मंगलवार, 28 फ़रवरी 2023

होली 2023 - होलाष्टक में भूल कर भी न करे ये काम वरना हो सकता है बड़ा नुक...



क्या होते हैं होलाष्टक?

होलाष्टक में क्या करें क्या न करें?

होलाष्टक के शाब्दिक अर्थ पर जायें, तो होला + अष्टक अर्थात होली से पूर्व के आठ दिन, जो दिन होता है, वह होलाष्टक कहलाता है। सामान्य रुप से देखा जाये तो होली एक  दिन का पर्व न होकर पूरे नौ दिनों का त्यौहार है।

 

होलाष्टक के समय शुभ कार्य वर्जित होते है

क्योंकि इस दौरान नौ में से आठ ग्रह अपनी उग्र अवस्था में रहते हैं इस वर्ष होलाष्टक की शुरुआत 27 फरवरी से हो रही है 28 फरवरी 2023 मंगलवार से होलाष्टक प्रारंभ हो रहा है जो होलिका दहन यानी 7 मार्च तक चलेगा होलास्टक के दिन शुभ कार्य करना प्रतिबंधित रहता है क्योंकि इन दिनों आठ गृह अपनी उग्र अवस्था में रहते हैं

प्राचीन मान्यता है कि इस अवधि में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव पृथ्वी पर सर्वाधिक होता है इस नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव को समाप्त करने के लिए ही होलिका का निर्माण किया जाता है विशेषकर गाय के गोबर से निर्मित शुद्ध कंडों से होली का दहन किया जाएं तो सकारात्मक ऊर्जा का संचार होना शुरू हो जाता है

यद्यपि होलाष्टक की अवधि में शुभ कार्य करने की मनाही होती है लेकिन इस अवधि में अपने आराध्य देव की पूजा अर्चना लगातार करते रहना चाहिए क्योंकि यह एक नियमित कार्य होता है और सबसे बड़ी चीज़ ये है की होलास्टक के अवधि में जो भी व्रत आदि किए जाते हैं उनका पुण्य लाभ सामान्य दिनों की अपेक्षा कहीं अधिक मिलता है इसलिए आठ दिनों में धर्म कर्म के कार्य वस्त्र अनाज और अपनी इच्छा और सामर्थ्य के अनुसार जरूरत मंद लोगों को अगर आप दान करते हैं तो आपको इसके शुभ परिणाम भी प्राप्त होते हैं

- होलाष्टक के दौरान  भी विवाह, मुंडन, नामकरण, सगाई समेत 16 संस्कार ना करें.

- होलाष्टक के समय नए मकान, वाहन, प्लॉट या दूसरे प्रॉपर्टी की खरीदारी करने से बचें.

- होलाष्टक के समय किसी भी प्रकार का धार्मिक कार्यक्रम यज्ञ, हवन आदि ना करें.

- होलाष्टक के दौरान नई नौकरी ज्वाइन नहीं करना चाहिए, वरना परेशानियों का सामना करना पड़ेगा.

- होलाष्टक के दौरान कोई भी नया बिजनेस नहीं शुरू करना चाहिए, क्योंकि नए बिजनेस की शुरुआत के लिए यह समय शुभ नहीं होता है.

 

होलाष्टक में न करें ये कार्य 

1. विवाह:👉 होली से पूर्व के 8 दिनों में भूलकर भी विवाह करें। यह समय शुभ नहीं माना जाता है, जब तक कि कोई विशेष योग आदि न हो।

 

2. नामकरण एवं मुंडन संस्कार:👉

होलाष्टक के समय में अपने बच्चे का नामकरण या मुंडन संस्कार कराने से बचें।

 

3. भवन निर्माण:👉 होलाष्टक के समय में किसी भी भवन का निर्माण कार्य प्रारंभ कराएं। होली के बाद नए भवन के निर्माण का शुभारंभ कराएं।

 

4. हवन-यज्ञ:👉 होलाष्टक में कोई यज्ञ या हवन अनुष्ठान करने की सोच रहे हैं, तो उसे होली बाद कराएं। इस समय काल में कराने से आपको उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होगा।

 

5. नौकरी:👉 होलाष्टक के समय में नई नौकरी ज्वॉइन करने से बचें। अगर होली के बाद का समय मिल जाए तो अच्छा होगा। अन्यथा किसी ज्योतिषाचार्य से मुहूर्त दिखा लें।

 

6. भवन, वाहन आदि की खरीदारी:👉 संभवत हो तो होलाष्टक के समय में भवन, वाहन आदि की खरीदारी से बचें। शगुन के तौर पर भी रुपए आदी न दें।

 

7.👉 सनातन हिंदू धर्म में 16 प्रकार के संस्कार बताये जाते हैं इनमें से किसी भी संस्कार को संपन्न नहीं करना चाहिये। हालांकि दुर्भाग्यवश इन दिनों किसी की मौत होती है तो उसके अंत्येष्टि संस्कार के लिये भी शांति पूजन करवाया जाता है।

 

 

 

 

 

 


शनिवार, 25 फ़रवरी 2023

सोरोस की शतरंज पर भारतीय मोहरे

 

                        सोरोस की शतरंज पर भारतीय मोहरे   





हंगरी मूल के अमेरिकी धन्नासेठ जॉर्ज सोरोस इस समय भारत में लगातार चर्चा में हैं. उन पर हो रहे नित नए खुलासों से लोग आश्चर्यचकित हैं. जॉर्ज सोरेस के बारे में यह जानना बहुत जरूरी है कि वह अकूत संपत्ति के मालिक तो हैं लेकिन न तो उनकी कोई फैक्टरी / कारखाने हैं और न ही वे कोई उत्पाद बनाते या बेचते हैं। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय बाजार में कृत्रिम उठापटक और अस्थिरता से पैसा बनाना उनका बिज़नेस मॉडल है।

 फोर्ब्स की वेबसाइट के अनुसार जॉर्ज सोरोस की नेटवर्थ  6.7 बिलियन डॉलर है ( As on 23.02.2023)। 2018 में 18 बिलियन डॉलर अपने संगठन ओपन सोसाइटी फाउंडेशन को देने के साथ वे अब तक कुल 32 बिलियन डॉलर दान दे चुके हैं। यह दान वास्तव में उनके व्यवसायिक हितों के लिए निवेष है। जार्ज सोरोस का ओपन सोसाइटी फाउंडेशन नाम का एक संगठन है, जिसका हेडक्वाटर न्यूयार्क में है, और यह भारत सहित दुनिया के 100 से ज्यादा देशों में सक्रिय है। इसका उद्देश्य प्रथम दृष्टया सामाज सेवा प्रतीत होता है लेकिन इसका वास्तविक उद्देश्य अंततोगत्वा अस्थिरता उत्पन्न करके वित्तीय लाभ उठाना होता है। अपने उद्देश्यों की पूर्ति करने के लिए वह इस संगठन के माध्यम से कई देशों के राजनैतिक और सामाजिक आंदोलनों, मीडिया संस्थानों, पत्रकारों और बुद्दिजीवियों खासतौर से वामपंथ और इस्लाम प्रेरित, को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराते हैं। विभिन्न देशों के राजनीतिक दलों और उनके ट्रस्ट और संगठनों को भी दान देते हैं। लाभार्थियों को मोहरा बनाकर उन देशों पर अपनी पकड़ मजबूत करते हैं और  समय समय पर उन देशों की कमजोरी का फायदा उठाकर लाभ कमाते हैं। जार्ज सोरोस ने इस तथ्य को कभी छिपाया भी नहीं।

1992 में ब्रिटेन की करेन्सी पाउंड स्टर्लिंग और यूरोपियन यूनियन की करेंसी यूरो के बीच एक्सचेंज रेट मैकेनिज्म की कमजोरी को भांप कर उन्होंने बड़ी मात्रा में पाउंड स्टर्लिंग की शॉर्ट सेलिंग की जिसके परिणाम स्वरूप  पाउंड में भारी गिरावट के बाद 16 सितंबर 1992 को ब्रिटेन एक्सचेंज रेट से बाहर होना पड़ा। जॉर्ज सोरोस ने इस गिरावट के कारण एक बिलियन डॉलर से भी ज्यादा का लाभ कमाया। इस सफलता के बाद इस तरह की गतिविधियां उनका आदर्श बिज़नेस मॉडल बन गई। उसके बाद उन्होंने थाईलैंड और मलेशिया सहित कई देशों में भी वही खेल खेला और अरबों डॉलर कमाए। अमेरिका सहित अन्य देशों की राजनीति में दखल देना उनका शौक नहीं उनके बिज़नेस मॉडल का हिस्सा है। अमेरिका में जहां जार्ज बुश को हराने के लिए उन्होंने एड़ी चोटी का ज़ोर लगाया और बहुत पैसा खर्च किया, वहीं बराक ओबामा, हिलेरी क्लिंटन आदि को भरपूर वित्तीय सहायता प्रदान की। डोनाल्ड ट्रंप को हराने के लिए भी विडेंन की भरपूर सहायता की। राष्ट्रवाद के सख्त विरोधी सोरोस का स्वाभाविक रूप से झुकाव वामपंथी बुद्धिजीवियों की तरफ रहता है, जो राष्ट्रवाद से लड़ते हुए इस्लामिक संगठनों का साथ देते हैं। अंतर्राष्ट्रीय विमर्श गढ़ने के लिए सोरोस दुनिया भर के प्रमुख मीडिया संस्थानों और पत्रकारों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराते हैं, और अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उनका भरपूर उपयोग करते हैं.

इस समय नरेंद्र मोदी उनके निशाने पर हैं क्योंकि उनका मानना है कि मोदी  भारत के लिए खतरा हैं और इसलिए भारत में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए मोदी को सत्ता से उखाड़ने में जुट गये हैं। इस तरह 2024 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए वह भारत में उन राजनीतिक दलों की सहायता कर रहे हैं, जिनसे उनके घनिष्ट संबंध है और जो अपने बलबूते मोदी को हराने में सक्षम नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी की दोबारा जीत के बाद इस पर कार्य करना शुरू कर दिया गया था। अमेरिका की शॉर्ट सेलिंग व्यवसायिक फर्म हिंडनबर्ग की अडानी पर की गई सनसनीखेज रिपोर्ट और बीबीसी डॉक्यूमेंटरी  भी इस परियोजना का हिस्सा है।  म्यूनिख सेक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में जॉर्ज सोरेस ने हिंडनबर्ग की रिपोर्ट का संदर्भ देते हुए गौतम अडानी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला किया। 2020 में उन्होंने आरोप लगाया था कि मोदी भारत को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। उन्होंने धारा 370 हटाने का विरोध करते हुए इसे मुस्लिमों के प्रति मोदी की घृणा बताया था । सोरोस ने लाभार्थी मीडिया का उपयोग करते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की और शाहीन बाग जैसे कई देश विरोधी आंदोलनों को सहायता देकर अराजकता फैलाने की कोशिश की।   

सोरोस प्रचार कर रहे हैं कि मोदी लोकतांत्रिक नहीं हैं। मुस्लिमों के साथ की गई हिंसा के कारण ही मोदी का राजनैतिक कद बहुत तेजी से बढ़ा है। अडानी घटनाक्रम पर भविष्यवाणी करते हुए उन्होंने कहा कि कि भारत में लोकतांत्रिक बदलाव होगा यानी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही मोदी सत्ता से हट जाएंगे और नई सरकार बनेगी। कांग्रेस की भारत जोड़ों यात्रा पर टिप्पणी करते हुए सोरोस ने कहा कि यह भारत के लोकतंत्र बचाने का अंतिम अवसर है। जॉर्ज सोरोस का यह अनर्गल प्रलाप लगभग वैसा ही है जैसा कांग्रेस सहित कई राजनीतिक दल कार रहे हैं। भाजपा सरकार की ओर से केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने पलटवार करते हुए जॉर्ज सोरोस के बयान को भारत विरोधी विदेशी साजिश बताते हुए लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने की कोशिश बताया।

विदेश मंत्री जयशंकर ने बिना लाग लपेट के बेहद सधी किन्तु तीखी प्रतिक्रिया दी और सोरोस के मोदी विरोधी बयानों को भारत के राजनीतिक दलों का एक विदेशी की मदद से विदेशी धरती से चुनावी अभियान करार दिया। कांग्रेस इन आरोपों में  घिरती नजर आ रही है क्योंकि कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तथ्य हैं जिनसे कांग्रेस की सोरोस या उनकी संस्थाओं से नजदीकी दृष्टिगोचर होती हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह की बेटी अमृत सिंह जॉर्ज सोरोस के संगठन ओपन सोसाइटी जस्टिस इनिशिएटिव में राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी परियोजना की डायरेक्टर हैं। यूपीए सरकार के समय भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे शिव शंकर मेनन, जॉर्ज सोरोस के एक एनजीओ के बोर्ड में हैं। सोनिया गाँधी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य रहे हर्ष मंदर ओपन सोसाइटी फाउंडेशन के ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव एडवाइजरी बोर्ड के अध्यक्ष हैं। हर्ष मंदर का एक संगठन “अमन बिरादरी ट्रस्ट” जो जॉर्ज सोरेस का लाभार्थी हैं, भी राजीव गाँधी फाउंडेशन ट्रस्ट के साथ कार्य कर चुका है। दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में भी हर्ष मंदर का नाम जुड़ा है। कांग्रेस को यह भी बताना चाहिए कि राजसी शान-शौकत से आयोजित भारत जोड़ो यात्रा, जिसमें सोरोस के खर्चे से पलने वाले NGO के वाईस प्रेसिडेंट सलील शेट्टी भी शामिल थे, का खर्चा किसने दिया? जार्ज सोरोस और शशि थरूर के मधुर संबंधो का आधार क्या है?  

जॉर्ज सोरोस का कई देशों के आंतरिक मामलों में दखल देने का इतिहास है। भारत में अपने संगठनों के माध्यम से 1995 में सक्रिय हुए सोरोस ने  सामाज सेवा के नाम पर  वामपंथी अंतर्राष्ट्रीय संगठन के माध्यम से भारत विरोधी तत्वों को समर्थन देकर देश भर में अपना जाल फैला रखा है। प्रभावी राजनीतिक विमर्श बनाने के लिए उन्होंने  इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म को बढ़ावा देने के नाम पर  भारत के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक बहुत बड़े वर्ग को भारी अनुदान दिया है, जो मोदी विरोध करते करते देश विरोधी कार्य करने में भी संकोच नहीं करता । मोदी सरकार के मुखर आलोचक और नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन भी इस कार्य में सोरोस की सहायता कर रहे हैं।

केंद्रीय मंत्रियों द्वारा दिए गए वक्तव्य और स्पष्टीकरण बिलकुल उचित हैं। राष्ट्र और लोकतंत्र विरोधी षड्यंत्र के विरुद्ध प्रत्येक नागरिक को सचेत और जागरूक किए जाने की आवश्यकता है, लेकिन 9 वर्ष की केंद्रीय सत्ता का समय राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए कम नहीं होता। आखिर कब तक प्रधानमंत्री मोदी अपने लिए विक्टिम कार्ड खेलते रहेंगे कि अमुक उन्हें गाली दे रहा है, अमुक उन्हे सत्ता से हटाना चाहता है। पूर्ण बहुमत मिलने के बाद भी प्रधानमंत्री डरे सहमे हुए बेहद रक्षात्मक ढंग से कार्य कर रहे हैं।  बहुसंख्यकों की अपेक्षाओं को तो पूरी तरह से नज़रअन्दाज़ कर रहें हैं। कल्पना करिए कि यदि वामपंथी या कांग्रेसी इतने बहुमत के साथ सत्ता में होते तो क्या करते? बिना बहुमत के भी कांग्रेस ने पूजा स्थल और वक्फ बोर्ड कानून बनाकर हिंदुओं को रौंद डाला। भाजपा जब सत्ता में नहीं थी तब भी  कुछ नहीं कर सकी और जब सत्ता में है तो भी कुछ नहीं कर सकी। सरकार राष्ट्र विरोधी तत्वों के विरुद्ध बिना भय और पक्षपात के कार्रवाई करने के बजाय सबका विश्वास अर्जित करने में राष्ट्र का समय बर्बाद कर रही है।  बात शायद अटपटी लगे लेकिन आज भारत में बहुसंख्यक वर्ग बेहद डरा और घबराया हुआ है। “सबका विश्वास”  के बाद भाजपा द्वारा तुष्टीकरण और तृप्तिकारण जैसे जैसे बढ़ाया जा रहा है बहुसंख्यकों की आशंकाएं भी बढ़ती जा रही हैं।

सरकार 2047 तक भारत को विकसित देश बनाना चाहती है, और पीएफआई जैसे कई संगठन 2047 तक इसे  इस्लामिक राष्ट्र बनाना चाहते हैं। सरकार अपने काम में व्यस्त हैं और वे लोग अपने काम में व्यस्त हैं। भ्रम है कि कौन किसके लिए कार्य कर रहा है या दोनों एक दूसरे के लिए कार्य कार रहे हैं।  भाजपा के कोर वोटर और मोदी के कट्टर समर्थक भी पूरी तरह से हताश और निराश हैं।  इनमे कोई भी दूसरे राजनीतिक दल को न तो वोट करेगा और न ही उनके लिए काम करेगा लेकिन अगर ये 2024 के लोकसभा चुनाव में केवल घर बैठ गए तो भी  जॉर्ज सोरेस की भविष्यवाणी सही साबित हो जाएगी और मोदी सत्ता से बाहर हो जाएंगे। इसके बाद भाजपा की सत्ता में आने की संभावना सदा सर्वदा के लिए खत्म हो सकती हैं क्योंकि नयी सरकार संविधान और भाजपा के साथ करेगी, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है । भाजपा अगर जाग सके, और मोदी उनका विश्वास करें जिनके वोटों से वह प्रधान मंत्री बने हैं, तो अभी भी थोड़ा समय बाकी है।

-    शिव मिश्रा  

 

भारत इस्लाम की धरती, पहला हक मुसलमानों का

 

भारत इस्लाम की धरती, पहला हक मुसलमानों का



दिल्ली के रामलीला मैदान में 11 और 12 फरवरी 2023 को जमीयत उलेमा ए हिंद का 34 वां अधिवेशन चचा-भतीजे के विवादित बयानों के कारण कुख्यात हो गया और यह लंबे समय तक आलोचनाओं से घिरा रहेगा. वैसे तो भारत में जितनी मुस्लिम संस्थाएँ और संगठन है, उतने सभी 57 इस्लामिक देशों में मिलाकर भी नहीं है और शायद पूरी दुनिया में भी नहीं है, लेकिन भारत के इन सभी संगठनों और संस्थाओं की बैठकों में जो प्रस्ताव पास किए जाते हैं, उनमें जबरदस्त समानता होती है और उसका केंद्र बिंदु होता है, राजनीतिक इस्लाम, जो “विक्टिम कार्ड”  भी खेलता है, और सरकार तथा बहुसंख्यकों को धमकी भी देता है. इसलिए लगभग हर आयोजन में यह अवश्य दोहराया जाता है कि भारत में मुसलमानों की स्थिति अच्छी नहीं है, भारत का मुसलमान डरा हुआ है, फिरकापरस्त ताकतें (इसका मतलब केवल हिंदू संगठन,भाजपा और आरएसएस होता है)  सिर उठा रही हैं, मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ रही है, उनके साथ सरकार तथा बहुसंख्यकों का व्यवहार अच्छा नहीं है. इसके साथ साथ सरकार और बहुसंख्यकों को धमकी दी जाती  है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी तरह की छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी और  समान नागरिक संहिता किसी भी हालत में स्वीकार्य नहीं है.

यह सब तब होता है जब भारत में मुसलमानों को विशेषाधिकार प्राप्त है, जितने किसी मुस्लिम देश में भी प्राप्त नहीं है. तुलनात्मक रूप से इस तथाकथित हिंदू राष्ट्र में हिंदुओं की स्थिति दोयम दर्जे के नागरिक से भी बदतर है.

जमीयत उलेमा ए हिंद का ये अधिवेशन समय से  पूर्व बुलाया गया था, स्वाभाविक है कि कुछ न कुछ विशेष और महत्वपूर्ण एजेंडा जरूर होगा. प्रथम दृष्टया इसका उद्देश्य 2024 के लोकसभा चुनाव और उसके पहले नौ राज्यों के विधानसभा चुनावों को देखते हुए मुस्लिमों को भाजपा के विरुद्ध एकजुट करना प्रतीत होता है, ताकि मोदी को सत्ता से हटाया जा सके क्योंकि चाचा-भतीजे ने कभी यह कहने में संकोच नहीं किया कि भारत के मुसलमानों को प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी स्वीकार्य नहीं है. अधिवेशन में पारित तमाम प्रस्तावों का उद्देश्य  पूरे विपक्ष को मुस्लिम वोटों की कीमत बताना है ताकि केंद्रीय सत्ता के दावेदार और प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार उचित और अधिकतम बोली लगा सके.





अबकी बार का अधिवेशन इस मामले में अलग रहा कि इसमें चचा भतीजे की जोड़ी ने हिंदुत्व पर प्रहार करने का जो दुस्साहस किया उसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी. इस्लाम की उत्पत्ति को भारत में स्थापित करने और उसे दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म सिद्ध करने की हास्यास्पद कोशिश में चाचा-भतीजे मज़ाकिया किरदार में नजर आए. अधिवेशन में कौमी एकता दर्शाने के लिए हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख और क्रिश्चियन धर्मगुरुओं को भी आमंत्रित किया गया था किन्तु नाटकीय अंदाज में जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष और देवबंद मदरसे के प्रिंसिपल अरशद मदनी ने मंच से यह कहते हुए सबको हतप्रभ ही नहीं, घोर अपमानित भी कर दिया कि ओम और अल्लाह एक ही है. जिसे वह हजरत आदम कहते हैं और जिसकी औलाद को आदमी कहा जाता है, हिंदू उन्हें मनु कहते हैं और उनकी संतानों को मनुष्य कहा जाता है. उस समय न राम थे, न ब्रह्मा थे, न शिव थे, मनु यानी हजरत आदम ओम यानी अल्लाह की पूजा करते थे. इसलिए इस्लाम की उत्पत्ति भारत में हुई और यह दुनिया का सबसे पुराना धर्म है. स्तब्ध जैन मुनि लोकेश ने उसी मंच से नाराज़गी प्रदर्शित की और मौलाना अरशद मदनी की बात को बकवास बताते हुए अन्य धर्मगुरुओं के साथ मंच छोड़ दिया. उन्हें मंच पर रोकने की कोशिश की गई और न रुकने पर  हमला करने की भी कोशिश की गई, और पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा लेकिन वह न डरे और न रुके. लोकेश मुनि ने जो किया उसकी जितनी प्रशंसा की जाए उतना कम है.

 इसके पहले अरशद मदनी के भतीजे और जमीयत उलेमा ए हिंद के महासचिव महमूद मदनी ने महमूद मदनी ने कहा था कि इस्लाम धर्म दुनिया का सबसे पुराना मजहब है. इस दुनिया में इस्लाम धर्म के पहले पैगंबर हजरत आदम आए थे, जो  पूरी मानवता के पितामह हैं, वो इसी धरती पर (भारत) आए थे, ऐसे में मुसलमानों को बाहरी कहना गलत है. उन्होंने कहा कि मोहम्मद साहब तो इस्लाम धर्म के आखरी पैगंबर हैं, जो हजरत आदम की दी हुई शिक्षा को पूर्ण करने आए थे. इसलिए भारत की धरती इस्लाम की धरती है, क्योंकि इस्लाम के पहले पैगंबर हजरत आदम को ईश्वर ने स्वर्ग से इसी धरती पर उतारा था और इसलिए भारत पर पहला हक मुसलमानों का है.

जमीयत के इस अधिवेशन की यही बातें प्रमुख हैं, शायद इसका एकमात्र अजेंडा भी यही था. इसके संदेश भारत की एकता, अखंडता और  धर्मनिरपेक्षता के लिए बेहद खतरनाक और चिंताजनक हैं. हिंदू जनमानस इस संदेश के निहितार्थ समझकर कितना सतर्क हो पाता है, यह देखने की बात है. पसमांदा वोटों के लालच में, भाजपा और आरएसएस का न केवल मुहं बंद है, बल्कि कुछ भी करने को तैयार है. एचएएल ट्रेनर एयरक्राफ्ट से हनुमान जी का लोगो हटाना, लालच और दबाव का ताजा और निकृष्टतम उदाहरण है. इसलिए सरकार कोई कारगर कदम उठायेगी इसकी संभावना नहीं है.

चचा भतीजे के विषवमन को समझने के लिए इनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि समझना आवश्यक है. अरशद मदनी के पिता हुसैन अहमद मदनी भी दारुल उलूम देवबंद के प्रिंसिपल थे और इसी मदरसे से शिक्षा प्राप्त कर परिवार सहित वह मदीना चले गए थे क्योंकि उनके उनके पिता अपने आप को पैगंबर मोहम्मद साहब का वंशज बताते थे. जब उनके शिक्षक और दारुल उलूम देवबंद के प्रिंसिपल महमूद उल हसन को “सिल्क लेटर कॉन्सपिरेंसी” में मक्का से गिरफ्तार किया गया था, और माल्टा जेल  भेजा जा रहा था, तो हुसैन अहमद मदनी  उनकी सेवा करने के लिए उनके साथ गए यद्यपि उन्हें कोई सजा नहीं सुनाई गई थी. जिसका मदनी अपने परिवारीजनों को  स्वतन्त्रता संग्राम में माल्टा जेल जाने की बात कहते हैं. ये सही है कि सिल्क लेटर आंदोलन देवबंद से संचालित था जिसका उद्देश्य प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ऑटोमन अंपायर, तुर्की, इम्पीरीयल जर्मनी, अफगानिस्तान की सहायता से भारत के जनजातीय इलाकों में अंग्रेजों के प्रति मुस्लिम विद्रोह शुरू करना था. इनका मानना था कि  भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर ध्यान केंद्रित करने से सर्व-इस्लामिक उद्देश्य की पूर्ति सबसे अच्छी तरह की जा सकेगी.

मदीना में 18 वर्ष तक रहने के बाद अरशद मदनी के पिता हुसैन अहमद मदनी  भारत आये तो उन्हें देवबंद दारुल उलूम का मुख्य शिक्षक बना दिया गया. उन्होंने कांग्रेस (मुख्यतया गांधी-नेहरु) को खलीफ़त आंदोलन को समर्थन देने के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. खलीफ़त आंदोलन, तुर्की में ब्रिटेन की भूमिका को इस्लाम पर आक्रमण मानकर भारत में अंग्रेजों के विरुद्ध शुरू किया गया आन्दोलन था जिसका भारत की स्वतंत्रता से किसी भी तरह का प्रत्यक्ष संबंध नहीं था.

यह सही है कि उस समय कुछ मुस्लिम  नेताओं ने भारत के विभाजन विरोध किया था, क्योंकि उनका उद्देश्य पूरे भारत को प्राप्त करना था. हुसैन अहमद मदनी की, पाकिस्तान समर्थक अल्लामा इकबाल से बहस भी हुई थी जो बाद में समझौते में बदल गई. जिसके अनुसार जिन्हे चाहिए उन्हें पाकिस्तान लेने दिया जाए, और अन्य लोग भारत में रहकर अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए काम करते रहें यानी भारत को इस्लामिक राज्य बनाने की कोशिश में लगे रहे. महमूद मदनी का यह कहना कि “इस्लाम दुनिया का सबसे पुराना धर्म है और इसकी पैदाइश भारत में हुई, इसलिए  भारत पर पहला हक मुस्लमानों का है” इसी कोशिश का हिस्सा है. इसके पहले भी वह कह चुके हैं कि यह हमारा मुल्क है जिसे मुसलमानों से समस्या है वह देश छोड़कर चले जाएं. अरशद मदनी ने तो ओम और अल्लाह को एक बताकर और मनु और हजरत आदम को एक बता कर सनातन समूह के सभी धर्मों और पंथों हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख धर्म को भारत भूमि से पूरी तरह खारिज कर दिया. अन्य धर्मों के  धर्माचार्यों को बुलाकर अधिवेशन के मंच पर बैठाने का उद्देश्य अपने शातिराना और शरारतपूर्ण दुस्साहस को मान्यता दिलवाना था.

दारुल उलूम देवबंद दुनिया भर के मुसलमानों का प्रेरणा स्रोत है, और दुनिया भर के आतंकवादी भी अपने आपको देवबंद से प्रेरित बताते हैं. वैसे तो दारुल उलूम देवबंद में केवल इस्लामिक शिक्षा मिलती है, लेकिन यहाँ पढ़ाई जाने वाली “हिदाया” जिसका जिक्र कुछ समय पहले आरिफ मोहम्मद खान ने किया था, जेहाद के लिए प्रेरित करती है.  स्वाभाविक है कि ऐसा संस्थान, जो न केवल इस्लाम के प्रचार और प्रसार के लिए समर्पित है, बल्कि जिसका उद्देश्य  किसी भी कीमत पर अपने मजहब को सर्वश्रेष्ठ ठहराना और स्थापित करना है, और अशरफ मदनी जैसा व्यक्ति जिसका प्रिन्सिपल हो,  भारत और इसके अन्य संप्रदायों/ धर्मो  का भला नहीं कर सकता. 

ऐसे समय जब केंद्र की भाजपा सरकार और पसमांदा मुस्लिमों के वोट पाने के लिए  तृप्तिकरण में जुटी है, जमीयत ने पसमांदा मुस्लिमों के लिए आरक्षण की मांग करके बड़ा दांव चल दिया है. मोदी सरकार तो अक्टूबर 2022 में ही धर्मान्तरित हुए लोगों को अनुसूचित जाति और जनजाति का आरक्षण देने के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन करके राष्ट्रघाती कदम उठा चुकी है. यदि इसकी रिपोर्ट सकारात्मक आती है तो केंद्र की कोई भी सरकार मुस्लिमों को आरक्षण दे देगी. इसके बाद भारत कब तक धर्म निरपेक्ष रहेगा, यह सिर्फ़ अनुमान लगाने की बात रह जाएगी.

काश मोदी जी यह समझ सके कि कांग्रेस के पैरों के नीचे से नहीं, पूरे हिन्दू समुदाय के पैरो के नीचे से जमीन खिसक रही है.

-    शिव मिश्रा

 

 

        

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2023

बजट 2023 : दूसरी पारी का आखिरी ओवर

 

बजट 2023 : दूसरी पारी का आखिरी ओवर

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का अंतिम बजट लोकसभा में प्रस्तुत कर दिया गया है. प्रत्येक बजट से स्वाभाविक रूप से बहुत सी अपेक्षाएं होती हैं लेकिन इस बार के बजट से कुछ ज्यादा ही अपेक्षाएं थीं क्योंकि यह मोदी के दूसरे कार्यकाल का अंतिम बजट था. इसलिए आशा थी की इसमें चुनावी लाभ को ध्यान में रखते हुए काफी लोकलुभावन घोषणाएं की जाएंगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. हाँ, ये काफी हद तक सही है कि इस बजट में सभी के लिए कुछ न कुछ अवश्य है.

बजट की सबसे बड़ी बात ये है कि इसमें कड़वी दवा देने में परहेज किया गया है, लेकिन रेबड़ी संस्कृति को बढ़ावा देने से बचा गया है और राजकोषीय घाटा कम करने की निरंतरता बनाए रखने का प्रयास किया गया है, जो 2021 22 में 6.9% और 2022 23 में 6.4% की की तुलना में 2023 24 में 5.9% पर रखने का लक्ष्य रखा गया है. रक्षा बजट में बढ़ोतरी की गई है, लेकिन यह अपेक्षा से कम है. रेलवे के लिए 2.40 लाख करोड़ रुपये की पूंजीगत निधि का प्रावधान, जो अब तक की सर्वाधिक राशि है। मूलभूत संरचना मैं पूँजी निवेश बढ़ाकर 10 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है, जो पिछले बजट की तुलना में 33 प्रतिशत ज्यादा है. ऐसे में जब पूरी दुनिया में मंदी का खतरा मंडरा रहा है, मूलभूत संरचना की परियोजनाओं में इतना बड़ा निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता और मजबूती को रेखांकित करता है.

वित्त मंत्री ने जो आंकड़े प्रस्तुत किए वे काफी उत्साहवर्धक है, जिसके अनुसार मोदी सरकार के पिछले नौ वर्षों में प्रति व्यक्ति औसत आय दोगुनी होकर रुपया ₹1.97 लाख हो गई है. भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार विस्तार ले रही है और ये पिछले नौ सालों में विश्व की दसवीं अर्थव्यवस्था से  पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है. मोदी कार्यकाल में भारत स्वच्छता मिशन के अंतर्गत 11.7 करोड़ घरों में शौचालय और 9.6 करोड़ उज्ज्वला योजना के अंतर्गत 9.6 करोड़ एलपीजी कनेक्शन दिए गए हैं. वित्तीय समावेशन की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण काम किया गया जिसके  अंतर्गत 47.8  करोड़ प्रधानमंत्री जन धन बैंक खाते खोले गए. प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना से भी 11.4 करोड़ किसानों को 2.2 लाख करोड़ रुपये का खतों में नकद हस्तांतरण किया गया.

बजट में सप्तऋषि के नाम से  जिन सात प्राथमिकताओ को चिन्हित किया गया है, वे हैं  - समावेशी विकास, अंतिम छोर अंतिम व्यक्ति तक पहुँच, बुनियादी ढांचा में निवेश, मौजूदा क्षमता का विस्तार, हरित विकास, युवा शक्ति और वित्तीय क्षेत्र. बजट का पूरा तानाबाना इन्हीं प्राथमिकता के आधार पर बनाया गया है.

अंत्योदय योजना के तहत ग़रीबों के लिए मुफ़्त खाद्यान्न की आपूर्ति को एक वर्ष के लिए बढ़ा दिया गया है. प्रधानमंत्री आवास योजना में 66% की वृद्धि की गई है. अखिल भारतीय राष्‍ट्रीय प्रशिक्षुता प्रोत्‍साहन योजना के अंतर्गत  तीन वर्षों में 47 लाख युवाओं को वृत्तिका सहायता प्रदान करने के लिए डायरेक्‍ट बेनिफिट ट्रांसफर शुरू किया जाएगा। 5G सेवाओं का उपयोग कर ऐप विकसित करने के लिए 100 प्रयोगशालाएं स्थापित की जाएंगी. रीजनल कनेक्टिविटी को बढ़ाने के लिए 50 नए एयरपोर्ट, हेलीपैड, एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड्स, वाटर एरो ड्रोन बनाए जाएंगे.

कृषि तथा लघु एवं मध्यम उद्योगों के लिए कई योजनाएं घोषित की गई है. युवा उद्यमी ग्रामीण क्षेत्रों में एग्री-स्‍टार्टअप्‍स शुरू कर सकें, इसके लिए पहली बार कृषि वर्धक निधि की स्‍थापना का प्रावधान और  आत्‍मनिर्भर स्‍वच्‍छ पादप कार्यक्रम का शुभारंभ 2,200  करोड़ रुपये के प्रारंभिक परिव्‍यय के साथ उच्‍च गुणवत्‍ता वाली बागवानी फसल के लिए रोग-मुक्‍त तथा गुणवत्‍तापूर्ण पौध सामग्री की उपलब्‍धता बढ़ाने की योजना. डेरी, मत्स्य पालन, पशुपालन जैसे कृषि के लिए 20, लाख करोड़ रुपये के ऋण प्राविधान. मोटे अनाज के उत्पादन में भारत को वैश्विक हब  बनाने का संकल्प लिया और अतिरिक्त भंडारण की व्यवस्था करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है. गोबरधन  योजना के अंतर्गत 10,000 करोड़ रुपये के कुल निवेश के साथ 500 नए संयंत्र स्थापित किए जाएंगे जिनमें अपशिष्ट से आमदनी हो सके. किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहन योजना के अंतर्गत उर्वरक और कीटनाशक विनिर्माण नेटवर्क तैयार करते हुए बायो इनपुट रिसोर्स केंद्र स्थापित किए जाएंगे. मत्स्य संपदा योजना में 6000 करोड़ रुपए के लक्ष्य के निवेश के साथ मछली पालकों विक्रेताओं और संबंधित सूक्ष्म और लघु उद्योगों को मजबूत करने का प्रयास किया जाएंगे.

नई आयकर व्यवस्था में निजी आयकर में छूट की सीमा को 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 7 लाख रूपये कर दिया गया है। इस प्रकार नई कर व्यवस्था में 7 लाख रुपये तक के आय वाले व्यक्तियों को कोई कर का भुगतान नहीं करना होगा। नयी व्यक्तिगत आयकर व्यवस्था में स्लैबों की संख्या 6 से घटाकर 5 कर दी गई और कर छूट की सीमा को बढ़ाकर 3 लाख रूपये कर दिया गया है। नए प्रावधानों में ३-६लाख तक ५%, ६से९ तक १०%, ९-१२ लाख तक १५%, १२-१५ लाख तक २०% और १५ लाख से ऊपर ३०%. गैर सरकारी कर्मचारियों की  सेवानिवृत्ति पर छुट्टियों के नकदीकरण पर 25 लाख तक की राशि को आयकर से मुक्त किया जाना राहत भरा कदम है. अग्निवीरों को मिलने वाले वेतन भत्ते और सेवानिवृत्त मिलने वाली सभी राशियां आयकर के दायरे से पूरी तरह से मुक्त कर दी गई है

आयकर में मध्यम वर्ग के लिए की गई जिस राहत को सरकार बहुत बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रही है, उसका फायदा बहुत कम लोगों को होगा क्योंकि यह केवल आयकर की नई योजना (न्यू टैक्स रिजीम) में किए गए हैं जबकि अधिकांश वेतनभोगी और पेंशनर्स पुरानी योजना (ओल्ड टैक्स रिजीम) के अंतर्गत आयकर निर्धारण करवातें हैं जिसमें कोई भी परिवर्तन नहीं किया गया है. ऐसे सभी व्यक्ति जिन्होंने आवास ऋण ले रखा है और जो ऋण पर ब्याज और भुगतान की गयी किश्तों तथा अन्य निवेश पर मिलने वाली रु 1.5 लाख तक की छूट का फायदा उठाते हैं, उनके लिए पुरानी योजना, अब भी फायदेमंद है. इसलिए ऐसे सभी लोगों को आयकर में घोषित रियायतों का कोई फायदा नहीं होगा और चुनावी वर्ष में एक बहुत बड़ा वर्ग बजट से निराश और हताश ही रहेगा. आयकर सरचार्ज में ३७% से २५% प्रस्तवित  कटौती का फायदा भी केवल उच्च आय वर्ग के  करदाताओं को होगा. वरीष्ठ नागरिको की बचत योजना में निवेशकों सीमा को 15 लाख  से बढ़ाकर 30 लाख  कर दिया जाना भी अच्छा कदम है.

मोदी कार्यकाल में खुले 157 नहीं मेडिकल कॉलेजों में प्रत्येक में नए नर्सिंग कॉलेज कॉलेज (१५७) खोले जाएंगे. आदिवासी और जनजातीय विद्यार्थियों के लिए 740 एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय खोलने का प्रावधान किया गया है, जिसमें 38,800 अध्यापक और अन्य कर्मचारी नियुक्त करने का प्रावधान किया गया है. राष्ट्रीय आवास विकास बैंक के माध्यम से अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड की स्थापना जिसका उपयोग टियर टू तथा टियर थ्री शहरों में इनफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए किया जाएगा, का प्रावधान.

डिजिटल उपयोग को बढ़ावा देने के लिए सूक्ष्म लघु मध्यम उद्योग, बड़े व्यवसाय और चैरिटेबल ट्रस्ट के लिए डिजिटल लॉकर की स्थापना का प्रावधान किया गया है. प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना नई पीढ़ी के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस रोबॉटिक्स मेकैट्रॉनिक्स आईओटी थ्रीडी प्रिंटिंग ड्रोन और सॉफ्ट स्किल जैसे पाठ्यक्रम शामिल किए जाएंगे. युवाओं को अंतरराष्ट्रीय अवसर उपलब्ध कराने के लिए 30 स्किल इंडिया इंटरनेशनल सेंटर स्थापित किए जाएंगे. यह एक अच्छी पहल है.

एमएसएमई ऋण गारंटी योजना मैं 9000 करोड़ रुपए के नए  अंशदान के साथ नवीनीकृत किया गया है, जिससे 2 लाख करोड़ रुपये के बिना कोलैटरल गारंटी के ऋण उपलब्ध करवाए जा सकेंगे और ऋण की लागत भी 1% से कम की जा सकेगी.

एक महत्वपूर्ण निर्णय के अनुसार स्‍थायी खाता संख्‍या (पैन) का इस्‍तेमाल विनिर्दिष्‍ट सरकारी एजेंसियों की सभी डिजिटल प्रणालियों के लिए पैन को सामान्‍य पहचानकर्ता के रूप में प्रयोग किया जाएगा। इससे कारोबार करना आसान होगा। बैंक व्यवस्था में सुधार लाने के लिए और निवेशक संरक्षण बढ़ाने के लिए बैंकिंग विनियमन अधिनियम, बैंकिंग कम्पनी अधिनियम और भारतीय रिजर्ब बैंक अधिनियम में कुछ संशोधनों का प्रस्ताव किया गया है। न्‍याय के प्रशासन में दक्षता लाने के लिए, 7,000 करोड़ रूपये के परिव्‍यय से ई-न्‍यायालय परियोजना का चरण-3 शुरू किया जाएगा।

उपरोक्त परिपेक्ष्य में यह कहना अनुचित नहीं होगा कि प्रस्तावित बजट एक प्रगतिशील बजट है, जिसमें देश की प्राथमिकता की पहचान करके उन पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जो निश्चित रूप से रोजगार सृजन के साथ साथ अर्थव्यवस्था को गति देगा. बजट में न तो संभावित वैश्विक मंदी की सकुचाहट दिखाई पड़ती है और न हीं चुनावों को देखते हुए रेबडिया बाँटने का लालच परिलक्षित होता है. कुल मिलाकर यह एक संतुलित बजट है जिसमें वित्तीय अनुशासन बनाए रखने का ध्यान तो रखा गया है, लेकिन विकास के लिए प्रगतिशील उपायों और योजनाओं पर धन खर्च करने में संकोच नहीं किया गया है.

-    शिव मिश्रा

 

 


 

मोहन भागवत भी हैं ब्राह्मण विरोधी ?

 




मोहन भागवत भी पड़ गए हैं ब्राह्मणों के पीछे

पिछले 5000 वर्षों से ब्राह्मण किसी न किसी के निशाने पर रहे हैं, भारत में. बात शुरू होती है महाभारत काल से. जब महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ तो देश में स्थितियां बेहद जटिल थी. कौरव और पांडव, दोनों ही पक्षों के अनगिनत योद्धा, युद्ध की विभीषिका के शिकार हो गए थे. कितने लोग मारे गए थे इसका अनुमान लगाना भी बेहद कठिन था. युद्ध में इतने पुरुष मारे गए थे की बहुत कम ऐसे घर थे जहाँ पुरुष बचे थे अगर बचे थे वे या तो बूढ़े थे या बच्चे. हर घर में विधवाएं थी, उनका करुण कृन्दन था विधवा बाहुल्य देश में स्थितियां अत्यंत भयावह हो गई थी. लोग सोचते थे कि जो अधर्म के साथ खड़े थे, उन्हें तो मरना ही था, लेकिन जिन्होंने धर्म का साथ दिया, जो धर्मराज के साथ खड़े थे, वे भी मारे गए.  उनका क्या अपराध था? भगवान श्रीकृष्ण धर्म की रक्षा के लिए धर्म के साथ खड़े थे, धर्मराज के साथ खड़े थे, यह तो होना ही चाहिए था लेकिन  उन्होंने अपनी सेना को अधर्मियों के पक्ष में लड़ने के लिए क्यों भेज दिया? आखिर क्यों श्री कृष्ण की सेना के अधिकांश सैनिक भी युद्ध में मारे गए? क्यों भगवान अपने सैनिकों की रक्षा नहीं कर सके?

धर्म के प्रति लोगों की आस्था टूट रही थी. भगवान से विश्वास उठ रहा था और बड़ी संख्या में लोग धर्म विमुख हो चूके थे. ऐसे में वे प्यास की आज्ञा से सतपथ ब्राह्मण ग्रंथ की रचना की गई और ब्राह्मणों को धर्म रक्षा का कार्य सौंपा गया. भागवत कथा, रामकथा और अन्य देवी देवताओं की कथाएं सुनाने, और कर्म काण्ड सम्पन्न करवाने का आदेश ब्राह्मणों को दिया गया. तत्कालीन परिस्थितियों में यह अत्यधिक विषम कार्य था और ब्राह्मण वर्ग, धर्म विहीन या  विरोधी लोगों के निशाने रह कर कार्य करता रहा.

भारत पर इस्लामिक आक्रमण के बाद तो ब्राह्मणों की जैसे शामत आ गई. इस्लामिक आक्रांता भारत मैं हिंदुओं का धर्मांतरण करने  में ब्राह्मणों को ही सबसे बड़ी बाधा समझते थे, इसलिए उनके द्वारा सबसे ज्यादा अत्याचार है ब्राह्मणों पर ही किए. इन अत्याचारों का सिलसिला अंग्रेजी राज्य में भी अनवरत चलता रहा और स्वतंत्रता के बाद तो हिन्दुओं के अंदर ही ब्राह्मण खलनायक की तरह हो गए और हिंदू समाज में व्याप्त जाति पांति, ऊँच नीच और छुआछूत के लिए केवल ब्राह्मणों को ही जिम्मेदार ठहराया जाने लगा.

आज भी जेएनयू से और वामपंथियों के सम्मेलन से ब्राह्मण भारत छोड़ो जैसे नारे लगाए जाते हैं. दलित और पिछड़े वर्ग की कई संस्थायें ब्राह्मण विरोधी अभियान चलाती हैं, क्योंकि वे केवल ब्राह्मणों के ही उच्च वर्ग का प्रतिनिधि मानती है. उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार जैसे कुछ राज्यों में सैंपल सर्वे किया जाए तो यह पता चलता है कि आज इस  तथाकथित उच्च कुलीन ब्राह्मण वर्ग का बहुत बड़ा तबका बेहद दरिद्रता का जीवन जी रहा है. वैसे नई बात भी नहीं है पुराना और पंचतंत्र की कहानियों मैं इस बात का बहुत उल्लेख मिलता है एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था. आज ऐसे गरीब ब्राह्मण परिवार हर हर गांव हर शहर में दरिद्रता पूर्ण जीवन यापन कर रहे हैं.

अब तो संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी ब्राह्मणों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया हैं. मुंबई में संत शिरोमणि रविदास की जयंती पर एक समारोह में बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू समाज में उच्च नीच की श्रेणी भगवान या नहीं पंडितों ने बनाई है जो गलत है. उन्होंने कहा कि इस प्रकार हमारे समाज के बंटवारे का फायदा दूसरों ने उठाया, देश पर आक्रामक हुए यहाँ तक कि बाहरी देश से आए लोगों ने हमारे देश पर राज्य भी किया अगर समाज में विभाजन नहीं होता तो किसी की हमारी तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं पड़ती. भागवत ने हिंदुओं से सवाल कि क्या हिंदू समाज को नष्ट होने का भय दिखाई पड़ रहा है? ये बात आपको कोई ब्राह्मण नहीं बता सकता. आपको स्वयं समझना होगा भगवान ने हमेशा कहा है कि हमारे लिए सब एक हैं उनमें कोई जाति वर्ण  नहीं है. जाति पाति पंडितों ने बनाई जो गलत है.  एक तरह से उन्होंने देश पर आक्रमण होने  और भारत में इस्लामी साम्राज्य स्थापित होने के लिए भी अप्रत्यक्ष रूप से ब्राह्मणों को जिम्मेदार ठहरा दिया.

यह मानने का कोई कारण नहीं है कि मोहन भागवत को यह नहीं मालूम कि हिन्दू समाज की संरचना और हिंदू /सनातन धर्म की धर्म ध्वजा फहराने में ब्राह्मणों का क्या योगदान है. आज भी केंद्र में मोदी सरकार की स्थापना से लेकर सोशल मीडिया मैं उनकी छवि निहारने में इस वर्ग का बहुत बड़ा हाथ है और वे भी जीना किसी स्वार्थ के क्योंकि ये उनको मालूम है कि केंद्र या किसी  राज्य सरकार ने न तो कोई योजना उनके फायदे के लिए बनाई है और न हीं बनायी जाएगी.

मुझे कभी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखा ज्वॉइन करने का सौभाग्य नहीं मिला और इस बात का मुझे बहुत कष्ट था लेकिन जब से मोहन भागवत की ऊँट पटांग और बेसिर पैर की बातें सुनाई पड़ने लगी हैं, मुझे लगने लगा है कि मैंने अगर संघ की शाखा ज्वाइन नहीं की तो शायद ठीक ही रहा.

कुछ दिनों से उनका इस्लाम के प्रति प्रेम भी बहुत उमड़ रहा है. मुंबई में दिए गए अपने भाषण में भी इसकी झलक मिलती है उन्होंने कहा कि इस्लामी आक्रमण से पहले अन्य किसी आक्रमणकारी ने हमारी जीवनशैली और परंपराओं विचारों में नहीं डाला लेकिन इस यानी आक्रमणकारियों के पास तर्क था पहले उन्होंने हमें अपने पराक्रम से हराया और फिर हमें मानसिक रूप से दबा दिया.

मुझे लगता है कि मोहन भागवत ने सरसंघचालक के रूप में अब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा का जितना नुकसान किया है उतना उनके पहले शायद किसी ने नहीं किया होगा.

-    शिव मिश्रा

मंगलवार, 31 जनवरी 2023

मानस फाड़ यादव हैं मुलायम के करीबी, और अखिलेश के परिवारी.

बहुत बड़ा षड्यन्त्र है राम चरित मानस जलाना,

मुझे यह जानकर भी भी आश्चर्य नहीं है कि स्वामी प्रसाद ने जो वक्तव्य दिया, वह अखिलेश यादव की सहमति से नहीं, उनके कहने से दिया है। उत्तर प्रदेश की यह घटना बिहार की पुनरावृत्ति है जहाँ तेजस्वी यादव की सहमति  और उनके कहने से ही चंद्रशेखर यादव ने रामचरित मानस पर बुरा भला कहा था।

बिहार में जातिगत  जनगणना चल रही है, जिसे राज्य सरकार अपने अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर कर रही है और इस इसकी रिपोर्ट के प्रकाशन पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रोक लगाए जाने की संभावना है। बिहार में तो इस लिए भूमिका बनाई जा रही थी।

उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव भी लंबे समय से जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य हिंदू समाज में जातिगत विभाजन को और अधिक उभारना तथा अगड़े पिछड़ों की राजनीति करके दलित और पिछड़ों को गोलबंद करना है। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद समाज में जातिगत विभाजन की रेखा कमजोर पड़ी है और कम से कम मतदान करने के मामले में जाति पांति बहुत अधिक महत्त्व नहीं रहा है। इसलिए मंडल की राजनीति करने वाले लालू और मुलायम का एमवाई  समीकरण (मुस्लिम यादव गठजोड़) चुनाव जीतने में कारगर नहीं रहा।

इसलिए किसी भी कीमत पर चुनाव जीतने के लिए ये इन दोनों पार्टियों की रणनीति है की हिंदू समाज में जितना संभव हो जातिगत वैमनस्यता फैलाई जाए। अखिलेश यादव तो पिछले चुनाव में जिन्ना, को सरदार बल्लभ भाई पटेल के बराबर खड़ा कर दिया था। उस समय लक्ष्य केवल मुसलमान वोट थे।  अबकी बार पिछड़े और दलितों को एक साथ लक्ष्य बनाया गया है।

स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान के बाद जब अखिलेश यादव से उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई तो उन्होंने मौर्य का न केवल समर्थन किया बल्कि यह भी कहा कि वह स्वामी प्रसाद मौर्य से कहेंगे कि वह जातिगत जनगणना के मामले में आगे बढ़ें. इसके बाद जब अखिलेश यादव लखनऊ में आयोजित माँ पीतांबरा 108 महायज्ञ मैं आहूति देने पहुंचे तो कुछ लोगों ने उन्हें काले झंडे दिखाए, उनकी पार्टी द्वारा प्रयोजित भी हो सकते हैं। अखिलेश ने जैसे पहले से तैयार किए गए बयान के आधार पर तुरंत कहा की भाजपा हमें मंदिर जाने से भी रोकती है, वह नहीं चाहते कि मैं धर्म यज्ञ में शामिल होऊँ  क्योंकि भाजपा हमें शूद्र  समझती  हैं।  

एक  दिन बाद उन्होंने न केवल स्वामी प्रसाद मौर्या को राष्ट्रीय महासचिव बना दिया बल्कि बिना किसी के पूछे ही एक बयान दिया कि वह शूद्र  हैं और उन्हें रामचरित मानस के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं है। उनके इस बयान के बाद ही एक स्वयंभू संस्था प्रकट हो गयी है जिसने अपने आप को ओबीसी महासभा बताया और स्वामी प्रसाद मौर्या और अखिलेश यादव की जिंदाबाद के नारे लगाए और रामचरित मानस के पन्ने जला दिए।

इसलिए 2024 के लोकसभा चुनाव तक तुलसीदास, रामचरितमानस और अन्य हिंदू धर्म ग्रंथ निशाने पर रहेंगे। इनके विरोध करने और इन्हें जलाने के लिए, पिछड़े और दलितों के नाम से बनाई गई है फर्जी संस्थाएँ और संगठन जगह जगह आयोजन करेंगे ताकि पुलिस और प्रदर्शनकारियों में संघर्ष हो और समाजवादी पार्टी अपनी राजनीति आगे बढ़ा सकें।

अखिलेश यादव को शायद  यह बात नहीं मालूम कि अगर वह ऐसा करते हैं तो यह उत्तर प्रदेश में पहली बार नहीं होगा।  इससे पहले  राम स्वरूप वर्मा के नेतृत्व में अर्जक संघ नामक संस्था कार्य करती थी जिसने इस तरह के  बहुत कार्य किये थे, लेकिन वह अपने बलबूते कभी विधायक भी नहीं बन पाए. एक और उदाहरण है, मुलायम सिंह यादव के बेहद करीबी विधायक रामपाल सिंह यादव का, जिन्होंने इन्हीं चौपाइयों के आधार पर विधानसभा के अंदर रामचरित मानस के पन्ने फाड़े थे। वह उत्तर प्रदेश में काफी कुख्यात हुए और उनका नाम रामपाल सिंह यादव की जगह मानस फाड़ यादव पड़ गया। इसके बाद वे गुमनामी में खो गए और मर गए ।

इसलिए अखिलेश यादव की यह नीति एक समुदाय विशेष को तो पसंद आएगी, लेकिन पिछड़े और दलित वर्ग से कोई बड़ा समर्थन मिलेंगे इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती और फिर अखिलेश यादव सत्ता के लिए यूं ही दशकों तक सर छटपटाते  रहेंगे।

 


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