सोमवार, 19 दिसंबर 2022

न्याय पर कोलीजियम का कहर

 

न्याय पर कोलीजियम का कहर 

इस बिषय को विस्तार से समझने के लिए You Tube पर तीन विडियो देखना उपयोगी होगा 


कोलेजियम  पार्ट 1




कोलेजियम पार्ट 2




कोलेजियम पार्ट 3  


कोलीजियम व्यवस्था को लेकर आजकल सरकार और सर्वोच्च न्यायालय आमने सामने हैं. पूरे मामले से ऐसा भ्रम  उत्पन्न होता है कि जैसे सर्वोच्च न्यायालय न्यायपालिका को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है और मोदी सरकार न्यायपालिका को अपनी मुट्ठी में करने के लिए  कोलेजियम व्यवस्था को समाप्त करना चाहती है. दरअसल यह स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई है क्योंकि संविधान में न्यायाधीशों की नियुक्ति कोई प्रक्रिया नहीं दी गई है ओर मोदी सरकार द्वारा बनाए गए कानून को 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया था.

कोजियम व्यवस्था मजबूरी में न्यायपालिका को राजनैतिक दबाव से मुक्त करने के लिए 28 अक्तूबर 1998 को तीन न्यायाधीशों के एक फैसले द्वारा कोलेजियम व्यवस्था यह प्रभाव में लाई गई थी. इस व्यवस्था को स्वयं न्यायाधीशों ने लागू किया और इसका संविधान  से कोई लेना देना नहीं है। उस समय  इस व्यवस्था को लागू करना साहसिक कदम था और  बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा इसकी सराहना की गयी थी. मुझे लगता है कि राजनीतिक दबाव और दखलंदाजी से त्रस्त सर्वोच्च न्यायलय ने अपनी स्वायत्तता और स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए यह कदम बेहद मजबूरी में उठाया था और उस समय यह आवश्यक भी था क्योंकि तब तक सरकार न्यायाधीशों की नियुक्ति हेतु कोई कानून नहीं बना सकी थी और मनमाने ढंग से न्यायाधीस्शों की नियुक्ति के जा रही थी. अब परस्थितियाँ बदल गयी है, और इस व्यवस्था में अनेक स्वार्थ और भाई भतीजावाद हावी हो गया है किन्तु यह व्यवस्था नहीं बदल रही. न्यायिक स्वतंत्रता की आड़ मे पिछले 24 सालों से इस व्यवस्था के अंतर्गत उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के लिए  न्यायाधीशों को नियुक्त किया जा रहा है।

 यह जान लेना आवश्यक है कि आजादी के 50 वर्ष बाद  सर्वोच्च न्यायालय को कोलेजियम व्यवस्था लाने की क्या मजबूरी थी? उस समय तक कुछ  वर्षों कुछ छोड़कर ज्यादातर समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार रही. इस पूरे कालखंड में सर्वोच्च न्यायालय सामान्यतय: केंद्र सरकार के दबाव में काम करता रहा, उसका कारण भी केंद्र सरकार द्वारा न्यायाधीशों की मनमानी नियुक्ति और उसके प्रसाद स्वरूप राजनैतिक निर्णय प्राप्त करना था.   आप कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि केंद्र में सत्तारूढ़ कोई राजनीतिक दल अपने किसी राजनीतिक कार्यकर्त्ता को सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बना सकता है, लेकिन कांग्रेस ने ऐसा किया. इंदिरा गाँधी का शासनकाल तो इस मामले में बहुत  कुख्यात हैं, जो कुछ उदाहरणों से स्पष्ट हो जाएगा.  

एक थे के एस हेगड़े, जो कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य थे, जिन्हें कांग्रेस ने त्यागपत्र दिलवाकर  मद्रास उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बना दिया. प्रोन्नति पाकर वे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी बन गए. इंदिरा गांधी द्वारा मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने में उनकी वरिष्ठता की अनदेखी किए जाने से नाराज होकर उन्होंने त्यागपत्र दे दिया था  और कांग्रेस उम्मीदवार के विरुद्ध बैंगलोर से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत कर लोक सभा पहुँच गए. यानी एक सांसद उच्च न्यायलय और सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बन गया और फिर चुनाव जीत कर संसद पहुंच गया. 

कांग्रेस के एक अन्य राज्यसभा सदस्य थे बहरुल इस्लाम जो १९५६ से कांग्रेस पार्टी के सदस्य थे, को इंदिरा गाँधी ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त कर दिया था, जहाँ वह मुख्य न्यायाधीश भी बनाये गए. उच्च न्यायालय से सेवानिवृत्ति होने के बाद श्रीमती गाँधी ने  उन्हें पुनः सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बना दिया, जो बहुत असामान्य था.  उन्होंने सहकारी बैंक घोटाले में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा को बरी कर दिया था.  सर्वोच्च न्यायालय से त्यागपत्र दिलवाकर श्रीमती गांधी  ने उन्हें फिर राज्यसभा का सदस्य बना दिया ।

राजनीति और न्यायपालिका के  इतने बड़े  घालमेल की कोई भी तारीफ नहीं कर सकता.  सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को राज्यसभा भेजने, राज्यपाल और उप राष्ट्रपति बनाने के अलावा आयोगों का अध्यक्ष बनाने का खेल कांग्रेस ने बहुत ही बेईमानी और अमर्यादित ढंग से खेला, फिर भी न्यायमूर्ति जगमोहन सिन्हा  जैसे न्यायाधीश भी इसी व्यवस्था  की देन हैं, जिन्होंने सभी प्रलोभनों और दबावों को दरकिनार करते हुए इंदिरा के विरुद्ध फैसला दिया जिससे उनकी संसद सदस्यता ख़त्म हो गयी.  

मुम्बई उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस अभय थिप्से  नें सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में गुजरात के भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा किया था और मालेगांव विस्फोट मामले में कहा था कि ये विस्फोट हिंदू संगठनों द्वारा किया गया है। उनके फैसले में कांग्रेस की राजनीति की झलक थी. २०१८ उन्होंने त्यागपत्र देकर कांग्रेस पार्टी ज्वॉइन की, और नीरव मोदी के मामले में  ब्रिटेन की अदालत को झूठा हलफनामा भी दिया जिसे ब्रिटिश अदालत ने पकड़ लिया और विश्व भर में  भारतीय न्यायपालिका की किरकिरी हुई.

मुझे लगता है कि कोलेजियम व्यवस्था शायद इसी राजनीतिक घालमेल को दूर करने के लिए बेहद मजबूरी में लाई गई होंगी, जिसमें  कालांतर में स्वार्थ बस कई विसंगतिया आ गई.   न्यायाधीशों की नियुक्ति का यह कोलेजियम पैनल सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता में चलाया जाता है जिसमें चार  अन्य न्यायाधीश सदस्य होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय  और उच्च न्यायालयों के सभी न्यायाधीश अपनी अपनी सिफारिशें कोलेजियम को भेजते हैं, जहाँ उन पर विचार करके अंतिम निर्णय लिया जाता है और उसे केंद्र सरकार को नियुक्ति के लिए भेज दिया जाता है।

स्पष्ट है कि सभी न्यायाधीश अपने कार्यकाल में संपर्कों के आधार पर किसी न किसी की नियुक्ति करवा लेते हैं. न्यायाधीशों की नियुक्ति की इस व्यवस्था में सरकार की कोई भूमिका नहीं है, जो  भेजे गए नामों को पुनर्विचार के लिए सर्वोच्च न्यायालय को वापस तो कर सकती है लेकिन यदि सर्वोच्च न्यायालय फिर से उन्ही नामों  की सिफारिश करता है तो सरकार को उनकी नियुक्ति करना बाध्यकारी होता है। इसलिए सरकार कई विवादित नामों को लंबे समय तक लटकाए रहती है, और यही सर्वोच्च न्यायालय से अनबन का मुख्य कारण है.

यदि उच्च न्यायालयों  और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का रिकॉर्ड खंगाला जाए तो पता चलता है  कि कुछ परिवारों के सदस्य पीढ़ी दर पीढ़ी न्यायाधीश बनते जा रहे हैं. मुख्य न्यायाधीश का बेटा भी मुख्य न्यायाधीश बन जाता है. एक कहावत प्रचलन में है कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में कोई भी ऐसा न्यायाधीश नहीं होता है जो बिना किसी जस्टिस अंकल के नियुक्त हुआ हो. भाई भतीजावाद की ऐसी बीमारी तो शायद ही किसी सरकारी विभाग में हो. इस सब के बाद भी  उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों में नैतिकता कम हठधर्मी ज्यादा दिखाई पड़ती हैं. कई न्यायाधीश अपनी ऊट पटांग टिप्पणियों और वक्तव्यों के लिए कुख्यात रहते हैं. ऐसा तभी हो संभव है जब उन्हें लगता हो कि उनके ऊपर कोई भी नहीं, जो लोकतंत्र के लिए स्वयं गंभीर  खतरा है. ऐसे में यह बहुत स्वाभाविक है कि इतनी लाभदायक कोलेजियम व्यवस्था को सर्वोच्च न्यायालय कैसे छोड़ सकता है जिसमें हर न्यायाधीश का लाभ होता हो.  

पिछले कुछ समय से कानून मंत्री किरण रिजिजू कॉलेजियम व्यवस्था पर अपनी बेबाक टिप्पणियां कर रहे हैं, यद्यपि उसमें  कहीं भी सर्वोच्च न्यायालय के प्रति असम्मान, अवज्ञा या अवमानना परलक्षित नहीं होती फिर भी उनकी टिप्पणियों से सर्वोच्च न्यायालय बहुत  तिलमिलाया हुआ है.

इसमें कोई संदेह नहीं की कोलेजियम व्यवस्था के अंतर्गत एक न्यायाधीश ही दूसरे न्यायाधीश की नियुक्ति करता है, जो दुनिया के किसी भी देश में नहीं होता. इस प्रक्रिया में  पारदर्शिता का पूरी तरह से अभाव है. तकनीकी आधार पर देखा जाए तो इन न्यायाधीशों की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है, कॉलेजियम केवल चयन करके नाम भेजता है. प्रश्न है की जब सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया पर एकाधिकार  है, और  वह इतना सक्षम है तो फिर सीधे इन चयनित न्यायाधीशों की नियुक्ति क्यों नहीं कर देता, केंद्र सरकार को नाम भेजने की क्या आवश्यक्ता? इसका सीधा सा मतलब है की नियुक्ति तो  केंद्र सरकार ही करती है किन्तु चयन का एकाधिकार सर्वोच्च न्यायालय ने जबरन अपने पास रखा है.

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का इससे बड़ा दुरुपयोग और कुछ नहीं हो सकता. सर्वोच्च न्यायालय, न्यायिक स्वतंत्रता के नाम पर संसद से ऊपर नहीं हो सकता. लोकतंत्र मेँ कानून बनाने का और संवैधानिक पदों को भरने का अधिकार संसद  के पास है. न्यायाधीशों के वेतन भत्ते ओर सेवा नियमावली आदि का निर्धारण संसद करती है. इससे कोई भ्रम नहीं है कि न्यायाधीश भी अन्य केन्द्रीय कर्मचारियों के सामान ही सरकारी कर्मचारी हैं. चूंकि  सभी संवैधानिक पदों पर नियुक्तियाँ सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति करते हैं,  जिसमें न्यायाधीश भी शामिल है,  स्पष्ट है कि कोलेजियम  व्यवस्था न तो संवैधानिक है और न हीं संवैधानिक पदों पर नियुक्ति की चयन प्रक्रिया के अनुरूप है.

न्यायपालिका पर राजनीतिक स्वार्थ हावी न हो, और सर्वोच्च न्यायालय संविधान और कानून के रक्षक की भूमिका निभा सके, इसके लिए आवश्यक है कि कोई न कोई ऐसा फॉर्मूला बनाया जाए जिसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को पारदर्शी निष्पक्ष और भाई भतीजावाद से मुक्त बनाया जा सके. इसके लिए जरूरी है कि सर्वोच्च न्यायालय और सरकार मिल बैठकर ऐसी किसी व्यवस्था पर सहमत हों.

-    शिव मिश्रा

 

 

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

खड्गे नहीं गांधी परिवार की जीत

 






कांग्रेस अध्यक्ष : कौन जीता,खड्गे या गांधी परिवार?

आखिरकार कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए लंबे समय से चल रहे उहापोह ओर उठापटक का पटाक्षेप हो गया और मल्लिकार्जुन खड़गे के रूप में कांग्रेस को एक नया अध्यक्ष मिल गया जिसके लिए निर्वाचन की औपचारिकता भी पूरी की गई लेकिन यह सब कुछ पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार ही हुआ इसलिए खड़गे जीते या शशि थरूर हारे, कहना बिल्कुल बेमानी और अर्धसत्य है. पूर्ण सत्य यह है की यह गाँधी परिवार की जीत है और सोनिया गाँधी की जीत है, अध्यक्ष खड़गे हैं या कोई और होता वह पूरी तरह से गाँधी परिवार की कठपुतली के रूप में कार्य करेगा और उसकी इच्छा के विपरीत कुछ भी करने की न तो उसमें सामर्थ्य है और न हिम्मत. सीताराम केशरी के कार्यकाल को याद करते हुए मल्लिकार्जुन खड़गे समय समय पर स्वयं सहमें सहमें रहेंगे. इसलिए गैर गाँधी अध्यक्ष बन जाने के बाद भी कांग्रेस में संगठनात्मक या नीतिगत कोई आशातीत परिवर्तन हो सकेगा इसकी उम्मीद नहीं की जानी चाहिए.

2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की जबरदस्त हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गाँधी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था और उन्होंने अच्छा व्यक्ति की थी कि अब कांग्रेस का अध्यक्ष कोई बाहर का व्यक्ति बनें लेकिन लंबे समय तक इस पर फैसला नहीं किया जा सका. सोनिया गाँधी कांग्रेस अध्यक्ष का पद किसी बाहरी व्यक्ति को देने की इच्छुक नहीं थी इसलिए कांग्रेस वर्किंग कमेटी की इच्छा को ढाल बनाकर वह स्वयं कार्यकारी अध्यक्ष बन गई और लंबे समय से अध्यक्ष पद के चुनाव इस आशा से टाल दिए गए थे कि इस बीच राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनने के लिए मनाया जा सके. इस बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने जिन्हें जी 23 की संज्ञा दी गई थी, सोनिया गाँधी को सार्वजनिक रूप से पत्र लिखकर कांग्रेस में तात्कालिक सुधार की आवश्यकता पर बल दिया जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष पद परिवार से बाहर किसी व्यक्ति को दिया जाना भी एक बड़ा मुद्दा था. सोनिया गाँधी पुत्रमोह के कारण लंबे समय तक असमंजस में रही और कपिल सिब्बल गुलाम, नबी आजाद जैसे बड़े नेता भी पार्टी छोड़ते चले गए.

कई प्रदेश कांग्रेस समितियों ने प्रस्ताव पारित कर राहुल गाँधी से अनुरोध किया कि वह कांग्रेस के अध्यक्ष पद स्वीकार करें, इससे राहुल गाँधी अध्यक्ष भले ही न बने हो लेकिन गाँधी परिवार के प्रति पार्टी में निष्ठा और निर्भरता का आकलन जरूर हो गया. इसके बाद मधु सूदन मिस्त्री, जो गाँधी परिवार के बेहद करीबी हैं, को चुनाव अधिकारी  बनाकर अध्यक्ष पद के निर्वाचन की अधिसूचना जारी कर दी गई. जिसतरह से अध्यक्ष के निर्वाचन मंडल के लिए डेलीगेट बनाए इस पार्टी के ही कई बड़े नेताओं ने सवालिया निशान लगाए. गाँधी परिवार किसी ऐसे व्यक्ति की खोज में था जिसकी गाँधी परिवार के प्रति निष्ठा संदेह से परे हो. इससे यह संदेश चला गया की अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने वाला कोई भी व्यक्ति गाँधी परिवार के बिना अनुमति के चुनाव नहीं लड़ सकता है. इसीलिए शशि थरूर ने भी चुनाव लड़ने के लिए सोनिया गाँधी से अनुमति मांगी और उन्हें अनुमति दे दी गई.

सोनिया गाँधी ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को परिवार के प्रति उनकी निष्ठा के आधार पर अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने का मन बनाया जिसे  गाँधी परिवार और अशोक गहलोत दोनों ने ही सार्वजनिक कर दिया, किंतु राजस्थान में मुख्यमंत्री पद को लेकर हुए घमासान ने कांग्रेस और गाँधी परिवार की इज्जत तार तार कर दी. गहलोत अध्यक्ष तो बनना चाहते थे लेकिन मुख्यमंत्री का पद नहीं छोड़ना चाहते थे. सोनिया से बातचीत के बाद वह मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए तैयार हो गए लेकिन वह गाँधी परिवार के सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाए जाने की फैसले से सहमत नहीं थे और इसलिए उन्होंने बगावत कर दी. कांग्रेस के ज्यादातर विधायक गहलोत खेमे में थे जिन्होंने सामूहिक इस्तीफा देकर कांग्रेस हाई कमान पर दबाव बनाया. सोनिया के अनुरोध के बाद भी गहलोत ने विधायको को समझाने बुझाने का प्रयास नहीं किया.  गहलोत के ऐन वक्त पर यू टर्न के कारण गाँधी परिवार ने अध्यक्ष पद के लिए किसी अन्य व्यक्ति को चुनाव लड़ाने का फैसला किया और शीघ्रता से  कई नामों पर विचार किया गया लेकिन विडंबना देखिए कि गाँधी परिवार अंबिका सोनी, केसी वेणुगोपाल और मल्लिकार्जुन खडगे के अलावा किसी अन्य नाम पर विचार भी नहीं कर सका और अंतिम रूप से मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम नामांकन की तिथि से कुछ समय पहले ही किया गया.

इस पूरी प्रक्रिया से दो बातें पूरी तरह से स्पष्ट हो गई कि एक तो शशि थरूर  गाँधी परिवार के विश्वास पात्र नहीं है दूसरा कि  बिना गाँधी परिवार के अशिर्वाद के कोई भी व्यक्ति अध्यक्ष नहीं बन सकता. गाँधी परिवार के संकेत के बाद प्रदेश कांग्रेस समितियों ने खड़गे के पक्ष में माहौल बनाना शुरू कर दिया जिसका परिणाम यह हुआ कि  उन्हें के कुल 10,000 मतों में से 7897 मत मिले जबकि शशि थरूर को 1072 मत मिले. गाँधी परिवार का प्रभाव इस बात से ही समझा जा सकता है कि तुलनात्मक रूप से खड़गे की अपेक्षा शशि थरूर पार्टी में कहीं ज्यादा लोकप्रिय और स्वीकार्य नेता है. चुनाव के बीच ही शशि थरूर ने चुनाव प्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए कहा था कि प्रादेशिक कांग्रेस समितियाँ खड्गे को गांधी परिवार का आधिकारिक उम्मीदवार बता रहीं हैं और इस तरह पक्षपात होने की संभावना है. कई प्रदेशों में शशि थरूर को पोलिंग एजेंट भी नहीं मिल पाए थे.  शशि थरूर के चुनाव प्रतिनिधि सलमान सोज ने मतदान में धांधली का आरोप लगाया और चुनाव अधिकारी मधुसूदम मिस्त्री को लिखित आपत्ति दर्ज कराई. इस सबके बीच काफी नाटकीय घटनाक्रम में  कांग्रेस की अध्यक्ष का चुनाव सम्पन्न हो गया और करीब 24 साल बाद कांग्रेस पार्टी की कमान गैर-गांधी परिवार के मल्लिकार्जुन खड़गे के हाथ में आ गई है. ८० वर्ष की उम्र के इस पड़ाव पर सीताराम केसरी का भूत सपने में भी खड्गे को डराता रहेगा और वह चाहते हुए गांधी परिवार की चाहत से अलग कुछ कर पाने का साहस नहीं जुटा पायेगे.

यद्दपि खड्गे अनुसूचित जाति से हैं और कर्णाटक  से हैं और हो सकता है कि इसका कुछ लाभ  कर्णाटक चुनाव में कांग्रेस को मिले लेकिन उत्तर भारत और महाराष्ट्र में इसका अधिक असर पड़ने की संभावना नहीं है. इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर इसका कोई फायदा कांग्रेस को नहीं मिलेगा. इसके उलट उनके बौद्ध धर्मावलम्बी होने  और हिन्दू धर्म के विरुद्ध अक्सर बयान देने और हिन्दी भाषा पर अच्छी पकड़ न होने के कारण खड्गे कांग्रेस का लगातार कुछ न कुछ नुकशान करते रहेंगे लेकिन गांधी परिवार ने चुनावी फायदे से ज्यादा परिवारिक निष्ठा को महत्त्व दिया. पारिवारिक वफादारी के कारण  ही लोकसभा और राज्य सभा में कांग्रेस नेता का पद भी क्रमश: अधीर रंजन चौधरी और खड्गे को दिया गया था और यह बताने की आवश्यकता नही इससे कांग्रेस ने क्या खोया और क्या पाया. 

कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव और राहुल की भारत जोड़ो यात्रा के कारण  हिमाचल और गुजरात में कांग्रेस अपना चुनाव प्रचार भी शुरू नहीं कर सकी है. जहाँ कई नेता राहुल की इस पदयात्रा को बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रचारित कर रहें हैं वही पार्टी  के शुभचिंतकों ने राहुल से यात्रा बीच में रोक कर गुजरात और हिमांचल चुनावों में प्रचार करने का अनुरोध किया पर शायद कांग्रेस ने इन दोनों राज्यों में हारने के पकी इरादे के साथ पूरी तैयारी कर ली हैं. इसे भांप कर दोनों राज्यों में बड़ी संख्या में नेता कांग्रेस  छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए हैं. बचा खुचा काम आम आदमी पार्टी कर रही है जो कांग्रेस के वोटों में बड़ी संख्या में सेंध लगा कर कांग्रेस की बुरी हार सुनिश्चित कर देगी. इसलिए नए कांग्रेस अध्यक्ष का प्रथम स्वागत  गुजरात और हिमाचल की हार से होगा. अब जब मल्लिकार्जुन खड्गे  'बकरीद में बच गए हैं  तो मुहर्रम में जरूर नाचेंगे”.

किसी गैर गांधी के कांग्रेस का अध्यक्ष बन जाने से राहुल और कांग्रेस को तात्कालिक भावनात्मक राहत भले ही मिल जाए इससे पार्टी का भला हो पायेगा इसमें  संदेह हैं. शशि थरूर को गांधी परिवार की इच्छा के विरुद्ध लगभग २०% मत मिलना भे गांधी परिवार के लिए बहुत बड़ा  सन्देश है कि पार्टी लम्बे समय तक गांधी परिवार की पिछलग्गू  बने नहीं रह सक्ती है  है.

-    शिव मिश्रा           

-    शिव मिश्रा           

मंगलवार, 27 सितंबर 2022

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया या इस्लामिक फ्रंट ऑफ इंडिया ?

 


पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया या इस्लामिक फ्रंट ऑफ इंडिया ?

राष्‍ट्रीय अन्‍वेषण अभिकरण (एनआईए), और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी)  ने कई राज्यों की पुलिस के साथ मिलकर पूरे देश में  अनेक स्थानों पर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के ठिकानों पर छापेमारी करके 100 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है और बड़ी संख्या  में भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने का प्रमाण और भारत में वादी गतिविधियाँ फैलाने के लिए विदेशों से चंदा एकत्रित करने संबंधित दस्तावेज बरामद किए हैं. छापेमारी मुख्यत: दक्षिण भारत में की गयी जिसे  एनआईए ने  ‘अब तक का सबसे बड़ा जांच अभियान’ बताया  है.

सरकार द्वारा की गयी यह कार्रवाई बहुत देर से उठाया गया सही कदम है. पिछले पांच सालों में इस संगठन ने देश के लगभग हर  उस इलाके में अपनी पैठ बना ली है जहाँ मुस्लिम जनसंख्या है. स्वयंसेवी और राष्ट्रवादी संगठनों द्वारा सरकार से लगातार इस संगठन को प्रतिबंधित करने की मांग की जा रही है लेकिन मोदी सरकार ने “सबका विश्वास” हासिल करने के लालच में इस कार्यवाही में आवश्यकता से अधिक विलंब कर दिया है, अब जब पानी सिर के ऊपर निकल गया है तब सरकार की नींद खुली है. इस बीच इस संगठन ने शाहीन बाग से लेकर पूर्वोत्तर तक आतंक और साम्प्रदायिकता का जाल बुन रखा है. दक्षिण भारत में इसकी गतिविधियों बेरोकटोक चल रही है. इसके कारण तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश तेलंगाना और कर्नाटक जैसे राज्यों में  सांप्रदायिक और भारत गतिविधियों में  आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई है.

पीएफआइ का उद्देश्य भारत में तालिबान जैसी शासन व्यवस्था कायम करना है जिसके लिए उसने अपनी लंबी अवधि की योजना तैयार कर रखी है. जिसके अंतर्गत कई राज्यों में राज्य सरकारों की जानकारी में होते हुए भी सैनिक प्रशिक्षण और भारत विरोधी गतिविधियों के अड्डे स्थापित कर रखे है. बिहार और पूर्वोत्तर राज्यों पर खासा ध्यान दिया गया है जहाँ मदरसों में आतंकी संगठनों से संबंध रखने वाले लोगों को अन्य राज्यों से लाकर मौलाना और मौलवी के रूप में रखा गया है. असम सरकार ने ऐसे मदरसों के विरुद्ध कार्रवाई करनी शुरू कर दी है लेकिन बिहार में जहाँ पीएफआई  गतिविधियों अपने चरम पर है किन्तु सरकार ने अब तक उसके विरुद्ध कोई भी कार्रवाई नहीं की है. फुलवारी शरीफ की जांच भी लगभग ठन्डे बस्ते में चली  गयी है.

प्रतिबंधित आतंकी संगठन पूर्व के  कुख्यात सिमी का ही परिवर्तित रूप है लेकिन इसकी गतिविधियां  और पूरे भारत मे नेटवर्क सिमी से भी बहुत बड़ा है. इसका परिचालन विदेशी कार्यालयों से भी किया जाता है जिसमें खाड़ी देशों के अलावा तुर्की  स्थित कार्यालय बहुत अधिक सक्रिय है.  इन सभी जगहों से इस संगठन को बड़ी मात्रा में है धन उपलब्ध कराया जाता है. भारत में धन भेजने के इसने  कुछ अनेक अनोखे तरीके तैयार कर रखे हैं जो अभी भी सरकार की पकड़ से बाहर है. इनमें हवाला के अतिरिक्त विदेशों से बड़ी धनराशि को छोटी छोटी राशियों  में बांटकर अनेक लोगों के खाते में प्रेषित की जाती है जिसे जकात और अन्य माध्यम से संबंधित संगठनों, मस्जिदों  और यहाँ तक कि पीएफआई के खातों में भी पहुंचा दिया जाता है. एंटी मनी लॉन्ड्रिंग की भाषा में इसे “वन टू मेनी” एंड “मैनी टू वन” कहा जाता है.  इस तरह प्राप्त धन का उपयोग टेरर फंडिंग और  सांप्रदायिक आंदोलन चलाने के लिए किया जाता है.

हाल के दिनों में हिजाब के पक्ष में कर्नाटक से शुरू हुए  आंदोलन हे पीछे भी पीएफआई का ही हाथ है और सिर तन से जुदा मामले भी इसी संगठन से जुड़ते हैं. इसमें किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि पीएफआई की गतिविधियों को ज्यादातर मुस्लिम धर्मगुरुओं राजनेताओं और संगठनों का समर्थन प्राप्त है. सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पीएफआई के कार्यों को उचित ठहराते हैं और जब भी कभी पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने या कार्रवाई करने की बात की जाती है तो यह सभी  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी प्रतिबंध लगाने की मांग करते हैं, जिससे  पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि इनका समर्थन  पी ऍफ़ आई गैरकानूनी गतिविधियों के साथ है. 

पिछले दिनों बिहार के फुलवारी शरीफ में बिहार पुलिस द्वारा की गई छापेमारी में पीएफआइ की उस कार्ययोजना का खुलासा हुआ था जिसके अंतर्गत उसका लक्ष्य 2047 तक भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाना है. इन गतिविधियों को चाहे देशद्रोही कहा जाए या  नहीं  लेकिन इस तरह की गतिविधियाँ और उन्हें समर्थन करने वाले  भारत के  ज्यादातर मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों का उद्देश्य गज़वा ए हिंद योजना को आगे बढ़ाना  है.  इसे मुस्लिम  राजनीतिज्ञों का समर्थन तो प्राप्त है ही, अप्रत्यक्ष रूप से इसे तुष्टीकरण करने वाले राजनीतिक दलों का भी समर्थन  प्राप्त हो जाता है.

एनआईए ने जिन  लोगों को गिरफ्तार किया है उन पर आतंकवाद के लिए धन मुहैया कराने, हथियार चलाने का प्रशिक्षण देने और प्रतिबंधित संगठनों में शामिल होने के लिए लोगों को उकसाने का आरोप है। पिछले कुछ वर्ष के दौरान देश के विभिन्‍न राज्‍यों में पी.एफ.आई. और इसके सदस्‍यों के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं। भारत सरकार ने एक मिशन के तहत जिस तरह गिरफ़्तारी की है वह साधारण नहीं है, क्योंकि  पीएफआई  तालिबान की तर्ज पर भारत को इस्लामिक स्टेट बनाना चाहती है.  यह लोग बम  बनाने में दक्ष है, और सिर तन से जुदा, टेरर फंडिंग और आतंकी गतिविधियों में भी शामिल हैं। इस देश में कई जगहों पर पीएफआई द्वारा हथियार चलाने के लिए ट्रेनिंग कैंप चलाये जा  रहे हैं और युवाओं को कट्टर बनाकर प्रतिबंधित संगठनों में शामिल होने के लिए उकसाया जा  रहा है। मदरसों में भी इनकी पैठ हो गई है जिन्हें  आतंक की फैक्टरी के रूप में विकसित  करने का काम शुरू कर दिया गया है. इसलिए मदरसों के सर्वे पर एतराज जताया जा रहा है.  

एनआईए की छापे की कार्रवाई का विरोध करने के लिए शुक्रवार को पीएफआई ने केरल में बंद बुलाया गया था जहाँ  जगह-जगह सड़क जाम करने की कोशिश की गयी, सरकारी बसों में तोड़फोड़ की गई, बस ड्राइवर हेलमेट पहनकर बस चलाते देखे गये. दुकानदारों से जबरदस्ती दुकानें बंद करने के लिए कहा गया और जिन्होंने दुकानें बंद नहीं की उनसे मारपीट भी की गई. पीएफआइ द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक के कार्यालयों पर बम फेंकने  की घटनाएं भी सामने आयी है. कई जगहों पर पुलिस से प्राप्त हुई और पूरे केरल में उत्पात मचाया गया. पीएफआई के उत्पात के कारण  राहुल गाँधी ने भारत जोड़ों यात्रा भी प्रभावित हुई है. केरल हाई कोर्ट ने इसका स्वत: संज्ञान  लिया है क्योंकि केरल में बिना 7 दिन की सूचना दिए हड़ताल या बंद  का आह्वान करने पर उच्च न्यायालय द्वारा रोक लगायी जा चुकी है. उच्च न्यायालय ने पीएफआई द्वारा प्रयोजित बंद के विरुद्ध अवमानना कार्रवाई शुरू कर दी है  और न्यायालय ने टीवी चैनलों पर भी फ्लैश हड़ताल का जोरशोर से प्रचार किए जाने पर भी आपत्ति जताई है. 

विश्वस्त सूत्रों के अनुसार पीएफआई ने प्रशिक्षित स्वयं सैनिकों  की फौज भी  तैयार कर ली है जो जरूरत पड़ने पर उसकी कार्रवाइयों को अंजाम दे सकें और भारत को हे 2047 तक इस्लामिक राष्ट्र बनाने का उसका सपना साकार कर सकें. इन छापों में पीएफआई के अलकायदा और आईएसआईएस से संबंधों की भी पुष्टि हुई है, जो वर्तमान परिस्थिति में भारत के लिए गंभीर खतरा है. भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की कार्ययोजना के लिए  वैश्विक मुस्लिम समुदाय से हर संभव मदद की जा रही है. दुर्भाग्य से भारत का जो राजनीतिक माहौल है उसमें  तुष्टीकरण  की नीति पर चल कर सत्ता पाने वाले  वाले ज्यादातर राजनैतिक दल इस खतरे को जानते हुए भी सत्ता पाने के स्वार्थ में इतने अंधे हो चूके हैं कि उन्हें भारत की इस्लामिक राष्ट्र बनने से भी कोई  चिंता नहीं है.

2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता बनाने  और एकीकृत विपक्ष का नेता बनने के लिए प्रधानमंत्री पद के चेहरे के सभी  दावेदार  पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के हमदर्द बनकर उभर आए हैं और उन सभी ने पीएफआई पर हो रही  कार्रवाई का विरोध किया है उसमें कांग्रेस भी शामिल है. कांग्रेस के नेता तारिक अनवर ने तो यहाँ तक कहा कि सरकार की कार्रवाई को तभी उचित ठहराया जा सकता था जब सरकार पीएफआई के साथ साथ आरएसएस के ठिकानों पर भी छापा मारती.

जो भी हो सरकार कार्रवाई बहुप्रतीक्षित थी है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए लेकिन तब तक अधूरी रहेंगी जब तक पीएफआई जैसे संगठनों शीघ्रता से  प्रतिबंध नहीं लगाया जाता. पीएफआइ के अतिरिक्त भी अनेक ऐसे इस्लामिक और मुस्लिम संगठन है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से  मिशन गज़वा ए हिंद में शामिल हैं, जिन पर तुरंत कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है. सरकार द्वारा किये जाने वाला विलम्ब  राष्ट्र के प्रति बड़ा  अन्याय होगा. 

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- शिव मिश्रा 

 

 


 

 



 

 



 

 

रविवार, 18 सितंबर 2022

कुर्सी के आसपास घूमती विपक्षी एकता

 

कुर्सी के आसपास घूमती विपक्षी एकता

कांग्रेस का पराभव तो बहुत लंबे समय से हो रहा है. उसके नेता एक एक करके पार्टी छोड़ते जा रहे हैं और इस कारण कांग्रेस बिल्कुल कृषकाय हो गई है, जिसका उपचार गाँधी परिवार से मुक्ति है, जो संभव नहीं है. इसलिए  बिना उपचार के कांग्रेस कितने दिन तक जिंदा रहेगी, कह पाना बहुत मुश्किल है. विपक्ष में कोई भी ऐसा सर्वमान्य नेता नहीं है जो संयुक्त विपक्ष का नेतृत्व कर सके लेकिन क्षेत्रीय क्षत्रप अपने सीमित राजनैतिक दायरे से निकलकर प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा के घोड़े पर सवार होकर निकल पड़े हैं. प्रत्येक दल का नेता  यही चाहता है कि अन्य दल  नेतृत्व करने की जिम्मेदारी उसे सौंप दें ताकि यदि कभी बिल्ली के भाग्य से छींका टूटे तो  येन केन प्रकारेण प्रधानमंत्री की कुर्सी हथिया सकें.

कांग्रेस में पार्टी  अध्यक्ष का पद पिछले लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गाँधी द्वारा इस्तीफा देने के कारण रिक्त हो गया था और तब से इसे भरा नहीं जा सका है. राहुल गाँधी ने घोषणा की थी कि नया अध्यक्ष गाँधी परिवार से नहीं होगा लेकिन शायद सोनिया गाँधी को ये मंजूर नहीं था  क्योंकि वह पार्टी से अपना नियंत्रण छोड़ने के लिए तैयार नहीं है और इस कारण उन्होंने स्वयं अपने आप को कार्यकारी अध्यक्ष मनोनीत करवा लिया और चुनाव  टाल दिए गए. इस्तीफा देने के बाद भी पार्टी पर पूरी पकड़ राहुल गाँधी की है, जो गंभीर राजनीति के लिए नहीं जाने जाते और ऐसे में इस अस्थायी व्यवस्था से पार्टी का भला नहीं  हो सकता है, लेकिन परिवार के प्रति निष्ठावान नेता वर्तमान व्यवस्था को चलाते रहने के पक्ष में है. पार्टी के वरीष्ठ नेताओं ने मांग की  थी कि अध्यक्ष पद पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा किसी व्यक्ति की स्थायी नियुक्ति की जाए. जी 23 आपके नाम से मशहूर हो गए इन नेताओं के विरुद्ध परिवार के निष्ठावान नेताओं ने  इतने प्रहार किये कि अपमान से आहत कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है और कई छोड़ने की कतार में हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव तक इस बात की संभावना ज्यादा है कांग्रेस के कई महत्वपूर्ण नेता पार्टी छोड़ देंगे और उनकी पहली पसंद भाजपा होगी, फिर भी आज कांग्रेस के बिना विपक्षी एकता की कल्पना नहीं की जा सकती. यह प्रश्न तो हमेशा उठाया जाता रहेगा कि जो  पार्टी स्वयं एकजुट नहीं रह सकती, वह पूरे विपक्ष को कैसे एकजुट कर पाएगी.  

राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा शुरू हो गयी है लेकिन अपनी धुन में वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध वही पुराने और घिसे पिटे आरोप लगा रहे हैं जिन्हें जनता कभी का खारिज कर चुकी है. कांग्रेस ने कभी भारत छोड़ो का नारा दिया था और इसके बाद भारत तोड़ने का भी काम किया और अब अगर भारत जोड़ों यात्रा का अभियान चलाया जा रहा है तो असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा का कहना बिल्कुल उचित है कि कांग्रेस को अपनी यह यात्रा पाकिस्तान में शुरू करनी चाहिए. ऐसा लगता है कि भारत जोड़ो यात्रा का उद्देश्य सोनिया गाँधी द्वारा राहुल गाँधी का रीलांच करना है ताकि पार्टी में उनके विरुद्ध उठ रहे बगावती स्वरों को ठंडा किया जा सके और साथ ही साथ संयुक्त विपक्ष की नेतृत्व की जिम्मेदारी और परिस्थितियां आने पर प्रधानमंत्री के पद की दावेदारी को भी मजबूत  जा सके .

 देश में विपक्षी एकता का आवाहन नई बात नहीं है. केंद्र में हर सत्ताधारी दल के विरुद्ध इस तरह की कोशिशे होती आई है. भाजपा की  केंद्र में दो बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद विपक्ष काफी हद “पराजित होने का भय”  की हीन  ग्रंथि से ग्रसित है, यह विपक्षी एकता के लिए किए जा रहे प्रयासों से भी स्पष्ट हो जाता है. विपक्षी खेमे में प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोए कई क्षेत्रीय राजनेता मैदान में हैं, जिनकी विश्वसनीयता पर भी बड़े  प्रश्न  चिन्ह लगे हैं लेकिन उनका दिल है कि मानता नहीं. विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच अंतर्विरोध भी विपक्षी एकता में सबसे बड़ी बाधा है.  उदाहरण के लिए तेलंगाना के  मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव उस गठबंधन में शामिल नहीं हो सकते जिसमें कांग्रेस हो, मायावती की बसपा उस गठबंधन का हिस्सा नहीं हो सकती  जिसमें समाजवादी पार्टी हो, चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी उस गठबंधन का हिस्सा नहीं हो सकती  जिसमें जगनमोहन रेड्डी  हों. ओडिशा के नवीन पटनायक ही  केवल ऐसे नेता  होंगे जो किसी भी गठबंधन का हिस्सा न होते हुए भी केंद्र में सरकार बनाने वाले  दल या गठबंधन को बाहर से समर्थन देते रहेंगे.

हाल में एक  नाटकीय घटनाक्रम में बिहार में  पलटूराम यानी  नीतीश कुमार ने भाजपा से नाता तोड़ कर एक बार फिर उनका साथ पकड़ लिया जिन्हें  वह जंगलराज कह कर धिक्कारते रहे थे. अपनी राजनैतिक कलाबाजी के लिए कुख्यात हो चुके  नीतीश कुमार ने दो दो बार भाजपा और राष्ट्रीय जनता दल से गठबंधन तोड़ा है और अपनी पार्टी के जार्ज फेर्नान्डीज़, शरद यादव जैसे अनेक नेताओं को ठिकाने लगाया है. राज्य में अब उनकी विश्वसनीयता धरातल पर हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी सिमटकर 43 विधेयकों तक सीमित रह गई थी. उनके निकटवर्ती सूत्रों का कहना है कि 2025 के अगले विधानसभा चुनाव से पहले 2024 में लोकसभा चुनाव होंगे जिसमें वह अपनी बढ़ती उम्र के कारण अंतिम बार सक्रिय रूप से हिस्सा लें सकेंगे.  इसलिए वह अपने प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा को साकार करने के आखिरी अवसर को गंवाना नहीं चाहते. चूंकि भाजपा के साथ गठबंधन में यह संभव नहीं था. इसलिए मुख्यमंत्री रहते हुए प्रधानमंत्री बनने का अपना सपना साकार करने के लिए पलटी मारना  ज़रूरी था ताकि विपक्षी खेमे में शामिल होकर जोड़ तोड़ शुरू करने का मौका मिल सके. यद्यपि उनकी पार्टी जेडीयू उन्हें प्रधानमंत्री मटेरियल बताकर आगे बढ़ा रही है जबकि  स्वयं नीतीश कुमार कहते हैं कि वह प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं है. जिससे स्पष्ट है कि उन्होंने अघोषित रूप से प्रधानमंत्री पद की दावेदारी कर दी है और दिल्ली आकर विभिन्न दलों के राजनेताओं से मुलाकात कर अपने लिए समर्थन हासिल करने की कोशिश भी की है.

इससे पहले ममता बेनर्जी भी  प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी ठोक चुकी है और उन्होंने कह भी दिया है  कि भाजपा का खेला पश्चिम बंगाल से शुरू होगा. प्रधानमंत्री पद के  एक अन्य उम्मीदवार हैं तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव जो तेलंगाना बनने के बाद लगातार उसके  मुख्यमंत्री रहते के कारण अपने आपको बेहद लोकप्रिय नेता मानने लगे हैं. उनको लगता है कि वह राष्ट्रीय क्षितिज पर चमकने के लिए तैयार है.

अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा के अत्यंत धनी  आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल भी प्रधानमंत्री बनने के लिए लंबे समय से अपने आप को प्रस्तुत कर रहे हैं. प्रिंट और डिजिटल मीडिया में छाये रहने  के लिए विज्ञापनों  पर अंधाधुंध सरकारी पैसा खर्च करने वाले और मुफ्त रेवड़ियां बांटने के उस्ताद अरविंद केजरीवाल, जिन्हें समाज और देश बांटने से भी परहेज नहीं है, अब देश की सीमाओं से बाहर जाकर भी सुर्खियां बटोरने में  लगे हैं. स्वाभाविक है कि वह  प्रधानमंत्री पद की अपनी दावेदारी से  पीछे हटने वाले नहीं.  उनकी महत्वाकांक्षा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने एक छोटे से राज्य का मुख्यमंत्री रहते हुए मेक इंडिया नंबर वन का अभियान शुरू किया  है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 100 से अधिक विधायकों वाली पार्टी के नेता अखिलेश यादव भी मैदान में हैं लेकिन उनकी मजबूत दावेदारी इस  पर निर्भर करेगी कि उन्हें  लोकसभा चुनाव में कितनी सफलता मिलती है. स्ट्रॉन्ग या रॉन्ग मराठा नेता  शरद पवार  की महत्वाकांक्षा किसी से भी छिपी नहीं है. यह अलग बात है कि महाराष्ट्र में उनके बड़े राजनैतिक सफ़र  के अनुसार उनका कद उतना बड़ा नहीं है और आज भी वह अपने दम पर राज्य में मुख्यमंत्री भी नहीं बन सकते लेकिन संयुक्त विपक्ष के कंधे पर चढ़कर वे भी प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में पीछे नहीं रहेंगे.

इसलिए यह कहना बहुत मुश्किल है की विपक्षी एकता बन पाएंगी या नहीं और अगर बन गयी  तो कब तक बनी रहेंगी.

-    शिव मिश्रा  

शनिवार, 17 सितंबर 2022

साधुओं पर हमले का रहस्य

 

साधुओं पर हमले सनातन विरोधी साजिश










ज़रा गंभीरता से सोचिए कि अगर आपकी सुरक्षा करने वाले ही सुरक्षित न रहे, षडयंत्र पूर्वक उनकी हत्याये की जाने लगे, और खतरा आप पर भी हो, तो आप कैसे सुरक्षित रह सकते हैं और कब तक बचे रह सकते हैं?

देश में इस समय अनेक ऐसी घटनाएं हो रही है जो  आपस में जुड़ी हुई दिखाई तो नहीं पड़ती लेकिन उनमें बहुत गहरा संबंध है. एक नया और महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, साधु सन्यासियों की हत्याएं और उन पर जानलेवा हमले, जो देखने में तो सामान्य कानून व्यवस्था  और अफवाह आधारित स्वतःस्फूर्त मामले  दिखाई पड़ते हैं लेकिन अगर गंभीरता से विचार करें तो ये हिंदुओं और उनकी प्राचीन सनातन संस्कृति के विरुद्ध बहुत बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है.

हाल में बच्चा चोरी की अफवाह आधारित आरोप में देश के विभिन्न भागों में साधुओं की हत्याएं हुई हैं और कई जगह उन पर जानलेवा हमले किए गए और उन्हें मारने की कोशिश की गई. इस तरह की घटनाओं से हिंदुओं और सनातन संस्कृति पर अप्रत्यक्ष रूप से हमला किया गया है. इस षड्यंत्र के कारण साधुओं के रूप में सनातन संस्कृति के निस्वार्थ कार्यकर्ताओं की हत्याएं जितनी गंभीर है उससे भी अधिक गंभीर यह है कि इसका उद्देश्य  सनातन संस्कृति के ध्वज वाहको के प्रति समाज में असम्मान और अविश्वास पैदा करना है जो हजारों वर्षों से घर परिवार छोड़ कर, माया मोह के बंधन त्यागकर सनातन संस्कृति के प्रति कृत संकल्पित होकर उसकी रक्षा करते आए हैं. इन हत्याओं को अफवाहों के आधार पर स्वाभाविक आक्रोश नहीं माना जा सकता है. अफवाह फैलाना भी एक बड़े षड्यंत्र का एक हिस्सा है. हिन्दी फिल्मों में तो लम्बे समय से साधू सन्यासियों का विकृत रूप पेश किया जा रहा है.   

पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक जिले के पुलिस अधिकारी के एक वीडियो में छेड़छाड़ करके उसे इस ढंग से बना दिया गया कि यह लोगों को पुलिस विभाग की तरफ से सावधान रहने की चेतावनी जैसा लगने लगे. इसमें कहा गया है कि “500 से अधिक अपराधी प्रवृत्ति के लोग साधु सन्यासियों के भेष में देश के विभिन्न भागों में घूम रहे हैं जो बच्चा चोरी करके उनके शरीर के अंग बेचने का काम करते हैं, इनसे सावधान रहें”  इस वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल किया गया और इसके कारण अफवाहों का बाजार गर्म हुआ, और  इस कारण देश के कई भागों में साधु सन्यासियों पर बिना सोचे समझे हमले होने लगे, यह सही है कि अफवाहें बहुत तेजी से फैलती है, लेकिन इनके पीछे कौन है, इसकी तह में जाना अत्यंत आवश्यक है.

कुछ समय पहले महाराष्ट्र के पाल घर में साधुओं  की निर्मम हत्यायें  की गई थी और मौके पर उपलब्ध पुलिस मूकदर्शक बनी रही थी. उस समय उद्धव ठाकरे की सरकार थी जो एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन की सरकार थी, पर अब  महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हिंदूवादी सरकार है लेकिन साधु सन्यासियों के विरुद्ध षडयंत्र अनवरत जारी है. सांगली में चार साधुओं की बच्चा चुराने के शक  में निर्मम पिटाई की गई और यह घटना भी पालघर की घटना की तरह होते होते बची. एक प्रतिष्ठित अखाड़े से सम्बद्ध यह सन्यासी कर्नाटक के बीजापुर से महाराष्ट्र के पंढरपुर जा रहे थे और पिछली  रात उसी गांव के मंदिर में ही ठहरे थे. फिर अचानक दूसरे दिन ऐसा क्या हो गया कि  कुछ ग्रामीणों ने उन्हें गाड़ी से खींच कर बेरहमी से पीट कर ह्त्या का प्रयास किया. बिहार के मधुबनी में एक मंदिर में  दो साधुओं की हत्या कर दी गई, पुलिस द्वारा यह कारनामा चोरों का बताया गया है, जो विश्वसनीय नहीं है.

बिहार के हाजीपुर की एक घटना पूरे हिंदू समाज की आँखें खोलने वाली है, जहाँ कुछ साधू  नंदी लेकर गांव में घूम कर लोगों से दान व भिक्षा मांगते देखा गया. ये लोग भी एक मंदिर में ठहरे लेकिन भगवान के प्रति कोई आस्था प्रदर्शित न करने  के कारण गांव वालों को शक हुआ,  तो पता चला कि यह सभी मुस्लिम हैं. पुलिस के समक्ष इन लोगों ने जो बयान दिया कि नंदी लेकर भिक्षा मांगने का यह काम उनके परिवार में कई पीढ़ियों से होता आया है, इसलिए वे भी ऐसा करते हैं, विश्वसनीय नहीं लगती. हो सकता है कि उनका इरादा साधुओं को बदनाम करने के उद्देश्य से साधु भेष में किसी बड़ी घटना को अंजाम देना हो. मथुरा वृंदावन सहित किसी भी तीर्थ स्थल पर मंदिर के आसपास बड़ी संख्या में लड़के लड़कियां और युवक श्रद्धालुओं को तिलक लगाकर पैसे मांगने के लिए खड़े रहते हैं,जिनमें बड़ी संख्या में मुस्लिम होते हैं.

इनसे सावधान रहने की जरूरत तो है, लेकिन किसी भगवाधारी साधू की मोब लिंचिंग प्रदर्शित करता है कि ऐसे लोग सनातन धर्म से विमुख होकर पथ भ्रष्ट हो रहें हैं. यह सब हिंदुओं की गिरती आस्था और चारित्रिक पतन को रेखांकित करता है, भले ही इसके पीछे कितनी भी बड़ी साजिश और षड्यंत्र क्यों न हो. चूंकि  सनातन धर्म दुनिया का सबसे सहिष्णु  ऐसा धर्म है, जिसमे कोई धार्मिक पाबंदियां नहीं है और सभी को स्वतंत्र रूप से सोचने ओर समीक्षा करने का धार्मिक अधिकार भी प्राप्त है. संभवतः इस कारण ही सनातन धर्मावलंबियों का धर्म से बहुत गहरा रिश्ता नहीं जुड़ पाता है. जिसका फायदा उठाकर क्रिश्चियन और इस्लाम से जुड़ें  लोगों और संस्थाओं ने धर्मांतरण का कुचक्र रचा और बड़ी संख्या में हिंदुओं को क्रिश्चियन या मुसलमान बनाने में सफल भी हुए.

हिन्दुओं के विरुद्ध षड़यंत्र में पिछली सरकारों  ने प्रत्यक्ष रूप से सहयोग भले ही न किया हो लेकिन धर्मांतरण का धंधा बिना किसी रुकावट के चलता रहा. राजनीति के सौदागरों ने वोटों  के लालच में धर्मांतरण, लव जिहाद, अराजकता और धार्मिक उन्माद फैलाने वाली संस्थाओं के कार्य में यथा संभव सहयोग किया और उनके दुष्कृत्य को उचित भी ठहराया, जो ज्यादातर राजनीतिक दल आज भी कर रहे हैं. धर्मांतरण के लिए इन संस्थाओं ने सनातन समाज में विघटन के बीज बोने का कार्य भी किया जिसके अंतर्गत समाज में विभिन्न जातियों के बीच मतभेद पैदा करके उन्हें जातियों उपजातियों, अगड़े पिछड़े, दलित आदिवासी के रूप में रेखांकित करने का कार्य भी किया. इसका उद्देश्य इन सभी सनातनियों को धर्म से विमुख करके समाज की मुख्यधारा से अलग थलग करना था.

हिन्दुओं के विरुद्ध इस तरह के षडयंत्र अंग्रेजी शासन में ही शुरू हो गए थे और इसमें वामपंथी इस्लामिक गठजोड़ ने प्रमुख भूमिका निभाई. इतिहास को विकृत रूप में पेश किया गया. मनुस्मृति सहित कई पौराणिक ग्रंथों में हेरफेर करके उन्हें परिवर्तित रूप में प्रकाशित किया गया और हिंदू समाज को विभाजित करने के उद्देश्य से इसे कपटपूर्ण ढंग से प्रचारित और प्रसारित किया गया. आर्यों को बाहरी और भारत पर आक्रमणकारी बताया गया. मनुस्मृति  में छेड़छाड़ करके इसे  दलित और आदिवासी विरोधी बना दिया गया और दलितों में आक्रोश पैदा करके उन्हें ब्राह्मणों और सवर्ण जातियों के विरुद्ध आंदोलन चलाने के लिए प्रेरित किया गया. षड्यंत्रकारी वामपंथी इस्लामिक गठजोड़ अपने उद्देश्य में काफी हद तक सफल भी हो गए और  उन्होंने बड़ी संख्या में दलित और आदिवासियों को धर्मांतरित करने में सफलता प्राप्त की थी.

बिहार और उत्तर प्रदेश में अनेक स्थानों पर साधुओं पर हमले हो रहे हैं जिसमें कई साधूओं की मृत्यु हो चुकी है, और कई गंभीर रूप से घायल हुए हैं. इन अफवाहों के पीछे के षड्यंत्र की जांच अत्यंत आवश्यक है, वरना यह सिलसिला रुकने वाला नहीं. सोशल मीडिया पर छद्म हिन्दू  नामों से सनातन धर्म के विरुद्ध विष वमन किया जा रहा है. अभी तक केवल लव जिहाद ही था अब तो इनकार करने पर ज़िंदा जलाने जैसे मामले भी आ रहे हैं. मुस्लिम समुदाय के युवक हिन्दू लड़कियों के अपहरण और बलात्कार में लिप्त हो रहे हैं. मदरसों में आतंकवादी संगठनो की संलिप्तता सामने आ रही है. मिशन 2047 प्रकाश में आ चुका है. इन्हें अलग अलग करके देखना भारी भूल होगी. इसलिए  “सबका साथ, सबका विकाश, और सबका विश्वास” में लगी मोदी सरकार को चाहिए कि सनातन संस्कृत के खिलाफ हो रहे षड्यंत्रों को विफल करने और भारत पर गजव़ा-ए-हिन्द के खतरे को देखते हुए प्रभावी कार्यवाही करे. विकाश तो तभी होगा जब देश बचेगा. ***    

  




देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था

भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ल...