शनिवार, 11 सितंबर 2010

कैसे.. कैसे.. लोग

खुद मरने की मन्नत मनाते हैं लोग,
हंसते हंसते भी रोते से रहते है लोग .

सूना घर     है   कोई रहने वाला नहीं  ,
छत में रहने को कितने तरसते हैं लोग.

कोई      अपना नहीं कोई     सपना नहीं,
कितने अपने भी सपने से लगते हैं लोग.

फासले हैं   बहुत फिर    कितने    करीब ,
कितने अपनो    से दूरी बनाते   हैं लोग .

क्यों ज़नाज़ा गया ? जानते हैं सभी,
फिर भी मरने से कितना डरते हैं लोग.

ऐ सितम अब शिव पर क्या भरोसा करे,
अपनी छाया से अक्सर डरते हैं लोग..
________________________________
             - शिव प्रकाश मिश्र
                मूल कृति जून १९८०
________________________________

दाग हूँ मैं.....

छोड़ दो साथ अब मेरा एक बुझता चिराग हूँ मै,
नहीं भाता   किसी को वह बदनुमा      दाग हूँ मै,
यही दुर्भाग्य है मेरा    न आया काम     कुछ तेरे,
सिवा दुःख दर्द  गम के    नहीं  था पास कुछ मेरे,
आज चाहो तो मुझे अंतिम मधुर मुस्कान दे दो,
दिया हो ना किसी को   या  वही  अपमान दे दो,
अँधेरी  वादियों में भटकता   विरह का राग हूँ मैं,
नहीं भाता    किसी को वह     बदनुमा दाग हूँ  मै !  ......१....

आत्मा पर बोझ बन कर, चाह कर भी न बोल पाया,
रिस रहे घाव अंतर में ,कभी उनसे नहीं   पर्दा उठाया,
आज   चाहे इस तपस्या  का  यहीं अवसान कर दो,
कहूँगा    कुछ     नहीं    चाहे   मुझे बदनाम कर दो,
नहीं      बुझती  कभी,       ऐसी सुलगती आग हूँ मैं,
नहीं  भाता   किसी    को  वह बदनुमा  दाग हूँ मै !!   .....२....
...........................................................................
          - शिव प्रकाश मिश्र
...........................................................................

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

कोई खयालो में क्यों..... नहीं ....होता ....?

आसमां  क्यों नहीं झुकता,
समुंदर क्यों नहीं थमता,
प्रेम का अंकुर पनप कर ,
हिमालय क्यों नहीं होता?



चांदनी मन में खटकती,
हवा तन मन को झुलसती,
कूक कोयल की न भाए,
मेघ सावन में रुलाएं,
कोई भी मौसम यहाँ पर ,
सुहाना क्यों नहीं होता ?



पंथ लम्बा भ्रमित राही,
दर्द बन कर घटा छाई,
उष्ण बालू फटे छाले ,
कौन पीड़ा को संभाले,
कोई भी अपना यहाँ पर,
अपना क्यों नहीं होता ?


नेह के बंधन जटिल है ,
नीद में पंछी बिकल है,
जिंदगी का क्या ठिकाना,
खो गया है आशियाना,
प्रेम का आँचल यहाँ पर,
बसेरा क्यों नहीं होता ?


नींद पलकों में नहीं है ,
ख्वाब है न इंतजार,
मन है व्याकुल तन सुलगता ,
दिल बहकता बार बार,
कोई आकर ख्यालो में,
हमारा क्यों नहीं होता ?


***** शिव प्रकाश मिश्र******

आपका काम तमाम

चुनाव प्रचार में
बोले एक नेता
बेरोजगार मै भी हूँ,
 मुशीबतो का मरा हुआ.
काम जब मिला नहीं,
 चुनाव में खड़ा हुआ ..
मेरी हालत पर,
 सब लोग रहम कीजिये.
वोट न सही चंदा ही दीजिये..
आपकी सब बातें,
 अक्सर भूल जाता हूँ.
पर आपका चुनाव चिन्ह,
 याद दिलाता हूँ..
कोचिंग दल बदल की अच्छी चलाता हूँ,
कुछ नहीं दे सका विश्वास तो दिलाता हूँ..
नौकरी नहीं तो आरक्षण
 जरूर दूंगा,
आप मेरा काम करिए
आपका काम तमाम
कर दूंगा..
`````````````````````````````````````````
 - शिव प्रकाश मिश्र
````````````````````````````````````````

आज का इन्सान

सरे बाज़ार में इमान धरम बेच  रहे है,
बोलिया बोल कर इन्सान का मन बेच रहे है !
रक्त अधरों पे उदित हास क्या करे  कोई,
साजे गम फ़ख्र के आने की तपन सेंक रहे हैं !!

मांगने पर नहीं मिलता था कभी कुछ जिनसे,
धरम के नाम पर आकर के रहम बेंच रहें हैं !
आश भगवान    से  इन्सान क्या    करें कोई,
आज इन्सान ही इन्सान का खुद बेंच रहे हैं !!
===========================
-----  शिव प्रकाश मिश्र
===========================

रोज़ी और रोटी

मेरी कहानी
 बिखर रही है,
स्वप्निल प्रासाद में,
 रोशनी खुद भटक रही है,
कांप रहा है मेरा भविष्य,
 मेरे ही हांथो में.
जान बूझ कर
 कोई डालता है,  गरम रेत,
 मेरे फूटे हुए छालो में.
विचारो के वातायन से
 गिर रहा हूँ मै,
 धरती पर,
पग पग पर,
ठोकर ,
और
हर ठोकर पर
वास्तिविकता का एक नया अनुभव.
आ पड़ा है मेरे दिल पर
एक भारी भरकम बोझ अनायास ही,
असंतुलित से कदम,
पड़ रहे है,
कहीं के कहीं.
मिल रही है,
कृतिमता,छुद्रता और समस्याओं की
असहनीय चिकौटी,
मेरे नेत्रों के धुंधलके में,
चमक रहे है सिर्फ दो शब्द,
रोज़ी और रोटी.........!
=================
     शिव प्रकाश मिश्र
=================

सिर्फ तेरा साथ हो

जुल्फों की छाँव में,
 सपनो के गाँव में,
 अधरों को ढूड़ता,
 नन्हा सौगात हो.

घर में जमात में ,
दिल में दवात में,
 बचपन से खेलता,
जवानी का हाथ हो.

आँखों से आँखों में,
 टूटती सांसो में ,
कस्तूरी महकता ,
अपना जजबात हो.

सावन के झूलों में,
 वर्षा की बूंदों में,
 प्रेम से भीगता ,
सिर्फ तेरा साथ हो..
*****************
शिव प्रकाश मिश्र
*****************

देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था

भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ल...