शनिवार, 17 सितंबर 2022

साधुओं पर हमले का रहस्य

 

साधुओं पर हमले सनातन विरोधी साजिश










ज़रा गंभीरता से सोचिए कि अगर आपकी सुरक्षा करने वाले ही सुरक्षित न रहे, षडयंत्र पूर्वक उनकी हत्याये की जाने लगे, और खतरा आप पर भी हो, तो आप कैसे सुरक्षित रह सकते हैं और कब तक बचे रह सकते हैं?

देश में इस समय अनेक ऐसी घटनाएं हो रही है जो  आपस में जुड़ी हुई दिखाई तो नहीं पड़ती लेकिन उनमें बहुत गहरा संबंध है. एक नया और महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, साधु सन्यासियों की हत्याएं और उन पर जानलेवा हमले, जो देखने में तो सामान्य कानून व्यवस्था  और अफवाह आधारित स्वतःस्फूर्त मामले  दिखाई पड़ते हैं लेकिन अगर गंभीरता से विचार करें तो ये हिंदुओं और उनकी प्राचीन सनातन संस्कृति के विरुद्ध बहुत बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है.

हाल में बच्चा चोरी की अफवाह आधारित आरोप में देश के विभिन्न भागों में साधुओं की हत्याएं हुई हैं और कई जगह उन पर जानलेवा हमले किए गए और उन्हें मारने की कोशिश की गई. इस तरह की घटनाओं से हिंदुओं और सनातन संस्कृति पर अप्रत्यक्ष रूप से हमला किया गया है. इस षड्यंत्र के कारण साधुओं के रूप में सनातन संस्कृति के निस्वार्थ कार्यकर्ताओं की हत्याएं जितनी गंभीर है उससे भी अधिक गंभीर यह है कि इसका उद्देश्य  सनातन संस्कृति के ध्वज वाहको के प्रति समाज में असम्मान और अविश्वास पैदा करना है जो हजारों वर्षों से घर परिवार छोड़ कर, माया मोह के बंधन त्यागकर सनातन संस्कृति के प्रति कृत संकल्पित होकर उसकी रक्षा करते आए हैं. इन हत्याओं को अफवाहों के आधार पर स्वाभाविक आक्रोश नहीं माना जा सकता है. अफवाह फैलाना भी एक बड़े षड्यंत्र का एक हिस्सा है. हिन्दी फिल्मों में तो लम्बे समय से साधू सन्यासियों का विकृत रूप पेश किया जा रहा है.   

पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक जिले के पुलिस अधिकारी के एक वीडियो में छेड़छाड़ करके उसे इस ढंग से बना दिया गया कि यह लोगों को पुलिस विभाग की तरफ से सावधान रहने की चेतावनी जैसा लगने लगे. इसमें कहा गया है कि “500 से अधिक अपराधी प्रवृत्ति के लोग साधु सन्यासियों के भेष में देश के विभिन्न भागों में घूम रहे हैं जो बच्चा चोरी करके उनके शरीर के अंग बेचने का काम करते हैं, इनसे सावधान रहें”  इस वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल किया गया और इसके कारण अफवाहों का बाजार गर्म हुआ, और  इस कारण देश के कई भागों में साधु सन्यासियों पर बिना सोचे समझे हमले होने लगे, यह सही है कि अफवाहें बहुत तेजी से फैलती है, लेकिन इनके पीछे कौन है, इसकी तह में जाना अत्यंत आवश्यक है.

कुछ समय पहले महाराष्ट्र के पाल घर में साधुओं  की निर्मम हत्यायें  की गई थी और मौके पर उपलब्ध पुलिस मूकदर्शक बनी रही थी. उस समय उद्धव ठाकरे की सरकार थी जो एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन की सरकार थी, पर अब  महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हिंदूवादी सरकार है लेकिन साधु सन्यासियों के विरुद्ध षडयंत्र अनवरत जारी है. सांगली में चार साधुओं की बच्चा चुराने के शक  में निर्मम पिटाई की गई और यह घटना भी पालघर की घटना की तरह होते होते बची. एक प्रतिष्ठित अखाड़े से सम्बद्ध यह सन्यासी कर्नाटक के बीजापुर से महाराष्ट्र के पंढरपुर जा रहे थे और पिछली  रात उसी गांव के मंदिर में ही ठहरे थे. फिर अचानक दूसरे दिन ऐसा क्या हो गया कि  कुछ ग्रामीणों ने उन्हें गाड़ी से खींच कर बेरहमी से पीट कर ह्त्या का प्रयास किया. बिहार के मधुबनी में एक मंदिर में  दो साधुओं की हत्या कर दी गई, पुलिस द्वारा यह कारनामा चोरों का बताया गया है, जो विश्वसनीय नहीं है.

बिहार के हाजीपुर की एक घटना पूरे हिंदू समाज की आँखें खोलने वाली है, जहाँ कुछ साधू  नंदी लेकर गांव में घूम कर लोगों से दान व भिक्षा मांगते देखा गया. ये लोग भी एक मंदिर में ठहरे लेकिन भगवान के प्रति कोई आस्था प्रदर्शित न करने  के कारण गांव वालों को शक हुआ,  तो पता चला कि यह सभी मुस्लिम हैं. पुलिस के समक्ष इन लोगों ने जो बयान दिया कि नंदी लेकर भिक्षा मांगने का यह काम उनके परिवार में कई पीढ़ियों से होता आया है, इसलिए वे भी ऐसा करते हैं, विश्वसनीय नहीं लगती. हो सकता है कि उनका इरादा साधुओं को बदनाम करने के उद्देश्य से साधु भेष में किसी बड़ी घटना को अंजाम देना हो. मथुरा वृंदावन सहित किसी भी तीर्थ स्थल पर मंदिर के आसपास बड़ी संख्या में लड़के लड़कियां और युवक श्रद्धालुओं को तिलक लगाकर पैसे मांगने के लिए खड़े रहते हैं,जिनमें बड़ी संख्या में मुस्लिम होते हैं.

इनसे सावधान रहने की जरूरत तो है, लेकिन किसी भगवाधारी साधू की मोब लिंचिंग प्रदर्शित करता है कि ऐसे लोग सनातन धर्म से विमुख होकर पथ भ्रष्ट हो रहें हैं. यह सब हिंदुओं की गिरती आस्था और चारित्रिक पतन को रेखांकित करता है, भले ही इसके पीछे कितनी भी बड़ी साजिश और षड्यंत्र क्यों न हो. चूंकि  सनातन धर्म दुनिया का सबसे सहिष्णु  ऐसा धर्म है, जिसमे कोई धार्मिक पाबंदियां नहीं है और सभी को स्वतंत्र रूप से सोचने ओर समीक्षा करने का धार्मिक अधिकार भी प्राप्त है. संभवतः इस कारण ही सनातन धर्मावलंबियों का धर्म से बहुत गहरा रिश्ता नहीं जुड़ पाता है. जिसका फायदा उठाकर क्रिश्चियन और इस्लाम से जुड़ें  लोगों और संस्थाओं ने धर्मांतरण का कुचक्र रचा और बड़ी संख्या में हिंदुओं को क्रिश्चियन या मुसलमान बनाने में सफल भी हुए.

हिन्दुओं के विरुद्ध षड़यंत्र में पिछली सरकारों  ने प्रत्यक्ष रूप से सहयोग भले ही न किया हो लेकिन धर्मांतरण का धंधा बिना किसी रुकावट के चलता रहा. राजनीति के सौदागरों ने वोटों  के लालच में धर्मांतरण, लव जिहाद, अराजकता और धार्मिक उन्माद फैलाने वाली संस्थाओं के कार्य में यथा संभव सहयोग किया और उनके दुष्कृत्य को उचित भी ठहराया, जो ज्यादातर राजनीतिक दल आज भी कर रहे हैं. धर्मांतरण के लिए इन संस्थाओं ने सनातन समाज में विघटन के बीज बोने का कार्य भी किया जिसके अंतर्गत समाज में विभिन्न जातियों के बीच मतभेद पैदा करके उन्हें जातियों उपजातियों, अगड़े पिछड़े, दलित आदिवासी के रूप में रेखांकित करने का कार्य भी किया. इसका उद्देश्य इन सभी सनातनियों को धर्म से विमुख करके समाज की मुख्यधारा से अलग थलग करना था.

हिन्दुओं के विरुद्ध इस तरह के षडयंत्र अंग्रेजी शासन में ही शुरू हो गए थे और इसमें वामपंथी इस्लामिक गठजोड़ ने प्रमुख भूमिका निभाई. इतिहास को विकृत रूप में पेश किया गया. मनुस्मृति सहित कई पौराणिक ग्रंथों में हेरफेर करके उन्हें परिवर्तित रूप में प्रकाशित किया गया और हिंदू समाज को विभाजित करने के उद्देश्य से इसे कपटपूर्ण ढंग से प्रचारित और प्रसारित किया गया. आर्यों को बाहरी और भारत पर आक्रमणकारी बताया गया. मनुस्मृति  में छेड़छाड़ करके इसे  दलित और आदिवासी विरोधी बना दिया गया और दलितों में आक्रोश पैदा करके उन्हें ब्राह्मणों और सवर्ण जातियों के विरुद्ध आंदोलन चलाने के लिए प्रेरित किया गया. षड्यंत्रकारी वामपंथी इस्लामिक गठजोड़ अपने उद्देश्य में काफी हद तक सफल भी हो गए और  उन्होंने बड़ी संख्या में दलित और आदिवासियों को धर्मांतरित करने में सफलता प्राप्त की थी.

बिहार और उत्तर प्रदेश में अनेक स्थानों पर साधुओं पर हमले हो रहे हैं जिसमें कई साधूओं की मृत्यु हो चुकी है, और कई गंभीर रूप से घायल हुए हैं. इन अफवाहों के पीछे के षड्यंत्र की जांच अत्यंत आवश्यक है, वरना यह सिलसिला रुकने वाला नहीं. सोशल मीडिया पर छद्म हिन्दू  नामों से सनातन धर्म के विरुद्ध विष वमन किया जा रहा है. अभी तक केवल लव जिहाद ही था अब तो इनकार करने पर ज़िंदा जलाने जैसे मामले भी आ रहे हैं. मुस्लिम समुदाय के युवक हिन्दू लड़कियों के अपहरण और बलात्कार में लिप्त हो रहे हैं. मदरसों में आतंकवादी संगठनो की संलिप्तता सामने आ रही है. मिशन 2047 प्रकाश में आ चुका है. इन्हें अलग अलग करके देखना भारी भूल होगी. इसलिए  “सबका साथ, सबका विकाश, और सबका विश्वास” में लगी मोदी सरकार को चाहिए कि सनातन संस्कृत के खिलाफ हो रहे षड्यंत्रों को विफल करने और भारत पर गजव़ा-ए-हिन्द के खतरे को देखते हुए प्रभावी कार्यवाही करे. विकाश तो तभी होगा जब देश बचेगा. ***    

  




गुरुवार, 8 सितंबर 2022

लंका दहन के बीच भारत में विपक्षी चिंगारी

 

लंका दहन के बीच भारत में विपक्षी चिंगारी



आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे श्रीलंका ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का 51 अरब डॉलर का कर्ज चुकाने में असमर्थता के कारण अपने आप को दिवालिया घोषित कर दिया था. इस समय श्रीलंका में स्थिति बहुत नाजुक और हालात काबू से बाहर हो गए लगते हैं. राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे श्रीलंका से मालदीप और वहाँ से सिंगापुर  भाग चुके हैं. देश में व्यापक विरोध प्रदर्शनों के कारण कर्फ्यू लगा दिया गया है, वहाँ आपात स्थिति पहले से ही लागू है, लेकिन प्रदर्शनकारी फिर भी राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री कार्यालय घेरे हुए हैं. आजादी के बाद से श्री लंका के ये अब तक के सबसे खराब और खतरनाक हालात हैं.

श्रीलंका की आर्थिक संकट का मुख्य कारण सत्ता पर एक परिवार का कब्जा और राष्ट्रीय हितों की अनदेखी करना है. एक ही परिवार के पास देश के सभी प्रमुख पद थे और इसलिए आर्थिक और प्रशासनिक फैसलों में बौद्धिक विमर्श और प्रभावी नियंत्रण की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. इस कारण परिवार के एक या कुछ सदस्यों की सोच बिना किसी विशेषज्ञ अनुशंसा के ही पूरे देश पर लागू की जाती रही जिससे देश के आर्थिक हालात लगातार बिगड़ते गए. कोरोना की महामारी ने पर्यटन आधारित इस देश के पर्यटन उद्योग को लगभग ठप कर दिया था जिसके कारण श्री लंका की आर्थिक स्थिति काफी डांवाडोल हो गई थी और सामान्य जनजीवन अत्यधिक प्रभावित हो गया था. जनता को आर्थिक तंगी से मुक्ति दिलाने के नाम पर वाहवाही लूटने के लिए सत्ताधारी परिवार ने लोगों में मुफ्तखोरी की संस्कृति को बढ़ावा दिया. मुफ्त में लोगों को पैसे बांटने और कर्ज चुकाने के लिए नया कर्ज लेने से हालात बद से बदतर होने लगे.

लोकलुभावन राजनीति के चक्कर में सरकार ने कर की दरों में भी भारी कटौती की थी. इससे हुई राजस्व की क्षति तथा भुगतान असंतुलन उत्पन्न हुई के कारण वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने श्रीलंका की साख पर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए, जिससे उसे अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से सस्ते दर पर कर्ज मिलना मुश्किल होता चला गया और इस कारण श्रीलंका वैश्विक पठान चीन की शरण में गया जहाँ से उसने ऊंची दरों पर बड़ी मात्रा में कर्ज लिया और कर्ज के जाल में फंस गया.  

इससे पहले कृषि मंत्रालय का कामकाज देख रहे परिवार के एक इस सदस्य ने एक गैर सरकारी संगठन की सिफारिश पर देश में ओर्गेनिक खेती को बढ़ावा देने के अनेक कार्य किये क्योंकि उसका मानना था कि ऑर्गेनिक खेती से देश बहुत शीघ्र ही समृद्धि प्राप्त कर सकेगा. जल्दी समृद्धशाली देश बनने का सपना पूरा करने के लिए खेती में प्रयुक्त होने वाले केमिकल्स और फर्टिलाइजर्स का आयात बंद कर दिया गया ताकि सभी किसान अनिवार्य रूप ऑर्गेनिक खेती करने लगे. इस कारण अनाज के उत्पादन में भारी गिरावट आई और देश के आंतरिक उपयोग के लिए खाद्यान्न की भारी कमी हो गई और आर्थिक संकट के इस दौर में खाद्यान्न आयात करने के लिए भी श्री लंका के पास पैसे नहीं थे. अनाज की कमी के कारण भूखी श्रीलंका की जनता को सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने के लिए मजबूर कर दिया.

विदेशी मुद्रा की कमी और आयात बंद हो जाने के कारण उपभोक्ता वस्तुओं के दाम आसमान छूने लगे और महंगाई अपने चरम पहुँच गयी जिसके कारण सरकार के खिलाफ़ लोगों का गुस्सा बढ़ता चला गया. श्रीलंका अपनी रोज़मर्रा की जरूरत के बहुत सम्मान के लिए आयात पर निर्भर है, जिसमे खाद्यान्न, पेट्रोलियम पदार्थ और दवाइयां प्रमुख हैं. विदेशी मुद्रा संकट के कारण न केवल आयात बंद करना पड़ा बल्कि विदेशी कर्ज का भुगतान भी रुक गया. श्री लंका इसके पहले ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से 51 अरब डॉलर का कर्ज ले चुका है और उस पर चीन का भी बहुत बड़ा कर्ज है. इसके अलावा श्रीलंका ने एशियन डेवलपमेंट बैंक, जापान सरकार और भारत से भी कर्ज ले रखा है. भारत ने इस वर्ष श्रीलंका में गंभीर आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए 5 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक का अभूतपूर्व समर्थन दिया है. श्रीलंका सरकार ने स्थानीय बाजार से भी बहुत बड़ी मात्रा में कर्ज ले रखा है. इन सब कारणों से श्रीलंका के गले में आर्थिक संकट का फंदा कसता चला गया. सरकार द्वारा किए गए तमाम प्रयासों  का कोई नतीजा नहीं निकला और इसके बाद सरकार ने श्री लंका को दिवालिया घोषित कर दिया.

श्रीलंका में संकट की आहट इस वर्ष के शुरू से ही मिलने लग गई थी और मार्च आते आते इसकी स्पष्ट संकेत मिल चुके थे और जनता का विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था. इसे देखते हुए मंत्रिमंडल के  सभी सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया था. दुनिया के किसी देश में जो नहीं हुआ था वह श्रीलंका में हुआ,  जहाँ छोटा भाई राष्ट्रपति था और उसने अपने बड़े भाई को प्रधानमंत्री मनोनीत कर लिया था. सरकार के सभी प्रमुख मंत्रालय परिवार के सदस्यों के पास थे. आसानी से समझा जाता है कि देश में संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन कैसे किया जा रहा था. सही अर्थों में अगर देखा जाए तो परिवारवादी राजनीति के स्वार्थ ने श्रीलंका को चौपट कर दिया और ये भारत की जनता के लिए बहुत बड़ा संदेश है.

  श्री लंका के संकट से विश्व के उन तमाम संगठनों की असलियत भी उजागर हो गई है जो तरह तरह की रिपोर्ट जारी करके भारत जैसे  देशों को कटघरे में खड़ा करने का स्वार्थ आधारित काम करते हैं. 2020 की मानव विकास दर में  श्री लंका भारत से बेहतर था. श्रीलंका की स्थान  72 वां और भारत का 132 वां था. विश्व हैपिनेस इंडेक्स में भी भारत से  श्रीलंका बहुत आगे था और प्रति व्यक्ति आय में भी भारत से बेहतर था. इन आंकड़ों को लेकर भारत में मोदी सरकार की बहुत आलोचना होती थी जिसमें कांग्रेस और वामपंथी सबसे आगे थे.

कोरोना संकट के समय राहुल गाँधी विश्व के अनेक अर्थशास्त्रियों से बात कर रहे थे और मोदी सरकार पर दबाव बना रहे थे कि प्रत्येक जरुरतमंद व्यक्ति के खाते में 7500 प्रति माह डाले जाएं जिससे विस्थापित और बेरोजगार हुए लोगों का जीवन यापन भी हो सके और बाजार में मांग भी बढ़ सके. रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने भी उनकी इस मांग का समर्थन किया था. इसके पहले भी 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस न्याय नाम की एक योजना अपने घोषणापत्र में लाई थी जिसके अनुसार देश के सर्वाधिक 20% गरीब परिवारों को72,000 प्रति परिवार सालाना दिया जाना था  यद्यपि कांग्रेस यह नहीं बता सकी थी कि इतना पैसा कहाँ से लाएगी. सौभाग्य या दुर्भाग्य से कांग्रेस सत्ता में नहीं आ सकी अन्यथा न्याय योजना और कोरोना संकट के समय हर जेब में 7500 डालने की योजना से भारत को भी श्रीलंका जैसी स्थितियों से दो चार होना पड़ सकता था यद्यपि अभी भी भारतीय अर्थव्यवस्था संकट के साये में है  और भारतीय रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले गिरती जा रही है. आने वाले समय में भारत को वैश्विक कर्ज का भुगतान करना है जिससे रुपये की कीमत और गिर जाने का खतरा है.

श्रीलंका के राजनीतिक और आर्थिक हालात से वहाँ गृह युद्ध की आशंका बढ़ती जा रही है और इससे भारत की चिंता बढ़ गई है। खस्ताहाल आर्थिक स्थिति वाले देशों से नागरिक पड़ोसी देश की तरफ भागते हैं और अगर ऐसा हुआ तो श्रीलंकाई नागरिको का पलायन भारत में शरणार्थियों की समस्या के साथ साथ देश की सुरक्षा को भी गंभीर खतरा पैदा करेगा. इसलिए भारत की चिंता बढ़ती जा रही है यद्यपि भारत के लिए यह श्री लंका से अपने संबंध को पुन प्रगाढ़ बनाने का अवसर है जिससे उसकी स्थिति हिंद महासागर में और मजबूत हो सकती है जिससे चीन के इस क्षेत्र में बढ़ते प्रभाव को रोका जा सकता है. श्रीलंका में हो रहे प्रदर्शन में भी इस बात की झलक मिलती है कि वहाँ के लोग भारत से अभिभूत हैं और चीन से खासे नाराज हैं, जिसने श्रीलंका की आर्थिक स्थिति खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

श्रीलंका की इस विकट स्थिति के बीच भारत में विपक्ष समर्थित एक अफवाह फैलाई जा रही है कि भारत की स्थिति भी श्रीलंका जैसी होने वाली है और अब टीवी चैनलों पर इस बात पर बहस भी लगातार ज़ोर पकड़ती जा रही है. शायद विपक्ष का एक बड़ा वर्ग यह चाहता है कि भारत की स्थिति श्रीलंका जैसी हो और उस संकट की स्थिति का वह राजनीतिक फायदा उठा सके. देश ने देखा है कि कोरोना के संकट के समय भी विपक्ष के एक बड़े वर्ग ने अफवाहों के माध्यम से पूरे देश में असंतोष और अराजकता फैलाने की कोशिश की थी और अस्पतालों की बदइंतजामी और मरने वालों की संख्या बढ़ा चढ़ाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेश की गई थी जिससे भारत की छवि को काफी धक्का लगा था.

जहाँ तक भारत में श्रीलंका जैसी स्थिति का प्रश्न है तो फिलहाल ऐसी किसी स्थिति की संभावना नहीं लगती है क्योंकि भारत और श्रीलंका की परिस्थितियों में बहुत अंतर है. श्रीलंका एक छोटा सा देश है और उसकी तुलना में भारत की अर्थ व्यवस्था विविधतापूर्ण है इसलिए किसी एक क्षेत्र में खराब आर्थिक स्थितियों से पूरे देश की आर्थिक स्थिति खराब नहीं हो सकती. कहावत भी  हैं “साइज मैटर्स” यद्यपि एक बात बिल्कुल सच है कि भारत के कई राज्य जैसे पंजाब, केरल, पश्चिम बंगाल, झारखंड, राजस्थान और कर्नाटक, आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं और इसका मुख्य कारण खराब वित्तीय प्रबंधन और मुफ्त की संस्कृति है, जिससे हर हालत में छुटकारा पाया जाना चाहिए. फिर भी भारत की आर्थिक स्थिति की किसी भी हालत में श्रीलंका से तुलना नहीं की जा सकती और निकट भविष्य में भारत ने श्रीलंका जैसी स्थिति बनने की दूर दूर तक कोई भी आशंका नजर नहीं आती.

-    शिव मिश्रा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 2 सितंबर 2022

बाल बाल बचे योगी

 

बाल बाल बचे योगी

सर्वोच्च न्यायालय नी अपनी 26 अगस्त 2022 के फैसले ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को बड़ी राहत देते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उनके विरुद्ध 2007 में गोरखपुर में हुए सांप्रदायिक दंगों के संबंध में मुकदमा चलाए जाने का आदेश देने का अनुरोध किया गया था. 15 साल पुराना यह मामला अब सदा सर्वदा के लिए बंद हो गया है लेकिन जहाँ इस मुकदमे द्वारा योगी को फंसाने की बड़ी साजिश रची गई थी वहीं इस मुकदमे का अनायास और आनन फानन में सर्वोच्च न्यायालय में लिस्ट कराया जाना भी किसी बड़े रहस्य से कम नहीं है. अगर सर्वोच्च न्यायालय इस याचिका पर मुकदमा चलाए जाने का आदेश दे देता तो योगी के लिए बहुत बड़ी मुसीबत साबित हो जाता क्योंकि इस मुकदमे धारा 302 जैसी अत्यंत संगीन धाराएं भी जोड़ी गई थी, जिसके कारण उनका मुख्यमंत्री का पद भी खतरे में पड़ सकता था.

जनवरी 2007 में मोहर्रम के जुलूस में हुए उपद्रव के कारण उपजे सांप्रदायिक तनाव कि कारण इस मुकदमे की उत्पत्ति हुई जिसका मुख्य कारण तुष्टीकरण और वोटों की राजनीति था. उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव जो कार सेवकों पर गोली चलवाकर एक वर्ग विशेष वोटों पर आधिपत्य हासिल कर चूके थे, शशी डे योगी आदित्यनाथ की गिरफ्तारी का आदेश दिया कुशीनगर से गोरखपुर आते समय रास्ते में ही उन्हें गिरफ्तार किया गया क्योंकि शहर के अंदर या मंदिर परिसर में उन्हें गिरफ्तार करना बहुत मुश्किल था. योगी की गिरफ्तारी के बाद पूर्वांचल की राजनीति ने अभूतपूर्व राजनीतिक घटनाक्रम देखा. योगी को पुलिस लाइन से केवल चार किलोमीटर दूर स्थित जेल ले जाए जाने में  8 घंटे  से अधिक समय लगा. गोरखपुर तथा आसपास के अन्य जिलों में  भी सांप्रदायिक तनाव फैल गया. योगी आदित्य नाथ को 11 दिन बाद जमानत मिल सकी और तब तक स्वतः स्फूर्ति  में गोरखपुर के सभी बाजार बंद रहे. गोरखपुर के इतिहास में यह सबसे लंबी बाजार बंदी थी. मुलायम सिंह यादव ने गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों में योगी आदित्यनाथ के इतने अधिक राजनीतिक प्रभाव कल्पना नहीं की थी. उन्हें भय सताने लगा कि कहीं  तुष्टीकरण के कारण हिंदू मतों से भी हाथ धोना पड़ जाए और इस कारण गोरखपुर के जिलाधिकारी और पुलिस प्रमुख को रातों रात हटा दिया गया. गोरखपुर में आंदोलन की धार को देखते हुए नव नियुक्त जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान को  हेलिकॉप्टर से पुलिस लाइन में उतारा गया था.

योगी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनसे मिलने वालों का तांता लगा रहता था और इसलिए जेल में सुरक्षा चेकिंग को बंद करना पड़ा और जेल की दीवार तोडकर उनकी बैरक तक पहुँचने का एक रास्ता तैयार किया गया ताकि बड़ी संख्या में मिलने आने वाले लोगों भीड़ में तब्दील होने से रोका जा सके. हे जेल में भी योगी की दिनचर्या में कोई खास परिवर्तन नहीं आया और वो हमेशा की तरह ब्रह्म मुहूर्त में जागकर पूजा अर्चना करते थे  और इसलिए 11 दिनों में जेल में  गोरखनाथ मंदिर की तरह माहौल बनने लगा था. योगी ने संसद में रुंधे गले से जब प्रशासन द्वारा उन पर ज्यादती करने और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा तुष्टिकरण के आधार पर पक्षपातपूर्ण कार्रवाई करते हुए जेल भेजे जाने की घटना का उल्लेख किया तो पूरा सदन सकते में आ गया.

यद्यपि पुलिस ने योगी के विरुद्ध उपयुक्त धाराओं में मुकदमा पहले ही दर्ज कर रखा था. एक वर्ग विशेष के मामले में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ इतनी  उदार वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं की वह कभी कभी देश की मुख्यधारा के विरुद्ध हे षडयंत्र का रूप ले लेता है.  गोरखपुर के मामले में भी वर्ग विशेष से संबंध रखने वाले एक तथाकथित पत्रकार और एक समाजसेवी ने सरकार से अनुरोध किया कि योगी के विरुद्ध जो प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई है हैं उसमें कड़ी धाराएं नहीं लगाई गई है और इसलिए धारा 302 सहित अत्यन्त सख्त धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए.  

उस समय जनसामान्य में आम चर्चा थी कि मुलायम सिंह यादव ने तुष्टिकरण के लिए योगी आदित्यनाथ को गिरफ्तार किया  था क्योनी  मुलायम सिंह को  लगता था कि योगी की  गिरफ्तारी से उनकी अल्पसंख्यक समाज में पैठ बढ़ेगी।  योगी के पक्ष में अपार जनसमर्थन  देखते हुए मुलायम सिंह ये आशंका होने लगी थी कि अगर साम्प्रदायिक तनाव बढ़ता गया तो मतों का ध्रुवीकरण भाजपा की तरफ हो सकता है, हे जिससे उनकी सरकार की वापसी मुश्किल हो जाएगी. हे आगामी चुनाव को देखते हुए हे और खासतौर से भाजपा को रोकने के लिए उन्होंने गोरखपुर की अपनी योजना से कदम पीछे खींच लिए. लाख कोशिशों के बाद भी मुलायम सिंह मुस्लिम समुदाय को खुश नहीं कर सके। विधानसभा चुनाव में मुस्लिम समुदाय ने बसपा का समर्थन किया और मायावती ने 206 सीटें जीत कर पहली बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनायी।

गोरखपुर के इन तथाकथित पत्रकार और समाजसेवियों की योगी पर अतिरिक्त  धाराओं के साथ नई एफआईआर दायर करने की मांग नहीं मानी गई हे तो वे लोग उच्च न्यायालय पहुँच गए जहाँ से उन्हें स्थानीय अदालत भेजा गया. हे स्थानीय अदालत में तमाम कार्रवाई के बाद भी याचिकाकर्ता अदालत को संतुष्ट नहीं कर सके और इसलिए उनकी नई एफआईआर दायर करने की मांग नहीं मानी गई. हे इसके बाद ये लोग पुन: उच्च न्यायालय पहुँच गए  तो एक नई एफआइआर दायर करने का आदेश दे दिया गया और इस प्रकार 2008 में  योगी  तथा उनके अन्य नजदीक लोगों के विरुद्ध धारा 302 सहित कई अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया. राज्य सरकार ने दबाव में आकर पूरे मामले की जांच सीबीसीआईडी से करवाई लेकिन जांच में अंकित उचित और पर्याप्त सबूत नहीं मिले. 2015 में सीबीसीआईडी ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सरकार को सौंप दी और योगी के विरुद्ध कार्यवाही करने की अनुमति मांगी. राज्यपाल ने योगी के विरुद्ध मुकदमा चलाने की अनुमति पर फैसला नहीं किया. इस बीच मार्च 2017 में योगी ने प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और मई 2017 में सरकार ने योगी के विरुद्ध मुकदमा चलाने की अनुमति देने से इंकार कर दिया. इसके बाद याचिकाकर्ता पुनः उच्च न्यायालय पहुंचे और उन्होंने जांच किसी निष्पक्ष और स्वतंत्र एजेंसी से कराने की मांग के साथ साथ योगी के विरुद्ध मुकदमा चलाने का आदेश देने का अनुरोध किया.

2018 में उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज करते हुए सरकार द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में कोई खामी नजर नहीं आती और इसलिए योगी के विरुद्ध मुकदमा चलाए जाने का कोई आधार नहीं है. उच्च न्यायालय के फैसले के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की उच्च न्यायालय के फैसले को निरस्त करते हुए योगी के विरुद्ध मुकदमा चलाने का आदेश देने की मांग की, जहाँ यह मामला 2018 से लगातार लंबित था. 26 जुलाई 2022 को  सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले से  योगी के विरुद्ध पिछले 15 वर्षों से लगातार की जा रही एक गहरी  साजिश का पटाक्षेप कर दिया गया ये बिलकुल सही फैसला है. अगर इस मामले की पूरी क्रोनोलॉजी को देखा जाए तो एकदम से स्पष्ट हो जाता है कि यह मुकदमा एक बहुत बड़ी साजिश का हिस्सा था जिसमें न केवल योगी आदित्यनाथ बल्कि उनके निकटवर्ती प्रमुख सहयोगी जिसमें डॉक्टर राधा मोहन अग्रवाल, डॉक्टर वाईडी सिंह आदि को भी शामिल किया गया था. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि सांप्रदायिक दुर्भावना के मुकदमे की रूप में शुरू हुई इस साजिश का प्रारंभिक उद्देश्य राजनीतिक लक्ष्य प्राप्त करना  था, जिसके अंतर्गत गोरखपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में गोरक्षनाथ पीठ का असर कम करना और मुस्लिम वोटों को एकजुट करना था. जनवरी 2007 में गोरखपुर में सांप्रदायिक तनाव की पटकथा उस समय लिखी गई थी जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री थे ओर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का माहौल था.  इसका फायदा मुलायम सिंह यादव नहीं उठा सके और उस साल हुए विधानसभा चुनाव में उनकी सरकार की वापसी नहीं हो सकी.

 इंटरनेट मीडिया पर एक विश्लेषण तैर रहा है जिससे लोग खासे हैरान है. इसके अनुसार राज्य सरकार के  कुछ अधिकारियों ने स्वयं  अत्यधिक सक्रियता दिखाते हुए हुए सर्वोच्च न्यायालय में विशेष उल्लेख के जरिये इस मामले को अतिशीघ्र  सुनवाई के लिए खुलवाया. प्रयागराज उच्च न्यायालय द्वारा  22 फरवरी 2018 को दिए गए निर्णय के विरुद्ध फाइल की गई यह अपील से लंबित थी. यह मामला  परवेज परवाज तथा अन्य  ( वादी) बनाम उत्तर प्रदेश सरकार ( प्रतिवादी) थे.

20 जुलाई 2022 को प्रदेश के संयुक्त सचिव स्तर का एक अधिकारी अपने पत्र द्वारा  इस मामले को शुरू से देख रहे प्रदेश के एक अपर महाअधिवक्ता से लेकर एक अन्य नए अपर महाधिवक्ता को सौंपते हुए एक्सपीडाइट ऐप्लिकेशन दाखिल करके शीघ्र सुनवाई हेतु सूचीबद्ध कराने का अनुरोध करता है. ये मामला शीघ्रता से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हो  जाता है  और 24 अगस्त की सुनवाई पूरी हो जाती है और सुरक्षित कर लिया जाता है, जिसे 26 अगस्त को सुनाया जाता है. सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले द्वारा योगी के विरुद्ध मुकदमा चलाए जाने का आदेश नहीं दिया और याचिकाकर्ताओं की अपील खारिज कर दी. अगर सर्वोच्च न्यायालय मुकदमा चलाए जाने की अनुमति दे देता तो क्या होता ? प्रथम सूचना रिपोर्ट में जो धाराएं लगाई गई है उनमें धारा 302 भी शामिल है, जिसमे सामान्यतः अग्रिम जमानत नहीं दी जाती है. योगी तथा उनके अन्य सहयोगियों को जिन्हें याचिकाकर्ता ने अपनी प्रथम सूचना रिपोर्ट में नामित किया था उनकी गिरफ्तारी  अवश्यंभावी हो जाती. ऐसी स्थिति में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ता क्योंकि भाजपा में सुचिता के नाम पर पहले भी कई मुख्यमंत्रियो के विरुद्ध इस तरह की कार्यवाही की गई है जिसमें दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना और मध्य प्रदेश की तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती शामिल हैं. ये बहुत स्वाभाविक था कि योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक भविष्य पर सदा सर्वदा के लिए ग्रहण लग जाता.

ऐसे में यह प्रश्न उठना बहुत स्वाभाविक है कि जब सरकार प्रतिवादी थी तो सरकार की ओर से इस मामले की जल्दी से जल्दी सुनवाई के लिए प्रयास क्यों किए गए और इसमें किसकी रुचि थी और क्यों. क्या पार्टी और सरकार में बैठे कुछ लोग योगी को निपटाना चाहते थे. इसका उत्तर मिलना बहुत मुश्किल है लेकिन योगी के विरुद्ध इस तरह के प्रयास होते रहे हैं. अभी हाल ही में राज्य कर्मचारियों के स्थानांतरण में हुई गड़बड़ियों ने राजनीतिक हलचल पैदा कर दी थी और लगभग उसी समय एक मंत्री के इस्तीफ़े ने भूचाल लाने का काम किया था. योगी के पहले कार्यकाल में भी उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने के प्रयास किए गए थे. तब यह माहौल बनाने की कोशिश की गई थी कि योगी राज़ में प्रदेश के अधिकारी विधायको, पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की बात नहीं सुनते और इस कारण जनता में नाराजगी बढ़ रही है. ये भी जोड़ा गया कि एक जाति विशेष का बोलवाला है. बिकरू कांड के बाद तो सोशल मीडिया पर बकायदा अभियान चलाया गया और  कहा जाने लगा था कि  प्रदेश के ब्राह्मण योगी से बहुत नाराज है क्योंकि उनका उत्पीड़न किया जा रहा है और ऐसे में वह भाजपा की बजाय किसी अन्य दल को चुनाव में समर्थन करेंगे. इन सब का सारांश ये था कि योगी के मुख्यमंत्री रहते भाजपा की प्रदेश की सत्ता में वापसी नहीं हो पाएगी. इस तरह के अभियान ने जहाँ भाजपा के कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित किया वहीं विपक्ष के हौसले बुलंद किये. भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने वस्तुस्थिति का जायजा लेने के लिए बकायदा एक टीम बनाकर प्रदेश में भेज दी थी. जनता में “योगी प्रभाव” की महती भूमिका को देखते हुए भाजपा ने योगी के नेतृत्व में ही विधानसभा चुनाव में जाने का फैसला किया. इस विवेकपूर्ण निर्णय से न केवल योगी बाल बाल बच गए बल्कि भाजपा की सत्ता में वापसी भी संभव हो सकी. इस पत्र के 23 जुलाई के अंक में छपे अपने लेख में मैंने लिखा था कि प्रदेश में अच्छे, निस्वार्थ और निष्पक्ष अधिकारियों की कमी नहीं है, योगी को गंभीरता पूर्वक अपने आस पास देखना चाहिए और जहाँ जरूरत हो वहाँ तुरंत बदलाव करना चाहिए और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से अपनी निष्ठावान टीम का निर्माण करना चाहिए जो उन्हें संभावित खतरों से न केवल समय रहते आगाह कर सके बल्कि बचा सके.

-    शिव मिश्रा ResponseToSPM@gmail.com

रविवार, 28 अगस्त 2022

 

भारत छोड़ो, भारत तोड़ो और भारत जोड़ों







कांग्रेस पार्टी एक लंबे अरसे बाद किसी जन संपर्क की शुरुआत करने जा रही है, जिसे नाम दिया गया है भारत जोड़ों यात्रा जो 7 सितंबर 2022 से शुरू होकर कन्याकुमारी से कश्मीर तक 3570 किलोमीटर की दूरी तय करेगी. इसमें 12 राज्य और दो केंद्र शासित प्रदेश शामिल होंगे. मज़े की बात यह है कि यह पद यात्रा होगी और राहुल गाँधी के नेतृत्व में होगी जबकि वह न तो कांग्रेस के अध्यक्ष और न ही इस समय  कांग्रेस का कोई अध्यक्ष हैं. प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि यह यात्रा 1942 में भारत छोड़ो यात्रा से मिलती जुलती बनाई गई होगी लेकिन वास्तविकता में ऐसा बिलकुल भी नहीं है क्योंकि भारत छोड़ो यात्रा ऐसे  समय की गई थी जब  देशभक्ति का ज्वार चरम पर था, उसके बाद “भारत तोड़ो” यात्रा हुई जिसमें कांग्रेस ने देश का विभाजन स्वीकार किया और जिस कारण सांप्रदायिक दंगों में लाखों लोगो  की दर्दनाक हत्या की गई.



स्वतंत्रता के बाद देश में अधिकांश समय कांग्रेस या कांग्रेस समर्थित सरकार ही थी जो भारत के आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन जैसी मूलभूत समस्याएं तो नहीं हल कर सकीं  लेकिन सत्ता में बने रहने के लिए वोटबैंक की राजनीति के अंतर्गत मुस्लिम तुष्टीकरण को बढ़ावा देकर विभाजन की पहले वाली स्थितियां जरूर उत्पन्न कर दीं गईं. इस अभियान का नाम “भारत जोड़ो” किसी के गले नहीं उतर रहा. आखिर भारत कहाँ  टूट रहा है, कहाँ अलगाववादी गतिविधियों चल रही है. पूर्वोत्तर में जहाँ कांग्रेस के समय तमाम अलगाववादी आंदोलन चलते थे वहाँ भी सबकुछ सामान्य है. कांग्रेस शासन में रेडियो, टीवी, बस स्टैंड एअरपोर्ट और हर रेलवे स्टेशन पर उद्घोषणा होती थी कि किसी भी अनजान वस्तु को हाथ न लगाए यह बम हो सकता है, वह स्थिति भी अब नहीं रही. कश्मीर में छुटपुट घटनाएं जरूर हो रही है लेकिन पहले जैसी भयानक स्थिति अब नहीं है. धारा 370 और 35 ए खत्म हो चुकी है. पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक हो चुकी है और अब वह पूरी तरह दबाव  और बेहद खस्ताहाल में है. तो फिर भारत में  क्या जोड़ा  जा रहा है ?  जब राहुल गाँधी और दिग्विजय सिंह कहते हैं कि नफरत का माहौल है, और नफरत के माहौल के विरुद्ध यात्रा निकाली जा रही है, तो इसका निहितार्थ है कि वे भारत का वातावरण विषाक्त करने जा रहे हैं. भारत जोड़ो की परिणति तुष्टीकरण के रूप में निकलने की पूरी संभावना है तब राहुल गाँधी की मंदिर परिक्रमा, जनेऊधारी अवतार और दत्तात्रेय गोत्र का क्या होगा ?

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भारत जोड़ों अभियान के संयोजक  मध्यप्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह हैं जो कांग्रेस के उन चुनिंदा नेताओं में से है जो पार्टी को फायदा कम नुकसान ज्यादा पहुंचाते हैं. इस यात्रा में उनके साथ मणिशंकर अय्यर, और सलमान खुर्शीद जैसे नेता भी जुड़ गए तो सोने में सुहागा हो जाएगा. दिग्विजय सिंह ने कहा है कि यह यात्रा नफरत के माहौल में, नफरत के खिलाफ़ की जा रही है. सरकार संविधान विरोधी  कार्य कर रही है, महंगाई और बेरोजगारी बढ़ती जा रही है, रुपए का अवमल्यून हो रहा है, बड़े उद्योपतितियों का कर्ज माफ हो रहा है, इसलिए देश बचाने के लिए यह यात्रा आयोजित की गई है. कांग्रेस अध्यक्ष चाहती है कि  एक ऐसी यात्रा हो जिसमे सभी धर्म और वर्ग के लोग शामिल हों और देश तथा संविधान बचाया जा सके.

कांग्रेस की इस भारत जोड़ो यात्रा में  योगेन्द्र यादव, मेधा पाटेकर सहित लगभग 150 सिविल सोसायटी के नेता और कार्यकर्ता भी भाग लेंगे, उन्हें  राहुल ने अपनी यात्रा को तपस्या बताते हुए  कहा है कि नफरत फैलाने वालों के अलावा इस यात्रा में सभी का स्वागत किया जाएगा यानी इसमें भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए कोई स्थान नहीं होगा. योगेंद्र यादव और मेधा पाटेकर जैसे नेताओं के बारे में पूरा देश जानता है कि ये पेशेवर आंदोलनकारी हैं और कहीं भी, कभी भी, किसी के भी साथ आंदोलन कर सकते हैं बशर्ते इनका इनका स्वार्थ पूरा हो. यह सभी आंदोलनकारी शाहीन बाग और किसान आंदोलन में  भी थे. मेधा पाटेकर ने तो वर्षों तक नर्मदा बचाओ आंदोलन की आड़ में सिंचाई और अन्य जरूरतों के लिए नर्मदा पर  बनाए जाने वाले बांध को रोके रखा. योगेन्द्र यादव तो यूपीए सरकार के खिलाफ़ अन्ना आंदोलन में भी थे.

कांग्रेस की भारत जोड़ों यात्रा ऐसे समय शुरू हो रही है जब उस उसके पास कोई पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है. सिकुड़ते सिमटते जनाधार के बीच कांग्रेस के दिग्गज नेता कांग्रेस छोड़ते जा रहे हैं और ऐसे में ये सवाल खड़ा होना बहुत लाजिमी है कि जो पार्टी अपने नेताओं को ही नहीं जोड़ पा रही है वह देश को कैसे जोड़ पाएगी. ये आशंका सही साबित होती जा रही है कि कांग्रेस पार्टी केवल गाँधी परिवार की पार्टी बनकर रह गई है जिसमें केवल परिवार के वफादारों के लिए जगह है और कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति कांग्रेस में नहीं बचेगा.

इस समय विभिन्न क्षेत्रीय नेता प्रधानमंत्री की दावेदारी के लिए अपना दावा ठोक रहे हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव पहले से  ही मैदान में हैं, और बिहार में नीतीश कुमार के पलटी मारने के बाद एक और प्रधानमंत्री मटेरियल दावेदारों में शामिल हो गया है. दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सतेंद्र जैन के भ्रष्टाचार और हवाला मामले में जेल जाने के बाद शराब घोटाला सुर्खियों में है और उसके बाद उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के जेल जाने के हालात बन गए हैं. अपने ऊपर लगे आरोपों को भी अपना हथियार बनाकर विरोधियो पर झूठे आरोप प्रत्यारोप करने में माहिर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने लोगों का ध्यान उनके भ्रष्टाचार से ध्यान  हटाने के उद्देश्य से ही सही, यह घोषणा कर दी है कि 2024 में उनका  सीधा मुकाबला भाजपा से होगा और अरविंद केजरीवाल अगले प्रधानमंत्री बनेंगे. उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बनने में असफल रहे समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने भी प्रधानमंत्री पद के लिए अपना दावा ठोंक दिया है. ऐसे में कांग्रेस की भारत जोड़ों यात्रा  राहुल गाँधी के प्रधानमंत्री पद के दावे को मजबूत कर पाएगी, इसमें भी संदेह है.

समझा जाता है कि पांच महीने तक चलने वाली इस यात्रा के बीच में ही कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिल जाएगा जो राहुल गाँधी की इस यात्रा के बाद उनके कद और महत्त्व के सामने  बौना और लुंज पुंज नजर आएगा और उसकी स्थिति मनमोहन सिंह से भिन्न नहीं हो पाएगी. गाँधी परिवार भी यही चाहेगा कि कांग्रेस का अध्यक्ष गाँधी परिवार के प्रति पूरी तरह से निष्ठावान हो लेकिन ऐसी स्थिति में वह न तो स्वतंत्र रूप से कार्य कर पाएगा और न ही पार्टी को मजबूत कर पाएगा. इसके परिणाम स्वरूप  गाँधी परिवार हमेशा अपरिहार्य बना रहेगा और यही गाँधी परिवार का लक्ष्य भी है.

2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों को लेकर अभी से यह सवाल किए जा रहे हैं कि इस लड़ाई में विपक्षी दलों में आपसी सहयोग और सामंजस्य कैसे बनेगा। यदि  कोई गठबंधन बनता भी  है तो उसका नेतृत्व कौन करेगा। भारत जोड़ो यात्रा परोक्ष रूप से गठबंधन के नेतृत्व करने की कांग्रेस क्षमता को रेखांकित करेगी जिसे कितने  विपक्षी दलों का समर्थन प्राप्त होगा, यह भी यक्ष प्रश्न है, क्योंकि इससे न केवल कांग्रेस की राजनैतिक शक्ति का संदेश पूरे देश में जाएगा बल्कि  विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व के बारे में भी स्पष्ट धारणा बनती नजर आएगी, यद्यपि क्षेत्रीय नेताओं की महत्वाकांक्षा के कारण ऐसा होना बेहद मुश्किल है.

भारत जोड़ों यात्रा के समक्ष एक सबसे बड़ी चुनौती राहुल गाँधी की देश में उपलब्धता को लेकर भी है क्योंकि वह हर एक दो महीने के अंतराल पर विदेश भ्रमण करते हैं इसलिए कहीं ऐसा न हो कि भारत जोड़ों यात्रा में भारत छोड़ों यात्रा भी शामिल हो जाए. सोनिया, राहुल और यात्रा के संयोजक और संचालकों के वक्तव्यों  से यह धारणा भी बनती जा रही है की यात्रा के दौरान जहर की खेती, मौत के सौदागर जैसी राहुल सोनिया की परंपरागत शैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति नफरत के भाव भी व्यक्त किए जा सकते हैं जिससे यह यात्रा सद्भावना की जगह दुर्भावना यात्रा बन सकती है क्योंकि राहुल गाँधी पर किसी का भी नियंत्रण नहीं है और राहुल गाँधी का अपनी भाषा और संवाद शैली पर कोई नियंत्रण नहीं है. इसलिए इस बात की प्रबल संभावना है कि इस यात्रा का लाभ कांग्रेस से ज्यादा भाजपा को मिल सकता है.

एक और अबूझ पहेली यह है कि इस यात्रा से प्रियंका वाड्रा को एकदम दूर रखा गया है. सोनिया की नजरों में क्या राहुल प्रियंका वाड्रा के तुलना में कमजोर पड़ते जा रहे हैं जो प्रियंका की छाया से राहुल को बचाते हुए “रि-लांच” किया जा रहा है.  

इस यात्रा से कांग्रेस यह संदेश देने की कोशिश करेगी कि नरेंद्र मोदी का विकल्प राहुल हैं, किंतु इसकी त्वरित प्रतिक्रिया स्वरूप विपक्षी एकता खंडित हो जाएगी क्योंकि प्रधानमंत्री पद के अन्य दावेदार कभी राहुल गाँधी को विकल्प स्वीकार नहीं कर सकते. इसलिए इस यात्रा से थोड़े समय के लिए कांग्रेस अपने आंतरिक मुद्दों से जनता का ध्यान तो बंटा सकती है लेकिन लंबी अवधि में इस यात्रा का उसे कोई फायदा होगा यह कहना बहुत मुश्किल है.

-    शिव मिश्रा responsetospm@gmail.com







 

 

 

बॉलीवुड में बायकॉट का ट्रेंड

 

बॉलीवुड और बायकॉट



हाल में आमिर खान की फ़िल्म लाल सिंह चड्ढा के बायकॉट की अपील सोशल मीडिया में सुर्खियों में थी लेकिन आमिर ने इसे हल्के में लिया. जिन कारणों से बायकॉट किया जा रहा था उसके लिए क्षमा याचना तो दूर, खेद भी प्रकट नहीं किया और इसका परिणाम यह हुआ कि फ़िल्म बुरी तरह से फ्लॉप हो गई. इसके पहले भी कई फिल्मों के बायकॉट की अपील की गई थी जिनका प्रभावी असर देखने को मिला था. भारत जैसे देश में जहाँ फ़िल्म सेंसर बोर्ड भी अपना काम निष्पक्षता और ईमानदारी के साथ न कर पा रहा हो तो बायकॉट प्रगतिशील न होते हुए भी एक अच्छा कार्य है जो समाज को फिल्मी कृतियों से बचाने के लिए फ़िल्म निर्माताओं को अनुशासित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है.



स्वतंत्रता प्राप्ति के समय धार्मिक आधार पर देश के बंटवारे के बावजूद यहां के बहुसंख्यक समुदाय ने उदारता दिखाते हुए भारत में सभी धर्मों के अनुयायियों को समान अधिकार दिए जिसमें इस्लाम के मतावलंबी भी शामिल थे जो अपने लिए पाकिस्तान बना चुके थे।  इस बात में किसी को संदेह नहीं हो सकता कि इस देश का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप सिर्फ बहुसंख्यक हिन्दुओं की उदारता और सहृदयता के कारण ही बचा हुआ है।  दुर्भाग्य से विभाजन  के बाद  हिंदी फ़िल्म जगत को ऐसे लोगों ने ही  अपने कब्जे में कर लिया जिन्होंने भारत को  विभाजित करने   और पाकिस्तान बनाने में  महत्त्व पूर्ण भूमिका अदा की थी. विभाजन के बाद ऐसे सांप्रदायिक और जिहादी मानसिकता के तत्व भारत में ही रहे  और कुछ प्रगतिशील लेखक मंच में शामिल हो गए और कुछ वामपंथी दलों में लेकिन बड़ी संख्या में लोग तुष्टीकरण के  लाभार्थी बनने के लिए कांग्रेस से जुड़ गए. इन सभी ने मिलकर हिंदी फ़िल्म जगत का  हिंददुओं  और सनातन संस्कृति के प्रति घातक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया. इस गिरोह ने पटकथा, गीत, संगीत, संवाद और अभिनय  के माध्यम से सनातन संस्कृति को लांछित और अपमानित करने का जितना घृणित कार्य किया उतना  विदेशी आक्रांता भी नहीं कर सके थे.

दुर्भाग्य से फ़िल्म जगत से जुड़े हिंदू और सनातनी लोगों ने भी इसका विरोध नहीं किया और न हीं दर्शकों की तरफ से ही  कोई प्रतिवाद किया गया. दर्शकों के डर से पहले मुस्लिम कलाकार हिंदू नाम रखकर कार्य करते थे. कालान्तर में  यह सभी मुखर होकर  मुस्लिम नाम  से न केवल कार्य करने लगे बल्कि  हिंदू और सनातन संस्कृति पर प्रहार करके पूरे सनातन समाज को विकृत और दिग्भ्रमित करने का कार्य  करने लगे. ऐसे लोगो में नामचीन पटकथा लेखक, गीतकार, संगीतकार, संवाद लेखक ओर नायक नायिकाओं तथा अतिरिक्त भूमिकाएं निभाने वाले लोग भी शामिल हैं.

सनातन धर्म दुनिया का है एक मात्र धर्मनिरपेक्ष और सर्वाधिक  उदार धर्म है जिसकी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम पर आधारित है और जिसमें सभी धर्मावलंबियों के लिये सम्मान  एवं सामानता की अवधारणा का मूल तत्व है. शुरुआत में हिंदी फ़िल्म जगत में  ऐसी फ़िल्में बनती थी जिसमें कोई न कोई धार्मिक गीत भजन आदि अवश्य होता था और उनके कथानक में हिंदू धर्म के प्रति आदर और ईश्वर के प्रति गहरी आस्था होती थी. संभवत: दर्शकों में फ़िल्म की स्वीकार्यता बनाना और पैसे कमाना इसका उद्देश्य रहा होगा. दुर्भाग्य से हिन्दू धर्म की उदारता को मूर्खता और कायरता मानकर सनातन के प्रति घृणा का भाव रखने वाले कट्टरपंथियों  द्वारा  सुनियोजित षड़यंत्र के अंतर्गत हिन्दुओं में  हीनभावना भरने और उनके धर्मग्रंथों के विरुद्ध भ्रामक प्रचार करने के लिए फिल्मों को माध्यम बनाने लगे.

आज ऐसी अनगिनत फ़िल्में हैं जिनमें हिंदू देवी देवताओं का मजाक उड़ाया गया है तथा हिंदू संस्कृति को दकियानूस, अंधविश्वासी और पिछड़ा साबित करने का कार्य किया गया है. सेंसर बोर्ड  भी प्रगतिशीलता के नाम पर खामोश रहा और आज भी यह घृणित कार्य बदस्तूर जारी है. फ़िल्में केवल मनोरंजन का साधन ही नहीं होती बल्कि ये इतिहास का हिस्सा  भी होती  हैं जिनका प्रत्यक्ष रूप से मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है, ये  किसी देश की संस्कृति को प्रदुषित और संक्रमित करने में वायरस सी भी अधिक तेज गति से कार्य करती है. इसलिए हिंदी फ़िल्म जगत में किया गया यह घृणित कार्य, गलत इतिहास लिखे जाने से भी ज्यादा बड़ा संगीन अपराध है .

भारतीय प्रबंध संस्थान अहमदाबाद के तत्कालीन प्रोफेसर धीरज शर्मा ने हिंदी फ़िल्म जगत के इस चलन पर शोध किया था जिसके नतीजे आश्चर्यजनक है, जिसके अनुसार बॉलीवुड की फिल्मों में 58% भ्रष्ट नेताओं को ब्राह्मण दिखाया गया है. 62% फिल्मों में बेइमान कारोबारी को वैश्य दिखाया गया है. फिल्मों में 74% फीसदी सिख किरदार मज़ाक का पात्र बनाया गया. जब किसी महिला को बदचलन दिखाने की बात आती है तो 78 % उनके नाम ईसाई होते हैं. 84% फिल्मों में मुस्लिम किरदारों को मजहब में पक्का यकीन रखने वाला, बेहद ईमानदार दिखाया गया है, यहां तक कि अगर कोई मुसलमान खलनायक हो तो वो भी उसूलों का पक्का हे दिखाया जाता है और उसे गरीबों के मसीहा और रॉबिनहुड की तरह दर्शाया जाता है.

सरकारी संरक्षण में पल रहे इन कट्टरपंथियो का गिरोह इतना शातिर है कि  फ़िल्म सेंसर बोर्ड पर भी इनका कब्जा है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कलात्मकता हे की आड़ में न जाने कितने घृणित कारनामे फिल्मों के माध्यम से किए गए.  2014 में आमिर की फिल्म पीके में हिंदू देवी देवताओं जितना अपमान किया गया उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है. हिंदू संगठनों ने इसके विरुद्ध आवाज तो उठाई लेकिन आमिर खान ने स्पष्ट रूप से कह दिया कि  जिसे अच्छी लगे वह देखें और जिसे  अच्छी न लगे वह न देखें.  इससे आमिर जैसे एजेंडा धारी कट्टरपंथियों का हौसला पता चलता है. हिंदू संगठनों के बहिष्कार की अपील के बाद भी फ़िल्म ने 340 करोड़ से अधिक की कमाई की थी. पीके फ़िल्म की सफलता से यह बात भी रेखांकित होती है  कि दशकों तक बॉलीवुड द्वारा हिंदू धर्म के विरुद्ध किए जा रहे दुष्प्रचार ने  हिंदुओं का मन मस्तिष्क कितना दूषित कर दिया है .

सोशल मीडिया क्रांति ने हिंदू जन जागरण के  अभियान में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसके कारण हिंदू समाज अब इन कट्टरपंथियों का सफलता पूर्वक सामना करने के लिए तैयार हो गया है. यही कारण है कि द कश्मीर फाइल्स जैसी फ़िल्म के विरुद्ध इस गिरोह के घृणित दुष्प्रचार के बाद भी जनता ने उसे हाथों हाथ लिया और कई ऐसी फिल्मों का सफलतापूर्वक बायकॉट भी किया जिनमें कट्टरपंथियों का एजेंडा शामिल था.

हाल में राष्ट्रवादियों द्वारा आमिर खान की फ़िल्म लाल सिंह चड्ढा के बहिष्कार की अपील की गई थी जिसका कारण आमिर का हिंदू देवी देवताओं और सनातन संस्कृति के प्रति अनादर का भाव और अतीत में किए गए दुष्कृत्य हैं. लाल सिंह चड्ढा बुरी तरह से फ्लॉप हो गयी. यद्द्यपि फिल्म फोरेस्ट गंप के की नक़ल है लेकिन इसमें शातिराना तरीके से बहुत सी आपत्तिजनक् बातें डाली गयी हैं, जैसे मुंबई का आतंकवादी हमला, अयोध्या बाबरी विवाद, कारगिल युद्ध आदि. भारतीय सेना का भी अपमान किया गया है. यह भी समझ से परे है कि फ़िल्म का नाम लाल सिंह चड्ढा ही क्यों रखा गया है? मोहम्मद जमालउद्दीन सिद्दिकी या ताहिर हुसैन कुरेशी आदि क्यों नहीं? इसलिए क्योंकि भारत में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में आमिर जैसा कट्टरपंथी व्यक्ति, हिंदुओं ओर सिखों का अपमान बड़े आराम से कर सकता है. आमिर की ज्यादातर फिल्मों की तरह इसमें भी पाकिस्तान को बहुत अच्छा बताने की कोशिश की गई है.

इस फ़िल्म से एक बार फिर यह साबित हो गया है कि आमिर खान जैसे लोग न सुधरे हैं न सुधरेंगे. आमिर खान कट्टर पंथी मुसलमान है, इससे कोई समस्या लेकिन अगर वह कहें कि उनकी बीवी तो हिंदू होगी लेकिन बच्चे मुसलमान होंगे, तो ये  अपमान जनक है. लव जिहाद से उन्होंने अभी तक दो शादियां की हैं और वह भी दोनों हिंदू लड़कियों से, जिनके बच्चों को मुसलमान बनाकर उन्हें  तलाक दे दिया. उन्होंने नरेन्द्र मोदी की  जमकर भर्त्सना करते हुए उन्हें मुस्लिम नरसंहार का जिम्मेदार ठहराया था, जबकि गोधरा नरसंहार के बारे में उन्होंने जबान भी नहीं खोली थी. मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दूसरे कट्टरपंथियों के साथ  उन्हें भी  हिंदुस्तान में डर लगा था. लाल सिंह चड्ढा  की एक पात्र करीना खान का परिवार विभाजन के समय पाकिस्तान से मार कर भगाया गया था लेकिन उसने उन्ही अफगान लुटेरों के वंशज से शादी की ओर बेटे का नाम रखा तैमूर, जो सभी हिंदुओं के लिए अपमानजनक है और  लोग इसे कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं.

किसी भी फ़िल्म या वस्तु का सांप्रदायिक आधार पर बायकाट नहीं होना चाहिए लेकिन जो व्यक्ति या संस्थाये हिंदू देवी देवताओं का अपमान करें, सनातन संस्कृति का उपहास उड़ा कर उसके विरुद्ध अभियान चलाएं,  और  देश विरोधी गतिविधियों में शामिल हों, उनके विरुद्ध लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से विरोध स्वरूप जो भी करना पड़े, अनुचित नहीं कहा जा सकता. सनातन संस्कृति को बचाने, सुरक्षित और सरंक्षित करने के लिए, सरकार की भरोसे न बैठ कर समूचे  हिन्दू समाज को स्वयं आगे आकर आवश्यक कदम उठाने पड़ेंगे.

-    शिव मिश्रा




पितृ पक्ष 2026 - एक दृष्टि:

  पितृ पक्ष 2026 - एक दृष्टि:   एक पीढ़ी का दूसरी पीढ़ी से संवाद  - शिव मिश्रा सनातन परंपरा में पितृ पक्ष पूर्वज...