हटवाना चाहते थे। उन्होंने न्यायलय को भी दबाव में लेने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।

    नेहरू ने एक पत्र 5 मार्च 1950 को पंत को लिखा, जिसे फैजाबाद जिला प्रशासन को मूल रूप से भेजा गया, जिसमें नेहरू का गर्भगृह से मूर्तियाँ तुरंत हटाने का आदेश था। जिलाधिकारी नायर ने सीधे प्रधानमंत्री से मिले निर्देशों पर कार्य करने में असमर्थता व्यक्त की। मुख्य सचिव को भेजे पत्र में नायर ने लिखा कि अगर सरकार किसी भी कीमत पर मूर्तियाँ हटाने का फैसला करती है, तो उससे पहले उन्हें पद से हटा दिया जाए, क्योंकि मूर्तियाँ हटाने के लिए बल प्रयोग करने के कारण बड़ी संख्या में लोगों की जानें जा सकती हैं। इस पृष्ठभूमि में नेहरू ने पंत को एक और पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने लिखा कि जिलाधिकारी आदेशों की अवहेलना कर रहे हैं। वे स्वयं अयोध्या आने के लिए तैयार हैं, लेकिन मुख्यमंत्री पंत, जो स्वयं रामभक्तों के आक्रोश के कारण अयोध्या नहीं जा सके थे, ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया।

    18 मई 1950 को नेहरू ने बिधान चंद्र रॉय को पत्र लिखा: “16 मई के आपके पत्र के लिए धन्यवाद... अयोध्या में बाबर द्वारा बनाई गई एक पुरानी मस्जिद पर वहाँ के पंडा और सनातनी लोगों के नेतृत्व वाली भीड़ ने कब्जा कर लिया। मैं बड़े दुख के साथ कहता हूँ कि यूपी सरकार ने हालात से निपटने में बहुत कमजोरी दिखाई। आपने गौर किया होगा कि यूपी से बड़े पैमाने पर मु@लमानों का पलायन हुआ है।”

    नेहरू ने राम जन्मभूमि को बा@री #स्जिद बनाए रखने का हरसंभव प्रयास किया। राम मंदिर मामले में नेहरू वांग्मय में उनके बड़ी संख्या में पत्र हैं, जिन्हें पढ़कर स्पष्ट होता है कि उनके ये कृत्य हिंदू धार्मिक गतिविधियों और सनातन की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण से उनकी छटपटाहट हैं।

    कांग्रेस तथा उसके सहयोगियों की प्रतिक्रिया और राजनीतिक विमर्श स्वभाविक रूप से रक्षात्मक है. भाजपा नेहरू की धर्मनिरपेक्षता पर प्रश्न उठाकर कांग्रेस की हिंदू विरोधी मानसिकता उजागर करते हुए हिंदू सांस्कृतिक पुनर्जागरण को राजनीतिक समर्थन दे रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मोदी की यात्रा से भाजपा भारत की सांस्कृतिक विरासत को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाकर अपने पक्ष में माहौल बनाना चाहती है, जिसमें विपक्ष बहुत बौना साबित हो रहा है। सोमनाथ का मुद्दा केवल मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस वैचारिक टकराव को भी दर्शाता है, जिसमें एक ओर नेहरू की बनावटी धर्मनिरपेक्षता है और दूसरी ओर सरदार पटेल की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा।

    स्वतंत्रता के बाद से किसी न किसी तरह कांग्रेस मु@स्लिम ध्रुवीकरण अपने पक्ष में करती रही है। अब उसे हिंदुओं के भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण हो जाने की चुनौती मिल रही है। इससे कांग्रेस चुनाव दर चुनाव हार का मुँह देख रही है। यदि कांग्रेस को हिंदुओं का समर्थन चाहिए, तो उसे उनकी भावनाओं को समझना और सम्मान करना चाहिए; अन्यथा राजनैतिक रूप से वह भाजपा का कभी मुकाबला नहीं कर पाएगी।

    वर्ष 2024 में अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का निमंत्रण कांग्रेस ने ठुकरा दिया था। वे चाहते तो शामिल होकर मोदी के हिंदुत्व की धार कुंद कर सकते थे, लेकिन उन्होंने स्वयं अपने ऊपर नेहरूवादी तुष्टिकरण की नीति चस्पा कर ली। इसके पहले भी कांग्रेस 2007 में सेतु समुद्रम परियोजना में सर्वोच्च न्यायालय में शपथ-पत्र देकर कह चुकी है कि राम या रामायण का ऐतिहासिक अस्तित्व नहीं है; ये सब काल्पनिक हैं। ऐसे एक नहीं, अनेक मामले हैं, जिनमें कांग्रेस भी आक्रांताओं की ही तरह बार-बार हिंदू आस्था पर प्रहार करती आयी है। ऐसे में हिंदू जनमानस भी उन्हें लगातार सत्ता से बेदखल करता रहे, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अगर तुष्टिकरण की कीमत होती है तो विरोध की भी कीमत चुकानी होगी.

    ~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~

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