शनिवार, 17 मई 2025

बायकाट टर्की कितना जरूरी

 

ऑपरेशन सिन्दूर || पाकिस्तान, टर्की, और अजर्वैजान तथा भारतीय विपक्ष की समानताएं और संभावनाएं || "बायकाट टर्की" कितना जरूरी ?


22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए हिंदू नरसंहार के बाद मोदी सरकार द्वारा आतंकवादियों और उनके आकाओं के विरुद्ध चलाए गए सुनियोजित अभियान में पाक अधिकृत कश्मीर तथा पाकिस्तान स्थित आतंकी ठिकानों पर किए गए जबरदस्त और ताबड़तोड़ हमले में सैकड़ों आतंकवादी मारे गए और बड़ी संख्या में घायल हुए. बौखलाए पाकिस्तान ने नियंत्रण रेखा के पार से भारी गोलीबारी की और ड्रोन से भारतीय वायुसैनिक अड्डों पर हमला करने की कोशिश की. भारतीय सेनाओं की जवाबी कार्रवाई तथा भारतीय वायु रक्षा की मजबूत प्रणाली ने पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलें हवा में ही मार गिराये गए. पाकिस्तान के कई सैन्य ठिकाने पूरी तरह से बर्बाद हो गए, विशेषकर नूर खान और सरगोधा जिसके पास ही पाकिस्तान के परमाणु ठिकाने हैं. भारत पर परमाणु बम से हमला करने के लिए इन्हीं सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल किया जाता, जिनके नष्ट होने से भारत पर परमाणु हमले की आशंका तो समाप्त हो गई लेकिन किराना हिल में भूमिगत परमाणु जखीरे में कुछ ऐसा हुआ जिससे उस क्षेत्र में भूकंप जैसे झटके महसूस किए गए और विकरण (रेडिएशन) की सूचनाएं भी मिली. बाद में अमेरिका और मिस्र के जहाज जिनमें न्यूक्लियर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम के सदस्यों के पहुँचने की सूचनाएं भी प्राप्त हुई.

भारत को हमेशा परमाणु बम की धमकी देने वाले पाकिस्तान के लिए इतनी वीभत्स परिस्थितियों में भारत से युद्धविराम का अनुरोध करनें के अलावा कोई विकल्प शेष नहीं था. युद्धविराम सुनिश्चित करने के लिए उसने अमेरिका और सऊदी अरब से भी गुहार लगाई जिनसे मोदी के अच्छे संबंध हैं. भारत का उद्देश्य पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर स्थित आतंकवादियों और उनके आकाओं के ठिकानों को नेस्तनाबूत करना था, जो काफी हद तक पूरा हो चुका था. ब्रह्मोस मिसाइल सहित भारत में बने कई हथियारों का सफल प्रयोग और प्रदर्शन भी हो चुका था, इसलिए युद्धविराम भारत के लिए भी श्रेयस्कर था. यद्यपि अमेरिका के बड़बोले राष्ट्रपति ट्रंप ने हाल के अपने गलत फैसलों से विश्व का ध्यान हटाने के लिए भारत-पाक युद्ध विराम का श्रेय हड़पने की कोशिश करके भारत की सफलता को कमतर करने का प्रयास भी किया. ट्रंप के इस निंदनीय कार्य को अपना ट्रंप कार्ड बनाकर भारतीय विपक्ष ने मोदी के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया और भारतीय सेना के उत्कृष्ट प्रदर्शन और शौर्य को हतोत्साहित करने का काम शुरू कर दिया क्योंकि भारतीय राजनेता हर काम में चुनावी राजनीति करते हैं चाहे देश का उससे कितना भी नुकसान क्यों न हो जाए. इसके पहले सर्वदलीय बैठक में विपक्ष ने पाकिस्तान के विरुद्ध किसी भी कार्रवाई के लिए मोदी सरकार को पूर्ण समर्थन दिया था लेकिन अब युद्ध विराम पर सवाल उठाए जा रहे हैं.

आतंकी देश पाकिस्तान के विरुद्ध कार्रवाई में भारतीय नौसेना, वायु सेना, थल सेना और खुफिया एजेंसियों का जबरदस्त सामंजस्य देखने को मिला जिससे बिना नियंत्रण रेखा पार किए आतंकी ठिकानों को चिन्हित कर इतना सटीक प्रहार किया गया जिसे पाकिस्तान की चीन निर्मित वायुरक्षा प्रणाली समझ नहीं सकी. इससे चीन निर्मित वायु रक्षा प्रणाली तथा चीनी विमानों की किरकिरी हुई वहीं भारतीय हथियारों के लिए नया बाजार मिलने की असीम सम्भावनाएं बन गयी है. आतंकवाद के विरुद्ध भारतीय के इस अभियान में टर्की, अजरबैजान और चीन ने खुलकर पाकिस्तान का साथ दिया. चीन लंबे समय से पाकिस्तान और उसके आतंकवादियों के साथ देता रहा है क्योंकि उसने सीपैक के माध्यम से पाकिस्तान में बड़ा निवेश कर रखा है, और इसलिए आर्थिक हितों के कारण ऐसा करना मजबूरी भी है और जरूरी भी. टर्की ने पाकिस्तान को राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन देने के साथ साथ सैन्य सामग्री और ड्रोन भी उपलब्ध कराए. टर्की के सैनिक ही ड्रोन संचालित कर रहे थे. टर्की की इस भूमिका ने पारस्परिक संबंधों पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर दिया है. यद्यपि सरकार ने अभी कोई प्रतिबंधात्मक कदम नहीं उठाए हैं लेकिन टर्की के बहिष्कार की जनभावना का सम्मान करते हुए उद्योग एवं व्यापार तथा शिक्षा जगत ने टर्की से अपने संबंध समाप्त करने शुरू कर दिए हैं.

टर्की हमेशा भारत के लिए राक्षस की भूमिका में रहा है. तुर्क इस्लामिक आक्रांताओं ने न केवल भारत को लूटा बल्कि हिंदुओं का जघन्य नरसंहार भी किया. ऑटोमन साम्राज्य तुर्की के खलीफा को ब्रिटेन द्वारा पदच्युत किए जाने के विरोध में भारतीय मुसलमानों द्वारा खलीफ़त आन्दोलन चलाया गया. जिसका घोषित उद्देश्य अंग्रेजों को विरोध प्रदर्शन के माध्यम से तुर्की के खलीफा को बहल करने के लिए मजबूर करना था लेकिन इस आंदोलन की परिणित हिंदू नरसंहार के माध्यम से भारत का विभाजन करके पाकिस्तान बनाने के रूप में हुई. भले ही जिन्ना को पाकिस्तान का निर्माता कहा जाता हो लेकिन पाकिस्तान का असली निर्माता और प्रेरणा स्रोत टर्की है. इसलिए टर्की का पाकिस्तान को समर्थन और सैन्य संसाधन उपलब्ध कराना आश्चर्यजनक नहीं है.

पाकिस्तान और पाक-परस्त भारतीय मुसलमानों का जितना गहरा संबंध टर्की से है उतना ही गहरा संबंध टर्की से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का भी है. गाँधी ने खलीफत आंदोलन को न केवल समर्थन दिया बल्कि हिंदू जनमानस को धोखा देने के लिए उसका नाम खिलाफत आंदोलन कर दिया जिससे यह असहयोग आन्दोलन का उर्दू रूपांतर लगने लगे. खलीफ़त आंदोलन के कारण देशभर में सांप्रदायिक दंगे हुए जिसमें हिंदुओं को निशाना बनाया गया लेकिन गाँधी और नेहरू तब तक आंखें बंद किए रहे जब तक हिन्दुओं को मुस्लिम नेताओं की यह बात सही नहीं लगने लगीं कि “हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते”. देश के विभाजन में गाँधी और नेहरू ने अंग्रेजों के साथ मिलकर हिंदुओं के साथ धोखा किया. धर्म के आधार पर पाकिस्तान का निर्माण हुआ लेकिन एक बड़े षड्यंत्र के अंतर्गत मुसलमान पाकिस्तान नहीं गए और इस कार्य में गाँधी और नेहरू मुस्लिमों के सबसे बड़े सहायक बने. गाँधी ने अहिंसा का पाठ पढ़ाकर हिन्दुओं के नरसंहार पर आंखें बंद रखी और केवल हिंदुओं को धर्मनिरपेक्षता का पाठ पढ़ाकर भारत को साझे की खेती बना दिया. गाँधी और नेहरू के सपनों का भारत बनाने के लिए कांग्रेस ने कभी भी मुस्लिम तुष्टीकरण के अभियान को मंद नहीं पड़ने दिया. उसने पाकिस्तान ही नहीं सभी मुस्लिम देशों के साथ अच्छे संबंध बनाने के लिए राष्ट्रीय हितों के साथ समझौता करने में कभी कंजूसी नहीं की. इसलिए कांग्रेस के टर्की में कार्यालय खोलने पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

टर्की में आई प्राकृतिक आपदा के समय मोदी सरकार ने सबसे पहले मानवीय सहायता पहुंचाई लेकिन टर्की के साथ संबंधों में प्रगाढ़ता कांग्रेस के शासनकाल में आई. नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो ने टर्की की सेलेबी एविएशन का लाइसेंस रद्द कर दिया है जिसे 9 हवाई अड्डों दिल्ली मुंबई, बैंगलोर, हैदराबाद,चेन्नई, कोचीन अहमदाबाद, गोवा, तथा कानपुर पर ग्राउंड हैंडलिंग, कार्गों, वेयर हाऊसिंग और यात्री सहायता कार्य करने का ठेका 2008 में कांग्रेस शासन में मिला था. इंडिगो एयरलाइन के टर्किश एयरलाइन्स के साथ कोड शेयरिंग समझौते का भी विरोध हो रहा है, जिसपर इंडिगो ने सफाई देकर समझौते का बचाव किया है. तुर्की के राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन इस्लामिक देशों के खलीफा बनने और पूरे विश्व में इस्लाम का परचम फहराने को बेताब है, जिसके लिए किसी भी इस्लामिक देश के साथ खड़े होने का मौका नहीं छोड़ते. उन पर कई देशों द्वारा इस्लामिक आतंकवादियों के अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क को वित्तीय सहायता तथा हथियार देने का आरोप लगता रहा है, जिसके लिए टर्की की कंपनियों का उपयोग किया जाता है. इसलिए टर्की की किसी भी कंपनी को राष्ट्रीय हित में भारत में कार्य हेतु अनुमति नहीं मिलनी चाहिए.

भारत में बायकॉट टर्की का आंदोलन ज़ोर पकड़ चुका है जो उद्योग एवं व्यापार के हर क्षेत्र को बहुत तेजी प्रभावित कर रहा है. कई संगठनों ने टर्की से आयात न करने का फैसला किया है. बड़ी संख्या में भारत के पर्यटक टर्की और अजरबेजान जाते हैं. अब पर्यटन सेवा प्रदाता भारतीय कंपनियां पर्यटकों से टर्की और अजरबेजान के बजाय भारतीय स्थानों या अन्य देशों का चयन करने की अपील कर रही हैं. आइआइटी रुड़की और जेएनयू सहित कई विश्वविद्यालयों ने टर्की के साथ अपने समझौते समाप्त करने की घोषणा कर दी है. लाल सिंह चड्ढा की शूटिंग तुर्की में करने वाले आमिर खान, जिनके एर्दोगन परिवार से घनिष्ठ संबंध है, मौन हैं. फ़िल्म जगत भी शांत है लेकिन कांग्रेस ने बायकॉट का समर्थन करने या टर्की के विरुद्ध कुछ कहने के बजाय सरकार पर ही प्रश्न दागने शुरू कर दिए हैं.

टर्की के बायकॉट पर देश की सोच बिलकुल सही है. सभी को इस आंदोलन का हिस्सा बन कर जिहादी मानसिकता और खलीफाई महत्वाकांक्षा का विरोध करना चाहिए.

~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

शनिवार, 3 मई 2025

सब कुछ तैयार, तो मोदी को है किसका इन्तजार

 


सब कुछ तैयार, तो मोदी को है किसका इन्तजार || भारत पाक युद्ध में असमंजस के बीच देशवासियों के सब्र का बाँध छलकने लगा || अवैध पाकिस्तानियों ने उड़ाई सरकार की नींद लेकिन खेल अलतकिया सबाब पर


22 अप्रैल 2025 को जम्मू कश्मीर के पहलगाम में घूमने गए 27 से अधिक लोगों की इस्लामिक आतंकवादियों द्वारा धर्म पूछ कर केवल हिन्दुओं की नृशंस हत्या कर दी गई. आतंकियों ने इन लोगों से कलमा पढ़ने को कहा और जिन्होंने नहीं पढ़ा उन्हें गोलियों से भून दिया. इस हिंदू नरसंहार से पूरे देश में उबाल है. लोगों की प्रबल इच्छा है कि सरकार आतंकियों और उनके आकाओं को ऐसा सबक सिखाये कि वे फिर इस तरह की घटना करने की हिम्मत न जुटा सके. सरकार ने भी ऐसे संकेत दिए कि वह आतंकवादियों और आतंकी देश पाकिस्तान के विरुद्ध अब तक की सबसे बड़ी और निर्णायक कार्रवाई करेगी. सरकार द्वारा आहूत सर्वदलीय बैठक में सभी राजनीतिक दलों ने आतंकवाद के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने में सरकार के समर्थन की घोषणा की. संशोधित वक्फ बोर्ड कानून के विरुद्ध आक्रामक बयानबाजी और सड़कों पर हिंसक धरना प्रदर्शन में व्यस्त मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम संगठनों ने भी आश्चर्यजनक रूप से न केवल इन जघन्य हत्याओं की निंदा की बल्कि काली पट्टी बांधकर नमाज़ अदा की और कई जगह कैंडल मार्च भी आयोजित किए. यदि यह विरोध वास्तविक है तो स्वागत योग्य है लेकिन इस्लाम, धर्म से अधिक राजनीति है और अलतकिया एक स्थापित परंपरा है जिसमे विपरीत परिस्थितियों में आडम्बर करना रणनीति होती है. इसलिए हिंदुओं को किसी भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए.

वैसे तो स्वतंत्रता के बाद से ही भारत पाकिस्तान प्रयोजित इस्लामिक आतंकवाद की चपेट में है और देश के लगभग सभी हिस्सों में आतंकी घटनाएं होती रही है लेकिन जम्मू कश्मीर में जिस ढंग से हिंदुओं का नरसंहार किया गया और उनकी जमीन जायदाद पर कब्जा किया गया वह विश्व का अनोखा उदाहरण है. यहाँ धर्मांध मुस्लिमो ने ही अपने पड़ोसी हिंदुओं का सफाया करने में मुख्य भूमिका निभायी. कई इस्लामिक संगठन और अतिवादी मुस्लिम भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने के लिए जम्मू कश्मीर का मॉडल पूरे देश में लागू करना चाहते हैं. इसलिए पूरी तैयारी के साथ सांप्रदायिक दंगों के लिए बहाने खोजे जाते हैं. पत्थरबाजी, आगजनी और हिंदुओं की निर्मम हत्याओं की प्रकृति भी कश्मीर प्रेरित होती है. आतंकवाद भले ही पाकिस्तान प्रयोजित हो लेकिन स्थानीय स्तर पर इस्लामिक कट्टरपंथी उनका न केवल पूरा सहयोग करते हैं बल्कि उनके दुष्कृत्यों को छिपाने के लिए राजनैतिक समर्थन भी हासिल कर लेते हैं.

सर्वदलीय बैठक में पाकिस्तान के विरुद्ध किसी भी कार्रवाई के लिए सरकार को पूर्ण समर्थन देने के बाद कई राजनेताओं ने तुष्टीकरण की राजनीति शुरू करते हुए आतंकी हमले का कारण सुरक्षा चूक और खुफिया एजेंसियों की विफलता बताना शुरू कर दिया है. कांग्रेस, वामपंथी. आरजेडी. टीएमसी, समाजवादी पार्टी आदि के नेताओं ने प्रत्यक्षदर्शियों और भुक्तभोगियों के दावों को झुठलाते हुए आतंकवादियों द्वारा धर्म पूछे जाने की बात पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. लालू की पार्टी ने आतंकी घटना को लिखी हुई पटकथा बताते हुए इसे सरकार प्रयोजित बताया. तुष्टीकरण की गंदी नाली के राजनीतिक कीड़ों को विवादित स्वयंभू शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का भी समर्थन मिला, जिन्होंने घटना के लिए मोदी को जिम्मेदार ठहराया और सरकार द्वारा प्रस्तावित कार्रवाई को केवल बयानबाजी बताया.

भारत ने प्रारंभिक तौर पर जो कदम उठाए हैं उनमें सिंध जल समझौता निलंबित करने, दूतावास में कर्मचारियों की संख्या कम करने,पाकिस्तानियों को वीज़ा बंद करने तथा वीजा पर आये पाकिस्तानियों को भारत छोड़ने, द्विपक्षीय व्यापार पर रोक लगाने पाकिस्तान के लिए भारतीय हवाई क्षेत्र प्रतिबंधित करने जैसे कई कदम शामिल हैं. इस बीच भारत में उच्च स्तरीय बैठकें हो रही है और सैन्य तैयारियां शुरू हो चुकी है. अरब सागर में भारतीय जल सेना ने मोर्चाबंदी कर ली है. वायु सेना अत्याधुनिक विमानों मिग, सुखोई और राफेल के साथगंगा एक्सप्रेस वे पर अभ्यास कर रही है और थल सेना ने रणनैतिक घेराबंदी शुरू कर दी है. पाकिस्तान में दहशत का माहौल है. उसने एटम बम की धमकियां देना शुरू कर दिया है. विश्व के अधिकांश देश या तो भारत के साथ हैं या पाकिस्तान के विरोध में लेकिन तुर्की खुलकर पाकिस्तान के समर्थन में आया है तथा चीन ने पाकिस्तान का खामोश समर्थन किया है.

भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की चर्चाओं के बीच आतंकवादियों की स्थानीय इकाइयों से ध्यान पूरी तरह हटा दिया गया है. तंत्र ने पूरे देश का आक्रोश पाकिस्तान की ओर मोड़ कर आतंकवाद की स्थानीय जड़ें पूरी तरह सुरक्षित करने का प्रयास किया है. पहलगाम हिंदू नरसंहार में केवल पुरुषों को मारा गया, स्त्रियों को छोड़ दिया गया जिनसे मिली जानकारी के आधार पर यह बिल्कुल स्पष्ट है कि स्थानीय घोड़ा चालकों और पर्यटन व्यवसाय में लगे अन्य स्थानीय लोगों में आतंकवादियों की बहुत अच्छी पैठ बन चुकी है. इन बदली परस्थितियों में सैलानियों की जान को गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है. इस घटना के बाद पर्यटक लौट गए हैं और घाटी में पर्यटन व्यवसाय पर गंभीर संकट आ गया है. यह नहीं माना जा सकता कि कश्मीर में पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों को इतनी समझ न हो कि ऐसी घटनाओं से उनका व्यवसाय बंद हो जाएगा. फिर भी यह हुआ तो इसका सीधा मतलब है कि घाटी में आर्थिक विकास से आतंकवाद समाप्त नहीं किया जा सकता. सरकार को इसके लिए कठोर निर्णय करने पड़ेंगे जो कश्मीरियत की गलत धारणा के कारण अब तक नहीं किए जा सकें. जम्मू कश्मीर में सरकार और विपक्ष में वही राजनैतिक दल है जिनके रहते घाटी में पहले भी भयानक हिंदू नरसंहार हो चुके हैं और जिनके रहते ही हिंदुओं का पलायन हुआ था. आज घाटी में नाम मात्र के हिंदू बचे हैं. मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, इस कारण अलगाववाद का समर्थन करने वाले नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी जैसे दलों को सत्ता से बाहर करना संभव नहीं है. जब तक इनमें से कोई भी दल सत्ता में रहेगा, घाटी से आतंकवाद समाप्त होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है .

भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने के लिए मुसलमान और अनगिनत मुस्लिम संगठन देश में कहाँ क्या कर रहे हैं, इसकी सही और सटीक जानकारी किसी के पास उपलब्ध नहीं है. पाकिस्तानी पासपोर्ट पर वीजा लेकर आए नागरिको को वापस किए जाने को लेकर सनसनीखेज रहस्योद्घाटन हो रहे हैं. अनेक पाकिस्तानी नागरिक वीजा ख़तम होने के बाद भी दशकों से भारत में रह रहे हैं, उन्होंने भारत की नागरिकता भी नहीं ली लेकिन उनके पास आधार कार्ड, राशन कार्ड ओर वोटर आईडी कार्ड सब कुछ हैं. ऐसे लोगो की संख्या लाखों में हो सकती है. जम्मू कश्मीर में ही ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं, जिसमे एक इफ्तिखार अली वीजा खत्म होने के बाद भी पिछले 60 सालों से भारत में रह रहे हैं. वह जम्मू कश्मीर के पुलिस विभाग में कर्मचारी हैं, उनका मकान है, परिवार है और बच्चे भी यही बस चुके हैं, जबकि शेष भारत का कोई व्यक्ति कश्मीर में न तो जमीन खरीद सकता है और न ही वहाँ का निवासी बन सकता है. भारत की अनेक मुस्लिम महिलाओं ने पाकिस्तान में शादी की है. वे सरकारी अस्पतालों में सरकारी योजनाओं का फायदा लेकर बच्चे जनने के लिए मायके आती है. चूंकि बच्चे भारत में जन्मते हैं इसलिए वे अपने आप भारत के नागरिक बन जाते हैं. कई महिलाएं तो ऐसी भी हैं जो पाकिस्तानियों से शादी करने के बाद भी कभी भी पाकिस्तान नहीं गई और उनके दर्जनों बच्चे हैं क्योंकि उनकी पाकिस्तानी पति वीजा लेकर इसी काम के लिए भारत आते हैं. अभी तक भारत बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों से त्रस्त था, जिनकी संख्या भारत में 5 करोड़ से भी अधिक हो गयी बताई जाती है. लेकिन अब इन अवैध पाकिस्तानियों ने एक नई समस्या खड़ी कर दी है. यह भारत में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ाकर भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने का अभियान है. यह देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता के लिए बहुत बड़ा खतरा है. अब जब उन्हें पाकिस्तान भेजा जा रहा है तो फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती जैसे मुस्लिम हितैषी और पाकिस्तान परस्त उन्हें भारत से निकाले जाने का विरोध कर रहे हैं और सरकार के इस कार्य को अमानवीय, अनैतिक और गैरकानूनी बता रहे हैं. अब्दुल्लाह और मुफ़्ती वही लोग हैं जिन्हें कश्मीर से हिंदुओं के पलायन पर न उस समय कोई अफसोस था और न आज. इन्होंने धारा 370 हटाने का विरोध किया था और इसकी बहाली के लिए चीन से सहायता लेने भी गए थे. ये आज भी पाकिस्तान से बात करने की हिमायती है.

जम्मू कश्मीर में आज आर्थिक विकास से ज्यादा इस बात की आवश्यकता है कि वहाँ प्राचीन सांस्कृतिक मूल्यों की स्थापना की जाए, हिंदू जनसंख्या को बढ़ाई जाए और विस्थापित हिंदुओं को वापस लाया जाए. हिंदुओं का जनसंख्या घनत्व बढाने के लिए पूर्व सैनिकों को बसाने का कार्य एक अच्छा विकल्प हो सकता है.

भारत के इस्लामीकरण अभियान को तभी रोका जा सकता है जब मदरसों पर रोक लगाई जाए, मस्ज़िदों को नियंत्रित किया जाए, वक्फ बोर्ड तथा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी संस्थाओं को तुरंत समाप्त किया जाए और पूजा स्थल कानून को रद्द किया जाए. समान नागरिक संहिता और समान शिक्षा नीति तुरंत लागू की जाए. जितनी जल्दी हो सके भारत को सनातन राष्ट्र घोषित किया जाए. अन्यथा भारत के इस्लामीकरण की गति रोक पान संभव नहीं लगता.

~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा~~~~~~~~~~~~~

मंगलवार, 29 अप्रैल 2025

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का हिंदू विरोध क्यों ?

 



स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का हिंदू विरोध क्यों ?

आजकल एक दंडी बाबा  स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती बहुत चर्चा में है. वह अपने आप को ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य कहते हैं. सामान्य जनता भी उन्हें शंकराचार्य ही समझती है और मीडिया ने तो उन्हें शंकराचार्य के रूप में स्थापित कर ही दिया है. उन्होंने पहलगाम में हुई घटना के लिए मोदी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि सबसे पहले तो चौकीदार को पकड़ा जाना चाहिए वह क्या कर रहा था और इस तरह उन्हें जिम्मेदार ठहराया है. पाकिस्तान के विरुद्ध प्रस्तावित कार्रवाई का भी उन्होंने मखौल उड़ाते हुए कहा कि मोदी कहते रहते हैं कि ये कर देंगे वो कर देंगे और जनता को बेवकूफ बनाते हैं. सिंधु नदी का जल रोका ही नहीं जा सकता है क्योंकि भारत के पास इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री झूठ बोल रहे हैं और मीडिया भी सनसनी फैला रहा है कि पाकिस्तान को बूंद बूंद पानी को तरसा देंगे.

इसके पहले भी वह कई मामलों में हिंदू विरोध की दस्तक दे चुके हैं. उन्होंने मुर्शीदाबाद की घटना को कानून और व्यवस्था का मामला बताते हुए कहा कि इसे हिंदू मुस्लिम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. तीर्थराज प्रयाग में आयोजित महाकुंभ 2025 में भगदड़ मचने वाली घटना के बाद उन्होंने योगी आदित्यनाथ पर जमकर प्रहार किया था और उन्हें झूठा मुख्यमंत्री करार दिया था. उनके इस्तीफ़े की मांग की और महाकुंभ को सरकारी कुंभ की संज्ञा देते हुए तमाम अव्यवस्थाओं को बढ़ा चढ़ाकर पेश किया और योगी सरकार की आलोचना की. दंडी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती भाजपा को घेरने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने देते और कई मौकों पर तो ऐसा लगता है कि उनका व्यवहार विशुद्ध राजनैतिक है और वे किसी राजनीतिक दल का मोहरा बने हुए हैं. 

उनके व्यवहार से ऐसा लगता है जैसे वह एक असंतुष्ट व्यक्ति हैं और भाजपा से खासे नाराज उनकी नाराजगी की वजह क्या है, इस पर शोध करने से पता चलता है कि अविमुक्तेश्वरानंद को लगता है कि केंद्र की भाजपा सरकार ने उन्हें ज्योतिषपीठ का शंकराचार्य बनने से रोकने की कोशिश की और उनके कारण ही सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी पट्टाभिषेक पर रोक लगा दी है.

अविमुक्तेश्वरानंद गुजरात की द्वारका-शारदा पीठ और उत्तराखंड की ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के शिष्य हैं. स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का 11 सितंबर २०२२ को निधन हो गया था। इसके बाद उनकी वसीयत के आधार पर उनके निजी सचिव ने अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ का नया शंकराचार्य घोषित कर दिया था। यह बहुत असामान्य घटना थी क्योंकि किसी भी शंकराचार्य की नियुक्ति वसीयत के आधार पर नहीं हो सकती. वास्तव में शंकराचार्य के चयन की एक प्रक्रिया है जिसका पालन नहीं किया गया था. इस कारण संन्यासी अखाड़े ने अविमुक्तेश्वर को ज्योतिष पीठ का नया शंकराचार्य मानने से इनकार कर दिया। निरंजनी अखाड़ा और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने भी विरोध किया और कहा कि शंकराचार्य की नियुक्ति की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है। मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा. अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने समर्थन में झूठ बोल कर कहा कि उनकी नियुक्ति का समर्थन गोवर्धन पीठ पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने भी किया है लेकिन गोवर्धन पीठ पुरी के शंकराचार्य की और से एक हलफनामा दायर कर बताया गया कि उन्होंने अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य के रूप में नियुक्ति का समर्थन नहीं किया है. भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल ने भी इस बात की पुष्टि की जिसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक समारोह पर अगले आदेशों तक रोक लगा दी, जो आज भी लगी है. पट्टाभिषेक समारोह वह होते हैं जिसमे चयनित शंकराचार्य की विधिवत शंकराचार्य के रूप में पदस्थापना की जाती है. इसलिए अविमुक्तेश्वरानंद ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य नहीं है.

ज्योतिषपीठ की विडंबना यह भी है की अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती भी पूरे कार्यकाल विवादों से घिरे रहे और उनकी नियुक्ति भी शंकराचार्य के रूप में कभी नहीं हो सकी थी. 1973 में जब ज्योतिष्पीठ में शंकराचार्य का पद रिक्त हुआ तो काशी विद्वत परिषद और भारत धर्म महामंडल ने शंकराचार्य की जिम्मेदारी स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को दे दी लेकिन एक अन्य सन्यासी स्वामी वासुदेवानंद ने शंकराचार्य के पद पर अपनी दावेदारी पेश कर दी और मामला प्रयागराज उच्च न्यायालय पहुँचा. 44 साल बाद उच्च न्यायालय ने 2017 में अपने फैसले में वासुदेवानंद  की दावेदारी को ठुकरा दिया और स्वरूपानंद सरस्वती की नियुक्ति को अवैध घोषित कर दिया. उच्च न्यायालय ने काशी विद्वत परिषद को अन्य तीन मठों के प्रमुखों से सलाह करके किसी योग शंकराचार्य को चुनने का निर्देश दिया लेकिन न्यायालय ने यह भी कहा कि जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती स्वरूपानंद सरस्वती ज्योतिर्मठ के कार्यवाहक शंकराचार्य के रूप में कार्य कर सकते हैं. वह अपनी आखिरी सांस तक केयरटेकर शंकराचार्य के रूप में कार्य करते रहे. इन्हीं केयर टेकर शंकराचार्य की वसीयत के आधार पर अपनी दावेदारी पेश करने वाले अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति का मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा और उनके पट्टाभिषेक पर रोक लग गई.

शंकराचार्य के रूप में अपनी नियुक्ति ना हो पाने के लिए वे केंद्र की मोदी सरकार को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराते हैं और इसलिए वह राजनैतिक रूप से अत्यन्त मुखर होकर हर संभव उनका विरोध करते हैं. सर्वोच्च न्यायालय में कांग्रेस ने अपने वकीलों के माध्यम से उनकी सहायता की थी इसलिए वह कांग्रेस के पक्षधर हैं और कांग्रेस के पक्षधर होने के नाते वे पूरे इंडी गठबंधन के भी पक्षधर हैं. कांग्रेस ने अपने मीडिया विभाग के माध्यम से उन्हें शंकराचार्य के रूप में स्थापित कर दिया है और उन्हें इस्तेमाल कर रही है. अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती पर भी कांग्रेसी शंकराचार्य होने का आरोप पूरी जिंदगीभर चस्पा रहा क्योंकि वह धार्मिक मामलों में भी कांग्रेस का पक्ष आगे बढ़ाते थे तथा भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ खुलकर मोर्चा संभालते थे.

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के निवासी अविमुक्तेशरानंद  का नाम उमाशंकर उपाध्याय है जिहोने डॉक्टर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की डिग्रियां लेते हुए राजनीति में भी ज़ोर आजमाइश की और छात्र राजनीति में हिस्सा लिया. अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने शंकराचार्य के प्रतिनिधि के रूप में मुस्लिम त्यौहार के परिदृश्य में गणेश प्रतिमा विसर्जन पर रोक लगाने के सरकार के फैसले के विरुद्ध साधु संतों के एक प्रदर्शन का आयोजन किया था और सरकार के निर्देश पर पुलिस द्वारा उनकी जमकर पिटाई की गई थी.  महाकुंभ के दौरान अखिलेश यादव ने उनसे मिलकर पिछली घटना के लिए खेद व्यक्त किया तो उन्होंने अतीत की पीड़ा भूल कर अखिलेश यादव के साथ मिलकर महाकुंभ के नाम पर केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को जमकर घेरा.

सूत्र बताते हैं कि भाजपा के चुनाव चिन्ह पर उन्होंने 2014 में लोकसभा का चुनाव लड़ने की भी इच्छा ज़ाहिर की थी जिसे भाजपा ने उनके कांग्रेसी संबंधों के चलते स्वीकार नहीं किया. 2019 के लोकसभा चुनावों में अविमुक्तेश्वरानंद ने वाराणसी से प्रधानमंत्री नरेंद्र के खिलाफ एक उम्मीदवार उतारने का प्रयास किया था जो सफल नहीं हो सका लेकिन 2024 में गौ गठबंधन के बैनर तले एक उम्मीदवार उतार भी दिया था. कांग्रेस नेता अजय राय द्वारा वाराणसी में मोदी के विरोध में आयोजित राजनैतिक धरना प्रदर्शन में भी अविमुक्तेश्वरानंद ने बढ़ चढ़कर भाग लिया था.

भाजपा का विरोध करने के लिए वे आज सन्यासी की गरिमा को गिराते हुए हिंदू विरोधी और राष्ट्र विरोधी लाइन ले रहे हैं, जो उन्हें शंकराचार्य के पद हेतु पूरी तरह से अयोग्य सिद्ध करता है . ऐसे धर्मगुरु, साधु, सन्यासी और शंकराचार्य  जो अपने निजी स्वार्थ में लिप्त हैं,  सनातन धर्म और सनातन संस्कृति की रक्षा नहीं कर सकते.

~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2025

पहलगाम में काफिरों पर कहर | आतंकवाद का धर्म है और धर्म का ही आतंक है

 


पहलगाम में काफिरों पर कहर | आतंकवाद का धर्म है और धर्म का ही आतंक है | आतंवादियों ने न जाति पूँछी और न ये कि पीडीए कौन है

कश्मीर में पहलगाम की खूबसूरत वादियों में छुट्टियां मनाने गए लोगों को इस्लामिक आतंकियों ने बेहद क्रूरता से मौत के घाट उतार दिया. इन मुस्लिम उन्मादी राक्षसों ने सैलानियों से उनका नाम पूछा, धर्म पूछा और हिंदुओं तथा सभी गैरमुस्लिमों को निर्दयता पूर्वक गोलियों से भून दिया. लोगों से कलमा पढ़ने को कहा गया. कपड़े उतरवाकर खतना देखा गया और 28 लोगों को मौके पर ही निर्ममता पूर्वक मार डाला गया. इससे भारत की षड्यंत्रकारी छद्म धर्मनिरपेक्षता ओर मुस्लिम तुष्टीकरण के उस नारे की एक बार पोल खुल गयी कि आतंकवादियों का धर्म नहीं होता. भारत में तो आतंकवाद का धर्म बिल्कुल स्पष्ट है और किसी को भी भ्रम में नहीं रहना चाहिए. जातिगत जनगणना की मांग करने वाले और पीडीए की बदौलत सत्तासीन होने का सपना देखने वाले राजनेताओं की आंखें खुल जानी चाहिए कि मुस्लिम आतंकवादियों ने किसी की जाति नहीं पूछी, नहीं पूछा कि वे पीडीए है. उनके लिए केवल यह जानना जरूरी था कि वे हिंदू हैं और इसी आधार पर सभी को मौत के घाट उतार दिया.

इस घटना से पूरे देश में उबाल है. लोगों में बेहद गुस्सा है आतंकवादियों तथा पाकिस्तान के लिए और थोडा केंद्र सरकार के लिए भी. निश्चित रूप से इस बात की समीक्षा की जानी चाहिए कि इतनी बड़ी घटना की नैतिक जिम्मेदारी किसकी है. राज्य की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी उपराज्यपाल के माध्यम से केंद्र सरकार के पास है, जिसमें गृहमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की महत्वपूर्ण भूमिका है. आखिर इतनी बड़ी सुरक्षा चूक कैसे हो गई. जहाँ खुफिया एजेंसियों की विफलता स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है, वहीं राज्य में स्थानीय राजनेताओं के दबाव में केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती में की गई कटौती भी एक प्रमुख कारण है. उपराज्यपाल की कार्यप्रणाली राजनैतिक रूप से सही भले ही हो लेकिन जम्मू कश्मीर जैसे आतंकवाद से प्रभावित अति संवेदनशील राज्य के लिए रणनीतिक रूप से बहुत उपयुक्त कभी नहीं रही. केंद्र सरकार जोरशोर से इस बात का प्रचार करती रही कि राज्य में कानून और व्यवस्था की स्थिति बिल्कुल सामान्य है, जिसके पीछे भी उपराज्यपाल का सही वस्तुस्थिति से अवगत न कराना प्रमुख कारण हो सकता है.

अधिकांश क्षेत्रों में सफलता अर्जित करने वाले अजित डोभाल भी राज्य की स्थिति से अनभिज्ञ कैसे बने रहे. केंद्र सरकार को राज्य की सुरक्षा स्थिति की सघन समीक्षा करनी चाहिए और बिना किसी राजनीतिक बाजीगरी के सुरक्षा कमजोरियों को तुरंत दूर किया जाना चाहिए. केंद्रीय सुरक्षा बलों को घाटी में तब तक रहना चाहिए जब तक आतंकवाद का पूरी तरह से खात्मा नहीं हो जाता. राज्य के पुलिस और प्रशासनिक कर्मचारी अब केंद्र शासित प्रदेशों के कैडर का हिस्सा है, इसीलिए राज्य के अधिक से अधिक कर्मचारियों को दूसरे केंद्र शासित प्रदेशों में तत्काल स्थानांतरित करने की आवश्यकता है, जिनके स्थान पर दूसरे केंद्र शासित प्रदेशों के कर्मचारियों अधिकारियों को लाया जा सकता है. इससे राज्य के कर्मचारियों और पृथकतावादियों के बीच का वर्षों से चला आ रहा तंत्र टूट सकेगा और राज्य का वातावरण बदलने में सहायता मिल सकेगी.

पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद भारत के लिए नया नहीं है. दशकों से हम लोग आतंकवाद के साये में ही रहते आए हैं. हमने वह समय भी देखा है जब रेडियो और टीवी पर लगातार सूचनाएं प्रसारित की जाती है कि किसी भी लावारिस वस्तु को हाथ न लगाएं यह बम हो सकता है. रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर गाड़ियों की सूचनाओं के बीच में यह सूचना लगातार प्रसारित की जाती थी. लोग जब घरों से कार्यालय, व्यवसाय या किसी कार्य से बाहर जाते थे तो उन्हें विश्वास नहीं होता था कि वह वापस आ पाएंगे और घर वाले भी वापस आने तक चिंता में डूबे रहते थे. मोदी सरकार बनने के बाद आतंकवाद पर जबरदस्त अंकुश लगा इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती. धारा 370 हटाना, जम्मू कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करना बहुत सकारात्मक कदम था. राज्य में कानून व्यवस्था को सामान्य बनाना बहुत बड़ी चुनौती थी जिसमें भी मोदी सरकार को बहुत सफलता मिली. अच्छा होता यदि जम्मू को भी अलग केंद्र शासित प्रदेश बना दिया जाता, तो आतंकवाद के प्रभाव को केवल घाटी तक सीमित किया जा सकता था. जम्मू कश्मीर में बाहरी लोगों द्वारा संपत्ति खरीदने और स्थायी निवासी बनने के मामले में मोदी सरकार कमजोर पड़ गयी. राज्य में लोकसभा और विधानसभा सीटों के परिसीमन के मामले में भी केंद्र सरकार हिचकिचाहट से बाहर नहीं निकल पाई, इस कारण आज भी राज्य में सत्ता की धुरी कश्मीर घाटी है, जो भारत विरोधियों और पृथकतावादियों से बुरी तरह प्रभावित है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ दिन पहले ही फारूक अब्दुल्ला ने मुर्शीदाबाद हिंदू नरसंहार और पलायन पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह भारत की मुस्लिमों के प्रति नफरत की राजनीति का परिणाम है. इंजीनियर रशीद का लोकसभा में दिया गया भाषण भी कश्मीर घाटी के माहौल को रेखांकित करता है. एक प्रश्न यह भी है कि राज्य में चुनाव करवाने की इतनी जल्दी क्या थी जबकि इससे सुधरते माहौल का पटरी से उतरने का खतरा था, जो सही साबित हो गया. हो सकता है इसके पीछे सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ का दबाव हो जब उन्होंने कहा था कि राज्य को लंबे समय तक लोकतंत्र से बिरत नहीं रखा जा सकता लेकिन देश की एकता और अखंडता की जिम्मेदारी तो केंद्र सरकार की है.

भारत में हर आतंकवादी घटना को पाकिस्तान से जोड़ दिया जाता है, यह भारत के मुस्लिम संगठनों और मुस्लिम तुष्टिकरण का राजनीतिक विमर्श है, जो सरकारों के लिए भी उपयुक्त होता है लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि पाकिस्तान चाहे कितना ही ज़ोर लगा ले बिना स्थानीय समर्थन और सहयोग के भारत में किसी आतंकवादी घटना को अंजाम नहीं दिया जा सकता. भारत की विडंबना है कि हम स्थानीय आतंकवादियों पर कार्रवाई करना तो दूर उनकी तलाश तक नहीं करते और जब कभी स्थानीय रंगे हाथों पकड़े जाते हैं तो विभिन्न राजनैतिक दल उन्हें बचाने का प्रयास करते हैं और सफल भी हो जाते हैं. इस काम में न्यायपालिका का भी भरपूर समर्थन मिलता है उनके लिए रात 12:00 बजे सर्वोच्च न्यायालय खुल जाता है. उन्हें जेल जाने से बचाने के लिए सर्वोच्च न्यायलय में एक ही दिन में तीन तीन बेंचों का गठन कर जमानत देना सुनिश्चित कर लिया जाता है. कोई देश चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, जब तक आतंकवाद की स्थानीय इकाइयों को नष्ट नहीं करता, आतंकवाद का सफाया नहीं कर सकता.

भारत विश्व का इकलौता देश है जहाँ, इस्लामिक आक्रान्ताओं और मुस्लिम आतंकवादियों द्वारा 10 करोड़ हिंदुओं का नरसंहार किया गया. वह देश भी कितना दुर्भाग्यशाली है जो आज तक यह नहीं समझ सका कि आतंकवाद का धर्म होता है. हिंदुओं का नरसंहार करना कुछ लोगों का धार्मिक कृत्य है. इस नासमझी के कारण ही भारत में आतंकवाद के विरुद्ध भारत में कभी कोई गंभीर लड़ाई लड़ी ही नहीं गई. कश्मीर मामले में भी मोदी सरकार का मत था कि घाटी के आतंकवाद पर सांप्रदायिक दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए और इसलिए आतंकवाद से लड़ने के लिए विकास का मॉडल चुना गया. जम्मू कश्मीर को जितनी केंद्रीय सहायता आज तक दी गयी उतनी तो उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े और गरीब राज्यों को भी कभी नहीं दी गई. घाटी को दी गई इस सहायता राशि का बड़ा हिस्सा राजनेताओ ने हड़प लिया, जो अप्रत्यक्ष रूप से अलगाववादियों और आतंकवादियों को भी पहुंचता रहा क्योंकि राज्य में राजनीति और आतंकवाद दोनों एक दूसरे के पूरक हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की अपेक्षा के अनुरूप आतंकवादियों और उनके आकाओं को मिट्टी में मिला देने की चेतावनी देते हुए कहा है कि उन्हें ऐसी सजा मिलेगी जिसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकते. संतोष की बात है कि पूरा विश्व भारत के साथ खड़ा है लेकिन भारत की उस राजनीति का क्या करें, जिसमें समूचा विपक्ष आतंकवादियों और पाकिस्तान के साथ खड़ा है क्योंकि उनकी पूरी राजनीति मुस्लिम तुष्टिकरण पर ही आधारित है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास” के नारे के साथ भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की धुन में है. उन्हें लगता है कि हिन्दुओं के विरुद्ध नफरत की भावना तथा भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की कामना को विकास के मॉडल से दूर किया जा सकता है, जो पूरी तरह से गलत है. यह वही गलती है जिससे विश्व की कई सभ्यताएं नष्ट हो गई और दुनिया में इस्लामिक राष्ट्रों की संख्या बढ़कर 57 हो गई. इस्लामिक विद्वान कहते हैं कि गज़वा-ए-हिंद धार्मिक कृत्य है, तो फिर इससे कौन इनकार कर सकता है कि भारत निशाने पर हैं.

~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

सोमवार, 10 फ़रवरी 2025

महाकुंभ पर महाभारत

 



महाकुंभ पर महाभारत


29 जनवरी 2025 को मौनी अमावस्या के अमृत स्नान के दिन कुंभ मेले में हुई भगदड़ में कई लोग मारे गए और अनेक घायल हुए, जिससे विपक्ष को योगी और उनकी व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करने का मौका मिल गया. विपक्षी दल, जो पहले कुंभ आयोजन पर करदाताओं के पैसे की बर्बादी का राग अलापते थे, लाशों की राजनीति में लग गए. इसके लिए संसद से सड़क तक तरह तरह के उपक्रम किए जा रहे हैं. योगी और मोदी का इस्तीफा भी मांगा गया और जनता में रोष उत्पन्न करने के लिए साधु संतों का सहारा भी लिया गया. दुर्भाग्य से ऐसे अनेक साधु संत हैं भी जो सनातन धर्म और संस्कृति को लांछित करने के लिए विपक्ष का हथियार बन जाते हैं. ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने तो योगी आदित्यनाथ पर सीधे प्रहार करते हुए कहा कि वह मुख्यमंत्री के पद के योग्य नहीं है, वह झूठा है, और उनका इस्तीफा तक मांग लिया. यद्यपि शकाराचार्य स्वयं विवादित व्यक्ति है, लेकिन किसी भी शंकराचार्य को राजनीतिक मोहरा नहीं बनना चाहिए. आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म को समृद्ध और शक्तिशाली बनाने के लिए जिन पीठों की स्थापना की थी उनका दुरुपयोग सनातन धर्म और संस्कृति को अपमानित करने के लिए हो इससे बड़ा दुर्भाग्य और कुछ नहीं हो सकता. कुम्भ में अव्यवस्था का आरोप लगाते हुए इस्तीफ़े की मांग तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के नेताओं ने भी की जिससे इस्तीफ़ा मांगने वालों के बीच आपसी सम्बन्ध का भी पता चलता है.

यद्यपि राज्य सरकार ने तुरंत पुलिस और न्यायिक जांच के आदेश दिए लेकिन राजनीतिक गिद्ध लाशों पर बैठ गए और अभी भी मृतकों की संख्या पर विवाद कर रहे हैं. अन्य देशों की घटनाओं से संबंधित भ्रामक वीडियो सोशल मीडिया में प्रसारित किये जा रहे हैं, और उनके आधार पर यह सिद्ध करने की कोशिश की जा रही है कि मृतकों की संख्या हजारों में है. सपा नेत्री जया बच्चन ने तो यहाँ तक कह डाला संगम का पानी तो दिल्ली में यमुना के पानी से भी ज्यादा संक्रमित है क्योंकि वहाँ हजारों लोगों की लाशें पानी में फेंकी गई हैं. कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने यहाँ तक कह डाला है कि कुंभ स्थान से न रोटी मिलती है न रोजगार लेकिन लोग हजारों रुपया बर्बाद करके डुबकी लगाने जा रहे हैं. इन दोनों ही दलों ने शुरुआत से ही कुम्भ के विरुद्ध अभियान चला रखा है त्ताकि यह आयोजन सफल न हो सके.  

यह तुष्टीकरण की ही पराकाष्ठा थी कि ज्ञानवापी में ऋंगार गौरी और संभल में श्री हरि विष्णु मंदिर में हिंदुओं की पूजा अर्चना बंद करवाने वाले राजनेता, कुंभ में मुस्लिमों के स्टाल लगाने  पर प्रतिबंध के विरोध में योगी के विरुद्ध विष वमन कर रहे थे, कुम्भ की भूमि को वक्फ की जमीन बता रहे थे, लेकिन भगदड़ में श्रद्धालुओं के मरने और घायल होने से खासे उत्साहित और प्रफुल्लित यही राजनेता घड़ियाली आंसू बहाने लगे. प्रत्यक्षदर्शियों और घायलों के अनुसार भगदड़ जान बूझकर करवाई गई थी और इसके लिए कुछ अराजक तत्वों को भेजा गया था. इसके बाद सरकार ने कुंभ दुर्घटना की जांच एसटीएफ को सौंपी दी, जिसकी प्रारंभिक जांच में षडयंत्र की पुष्टि हुई है. एसटीएफ ने कई लोगों को हिरासत में लिया है और पूछ्ताछ चल रही है. भगदड़ के लिए कोई भी पार्टी या नेता जिम्मेदार क्यों न हो, लेकिन राजनैतिक दुर्भावना से किया गया यह षड्यंत्र मानवता को शर्मसार करने वाला है. यदि यह षड्यंत्र है तो इसमें शामिल लोग हिंदू और हिंदुस्तान के हितैषी नहीं हो सकते, यह सभी हिन्दुओं को सदैव याद रखना चाहिए.  

144 बरसों बाद बने अद्भुत खगोलीय संयोग से प्रयागराज में हो रहे महाकुंभ 2025 पर कुछ राजनीतिक दल ओछी राजनीति कर रहे हैं. 6 वर्षों के अन्तराल पर अर्धकुंभ, 12 वर्षों पर पूर्ण कुम्भ का संयोग बनता है.144 वर्षों के बाद पडने वाले महाकुंभ का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसमें कोई भी व्यक्ति अपने पूरे जीवनकाल में एक बार ही सम्मिलित हो सकता है. इसलिए इस महाकुंभ में श्रद्धालुओं की संख्या अर्द्धकुंभ और पूर्ण कुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या से कई गुना अधिक होना स्वाभाविक है. इस बार सरकार ने 40 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं के भाग लेने का अनुमान लगाया था और डिजिटल आकलन के अनुसार अब तक आये श्रद्धालुओं का आंकड़ा इसके काफी करीब पहुँच चुका है, जबकि अभी दो सप्ताह से अधिक का समय बाकी है. इस प्रकार यह आंकड़ा 60 करोड़ पार कर सकता है. उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके लिए व्यापक तैयारियां भी की हैं. यह आयोजन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हृदय के बहुत नजदीक है और इसलिए वह लगातार आयोजन की व्यवस्थाओं की सूक्ष्म निगरानी करते रहे और अनेक बार संगम स्थल पर जाकर तैयारियों का जायजा लेने पहुंचे. इसमें कोई संदेह नहीं कि महाकुंभ 2025 की व्यवस्था अब तक के सभी कुंभ आयोजनों में सर्वश्रेष्ठ हैं.

वर्तमान समय में राजनीति में आ रही गिरावट नित नई नीचाइयाँ छू रही है, लेकिन यह अनायास नहीं है क्योंकि लगातार राजनीतिक गिरावट की व्यवस्था तो संविधान में ही निहित  है और उसका मूल कारण है ब्रिटेन की नकल कर बनाई गई बहुदलीय राजनैतिक प्रणाली. भारत में राजनीति अब समाज और राष्ट्रसेवा का माध्यम न हो कर सबसे अधिक फायदेमंद उद्योग बन गयी है. कुकुरमुत्तों की तरह राजनीतिक दल उग आए हैं और अनेक लोग सत्ता पाकर प्रादेशिक क्षत्रप बन गए हैं. यह स्थिति लगभग हर राज्य में हो चुकी है. सत्ता पाने के लिए ये कुछ भी करने को तैयार है लेकिन मुस्लिम तुष्टीकरण इनका अनिवार्य कर्तव्य बन गया है, और हिंदू विरोध स्वाभाविक दिनचर्या. इसलिए केवल समाजवादी पार्टी ही नहीं, कांग्रेस और उसके गठबंधन के राजनीतिक दल हिंदू और उनके तीज त्योहारों, पौराणिक परंपराओं का मुखर विरोध करते हैं. हिन्दुओं को बांटने के लिए जातिगत जनगणना का जाप करते हैं और अन्य पिछड़ा वर्ग में सभी मुसलमानों को भी जोड़ लेते हैं, जैसा कि हाल में तेलंगाना में हुए जातिगत सर्वे में किया गया है. अखिलेश यादव का पीडीए यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक (केवल मुसलमान) मात्र चुनाव जीतने का फॉर्मूला है, जो उनका अपना नहीं है, बल्कि भारत को 2047 तक इस्लामिक राष्ट्र बनाने का पीएफआई फॉर्मूला है. समाजवादी पार्टी का मुस्लिम तुष्टीकरण किसी से छिपा नहीं है. लालू यादव ने जब मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर उनका रामरथ रोक दिया था तो मुलायम सिंह यादव कहाँ पीछे रहने वाले थे उन्होंने राम जन्मभूमि पर राम भक्तों पर गोली चलवाकर सैकड़ों कार सेवकों की हत्या करवा दी. बाद में उन्होंने कहा भी था कि अगर मुस्लिमों को खुश करने के लिए और हिंदुओं को मरवाना होता तो वे जरूर मरवाते.

अखिलेश यादव की साढ़े चार  मुख्यमंत्री वाली सरकार में एक मुख्यमंत्री आजम खान भी थे जो 2013 में प्रयागराज में कुम्भ आयोजन के प्रभारी थे. सरकार द्वारा घोषित आंकड़ों के अनुसार उस समय लगभग 2 करोड़ श्रद्धालु शामिल हुए थे. उस समय भगदड़ में 42 से अधिक श्रद्धालुओं की मृत्यु हो गई थी. इस कारण वह योगी आदित्यनाथ द्वारा कुंभ आयोजन के लिए प्रस्तावित भव्य व्यवस्थाओं पर दिए जा रहे बयानों से काफी कुंठित थे. विपक्षी को इस बात की भी चिंता थी कि दावे के अनुसार यदि कुम्भ में 40 करोड़ लोग शामिल होते हैं और यह सकुशल संपन्न हो जाता है तो भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक लाभ होगा, योगी का कद बढ़ेगा और विपक्ष को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा. इसलिए उन्होंने कुंभ आयोजन में खामियां गिनवाने के नाम पर अनेक भ्रामक बयान दिये. उनकी देखा देखी राहुल भी इस अभियान में जुट गए. समाजवादी पार्टी, कांग्रेस तथा इंडी गठबंधन के घटक दल पूरे कुंभ आयोजन को कटघरे में खड़ा करने के लिये हर संभव गलतबयानी कर  हिंदू समाज को दिग्भ्रमित करने का काम रहे हैं. इसका उद्देश्य केवल हिंदू श्रद्धालुओं को कुम्भ में आने से रोकना नहीं है बल्कि बड़ा उद्देश्य हिन्दुत्व को कमजोर करने, हिंदू समाज को विभाजित करने के साथ हिंदू धर्म और संस्कृति को नष्ट करना है. ये सभी हिंदू विरोधी, वामपंथी और इस्लामिक कट्टरपंथियों के इशारे पर काम कर रहे हैं जो जल्द से जल्द भारत को इस्लामिक राष्ट्र में बदलना चाहते हैं.

समझना मुश्किल नहीं है कि अधिकांश राजनैतिक दल स्वार्थ में पूरी तरह अंधे हो चुके हैं. अब वे अपनी प्राचीन सनातन संस्कृति पर स्वयं प्रहार कर उसे नष्ट करने पर आमादा है. राष्ट्र की एकता और अखंडता पर उत्पन्न हो चुके गंभीर खतरे से भी उन्हें कोई लेना देना नहीं है. सत्य तो यह है कि वे स्वयं राष्ट्र के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं. इसलिए सभी राष्ट्रप्रेमियों को सावधान ही नहीं रहना होगा बल्कि ऐसे तत्वों से जमकर लोहा लेना होगा क्योंकि राष्ट्र की रक्षा के लिए सभी की सहभागिता और योगदान आवश्यक है. 

~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

शनिवार, 25 जनवरी 2025

जिहाद का अर्थशास्त्र है हलाल

 




               जिहाद का अर्थशास्त्र है हलाल

हलाल का बवाल फिर उबाल पर है और इसका कारण है उत्तर प्रदेश सरकार के हलाल उत्पादों पर प्रतिबंध के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में दायर हुई याचिका. योगी  सरकार ने 18 नवंबर 2023 को हलाल उत्पादों की बिक्री, वितरण और भंडारण पर प्रतिबंध लगा दिया था. योगी आदित्यनाथ के इस कदम की जितनी प्रशंसा की जाय कम है क्योंकि यह देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर कलंक होने के साथ देश की अर्थव्यवस्था में सरकार के समानांतर जजिया की तरह टैक्स वसूलने का षडयंत्र है, जो राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए बहुत बड़ा खतरा है क्योंकि इस पैसे का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों, धर्मान्तरण और गजवा-ए-हिन्द के वित्तपोषण के लिए किया जाता है. यह बड़ा और राष्ट्रीय महत्त्व का मुद्दा है, इसलिए यह कार्य तो मोदी सरकार को बहुत पहले करना चाहिए था. दुर्भाग्य से दो पूर्ण बहुमत के कार्यकाल में उन्होंने इस पर कुछ नहीं किया. अब नाइडू और नीतीश की बैसाखी के सहारे चलने वाली सरकार कोई कार्रवाई करेगी या कानून बनाएगी इसकी संभावना नहीं है. वैसे भी मोदी सरकार हिंदू हितों के मामलों में स्वयं साहसिक कदम उठाने के बजाय सर्वोच्च न्यायालय के कंधे पर डाल कर समाधान खोजती है लेकिन भारतीय न्यायपालिका का इस्लामिक और वामपंथी शक्तियों के दबाव में काम करने का पुराना इतिहास है, इसलिए उससे  सकारात्मक निर्णय की अपेक्षा करना व्यर्थ है. इसे शाहीनबाग, किसान आंदोलन आदि के मामले से समझा जा सकता है.

सर्वोच्च न्यायालय ने निर्यात के लिए उत्पादित वस्तुओं को छोड़कर उप्र की योगी सरकार द्वारा हलाल उत्पादों की बिक्री, वितरण और भंडारण पर लगाए गए प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई प्रारम्भ की. ये याचिकाएं जमीयत उलेमा-ए-हिंद की तरफ से लगाई गई हैं, जो हलाल प्रमाण पत्र देकर जजिया की तरह टैक्स  वसूली करने वाली भारत की सबसे बड़ी संस्था है और यह देवबंद दारूल उलूम के सर्वेसर्वा और गज़वा ए हिंद के प्रमुख कर्ताधर्ता अरशद मदनी की जेबी संस्था है. भारत के महाधिवक्ता तुषार मेहता ने कहा कि यह हैरान करने वाला है कि सीमेंट, सरिया, आटा, बेसन यहां तक कि पानी की बोतल तक का हलाल प्रमाणन किया जा रहा है और लाखों करोड़ रुपये वसूले जा रहे हैं. न्यायमूर्ति बीआर गवाई की अध्‍यक्षता वाली पीठ के समक्ष सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने मांस आधारित उत्पादों के अतिरिक्त अन्य उत्पादों पर हलाल प्रमाणपत्र को लेकर हैरानी जताई. उन्‍होंने कहा कि जहां तक ​​हलाल मांस का सवाल है, किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती लेकिन आश्चर्य की बात है  ​​कि सीमेंट-सरिये को भी हलाल-प्रमाणित किया जा रहा है. बोतलबंद पानी भी हलाल प्रमाणित किया जा रहा है. न्यायालय ने जमीयत उलेमा ए हिंद को प्रतिउत्तर दाखिल करने के लिए 1 मार्च तक का समय दे दिया. न्यायालय ने पहले ही जमीयत उलेमा ए हिंद के मालिक अरशद मदनी और इसके कर्मचारियों के विरुद्ध किसी भी दंडात्मक कार्रवाई पर प्रतिबंध लगा रखा है.

भारत में विभिन्न उत्पादों और सेवाओं के लिए सरकारी मानकीकरण की व्यवस्था है.  खाद्य पदार्थों की शुद्धता और गुणवत्ता के लिए FSSAI, अन्य उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए के लिए ISI (BIS), ISO आदि द्वारा प्रमाणन होता है. इसलिए किसी व्यक्ति या निजी संस्था द्वारा उत्पादों और सेवाओं का प्रमाणन न केवल अनावश्यक बल्कि गैरकानूनी है और देश की संप्रभुता को चुनौती है. स्थिति यह हो गयी है कि हलाल उत्पाद जो हिंदुओं के लिए धार्मिक रूप से अस्वीकार्य हैं, जबरन थोपे जा रहे हैं क्योंकि रेल, हवाई जहाज, होटल, रेस्टोरेंट और सरकारी कैंटीनों हलाल चाय, कॉफी, दूध और दूसरे खाद्य पदार्थ प्रयोग किए जा रहे हैं, और गैर मुस्लिमों को इसकी जानकारी भी नहीं दी जाती.

भारत में संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता का दुरुपयोग कर कुछ मुस्लिम संस्थाओं द्वारा हलाल प्रमाणपत्र देकर भारी शुल्क वसूला जा रहा है. पिछली सरकारों ने वोट बैंक और तुष्टिकरण की राजनीति के चलते न केवल इसे अनदेखा किया बल्कि निर्यात किए जाने वाले मांस का हलाल प्रमाणन अनिवार्य भी कर दिया था जिस कारण मांस के निर्यात के व्यवसाय गैर मुस्लिम बाहर हो गए. यद्यपि मोदी सरकार ने मांस की  निर्यात प्रक्रिया में थोड़ा सुधार करके ऐसे देश जो हलाल मांस की मांग नहीं करते, उन्हें निर्यात किए जाने वाले मांस में हलाल प्रमाणन की अनिवार्यता खत्म कर दी है लेकिन यह नाकाफी है.

हलाल उत्पाद, जिहाद का ही एक हिस्सा हैं. गैर मुस्लिम राष्ट्र में जहाँ कहीं भी मुसलमान होते हैं, राजनीतिक इस्लाम के वैश्विक षड्यंत्र के अनुसार उस देश की अर्थव्यवस्था को कब्जाने की कोशिश की जाती है. मुसलमानों द्वारा सफाई, कूड़ा और कबाड़ बीनने जैसे छोटे छोटे कार्य अपने हाथ में लेकर बहुसंख्यकों का दिल जीतने की कोशिश की जाती है जिसके लिए अवैध घुसपैठियों को लगाया जाता है. पंचर जोड़ने से लेकर स्कूटर, मोटरसाइकिल और कार की मरम्मत, डेंटिंग, पेंटिंग, वेल्डिंग आदि का काम हथिया लेते हैं. बाल काटने से लेकर लुहार और बढ़ई का काम भी करते हैं. बहुसंख्यकों के तीज त्यौहार और उत्सवों में सेवा प्रदाता के रूप में अपनी पहुँच बनाते हैं. महिलाओं की चूड़ी, सिंदूर और सौंदर्य प्रसाधन की सामग्री से लेकर सिलाई कढ़ाई बुनाई पर इस समुदाय ने अपनी पकड़ बना ली है. सब्जी और फलों के थोक और फुटकर बाजार पर मुस्लिमों का कब्ज़ा है. मंदिरों में फूल और प्रसाद बेचने वाले भी बड़ी संख्या में मुस्लिम मिल जाएंगे. मांस, और चमड़ा उद्योग पूरी तरह से इस समुदाय के पास है. हलाल प्रमाण पत्र के लिए कई औपचारिकताएं होती हैं जिसमें उत्पाद बनाने के लिए मुसलमान कर्मचारियों का होना एक अनिवार्य शर्त है. यह बिना किसी संवैधानिक व्यवस्था के आरक्षण का लाभ लेना है, जो मुस्लिम समुदाय को रोजगार प्राप्त करने के अवसर भी उपलब्ध कराता है. इसके अतरिक्त उस परिसर में प्रार्थना कक्ष, क़िबला दिशा सूचक, नमाज चटाई, स्थानीय नमाज की समय सूची, कुरान की कॉपी, रमजान से संबंधित सेवाएं उपलब्ध होना भी आवश्यक है. इस तरह हलाल प्रमाण पत्र लेने वालों से ही इस्लाम का प्रचार और प्रसार करवाया जाता है.

हलाल का जाल अब केवल मांस तक सीमित नहीं है बल्कि यह दैनिक जीवन में प्रयोग किए जाने वाले सभी उत्पादों और सेवाओं  पर फैल गया है. सौंदर्य प्रसाधन, घर गृहस्थी  के सभी सामान, दवाइयां, अस्पताल, ईट, सीमेंट, सरिया, फ्लैट, विला साहित लगभग सभी वस्तुओं और सेवाओं पर शिकंजा कस दिया है. यही नहीं कच्चे माल, भण्डारण, और पूरी औद्योगिक इकाई पर भी हलाल प्रमाणन आवश्यक है। हलाल प्रमाणन  के नाम पर उत्पादकों और सेवा प्रदाताओं से बड़ी रकम वसूली जाती है, जिसका उपयोग इस्लामीकरण के लिए किया जा रहा है, जिसमे आतंकवादी गतिविधियों का वित्तपोषण, धर्मांतरण तथा जिहाद की सभी परियोजनाये शामिल हैं. जमीयत उलेमा-ए-हिंद गोधरा में 59 हिंदुओं को साबरमती एक्सप्रेस की बोगी में जिन्दा जलाकर मारने वाले सजायाफ्ता आतंकी कैदियों के सर्वोच्च न्यायालय में लड़ रहे हैं. गोधरा तथा गुजरात दंगों में आरोपित मुस्लिमों के मुकदमे भी इसी ने लड़ें. चाहे  अयोध्या, मथुरा और काशी में हिंदू धर्म स्थलों को तोड़ कर बनाई गई मसजिदों के मुकदमें हों, या फिर संशोधित नागरिकता कानून, समान नागरिक संहिता, वक्फ बोर्ड आदि से संबंधित मुकदमे हो सब का वित्तपोषण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जमीयत उलेमा ए हिन्द करता रहा है. देशभर में होने वाले हिंदू मुस्लिम दंगों के मुस्लिम आरोपितो के मुकदमों तथा दंगों में मुस्लिम मृतकों के परिवारों को वित्तीय सहायता भी जमीयत उलेमा-ए-हिंद और हलाल से जुड़े अन्य संगठन करते हैं. इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं है कि जजिया की तरह वसूला गया हलाल टैक्स आतंकवादी और राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में किया जाता हैं. गज़वा-ए-हिंद से जुड़े हुए सभी जिहादी कार्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से देवबंद दारूल उलूम और जमीयत उलेमा ए हिंद से जुड़े होते हैं.

हलाल जिहाद का अर्थशास्त्र है जिसे हलालोनॉमिक्स कहते हैं. इसका उद्देश्य वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कब्जा करके गैर-मुस्लिमों से पैसा वसूल कर पूरी दुनिया में इस्लाम का वर्चस्व कायम करना है. पूरे विश्व में हलाल अर्थव्यवस्था ८ ट्रिलियन यूएस डॉलर पार कर चुकी है. विश्व हलाल कॉन्फ्रेंस में बोस्निया के ग्रैंड मुफ्ती मुस्तफा सरिक ने  कहा था कि “अब उन्हें हथियार उठाकर युद्ध करने और आतंक फैलाने की  जरूरत नहीं है, हलाल अर्थव्यवस्था के माध्यम से ही वे  पूरे विश्व पर राज कर सकेंगे.” 

सरकार और न्यायालय इस विषय में कुछ करेगा इसकी संभावना नहीं है लेकिन सभी गैर मुस्लिम विशेषकर हिंदू जागरूक बनें और हलाल उत्पादों का बहिष्कार करें. इस प्रकार देश और सनातन संस्कृति को काफी हद तक बचा सकते हैं, और यह काम आप आज से ही शुरू करें क्योंकि कल बहुत देर हो जायेगी. 

~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

 

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