मोहन भागवत भी पड़ गए हैं ब्राह्मणों
के पीछे
पिछले 5000 वर्षों से ब्राह्मण किसी न किसी के निशाने पर रहे हैं, भारत
में. बात शुरू होती है महाभारत काल से. जब महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ तो देश में
स्थितियां बेहद जटिल थी. कौरव और पांडव, दोनों ही पक्षों के अनगिनत योद्धा, युद्ध
की विभीषिका के शिकार हो गए थे. कितने लोग मारे गए थे इसका अनुमान लगाना भी बेहद
कठिन था. युद्ध में इतने पुरुष मारे गए थे की बहुत कम ऐसे घर थे जहाँ पुरुष बचे थे
अगर बचे थे वे या तो बूढ़े थे या बच्चे. हर घर में विधवाएं थी, उनका करुण कृन्दन था
विधवा बाहुल्य देश में स्थितियां अत्यंत भयावह हो गई थी. लोग सोचते थे कि
जो अधर्म के साथ खड़े थे, उन्हें तो मरना ही था, लेकिन
जिन्होंने धर्म का साथ दिया, जो धर्मराज
के साथ खड़े थे, वे भी मारे गए. उनका क्या
अपराध था? भगवान श्रीकृष्ण धर्म की रक्षा के
लिए धर्म के साथ खड़े थे, धर्मराज के साथ खड़े थे, यह तो होना ही चाहिए था लेकिन उन्होंने अपनी सेना को अधर्मियों के पक्ष में
लड़ने के लिए क्यों भेज दिया? आखिर क्यों श्री कृष्ण की सेना के अधिकांश सैनिक भी युद्ध में मारे गए? क्यों
भगवान अपने सैनिकों की रक्षा नहीं कर सके?
धर्म के प्रति लोगों की आस्था टूट रही थी. भगवान से विश्वास उठ रहा था
और बड़ी संख्या में लोग धर्म विमुख हो चूके थे. ऐसे में वे प्यास की आज्ञा से सतपथ
ब्राह्मण ग्रंथ की रचना की गई और ब्राह्मणों को धर्म रक्षा का कार्य सौंपा गया. भागवत
कथा, रामकथा और अन्य देवी देवताओं की कथाएं सुनाने, और कर्म काण्ड सम्पन्न करवाने
का आदेश ब्राह्मणों को दिया गया. तत्कालीन परिस्थितियों में यह अत्यधिक विषम कार्य
था और ब्राह्मण वर्ग, धर्म विहीन या विरोधी
लोगों के निशाने रह कर कार्य करता रहा.
भारत पर इस्लामिक आक्रमण के बाद तो ब्राह्मणों की जैसे शामत आ गई. इस्लामिक
आक्रांता भारत मैं हिंदुओं का धर्मांतरण करने में ब्राह्मणों को ही सबसे बड़ी बाधा समझते थे,
इसलिए उनके द्वारा सबसे ज्यादा अत्याचार है ब्राह्मणों पर ही किए. इन अत्याचारों
का सिलसिला अंग्रेजी राज्य में भी अनवरत चलता रहा और स्वतंत्रता के बाद तो हिन्दुओं
के अंदर ही ब्राह्मण खलनायक की तरह हो गए और हिंदू समाज में व्याप्त जाति पांति, ऊँच
नीच और छुआछूत के लिए केवल ब्राह्मणों को ही जिम्मेदार ठहराया जाने लगा.
आज भी जेएनयू से और वामपंथियों के सम्मेलन से ब्राह्मण भारत छोड़ो जैसे
नारे लगाए जाते हैं. दलित और पिछड़े वर्ग की कई संस्थायें ब्राह्मण विरोधी अभियान
चलाती हैं, क्योंकि वे केवल ब्राह्मणों के ही उच्च वर्ग का प्रतिनिधि मानती है. उत्तर
प्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार जैसे कुछ राज्यों में सैंपल सर्वे किया जाए तो यह पता
चलता है कि आज इस तथाकथित उच्च कुलीन
ब्राह्मण वर्ग का बहुत बड़ा तबका बेहद दरिद्रता का जीवन जी रहा है. वैसे नई बात भी
नहीं है पुराना और पंचतंत्र की कहानियों मैं इस बात का बहुत उल्लेख मिलता है एक
गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था. आज ऐसे गरीब ब्राह्मण परिवार हर हर गांव हर
शहर में दरिद्रता पूर्ण जीवन यापन कर रहे हैं.
अब तो संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी ब्राह्मणों के विरुद्ध मोर्चा खोल
दिया हैं. मुंबई में संत शिरोमणि रविदास की जयंती पर एक समारोह में बोलते हुए मोहन
भागवत ने कहा कि हिंदू समाज में उच्च नीच की श्रेणी भगवान या नहीं पंडितों ने बनाई
है जो गलत है. उन्होंने कहा कि इस प्रकार हमारे समाज के बंटवारे का फायदा दूसरों
ने उठाया, देश पर आक्रामक हुए यहाँ तक कि बाहरी देश से आए लोगों ने हमारे देश पर
राज्य भी किया अगर समाज में विभाजन नहीं होता तो किसी की हमारी तरफ आंख उठाकर
देखने की हिम्मत नहीं पड़ती. भागवत ने हिंदुओं से सवाल कि क्या हिंदू समाज को नष्ट
होने का भय दिखाई पड़ रहा है? ये बात आपको कोई ब्राह्मण नहीं बता सकता. आपको स्वयं
समझना होगा भगवान ने हमेशा कहा है कि हमारे लिए सब एक हैं उनमें कोई जाति वर्ण नहीं है. जाति पाति पंडितों ने बनाई जो गलत है. एक तरह से उन्होंने देश पर आक्रमण होने और भारत में इस्लामी साम्राज्य स्थापित होने के
लिए भी अप्रत्यक्ष रूप से ब्राह्मणों को जिम्मेदार ठहरा दिया.
यह मानने का कोई कारण नहीं है कि मोहन भागवत को यह नहीं मालूम कि हिन्दू
समाज की संरचना और हिंदू /सनातन धर्म की धर्म ध्वजा फहराने में ब्राह्मणों का क्या
योगदान है. आज भी केंद्र में मोदी सरकार की स्थापना से लेकर सोशल मीडिया मैं उनकी
छवि निहारने में इस वर्ग का बहुत बड़ा हाथ है और वे भी जीना किसी स्वार्थ के क्योंकि
ये उनको मालूम है कि केंद्र या किसी राज्य
सरकार ने न तो कोई योजना उनके फायदे के लिए बनाई है और न हीं बनायी जाएगी.
मुझे कभी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शाखा ज्वॉइन करने का सौभाग्य
नहीं मिला और इस बात का मुझे बहुत कष्ट था लेकिन जब से मोहन भागवत की ऊँट पटांग और
बेसिर पैर की बातें सुनाई पड़ने लगी हैं, मुझे लगने लगा है कि मैंने अगर संघ की
शाखा ज्वाइन नहीं की तो शायद ठीक ही रहा.
कुछ दिनों से उनका इस्लाम के प्रति प्रेम भी बहुत उमड़ रहा है. मुंबई
में दिए गए अपने भाषण में भी इसकी झलक मिलती है उन्होंने कहा कि इस्लामी आक्रमण से
पहले अन्य किसी आक्रमणकारी ने हमारी जीवनशैली और परंपराओं विचारों में नहीं डाला
लेकिन इस यानी आक्रमणकारियों के पास तर्क था पहले उन्होंने हमें अपने पराक्रम से
हराया और फिर हमें मानसिक रूप से दबा दिया.
मुझे लगता है कि
मोहन भागवत ने सरसंघचालक के रूप में अब तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा
का जितना नुकसान किया है उतना उनके पहले शायद किसी ने नहीं किया होगा.
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शिव मिश्रा
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