शुक्रवार, 11 मार्च 2022

यूक्रेन रूस युद्ध से भारत को संदेश

 



आज के युग में जब दूसरे ग्रहों पर जीवन खोजने और जीवन की संभावना के लिए उचित वातावरण की खोज पर के लिए  बड़ी मात्रा में धन खर्च किए जा रहा हो, ऐसे में यूक्रेन-रूस  युद्ध में हजारों लोगों की जान जाना और लाखों लोगों  का बेघर हो जाना बेहद दुखी करने वाला है. युद्ध का कारण सिर्फ यह है कि यूक्रेन नाटो का सदस्य बनना चाहता था ताकि उसे सुरक्षा कवच मिल सके और  यदि यूक्रेन को नाटो की सदस्यता मिल गई होती तो अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो ने यूक्रेन में परमाणु हथियार और परमाणु मिसाइलें तैनात कर दी होती और तब रूस के अस्तित्व को हमेशा खतरा बना रहता. इस बीच कथित रूप से जैसे ही रूस को यह सूचना मिली कि यूक्रेन बायोलॉजिकल हथियार बना रहा है, उसने यूक्रेन पर आक्रमण कर दिया. रूस ने युद्ध रोकने की शर्त भी यही रखी कि न तो यूक्रेन नाटो की सदस्यता के लिए आवेदन करेगा और ना ही न तो उसे सदस्यता प्रदान करेगा और उसे इस बात की  गारंटी चाहिए. फिलहाल न तो  यूक्रेन इसे स्वीकार कर रहा है, और न ही  अमेरिका इस संबंध में कोई आश्वासन दे रहा है और इसलिए यूक्रेन की धरती पर भयंकर युद्ध चल रहा है और रूस की सेना भारी तबाही मचा रही है. हजारों लोग मारे जा चुके हैं, औद्योगिक प्रतिष्ठान, रिहायशी इलाके, सड़कें, पुल, सैनिक अड्डे और बड़ी बड़ी  इमारतें ही नहींऔर  पूरे के पूरे शहर तबाह हो चुके हैं. यूक्रेन के परमाणु बिजली घर रूस  के कब्जे में आ चुके हैं. यूक्रेन केवल नाक की लड़ाई लड़ रहा है इस युद्ध का परिणाम  यूक्रेन की बर्बादी के अलावा कुछ भी नहीं होगा.  

 

विश्व समुदाय की सहानुभूति स्वाभाविक रूप से यूक्रेन के साथ है क्योंकि आक्रमण रूस ने किया है और यूक्रेन में भारी धन जन की हानि हो रही है. भारत विश्व का पहला देश था जिसने अपने छात्रों और नागरिकों को निकालने की पहल की. अन्य देशों के नागरिकों के साथ यूक्रेन के  सामान्य लोग भी पलायन कर रहे हैं, जिनकी संख्या 20 लाख से ऊपर पहुंच चुकी है. इस बीच अमेरिका और यूरोपीय समुदाय ने रूस के खिलाफ कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं जिस कारण  यूरोप और अमेरिका  की कई  आईटी, फार्मा और वित्तीय क्षेत्र की कंपनियों ने रूस में अपना कारोबार बंद करने का फैसला किया है, इनमें एप्पल,  गूगल, मास्टर कार्ड वीजा कार्ड, अमेरिकन एक्सप्रेस और पेपाल  जैसी कंपनियां भी शामिल है. इसका रूस पर व्यापक असर दिखने लगा है.  कार्ड और पेमेंट सेटेलमेंट से संबंधित कंपनियों वीजा,  मास्टरकार्ड और अमेरिकन एक्सप्रेस के कारोबार बंद कर देने से क्रेडिट कार्ड बुरी  तरह से प्रभावित हो गए हैं और एटीएम कार्ड कैश निकालने का साधन मात्र रह गए हैं. ऑनलाइन खरीदने के आदी हो चुके लोगों को   ज्यादातर नकद  खरीदना पड़ेगा. ऐसे में एटीएम के बाहर लंबी लंबी कतारें लगी हैं और बैंक की शाखाओं में घुसने की जगह नहीं है क्योंकि सभी को कैश  चाहिए. इस कारण  अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह तेजी से बढ़ेगा और ऑनलाइन व्यापार भी बुरी तरह से प्रभावित होकर कैश ऑन डिलीवरी तक सीमित रह जाएगा. गूगल हमारे दैनिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया है. बात चाहे गूगल पर जाकर कुछ खोजने की हो, या  रास्ता ढूंढने की, गूगल सर्च इंजन के बिना हमारे जीवन में एक बहुत बड़ी रिक्तिता आ जाएगी.  जिन अमेरिकन कंपनियों के उत्पाद रूसी जनता ने खरीदे हैं उनके  पार्ट्स उपलब्ध न होने से "आफ्टर सेल्स सर्विस" बंद हो जाएगी और देश को बहुत बड़ा वित्तीय नुकसान होगा. हवाई क्षेत्र की कंपनी बोइंग जिसके बहुत सारे यात्री विमान रूस  ने खरीद रखे हैं उनका  रखरखाव और मरम्मत का कार्य बहुत मुश्किल हो जाएगा. यद्यपि इन अमेरिकन कंपनियों के रूस से  काम समेटने से उनका स्वयं उनका बहुत वित्तीय नुकसान होगा, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण डालर रूबल भुगतान बंद  हो जाने के कारण इन कंपनियों के लिए लिए कार्य करना संभव भी नहीं रह गया है.

इन प्रतिबंधों से भारत सहित दुनिया के देशों को तीन बहुत बड़े संदेश प्राप्त होते हैं-

१.पहला संदेश यह है कि जनता को अपने देश के सरकार का चुनाव  बहुत सावधानी से करना चाहिए  और उसका  मुखिया यानी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति कौन होगा इस पर  गंभीरता  पूर्वक करना चाहिए कि उनके वोट से जो  व्यक्ति  सरकार का मुखिया बनने  जा रहा हैं, उस व्यक्ति में  इस जिम्मेदारी के  निर्वाहन की क्षमता है भी या नहीं क्योंकि राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए. यूक्रेन में जनता ने 3 साल पहले जब वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की को राष्ट्रपति चुना था तब वह एक प्रसिद्ध कॉमेडियन थे लेकिन  बिना उनकी  राजनीति क्षमताओं को जाने केवल इस आधार पर कि वह एक अच्छे कलाकार हैं, राष्ट्रपति बना दिया. यह सही है कि रूस के आक्रमण के बाद जेलेंसिकी ने स्वयं सेना की वर्दी पहन ली और  जनता में राष्ट्रवाद की ऐसी अलख जगाई कि आज सेना के साथ आम नागरिक भी रूसी सेनाओं से लड़ने के लिए तैयार हैं . निश्चित रूप से इसकी प्रशंसा की जानी चाहिए लेकिन अगर जेलेंस्की की जगह यूक्रेन का राष्ट्रपति कोई सक्षम राजनीतिक सिटी युवा इस चर्चा व्यक्ति होता तो शायद युद्ध की नौबत ही नहीं आती. बिना नाटो की सदस्यता के भी यूक्रेन अपनी एकता अखंडता और संप्रभुता बनाए रख सकता था और रूस सहित  दुनिया के अन्य देशों के साथ अच्छे संबंध भी बनाए रख सकता था.

प्राप्त सूचनाओं के अनुसार अब जेलेंस्की ने रूस के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है कि वह नाटो की सदस्यता नहीं लेंगे और पूर्वी यूक्रेन के  दोनों क्षेत्र  डोनेत्स्क और लुहान्स्क पर रूस द्वारा घोषित स्वायत्तता स्वीकार करेंगे. इतने  बड़े राष्ट्रीय  नुकसान और जनधन की हानि कराने  के बाद जिस का आकलन करना बहुत मुश्किल है, जो रूस चाहता था, उससे कहीं ज्यादा  किया. एक देश के राष्ट्रपति में  राजनीतिक परिपक्वता के अभाव ने देश का इतना बुरा हाल कर दिया इसकी सहज कल्पना करना भी मुश्किल है. इस संबंध में भारत के मतदाताओं की समझदारी की प्रशंसा करनी होगी  जिन्होंने 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का 30 साल बाद मौका दिया था और उन्हें  निराश नहीं होना पड़ा  बल्कि  2019 में जनता ने पुनः मौका दिया. 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा को आशातीत बहुमत देकर  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 5 वर्ष के कार्यकाल को देखा और आज  जिन  राज्यों के चुनाव घोषित हुए हैं उनमें उत्तर प्रदेश सहित चारों भाजपा शासित राज्यों में जनता ने भाजपा को भारी बहुमत से पुनः विजयी  बनाया. 

 

२. दूसरा संदेश जिसे भारत और अन्य देशों को बहुत गंभीरता से ग्रहण करना चाहिए वह यह है कि बिना आत्मनिर्भरता के कभी भी बड़ा संकट सामने आ सकता है, विशेष तौर से वित्तीय, औद्योगिक और खाद्यान्न उत्पादन.  वित्तीय एवं बैंकिंग क्षेत्र में भारत ने  कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं, आज भारत की भुगतान व्यवस्था विश्व में सर्वश्रेष्ठ है. आरटीजीएस, एनईएफटी, आइएमपीएस और  यूपीआई भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में नवाचार के उत्कृष्ट उदाहरण है. कार्ड भुगतान और सेटलमेंट व्यवस्था में रूपे लगातार प्रगति कर रहा है और आज भारत में इस्तेमाल होने वाले कुल डेविड कार्ड में 60% की हिस्सेदारी रुपे कार्ड की है. यद्यपि क्रेडिट कार्ड क्षेत्र में रूपे  का दबदबा डेबिट कार्ड की तरह नहीं बन पाया है फिर भी सरकारी प्रोत्साहन के कारण रुपए ने उल्लेखनीय प्रगति की है और हम आशा कर सकते हैं कि आगामी वर्षों में  भुगतान और सेटलमेंट  हेतु  वीजा और मास्टरकार्ड जैसी विदेशी कंपनियों पर निर्भरता बहुत कम या खत्म हो जायेगी. प्रतिबंधों के बाद क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड  की भुगतान व्यवस्था से संबंधित जिन परेशानियों का सामना रूस की जनता को करना पड़ रहा है संभवत उस तरह की परेशानियां उन परिस्थितियों में भारत को नहीं आएगी.

 

३.     ३. तीसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है शिक्षा का क्षेत्र जिसमें  प्रत्येक देश को जितना संभव हो सके आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना चाहिए. भारत के लगभग  24000 छात्र यूक्रेन में चिकित्सा शिक्षा की डिग्री प्राप्त करने हेतु अध्ययन कर रहे थे, रूस के आक्रमण के बाद भारत सरकार को उन्हें ऑपरेशन गंगा के तहत निकालना पड़ा. इसमें एमबीबीएस प्रथम वर्ष से लेकर अंतिम वर्ष तक के छात्र हैं और ऐसे छात्र भी हैं जो इंटर्नशिप कर रहे थे. इन सभी के यूक्रेन वापस जाकर शिक्षा पूरी करने की संभावनाएं निकट भविष्य में बहुत कम है. इन सभी का भविष्य दांव पर लग गया है इनकी बची हुई पढ़ाई भारतीय मेडिकल कॉलेज में करवा पाना मुश्किल होगा और अगर ऐसा किया जाता है तो यह चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता करना होगा. वैसे भी जब कोई छात्र रूस, यूक्रेन, चीन, बांग्लादेश और नेपाल से एमबीबीएस की डिग्री लेकर आते हैं तो उन्हें भारत में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित प्रोफेशनल  परीक्षा पास करनी होती है और इसे भी बहुत कम छात्र पास कर पाते हैं. जो यह परीक्षा पास नहीं कर पाते हैं वी डॉक्टर नहीं बन पाते हैं और कोई दूसरा व्यवसाय या नौकरी चुनते हैं लेकिन इन छात्रों द्वारा विदेश में चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने के लिए किया गया बड़ा खर्चा बेकार चला जाता है.

 

यूक्रेन से लौटे हुए इन छात्रों के समक्ष एक नई चुनौती खड़ी हो गई है इसमें ज्यादातर ऐसे छात्र हैं  जिन्हें अभी मेडिकल डिग्री भी नहीं मिल पाई है, ऐसे में इन छात्रों को भारतीय मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश देना बहुत बड़ी चुनौती है. भारत में मेडिकल कॉलेज खोलने की गति इतनी धीमी रही है कि इनसे निकलने वाले डॉक्टर देश की बढ़ती जनसंख्या के लिए पर्याप्त नहीं है. इसलिए देश में हर जिले में राजकीय या निजी क्षेत्र मैं मेडिकल कॉलेज खोले जाएं जिससे एमबीबीएस की कुल उपलब्ध सीटों की संख्या बढ़ाई जा सके और छात्रों को चिकित्सा शिक्षा हेतु विदेश ना भाग ना पड़े.

-शिव मिश्रा

गुरुवार, 3 मार्च 2022

यूक्रेन-रूस संघर्ष : भारत में सरकार और विपक्ष की भूमिका

 


यूक्रेन पर रूस के आक्रमण का आज सातवाँ दिन है, जब मै यह लेख लिख रहा हूँ  और रूस की  आशा के ठीक विपरीत वह अब तक यूक्रेन की राजधानी कीव पर कब्जा नहीं कर पाया है. रूस इस युद्ध को जितना  आसान समझ रहा था वह  उतना ही मुश्किल साबित हो रहा है. यूक्रेन के आम नागरिक अपने देश की सेना के साथ मिलकर रूस की सेना का डटकर मुकाबला कर रहे हैं. राष्ट्रभक्ति की यह भावना सराहनीय है और इसके पीछे हैं  यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की, जो स्वयं सेना की वर्दी पहनकर सैनिकों के साथ दिखाई पड़ रहे हैं. उन्होंने अमेरिका के उन्हें सुरक्षित यूक्रेन से निकालने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और पलायन करने की बजाय आखिरी दम तक देश के लिए लड़ने का संकल्प लिया.

यूक्रेन   पर रूस के आक्रमण और उस पर पूरे वैश्विक समुदाय की प्रतिक्रिया के संदर्भ में हमें एक बात हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि यूक्रेन पर रूस का आक्रमण केवल रूस के कारण नहीं हुआ है बल्कि इसके पीछे अमेरिका और यूरोप के अनेक देशों सहित बहुत सी अंतर्राष्ट्रीय ताकतें भी शामिल हैं, जो किसी भी हालत में रूस और यूक्रेन के बीच तनाव बढ़ा कर युद्ध की स्थिति चाहती थी. इसके पीछे इन सभी के  अपने अपने स्वार्थ जुड़े हुए हैं. फिर भी रूस द्वारा एक स्वतंत्र और संप्रभु देश पर आक्रमण किसी भी हालत में उचित नहीं ठहराया जा सकता और इसकी निंदा होनी ही चाहिए.  

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के पूरे चार वर्ष के कार्यकाल में अमेरिका ने कोई नया युद्ध शुरू नहीं किया था बल्कि पुराने चल रहे संघर्ष से  भी निकलने की कोशिश की गई थी. इससे अमेरिका की हथियार बनाने वाली लॉबी उनसे बेहद नाराज थी और चुनाव में उन्होंने ट्रम्प का जमकर विरोध भी किया था और बिडेन का समर्थन. अमेरिका और सभी पश्चिमी देशों में रक्षा उपकरण हथियार आदि निजी क्षेत्र में बनाये जाते है और सरकारें ज्यादा से ज्यादा टैक्स लेने और राजनीतिक पार्टियों के लिए इनका समर्थन हासिल करने के लिए, अप्रत्यक्ष रूप से इनकी मार्केटिंग करती है. अब चूंकि बिडेन राष्ट्रपति हैं तो उन पर इसी हथियार लॉबी का जबरदस्त दबाव है, और इस कारण यूक्रेन और रूस में तनाव बढ़ाने के लिए जबरदस्त वातावरण तैयार किया गया. एक तरह से रूस को आक्रमण करने के लिए प्रोत्साहित किया गया या मजबूर कर दिया गया.

सोवियत संघ के विघटन के बाद 15 नये  देश बने उनमें यूक्रेन, रूस  के बाद यूरोप का सबसे बड़ा देश था  और परमाणु संपन्न भी लेकिन अमेरिका और नाटो देशों द्वारा आश्वासन के बाद यूक्रेन ने परमाणु निशस्त्रीकरण का फैसला लिया और अपने सभी परमाणु हथियार नष्ट कर दिये लेकिन उसके बाद भी यूक्रेन का न तो यूरोपियन यूनियन  और न हीं  नाटो में  प्रवेश हो पाया है और इस युद्ध में उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. वास्तव में सोवियत संघ के  विघटन के बाद  नाटो की आवश्यकता ही नहीं रह गई थी क्योंकि रूस आर्थिक रूप से बहुत  कमजोर हो गया था और इस तरह अमेरिका एकमात्र महाशक्ति बचा  था. अमेरिका, यूरोपीय देशों  और रूस के बीच बनी समझ के अनुसार नाटो को समाप्त किया जाना था और कम से कम इसका विस्तार तो बिल्कुल भी नहीं किया जाना था लेकिन अमेरिका ने न केवल नाटो को बनाए रखा बल्कि सोवियत संघ से बाहर आये नए  देशों को नाटो का सदस्य भी बनाया. यूक्रेन और जार्जिया  को भी नाटो की सदस्यता दिए जाने का प्रस्ताव था, जिसके बाद यदि नाटो देशों के परमाणु हथियार और मिसाइल यूक्रेन और जॉर्जिया में तैनात की जाती तो रूस को स्वाभाविक रूप से खतरा था. इसलिए रूस का यूक्रेन को नाटो  का सदस्य बनाए जाने का विरोध समझ में आता है.

रूस पहले ही जॉर्जिया में सैन्य अभियान चला कर उसके दो राज्यों पर कब्जा कर चुका है. यूक्रेन में चले रूस विरोधी आन्दोलन के  कारण रूसी समर्थित यूक्रेन के राष्ट्रपति यानोकोविच को देश छोड़कर भागना पड़ा था . रूस विरोधी माहौल के कारण यूक्रेन के रूसी भाषी क्षेत्र क्रीमिया में यूक्रेन सरकार के प्रति असंतोष के स्वर उभरे तो  रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने इस अवसर को भुनाया और क्रीमिया को रूस में शामिल कर लिया. क्रीमिया में सामरिक महत्व का हवाई अड्डा है जिसका नाटो के लिए भी बहुत महत्व था लेकिन क्रीमिया के रूस के साथ मिल जाने से, अमेरिका के लिए यूक्रेन को नाटो में शामिल करने का आकर्षण कम  हो गया. पुतिन ने यूक्रेन पर आक्रमण के बाद उसके दो पूर्वी क्षेत्र डोनेस्क और  लोहान्स्क को  स्वतंत्र देश की मान्यता प्रदान कर दी है.

राष्ट्रपति पुतिन ने रूस को कमजोर आर्थिक स्थिति से निकालने में महत्वपूर्ण योगदान दिया जिसके लिए यूरोपीय देशों को गैस की आपूर्ति करना बहुत बड़ा कारक था. कई यूरोपीय देशों के रूस से संबंध बहुत मधुर होते जा रहे थे, जो अमेरिका के हित में नहीं थे. यूरोप को गैस आपूर्ति करनेवाली रूसी पाइप लाइन यूक्रेन से होकर गुजरती है और इसके लिए यूक्रेन को काफी आकर्षक राजस्व भी मिलता था. यूक्रेन में रूस विरोधी माहौल बनने के बाद रूस ने यूरोप को गैस सप्लाई करने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करनी शुरू कर दी जिससे यूक्रेन को राजस्व का नुकसान होना तय था. इन परिस्थितियों में अमेरिका चाहता था कि नाटो के सदस्य देशों की नजदीकी रिश्ते रूस से न बनने दिये  जाए ताकि वे अपनी आवश्यकताओं के लिए अमेरिका पर निर्भर रहे. इसी प्रष्ठ भूमि से  तनाव बढ़ाने का कार्य शुरू किया गया जिसकी परिणिति रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण के रूप हुई.  

अमेरिका ने यूक्रेन में नाटो की सेना भेजने  से इनकार कर दिया  और रूस के भीषण आक्रमण का इंतजार किया. इस बीच पूरे विश्व में रूस के विरुद्ध प्रचार किया गया और सभी देशों को रूस के विरुद्ध लामबंद होने के लिए प्रेरित  किया गया. परिणाम स्वरूप ज्यादातर देशों ने रूस के हमले की न केवल निंदा की बल्कि वह अमेरिका के पक्ष में खड़े नजर आए लेकिन भारत ने रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण की निंदा तो की लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और महासभा में रूस के विरुद्ध प्रस्ताव में मतदान में हिस्सा नहीं लिया. तकनीकी तौर पर भारत की भूमिका भले ही तटस्थ हो लेकिन यूक्रेन सहित अमेरिका और पश्चिमी देशों ने इसे रूस के प्रति भारत का समर्थन माना यद्यपि अमेरिका ने भारत अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए भारत की भूमिका पर संतोष व्यक्त किया.

इस बीच अमेरिका और कई पश्चिमी देशों ने अत्याधुनिक हथियार उक्रेन को देने शुरू कर दिए. इनमे कुछ ऐसे हथियार हैं जिनका परीक्षण पहली बार हो रहा है. उपग्रह से इनके वीडियोग्राफी हो रही है. इनके विडियो वायरल किये जा रहें हैं  और उनकी सफलता की कहानियां बढ़ा चढ़ा कर बखान की जाती रहेंगी . पूरी दुनिया इन्हें देखेगी, कि कैसे  इन हथियारों की वजह से रूस को पीछे हटना पडा या कीव पर कब्जा करना मुश्किल हो गया. यूक्रेन के नागरिको के अदम्य साहस की सराहना तो होनी ही चाहिए लेकिन उनकी वीरता की कहानियों को बढ़ा चढ़ाकर सोशल मीडिया पर परोसा जा रहा है,  ताकि यूक्रेन के नागरिको का मनोबल ऊंचा बना रहे और हथियार चलाने वाले लोग लगातार उपलब्ध होते रहे और युद्ध लंबा खिंचे. आज यूक्रेन हथियारों का टेस्ट ग्राउंड बन गया है.

अनेक देशों पर इस युद्ध में प्रयोग हुए हथियार  खरीदने का मानसिक  दबाव होगा. हथियार कंपनिया मालामाल हो जायेंगी और इनके देश भी टैक्स पाकर खुश होंगे. एक बात और जिसे समझने की है कि यूक्रेन के मामले में कहा जा रहा है कि इस देश ने इतने हथियार दिए उस देश ने इतने दिए, ये सब भ्रामक है. ज्यादातर  हथियार भी  निर्माता कंपनिया ही देतीं है और इस तरह युद्ध भी परोक्ष रूप से वही लडती हैं. पूरे विश्व को रूस के पक्ष और विपक्ष में खड़ा करने की कवायद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केवल हथियारों की बिक्री बढ़ाना ही नहीं बल्कि रूस को खलनायक बना कर अलग थलग करना और हथियारों के व्यवसाय में  अधिकाधिक हिस्सेदारी हासिल करना भी है. भारत हथियारों की आपूर्ति के लिए अभी भी रूस पर काफी अधिक निर्भर है इसलिए रूस विरोधी लॉबी पूरा प्रयास कर रही है कि भारत भी रूस के विरुद्ध खड़ा हो जाए ताकि उसे अपने हथियार आपूर्ति के लिए अमेरिका और पश्चिमी देशों के पास जाना पड़े.

रूसी हमले से यूक्रेन की मूलभूत परियोजनाएं नष्ट हो रही है. धन जन की बहुत हानि हो रही है और अगर यूक्रेन बच भी गया तो इसकी भरपाई करने में दशकों लग जाएंगे. रूस पर भी अमेरिका और यूरोपीय देशों ने बहुत कड़े प्रतिबंध लगाए हैं. उसे स्विफ्ट सिस्टम से बाहर कर दिया गया है ताकि अंतरराष्ट्रीय भुगतान रुक जाए. इसके साथ ही रूस की परिसंपत्तियों को अमेरिका और यूरोपीय देशों में फ्रीज किया जा रहा है. आने वाले समय में रूस की आर्थिक स्थिति  बहुत खराब हो सकती है  और उसे   संभालने में  वर्षों लग जाएंगे. इसलिए यह आक्रमण यूक्रेन और रूस दोनों के लिए ही विनाशकरी शाबित होगा .

यूक्रेन इस समय जो भी कर रहा है वह अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रभाव  में कर रहा है क्योंकि वह  हर हालत में नाटो की सदस्यता चाहता है और इसलिए उनके  इशारे पर हर संभव कोशिश कर रहा है कि भारत संयुक्त राष्ट्र संघ सहित हर अंतर्राष्ट्रीय पटल पर यूक्रेन का साथ देकर रूस का विरोध करे. इसलिए भारतीय छात्रों को बंधक के रूप में इस्तेमाल करना, और उनके देश छोड़ने में बाधा उत्पन्न करना एक रणनीति के अंतर्गत किया जा रहा है. इसी दबाव के कारण यूक्रेन के सैनिक सीमा पर भारतीय छात्रों से अवैध वसूली भी कर रहे हैं. यही नहीं अंतर्राष्ट्रीय लॉबी भारत सरकार पर दबाव बनाने के लिए सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के माध्यम से इन छात्रों के अभिभावकों को मानसिक रूप से तोड़ने और सामान्य जनमानस में भारत सरकार की नकारात्मक छवि पेश करने का भी कार्य कर रहा है.

यह भी एक सोची समझी रणनीति है और आम भारतीय इसका शिकार होता जा रहा है. मोदी सरकार के विरुद्ध लगातार मुददे तलाशने वाली कांग्रेस और  अन्य  विपक्षी दल भी जाने अनजाने में इस अंतरराष्ट्रीय साजिश का मोहरा बन गए हैं. भारतीय छात्रों को यूक्रेन से वापस लाने की मांग को लेकर कांग्रेस ने  तो विदेशमंत्री के आवास के बाहर धरना प्रदर्शन और पुतला जलाने का कार्य शुरू कर दिया है. जब  भारत सरकार  सभी छात्रों को सुरक्षित देश वापस लाने के संकल्प के साथ ऑपरेशन गंगा के अंतर्गत  छात्रो की वापसी शुरू हो गयी है और चार केन्द्रीय मंत्री उक्रेन के पड़ोसी देशों में कैंप कर रहें हैं तो फिर दुष्प्रचार क्यों ? भारत विश्व का पहला ऐसा देश है जो यूक्रेन से अपने नागिरकों और छात्रों को सुरक्षित वापस लाने का कार्य कर रहा है. अमेरिका सहित विश्व के लगभग सभी देशों ने अपने नागरिको से स्वयं की व्यवस्था से यूक्रेन छोड़ने की एडवाइजरी जारी की है.

 भारत सरकार पर दबाव बनाने के उद्देश्य से, इन छात्रों से भी ऊलजलूल वीडियो बनवा  कर वायरल किए जा रहे हैं. भारतीय मीडिया भी न केवल रूस के विरुद्ध बल्कि भारत सरकार के विरुद्ध भी माहौल तैयार करने में सहयोगी बनती जा रही है. अगर हम इसे भूल भी जाएँ कि यूक्रेन ने अतीत में भारत का कई संवेदन शील मामलों में विरोध किया था, हम अपने राष्ट्रीय हितों को ताक रख कर रूस का विरोध नहीं कर सकते. यद्दपि भारत ने रूस के आक्रमण की निंदा की है और आपसी बातचीत द्वारा संकट के समाधान की अपील की है. देश वासियों और विपक्ष को भी इस तरह के दुष्प्रचार के दुष्चक्र को समझना चाहिए.

- शिव मिश्रा


मंगलवार, 22 फ़रवरी 2022

केजरीवाल आतंकवादियों से हाथ क्यों मिलाते हैं?

सत्ता का सिंहासन अरविंद केजरीवाल के लिए के लिए एक ऐसा नशा हो गया है, जिसे पाने के लिए वह कुछ भी कर सकते हैं आतंकवादियों से संबंध भी बना सकते हैं और खुद भी आतंकवादी बन सकते हैं. कुछ भी कर सकते हैं. ( ये जानते हुए भी कि आपके पास पढने के लिए समय नहीं होता, मैं विस्तार से लिख रहा हूँ )

अब तो उन्होंने स्वयं भी स्वीकार कर लिया है कि वह एक प्यारे आतंकवादी (स्वीट टेररिस्ट), हैं जिसने अस्पताल बनवाए हैं, स्कूल कॉलेज बनवाए हैं, लोगों की भलाई के लिए मुफ्त में चीजें दी हैं. आदि आदि.

यह सब उन्होंने कुमार विश्वास द्वारा किए गए खुलासे के कई दिन बाद बहुत सोच विचार के बताया लेकिन फिर भी कुमार विश्वास के आरोपों पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा.

शातिर राजनीतिज्ञ की तरह अपने ऊपर लगे आरोपों को ही हथियार बना लिया. कुछ लोग कह सकते हैं कि कुमार विश्वास ने चुनाव के वक्त ही यह सब क्यों बताया तो इसका जवाब कुमार विश्वास ने स्वयं दिया और यूट्यूब पर उनका वीडियो भी उपलब्ध है कि उन्होंने लगभग 2 साल पहले यह घटना बताई थी लेकिन उस समय किसी ने इसका संज्ञान नहीं लिया और अब क्योंकि चुनाव हो रहे हैं लोगों ने इस आरोप को हाथों हाथ ले लिया.

केजरीवाल ने दिल्ली के मतदाताओं को मुफ्त में कई चीजें देने की घोषणा की थी और कुछ दिया भी. वही सब घोषणाएं पंजाब में चुनाव के पहले की.

प्रश्न यह है कि जब आम आदमी समझता है कि यह सब कुछ अच्छा नहीं, देश हित में नहीं, तो फिर केजरीवाल ऐसा क्यों करते हैं ?

इसे समझने के लिए हमें यह जानना जरूरी है यह केजरीवाल पढ़े-लिखे चालाक व्यक्ति हैं और सत्ता के लालची भी लेकिन ऐसा करने वाले वह न तो भारत के पहले व्यक्ति हैं और न हीं विश्व के. अनेक देशों में ऐसा ही कुछ हो चुका है, सत्ता के संघर्ष में कई देश बिखर चुके हैं, लेकिन सत्ता प्राप्त करने वालों ने कभी इसकी चिंता नहीं की. एक ऐसा ही उदाहरण सोवियत रूस का है और वह है लेनिन का ?

रिचर्ड पाइप्स एक अमेरिकन इतिहासकार हैं जिन्होंने रूसी क्रांति पर एक किताब लिखी है जो पूरे विश्व में बहुत प्रसिद्ध है. इस पुस्तक का नाम है "थ्री व्हाईस ऑफ दि रशियन रिवॉल्यूशन" (Three Whys of the Russian Revolution) . इस पुस्तक में लेनिन के बारे में जो कुछ भी बहुत पहले लिखा गया है, वह काफी हद तक अरविंद केजरीवाल से मिलता जुलता है .

मेरे कहने का मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि अरविंद केजरीवाल इस किताब को पढ़कर लेनिन की कॉपी कर रहे हैं. इस किताब के पेज संख्या 44 और 45 के संबंधित भाग की फोटो नीचे है जिसके हाई लाइट को ध्यान से पढ़िए

( इसका हिन्दी में मतलब है कि लेनिन को अपने देश की बिल्कुल चिंता नहीं थी वह किसी भी व्यक्ति को कुछ भी देने के लिए तैयार रहता था और इसमें बिल्कुल भी दिमाग नहीं लगाता था कि क्या होगा क्योंकि उसे विश्वास था कि लूट की लूट बड़ी बात नहीं, स्वयं खत्म हो जाएगी और सब कुछ अपने आप समाप्त और सामान्य हो जाएगा .

उसे मलूम था कि देश के अल्पसंख्यक स्वतंत्रता मांग सकते थे, आत्म निर्णय के अधिकार की मांग कर सकते थे, अलग राज्य बनाने की मांग कर सकते थे, इसके लिए वह गारंटी भी देने के लिए तैयार था. इसके पीछे धारणा यह थी ऊपर बैठे लोग इस पर खुद जो करना है करें.

यह सब उसके लिए वरदान सिद्ध हुआ क्योंकि उससे प्रतियोगिता करने वाला कोई राजनेता नहीं था, कर भी नहीं सकता था. अपना उल्लू सीधा करने के लिए वह किसी के भी साथ सांठगांठ करने के लिए तैयार था चाहे वे विदेशी शक्तियां ही क्यों न हों, और देश गुलाम क्यों न हो जाए.

जर्मनी ने फ्रांस और इंग्लैंड के गद्दारों को भी अपने साथ मिलाने के लिए इस तरह की कोशिश की थी.)

केजरीवाल क्या कर सकते हैं क्या नहीं कर सकते हैं, इसका फैसला आप स्वयम कर सकते हैं लेकिन सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि भारत में शिक्षा का स्तर अभी भी जागरूकता के स्तर पर नहीं पहुंच पाया है और इसलिए न तो लोग ज्यादा पढ़ते / लिखते हैं और न ही चीजों को सही परिपेक्ष में समझने की कोशिश करते हैं.

ऐसा न करने देने के लिए बहुत सारी शक्तियां हर जगह सक्रिय रहती हैं, कोरा पर भी, जो आपके लिखने, पढने और सोचने की दिशा बदल देते हैं . आप चटनी और चाय बनाने, पानी पीने की विधि जानने और आज क्या देखा, क्या नहीं देखा में उलझ जायेंगे और अपना कीमती समय बर्बाद करेंगे . कभी दिल दिमाग लगायेंगे तो कोरा मॉडरेटर बीच में आ जाएगा, क्यों कि कोरा का अपना एजेंडा है.

जब राष्ट्रहित में अपेक्षित एक जैसी विचारधारा रखने वाले शिक्षित लोगों के बीच भी विभाजन होगा, तो देश को विभाजित होने में कितना समय लगेगा?

References- Three Whys of Russian Revolution by Richard Pipes


हिजाब के पीछे क्या है ?

 हिजाब न कभी मुद्दा था और न इस समय है, इस्लामिक राष्ट्रों में भी इस पर इस कदर  यह एक बहुत बड़ी अंतराष्ट्रीय  साजिश का हिस्सा है, जो संभवत तथाकथित  धर्मनिरपेक्ष और बहुतायत  हिंदुओं को समझ में नहीं आएगा. कर्नाटक उच्च न्यायलय ने हिजाब की अनुमति के लिए 4 मुस्लिम छात्राओं की ओर से दायर एक याचिका विचारार्थ  स्वीकार कर ली किन्तु  तुरंत कोई राहत देने से इंकार कर दिया और साथ ही निर्णय आने तक किसी भी विद्यालय में हिजाब पर रोक लगा दी है. इससे निराश कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गए और उन्होंने उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने और इस पर तुरंत सुनवाई की मांग की. सर्वोच्च न्यायालय ने तुरंत सुनवाई से इनकार करते हुए एक स्थानीय मुद्दे को राष्ट्रीय मुद्दा न बनाने का अनुरोध किया. 


हिजाब विवाद की शुरुआत भले ही अभी हाल की दिखाई पड़ती हो लेकिन इसकी तैयारी सितंबर २०२१  से की जा रही थी जब पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया  की सहयोगी संगठन केंपस फ्रंट ऑफ इंडिया ने कर्नाटक के विद्यालयों में सदस्यता अभियान शुरू किया. ये तथा कथित पीड़ित  चारों लड़कियां सितंबर माह से ही केंपस फ्रंट ऑफ इंडिया की सदस्य हैं और ट्विटर पर उनके हैशटैग अभियान का हिस्सा हैं और उसके सभी देश विरोधी ट्वीट को कॉपी पेस्ट करके ट्वीट करती  हैं. पीएफआई और सीएफआई दोनों ही शाहीन बाग और उसकेबाद  दिल्ली दंगे की तर्ज पर ही हिजाब विवाद को फैलाकर राष्ट्रीय बनाने की कोशिश की  है. 
अतीत में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा उन्हें  मिले  समर्थन के प्रति आश्वस्त इन संगठनों इन चारों में से एक  मुस्लिम लड़की के साथ अल्लाहुअकबर करते हुए वीडियो शूट किया जिसे वायरल किया गया. भगवाधारी युवकों के बारे में छानबीन की जा रही है लेकिन पुलिस का अनुमान है इसमें भी कई लड़के भी फ़िल्मी है. इनका एक निर्देशक इन युवकों को नियंत्रित करता हुआ देखा जा सकता है. हड़बड़ी में शूट किए गए इस वीडियो में फिल्मकार इस लड़की को चप्पल पहनाना और किताबें देना भूल गए और इस वीडियो की असलियत और उसके पीछे छिपी साजिश का पता लगाने में महत्वपूर्ण सूत्र बने.   

भारत का इतिहास जानबूझकर ऐसा लिखा गया था जिससे  बहुसंख्यक हिंदूओ को वास्तविकता से कभी परिचित न होने दिया जाए और सनातन संस्कृति और हिंदूओं  के सर्वमान्य तथ्यों को इस प्रकार  गलत ढंग से प्रस्तुत किया जाए ताकि वे कभी न असलियत जान सकें और  न हो सके. समाज की  इसी बुराई के कारण ही भारत को मुस्लिम आक्रांताओं का गुलाम होना पड़ा और बाद में अंग्रेजों का भी. इन दोनों मामलों में एक बात समान थी कि दोनों ने ही हिंदुओं में फूट डालकर हिंदुओं के माध्यम से ही हिंदुओं पर शासन किया. अन्यथा क्या इतनी विशाल आबादी वाले देश पर कुछ हजार सैनिकों वाले मुस्लिम आक्रांता और केवल  ४-५ हजार  अंग्रेज अपना शासन स्थापित कर पाते ?

1857 में जब स्वतंत्रता का  प्रथम संग्राम हुआ तो भारत के स्वतंत्र होने की संभावना बहुत ज्यादा थी क्योंकि यह सशस्त्र सैन्य विद्रोह के कारण शुरू हुआ था लेकिन हिंदू मुस्लिम विवाद खड़ा हो गया. मुस्लिम नेताओं का मत था की स्वतंत्रता के बाद अगर सकता हिंदुओं के हाथ में जाती है तो मुस्लिमों को क्या मिलेगा अगर संघर्ष के बाद हिंदुओं के अधीन ही रहना है तो अंग्रेजों के अधीन रहना क्या बुरा है. आंदोलन शुरू होने के पहले ही खत्म ना हो जाए इसलिए हिंदू नेताओं ने मुस्लिम नेताओं को मनाने की कोशिश की तो उन्होंने शर्त रख दी कि  स्वतंत्रता के बाद दिल्ली का  सिंहासन उसी को मिले जिससे अंग्रेजों ने छीना है, यानी मुगलों को. यह भी एक शर्त थी  कि आंदोलन का नेतृत्व भी कोई मुस्लिम ही करें. 

अंग्रेजों से छुटकारा पाने के लिए हिंदू  नेताओं ने  समझौता कर लिया. इस प्रकार आंदोलन का नेतृत्व दिल्ली के आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर द्वितीय के हाथों में दे दिया गया. उस समय उनकी उम्र 80 वर्ष के लगभग थी और  वह अपने पजामें  का नाड़ा भी अपने हाथ से नहीं बांध पाते थे.  इसलिए आंदोलन की सफलता तो संदिग्ध हो ही गई थी लेकिन इससे भी आगे बढ़कर बहादुर शाह जफर ने अपने स्वार्थ के कारण आंदोलनकारियों के साथ गद्दारी की और आंदोलनकारियों की  गतिविधियों की सारी सूचनाएं अंग्रेजों को प्रेषित करने लगे. लाल किला जिस पर उनका मालिकाना हक था, ₹1लाख पर अंग्रेजों को सैनिक छावनी के लिए किराए पर दे दिया. 

1885 में अंग्रेजों ने कांग्रेस की स्थापना भारतीयों को लटकाने भटकाने के लिए की थी ताकि स्वतंत्रता चाहने वालों को बातचीत के लिए एक मंच उपलब्ध करा दिया जाए जिससे 1857 जैसा विद्रोह पुनः ना उभर सके. अंग्रेजों ने कांग्रेस में उन्हीं नेताओं को उभरने दिया पर महत्त्व दिया जो उनके काम के थे. जातियों में बटे हिंदू समाज को विभाजित करने के अतिरिक्त अंग्रेजों ने हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच भी खाई बढ़ाने का काम किया. इसका परिणाम यह हुआ कि मुस्लिमों के लिए अलग देश की मांग उठाई गई. खिलाफत आंदोलन में कांग्रेस के समर्थन न देने से गुस्साए एक मुस्लिम नेता जौहर अली (जिनके नाम से आजम खान ने रामपुर में एक निजी विश्वविद्यालय की स्थापना की है) ने अफगानिस्तान के शासक को पत्र लिखा कि वह हिंदुस्तान पर आक्रमण कर दें और हिंदुस्तान के सभी मुस्लिम उनका साथ देंगे.

पाकिस्तान के रूप में अलग देश की मांग स्वीकार हो जाने के बाद भी मुस्लिम संतुष्ट नहीं थे और उस समय मुस्लिम लीग के एक बड़े नेता ने कहा कि पाकिस्तान उनकी आखिरी मांग नहीं है. मुस्लिमों को एक  बड़े नेता और शायर अल्लामा इकबाल, जिनकी तराने ज्यादातर भारतीय गुनगुनाते हैं उनका असली गाना इस प्रकार था-  "चीन-ओ-अरब हमारा हिन्दोस्ताँ हमारा, मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा" हालांकि बाद में बहुत दबाव पड़ने पर उन्होंने बदलाव किया  लेकिन फिर भी उनके दिल में था वह निकलता जरूर था  "हो जाए ग़र शाहे ख़ुरासान का इशारा, सज्दा न करूँ हिन्द की नापाक ज़मीं पर" .  इसमें इकबाल को दोष देना बेकार है क्योंकि यह इस्लाम के अनुसार ही है, जिसका पालन करते हुए कई देश इस्लामिक बना दिए गए और  इस्लाम की उत्पत्ति के बाद आज पूरी दुनिया में  ५७ मुस्लिम देश हैं और दुनियां की  दूसरी सबसे बड़ी आबादी मुसलमानों की है.

 यह तब तक चलता रहेगा जब तक पूरी पृथ्वी पर दुनिया के सभी देश मुस्लिम शासित नहीं हो जाते. गजवा ए हिंद की परिकल्पना इसी दिशा का एक छोटा सा कदम है. कश्मीर और केरल में प्रयोग किए गए और इन प्रयोगों को पश्चिम बंगाल सहित अन्य राज्यों में दोहराया गया. इस तरह के प्रयोग जहां जहां संभव हैं वहां किए जायेंगे  और इनसे उपजी परिस्थितियों का राजनीतिक दोहन और समर्थन करने  तथा अपनी राजनैतिक शक्ति बढ़ाने के लिए  छोटे बड़े मुस्लिम नेता देश में चारों तरफ घूम रहे हैं. चाहे चुनाव हो,  सोशल मीडिया, टीवी या इलेक्ट्रोनिक मीडिया या कुछ और  हो, सभी जगह अलग तरह की आवाज बुलंद की जा रही है.  सभी राजनीतिक दल वोटों  के लालच में इन्हें  समर्थन भी दे रहे हैं, भाजपा एकमात्र इसका अपवाद  है इसलिए वैश्विक रूप से मोदी और भाजपा के विरुद्ध सुनियोजित अभियान चला कर लांछित भी किया जा रहा  है.  

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में देशभर के मुल्ला और मौलवी भाजपा के विरुद्ध तकरीरे कर रहे थे और उन्हें अपने उद्देश्य में सफलता भी मिली. इस सफलता से उत्साहित होकर ही पांच राज्यों के चुनाव में प्रभाव  देखने  के उद्देश्य से और कर्नाटक विधानसभा के आगामी चुनाव को ध्यान में रखते हुए सांप्रदायिक विवाद खड़ा किया गया है. यह बहुत बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश है जिसके अंतर्गत अन्य देशों में भी भारत की सनातन संस्कृति की  सहिष्णुता को  अपमानित करने के लिए इस मुद्दे को तूल दिया जा रहा है. 

 देश में हर छोटे  बड़े शहर में प्रदर्शन हो रहे हैं और कांग्रेश, एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस सहित लगभग सभी दलों ने हिजाब की मांग का समर्थन किया  है और यह दल इन प्रदर्शनों में बढ़-चढ़कर भाग भी ले रहे हैं. एक छोटी सी जगह उडुपी से उठाये गए  इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर सफलतापूर्वक प्रसारित कर दिया गया है. यह भविष्य में घटने वाली किसी  बड़ी योजना का एक छोटा सा प्रयोग है कि  कैसे किसी छोटी सी स्थानीय घटना को व्यापक रूप दिया जा सकता है. नई  दवाइयां और सॉफ्टवेयर के प्रयोग ऐसे ही किए जाते हैं. यह अप्रत्यक्ष रूप से देश की न्याय व्यवस्था को भी प्रभावित करने की कोशिश है.  भारत सरकार को इस मुद्दे को अत्यंत गंभीरता से लेना चाहिए. 

जब  देश में हिजाब की मांग को लेकर धरना प्रदर्शन हो रहे हैं, पूरा देश आक्रोशित है, यह उचित समय है कि  सरकार को समान नागरिक संहिता कानून  लागू करने की दिशा में तुरंत आगे बढ़ना चाहिए. अगर वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो इस तरह की घटनाएं  हर उस देश में हुई थी, जो आज मुस्लिम  देश हैं. वहां भी  इस तरह की छोटी-छोटी घटनाओं को बड़ा बनाकर धरना प्रदर्शन और मजहबी  एकजुटता बनाने का काम होता रहा है. मजहब को खतरे में बताया जाता रहा है, विक्टिम कार्ड भी खेला जाता रहा है और इसके साथ सरकार पर दबाव बनाकर ज्यादा से ज्यादा अधिकार हासिल करने, संसाधनों पर कब्जा करने और जनसंख्या बढ़ाने का काम भी अनवरत किया जाता  रहा है.  धीरे-धीरे कितने ही ऐसे देश आज इस्लामिक राष्ट्र बन गए हैं. भारत इस वैश्विक षड्यंत्र का अगला निशाना है. 

विभाजन के बाद भारत में लगभग तीन करोड़ मुसलमान और 30 करोड़ हिन्दू  थे जो अब बढ़ कर  क्रमश:  30 और 100 करोड हो गयी है और अल्पसंख्यकों का अनुपात १०% से बढ़कर ३०% हो गया है. यदि अन्य देशों के  उदाहरण ध्यान में रखे  जाए तो हिंदू और मुस्लिम जनसंख्या का प्रतिशत धीरे-धीरे उस स्तर पर जा रहा है जहां से अन्य  देशों  में आंतरिक अव्यवस्था फैलाकर मजहबी प्रभुत्व बढ़ाने की कोशिश होती है. गांव कस्बों और राज्यों पर कब्जा करते हुए पूरे देश पर कब्जा कर लिया जाता है.

भारत में स्थिति अत्यंत  दुखद  और दुर्भाग्य पूर्ण है. राजनीतिक और अन्य कारणों से हिंदू समाज में विभाजन पहले से और अधिक गहराता जा रहा है. राजनीतिक दल अपने स्वार्थ में अंधे होकर भविष्य में  आने वाले बड़े संकट को अनदेखा कर रहे हैं. सभी देशभक्तों,  चाहे वह किसी भी  धर्म के क्यों न हों, विशेषतय: सनातन धर्मियों को, तुरंत सचेत होने की आवश्यकता है अन्यथा आने वाले संकट को टालना बहुत मुश्किल हो जाएगा.
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गुरुवार, 17 फ़रवरी 2022

भारत में बनेगी हिजाबी प्रधान मंत्री

  भारत में बनेगी हिजाबी प्रधान मंत्री : यह खतरे का आगाज ही नहीं, बल्कि खतरा आपके सामने मुहं बाए खड़ा है.

वैसे तो असदुद्दीन ओवैसी दादा / परदादा मंगेश ब्राह्मण थे, लेकिन धर्मांतरण के बाद ओवैसी परिवार का आचरण हिंदुस्तान और हिंदुओं के लिए तैमूर लंग से कम नहीं रहा है. ओवैसी का संबंध हैदराबाद के रजाकार संगठन से है, जो हैदराबाद में निजाम के इशारे पर हिंदुओं पर अत्याचार करता था और उन्हें मौत के घाट उतारता था. ओवैसी के पिता मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन के अध्यक्ष थे, जिसने रजाकार संगठन के साथ मिलकर हैदराबाद रियासत के भारत में विलय का विरोध किया था.

यह सभी हैदराबाद को स्वतंत्र देश बनाना चाहते थे या फिर उसका विलय पाकिस्तान में करना चाहते थे. हिंदुओं के खून खराबा और मारकाट से भरा यह विरोध उतना ही उग्र था जैसा कि देश का विभाजन. इस कारण भारत को स्वतंत्रता मिलने के एक साल बाद अक्टूबर 1948 में सेना की कार्यवाही के बाद ही हैदराबाद का भारत में विलय किया जा सका.

इसके बाद रजाकार संगठन और मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन पर प्रतिबंध लगा दिया गया. 1957 में इनके पिता सुल्तान सलाहुद्दीन ओवैसी ने इस पार्टी को दोबारा शुरू किया पार्टी के नाम में आल इंडिया जोड़कर इसे ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन कर दिया.

नाम बदलने के बाद भी पार्टी की सोच आज भी बेहद संकीर्ण संप्रदायिक और पाकिस्तानी विचारधारा की है. ये सब हिंदुस्तान में इसलिए नहीं है कि इनके दिल बदल गए या इन्होंने अलगाववादी प्रवृत्ति छोड़ दी बल्कि इसलिए हैं कि इनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं है और जिस दिन विकल्प होगा यह फिर एक नये देश की मांग करेंगे. इस लिए इनकी पार्टी बीच-बीच में 15 मिनट के लिए पुलिस हटाने, 15 करोड़ मुसलमान 100 करोड़ हिंदुओं पर भारी पड़ेंगे जैसे तराने गुनगुनाते रहते हैं.

ज्यादातर लोगों को यह बात मालूम नहीं होगी कि जिन लोगों ने आगे बढ़ चढ़कर पाकिस्तान बनाने की मांग की थी, उनमें से कोई भी व्यक्ति पाकिस्तान नहीं गया था. आपको जानकर हैरत होगी कि विभाजन के बाद भारत वाले भूभाग में लगभग चार करोड़ मुसलमान थे, जिन्हें पाकिस्तान जाना था, लेकिन गए केवल 72 लाख और उसमें भी लगभग 60 लाख लोग पंजाब से गए और बाकी पूरे हिंदुस्तान से गए. दक्षिण भारत के राज्यों से तो कोई भी नहीं गया और आज यही लोग कहते हैं कि यहां की मिट्टी में उनका खून मिला हुआ है. इस सब के लिए महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू भी जिम्मेदार हैं जिन्होंने सरदार पटेल और डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की पूरी आबादी की अदला-बदली की बात नहीं मानी और आज देश में फिर विभाजन कारी ताकतें सक्रिय हैं.

अल्लामा इकबाल, जौहर अली आदि ने तो यहां तक कहा था कि पाकिस्तान उनकी आखिरी मांग नहीं है. विभाजन की त्रासदी के बाद मिली. आजादी के तुरंत बाद पश्चिम बंगाल और असम मैं इतनी आपाधापी की गई कि यह दोनों राज्य हाथ से फिसलते फिसलते बचे और कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा चला भी गया.

कश्मीर में जिस तरह से मुस्लिम मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल में हिंदुओं का रक्तपात हुआ, संपत्तियां लूटी गयीं, महिलाओं के साथ दुराचार हुआ और इसका परिणाम हिन्दुओं के पलायन के रूप में हुआ. केरल में भी वही दोहराया गया और यही कार्य पश्चिम बंगाल में किया गया. आज अनेक राज्यों में मुस्लिम जनसंख्या सरकार बनाने की स्थिति में है.

पूरे भारत में मुसलमानों की जनसंख्या बहुसंख्यक लोगों की जनसंख्या का लगभग 30% है और यह संख्या ही खतरे का निशान है. ईरान, इराक, अफगानिस्तान और कुछ अन्य देशों में ऐसा ही हुआ जैसा आजकल भारत में हो रहा है और आज यह सभी इस्लामिक देश हैं.

असदुद्दीन ओवैसी आजाद भारत में जिन्ना की भूमिका में है और दुर्भाग्य से हर राजनीतिक दल जवाहरलाल नेहरु की भूमिका में है, सत्ता की लालसा और मुस्लिम वोटों के लालच में देश के भविष्य को गिरवी रखने का कार्य कर रहे हैं.

कर्नाटक के उडुपी में साजिशन रची गई एक घटना हिजाब को मुद्दा बना लिया गया और यह हिजाब उड़ता हुआ उत्तर प्रदेश के चुनाव में पहुंच गया. सारे राजनीतिक दलों ने इसे हाथों-हाथ लपक लिया. जहां समाजवादी पार्टी से हिजाब पर हाथ लगाने वालों के हाथ काटने का बयान दिया गया, प्रियंका वाड्रा ने हिजाब के समर्थन में कहा कि यह महिलाओं का अधिकार है कि वह हिजाब पहनती हैं या बिकनी. असदुद्दीन ओवैसी ने चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बना दिया और इस समय उत्तर प्रदेश में ज्यादातर मुसलमान हिजाब के पक्ष में ही गोलबंद होकर मत दे रहे हैं. सारे मुद्दे गौण हो गए हैं अब भाजपा बनाम सभी दल हो गए हैं.

ओवैसी का बयान कि "एक दिन भारत में हिजाबी प्रधानमंत्री बनेगा" बहुत गंभीर है और यह एक पूर्व नियोजित षडयंत्र की तरफ इशारा करता है. इस बयान का यह मतलब कतई नहीं है कि आज की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से चुनकर कोई मजहबी प्रधानमंत्री बनेगा क्योंकि ऐसा होने में किसी को कोई भी समस्या नहीं है क्योंकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और लोकतांत्रिक व्यवस्था से चुनकर कोई भी प्रधानमंत्री बन सकता है.

इसके पहले भी भारत के अनेक राज्यों में मुस्लिम मुख्यमंत्री और हिजाबी मुख्यमंत्री भी हुए हैं. 1980 में आसाम में अनवर तैमूर पहली महिला मुस्लिम मुख्यमंत्री बनी और मुफ्ती महबूबा सईद तो बकायदा मुख्यमंत्री रहते हुए भी हिजाब पहनती थीं. मुस्लिम पुरुष मुख्यमंत्रियों की एक लंबी फेहरिस्त है. इसलिए ओवैसी के बयान को किसी भी हालत में सामान्य बयान नहीं माना जा सकता. अपने बयान में ओवैसी ने यह भी साफ कर दिया कि हो सकता है कि उस समय तक वह शायद जिंदा ना रहें, लेकिन यह होगा जरूर. स्पष्ट है कि उनका इशारा सीधे-सीधे उस स्थिति और परिस्थिति की ओर है जब मुसलमान भारत में बहुसंख्यक होंगे और देश में हिजाबी प्रधानमंत्री बनेगा यानी इस्लामिक राष्ट्र और उसका रास्ता ghazwa-e-hind से होकर जाता है.

मुझे भी लगता है कि शायद यह होकर ही रहेगा, समय चाहे जो भी लगे. मैंने अब तक दुनिया के 20 देशों की यात्रा की है और वहां के मूल निवासियों से बात करने में अपने देश और अपनी संस्कृति के प्रति जितनी निष्ठा और समर्पण देखा है, वैसा हिंदुओं में देखने को नहीं मिलता. बड़ी संख्या में ऐसे हिंदू मिलेंगे जिनका अपने निजी स्वार्थ या विभिन्न कारणों से इतना नैतिक पतन हो चुका है कि वह समझ ही नहीं पा रहे हैं कि वह क्या कर रहे हैं और इस कारण वे जाने अनजाने में इन षड्यंत्रकारियों के साथ ही खड़े नजर आते हैं.

ऐसे में असदुद्दीन ओवैसी के बयानों से खतरे का आगाज भले ही हो लेकिन उन्होंने अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अनवरत चलाए जा रहे षड्यंत्र की सच्चाई बयान की है. अब यह आप पर निर्भर करता है कि इसे अस्वीकार करें या रोकने के लिए कुछ करें.

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- शिव मिश्र 



केजरीवाल ने पंजाब चुनाव में खालिस्तान अलगाववादियों का सहयोग लिया

 

लोग शायद भूलने लगे होंगे अन्ना हजारे को, और उनके द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन को. लोगों को अब यह भी ठीक से याद नहीं होगा यह आंदोलन किस लिए किया गया था? स्वयं अरविंद केजरीवाल भी यह सब भूल गए हैं.

अन्ना हजारे द्वारा शुरू किए गए आंदोलन की लोकप्रियता को अरविंद केजरीवाल ने पूरी तरह से भुनाया और अन्ना हजारे को दूध की मक्खी की तरह फेंक दिया. लोगों को शक हुआ कि कहीं यह राजनीतिक आंदोलन तो नहीं है, तो अरविंद केजरीवाल ने अपने बच्चों की कसम खाकर लोगों को विश्वास दिलाया कि वह राजनीति में नहीं आएंगे, लेकिन आ गए .

जब उन्होंने राजनीतिक पार्टी बनाई तो बड़ी-बड़ी बातें की, शुचिता और ईमानदारी स्थापित करने कीबड़ी-बड़ी बातें करके लोगों की आशायें आसमान में चढ़ा दी. अभावों में जीने वाले लोग बहुत आशावादी होते हैं और उन्हें हमेशा किसी ने किसी चमत्कार की आशा बनी रहती है. लोगों ने अरविंद केजरीवाल से भी चमत्कार की उम्मीद लगा ली.

अरविंद केजरीवाल के साथ सामान्य लोग ही नहीं, पढ़े लिखे जागरूक और समाज सेवा का जज्बा रखने वाले लोग भी शामिल हो गए.

पार्टी को दिल्ली राज्य की सत्ता तो हासिल हो गई लेकिन केजरीवाल का बौनापन, न्यूनता और वैचारिक संकीर्णता उनका पीछा नहीं छोड़ रही थी. अपने से बड़े कद के अपने साथियों से उहे कुर्सी और राजनीतिक अस्तित्व के लिए हमेशा खतरा दिखाई पड़ता था.

इसलिए उन्होंने एक-एक करके सभी ऐसे लोगों को पार्टी से निकाल बाहर किया चाहे वह योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे शातिर आदमी हों या कुमार विश्वास जैसे विद्वान साहित्यकार.

ऐसे लोग सत्ता पाने के लिए कितना गिर सकते हैं और क्या क्या कर सकते हैं इसका अंदाजा लगाना भी बहुत मुश्किल है.

कुमार विश्वास ने ए एन आई को दिए इंटरव्यू में जो रहस्योद्घाटन किए हैं वह सभी देशभक्त नागरिकों के लिए बहुत व्यथित और विचलित करने वाले हैं. पिछले पंजाब विधानसभा चुनाव के समय भी आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने की काफी हवा बनाई गई और केजरीवाल ने पाकिस्तान समर्थित खालिस्तान की मांग करने वाले संगठनों से जो सीमा पार से पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ मिलकर कार्य करते हैं, से भी वित्तीय सहित हर तरह की सहायता ली.

कुमार विश्वास जैसे पार्टी सदस्यों ने जब उन्हें इसके संभावित खतरे से आगाह किया तो केजरीवाल ने जवाब दिया कि इन्हें आपस में लड़वाकर वह स्वयं पंजाब के मुख्यमंत्री बन जाएंगे और खालिस्तान आंदोलनकारियों के कारण यदि पंजाब भारत से अलग होकर खालिस्तान बन जाता है तो वह खालिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री बनेंगे. 

इंटरव्यू के लिए क्लिक करे 

https://twitter.com/i/status/1493846434164383745

इससे बड़ी नीचता और कुछ नहीं हो सकती. केजरीवाल, ओवैसी, महबूबा मुफ्ती और फारूक अब्दुल्ला मुफ्ती में क्या फर्क है. बाकी लोग तो भूमिका बना रहें हैं लेकिन केजरीवाल तो योजना बना रहे हैं?

राजनीति में स्वच्छता और इमानदारी की मिसाल कायम करने वाला व्यक्ति सत्ता पाने के लिए इस कदर बेकरार है कि कि देश बेचने या तोड़ने से कोई परहेज नहीं है.

आज दिल्ली में जगह जगह शराब की दुकानें खुल गयी हैं, अविकसित और कच्ची कॉलोनियों में भी दुकान खुली है. शराब का सिंडिकेट केजरीवाल की सरपरस्ती में काम कर रहा है. यदि पंजाब की जनता भूलवश केजरीवाल को सत्ता सौंप देती है, तो ड्रग और धर्मांतरण से कराह रहे पंजाब का क्या हाल होगा, कहना मुश्किल है.

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- शिव मिश्रा 

देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था

भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ल...